हसीनाबाद, सन 1975 । 

जमुना ने ज्योंही बग्घी घर के सामने रोकी, उसकी साँसें अटक गयीं। अंदर से आ रही बातचीत की आवाज़ ये इंगित कर रही थी कि पशुपति घर पर आया हुआ था। उसकी बीवी और छोटी सी बेटी एक नरभेड़िये से रूबरू हैं; जेहन में ये ख्याल आते ही कि जमुना के होश फाख्ता हो गये। वह बग्घी से कूदा और आँधी-तूफ़ान बना हुआ घर के अंदर भागा। उसकी जान में जान तब आयी, जब बैठक के दरवाजे पर पहुँचने पर उसने पाया कि पशुपति का बर्ताव एक सामान्य इंसान की तरह ही था।

वह चारपाई पर बैठा हुआ था। जमुना की चार साल की बेटी उसकी गोद में खेल रही थी जबकि उसकी बीवी चारपाई से थोड़ी ही दूरी पर जमीन पर चटाई बिछाकर बैठी हुई थी। जिस तहजीब के साथ पशुपति उसकी बीवी से बातें कर रहा था, उससे बोध होता था कि वह नरभेड़िया होने के साथ-साथ सभ्य और व्यवहारकुशल इंसान भी था।

“लीजिये भाई साहब, ये तो आ गये।” जमुना पर नजर पड़ते ही उसकी बीवी खींसे निपोरते हुए बोली।

दरवाजे पर ठहरकर साँसें संयत कर रहे जमुना को देख पशुपति के चेहरे पर अप्रत्याशित गंभीरता छा गयी। उसकी व्यवहारकुशलता और मिलनसारिता मानो पल भर में ही कपूर की भांति उड़ गयी लेकिन उसकी भंगिमाओं में आये परिवर्तन को मात्र जमुना ने ही महसूस किया। उसकी बीवी की आँखों में तो अब भी उसके लिए अथाह सम्मान उमड़ रहा था।

पशुपति, जमुना को तीक्ष्ण नेत्रों से घूरते हुए मुस्कुराया, मानो चेतावनी के तहत जता रहा हो कि उसकी पहुँच उसके हर चाहने वालों तक है तत्पश्चात बोला- “कल रात आप हमें खाना पहुँचाने नहीं आये थे जमुना जी इसलिए हम आपके लिए फिक्रमंद हो गये थे और सुबह होते ही भागे-भागे यहाँ चले आये। फिर भाभी जी से मालूम हुआ कि आप किसी जरूरी काम से बाहर गये हैं।” पशुपति ने ‘जरूरी’ शब्द पर ख़ासा जोर देते हुए कहा। जमुना ने गौर किया कि आख़िरी वाक्य बोलते समय उसके कान के पास जबड़ों का उभार नजर आया था।

“हमें बताकर वो जरूरी काम करने जाते आप तो क्या हम आपको मना कर देते, जाने नहीं देते?” पशुपति ने अर्थपूर्ण लहजे में अपना कथन आगे बढ़ाया- “कल रात भर भूखे रहे हम। हमारी भूख शांत करने के लिए कोई इंसान भी हमारे पास नहीं था।”

पशुपति का द्विअर्थी कथन सुनकर जमुना की दशा और बिगड़ गयी। उसने बीवी की ओर देखा, जो आँखों ही आँखों में उससे कह रही थी:

‘इतने शरीफ़ और रईस आदमी के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया तुमने?’

“क..काम ही..ऐसा था...बाबू साहब कि....आनन-फानन जाना पड़ गया।” आख़िरकार किसी तरह जमुना ने मुँह खोला।

“अरे कोई बात नहीं।” पशुपति ने सहज भाव से हँसते हुए कहा- “हमें कोई शिकायत नहीं है, हम तो उल्टा आपके लिए परेशान हो रहे थे।” उसने गोद में खेल रही बच्ची को चारपाई पर बैठाया और उठकर खड़ा हो गया।

“बाहर आइए।” जमुना के करीब पहुँचकर उसके कान में फुसफुसाते हुए वह बैठक से बाहर निकल गया।

जमुना भी काँपते पैरों के साथ उसके पीछे-पीछे बाहर आया।

“क...क्यों....?” पशुपति ने अपनी आग उगलती आँखों से जमुना की आँखों में झाँकते हुए पूछा- “क...क्यों किया आपने ऐसा?”

