लालघाटी, सन 1975।
उस वक्त सुबह के साढ़े पाँच बजे रहे थे, जब तेज शोर-शराबा सुनकर जमुना की नींद खुली।
“क्या हुआ? इतना शोर-शराबा क्यों हो रहा है?” उसने लिहाफ़ से सिर निकालकर पूछा जबकि कुक्कू पहले ही उठकर बैठ चुका था और कान खड़ा किये हुए बाहर मची चीख पुकार के शब्दों को पहचानने की कोशिश कर रहा था।
“कुछ हुआ है क्या?” जमुना की भी नींद हवा हो गयी।
“कोई घटना घटी है। खून-खून सुनाई दे रहा है। बाहर चलकर देखते हैं।”
कुक्कू बिस्तर से निकला और खूँटी पर टंगा लालटेन उतारकर उस कुटिया से बाहर आ गया, जो मजार पर रात रुकने वाले फरियादियों के लिए अरक्षित था। जमुना भी उसके पीछे-पीछे निकला। चारों ओर गहन अँधकार था और उजाला फैलने में कम से कम घंटे भर की दरकार थी। सर्द हवा ने पहले से व्याप्त कड़ाके की ठण्ड में और इजाफ़ा कर दिया था। लगभग सौ मीटर के फासले पर मौजूद पीर सैय्यद की कुटिया के आगे लालटेनों की लौ के साथ-साथ लोगों के साये भी नजर आ रहे थे। शोर भी वहीं से आ रहा था। कुक्कू और जमुना लम्बे-लम्बे कदम बढ़ाते हुए वहाँ पहुँचे लेकिन वहाँ का नजारा देखकर हैरान रह गये।
“य..ये क्या हुआ है?” कुक्कू ने हैरतजदा लहजे में पूछा लेकिन जवाब देने का हौसला कोई न जुटा सका। पीर की कुटिया के बंद दरवाजे के नीचे से गाढ़ा लाल खून रिसकर बाहर एक छोटे से गड्ढे में जमा हो रहा था। गड्ढा भरने की कगार पर पहुँच चुका था। कुछ शागिर्द सिसक रहे थे जबकि कुछ को अभी भी ये उम्मीद बंधी हुई थी कि कुटिया के भीतर पीर सैय्यद सही-सलामत हैं। ये बात जुदा थी कि दरवाजा खोलने का साहस कोई नहीं कर पा रहा था। लालटेन की रोशनी में हर किसी का चेहरा ग़मगीन नजर आ रहा था।
“पीर हमें छोड़कर चले गये।” एक शागिर्द छाती पीटते हुए दहाड़े मार-मारकर रोने लगा। उसे देखकर वे लोग भी द्रवित हो गये, जो अब तक खुद को जब्त किये हुए थे। और फिर जो सुबह पक्षियों के कलरव से संगीतमय होनी चाहिए थी, वह सुबह देखते ही देखते लोगों के हृदयविदारक रुदन से द्रवित हो उठी।
जमुना का कलेजा बैठने लगा। उसे महसूस हुआ कि उसके जिस्म का वह
हिस्सा अचानक खाली हो गया है, जहाँ दिल पाया जाता है जबकि कुक्कू अभी भी आपा नहीं खोया था और दरवाजे से बहकर आ रहे तरल पर नजरें टिकाये हुए था, जिसकी शिनाख्त पहले ही खून के रूप में हो चुकी थी।
“हमें दरवाजा तोड़ना होगा।” कुक्कू ने घोषणा की- “हो सकता है पीर बाबा अभी घायल हों। उन्हें बचाया जा सकता हो।”
