बर्लिन ओलंपिक्स

एडोल्फ हिटलर को खेल-कूद में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए वर्ष 1936 में ओलंपिक खेलों का आयोजन करने के प्रति उसका रवैया ढीला-ढाला एवं निरुत्साहपूर्ण था। प्रचार मंत्री जोसेफ गॉबेल्स को हिटलर को यह समझाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी कि ओलंपिक समारोहों के माध्यम से जर्मनी के अंदर और बाहर दोनों जगह नाज़ी उद्देश्य को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी ने हिटलर के सत्ता में आने से पहले ही मई 1931 में जर्मनी को खेलों के आयोजन का उत्तरदायित्व सौंप दिया था। यह दूसरी बार था, जब आधुनिक ओलंपिक्स का आयोजन जर्मनी में किया जाना था। वर्ष 1916 के ओलंपिक्स बर्लिन में होने थे, लेकिन प्रथम विश्‍व युद्ध के कारण उन्हें रद्द कर दिया गया था।

गॉबेल्स के निर्देशानुसार नाज़ियों का इरादा यह था कि बर्लिन में होने जा रहे 1936 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक्स आयोजन को ‘अभिनव जर्मनी’ के रूप में प्रस्तुत किया जाए। नाज़ियों को यह भी आशा थी कि खेलों का मजा लेने के लिए जो हजारों-लाखों दर्शक बाहर से आएँगे, वे स्मृति-चिह्न, भेंट-वस्तुएँ खरीदेंगे और देश को विदेशी मुद्रा का लाभ होगा।

नाज़ी प्रशासन ने एक शानदार 325 एकड़ ओलंपिक खेल परिसर का निर्माण करने में 4.2 करोड़ मार्क खर्च किए। इस बहुभागी क्रीड़ांगन का निर्माण बर्लिन से 5 मील दूर पश्‍चिम में किया गया था। यह वही जगह थी, जिसे 1916 में होनेवाले खेलों के लिए चुना गया था। नए खेल परिसर का केंद्रीय आकर्षण था—प्राकृतिक पत्थर से बनाया गया एक विशाल ओलंपिक स्टेडियम, जिसमें 1,10,000 दर्शक बैठ सकते थे। संसार के सबसे बड़े इस स्टेडियम के अंदर हिटलर और शीर्षस्थ नाज़ी नेताओं के बैठने के लिए एक विशेष स्थान बनाया गया था।

हालाँकि इस शानदार ओलंपिक निर्माण परियोजना का कार्य वर्ष 1934-35 में बराबर चल रहा था, लेकिन जर्मनी की ओलंपिक टीम से यहूदी एथलीटों को निकाले जाने पर बड़ा विवाद उत्पन्न हो गया।

ओलंपिक टीम से निकाले गए कुछ यहूदी वास्तव में विश्‍व-स्तर के एथलीट थे, जैसे कि टेनिस खिलाड़ी डेनियल प्रेन और मुक्केबाज (बॉक्सर) ऐरिक सीलिंग। वे अन्य यहूदी एथलीटों को साथ लेकर जर्मनी से चले गए, ताकि अन्यत्र खेल-कूद के क्षेत्र में आगे बढ़ सकें। प्रेन इंग्लैंड में टेनिस खेलने लगा और सीलिंग अमेरिका चला गया। नाज़ियों ने मध्यभार मुक्केबाजी चैंपियन जोहन ट्रॉलमैन सहित जिप्सियों को भी अयोग्य घोषित कर दिया।

जर्मनी की ओलंपिक टीम में गैर-आर्यों को शामिल करने पर रोक लगाने की काररवाई की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना की गई, क्योंकि उन्होंने इस काररवाई को समानता एवं निष्पक्षता संबंधी ओलंपिक संहिता का उल्लंघन माना। ओलंपिक्स को खेल-कूद प्रतियोगिता के क्षेत्र में सभी राष्ट्रों के बीच जातीय समानता के आधार पर सद्भावना का संदेश फैलाने का माध्यम समझा जाता है और यही उसका उद्देश्य है। किंतु नाज़ियों को जातीय समानता में कोई दिलचस्पी नहीं थी और इसके बजाय वे ओलंपिक्स का उपयोग आर्य एथलीटों के प्रदर्शन हेतु करना चाहते थे, जिन्हें वे उनकी नस्ल के आधार पर निस्संदेह श्रेष्ठ मानते थे।