उसके रक्ताभ नेत्रों में पानी उतर आया था और लहजा यूँ काँप रहा था, जैसे

अपने भीतर उफ़न रहे वहशत के तूफ़ान को वह अपनी प्रवृत्ति के विरुद्ध जाकर दबाने की कोशिश कर रहा हो।

“म...मुझे...मुझे....माफ़....।” भय से जमुना की रुलाई फूटने को आ गयी।

“नहीं...नहीं...।” पशुपति उसके मुँह पर हाथ रखते हुए बोला- “यहाँ नहीं, यहाँ आपकी बीवी और बच्ची बाहर आ सकती हैं। आपको यूँ डरकर गिड़गिड़ाते हुए देखेंगी तो उन्हें अच्छा नहीं लगेगा। परिवार का मुखिया परिवार के सदस्यों के लिए नायक होता है इसलिए उसे कभी भी अपनी भीरु प्रवृत्ति को परिवार के सामने उजागर नहीं होने देना चाहिए, वरना परिवार का मनोबल टूटता है।” पशुपति ने सर्द लहजे में आगे कहा- “आइए, घर के पीछे चले।”

और फिर वह जमुना हाथ पकड़कर उसकी मर्जी के खिलाफ़ उसे लगभग खींचते हुए लेकर घर के पीछे पहुँचा, जहाँ पूर्णतया एकांत था तत्पश्चात खामोश होकर अपनी निगाहें उसके चेहरे पर गड़ा दीं।

“मैं...मैं डर गया था...।” जमुना इस बार अपनी रुलाई न रोक सका और गिड़गिड़ाते हुए पशुपति के पैरों पर गिर गया- “मुझे बख्श दीजिए...मेरी चार साल की बच्ची अनाथ हो जायेगी।”

“आपको मालूम है जमुना जी कि आपने क्या किया है हमारे साथ? खुद अपनी आँखों से देखिए।”

पशुपति ने अपनी कमीज उतार दी और इसी के साथ जमुना का कलेजा दहल गया। सामने खड़े उस नरभेड़िये के दर्द की कल्पना से वह द्रवित हो उठा। पशुपति के इस्पात के समान मजबूत और गठीले जिस्म पर चाबुक की मार की शक्ल में जले हुए के अनगिनत ताजा जख्म थे। ऐसा मालूम होता था, जैसे किसी ने उसके बदन पर अंगारों के समान दहकते हुए चाबुक बेतहाशा बरसाए हों।

“क्या बिगाड़ा था हमने आपका?” पशुपति ने दर्द पीने की कोशिश करते हुए पूछा।

“म..मैं...मैं...डर गया था साहब।”

“क्यों?” इस दफा पशुपति के जबड़े खुद ब खुद भींच गये- “क्यों डरे? क्या हमने आपको या आपके जैसे किसी इंसान को कभी कोई नुकसान पहुँचाया?”

“आपने कबाइलियों के साथ जो किया, उसने मुझे खौफ़जदा कर दिया था। मुझे ये डर सताने लगा था कि अगली पूर्णमासी को कस्बे की बारी आयेगी।”

“अगर हमें इंसानों की बस्तियां ख़त्म करनी होती तो हम ये काम कबाइलियों को ख़त्म करने के बाद क्यों करते? अगर हमें आपको ख़त्म करना होता तो हम ये काम उसी वक्त क्यों नहीं कर देते, जब आपने हमारे मना करने के बावजूद हमारा ख़त खोलने की हिमाकत की थी? आपको हर बार छिपी चेतावनी देकर क्यों छोड़ते जाते?” पशुपति ने क्षणिक अंतराल के बाद आगे कहा- “हमने उन निकृष्ट कबाइलियों को मौत के घाट उतारा क्योंकि वे थे ही इसी लायक।” उसका लहजा घृणा से भर उठा- “लेकिन उन कबाइलियों के हश्र में आपने अपना भविष्य देखने की गलती कर ली, क्यों?”

