देवराज चौहान ने कार पोर्च में रोकी। ईजन-हैडलाइट ऑफ की। इसके साथ ही जगमोहन कार से निकला और जेब से चाबी निकालते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ गया।
देवराज चौहान भी तब तक उसके पास पहुंच चुका था। जगमोहन ने चाबी लगाकर दरवाजा खोला। दोनों ने भीतर प्रवेश किया। वहां अंधेरा था। जगमोहन स्विच बोर्ड की तरफ बढ़ते हुए बोला।
"कल कृष्णलाल से बाकी का चौबीस करोड़ ले आऊं?"
"सीधे उसके पास मत पहुंच जाना। रकम बड़ी है। इंतजाम करने में दो-एक दिन लग सकते हैं। पहले उससे फोन पर बात कर लेना। " देवराज चौहान ने कहा।
जगमोहन ने लाइट ऑन कर दी। ड्राईंग हॉल में रोशनी फैल गई।
"चाय पी जाए। उसके बाद नींद लेंगे। "जगमोहन ने कहा। देवराज चौहान ने सोफा चेयर की तरफ बढ़ते हुए सहमति में सिर हिला दिया। तभी वो ठिठका। माथे पर बल पड़े। निगाह महाजन पर जा अटकी थी, जो ऊपर जाने वाली सीढ़ियों के पास, बोतल थामे खड़ा था। दूसरे हाथ में रिवॉल्वर थी।
जगमोहन भी उसे देख चुका था। तुम?" जगमोहन के होंठों से निकला।
"हां। बेबी भी है। " महाजन ने मुस्कराकर कहा- "लगता है तुम लोग किस्की से परहेज करते हो या फिर जरूरत पड़ने पर ताजी ताजी बोतल खरीद लाते हो क्योंकि पूरे बंगले को देखने के बाद, एक बोतल भी नहीं मिली।
"मिलेगी भी नहीं।" जगमोहन ने कड़वे स्वर में कहा-"क्योंकि तेरी सेवा करने की हमारी कोई इच्छा नहीं है।"
देवराज चौहान सिर पर मंडरा रहे खतरे को पहचान चुका था। उसकी निगाहें मोना चौधरी को तलाश कर रही थीं। पहले पारसनाथ नजर आया, फिर मोना चौधरी भी दिखी। जो पहली मंजिल पर रेलिंग के पास खड़ी मौत भरी निगाहों से उसे देख रही थी। हाथ में रिवॉल्वर था।
"तुम्हें हैरानी तो हो रही होगी देवराज चौहान कि इतनी जल्दी हम तुम तक कैसे पहुंच गए। लेकिन मैं हर वो काम जल्दी ही निपटाती हूँ जो मुझे देर सबेर में पूरा करना होता है। "
देवराज चौहान के होंठ भिंच गए।
"मानना पड़ेगा की धोखेबाजी भी की तो बहुत समझदारी से। नकली नक्शा बनाकर वो फाइल मेरे हवाले करके हीरा ले गए। तुमने क्या सोचा कि हमें मालूम नहीं होगा कि वो नकली नक्शा है। " मोना चौधरी का स्वर जहर से बुझा हुआ था-"या फिर यह सोचा कि मैं तुम्हें तलाश नहीं कर पाऊंगी।
देवराज चौहान की कठोर निगाह मोना चौधरी पर टिकी रही।
"तुम तो बहुत समझदार निकली।" जगमोहन मुस्कराकर, परन्तु, व्यंग भरे स्वर में कह उठा "वास्तव में हमने तो यही सोचा था कि तुम्हें कभी भी मालूम नहीं हो पाएगा कि वो नकली नक्शा है। यो नक्शा बांके ने बनाया था और बोलता था, ये सिकंदर के खजाने का नक्शा ।
"प्यारे। " महाजन शांत स्वर में कह उठा-"
जुबान बंद कर ले, ये तेरा आखिरी वक्त हैं। "
तभी मोना चौधरी पुनः कठोर स्वर में कह उठी।
“हीरा कहां है?"