शागिर्दों का रोना-चिल्लाना थम गया। वे बगुले की तरह गर्दन उठाकर कुक्कू को यूँ देखने लगे, जैसे अचानक उसमें उन्हें अपना नेता नजर आने लगा हो। कुक्कू ने भी अपनी भूमिका को समझा और दो ऐसे शागिर्दों का चयन किया, जो पूरी तरह मातम के हवाले नहीं हुए थे तत्पश्चात करीब दस मिनट बाद कुटिया के दरवाजे फ्रेम से अलग कर लिए गये। कुटिया तो खोल ली गयी लेकिन उसके बाद वातावरण में जो चीख-पुकार मची, लोगों पर जो दहशत और मातम तारी हुआ, उसमें किसी को अपने तन-मन की सुध न रही। शागिर्द अपनी छाती पीटते हुए खून के तालाब में लोटने लगे।
दृश्य ही ऐसा था, जिसे देखकर कोई भी खौफ़जदा हो सकता था। कुटिया में पीर सैय्यद का जिस्म दो टुकड़ों में यूँ विभक्त हुआ पड़ा था, मानो बेइंतहा ताकत के धनी किसी शख्स ने उनके दोनों टाँगों को पकड़कर जिस्म को चीर दिया हो। लाश के इर्द-गिर्द लहू का दरिया बह रहा था। पीर की खुली हुई आँखों में हैरत और दहशत थी। आभास हो रहा था कि उनके सामने कोई ऐसी शख्सियत आयी थी, जिसके आने की उन्हें ज़रा भी उम्मीद न रही हो। और इस तरह उनकी आँखों में हैरत और दहशत के जो साये काबिज हुए थे, वे मौत के बाद हमेशा के लिए उनमें कैद होकर रह गये थे।
शागिर्दों की जो हालत हुई, वो हुई लेकिन जमुना को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसने पीर सैय्यद की लाश के रूप में खुद अपनी लाश देख ली हो। वह पत्थर की मूरत में तब्दील होकर लाश को यूँ घूर रहा था, मानो चेतनाशून्य हो गया हो। इतनी वीभत्स मौत, वो भी पीर सैय्यद जैसे ऐसे जलाली शख्स की, जिसकी देव सरीखी काया और भाव-भंगिमाएं मात्र ही किसी को दहलाने के लिए काफी थीं; ये घटना दुश्मन के साहस और वहशत का प्रत्यक्ष दस्तावेज थी।
जमुना को हर चीज घूमती हुई नजर आने लगी। वह चक्कर खाकर गिरने ही वाला था कि कुक्कू ने उसे थाम लिया।
“संभाल अपने आप को।” उसने उसे एक पत्थर पर बैठाते हुए कहा- “मैं पता करता हूँ कि क्या हुआ था।”
“मुझे घर जाना है।” जमुना ने किसी जूड़ी के मरीज की भांति काँपते हुए कहा- “मेरी बीवी और चार साल की बच्ची की जान खतरे में है।”
“पागल मत बन, अभी पता करने दे कि आख़िर ये किसकी हरकत है।”
“तुझे अब भी पता करने की पड़ी है?” जमुना ने उसे घूरा- “तुझे दिखाई नहीं दे रहा है कि पीर बाबा जैसे मजबूत और करिश्माई शख्स को पशुपति के अलावा और कोई नहीं मार सकता?”