पशुपति के ‘क्यों’ के जवाब में जमुना केवल सिसकता रहा।

“कल रात दो घंटे तक हमारे बदन पर चाबुक बरसते रहे, हम तड़पते रहे, दर्द से चीखते रहे; और ये सब हुआ आपके कारण। आपको लगा, वो पीर सैय्यद अपने रूहानी इल्म से हमें क़त्ल करके आपका डर दूर कर देगा, बेशक वो कर देता। अगर घंटे भर उसकी रूहानी चाबुक और हम पर बरसती रहती तो हम जरूर एक लाश बन गये होते लेकिन ये न तो आपको मालूम था और न ही आपके पीर को कि हमारे सिर पर किसका हाथ है।” पशुपति की आँखें चमक उठीं।

“क...किसका...किसका हाथ है?” खौफ़जदा होने के बाद भी जमुना अपनी इस उत्सुकता को जब्त न कर सका कि वह कौन था, जिसने पीर को इतनी बेरहम मौत दी थी।

“उसका हाथ है, जिसने आपके पीर को दो टुकड़ों में चीर दिया, जिसने हमारे प्रारब्ध से वाकिफ़ होते हुए भी हमें तब अपनाया, जब हमारे अपने हमें ठुकरा चुके थे। पर हम ये आपको क्यों बता रहे हैं, आप तो डरे हुए हैं। हमें तो आपका डर ख़त्म करना है।”

सहसा पशुपति के चेहरे पर हिंसक भाव उभरे और उसने जमुना का गला अपने दाहिने पंजे में जकड़कर उसे दीवार से सटा दिया।

“हाँ, हम नरभेड़िया हैं।” पशुपति की वहशत पूरी तरह बाहर आ गयी- “हमने कबाइलियों को क़त्ल करने के लिए रणनीति बनायी। आपके जरिये हमने एक कबाइली से मेल-जोल बढ़ाया और फिर धीरे-धीरे कबीले के हर राज़ से वाकिफ हो गये हम। इस राज़ से वाकिफ हो गये कि नरभेड़िये को मारने वाला चाँदी का खंजर उन्होंने कहाँ रखा है और इस राज़ से भी वाकिफ हो गये कि पूर्णमासी को होने वाली उनकी रस्म में ऐसी क्या ख़ास बात होती है, जो उन्हें नरभेड़िये से महफ़ूज रखती है।” पशुपति ठहरा और कुछ पलों तक जमुना के खौफ़जदा चेहरे को देखकर तृप्त होता रहा तत्पश्चात बोला- “जानना चाहेंगे कि उस पूर्णमासी की रात जब मैं बरामदे में बैठा चाँद को देख रहा था और किताब में लिखे होने का हवाला देकर हूबहू आपकी ही हालत को शब्दों का रूप देकर आपको डरा रहा था तो नरभेड़िया क्यों नहीं बन रहा था, जबकि आकाश में पूरे आकार का चाँद मेरी आँखों के सामने ही चमक रहा था?”