आगामी ओलंपिक्स के प्रति नाज़ी रवैए की वजह से बर्लिन खेलों का बहिष्कार करने और खेलोें का आयोजन किसी दूसरे देश में करने की माँग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठी। बहिष्कार का सबसे बड़ा विवाद अमेरिका में उठा, क्योंकि पिछले ओलंपिक्स में उस देश ने अधिकतर एथलीट भेजे थे और अधिकांश पदक जीते थे।

बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव को ध्यान में रखते हुए नाज़ियों ने आंशिक यहूदी एथलीट हेलेन मेयर को अपनी ओलंपिक टीम में वापस आने की अनुमति देकर सांकेतिक सद्भाव-प्रदर्शन किया। उस महिला एथलीट ने 1928 में हुए ओलंपिक्स में स्वर्ण-पदक जीता था और उसे विश्‍व की महानतम पट्टेबाज (तलवार चलाने वाली) माना गया था। नाज़ियों ने यहूदी थियोडोर लेवाल्ड को भी जर्मनी की ओलंपिक आयोजन समिति के सलाहकार के रूप में कार्य करने की इजाजत दे दी।

जब अमेरिका में अव्यवसायी खेल-कूद संघ ने 8 दिसंबर, 1935 को अंतिम मत लिया, बहिष्कार प्रस्ताव अत्यल्प अंतर से पराजित हो गया। अंतत: अमेरिकियों ने ओलंपिक्स में भाग लेने का फैसला कर लिया।

अमेरिका की ओलंपिक टीम अब तक की सबसे बड़ी टीम थी। उसमें 19 अफ्रीकी अमेरिकियों तथा 5 यहूदियों को मिलाकर कुल 312 एथलीट थे। नाज़ियों ने इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी को बार-बार आश्‍वासन दिए थे कि काले एथलीटों को जर्मनी में उचित व्यवहार मिलेगा। नाज़ियों ने अनिच्छा से विदेशी यहूदियों को खेलों में भाग लेने की मंजूरी दे दी।

फिर भी कुछ अमेरिकी यहूदी एथलीटों ने, जिनमें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का पथ-धावक मिल्टन ग्रीन भी था, नाज़ी सामीवाद-विरोध के खिलाफ ओलंपिक्स से बाहर रहने का निर्णय किया। इसका मतलब था, जीवन भर के लिए कोई भी राजनीतिक वक्तव्य देने का अवसर खो देना। ऑस्ट्रिया, फ्रांस और कनाडा सहित अन्य देशों से आए यहूदी एथलीटों ने भी विरोध-स्वरूप खेलों से बाहर रहने का फैसला किया।

कुल मिलाकर 51 देशों ने बर्लिन खेलों में भाग लेने का निश्‍चय किया। आधुनिक ओलंपिक युग में यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या थी। जर्मनी की ओलंपिक टीम सबसे बड़ी थी, उसमें 348 प्रतियोगी थे। तब तक सोवियत संघ ने किसी भी ओलंपिक्स में भाग नहीं लिया था और वह बर्लिन खेलों में भी नहीं था।

वर्ष 1936 के मध्य-जुलाई में टीमों ने जर्मनी आना शुरू कर दिया और उनके नाज़ी मेजबानों ने उनके सम्मान में आव-भगत की शानदार व्यवस्था द्वारा उनका हार्दिक स्वागत किया। नाज़ी प्रशासन ने बर्लिन वासियों को कह दिया था कि वे अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों का भरपूर स्वागत-सत्कार करके अच्छा प्रभाव जमाएँ।

पर्यटकों ने बर्लिन को चीख-पुकार मुक्त पाया, क्योंकि सभी अवांछित व्यक्तियों को पुलिस ने सड़कों से हटाकर नगर के बाहर विशेष नजरबंदी शिविर में डाल दिया था। हर जगह इमारतों को सजाया गया था, ओलंपिक झंडों के साथ-साथ नाज़ी स्वस्तिक ध्वज भी लहरा रहे थे और खेल-कूद स्पर्धाओें के लिए विभिन्न सुविधाएँ मुहैया कराई गई थीं।