“नहीं, मत भूल कि पीर ने क्या कहा था। पशुपति केवल पूनम की रात ताकतवर होता है। किसी जलाली को मारने की कुव्वत उसमें केवल पूनम की रात पैदा होती है। बाकी दिनों में वह आम इंसानों से बस थोड़ा ही अलग होता है। इसलिए ये काम पशुपति का नहीं है। किसी ऐसी शख्सियत का है, जो पीर से भी ज्यादा शक्तिशाली है। लेकिन कौन?” जवाब में कुक्कू की आँखें गोल हो गयीं लेकिन जवाब फिर भी नहीं सूझा उसे।
“मुझे केवल घर जाना है। मेरा परिवार अकेला है। मुझे किसी भी तरह घर जाना है।” जमुना का धैर्य पूरी तरह जवाब दे चुका था। उसकी कल्पना में बार-बार ये दृश्य उभर रहा था कि पशुपति उसकी चार साल की बेटी का सिर धड़ से उखाड़ने के बाद उसकी बीवी के बाल पकड़कर घसीटते हुए उसे घर से बाहर लेकर आ रहा है।
“ठीक है। तू पाँच मिनट रुक, हम अभी यहाँ से निकलते हैं।”
कहने के बाद कुक्कू, जमुना के पास से हटकर उस शागिर्द के पास पहुँचा, जो ग़मगीन होने के बाद भी कुछ बता पाने के स्थिति में दिखाई दे रहा था।
“य..ये सब कैसे हो गया?” कुक्कू ने भी यथासंभव खुद को दुखी दर्शाते हुए पूछा।
“क्या बताएं जनाब कि कैसे हो गया।” शागिर्द ने सुबकते हुए कहा- “रात को कोई आहट नहीं हुई, कोई आवाज़ नहीं आयी, कोई शोर नहीं उठा। जब सवा पाँच बजे अजान का वक्त हुआ तो हम सब बिस्तर से बाहर निकले और मजार से थोड़ी ही दूर पर मौजूद मस्जिद में इकट्ठा हुए। हर रोज़ पीर साहब वहाँ हमसे पहले ही पहुँचे होते थे लेकिन आज ये नयी घटना हो गयी थी कि वे हर किसी के पहुँच जाने के बाद भी नहीं पहुँचे थे। हमने पाँच मिनट तक उनकी राह देखी और फिर जब यहाँ आये तो......।” शागिर्द ने जोर की हिचकी लेकर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया और कुक्कू के कंधे पर सिर रखकर रोने लगा- “हम यतीम हो गए। हमारे हुजूर हमें छोड़कर चले गये। हमने कभी नहीं सोचा था कि इतने पहुँचे हुए पीर को कोई इतने वहशियाना तरीके से क़त्ल कर जाएगा। या खुदा, शैतान तेरे बंदों से भी ताकतवर कब से होने लगा।”
शागिर्द का करुण क्रंदन सुनकर कुक्कू की आँखों में भी पानी उतर आया। मजार के वातावरण में चारों ओर चीख-पुकार मची हुई थी। पीर सैय्यद के शागिर्द गम में इस कदर पागल हुए जा रहे थे कि जमीन पर फ़ैले खून को अपने बदन से पोतते हुए गला फाड़-फाड़कर चीख रहे थे। कुछ तो दीवार पर माथा पटकते हुए खुद को गंभीर रूप से घायल करने पर तुले हुए थे। कुक्कू को लगा कि अगर जल्द ही आस-पास के लोगों ने वहाँ पहुँचकर स्थिति को नहीं संभाला तो कई लाशें बिछ जायेंगी, लिहाजा वह जमुना के साथ वहाँ से रवाना हो गया।
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राजनगर, वर्तमान।
जिस पल कम्पाउण्डर फाह्याज़ की ड्रेसिंग करके वहाँ से गया, उसके ठीक अगले ही पल सुबोध और कामरान ने ड्राइंग हॉल में कदम रखा। फाह्याज़ को पट्टियों का श्रृंगार किया देख कामरान तो हैरान हुआ लेकिन सुबोध मामला समझ गया।
“जरूर घर पहुँचने की जल्दी में किसी को ठोका होगा आपने।” उसने हँसते हुए कहा।
“नहीं।” फाह्याज़ दोनों को बैठने का संकेत करने के बाद बोला- “खुद ठुक गया। खुदा का शुक्र है कि बाइक का पहिया एक पेड़ से टकरा गया वरना जिस स्पीड में वो थी, उस स्पीड में न जाने कितनी दूर तक घसीटते हुए ले जाती मुझे और तब मैं आपको यहाँ घर पर नहीं, किसी हॉस्पिटल में मिलता; जिन्दा या लाश के रूप में।”
“गलती मेरी ही थी सर।” सुबोध ने एक सोफ़े पर तशरीफ़ टिकाया और हाथ में ली हुई फाइल को सेंटर टेबल पर रखते हुए अफ़सोसजनक लहजे में कहा- “घबराहट पैदा करने वाली इतनी बड़ी बात मैंने आपको बाइक राइड करते समय बता दी।”
“जी बिल्कुल नहीं थी।” फाह्याज़ ने पलकें झपकाते हुए कहा- “आप जब भी मुझसे वो बात शेयर करते, मेरा पहला कदम यही होता कि मैं भागकर अपने बेटे तक पहुँचता। आई लव हिम टू मच।” कहने के बाद वह कामरान से मुखातिब हुआ- “खातिरदारी में क्या लेना पसंद करेंगे कामरान मियाँ?”