जमुना की साँसें पल-प्रतिपल थमने की कगार पर पहुँच रही थी और वह

पशुपति के किसी भी सवाल के जवाब में केवल छटपटाहट ही व्यक्त कर पा रहा था।

“क्योंकि यही तो तासीर थी, उन कबाइलियों की रस्म में, उनके गीतों में, जिसे वे जोर-जोर से चिल्लाकर गाते थे।” पशुपति ने जमुना की छटपटाहट को नजरअंदाज करते हुए कहा- “उनके वे गीत वृकमानव शाप से ग्रस्त इंसानों के भीतर छिपी पाशविकता को सतह पर आने से रोककर उन्हें भेड़िया मानव बनने से रोकते थे ताकि अगर उनके बीच या आस-पास कहीं भेड़िया-मानव हो तो वह नरभेड़िया में तब्दील होकर उनका शिकार न करने पाये और पूर्णमासी की रात सकुशल गुजर जाए। कबाइलियों के उन गीतों के स्वर उस रात बरामदे तक आ रहे थे, मद्धिम ही सही, लेकिन आ रहे थे और हमें नरभेड़िया बनने से रोक रहे थे।” पशुपति ने क्षणिक अंतराल के बाद कहा- “उस रात के अनुभव के बाद हमें इल्म हुआ कि जो स्तुतिगान दूर रहकर भी हमारी पाशविकता को सुप्तावस्था में पहुँचा सकते थे, उन स्तुतिगानों के होते हुए हमारा भेड़िया मानव के रूप में कबीले में जाकर कबाइलियों को क़त्ल करना असंभव था इसलिए हमने इसका पूरा प्रबंध किया कि उनका स्तुतिगान हमारे कानों में न जाने पाए हालाँकि ये नामुमकिन था कि कान में रूई या उंगली ठूँसने जैसे मामूली तरीके अपनाकर उन भीषण आवाजों से बचा जा सके लेकिन फिर भी हमने ये किया। वे स्तुतिगान हमारी पाशविकता को सिर उठाने से नहीं रोक पाए थे, इसलिए नहीं रोक पाये थे क्योंकि उस रात कबाइलियों को करीब देखकर उनके खिलाफ़ हमारे भीतर छिपी दशकों पुरानी नफ़रत और क्रोध इस कदर हमारे जेहन पर तारी हुई थी कि उनका स्तुतिगान भी हमारी पाशविकता और वहशत पर अंकुश न लगा सका था, मुझे आदमभेड़िया बनने से न रोक सका था।” पशुपति की आँखों में एक अजनबी सा उन्माद भर आया। उसके हलक से इस बार आवाज़ निकली तो वह किसी शेर की गुर्राहट के समान थी- “हमारा काम पूरा हो चुका था जमुना। हम कबाइलियों से अपना प्रतिशोध भी साध चुके थे और अमरोज़ से भेंट भी कर चुके थे, लिहाजा हम तो आज खुद ब खुद इंसानों की इस बस्ती से चले जाने वाले थे लेकिन आख़िरी पलों में आपने हमारा दिल तोड़ दिया। आपने अपनी मौत बुला ली।”

पशुपति के आँखों की लाली इस कदर बढ़ गयी कि प्रतीत हुआ उनसे अभी खून टपक पड़ेगा और इसी के साथ वह, जमुना के गले पर अपना शिकंजा कसता चला गया।

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“ये हसन के ब्लड के टाइपिंग टेस्ट की रिपोर्ट है।” साधना ने लिफ़ाफ़ा

फाह्याज़ की ओर बढ़ाते हुए कहा- “यू विल बी सरप्राइज्ड टू नो कि आपका बेटा बेहद ख़ास है, और उतनी ही ख़ास आपकी मिसेज भी थीं।”

हसन अपने कमरे में था और मेड उसकी बाँह पर बर्फ की सिंकाई कर रही थी, जहाँ इंजेक्शन लगा था जबकि लियाकत ड्राइंग रूम में ही रुक गये थे।

फाह्याज़ ने लिफ़ाफ़े में से रिपोर्ट बाहर निकाली लेकिन टाइपिंग टेस्ट के नतीजे पर नजर जाते ही उसकी आँखें हैरत से फैलती चली गयीं। वह रिपोर्ट पर तुरंत यकीन न कर सका और पेशानी पर बेशुमार लकीरें लिए हुए साधना की ओर देखा- “मेरा बेटा उन जीरो प्वाइंट जीरो वन फीसदी लोगों में से है, जिनकी रगों में एक अलग किस्म का लहू गर्दिश करता है?”

“क्या ये एचएच ग्रुप या बॉम्बे ब्लड ग्रुप की बात हो रही है?” सुबोध भी रोमांचित हो गया और उसने फाह्याज़ के जवाब का इंतजार किए बिना उसके हाथ से टेस्ट की रिपोर्ट छीन ली और जब रिपोर्ट पर नजर डाली तो उसे भी एकदम से यकीन नहीं हुआ कि उनके बीच एक ऐसा बच्चा था, जिसका रक्त समूह भारतीय स्तर पर दुर्लभ और वैश्विक स्तर पर दुर्लभतम था।

“कोई मुझे भी बताएगा कि ये तुम लोग किस भाषा में बात कर रहे हो?” लियाकत ने अधीर लहजे में पूछा।

“लेकिन...लेकिन हमने स्कूल के रिकॉर्ड में देने के लिए जब हसन के ब्लड की टाइपिंग टेस्ट कराई थी तो ओ निगेटिव ग्रुप पता चला था।” फाह्याज़ ने लियाकत की टिप्पणी मानो सुनी ही नहीं। उसके लिए उक्त खुलासे पर यकीन करना अब भी मुश्किल हो रहा था।