जर्मनी में होटलों, रेस्तराँओं और सार्वजनिक स्थानों से आमतौर पर सर्वत्र विद्यमान वे संकेत-पट्ट हटा दिए गए, जिनमें लिखा होता था, ‘यहूदी अंदर आने का कष्ट न करें।’ ओलंपिक खेलों का समापन होने तक के लिए ऐसा किया गया था। नाज़ी तूफानी सैनिकों को भी यहूदियों के खिलाफ कोई काररवाई न करने की हिदायत दी गई थी। दिलचस्प बात यह है कि जो मेहमान अर्थात् आगंतुक नाज़ी जर्मनी में यहूदियों के दैनिक अनुभवों के बारे में बर्लिन में यहूदियों से बात करना चाहते थे या यहूदियों के जीवन की जाँच-पड़ताल करना चाहते थे, उन्हें कहा गया कि वे पहले जेस्टेपो से संपर्क करें। उसके बाद उन पर कड़ी निगरानी रखी जाती थी, जब तक कि वे चले न जाएँ। 

9वें ओलंपिक खेलों का उद्घाटन समारोह शनिवार, 1 अगस्त, 1936 को ओलंपिक स्टेडियम के अंदर आयोजित किया गया था, जो खचाखच भरा हुआ था। दुर्भाग्य से जर्मनी के लोगों को वह भड़कीला आडंबरपूर्ण ‘फ्यूहरर माहौल’ देखने को नहीं मिला, जो बड़े नाज़ी कार्यक्रमों के साथ सामान्यत: सदैव नजर आता था। उस चकाचौंध के बजाय दिन भर बादल छाए रहे और बीच-बीच में बरसात होती रही। ओलंपिक पदाधिकारियों के साथ हिटलर और उसके काफिले ने स्टेडियम में प्रवेश किया, जब 3,000 जर्मन एक साथ वृंदगान कर रहे थे और उसके बाद उन्होंने नाज़ी राष्ट्रगान प्रस्तुत किया।

तत्पश्‍चात् 51 राष्ट्रों से आए 5,000 एथलीटों ने अकरादि क्रम के अनुसार मार्च किया। पूरी परेड में सबसे आगे ग्रीस था और जर्मनी आखिर में। लेकिन उद्घाटन समारोह भी विवाद-रहित नहीं रह पाया। सवाल यह था कि क्या एथलीट हिटलर को नाज़ी सलामी देंगे, जब वे उसके निरीक्षण मंच के आगे से गुजरेंगे। इस विषय पर कुछ विवाद था, क्योंकि सीधे बाजू को कंधे से आगे बढ़ाकर किए जानेवाले ओलंपिक सैल्यूट को औपचारिक हिटलरी सैल्यूट समझने की भूल की जा सकती थी। ऑस्ट्रियाई एथलीटों ने हिटलर को सलामी दी। फ्रांस के एथलीटों ने हिटलर को सलामी देकर दर्शकों को खुश कर दिया, यद्यपि कुछ फ्रांसीसी एथलीटों ने बाद में दावा किया कि उन्होंने ओलंपिक सलामी दी थी। बुल्गेरियाई एथलीटों ने हिटलर के आगे जर्मन सेना के रंगरूटों की कवायद करके सबको पीछे छोड़ दिया। ब्रिटेन और अमेरिका के एथलीटों ने ‘आँखें दाहिने’ वाली एक फौजी शैली चुनी, जिसमें भुजा सलामी नहीं दी जाती है। प्रत्येक राष्ट्र के ध्वजवाहक को फ्यूहरर तथा ओलंपिक पदाधिकारियों के सामने से गुजरते हुए अपने देश का झंडा नीचे झुकाना था। अमेरिकी ध्वजवाहक ने इस औपचारिकता की उपेक्षा करके दर्शकों में अनेक जर्मन नागरिकों का दिल दुखाया, हालाँकि उसने संयुक्त राष्ट्र महासचिव के अलावा किसी अन्य के आगे झंडा न झुकाने की अमेरिकी प्रथा का ही पालन किया।

शानदार वायुपोत हिंडेनबर्ग ओलंपिक ध्वज लगाए। स्टेडियम के ऊपर बहुत नीचे उड़ान भर रहा था। ओलंपिक ध्वज में पाँच छल्ले बने हुए थे, जो खेलों में शामिल पाँच महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। सांकेतिक सद्भावना प्रदर्शन के रूप में नाज़ियों ने ओलंपिक्स आयोजक थियोडोर लेवाल्ड को उद्घाटन भाषण देने दिया। उसके बाद हिटलर ने साधारण-सा संदेश दिया—‘‘मैं आधुनिक युग के ग्यारहवें ओलंपिक खेल आयोजन पर खुशी का इजहार करते हुए बर्लिन खेलों का शुभारंभ करने की घोषणा करता हूँ।’’ ओलंपिक्स के दौरान हिटलर ने बस यही सार्वजनिक उद्बोधन किया था।