कामरान ने सकपकाकर पहले सुबोध की ओर देखा फिर फाह्याज़ की ओर, तत्पश्चात हिचकिचाते हुए कहा- “आपको हॉस्पिटैलिटी की पड़ी है सर, जबकि आप बेहतर जानते हैं कि हम किस सिलसिले में यहाँ आये हैं।”
“यू नो मिस्टर कामरान...।” फाह्याज़ ने गहरी साँस लेते हुए कहा- “कुछ देर पहले मेरी हालत बेशक वैसी ही थी, जैसी आप समझ रहे हैं। मुझे लग रहा था कि अब मेरी दुनिया ख़त्म हुई ही हुई, लेकिन फिर न जाने ऐसा क्या चमत्कार हुआ कि अब मुझमें ये यकीन पैदा हो गया है कि हसन को कुछ नहीं होगा। अब या तो मेरा सिक्स्थ सेन्स बेहतर काम कर रहा है या फिर मुझे भयानक धोखा दे रहा है।”
“जी आपका सिक्स्थ सेन्स आपको बिल्कुल धोखा नहीं दे रहा है।” सुबोध ने सेण्टर टेबल पर कुछ देर पहले रखी फाइल उसकी ओर सरकाते हुए कहा- “वी हैव लॉट्स ऑफ़ पॉजिटिव न्यूज़।”
“इस टूटी-फूटी हालत में फाइल मत पढ़वाइए आचार्य जी।” फाह्याज़ ने भयंकर जम्हाई लेते हुए कहा- “अपनी फाइंडिंग्स को खुद समराइज कर दीजिए। एक्सीडेंट की वजह से मेरे सुनने और समझने की क्षमता पर कोई फर्क नहीं पड़ा है।”
“ऑलराइट सर। तो शुरूआत उस मोमिन से करते हैं, जिसकी तस्वीर मुझे भेजकर आपने उसके बाबत पता लगाने के लिए कहा था।” सुबोध ने जेब से पेनड्राइव निकाला और आगे कहा- “प्लीज लैपटॉप या ओटीजी केबल मंगवा लीजिए।”
फाह्याज़ ने चिल्लाकर मेड को लैपटॉप लाने के लिए आवाज़ दी तत्पश्चात सामने बैठे कामरान और सुबोध को देखते हुए उस पल की कल्पना करने लगा, जब उन्हें ये पता चलता कि वह मोमिन इंसान है ही नहीं।
जब मेड लैपटॉप पहुँचा गयी तो सुबोध ने उसका पॉवर बटन ऑन करते हुए कहा- “ये मोमिन गोल मार्केट के बड़े मस्जिद में रहता है। इमाम के साथ इसकी गहरी यारी लगती है।”
गहरी यारी की बात सुनकर फाह्याज़ चौंका क्योंकि उसे वो मालूम था, जो सुबोध को नहीं मालूम था लिहाजा उसने आँखें गोल करते हुए पूछा- “आपके हाथ ये इनफार्मेशन लगी कैसे?”
“आसान था सर।” सुबोध मुस्कुराया- “वह आदमी बिना किसी मिलावट का खालिस मुसलमान दिखता है, ऊपर से उसकी पेशानी पर सजदे का निशान भी है। मैंने तुरंत ये कन्क्लुड कर लिया कि ये नमाज का पाबंद शख्स है और शहर के किसी मस्जिद में नमाज के वक्त जरूर स्पॉट हो सकता है लिहाजा मैंने शहर के कुछ नामचीन मस्जिदों के आस-पास लगे कैमरे खंगाले।”
“नामचीन मस्जिदों के ही क्यों?”
