माया, प्रिया से अलग, अपने किराये के अपार्टमेंट में रहने लगी। कबीर का माया के अपार्टमेंट में आना-जाना लगा रहता। कबीर, अब प्रेम को सँभालना भी सीखने लगा था। वह माया को खुश रखने की हर संभव कोशिश करता। माया खुश थी, कि कबीर के रूप में उसे एक समर्पित प्रेमी मिला था। कबीर खुश था, कि माया ने उसके समर्पण को स्वीकार किया था। प्रिया के साथ किए विश्वासघात का उसे दुःख था, मगर वह उसके अपने जीवन में की गई गलतियों की लम्बी शृंखला में एक और कड़ी ही था। वह खुश था कि उसकी प्रेम की तलाश माया पर पहुँचकर पूरी हो गई थी।
‘‘कबीर, इस अपार्टमेंट का मालिक अपार्टमेंट बेचना चाहता है; सोच रही हूँ मैं ही खरीद लूँ।’’ एक दिन माया ने कबीर से कहा।
‘‘इतनी जल्दी भी क्या है माया; किराये पर कोई और अपार्टमेंट मिल जाएगा।’’ कबीर ने कहा।
‘‘कबीर, दिस इ़ज ए गुड टाइम टू बाय प्रॉपर्टी; इंटरेस्ट रेट कम है, प्रॉपर्टी प्राइस बढ़ रहे हैं। इस समय रेंट करना तो पैसों की बर्बादी है; और फिर ख़ुद का अपार्टमेंट हो, तो उसे अपने तरीके से रखा जा सकता है। तुम्हीं ने तो कहा था, कि जिस घर में माया रहे, वह घर माया का ही लगना चाहिए।’’
‘‘हाँ, मगर इतने पैसे कहाँ से लाओगी?’’
‘‘कुछ सेविंग है, और बाकी का लोन मिल जाएगा; मैंने पता किया है, बैंक चार लाख पौंड का लोन देने को तैयार है।’’
‘‘चार लाख पौंड? कुछ ज़्यादा नहीं है माया? तुम कहो तो मैं भी कुछ कंट्रीब्यूट कर सकता हूँ।’’ कबीर ने चिंता जताई।
‘‘अभी तुम कमाते ही कितना हो कबीर; जब कुछ ठीक-ठाक कमाने लगो तब कहना।’’ माया ने हँसते हुए कहा।
माया ने बात शायद म़जाक में ही कही, मगर कबीर को अच्छा नहीं लगा। अचानक ही वह ख़ुद को माया के सामने छोटा महसूस करने लगा। प्रेम में तो उसने माया की हुकूमत स्वीकार कर ली थी, मगर दुनियावी मामले दिल के मामलों से अलग होते हैं। कबीर ने सोचा कि अगर वह माया के सामने ख़ुद को इतना छोटा महसूस कर रहा था, तो प्रिया के सामने कितना छोटा महसूस करता। बस यही सोचते हुए उसने माया की बात को झटक कर मन से बाहर किया।
माया ने बैंक से लोन लेकर अपार्टमेंट खरीद लिया। माया के पास समय कम होता; वह ज़्यादा वक्त अपने करियर को देती। सफलता और समृद्धि को पाने की लपट एक बार फिर उसके भीतर सुलग उठी थी। माया के अपार्टमेंट को माया की पसंद का घर बनाने की ज़िम्मेदारी कबीर पर आ पड़ी। कबीर का म़जाक सच ही हो गया था, कि माया ने उसे घर पर भी नौकर रख लिया था।
माया ने हाउस वार्मिंग पार्टी की। ऑफिस के कुछ लोगों को घर, डिनर पर बुलाया। भोजन और ड्रिंक्स की कैटरिंग का इंत़जाम बाहर से किया गया था। घर की लगभग पूरी सजावट कबीर ने कर ही रखी थी; माया की पसंद के अनुरूप ही।