हिटलर द्वारा खेलों के उद्घाटन की घोषणा के पश्‍चात् ओलंपिक भजनगान हुआ, जिसकी रचना रिचर्ड स्ट्रॉस ने की थी। उद्घाटन समारोह का चरम क्षण वह था, जब ओलंपिक मशाल का आगमन हुआ। कुछ अलग-अलग 3,000 रिले धावक इसे ओलिंपिया, ग्रीस से लेकर यहाँ पहुँचे थे और उन्हें यहाँ पहुँचने में बारह दिन से अधिक का समय लगा था। ओलंपिक के इतिहास में ऐसा पहली बार किया गया था।

खेल-कूद प्रतियोगिताओं का शुभारंभ अगले दिन शनिवार, 2 अगस्त को ‘ट्रैक ऐंड फील्ड’ स्पर्धाओं के साथ हुआ। सप्ताह भर चली प्रतियोगिता के दौरान ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका के ट्रैक स्टार जेस्सी ओवेंस ने 100 और 200 मीटर की दौड़ें जीत लीं। उसने दोनों दौड़ों में नए विश्‍व रिकॉर्ड कायम किए। ओवेंस ने कुल मिलाकर चार स्वर्ण-पदक हासिल किए। उसने न केवल लंबी कूद में विश्‍व रिकॉर्ड बनाया बल्कि 400 मीटर रिले में भी स्वर्ण पदक दिलाया।

जर्मन प्रसारणकर्ता और पत्रकार अफ्रीकी अमेरिकन ओवेंस का उल्लेख हमेशा ‘द नीग्रो ओवेंस’ के रूप में करते थे। दूसरे अठारह अफ्रीकी अमेरिकन एथलीटों को ‘अमेरिका के कलूटे सहायक खिलाड़ी’ कहा जाता था, जैसे कि वे टीम के पूर्ण सदस्य नहीं थे।

ओवेंस बर्लिन में तत्काल बहुत बड़ा खिलाड़ी बन गया। जर्मनी में वह इतना लोकप्रिय हो गया कि जैसे ही वह स्टेडियम में प्रवेश करता, उसके प्रशंसक उसका नाम पुकारने लगते और सड़कों पर लोग उसे घेर लेते तथा उसके ‘हस्ताक्षर’ लेने की होड़ में जुट जाते। फिर भी, हिटलर ने उससे कभी भेंट नहीं की। ट्रैक ऐंड फील्ड प्रतियोगिता के पहले दिन हिटलर स्टेडियम से चला गया था, क्योंकि बरसात होने की पूरी संभावना थी और काले बादलों के कारण अँधेरा छा गया था, जिसके कारण वह ऊँची कूद में पदक जीतनेवाले तीन अमेरिकी एथलीटों से मिल नहीं पाया, जिनमें से दो अफ्रीकी थे। ओलंपिक अधिकारियों को यह अच्छा नहीं लगा और उन्होंने हिटलर को सलाह दी कि उसे या तो सभी पदक विजेताओं ंसे मिलना चाहिए या किसी से भी नहीं। हिटलर ने उसी समय फैसला कर लिया कि वह किसी भी खिलाड़ी का स्वागत नहीं करेगा, ओवेंस का भी नहीं। 

ओलंपिक्स के बारे में रिपोर्ट देनेवाले पत्रकारों ने इस बात को नोट किया और अंदाजा लगाया कि हिटलर के ऐसे व्यवहार का कारण ओवेेंस तथा उसके साथ अफ्रीकी अमेरिकन एथलीट हो सकते हैं, जिन्होंने ‘ट्रैक ऐंड फील्ड’ प्रतियोगिताओं में अनेक पदक जीते थे, कुल मिलाकर 14। कुछ पत्रकारों का तो यहाँ तक कहना था कि उनकी जीत ने नाज़ियों के इस काल्पनिक सत्य को झुठलाकर रख दिया कि आर्य नस्ल श्रेष्ठ है।

ओवेंस ने बाद में कहा कि उसे ऐसा नहीं लगा कि हिटलर ने उसका अपमान किया है। ओवेंस के अनुसार, एक बार उसने दौड़ प्रतियोगिता के दौरान हिटलर की ओर देखा था, जो अपने कक्ष में बैठा हुआ था और उसने अर्थात् फ्यूहरर ने अपनी कुरसी से खड़े होकर उसकी ओर हाथ हिलाया था और उसने भी जवाब में हिटलर की ओर हाथ का इशारा किया था।

