हिटलर बना प्रधान सेनापति

वर्ष 1937 में क्रिसमस से कुछ दिन पहले एडोल्फ हिटलर प्रथम विश्‍व युद्ध के जाने-माने सेनानायक और एक समय के नाज़ी समर्थक जनरल एरिक ल्यूडेंडॉर्फ की अंत्येष्टि में शामिल हुआ। दिवंगत आत्मा की स्मृति-उपासना में हिटलर कुछ नहीं बोला। उस व्यक्ति की प्रशंसा में वह एक शब्द भी नहीं कहना चाहता था, जो उससे नफरत करने लगा था।

ल्यूडेंडॉफ ने चौदह साल पहले असफल बीयर हाल क्रांति में भाग लिया था और वह हिटलर को वहाँ हुई गोलीबारी के बीच अपनी जान बचाकर निकल भागने के लिए कभी माफ नहीं कर पाया था। जब राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडेनबर्ग ने 1933 में हिटलर को जर्मनी का चांसलर नियुक्त किया, ल्यूडेंडॉर्फ ने हिंडेनबर्ग को एक तार संदेश भेजा था, जिसमें लिखा था कि उसने यानी राष्ट्रपति ने ‘‘पवित्र जर्मन पितृभूमि अब तक के सबसे बड़े बाजारू नेता, जन-भावनाओं को भड़काने में माहिर व्यक्ति के हाथों में सौंप दी है। मैं आपको दावे के साथ बताना चाहता हूँ कि यह दुष्ट आदमी हमारे जर्मन साम्राज्य को गर्त में धकेल देगा और हमारे देश को उसके कारण घोर विपत्ति का सामना करना पड़ेगा।’’

ल्यूडेंडॉफ तथा जर्मनी के अन्य वरिष्ठ सेनानायक पुरातन प्रथानुयायी थे। उन्होंने प्रशिया के ऐसे संपन्न एवं कुलीन परिवारों में जन्म लिया था, जिनका सैनिक परंपराओं से बहुत पुराना संबंध था, जिन्हें अपने बचपन से पता था कि एक दिन वे भी सैनिक बटालियनों का नेतृत्व करेंगे, ठीक उसी तरह जैसे उनके पिताओं और दादा-नानाओं ने किया था।

इस सीमित-समाज में एडोल्फ हिटलर हमेशा एक बाहरी आदमी था, हिंडेनबर्ग जिसे ‘ऑस्ट्रियाई कॉरपोरल’ पुकारता था। हालाँकि फ्यूहरर को चाहने वाले लाखों थे, फिर भी उसके अपने ही जनरल स्टाफ के उच्च स्तरीय अधिकारी वर्ग ने उसे कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। निस्संदेह हिटलर को मालूम था कि उनकी नजर में वह क्या हस्ती रखता है, अर्थात् वे उसे किस नजर से देखते हैं। इसके बावजूद हिटलर उनके मौन तिरस्कार को तब तक बरदाश्त करता रहा, जब तक वे उसके लिए उपयोगी थे।

किंतु वर्ष 1938 के प्रारंभ में ऐसा प्रतीत होने लगा कि पुरातनपंथी सेनानायकों में उस साहस का अभाव है, जिसके बूते पर हिटलर जर्मन लोगों की खातिर जबरन भूमि-अधिग्रहण की अपनी महत्त्वाकांक्षी योजना को अंजाम देना चाहता था। कुछ वर्ष पहले राइनलैंड में कूच के दौरान उन्होंने हिटलर से बार-बार आग्रह किया था कि सेना को वापस बुला लिया जाए, क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि फ्रांस हमला कर सकता है। हिटलर ने जहाँ अपनी युद्ध संबंधी योजनाओं के बारे में विवरण दिया था, उस हॉसबक सम्मेलन के दौरान और उसके बाद भी उन्होेंने बड़ी आशंका व्यक्त की थी कि लेबेंसरॉम की खोज जर्मनी को एक नए यूरोपीय युद्ध में झोंक देगी, जिसके भीषण परिणाम होंगे।

