छाबड़ा और वधवा कार के भीतर बैठे थे। कार के शीशे थोड़ा नीचे कर रखे थे कि गर्मी महसूस ना हो। वैसे भी खुली जगह होने के कारण, हवा थी चल रही थी। गर्मी का एहसास ना के बराबर था।
"मेरा तो दिल घबरा रहा है...।" छाबड़ा बोला।
"आप फिक्र क्यों करते हैं।" वधवा कह उठा--- "मैं भी तो आपके साथ हूँ। हमारे बैंक की तरक्की के लिए, ये काम करना जरूरी था। ये खुशी की बात है कि बड़े अधिकारियों ने ये काम हमारे हवाले किया। कुछ ही देर की बात है कि D.C.M.B बैंक की भविष्य की योजना के कागजात हमारे पास होंगे। उनकी फोटोकॉपी करा कर उन्हें वापस रख दिया जाएगा। उस दुकान वाले को हम दो हजार रुपया दे आए हैं कि वो अपनी दुकान खुली रखे और हमारा इंतजार करे। वो फोटोकॉपी कर देगा फिर...।" वधवा कहते-कहते ठिठका और बाहर देखते कह उठा--- "मलिक फिर आ गया है। कोई अच्छी खबर लाया होगा।"
छाबड़ा ने बाहर देखा तो कार के पास, अंधेरे में कोई दिखा।
छाबड़ा ने पूरा शीशा नीचे गिराते हुए कहा---
"कहो मलिक, काम हो गया?"
"उसी पल उसकी गर्दन पर रिवाल्वर की ठंडी नाल आ लगी।
छाबड़ा के शरीर में सिहरन दौड़ती चली गई।
मुँह से आवाज ना निकली।
अंधेरा होने के कारण वधवा कुछ समझ नहीं पाया कि तभी उसकी खुली खिड़की से रिवाल्वर की ठंडी नाल उसके गाल पर भी आ टिकी। हालत समझते ही उसके हाथ-पाँव काँप उठे।
"अगर गोली नहीं खाना चाहते तो बिना शोर-शराबे के बाहर आ जाओ।" पव्वे की गुर्राहट कानों में पड़ी।
छाबड़ा और वधवा फौरन दरवाजा खोलकर बाहर आ गए।
उनके सामने अँधेरे में डूबे पाँच लोग खड़े थे।
"तलाशी लो।" यह आवाज देवराज चौहान की थी।
प्रतापी और टिड्डे ने दोनों की तलाशी ली।
दोनों डर के मारे काँप रहे थे।
"गोली मार दो इन्हें?" प्रतापी बोला।
"नहीं।" वधवा ने काँपकर जल्दी से कहा--- "हमें गोली मत मारना।"
"क्या जरूरत है गोली मारने की।" टिड्डा बोला--- "अगर ये सब कुछ बता देते हैं तो---।"
"कौन हो तुम?" पव्वे के होंठों से गुर्राहट निकली।
"छ...छाबड़ा...।"
"और तुम?" शेख ने पूछा।
"व...ध...वा...।"
"वैन कहाँ है?"
"उधर पेड़ों के झुरमुट में...। जहाँ से रोशनी बाहर आ रही है।" वधवा ने उस तरफ हाथ किया।
"तुम अपने बारे में बताओ कि कौन हो और यहाँ क्या कर रहे हो?" देवराज चौहान ने कहा।
"तुम... तुम पुलिस वाले हो?" छाबड़ा ने भयभीत स्वर में कहा।
"नहीं...।"
ये सुनकर दोनों ने राहत की साँस ली।
"अपने बारे में सब कुछ बता दो।" शेख ने खतरनाक स्वर में कहा।
छाबड़ा और वधवा में इतनी हिम्मत कहाँ की रिवाल्वरों के सामने मुँह बंद रख पाते।
दोनों सब कुछ बताते चले गए।
छाबड़ा-वधवा ने सारा मामला जान लिया उन्होंने।
मलिक और उसके साथियों के बारे में भी जान लिया।
जो तस्वीर उनके सामने स्पष्ट नहीं थी, वो सब समझ में आ गया था उनकी।
"कार में बैठो।" देवराज चौहान ने रिवाल्वर निकालते हुए कहा।
"ह...हमें मत मारना... ह...म... हम...।"