अमेरिकी अखबारों में एक और बड़ा बवाल तब मचा जब यह बात सामने आई कि अमेरिका के धावक दल में केवल दो यहूदी थे, जिन्हें 400 मीटर रिले दौड़ से आखिरी क्षणों में निकाल दिया गया।

चौदह दिनों तक चली खेल प्रतियोगिता के दौरान हिटलर ने ओलंपिक्स में जान-बूझकर गंभीरता ओढ़े रखी और अपनी मौजूदगी को माहौल पर हावी नहीं होने दिया। ऐसा ओलंपिक पदाधिकारियों को खुश करने के लिए किया गया था, जो नहीं चाहते कि वह आमोद-प्रमोद के कार्यक्रमों में दंभ का प्रदर्शन करे और माहौल में नीरसता छा जाए। हिटलर के लिए उन हजारों अंतरराष्ट्रीय प्रेक्षकों की दृष्टि में शांत एवं गौरवपूर्ण बने रहने का यह अच्छा अवसर था, जो उसके हर कदम पर नजर रखे हुए थे। उसके शीर्षस्थ सहयोगियों को यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि हिटलर ने विभिन्न खेल-कूद प्रतियोगिताओं में वास्तविक दिलचस्पी दिखाई और जर्मनी की प्रत्येक जीत में उसे अत्यधिक खुशी हुई। 

11वें ओलंपिक खेलों का समापन रविवार, 16 अगस्त को हुआ। 89 पदक जीतकर जर्मनी सबसे ऊपर रहा और 56 पदक हासिल करके अमेरिका ने दूसरा स्थान प्राप्त किया। ‘संकाय शक्ति की जीत’ (ट्राइंफ ऑफ द विल) की प्रसिद्ध निर्देशक लेनी राइफेंस्टॉल ने खेलों की फिल्म बनाई। फिल्म बनाने के लिए धन की व्यवस्था नाज़ियों ने की थी और वह तीस कैमरा ऑपरेटरों को ओलंपिक्स में लेकर आई थी तथा 10 लाख फीट से अधिक फिल्म शूट की थी। शूट की गई फिल्म का संपादन करने और फिर चार घंटे की फिल्म ‘ओलंपिया’ में समेटने में उसे 18 महीने लगे। बाद में यह फिल्म अप्रेल 1938 में दो भागों में रिलीज हुई।

उल्लेखनीय बात यह है कि ओलंपिक्स में बर्लिन में आयोजित खेलों में पहली बार टेलीविजन का इस्तेमाल किया गया, हालाँकि पिक्चर का रिसेप्शन बहुत अच्छा नहीं था। ओलंपिक ग्राम में, जहाँ सभी पुरुष एथलीटों को ठहराया गया था, मनोरंजन के लिए हिंडेनबर्ग हॉल नामक एक भवन था, जिसमें एक टी.वी. रूम था और वहाँ बैठकर प्रतियोगियों का सीधा प्रसारण देखा जा सकता था। बर्लिन के आस-पास सत्रह और स्थानों पर भी टी.वी. कक्ष थे।

ओलंपिक ग्राम की भी हर किसी ने भरपूर प्रशंसा की, जो भी वहाँ ठहरा था। कैप्टन वॉल्फ्गैंग फ्यूर्स्टनर के निर्देशन में जर्मन सेना ने 130 एकड़ में खेल ग्राम का निर्माण किया। इसे जर्मनी के नक्शे का रूप दिया गया था और इसके अंदर 140 भवन थे, जिनमें एक डाकघर और एक बैंक भी था। एथलीटों के प्रत्येक घर में 13 शयनकक्ष थे और एक-एक कमरे में दो-दो एथलीटों को ठहराया गया था। प्रत्येक घर में हमेशा दो परिचारक तैनात रहते थे, जो एथलीटों की मूल भाषा बोलते थे। जहाँ तक प्रशिक्षण सुविधाओं का संबंध है, खेल-ग्राम में 400 मीटर का अंडाकार ट्रैक था और एक पूरे आकार का तरणताल था।