"तुम दोनों अपने हाथ ऊपर करो। " मोना चौधरी हाथ में दबे रिवॉल्चर को हिलाकर बोली।
"वो तो गया।" जगमोहन का लहजा तीखा हो गया।
"लो।" जगमोहन ने फौरन अपनी दोनों बांहे छत की तरफ उठा दी। देवराज चौहान की सर्द निगाह मोना चौधरी पर टिकी रही। देवराज चौहान को वैसे ही खड़ा पाकर, मोना चौधरी की आंखें सुलग उठीं।
"हाथ ऊपर।" मोना चौधरी फुफकार उठी।
चेहरे पर मौत के सर्द भाव ही समेटे देवराज चौहान ने हाथ ऊपर कर लिए ।
"महाजन तलाशी लो इनकी हीरा इनकी जेबों में हो सकता है।" दांत भींचे मोना चौधरी ने कहा।
"नहीं है।" जगमोहन की आवाज में तीखापन ही था।
"बेबी।" महाजन, देवराज चौहान और जगमोहन को घूरता कह उठा—"यह भी तो हो सकता है कि हीरा इन्होंने बंगले में कहीं छिपा रखा हो। "
"हम यहां हीरा नहीं, इनकी जान लेने आए हैं। वो बाद की बात है अगर हीरा बंगले में है। तुम्हें जो कहा है, फौरन वही करो। यहां से जाना भी है। " मोना चौधरी ने कठोर
आवाज में कहा।
महाजन ने पैंट में फंसा रखी बोतल निकाली। घूंट भरा। फिर उसे वापस पैंट में ठूंसकर रिवॉल्वर थामे सावधानी से आगे बढ़ा। पहले जगमोहन के पास पहुंचा और उसकी तलाशी लेने लगा।
"बेटे, एक गलती कर दी हमने।" जगमोहन ने कड़वे स्वर में कहा।
"क्या?"
"जब वो तिजोरी बांके रुस्तम ने ली थी, तब ही तुम्हें और मोना चौधरी को शूट कर देते तो बढ़िया रहता।"
"वो वक्त निकल गया है। " महाजन मुस्कराया
"यही तो कह रहा हूं कि वो वक्त निकल गया है। तब...।"
तभी बंगले के बाहर कार के इंजन की आवाज फिर पोर्च में कार रुकने का स्वर आया।
मोना चौधरी, पारसनाथ और महाजन चौके।
"पारसनाथ बाहर देखो।" मोना चौधरी ने भिंचे दांतों से कहा।
पारसनाथ फौरन मुख्य द्वार के पास की खिड़की की तरफ बढ़ा। और जगमोहन ने दो पल के लिए बदले हालातों का फायदा उठाया। चीते की सी फुर्ती के साथ उसने महाजन के रिवॉल्वर वाले हाथ पर झपट्टा मारा। दूसरे ही पल रिवॉल्चर जगमोहन के हाथ में थी और नाल महाजन के पेट से सट चुकी थी।
महाजन हक्का-बक्का खड़ा रह गया था।
देवराज चौहान ने जगमोहन को हरकत में आते देखकर, उसी पल जेब से रिवॉल्वर निकाली और खिड़की की तरफ बढ़ते हुए पारसनाथ के हाथ का निशाना लेकर ट्रेगर दबा दिया।
निशाना बिल्कुल ठीक बैठा। गोली नाल वाले हिस्से में लगी और तीव्र झटके के साथ रिवॉल्वर पारसनाथ के हाथों से निकलकर दूर जा गिरी। नाल वाले हिस्से पर गोली लगने की वजह से नाल चीथड़ों में बदल गई थी। पारसनाथ दो पलों के लिए हक्का बक्का रह गया था।
तब तक देवराज चौहान की रिवॉल्वर का रुख मोना चौधरी की तरफ हो चुका था। जो कि हालातों को बदलते पाकर परेशान हो उठी थी। महाजन, जगमोहन के निशाने पर था और पारसनाथ अब बिना हथियार के था।
दो पल के लिए मोना चौधरी को समझ न आया कि क्या करे?