"तुम दोनों को सिर्फ बेहोश किया जाएगा।" देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा--- "कार में बैठो।"
"दोनों जल्दी से कार के भीतर जा बैठे।
देवराज चौहान ने बारी-बारी उनकी कनपटियों पर रिवाल्वर के हत्थे की चोट मारकर, उन्हें बेहोश किया और बेल्ट फँसाकर बिठा दिया।
"उधर वैन है।" पव्वा खुशी से कह उठा--- "हम उसमें से पैसे ले सकते हैं।"
"इतना आसान नहीं है ये।" देवराज चौहान बोला--- "वो सब प्राइवेट जासूस हैं। उनके पास रिवाल्वरें होंगी। वो मुकाबले पर भी उतर सकते हैं। कोई भी बेवकूफी मत करना।"
"तुम्हारा मतलब कि हम वैन के पास ना जायें?" पव्वा सिटपिटा उठा।
"जल्दी मत करो। इन दोनों ने बताया है कि इनके कहने पर प्राइवेट जासूस नोटों वाले किसी बक्से में रखे कागज लेना चाहते हैं। ये दो बैंक का आपसी मामला है। जिससे हमें कोई मतलब नहीं। उन्हें कागज लेने दो। 60 करोड़ हमारे हैं।"
"तुम्हारा मतलब कि अभी हम सामने नहीं जायें?" टिड्डा कह उठा।
"मैं जाऊँगा वहाँ। क्योंकि वहाँ जगमोहन और सोहनलाल पहले से ही...।"
"तो हमारे वहाँ जाने से तुम्हें क्या एतराज है?"
"कोई एतराज नहीं। लेकिन बेहतर होगा कि तुम लोग मुझे कवर करो। इधर-उधर छिपकर हालातों पर नजर रखो। जब कभी हालात बिगड़ें तो अपनी समझ के मुताबिक ठीक कर लेना। परन्तु खून-खराब ना हो।"
"खून-खराबा हो भी सकता है।" शेख गम्भीर स्वर में बोला।
"गोलियाँ चलाने की नौबत आए तो, टाँगों पर चलाना। बाँहों पर चलाना। यही कोशिश करना।"
शेख सिर हिला कर रह गया।
"सब तरफ फैल जाओ। चारों दिशाएं कवर कर लो। जब मैं उनके पास पहुँचूँगा तो कुछ भी हो सकता है। हो सकता है कि कुछ भी ना हो। मैं वहाँ के हालातों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करुँगा।"
"वो लोग तुम्हें देखते ही शूट करने की चेष्टा कर सकते हैं।"
"मैंने पहले ही कहा है कि कुछ भी हो सकता है। तुम लोग चारों दिशाओं में अपनी-अपनी जगह चुन लो। उसके बाद ही मैं वहाँ जाऊँगा। दस मिनट हैं तुम लोगों के पास...।" देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा।
चारों अलग-अलग दिशाओं में पेड़ों के झुरमुट की तरफ बढ़ गए।
देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई और कश लेने लगा।
◆◆◆
"मीटिंग कर रहे लगते हैं वो...।" सोनू बोला।
"ये वो वक्त था जब जगदीश मलिक से बात कर रहा था और अम्बा, मल्होत्रा, जगमोहन वहाँ पहुँच गये थे।
"तय कर रहे होंगे कि नोटों को कैसे बाँटना है।" प्यारे ने कहा।
"ये ही बात होगी। सालों को यह नहीं पता कि लाख-डेढ़ उसमें से हमें देना है।"
"वहाँ जाकर हम भी बात कर लें अपनी? कहीं वो ये ना कहें कि हमने पहले क्यों नहीं बताया उन्हें...।"
"अभी रुक जा। माल तो निकाल लेने दे उन्हें। तब जायेंगे।"
प्यारा और सोनू देखते रहे।
मीटिंग खत्म हो गई।
तभी उन्होंने जगमोहन और मलिक को वैन के अगले हिस्से में बैठते देखा।
"सोनू, वो फिर वैन के आगे वाले हिस्से में बैठ रहे हैं। ये बार-बार वहाँ बैठ के क्या करते हैं?"