कुल मिलाकर बर्लिन ओलंपिक्स का आयोजन नाज़ियों के लिए बहुत सफल रहा। सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों ने स्वीकार किया कि जर्मनी ने हाथ खोलकर खर्च किया था और ओलंपिक्स का यह अब तक का सबसे बड़ा आयोजन था। हजारों की संख्या में जो पर्यटक जर्मनी आए थे, वे नाज़ियों एवं जर्मन लोगों से मिले। शिष्टाचार और शानदार सुविधाओं तथा समग्र आयोजन के कुशल संचालन की मधुर स्मृतियों को दिल में सँजोकर जर्मनी से गए। नाज़ी सरकार को ओलंपिक्स का आयोजन करके जो पाने की इच्छा थी, उसे पाने में वे कामयाब रहे—प्रतिष्ठा।

समापन समारोहों के दौरान इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी के अध्यक्ष ने अगले खेलों के लिए पारंपरिक घोषणा जारी की थी, इस अनुरोध के साथ कि ‘प्रत्येक देश के युवक चार साल में हमारे साथ बारहवें ओलंपिक खेलों का आनंद उठाने के लिए तोक्यो में जमा होंगे।’

लेकिन हालात ऐसे बने कि बारह वर्षों तक कोई ओलंपिक खेल नहीं हो सके। सन् 1940 में तोक्यो में होनेवाले खेलों और उसके बाद 1944 के खेल आयोजनों को रद्द कर दिया गया। खेल-कूद के मैदान में एक-दूसरे से मुकाबला कराने के बजाय अनेक देशों के जवान एक नए विश्‍व युद्ध में एक-दूसरे को जान से मारने के खेल में कूद पड़े। एडोल्फ हिटलर पहले से ही उस युद्ध की योजना बनाने में लगा हुआ था।

हिटलर ने उजागर की युद्ध-योजना

अपनी जीविका आरंभ करने के दिन से लेकर अपनी मृत्यु के दिन तक एडोल्फ हिटलर के दो ही बड़े लक्ष्य थे। उसका पहला और प्रमुख लक्ष्य था जर्मन लोगों के लिए जीविकोपार्जन के अवसर जबरन हासिल करना; दूसरे, वह यहूदियों के साथ किसी तरह अपना अंतिम हिसाब-किताब साफ करना चाहता था।

जीवन-यापन की ओर वर्ष 1935 में पहले कदम बढ़े, जब हिटलर ने वर्सेलिस संधि की शर्तों के विरुद्ध जाकर सेना में अनिवार्य भरती पुन: शुरू कर दी और जर्मन सेना का तेजी से पुनर्निर्माण करना आरंभ कर दिया। तत्पश्‍चात् हिटलर ने ब्रिटेन के साथ सफलतापूर्वक एक समझौता किया, जिसके तहत वह जर्मनी के लिए ब्रिटेन के जहाजी बेड़े के 35 प्रतिशत के बराबर नौसेना का निर्माण कर सकता था और उतना ही बड़ा पनडुब्बी बेड़ा रख सकता था।

हिटलर ने यह भाँप लिया कि जर्मनी को अपना पुन: शस्त्रीकरण करते देखकर विश्‍व के नेताओं की बेचैनी बढ़ रही थी; क्योंकि वे जानते थे कि बीस साल पहले जर्मनी ने भीषण विश्‍व युद्ध में क्या रोल अदा किया था। उसने राजनयिकों और उसकी बात सुननेवाले हर देश, हर व्यक्ति को बार-बार आश्‍वस्त किया कि जर्मनी की सेना का निर्माण एवं संवर्धन सिर्फ एक रक्षात्मक उपाय है, ताकि उसका देश भी आस-पास के देशों की बराबरी कर सके। आखिरकार उसने ऐलान किया, ‘‘क्या जर्मनी को यह अधिकार नहीं है कि दूसरे देशों की तरह वह भी अपनी रक्षा कर सके?’’