किंतु हिटलर को परिणामों की परवाह नहीं थी। वह केवल नतीजों में दिलचस्पी रखता था और उसके निश्‍चय को बदलने का कोई भी प्रयास समय की बरबादी के सिवा कुछ नहीं था। जनरलों को शायद यह एहसास नहीं था कि जिस व्यक्ति से उनका पाला पड़ा है, वह बड़ा हठी है और वह एक बार जो ठान लेता है, उससे कभी पीछे नहीं हटता, भले ही उसे अपना लक्ष्य पाने के लिए कुछ भी करना पड़े।

हिटलर के लिए अब घर की सफाई करने, बूढ़े और बदमिजाज सेनानायकों को हटाकर ऐसे युवा लोगों को भरती करने का समय आ गया था, जो परिणामों की परवाह न करते हुए अपने फ्यूहरर की आज्ञा का पालन करने के लिए हमेशा तत्पर रहें। जर्मनी में उस समय दो उच्चतम पदधारी अधिकारी राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग के दिनों से अपनी कुरसी पर जमे हुए थे। जर्मन सशस्त्र सेना का प्रधान सेनापति अर्थात् कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल वेर्नर वॉन ब्लॉम्बर्ग और सेना का कमांडर-इन-चीफ जनरल वेर्नर वॉन फ्रिट्श। ये सख्त और अभिमानी अधिकारी, जिन्हें अपनी मान-मर्यादा की हर समय चिंता रहती थी, नहीं जानते थे कि उन्हें सेक्स जैसे निजी घोटाले में फँसाकर, अपमानित करके अपने पद से हटा दिया जाएगा; जबकि वे स्वयं ऐसे कार्यों को बहुत घृणित मानते थे।

पहले ब्लॉम्बर्ग को गिरना था। वह अभी-अभी बर्लिन वापस आया था। गोरिंग तत्काल उससे मिलने उसके दफ्तर गया। उस क्षण तब ब्लॉम्बर्ग को कतई पता नहीं था कि क्या होने जा रहा है। चौंकानेवाली खबर सुनने के बाद ब्लॉम्बर्ग ने अपनी पद-प्रतिष्ठा बचाने के लिए तुरंत समझौता करने की पेशकश की।

उस दिन बाद में हिटलर ने ब्लॉम्बर्ग को राइक चांसलरी में बुलाया और फौरन नौकरी से निकाल दिया, यह वादा करने के बाद कि विवाद शांत हो जाने के बाद उसे ड्यूटी पर वापस बुला लिया जाएगा। ब्लॉम्बर्ग वापस इटली चला गया और हिटलर ने उसे फिर कभी वापस नहीं बुलाया।

ब्लॉम्बर्ग लोकापवाद उतना गंभीर नहीं था जितना कि अगला प्रकरण। हिमलर और हेड्रिक की वह साजिश, जो सेना के कमांडर-इन-चीफ जनरल वेर्नर वॉन फ्रिट्श की मान-मर्यादा, पद-प्रतिष्ठा सबकुछ ले बैठी।

जिस दिन ब्लॉम्बर्ग को बरबाद किया गया था, उसी दिन गोरिंग ने हिमलर और हेड्रिक से मिली जेस्टेपो की एक फाइल हिटलर को दी थी। उस फाइल में पूरी उम्र अविवाहित रहे जनरल फ्रिट्श की वर्ष 1935 में कलमबंद की गई उसके समलिंगी आचरण की एक घिनौनी कहानी थी। 

जब वह फाइल हिटलर को दिखाई गई, उसका सहायक सैनिक अधिकारी कर्नल फ्रेडरिक हॉसबक भी संयोगवश वहाँ मौजूद था। सेना के प्रति निष्ठा के कारण वह जनरल फ्रिट्श को सबकुछ बताने के लिए दौड़ गया, हालाँकि हिटलर ने उसे हिदायत दी थी कि इस मामले के बारे में वह किसी से जिक्र न करे। आरोपों के बारे में सुनने के बाद फ्रिट्श ने हर आरोप से साफ इनकार कर दिया।