“हालाँकि मुझे मालूम है कि नमाज में ये मैटर नहीं करता कि मस्जिद नामचीन है या मामूली इवन मस्जिद का होना ही कोई जरूरी नहीं है लेकिन चूँकि वह इंसान अपनी वेशभूषा से किसी धर्मगुरु सरीखा लग रहा था, इसलिए मेरे मन में पहला ख्याल यही आया कि वह किसी नामचीन मस्जिद से ताल्लुक रखता हो सकता है। हर एक मस्जिद में जाकर पूछताछ करना भागदौड़ वाला वक्त खाऊँ काम होता और ऊपर से हमेशा फुटेज के भूखे रहने वाले लोकल नेताओं द्वारा बात को तिल का ताड़ बनाये जाने का भी खतरा था। उन्हें तो बस ये अफवाह उड़ा देनी थी कि पुलिस को मस्जिदों में बम बनाये जाने की सूचना मिली है, उसी की छानबीन कर रही है; फिर देखते ही देखते शहर और सोशल मीडिया की आबोहवा ही बदल जानी थी। सिर्फ इतना ही नहीं, अगर ये इंसान सस्पेक्ट होता तो करेक्ट इनफार्मेशन न निकल पाने का भी खतरा था लिहाजा मैंने कुछ नामचीन मस्जिदों की नमाज के वक्त की पिछले तीन दिन की फुटेज पुलिस स्टेशन में ही मंगवाकर डेस्क वर्क कर लिया।”
“कॉमन सेंस तो कमाल का है आपका।” फाह्याज़ हँसा।
“पर अफ़सोस इस बात का है कि ये आपको आज पता चला।”
“मजाक कर रहा था आचार्य जी, मैं तो हमेशा से ही आपकी बुद्धिमत्ता और मेहनत का कायल रहा हूँ। मुझे यकीन है कि इस बार सीएसई की होली लिस्ट में आपका नाम जरूर आयेगा, वो भी आईएएस के लिए।”
“आपके मुँह में घी शक्कर।”
“फिलहाल ये बताइए कि कुछ ज्यादा ही बोरिंग काम नहीं चुन लिया आपने?” फाह्याज़ ने सुबोध के हाथ से पेनड्राइव लेकर लैपटॉप में लगाते हुए पूछा।
“चूंकि नेक काम कर रहे हैं, इसलिए नसीब ने भी साथ दिया सर और डिजायर्ड फुटेज तीसरी बार में ही हाथ लग गयी वरना वक्त भी बहुत लगता और मगजमारी भी खूब होती।”
फाह्याज़ ने पेनड्राइव में मौजूद विडियो क्लिप्स को चेक किया और इस नतीजे पर पहुँचा कि सुबोध की फाइंडिंग सौ फीसदी दुरुस्त थी। कई बार वह मोमिन, इमाम के साथ मस्जिद के आस-पास स्पॉट हुआ था। यानी कि उस कथित जिन्न को तो अब दबोचा ही जा सकता था।
“लेकिन ये आदमी है कौन, और आपको इसे तलाशने की जरूरत क्यों पड़ गयी?” सुबोध ने पूछा।
“ये वो आदमी है, जो नेक्रोमेंसी के निशान में दिलचस्पी लेते हुए मोर्ग तक चला गया था और गार्ड को कन्विंस करके विनायक के सीने पर मौजूद उस निशान को देखकर किसी बात की तस्दीक भी किया था।”
“ओह! यानी कि पीर-फ़कीर भी अब इस केस में दिलचस्पी ले रहे हैं?”