हिटलर ने अपने ही सवाल का सकारात्मक जवाब भी दे दिया और उसी साँस में यह वचन भी दे दिया कि जर्मनी कभी शांति भंग नहीं करेगा। अपनी बात पर जोर देते हुए उसने युद्ध की उन विभीषिकाओं के बारे में कुछ उल्लेखनीय बातें भी कहीं, जिन्हें उसने पहली पंक्ति के योद्धा के रूप में अपनी आँखों से देखा था। 21 मई, 1935 को एक भाषण देते समय उसने कहा, ‘‘पिछले तीन सौ वर्षों में यूरोपीय महाद्वीप में जितना खून-खराबा हुआ है, वह पूर्ण घटनाक्रम के राष्ट्रीय परिणाम के किसी अनुपात में नहीं आता है। अंत में फ्रांस तो फ्रांस ही रहा, जर्मनी जर्मनी रहा, पोलैंड वही पोलैंड और इटली वही इटली। जहाँ तक राष्ट्रीय भावना का संबंध है, राजवंशीय अहंकार, राजनीतिक उन्माद तथा देशभक्तिपूर्ण अंधता की आड़ में खून की नदियाँ बहाकर व्यापक राजनीतिक परिवर्तन लाने की चाहत से आखिरकार हासिल क्या हुआ है? उनकी खाल छू लेने भर से उनके मौलिक चरित्रगत स्वभाव या स्वरूप में तो कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ। यदि इन राज्यों ने उस खून-खराबे की तुलना में थोड़ा सा भी बलिदान विवेकपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया होता तो सफलता निश्‍चय ही अधिक बड़ी और अधिक टिकाऊ होती।’’

फ्रांस एवं इंग्लैंड और हिटलर के पड़ोसी देशों के नेतागण ऐसी भावनाओं की अभिव्यक्ति से वास्तव में प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। वर्षों बाद उन्हें पता चल पाया कि जिस दिन हिटलर ने वे उद्गार प्रकट किए थे, उसी दिन उसने एक गुप्त राइक डिफेंस लॉ (जर्मन राज्य रक्षा कानून) को भी मंजूरी दी थी। इस कानून ने जर्मनी को युद्धकालिक अर्थव्यवस्था में रख दिया और सेना के जनरल स्टाफ संगठन को पुनर्जीवित कर दिया, जिसका प्रथम विश्‍व युद्ध के बाद प्रतिबंध लगा दिया गया था।

अधिकतर राजनयिकों ने भूल से हिटलर के शब्दों को सच मान लिया और सोचा कि वह ऐसा इनसान है, जिसके साथ तर्कसंगत बातचीत की जा सकती है और संभवत: उस पर भरोसा भी किया जा सकता है। सच में, हिटलर यही चाहता था कि वे उसके बारे में ऐसा ही सोचें। उसने उन्हें एक अजीब असमंजस की स्थिति में डाल दिया था, क्योंकि वे वास्तव में कभी यह नहीं जान सकते थे कि उसके दिमाग में क्या चल रहा है। उन्हें पता नहीं था कि उनका पाला एक ऐसे व्यक्ति से पड़ा है, जो अपने दूरगामी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आमतौर पर झूठ का सहारा लेता है।

हिटलर किसी की भी आँखों में आँखें डाल सकता था और अत्यधिक ईमानदारी से झूठ बोल सकता था। उसने रेडियो प्रसारणों के माध्यम से भी दुनिया को धोखे में डाले रखा, क्योंकि वह बराबर यह घोषणा करता रहा कि वह शांति चाहता है, वह शांति का पुजारी है। इन सब मीठी बातों की आड़ लेकर वह बराबर एक और भीषण युद्ध की तैयारी में लगा रहा।

जर्मनी के लोगों और जर्मन साम्राज्य के अनेक शीर्षस्थ नेताओं को भी अपने फ्यूहरर के पागलपन की गहराई का कोई अनुमान नहीं था; लेकिन देर-सबेर उन सबको पता चल ही गया। जर्मन सेना के उच्चस्थ अधिकारियों को उसके सनकीपन की जानकारी 5 नवंबर, 1937 को प्राप्त हुई, जब हिटलर ने एक गुप्त बैठक बुलाई और सीधे-सपाट शब्दों में अपनी इस योजना का खुलासा किया कि वह दूसरे राष्ट्रों की कीमत पर अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता है।

यह बैठक शाम 4:15 बजे बर्लिन में राइक चांसलरी के अंदर आयोजित की गई थी। व्यंग्यात्मक रूप से देखें तो उसी दिन कुछ समय पहले हिटलर ने पोलैंड के राजदूत से भेंट की थी और एक संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें यह आश्‍वासन था कि जर्मनी पोलैंड के सीमा संबंधी अधिकारों का सम्मान करेगा।

हिटलर ने चार घंटे तक चली उस बैठक का आरंभ करने से पहले वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति को गोपनीयता की शपथ उठाने के लिए कहा। फिर उसने उन्हें सूचित किया कि अगर उसकी असमय मृत्यु हो जाए तो उस स्थिति में निम्‍नलिखित विवरण को उसकी अंतिम इच्छा और वसीयतनामा समझा जाना चाहिए।