अगले दिन सुबह हॉसबक ने बड़ी हिम्मत दिखाते हुए हिटलर की फ्रिट्श के साथ हुई चर्चा तथा आरोपों से उसके साफ इनकार के बारे में सबकुछ बता दिया। हॉसबक ने हिटलर से यह भी आग्रह किया कि वह फ्रिट्श को उससे अकेले में मिलने का एक मौका दे, ताकि वह अपनी सफाई पेश कर सके और अपने नाम पर लगे बदनामी के दाग को मिटा सके। हिटलर ने उसकी बात तुरंत मान ली और फ्रिट्श को चांसलरी में बुलवाया।

फ्रिट्श जब शाम को वहाँ पहुँचा तो उसने हिमलर तथा गोरिंग को पहले से वहाँ मौजूद पाया। फिर हिटलर ने सेक्स-ब्लैकमेल आरोपों का वर्णन किया और उसे जवाब देने का मौका दिया। फ्रिट्श ने एक बार फिर हर आरोप को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया।

फ्रिट्श घटनाक्रम में आए इस बेतुके बदलाव से अत्यधिक घबराया हुआ था, जिसे हिटलर ने अपराध-भाव का संकेत मान लिया। तत्पश्‍चात् हिटलर ने उसी समय उसके इस्तीफे की माँग की। लेकिन फ्रिट्श ने धैर्यपूर्वक अपनी घबराहट से निकलकर और अपने आत्मसम्मान का खयाल आते ही इस्तीफा देने की माँग को ठुकरा दिया। उसने कहा कि त्याग-पत्र देने के बजाय वह फौजी अदालत के सामने सफाई देना अधिक पसंद करेगा। हिटलर ने तब उसे अनिश्‍चितकालीन अवकाश पर भेज दिया।

इस बीच बर्लिन में यह अफवाह फैल गई कि सेना में इस बात को लेकर काफी रोष है कि उनके शीर्षस्थ कमांडरों के साथ बहुत बुरा सुलूक हुआ है और वे इस कारण समस्त नाज़ी अधिकारी वर्ग के खिलाफ कोई कदम उठाने पर विचार कर रहे हैं। संभावना है कि वे अपना रोष प्रदर्शन 30 जनवरी को करें, जब हिटलर के सत्ता में आने की पाँचवीं वर्षगाँठ मनाई जाएगी और हिटलर उस दिन राइचस्टैग की सभा को संबोधित करेगा।

लेकिन, सच तो यह है कि फौजी नेताओं का 30 जनवरी को ऐसा कुछ भी करने का इरादा नहीं था। इसके दो कारण थे। एक तो वे उसके परिणामों से डरे हुए थे और दूसरे, उन्होंने निष्ठा की जो शपथ ली हुई थी, उस पर आँच आने का भय था। उनकी हिचकिचाहट को देखते हुए हिटलर को अपनी शक्ति का प्रयोग करने का मौका मिल गया। 4 फरवरी, 1938 को उसने अपने मंत्रिमंडल की एक बैठक बुलाई और उनकी स्वीकृति से एक आदेश जारी किया, जो इस प्रकार था—‘‘मैं इसी समय से समस्त सशस्त्र बलों को अपने अधिकार में लेता हूँ।’’

उसने पूरा युद्ध मंत्रालय समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर सशस्त्र बलों का नया आला कमान (हाई कमांड) बना दिया, जिसके तहत थल सेना, नौसना व वायुसेना का पूरा नियंत्रण था और इन सबके ऊपर वह खुद था, इस पूरी व्यवस्था के अध्यक्ष की हैसियत से। चीफ-ऑफ-स्टाफ के सांकेतिक पद पर जनरल काइटेल को नियुक्त कर दिया। फ्रिट्श की जगह आर्मी कमांडर के रूप में जनरल वाल्टर वॉन ब्राउकिट्श की नियुक्ति कर दी गई।

गोरिंग, जिसे उम्मीद थी कि सशस्त्र बलों की कमान वह खुद सँभालेगा, को पदोन्नति देकर फील्ड मार्शल बना दिया गया। इस तरह वह राइक में उच्चतम सेना अधिकारी बन गया।