"कोई टोटका होगा कि वैन के भीतर बैठेंगे तो दरवाजा जल्दी खुल जायेगा।"
"यहाँ से नजर भी तो नहीं आता कि वो क्या कर रहे हैं...।"
"मैं पेड़ से नीचे उतरकर देखूँ...।" प्यारे ने कहा।
"नहीं। खतरा है। तू पेड़ पर ही रह।"
"ठीक है।"
"वो फिर आ रहा है।" सोनू ने मल्होत्रा को देखा तो कह उठा--- "इसे सू-सू बहुत आता है।"
"हमारे पेड़ की तरफ ही आ रहा है...।" प्यारे ने धीमे स्वर में कहा।
"चुप हो जा...।"
मल्होत्रा वहाँ पहुँचा। उनके पेड़ के नीचे ही। सू-सू करने लगा।
दोनों दम साधे पेड़ के तनों पर बैठे रहे।
परन्तु तभी गड़बड़ हो गई।
सोनू की जेब में पड़ी आठ रुपये वाली टॉर्च फिसल कर नीचे जा गिरी।
मल्होत्रा बुरी तरह चौंका। उसने फुर्ती से सू-सू बंद किया और ऊपर देखा। अगले ही पल उसकी आँखें फैल गईं। उसने दो-दो को पेड़ पर बैठे जो देख लिया था।
"लाख-डेढ़ गये पानी में...।" प्यारा कह उठा।
सोनू समझ चुका था कि ये अब अपने साथियों को बुलायेगा। वो जल्दी से, धीमे स्वर में मल्होत्रा से कह उठा---
"साँप... साँप...।"
"क... कहाँ?" मल्होत्रा ने हड़बड़ा कर नीचे देखा।
"तेरे पीछे...।"
मल्होत्रा फौरन पीछे घूमा।
"तू क्या कर रहा...।" प्यारे ने पूछना चाहा।
तभी सोनू ने मल्होत्रा पर छलांग लगा दी।
सीधे मल्होत्रा पर जा गिरा।
मल्होत्रा के होंठों से कराह निकली और नीचे जा गिरा। सोनू भी नीचे जा लुढ़का था।
पेड़ पर टंगा प्यारा हड़बड़ाया-सा ये सब देख रहा था।
सोनू जल्दी से उठा और मल्होत्रा की तरफ लपका। परन्तु मल्होत्रा बेसुध पड़ा था। उसके माथे पर खून लगा नजर आ रहा था, जो कि शायद नीचे पड़े, किसी पत्थर से टकरा गया था। इसी वजह से बेहोश हो गया था।
सोनू ने मल्होत्रा को अच्छी तरह हिला-डुला कर देखा।
"प्यारे।" सोनू ऊपर टँगे प्यारे को देखता कह उठा--- "ये तो बेहोश हो गया है।"
"मर तो नहीं गया?"
"नहीं। छाती ऊपर-नीचे हो रही है। तू जल्दी से नीचे आ जा।"
"क्यों?"
"इसका साथी इधर आया तो इसे बेहोश पाकर, सबसे पहले पेड़ पर ही देखेगा। हमें पेड़ बदल लेना चाहिये।"
प्यारा जल्दी से नीचे उतरा।
दो-चार पेड़ दूर, एक अन्य पेड़ पर जा बैठे।
"तूने तो बहुत बहादुरी दिखाई...।" प्यारा कह उठा।
"मैं तो घबरा गया था। कुछ और समझ में नहीं आया तो उस पर कूद गया।" सोनू ने गहरी साँस लेकर कहा।
"वो बेहोश हो गया...।" प्यारा मुस्कुराया।
"हमारी किस्मत अच्छी थी। नहीं तो वो तगड़ा था। हमारी ठुकाई कर देता।"
"लेकिन हुआ क्या था जो...?"
"भगते की टॉर्च जेब से निकलकर नीचे जा गिरी थी।" सोनू ने कहा।
"बाल-बाल बचे...।" प्यारे ने गहरी साँस ली--- "वो जिंदा है ना?"
"हाँ-हाँ, बेहोश है। उसका सीना उठ-बैठ रहा है। ये बात बार-बार मत पूछ...।"
"गिन्नी की चिंता हो रही है मुझे...।"
"तू गिन्नी की इतनी चिंता क्यों करता है?"
"वो मेरी होने वाली पत्नी है। जिस काम के लिए आये थे, वो भी अभी तक नहीं हुआ।"
"बच्चा ठहराने वाला काम?"
"वो ही तो...।"
"मैंने तो तेरे को कहा था कि हाथ फेर आ...।"
"वो नींद में थी।"
"तो क्या हो गया। उठा लेता उसे...।"
"यहाँ भी तो आना था। हाथ फेरने के बाद, वो कहती कि मैं उसके पास ही रहूँ तो...?"