शाम का वक्त था। हवा में जास्मिन की खुशबू बिखरी हुई थी, बैकग्राउंड में हल्का जा़ज संगीत बज रहा था। मेहमान आने शुरू हुए, और साथ ही शुरू हुआ ड्रिंक्स का दौर।
‘‘वाह माया, तुम्हारा फ्लैट तो बहुत सुन्दर है; और तुमने डेकोरेशन भी कितना बढ़िया किया है; इतना समय कैसे निकालती हो घर के लिए?’’ निशा ने अपार्टमेंट की सजावट पर ऩजरें फेरते हुए कहा।
‘‘ये सारी सजावट कबीर ने की है।’’ माया ने एक प्रशंसा भरी निगाह कबीर पर डाली।
‘‘लगता है कबीर हमारी फ़र्म की कम, और माया की नौकरी अधिक करता है।’’ मि.सिंग ने हँसते हुए कहा।
कबीर को मि.सिंग का म़जाक कुछ पसंद नहीं आया। उसने शिकायत भरे अंदा़ज में माया की ओर देखा।
‘‘ये कबीर का फ्लैट भी है; वी आर टूगेदर नाउ।’’ माया ने कबीर के गले में बाँहें डालीं।
‘‘कबीर, यू आर वेरी लकी टू हैव ए गर्लफ्रेंड लाइक माया; मेरी बात लिख लो... एक दिन इस लड़की की तस्वीर बि़जनेस टाइम्स के फ्रट कवर पर होगी।’’ मि.सिंग ने व्हिस्की का एक लम्बा घूँट भरकर कहा।
निशा ने कबीर के चेहरे पर ऩजर डाली। उसे लगा कि कबीर को मिस्टर सिंग द्वारा माया के सामने यूँ छोटा साबित करना पसंद नहीं आ रहा था। उसने सामने दीवार पर सजी एक सुनहरी पेंटिंग को देखते हुए कहा, ‘‘वाओ! गुस्ताव क्लिम्ट की ‘दि किस’... ये तो पक्का कबीर की ही चॉइस होगी!’’
‘‘कबीर इ़ज वेरी रोमांटिक।’’ माया ने एक रोमांटिक अंदा़ज से कबीर को देखा।
‘‘माया, यू आर वेरी लकी टु हैव ए बॉयफ्रेंड लाइक कबीर; काश, मुझे भी ऐसा ही कोई रोमांटिक बॉयफ्रेंड मिल जाता, जो दिल से लेकर घर तक सब कुछ सँभाल लेता।’’ निशा ने माया के रोमांटिक अंदा़ज को दुहराया।
माया को निशा की कही बात याद आ गई, ‘ही विल वरशिप द फ्लोर यू वाक ऑन।’ कबीर ऐसा ही समर्पित प्रेमी था।
पार्टी चलती रही, शराब के दौर भी चलते रहे। मेहमानों का साथ देते- देते माया ने शराब भी खूब पी ली। फिर पार्टी खत्म हुई, मेहमान जाने लगे। मेहमानों के जाने के बाद माया, थकान और नशे में निढाल होकर सो़फे में जा धँसी।
‘‘कबीर, तुम मुझसे कितना प्यार करते हो?’’ माया ने पास बैठे कबीर के गले में बाँहें डालते हुए पूछा।
‘‘माया, प्यार का कोई पैमाना नहीं होता कि उसे नापा जा सके।’’ कबीर ने भी माया के गले में बाँहें डालीं।
‘‘डू यू वरशिप द फ्लोर आई वाक ऑन?’’
‘‘ऑफकोर्स माया।’’ कबीर ने माया के गले से बाँहें निकालकर उसकी कमर जकड़ी।
‘‘मैंने कभी देखा नहीं।’’ माया ने कबीर पर शरारती निगाह डाली।
‘‘तुम्हें मेरे प्यार पर शक है?’’