जर्मन लोगों की जानकारी के लिए हिटलर ने घोषणा कर दी कि ब्लॉम्बर्ग और फ्रिट्श दोनों ने ‘स्वास्थ्य के आधार पर’ अपने पदों से त्याग-पत्र दे दिया है। उनकी बरखास्तगी के साथ ही हिटलर ने रंडस्टेड, वॉन क्लूज और वॉन क्लेस्ट सहित 16 वरिष्ठ सेनापतियों अर्थात् जनरलों को भी हटा दिया। अन्य 44 को पुन: नियुक्त किया गया। उनमें से अनेक को बाद में वापस बुला लिया गया, क्योंकि एक ऐसी नीति बनाई गई थी, जिसके तहत जनरलों को फ्यूहरर की मरजी के मुताबिक नियुक्त एवं पदच्युत किया जा सकता था। जिनसे वह नाराज होता था, उन्हें हटा दिया जाता और उनकी जगह दूसरों को रख लिया जाता।

जर्मनी की सशस्त्र सेनाओं का नियंत्रण अब एक ऐसे व्यक्ति के हाथों में था, जो नौसिखिया था, जिसने कोई प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया था और जिसका युद्धक्षेत्र संबंधी अनुभव सिर्फ इतना था कि प्रथम विश्‍व युद्ध के दौरान उसने एक डाक-वाहक के रूप में काम किया था। हालाँकि उसने बहादुरी के लिए ‘आयरन क्रॉस प्रथम श्रेणी’ प्राप्त किया था, फिर भी हिटलर को पदोन्नति नहीं मिली थी, क्योंकि उसमें नेतृत्व करने की क्षमता का अभाव था। सैनिक अधिकारी, जिन्हें व्यक्ति के स्वभाव एवं चरित्र की स्वाभाविक समझ थी, ऑस्ट्रियाई कॉरपोरल पर इतना भरोसा नहीं करते थे कि उसे वे सार्जेंट बना दें। बहुत वर्ष बीत जाने पर भी वे उस पर विश्‍वास नहीं करते थे, लेकिन उसका विरोध करने की हिम्मत भी उनमें नहीं थी।

उसी प्रकार हिटलर ने अपने सेनापतियों पर कभी भरोसा नहीं किया। उसे काइटेल जैसे दब्बू, हाँ में हाँ मिलानेवाले चापलूसों से घिरा रहना अधिक पसंद था। उसकी सैन्य नेतृत्व संबंधी शैली की दो मुख्य विशेषताएँ थीं—एक तो यह कि उसे जब भी कोई निर्णय लेना होता था, वह हमेशा सोचने में बहुत समय लगाता था। समय चाहे जितना भी नाजुक क्यों न हो, बड़े-बड़े निर्णयों को टालता रहता था और गप्पें हाँकने में मशगूल रहता था; दूसरे, जब वह अपना निश्‍चय कर लेता था तो उसका अडिग निर्णय बना जाता था, भले ही उसके परिणाम कितने भी भीषण हों। उसकी इसी घातक हठधर्मी के कारण लाखों जर्मन सैनिकों को असमय अपनी कब्र में जाना पड़ा।

वर्ष 1938 की वसंत ऋतु में हिटलर ने हिंडेनबर्ग के जमाने में नियुक्त अधिकतर बूढ़े अनुदार सैनिक अधिकारियों की अनौपचारिक ढंग से छुट्टी कर दी। सैन्य विभाग में इस साफ-सफाई के साथ ही अनेक मंत्रियों और राजदूतों को भी हटा दिया गया।

हिटलर के लिए भविष्य के द्वार पूरे खुले हुए थे। जर्मन राष्ट्र और समस्त सशस्त्र बलों पर उसका अधिकार था। साम्राज्य का क्षेत्र-विस्तार करने का समय आ गया था। सोची-समझी योजना के अनुसार आक्रमण का पहला शिकार ऑस्ट्रिया को बनाया जाना था और किसे पता था कि यह कदम एक नए विश्‍व युद्ध की ओर जानेवाला पहला कदम साबित होगा।