“आमतौर पर ऐसा ही होता है।” साधना ने कहा- “एचएच ब्लड ग्रुप के ब्लड में ए, बी और एच एंटिजन नहीं होते हैं, इसलिए टेस्ट के दौरान ए, बी या एबी में से कोई ग्रुप नहीं आता है और सामान्यतः व्यक्ति को ओ ग्रुप का मान लिया जाता है। एच एच ब्लड ग्रुप की पुष्टि तब होती है, जब ओ ब्लड ग्रुप डिटेक्ट होने पर एक स्टेप और आगे बढ़कर एच एंटिजन टेस्ट किया जाता है और ये टेस्ट निगेटिव आ जाता है। एचएच ग्रुप में एच एंटिजन नहीं पाया जाता है, जबकि ओ ग्रुप में पाया जाता है; यही वो फैक्ट है, जो एचएच ग्रुप को ओ ग्रुप से पृथक करता है। सामान्यत: ओ ग्रुप आ जाने पर भी लैब वाले एच एंटिजन टेस्ट को तरजीह इसलिए नहीं देते हैं क्योंकि एचएच ग्रुप इतना दुर्लभ है कि इस सम्भावना को लोग गम्भीरता से लेते ही नहीं कि ओ ग्रुप वाला वह शख्स एचएच ग्रुप का निकल सकता है। परिणाम ये होता है कि आपके बेटे और आपकी वाइफ की तरह वह शख्स भी तब तक खुद को ओ ग्रुप का ही समझता है, जब तक कि ब्लड ट्रांसफ्यूजन की नौबत नहीं आ जाती।”

“व्हाट डू यू मीन बाई वाइफ की तरह?” फाह्याज़ के नेत्र संकुचित हुए- “तो क्या...तो क्या शबनम भी इसी ब्लड ग्रुप की थी?”

“ऑफकोर्स मिस्टर फाह्याज़।” साधना ने संजीदा लहजे में कहा- “और दुर्भाग्य से यही उनकी मौत की वजह भी बना।”

“तो ये थी शबनम को हुए एनाफिलैक्सिस की वजह?” फाह्याज़ के लहजे में क्षोभ व उत्तेजना भर गयी- “उसे हीमोलिटिक ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन इसलिए हुआ क्योंकि उसे गलत खून चढ़ाया गया? यानी कि..यानी कि वह मेडिकल नेग्लिगेंसी का शिकार हुई थी?”

“एक्चुअली, वी शुड कॉल इट अ बैडलक रेदर दैन मेडिकल नेग्लिगेंसी।” साधना ने शांत लहजे में कहा।

“बट व्हाई? अभी-अभी तो आपने कहा कि अगर एचएच ब्लड ग्रुप वाला कोई शख्स खुद को ओ ब्लड ग्रुप का समझ रहा होता है तो भी ट्रांसफ्यूजन के दौरान उसका वास्तविक ग्रुप उजागर हो ही जाता है। क्या शबनम के केस में कोई प्रीट्रांसफ्यूजन टेस्ट नहीं हुआ था, जो ये चूक हुई?”

“आपकी वाइफ के केस में भी स्टैण्डर्ड प्रीकॉशन को फॉलो किया गया था मिस्टर फाह्याज़, फिर भी उनके साथ जो हादसा हुआ, उसकी क्या वजह रही हो सकती है; इसके बाबत मैं अपने पैथोलॉजिस्ट पति से डिटेल में डिस्कस करके आ रही हूँ और चाहती हूँ कि पहले आप मेरे कन्क्लूजन को सुन लें।”

फाह्याज़ की उत्तेजना कुछ हद तक कम हुई। कामरान और लियाकत को अब तक बस यही समझ में आ सका था कि हसन और शबनम की रगों में ऐसा खून बह रहा था, जो दस हजार में से केवल एक शख्स की रगों में बहता है।