"उसे भी साथ ले आता।"
"वो पेड़ पर कैसे चढ़ती?"
"हम दोनों उसे पेड़ पर चढ़ा देते...।"
"यहाँ खतरा है। गिन्नी को नींद में ही रहने दे।"
बातों के दौरान दोनों की नजरें सामने वैन और उन लोगों पर थीं।
"बहुत देर लगा रहे हैं ये...।" प्यारे बोला।
"वैन का पीछे वाला दरवाजा खोल रहे हैं। मेरे ख्याल से जल्दी ही काम हो जायेगा।"
"ये हमें लाख-डेढ़ लाख दे देंगे ना?"
"क्यों नहीं देंगे?" सोनू झल्लाया--- "यहाँ चाय-पानी का इंतजाम नहीं है, वरना वो भी पिलाते...।"
दोनों वैन खुलने के इंतजार में बैठे रहे पेड़ पर।
कुछ मिनट बीते कि उनके कानों में मध्यम-सी आहटें पड़ीं।
दोनों चौंके। नजरें मिलीं, फिर उन्होंने पेड़ के आसपास देखा।
उन्हें कोई नजर आया, जो कि पेड़ के नीचे चंद पलों के लिए रुका था।
वो टिड्डा था।
दोनों दम साधे उसे देखते रहे।
टिड्डा वहाँ से सावधानी से आगे बढ़ गया।
दोनों ने चैन की साँस ली।
"कौन था ये?" सोनू दबे स्वर में कह उठा।
"पता नहीं।"
"ये उनका साथी नहीं था, जो वैन के पास थे।" सोनू सोच भरे स्वर में कह उठा।
"तू कैसे कह सकता है?"
"उधर देख, वो सब गिनती में पूरे हैं।"
"फिर तो गड़बड़ हो गई सोनू। हमारे अलावा कोई और भी चुपके से इन पर नजर रख रहा है।"
"मुझे भी ऐसा ही लगता है। खतरा बढ़ गया है।"
"हमें लाख-डेढ़ लाख मिल जायेगा ना?"
"पता नहीं क्या होने वाला है। ये नया बंदा कहाँ से आ गया?" सोनू सोच भरे स्वर में बोला।
"मुझे तो लगा कि तू उस पर भी छलांग लगा देगा, जब वो पेड़ के नीचे खड़ा था।"
"उसे पता नहीं चला कि हम पेड़ पर हैं तो मैं क्यों छलांग लगाता?"
"लेकिन वो था कौन?"
"हम जैसा ही होगा कोई। वो भी अपने लाख-पचास हजार बनाने के चक्कर में होगा।"
"उसके पीछे जाकर देखें?"
"नहीं। पेड़ से उतरना मत। वो जो कोई भी है, हमें देख सकता है। इस तरफ हम अकेले नहीं हैं।"
"मुझे तो गिन्नी की चिंता...।"
"गिन्नी की परवाह मत कर। वो नींद में है। ताला खुलने वाला है वैन के दरवाजे का... सामने ध्यान दे।"
दोनों नजरें सामने रखे, पेड़ पर टँगे हुए थे।
◆◆◆
"मल्होत्रा कहाँ है?" एकाएक सुदेश कह उठा।
सामने से आता अम्बा ठिठका और कह उठा---
"यहीं होगा...।"
"मैंने उसे पन्द्रह मिनट पहले पेड़ों के उस तरफ जाते देखा था। फिर वो वापस नहीं आया।" सुदेश ने कहा।
अम्बा ने पेड़ों के उस तरफ देखा।
तभी जगदीश आ पहुँचा।
"क्या हुआ?" जगदीश ने पूछा।
"दस-पन्द्रह मिनट पहले मल्होत्रा उधर गया था, परन्तु अभी तक नहीं लौटा।" सुदेश ने कहा।
"मैं देख के आता हूँ।" कहने के साथ ही जगदीश उस तरफ बढ़ गया।
पन्द्रह कदम उठाने के बाद जगदीश ने खुद को अँधेरे में पाया।
उधर जल रही कार की हैडलाइट की मध्यम-सी चमक का अहसास ही इधर हो रहा था।
"मल्होत्रा...।" जगदीश ने ठिठक कर पुकारा।
कोई जवाब न मिला।
जगदीश आँखें फाड़े अँधेरे में स्पष्ट देखने की चेष्टा कर रहा था।
"तुम कहाँ हो मल्होत्रा...।" इस बार जगदीश ने ऊँचे स्वर में पुकारा।
खामोशी रही।
जगदीश कुछ और आगे बढ़ा। पूरे अँधेरे में आ गया था वो।
आँखें फाड़े हर तरफ देख रहा था।
परन्तु कुछ खास नजर नहीं आ रहा था उसे। उसने महसूस किया कि पास में टॉर्च होनी चाहिए। कार में टॉर्च रखी हुई थी। वो टॉर्च लाने का इरादा करके पलटा कि उसके पाँव में हल्की-सी ठोकर लगी।
जगदीश ठिठका।
यूँ ही नीचे देखा।
अगले ही पल उसके शरीर में ठंडी सिहरन दौड़ती चली गई।
कोई नीचे गिरा पड़ा था।
मस्तिष्क में एक ही शब्द कौंधा कि कहीं ये मल्होत्रा ही तो नहीं?