‘‘हाँ, कर के दिखाओ, वरशिप द फ्लोर आई वाक ऑन।’’ कहते हुए माया की नशे में डूबी आवा़ज और भी नशीली हो गयी।
‘‘पहले सो़फे से उठकर, चलकर तो दिखाओ।’’ कबीर ने हँसते हुए कहा।
‘‘ठीक है, छोड़ो मुझे।’’ माया ने अपनी कमर से कबीर की बाँहें हटाईं।
सो़फे से उठकर माया चलने लगी, मगर नशे की हालत में और हाई हील में उससे ज़्यादा दूर चला न गया। तीन-चार क़दम चलते ही वह लड़खड़ाने लगी। कबीर ने उठकर उसे अपनी बाँहों में लपेटा।
‘‘मुझे छोड़ो, वरशिप द फ्लोर।’’ माया ने हँसते हुए कहा।
‘‘माया, लेट मी वरशिप योर फीट; फिर जिन जिन रास्तों पर चलोगी, सभी पर मेरी बंदगी के निशां होंगे।’’ कबीर ने मुस्कुराते हुए माया की कमर को ट्विस्ट किया और उसे सो़फे पर लेटाकर उसके पैर पर अपने होंठ रख दिए। कबीर को वह पल याद आ गया, जब उसके होंठ नेहा के पैरों के पास जाकर घबराकर काँप उठे थे। तब से अब तक कितना समय गु़जर गया, कितना कुछ बदल गया। तब, जब वह किसी लड़की के सामने अपना प्रेम अभिव्यक्त करने से घबराता था; और अब, जब वह पूरे आत्मविश्वास से किसी लड़की पर अपना प्रेम ज़ाहिर कर सकता है, उसे आसानी से अपनी ओर आकर्षित कर अपने बिस्तर तक ला सकता है। मगर इस पूरे आत्मविश्वास के बावजूद वह एक ऐसी लड़की ही ढूँढ़ता रहा, जिसके सामने वह स्वयं समर्पण कर दे; जो उस पर शासन करे। तब लड़कियाँ उसके लिए चुनौती थीं; फिर वह लड़कियों में चुनौती ढूँढ़ने लगा। क्या उसने प्रिया को सि़र्फ इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि प्रिया ने बहुत आसानी से उसके आगे समर्पण कर दिया था? प्रिया उसके लिए कभी चुनौती नहीं रही, जबकि माया हर पल उसके लिए चुनौती है; जिसकी रफ्तार से रफ्तार मिलाकर चलना उसे कठिन लगता है। इन्सान जो भी चाहे, जब तक वह उसके लिए चुनौती न हो, उसका पीछा करने में आनंद नहीं आता।
‘‘सि़र्फ पूजा से काम नहीं चलेगा भक्त; देवी को भोग की भी आवश्यकता है।’’ सोच में डूबे कबीर की ठुड्डी में पैर अड़ाते हुए माया ने शरारत से हँसकर कहा।
कबीर ने ऩजरें उठाकर माया की शरारत से चमकती आँखों को देखा। उसकी अपनी आँखों में भी शरारत चमक उठी। कबीर के होंठ माया की टाँग पर सरकने लगे। माया की टाँगें लम्बी और स्कर्ट छोटी थी; फिर भी कबीर के अधीर होंठों को उसकी स्कर्ट के भीतर पहुँचने में समय नहीं लगा। कबीर के हाथ भी माया की टाँगों पर सरकते हुए उसकी जाँघों पर पहुँचे, और फिर कुछ और ऊपर सरककर माया के कूल्हे जकड़ लिए। माया की नशे में भीगी साँसें कुछ और बहक उठीं। उसने स्कर्ट की ज़िप खोलकर उसे नीचे सरकाया। स्कर्ट, कबीर के कन्धों पर जा लिपटी। माया ने अपनी टाँगें कबीर की कमर पर लपेटीं और उसकी गर्दन को जकड़कर उसका चेहरा ऊपर खींचा। कबीर अब पूरी तरह उसकी क़ैद में था। कबीर के अधीर होंठों और उसकी बेसब्र क्रॉच के बीच अब सि़र्फ सिल्क की महीन पैंटी थी। माया के बेसब्र हाथों ने उसे भी खींचकर नीचे जाँघों पर सरका दिया। माया और कबीर की बेसब्री कुछ पलों के लिए ठहर गई।