“मैं जानती हूँ कि मैं जो बताने जा रही हूँ, उस पर आपको यकीन नहीं होगा इसलिए नहीं होगा क्योंकि गैलेक्सी हॉस्पिटल शहर का टॉप क्लास हॉस्पिटल है और वहाँ पर ऐसे दुर्योग बनने मुश्किल हैं लेकिन जब विधाता किसी की किस्मत में मौत लिख देता है तो बड़े से बड़ा डॉक्टर और अच्छे से अच्छा हॉस्पिटल भी उसे नहीं बचा पाता। यमदूत उसे ले जाने के लिए कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेते हैं। आपकी वाइफ के केस में जो हुआ, वो कोई पहली बार नहीं हुआ है। सेम यही केस ईरान में हुआ था। [2] हालाँकि उस केस में पेशेंट खुशकिस्मत थी, जो समय रहते ही परिस्थितियों पर काबू पा लिया गया था। ये देखिए।” साधना ने वैनिटी बैग में से कुछ पेपर्स निकालकर सेंटर टेबल पर रखते हुए आगे कहा- “ये प्रिंटआउट्स मैंने एक मेडिकल जर्नल की वेबसाइट से निकाला है। इन पेपर्स में उस केस की पूरी डिटेल है।” साधना ठहरी लेकिन जब किसी ने उन पेपर्स को तवज्जो नहीं दिया तो वह भाँप गयी कि लोग उसके मुँह से उस केस का सारांश सुनना चाहते हैं, लिहाजा उसने अपना वक्तव्य आगे बढ़ाया- “इन दिस केस, पेशेंट वाज अ सिक्स्टी टू इयर ओल्ड लेडी, जो सीने में दर्द की शिकायत लेकर हॉस्पिटल आयी थी और जिसे अनस्टेबल एंजिया डायग्नोस होने के बाद कोरोनरी केयर यूनिट में शिफ्ट कर दिया गया था। हीमोग्लोबिन कम होने की वजह से फिजिशियन ने उसे एक यूनिट ब्लड पेस्क्राइब किया था। महिला का ब्लड ग्रुप ओ था लिहाजा ब्लड बैंक से उसी ग्रुप का ब्लड मंगाया गया लेकिन ट्रांसफ्यूजन शुरू होने के कुछ समय बाद ही वह बदन दर्द, साँस लेने में दिक्कत, हायपरटेंशन और घबराहट की शिकायत करने लगी। ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन की संभावना भांपकर डॉक्टर ने फ़ौरन ट्रांसफ्यूजन को रोक दिया और फिर आगे की जाँचों में खुलासा हुआ कि वह महिला बॉम्बे ब्लड कैरी कर रही थी। ये उसकी खुशकिस्मती थी कि डॉक्टर ने अपने अनुभव और प्रजेंस ऑफ़ माइंड से समय रहते ही बॉम्बे ब्लड की संभावना को भाँप लिया था और सिचुएशन को कण्ट्रोल कर लिया गया। बाद में एक सामाजिक संस्था की मदद से महिला के लिए बॉम्बे ब्लड अका एचएच ब्लड ग्रुप का इंतजाम किया गया।” साधना ने कुछ देर ठहरकर दम भरा फिर आगे बोली- “मैं इस बात से इंकार नहीं कर रही कि आपकी वाइफ ने रिएक्शन शो नहीं किया होगा, लेकिन संभव है कि ऐसा डॉक्टर के राउंड से जाने के बाद हुआ हो और नर्सिंग स्टाफ ने उनके सिम्प्टम्स को इतनी गंभीरता से न लिया हो कि उसे हिमोलिटिक ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन समझकर तुरंत डॉक्टर को इन्फॉर्म करते और जब तक रिएक्शन सीवियर हुआ होगा तब तक कुछ करने के लिए बचा ही नहीं रहा होगा। आफ्टरआल वो वजायनल ब्लीडिंग का केस था और खून पहले ही बहुत बह चुका था उनका। नर्सिंग स्टाफ की जवाबदेही बेशक बनती थी फिर भी...।” साधना ने कथन जानबूझकर अधूरा छोड़ दिया।

ड्राइंग हॉल में सन्नाटा छा गया। किसी को कहने के लिए कुछ नहीं सूझ रहा था लिहाजा हर कोई खामोश रहकर अपने-अपने स्तर से शबनम की बदनसीबी पर अफ़सोस जता रहा था।