“ये कोई पीर-फ़कीर नहीं है।” फाह्याज़ ने कहा और इससे पहले कि सुबोध इस बाबत कुछ पूछता उसने फ़ौरन बात आगे बढ़ा दी- “फोन पर आपने कहा था कि काफी बातें बताने को हैं। तो क्या कोई और फाइंडिंग है या बस इतना ही
था?”
“भूसे के ढेर में एक और सुई किस्मत से मेरे हाथ लगी है..।” सुबोध ने फाइल में से किसी वेबपेज का प्रिंट आउट निकालते हुए कहा- “...लेकिन ये कितना कारगार होगा, ये सोचने का विषय है।”
फाह्याज़ उस प्रिंटआउट को लेकर उलटने-पलटने लगा, जिस पर एक ही डेडबॉडी की दो तस्वीरें थीं; एक पेट के बल और एक पीठ के बल। मरने वाले की पीठ पर नेक्रोमेंसी का निशान था।
“गूगल लेंस तो हमारी कोई मदद नहीं कर पाया सर लेकिन जब मैंने गूगल पर कुछ फ्रेजेज जैसे अपीयरेंस ऑफ़ नेक्रोमेंसी’ज सिगिल ऑन ह्युमन बॉडी, रिपोर्टेड डेथ बिकॉज़ ऑफ़ नेक्रोमेंसी’ज साइन वगैरह सर्च किया तो गूगल इमेज ने जो तमाम तस्वीरें परोसीं, उनमें एक डेडबॉडी की वो तस्वीरें भी थीं, जो इस वक्त आपके हाथ में हैं। उस इमेज पर क्लिक करके मैं जिस वेबपेज पर पहुँचा, उसी का प्रिंटआउट आप देख रहे हैं।”
“लेकिन ये तो किसी लोकल न्यूज़पेपर का वेबपेज लग रहा है और गुजराती में है।”
“जी हाँ, इसीलिए इससे जो भी इनफार्मेशन हासिल होती है या यूँ कहे कि हमारे थ्योरी की जो पुष्टि होती है, उसे अब कामरान आपको समझायेगा क्योंकि इसे गुजराती आती है।”
“तो शुरू हो जाइए कामरान मियाँ।” फाह्याज़, कामरान से मुखातिब होकर बोला।
“एक्चुअली सर ये गुजरात के एक लोकल न्यूजपेपर में आने वाला साप्ताहिक कॉलम ‘विश्वानि अकल्पनीय कोयड़ाओ’ है।” कामरान ने कहा- “इस कॉलम में देश-दुनिया के अनसुलझे रहस्यों पर आधारित लेख प्रकाशित किये जाते हैं। हिंदी में इस टाइटल का मतलब ‘संसार की अबूझ पहेलियाँ’ होता है। इस अंक में जिस घटना के बारे में बात की गयी है, वह महाराष्ट्र से लगे हुए गुजरात के वलसाड जिले के रोला गाँव की है। इस आर्टिकल में जो कंटेंट है, उसके मुताबिक़ इस गाँव में रहने वाले व्यक्ति जोसेफ़ पटेल की मौत हूबहू उन्हीं परिस्थितियों में हुई थी, जिस परिस्थिति में विनायक की मौत हुई है और ये घटना तकरीबन पंद्रह से बीस साल पुरानी है। इट मीन्स, ये बात तब की है, जब मैं कूची थामना सीख रहा था।”
“यानी कि अगर इस आदमी की मौत में भी उसी एंटिटी का हाथ होगा तो इतना तय है कि इस आदमी का चुनाव एंटिटी ने तुम्हारे जरिये नहीं किया होगा।” सुबोध ने कहा।
“मैंने आप लोगों को बताया था कि कभी-कभी मेरे वालिद भी कोई पेटिंग
बनाने के बाद निराश हो जाते थे। एक बार मैंने उन्हें कुछ पेंटिंग्स जलाते हुए भी देखा था। साथ ही मैंने ये संभावना भी जताई थी कि ये शाप अब्बू से ही मुझ तक पहुँचा हो सकता है। मे बी कि उस वक्त एंटिटी ने उन्हीं के जरिये उस आदमी की पेंटिंग बनवाई रही हो।”
“तुमने ये भी कहा था न कि तुम्हारी अम्मी घुमने की बहुत शौक़ीन थीं और अक्सर महाराष्ट्र और गुजरात की जगहें उनकी फेहरिस्त में हुआ करती थीं?”