"कोई हरकत मत करना मोना चौधरी "देवराज चौहान की आवाज में मौत के सर्द भाव थे— "रिवॉल्वर नीचे फेंको और खुद भी नीचे आ जाओ। वरना तुम्हारे दोनों साथी पहले और उसके बाद तुम मरोगी। "
"तुम खुले में हो देवराज चौहान।" मोना चौधरी मौत भरे स्वर में बोली "बचोगे तुम भी नहीं।"
"अगर अपने शब्दों पर विश्वास है तो आजमा लो इस बात को । करो फायर। " देवराज चौहान के दांत भींच गए।
मोना चौधरी कई पलों तक मौत से भरी निगाहों से देखती रही।
वहां मौत सा सन्नाटा छा चुका था।
तभी कदमों की आहट गूंजी और कर्मपाल सिंह ने सावधानी से भीतर प्रवेश किया उसके हाथ में रिवॉल्वर थी। यकीनन उसने भीतर होने वाले फायर की आवाज सुन ली थी। भीतर के माहौल को भी उसने फौरन पहचाना। मोना चौधरी को पहले कभी उसने देखा नहीं था। फिर भी वो पहचान गया कि ऊपर की रेलिंग पर मोना चौधरी खड़ी है। दो पल के लिए वो वैसे ही खड़ा रह गया।
"कर्मे।" जगमोहन खतरनाक स्वर में कह उठा "उसको
संभाल। जो खिड़की के पास है। "
कर्मपाल सिंह की रिवॉल्वर, पारसनाथ की तरफ उठ गई।
पारसनाथ की सपाट कठोर निगाह कर्मपाल सिंह पर जा टिकी। देवराज चौहान ने मौत भरे अंदाज में रिवॉल्वर वाला हाथ हिलाकर नीचे आने का इशारा किया।
लागिन सी नजर आ रही मोना चौधरी ने रिवॉल्वर नीचे फेंकी और सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई, नीचे आने के लिए। कुछ ही क्षणों में वो नीचे थी ।
सतर्कता भरे अंदाज में देवराज चौहान की रिवॉल्वर का रुख मोना चौधरी की ही तरफ था।
"वहां। " देवराज चौहान ने भिंचे कठोर स्वर में लंबे सोफे की तरफ इशारा किया- "उस सोफे पर बैठो।"
मौत में डूबी निगाहों से, देवराज चौहान को देखती मोना चौधरी उसी सोफे पर जा बैठी। वो फंस चुकी थी।
महाजन और पारसनाथ की तरफ हथियार उठे हुए थे। उसकी कोई भी हरकत उन दोनों की फौरन जान ले सकती थी। ऐसे में वो चुप रहना ही ठीक समझ रही थी।
"जगमोहन।" देवराज चौहान, मोना चौधरी के प्रति सतर्क था-"महाजन को, मोना चौधरी के साथ बिठाओ।"
"चल।" जगमोहन ने दांत भींचे उसके पेट पर नाल का दबाव बढ़ाया।
"चल भाई।"
महाजन, मोना चौधरी की बगल में जा बैठा।
जगमोहन की रिवॉल्वर का रुख भी उस तरफ हो गया। कर्मपाल सिंह के हाथ में थमे रिवॉल्वर का रुख पारसनाथ की तरफ था।
"तुम...।" देवराज चौहान ने उसे देखते हुए कठोर स्वर में कहा- "तुम भी इनके साथ आकर बैठ जाओ।"
पारसनाथ इनकार करने की स्थिति में नहीं था। उसी लंबे सोफे पर पारसनाथ आकर बैठ गया। कर्मपाल रिवॉल्वर थामे पास आ पहुंचा था।
"कितने अच्छे लग रहे हो, तीनों लाइन में एक ही सोफे पर बैठे हुए। " जगमोहन ने व्यंग से कहा।
मोना चौधरी की कठोर निगाह बराबर देवराज चौहान पर थी।
"तुम दोनों " देवराज चौहान ने जगमोहन और कर्मपाल सिंह से कहा- "इन तीनों को निशाने पर रखो। अगर शक भी हो कि कोई कुछ करने वाला है तो फौरन शूट कर दो।"
जगमोहन और कर्मपाल सिंह ने पोजिशन ले ली।
"लेकिन...।" जगमोहन के चेहरे पर उलझन थी "इनका करना क्या है?"
"इनका जो करना है, शंकर भाई करेगा। वो मोना चौधरी को मांग रहा था। ले जाये आकर" देवराज चौहान ने एक-एक शब्द चबाकर कहा और फोन की तरफ बढ़ गया।
जगमोहन के होंठ सिकुड़े। उसने तीनों को देखा।
"शंकर भाई को तुम तीनों की बहुत जरूरत है। " जगमोहन ने जहरीले स्वर में कहा "वो उन लोगों से मिलने का बहुत ख्वाहिशमंद हो रहा था, जिन्होंने उसके बारह गनमैनों को शूट किया और तिजोरी ले गए।"
"मेरा नाम भी उनमें है। "महाजन ने मुंह बनाया।
"पहला नाम तो तेरा ही है।"
"तुमने उसे भड़काया होगा।"
"मेरी भैंस ले भागा था, जो मैं शंकर भाई को तेरे खिलाफ भड़काऊंगा।" ।
महाजन ने पैंट में फंसा रखी बोतल निकाली। घूंट भरा।
"शंकर भाई।" आवाज पहचानते ही देवराज चौहान बोला— "तुम्हारे मेहमान मेरे पास हैं। "
"कौन देवराज चौहान।" शंकर भाई का अजीब सा स्वर आया—"कैसे मेहमान?"