फिर उसने ‘लिविंग स्पेस*’ के अपने सिद्धांत की व्याख्या करते हुए अपनी अंतिम इच्छा का ब्योरा देना शुरू किया। उसने कहा कि जर्मनी का ‘जातिमूलक अर्थात् वंशगत आंतरिक साँचा बहुत कसा हुआ है’ और जर्मनी के लोगों को ‘अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक जगह मिलनी चाहिए, जीवन-निर्वाह के लिए।’

उसने दो मुख्य बाधाओं की ओर ध्यान दिलाया, ‘‘घृणा से प्रेरित दो विरोधी ब्रिटेन और फ्रांस, जो यूरोप के केंद्र में एक विराट् जर्मन को देह में लगे काँटे की तरह देखते हैं।’’

‘‘जर्मनी की समस्या बल-प्रयोग से ही हल की जा सकती है।’’ हिटलर ने कहा, ‘‘लेकिन जिन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं वे हैं—‘कब’ और‘कैसे’...’’

हिटलर चाहता था कि निर्वाह योग्य भूमि के जबरन अधिग्रहण के सवाल को अधिक-से-अधिक वर्ष 1943 से 1945 तक सैन्य शक्ति के पुराने पड़ने और नाज़ी नेतृत्व के बुढ़ाने से पहले सुलझा लिया जाए और ‘‘एक बात यह भी थी कि उस अरसे में बाकी दुनिया अपनी रक्षा की तैयारियों में लगी हुई थी, जिसके कारण हमारे लिए भी आक्रामक तेवर अपनाना जरूरी हो गया।’’

हालाँकि हिटलर का अंतिम लक्ष्य पूर्व में, अर्थात् रूस में भूभाग पर जबरन कब्जा करने का था, फिर भी उसने सब लोगों का ध्यान अपने पहले उद्देश्यों की ओर केंद्रित किया, यानी जर्मनी के पूर्वी और दक्षिणी किनारों की रक्षा करने की दृष्टि से ऑस्ट्रिया एवं चेकोस्लोवाकिया पर कब्जा करना। हिटलर ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए तीन रणनीतियाँ बनाईं। प्रत्येक रणनीति इस ढंग से बनाई गई थी कि फ्रांस और ब्रिटेन की सैनिक एवं राजनीतिक कमजोरियों का फायदा उठाया जा सके।

पहली रणनीति के अनुसार, हिटलर को वर्ष 1943 तक प्रतीक्षा करनी थी, जब तक कि पुन: शस्त्रीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती और उसकी अपनी ताकत फ्रांस तथा ब्रिटेन की सैन्य शक्ति से बढ़कर नहीं हो जाती। दूसरी योजना यह थी कि वह फ्रांस की आंतरिक राजनीतिक समस्याओं पर नजर रखते हुए चेकोस्लोवाकिया पर जल्दी आक्रमण करने के मौके की ताक में रहेगा और ऐसा मौका तभी मिल सकता था, जब फ्रांस गृह-युद्ध जैसे किसी बड़े संकट की चपेट में आकर कमजोर हो जाता। तीसरी रणनीति की रूपरेखा यह थी कि अगर फ्रांस किसी दूसरे देश जैसे कि जर्मनी के नए मित्र, फासिस्ट इटली के साथ सैनिक युद्ध में मार खा जाता है तो वह यथाशीघ्र वर्ष 1938 में ही ऑस्ट्रिया और चेकोस्लोवाकिया दोनों पर आक्रमण कर देगा।

यूरोप में बड़े पैमाने पर युद्ध छेड़ने में कितना बड़ा जोखिम है, इस बात को हिटलर ने गंभीरता से नहीं लिया और उसके इस लापरवाह रवैए को देखकर बैठक में मौजूद सभी लोगों को बड़ा अचंभा हुआ।

वे लोग हिटलर की युद्ध संबंधी योजनाओं के बारे में किसी नैतिक आधार पर आपत्ति नहीं कर रहे थे, बल्कि वे उसके व्यावहारिक पहलुओं पर विचार करके आपत्ति का हजहार कर रहे थे। उनकी राय में, जर्मनी युद्ध के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं था और वर्ष 1943 तक भी जर्मनी के पर्याप्त रूप से शस्त्र-सज्जित होने की संभावना नहीं थी।