जगदीश नीचे झुका। उस शरीर को टटोला। मल्होत्रा की कमीज को उसने पहचान लिया था। जगदीश ने घबराकर सतर्कता के नाते रिवाल्वर निकाली और आसपास देखा। जिस पेड़ के नीचे खड़ा था, वहाँ भी नजर मारी।
सब ठीक ही नजर आया उसे।
फिर मल्होत्रा को क्या हो गया?
जगदीश चैक कर चुका था कि उसकी साँस चल रही है। उसने मल्होत्रा को उठाया और कंधे पर लादने के पश्चात रिवाल्वर हाथ मे पकड़े तेजी से वैन की तरफ बढ़ गया।
मिनट भर में जा पहुँचा।
जिसकी भी नजर जगदीश पर पड़ी, वो हैरान हुआ और पास आता चला गया।
"क्या हुआ मल्होत्रा को?" सुदेश के माथे पर बल पड़ गए।
"जिंदा है?" अम्बा ने पूछा।
"क्या हुआ?" मलिक व्याकुलता से पास पहुँचता कह उठा।
"मल्होत्रा ठीक है। बेहोश है। इसे नीचे उतारो...।" जगदीश बोला।
मल्होत्रा को उसके कंधे से उतारकर नीचे लिटाया गया।
"क्या हुआ?" जगमोहन भी पास आ पहुँचा।
"इसके माथे पर चोट लगी है।" अम्बा ने कहा।
मलिक ने जगदीश को देखा।
"ये उधर पेड़ के नीचे, अँधेरे में बेहोश पड़ा था।" जगदीश ने मलिक से कहा।
"उधर, बेहोश पड़ा था?" मलिक चौंका--- "लेकिन किसने इसे बेहोश किया?"
"मुझे क्या पता...।"
"वहाँ कोई था?"
"नहीं...।"
"जिसने मल्होत्रा को बेहोश किया, वो पास ही होगा। छिपा होगा...।" मलिक बोला।
"मुझे कोई नजर नहीं आया...।" जगदीश बोला।
अम्बा पानी की बोतल लाकर, उसके चेहरे पर छींटे मारने लगा। सुदेश, जगदीश और मलिक एक-दूसरे को देख रहे थे।
कुछ पलों के लिए खामोशी आ ठहरी वहाँ...।"
"इसका मतलब यहाँ हमारे अलावा कोई और भी है...।" सुदेश ने खामोशी तोड़ते हुए कहा।
"लगता तो यही है।" जगदीश ने परेशान स्वर में कहा।
"कौन हो सकता है?" मलिक की निगाह हर तरफ घूमने लगी।
"जो भी है, उसने खुद को अँधेरे में छुपा रखा है और हमें देख रहा है।" सुदेश बोला।
"ये खतरनाक बात है कि हम किसी की नजरों में आ गए हैं।" मलिक ने कठोर स्वर में कहा।
"पुलिस होती तो सामने आ गई होती...।"
"कौन होगा वो?"
तभी मल्होत्रा के होंठों से कराह निकली।
सबकी निगाह मल्होत्रा पर जा टिकी।
जगमोहन की निगाह पेड़ों की तरफ फिर रही थी।
"मल्होत्रा बताएगा कि वो कौन है। बेहोश होने से पहले मल्होत्रा ने उसे जरूर देखा होगा।" जगदीश ने कहा।
मल्होत्रा के होंठों से कराह निकली। ऑंखें खोलीं, फिर उसी पल उठ बैठा।
"क्या हुआ?" मल्होत्रा के होंठों से निकला।
"तुम वहाँ बेहोश पड़े थे... उधर...क्या हुआ था?" सुदेश कह उठा।
"ओह!" मल्होत्रा को जैसे सब याद आया--- "मैं उधर... पेड़ के पास सू-सू करने गया था कि तभी पेड़ के ऊपर से कुछ गिरा। मैंने ऊपर देखा तो, दो लोगों को पेड़ पर बैठे देखा।"
"दो लोगों को?"