“बाद में हॉस्पिटल के एम.एस. ने इस केस पर संज्ञान लिया था और शबनम के ट्रांसफ्यूजन के बाद के ब्लड का सैंपल लेकर बड़ी लेबोरेटरीज को भेजा था, जहाँ से आयी रिपोर्ट्स ने ये कन्फर्म किया होगा कि मरहूम एक दुर्लभ रक्त-समूह की वाहक थी। इस केस पर उन्होंने अद्वैत फाउंडेशन की रिसर्च टीम से भी डिस्कशन किया था। ये फाउंडेशन आवश्यकता पड़ने पर रेयर ब्लड ग्रुप्स को उपलब्ध कराने में अहम् भूमिका निभाता है। साथ ही इस बात पर भी नजर रखता है और विश्लेषण करता है कि देश के किस हिस्से में किस ब्लड ग्रुप के लोगों की अधिकता या दुर्लभता है।”

“ये बातें आपको पता कैसे चलीं?” सुबोध ने पूछा- “जाहिर है कि हॉस्पिटल ने इसे सीक्रेट रखा होगा क्योंकि नर्सिंग स्टाफ की लापरवाही के चलते मामला उनके खिलाफ़ जा सकता था।”

“विभू की हेल्प से मैंने हॉस्पिटल की एक नर्स संगीता से कांटेक्ट किया था। उसी ने मुझे ये कन्फर्म किया कि शबनम ने रिएक्शन शो किया था और उनकी मौत के बाद एम.एस. ने इस केस में दिलचस्पी लेते हुए अद्वैत फाउंडेशन से कांटेक्ट किया था। उस नर्स ने मुझे बस इतना ही बताया था, इसकी बिनाह पर मैंने जो कुछ भी एक्सप्लेन किया, वो सब रीजनिंग की बदौलत जान पायी।” साधना ने थोड़ा ठहरकर आगे कहा- “एक्चुअली संगीता की जुबान पर इस फाउंडेशन का नाम आते ही मैं ऑन द स्पॉट इस संस्थान की वेबसाइट पर पहुँची और वहाँ न्यूज़फीड पर ये खबर पढ़ते ही कि इस फाउंडेशन ने हाल ही में कूरियर के जरिये बॉम्बे ब्लड ग्रुप का दो यूनिट ब्लड म्यांमार भेजा था, मेरे जेहन में एक धमाका सा हुआ और सब-कुछ आईने की तरह साफ़ हो गया। अब जरूरत थी तो बस विभू से ये ऑफिसियल कन्फर्मेशन लेने की कि मेरा सोचना सही था, जो कि मैंने तुरंत जाकर लिया। जब आपने फोन पर ये बताया कि आपके बेटे के बदन पर भी निशान उभरा है तो मैं भांप गयी कि वह एंटिटी उन्हीं लोगों को अपना शिकार बनाती है, जो इस दुर्लभ ब्लड ग्रुप के साथ पैदा हुए हैं, इसलिए मैंने हसन को हॉस्पिटल बुलावाया और उसके ब्लड का एच एंटीजन टेस्ट करवाकर ये कन्फर्म किया कि वह भी बॉम्बे ब्लड ग्रुप कैरी करता है।”

“एम.एस. ने अद्वैत फाउंडेशन जैसे बाहरी संस्थान को इसमें क्यों इन्वाल्व किया? जबकि ऐसा करने से केस की सीक्रेसी को खतरा था।” काफी देर से खामोश कामरान ने पूछा।

“अद्वैत फाउंडेशन, हॉस्पिटल के लिए बाहरी नहीं था क्योंकि ऐसे फाउंडेशन अपनी रिसर्च इत्यादि जरूरतों के लिए हॉस्पिटल्स के डाटा और सोर्सेज पर भी आश्रित होते हैं लिहाजा इनका हॉस्पिटल्स के साथ टाई-अप होता है। ये रिसर्च प्रोजेक्ट्स से लेकर कई सोशल वेलफेयर प्रोग्राम भी हॉस्पिटल्स के साथ जॉइंट वेंचर के तहत चलाते हैं।”

“तो फिर ये अद्वैत फाउंडेशन, जो कि ब्लड ग्रुप के डिस्ट्रीब्यूशन का लेखा-जोखा रखता है, शबनम के रेयर ब्लड ग्रुप से वाकिफ़ होने के बाद फरदर डिटेल्स इकट्ठा करने या सर्वे करने के लिए कभी हमारे घर क्यों नहीं आया?” लियाकत ने विचारपूर्ण मुद्रा अख्तियार करते हुए पूछा।