कामरान ने जब सहमति में सिर हिलाया तो फाह्याज़ ने आँखों में ये सवाल लिए हुए सुबोध की ओर देखा कि क्या उसकी अम्मी के घुमंतू मिजाज का इस मामले से कोई सम्बन्ध हो सकता है? लेकिन सुबोध ने कंधे उचका दिए।
“और क्या मालूमात हासिल होते हैं इस आर्टिकल से?”
“मानसिक बीमारी का हवाला देते हुए पुलिस ने इसे आत्महत्या बताकर केस बंद कर दिया था। ये थ्योरी गढ़ने में पुलिस इसलिए कामयाब हो गयी क्योंकि..।”
“....जोसेफ पटेल को भी डरवाने सपने आते थे, काली परछाईं दिखाई देती थी और अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देती थीं।” फाह्याज़ ने कामरान का कथन पूर्ण किया।
“एग्जैक्ट्ली।”
“लेकिन अखबार का ये आर्टिकल साल भर पुराना है...।” इस दफा सुबोध ने कहा- “यानी कि पंद्रह-बीस साल पुराने इस वाकये को न्यूज़पेपर ने हाल ही में प्रकाशित किया है। पुलिस फाइल में ये केस साल्व्ड था, बावजूद इसके इसमें अखबार वालों को ऐसा क्या अनसाल्व्ड दिखा, जो उसने इसे अपने कॉलम के लिए कवर किया?”
“पुलिस की थ्योरी से इतर इस मामले से एक बड़ी ही दिलचस्प कहानी भी जुड़ी हुई है सर, जो आर्टिकल के आख़िरी कुछ पैराग्राफ में दर्ज है और लोकल्स के बीलिफ्स पर आधारित है।”
“तो बताइए न, इंतजार किस बात का कर रहे हैं।”
“कॉलम के लिए मसाले की तलाश में रहने वाली अखबार की रिसर्च टीम जब इस कहानी तक पहुँची तो पूरे मामले को जानने-समझने के लिए रोला गाँव गयी। टीम ने सबसे पहले गवर्नमेंट ऑफिसिअल्स से कांटेक्ट करके इस केस से रिलेटेड वो बातें बाहर निकालीं, जो आधिकारिक तौर पर रिकॉर्ड में अंकित थीं और जो मैंने अभी-अभी आपको बतायीं लेकिन परदे के पीछे की कहानी जानने के लिए जब टीम रोला के लोकल्स से मिली तो उन्होंने टीम को असली कातिल का नाम बताया।”
“असली कातिल का नाम?” फाह्याज़ और सुबोध के होठों से सिसकारी
निकल गयी।
“लोकल्स के मुताबिक़ जोसेफ़ का कत्ल अमरोज़ ने किया था, जो मिथक और फोकटेल्स के अनुसार सदियों पहले तेहरान में रहने वाला एक भयानक नेक्रोमेंसर था। वह अँधेरी दुनिया के रहस्यों का इतना बड़ा ज्ञाता था कि काला लिबास पहनकर, अँधेरे की काली स्याही खुद पर उड़ेलकर अँधेरे का ही एक हिस्सा बन गया था ताकि जब मौत का फ़रिश्ता उसे लेने आये तो उसकी अँधेरी शख्सियत को ढूँढ न पाये या अगर ढूँढ भी ले तो उसके स्याहपन के कारण उसे पहचान न पाये और गफ़लत में पड़कर खाली हाथ वापस लौट जाए। इस दुनिया में क़यामत तक अपनी मौजूदगी बनाये रखने के लिए अमरोज़ ने अपने काले इल्म की बदौलत मौत को धोखा देने का ये नायाब तरीका निकाला था।”
“लोकल्स के इस इनफार्मेशन का सोर्स क्या था?” फाह्याज़ ने पूछा- “उन्हें इतना यकीन क्यों था कि जोसेफ़ को अमरोज़ ने ही मारा है? जबकि अमरोज़ का नाम मैंने पहली बार सुना है। इससे पहले किसी किताब में भी ये नाम नहीं पढ़ा था मैंने।”