"हाँ, वो दो थे। इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं देख सका। एक ने मुझ पर छलांग लगा दी। मेरे ऊपर आ गिरा वो। मैं नीचे गिर गया। नीचे किसी पत्थर से मेरा माथा टकराया तो, फिर मुझे कुछ भी होश नहीं रहा।"
"तो तुमने उसे ठीक से नहीं देखा?" मलिक के दाँत भिंच गए।
"नहीं...।"
"उन्हें पहले कभी देखा था?"
"मैंने कहा कि अँधेरा होने की वजह से मैं उन्हें देख नहीं पाया।" मल्होत्रा बोला।
मलिक ने रिवाल्वर निकाल ली।
"इसका मतलब वो दोनों जो भी हैं, हमें देख रहे हैं। हम सबके चेहरे उन्हें अच्छी तरह याद हो गए होंगे।" मलिक बोला।
वे एक-दूसरे को देखने लगे।
"हमें उन्हें ढूंढ निकालना होगा...। मैं देखता हूँ...।" कहकर मलिक पलटा।
"वहाँ खतरा हो सकता है।"
"खतरा तो शुरू हो चुका है। हम यहाँ वैन को खुलवाने पर लगे हैं और वो हमें देख रहे हैं। कम-से-कम हमें पता तो हो कि वो लोग कौन हैं। वो इस मामले में पुलिस के गवाह भी बन सकते हैं। हम बुरे फँस जायेंगे।"
"तो उन्हें ढूंढ कर क्या करना चाहते हो?" सुदेश ने पूछा।
"उन्हें कुछ देकर उनका मुँह बंद कर सकते हैं।" कहने के साथ ही मलिक पेड़ों की तरफ बढ़ गया।
जगदीश ने सुदेश से कहा---
"तुम मलिक के साथ जाओ।"
सुदेश तेजी से मलिक की तरफ बढ़ गया।
"तुम ठीक हो?" जगदीश ने मल्होत्रा से पूछा।
मल्होत्रा ने सिर हिला दिया।
इस घटना ने सबका ध्यान सोहनलाल की तरफ से हटा दिया था।
मलिक के जाने के बाद जगमोहन, सोहनलाल के पास जा पहुँचा था।
"देवराज चौहान यहीं है।" सोहनलाल ने धीमे स्वर में कहा।
"यहीं?"
"हाँ। पास ही में कहीं। उसके साथ वे चारों भी हैं जो उसके साथ बैंक-वैन पर हाथ डालने वाले थे।"
"तो मल्होत्रा को उनमें से ही किसी ने बेहोश किया।" जगमोहन ने कहा।
"ये मैं नहीं जानता।"
"इस मामले में तुम्हारा वास्ता देवराज चौहान से कैसे पड़ा?" जगमोहन ने पूछा।
सोहनलाल के कुछ कहने से पहले ही, जगदीश वहाँ आ पहुँचा।
"अभी तक ताला नहीं खुला?" वो बोला।
"खुलने वाला है...।" सोहनलाल ने काम छोड़ा और सिगरेट सुलगाने लगा।
"फिर सिगरेट!" जगदीश ने दाँत भींचकर कहा--- "हम खतरे में हैं। यहाँ कोई और भी है। जल्दी करो...।"
"शोर कम डाल।" सोहनलाल ने कश लिया--- "काम हो रहा है।"
"दिल तो करता है कि तुझे गोली मार दूँ...।" जगदीश गुर्राया।
सोहनलाल उसे देखकर, हँसकर रह गया।
"शांति रख।" जगमोहन ने जगदीश से कहा--- "वैन खुलने की कोई जल्दी नहीं है। क्योंकि भीतर मौजूद गनमैनों का कोई इंतजाम नहीं हो सका। मान ले कि अभी वैन खुल गई तो उन गनमैनों का क्या करेगा, जो बाहर आने को तैयार नहीं हैं?"
जगदीश कसमसा कर रह गया।
◆◆◆
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