“शायद इसलिए....।” जवाब फाह्याज़ ने दिया- “क्योंकि ये मामला एक पुलिसवाले से जुड़ा हुआ था और अगर मुझे ज़रा भी भनक लग जाती कि मेरी बीवी का ब्लड ग्रुप वो नहीं था, जो हॉस्पिटल ने उसे चढ़ाया था तो मैं अग्रेसिव हो सकता था। ये ब्रांडेड इन्स्टिट्युशंस हमेशा इस बात से बचने की कोशिश करते हैं कि मीडिया में इनका नाम नेगेटिव वे में न उछलने पाए। बहरहाल...।” फाह्याज़ ने गहरी साँस लेकर कहा- “अब ये क्रिस्टल क्लियर है कि विनायक का ब्लड ग्रुप एचएच ही रहा होगा।” वह, सुबोध से मुखातिब हुआ- “ऑटोप्सी रिपोर्ट में उसका ब्लड ग्रुप क्या है?”

“ओ, बट मोस्ट प्रोबेबली एचएच ही होगा।” सुबोध ने कहा- “विसरा के जरिये फिर से ब्लड टेस्ट करा सकते है।”

“कोई जरूरत नहीं है। इट इज कन्फर्म्ड कि वह हरामज़ादा अमरोज़ बॉम्बे ब्लड ग्रुप के लोगों को ही निशाना बना रहा है।” कुछ सोचकर फाह्याज़, साधना से मुखातिब हुआ और पूछा- “माँ-बेटे का ब्लड ग्रुप सेम हो, ऐसा हर बार तो नहीं होता है न?”

“जी नहीं। हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है, इसके पीछे कोई जनरल थ्योरी नहीं है।” साधना ने बताया।

फाह्याज़ ने समझ जाने के भाव से सिर हिलाया और इसी के साथ ड्राइंग हॉल में एक बार फिर सन्नाटा पसर गया लेकिन लंबी हो रही खामोशी पर जल्द ही फाह्याज़ ने ही अंकुश लगाया।

“लेकिन ये सवाल अब भी बरक़रार है कि अमरोज़ किसी आर्टिस्ट से पेंटिंग बनवाकर अपना शिकार कैसे चुन रहा है? वह पेंटिंग को कैसे आधार बना रहा है?”

कहने के बाद फाह्याज़ ने ड्राइंग हॉल में मौजूद हर शख्स के चेहरे पर बारी-बारी से नजरें फिराईं लेकिन उस सवाल का जवाब पाने का जरिया केवल सुबोध ने सुझाया- “हमें उस मस्जिद में रहने वाले मोमिन को तलब करना चाहिए। चूँकि वह नेक्रोमेंसी के निशान में दिलचस्पी ले रहा था, इसलिए आई होप कि वह कोई क्लू दे सकता है हमें।”

सुबोध का इरादा सुनते ही लियाकत की रूह फ़ना हो गयी। उन्होंने फाह्याज़ को लक्ष्य करके पूछा- “तो तुमने उसका पता-ठिकाना तक निकलवा लिया?”

फाह्याज़ ने आँखों ही आँखों में लियाकत को इशारा किया कि उस मोमिन के जिन्न होने का खुलासा फिलहाल वे न करें। लियाकत ने भी उसके संकेत को भांपकर मन में तमाम सवाल होने के बावजूद उक्त सन्दर्भ में चुप्पी साध ली। फाह्याज़, मोमिन के बाबत आगे कुछ कहने ही जा रहा था कि उसका मोबाइल बजा, उसने कॉल रिसीव की।

“साब...मैं...मैं...तबस्सुम के यहाँ से मेड हसीना बानो बोल रही हूँ...। ब...ब....बहुत जरूरी बात करनी थी आपसे।” दूसरी ओर से हसीना की आवाज़ आयी।

और फिर करीब पंद्रह मिनट में हसीन ने फाह्याज़ को वह सब-कुछ बता दिया, जो उसके साथ घटित हुआ था। उससे बात करने के बाद जब फाह्याज़ ने फोन रखा तो सभी ने समवेत स्वर में पूछा- “क्या हुआ?”

“उस रहस्यमयी मोमिन से मिलना अब बहुत जरूरी हो गया है।” उसने सर्द लहजे में जवाब दिया और उठकर खड़ा हो गया।