“न्यूज़पेपर की टीम ने गाँव के उन उम्रदराज लोगों से राबता किया था, जो जोसेफ़ की घटना के चश्मदीद गवाह थे। उनके मुताबिक़ जब जोसेफ़ को अजीबोगरीब सपने और आवाजें परेशान करने लगी थीं तो वह नूर मोहम्मद नाम के एक सूफ़ी संत के पास गया था। उस संत ने ही उसे अमरोज़ के बारे में बताते हुए कहा था कि अब उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं बचा सकती। जिस दिन उसकी पीठ पर उभर रही अमरोज़ की मुहर पक्की हो जायेगी, उसी रात अमरोज़ उसे लेने आयेगा और वह चाकू से अपने बदन के सारे कपड़े फाड़कर उसका हाथ थामकर उसके साथ चला जाएगा।”
फाह्याज़ को महसूस हुआ कि किसी ने उसके कलेजे पर जोर का मुक्का मारा हो। कुछ देर पहले हसन को बचा लेने का जो आत्मविश्वास उसके मन में जगा था, वह कमजोर पड़ने लगा।
“क्या अमरोज़ से बचने का कोई रास्ता नहीं है? वह शैतान का नुमाइंदा इतना शक्तिशाली है?” उसने नायकीनी भरे लहजे में पूछा।
“आर्टिकल के मुताबिक़ नूर मोहम्मद ने तो जोसेफ़ से यही कहा था। इसके बाद अपनी जिन्दगी से नाउम्मीद होकर जोसेफ़ ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था और लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया था। ऐसा वह शायद इसलिए कर रहा था ताकि परिवार वाले उसके बिना जीना सीख लें।” कामरान का लहजा द्रवित हो गया। इसलिए भी हो गया क्योंकि उसका हुनर भी जोसेफ़ जैसे न जाने कितने निर्दोषों की मौत में शरीक था।
“लेकिन सदियों पहले तेहरान में रहने वाला वह खूंखार जादूगर आज तक लोगों का शिकार क्यों कर रहा है? पहले तुम्हारे वालिद और अब तुम्हारे हुनर को जरिया बनाकर वह लोगों को क्यों, कैसे और किस आधार पर चुन रहा है? तुम्हारे खानदान का अमरोज़ से क्या रिश्ता है?”
ड्राइंग हॉल में सन्नाटा छा गया। साँसों की रफ़्तार थाम लेने वाले उन रहस्यमयी सवालों का जवाब किसी के पास नहीं था।
“मैं डॉ० साधना से पता करता हूँ कि वे हसन को लेकर किस नतीजे पर पहुँचीं।” फाह्याज़ ने अपना फोन निकालते हुए कहा- “उन्होंने उस पैटर्न को पकड़ लेने का दावा किया है, जिसके आधार पर एंटिटी यानी कि अमरोज़ अपना शिकार चुनता है।”
“सचमुच?” कामरान और सुबोध के रोंगटे खड़े हो गये।
“अब इस सचमुच का जवाब तो वही दे सकती हैं।”
फाह्याज़, साधना का नंबर ढूंढकर डायल आइकॉन को टच करने जा ही रहा था कि दरवाजे की ओर से साधना की आवाज़ आयी- “आप शायद मुझे ही फोन लगाने जा रहे हैं।”
फाह्याज़ समेत बाकियों की निगाह भी दरवाजे की ओर उठ गयी, जहाँ से लियाकत, साधना और हसन भीतर दाखिल हो रहे थे। साधना के हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था।
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