"मोना चौधरी और उसके सांथी। जिन्होंने बंगले में आकर तिजोरी उठाई थी। "
"समझा। समझा। भेजूं क्या अपने आदमी ?"
"हां"अभी भेजे। वो आकर ले जाएंगे उन्हें तब तक संभाले रखना।"
देवराज चौहान ने रिसीवर रखा और चंद कदम तय करके वापस आ गया।
"देवराज चौहान।" मोना चौधरी फुफकार उठी-"तुम क्या समझते हो कि शंकर भाई...।"
"मैं कुछ नहीं समझता। " देवराज चौहान उसकी बात काटकर बोला "अगर तुमने समझ से काम लिया होता तो हमें मौत देने की सोचकर यहां न आती। सीधे-सीधे बात करती तिजोरी में खाली फाइल थी। जिसे तुमने मांगा। उस पर तुम्हारा हक बनता था। हीरा मेरा था। वो मैंने ले लिया। मैंने तुमसे फोन पर ही वायदा किया था कि तिजोरी जैसे मुझे मिली है। जैसे शंकर भाई के यहां से आई है, वैसे ही तुम्हें मिलेगी। लेकिन तुमने मेरे कहे शब्दों पर तबज्जों नहीं दी। तभी यह वक्त आया। "
"मैं तुम्हें जिंदा नहीं छोडूंगी देवराज चौहान। मैं... ।'
"पहले शंकर भाई के गले तो मिल लो। " जगमोहन ने कड़वे स्वर में कहा— "उसके आदमी तुम्हें लेने आ रहे हैं।"
"उनसे भी मिल लूंगी।" मोना चौधरी ने खूंखार स्वर में कहा- "और फिर तुमसे भी मिलूंगी।"
"वो तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेगा। इसलिए दोबारा हमारी मुलाकात होना संभव नहीं। "
जवाब में मोना चौधरी के होंठों पर जहरीली मुस्कान नाच उठी।
***
शंकर भाई के आठ आदमी आए और मोना चौधरी, पारसनाथ और महाजन को गनों के सख्त घेरे में वहां से ले गए। तब जगमोहन ने कर्मपाल सिंह को देखा।
"बोल भाई, तू इतनी रात गए कैसे आया था?" जगमोहन ने पूछा।
“ये बताने कि मोना चौधरी बंगाली के किस ठिकाने पर मौजूद है। " कर्मपाल सिंह ने कहा।
"अब कोई जरूरत नहीं। "जगमोहन मुस्कराया— "मोना चौधरी अब ऐसे ठिकाने पर पहुंच गई है कि उसके बाद अब उसे किसी ठिकाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
कर्मपाल सिंह ने मुस्कराकर सहमति में सिर हिलाया। देवराज चौहान सिगरेट सुलगाए गंभीरता से कश ले रहा था। रात के ढाई बज रहे थे।
"तू अच्छे मौके पर आया।" जगमोहन ने पुनः कहा "तेरे आने की वजह से उनका ध्यान भटका और हमने फायदा उठा लिया। तेरे को फाइल इसलिए नहीं मिल पाई की शंकर भाई ने पहले ही तिजोरी से फाइल हटा दी थी। खैर, जो भी रहा। बढ़िया रहा। मेरे को नींद आ रही है। तेरे को नहीं आ रही क्या?"
"आ रही है। "- कर्मपाल सिंह मुस्कराया। "तो जा। नींद ले। काम खत्म हुआ। कर्मपाल सिंह वहां से चला गया। चौहान को देखा।
जगमोहन ने देवराज "मोना चौधरी नाम की मुसीबत तो अब हमेशा के लिए टल गई। " जगमोहन ने कहा "शंकर भाई के हाथों बढ़िया मौत मरेगी वो। सुबह उसकी लाश कहीं पड़ी होगी या फिर हो सकता है, लाश ही न मिले। "
देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा। जवाब में सिर हिलाकर रह गया।
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