कुछ वक्त बस यूँ ही बीता, फिर कबीर के प्रेम की तरह ही उसकी जॉब भी स्थाई हो गई।
‘‘कबीर, कन्ग्रैचलेशन्स! तुम्हारा प्रोबेशन कम्पलीट हो गया और जॉब परमानेंट हो गई है।’’ माया ने कबीर को खुशखबरी दी।
‘‘थैंक्स माया।’’ कबीर ने माया को गले लगाकर कहा।
‘‘मगर कबीर, तुम्हारी अप्रे़जल रेटिंग सि़र्फ गुड है, एंड दिस इ़ज नॉट सो गुड।’’
‘‘ओह, तो बॉस के लिए अच्छा होना अच्छा नहीं है।’’ कबीर ने म़जाक किया।
‘‘बी सीरियस कबीर; ये फाइनेंशियल मार्केट की दुनिया है; यहाँ अच्छा नहीं, बल्कि बहुत बहुत अच्छा होना पड़ता है।’’
‘‘माया, तुम्हें पता है कि मुझे रैट रेस पसंद नहीं है; मैं अपने ख़ुद के काम से खुश हूँ, और मेरे लिए इतना ही का़फी है।’’
‘‘कबीर, अगर तुम्हें मेरे साथ रहना है तो मेरी ऱफ्तार से ही दौड़ना होगा।’’ माया ने रोब झाड़ा।
‘‘ओके माया, आई विल ट्राई।’’
‘‘यू मस्ट।’’ माया ने उसी रोब से कहा।
कबीर एक विचित्र सी दुविधा में था। माया की लगाम उस पर कसती जा रही थी। कबीर, जो खुले आसमान में स्वच्छंद होकर उड़ना चाहता था, वह माया के बताए रास्ते पर दौड़ रहा था। माया का बॉसी रवैया उससे वह सब करा रहा था, जो वह करना नहीं चाहता था... मगर माया का यही अंदा़ज तो उसे पसंद था। वह चाहकर भी माया के तिलिस्म को तोड़ नहीं पा रहा था।
कुछ वक्त और बीता। प्रिया की पढ़ाई पूरी हुई। उसने अपने डैड की फ़र्म ज्वाइन कर ली, यूरोप में मार्वेâटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन की हेड बनकर। माया की पकड़ भी अपनी फ़र्म पर मजबूत होती गई। माया की रफ्तार ते़ज थी; कबीर के लिए उसकी रफ्तार से रफ्तार मिलाना मुश्किल था, मगर उसने तय कर लिया था, चलना तो उसे माया के साथ ही था; क़दम से क़दम मिलाकर, या पीछे-पीछे।
‘‘हे कबीर! एक अच्छी खबर है।’’ माया ने अपने सामने बैठे कबीर से कहा।
‘‘हूँ... प्रमोशन मिला है, सैलरी हाइक मिला है या बोनस?’’ कबीर ने म़जाक के अंदाज में पूछा।
‘‘ऑ़फर मिला है, फ़र्म में पार्टनर बनने का।’’ माया का चेहरा गर्व से चमक रहा था।
‘‘वाओ! ग्रेट... तो अब तुम ऑफिशियली मेरी बॉस बन जाओगी; माया मेमसाब।’’ कबीर ने म़जाक किया, ‘‘मगर तुम्हें फ़र्म में इन्वेस्ट करना होगा?’’
‘‘हाँ, लगभग दो लाख पौंड।’’ माया ने एक बेपरवाह मुस्कान बिखेरी।
‘‘माया, तुम्हारे पास पैसे हैं? तुम पर पहले ही इस अपार्टमेंट का लोन है।’’ कबीर ने चिंता जताई।
‘‘कबीर, मैंने सही समय पर अपार्टमेंट खरीद लिया था। अपार्टमेंट का प्राइस बढ़ गया है, और दो लाख पौंड की मेरी इक्विटी बढ़ गई है; इस इक्विटी के अगेंस्ट लोन लेकर मैं फ़र्म में इन्वेस्ट कर सकती हूँ।’’ अपनी व्यवसाय कुशलता पर हो रहा गर्व, माया की मुस्कान को और भी मोहक बना रहा था।
‘‘माया, पता नहीं क्यों, मगर मुझे तुम्हारी रफ्तार से डर लगता है... तुम्हें नहीं लगता कि तुम इतना ज़्यादा लोन लेकर रिस्क ले रही हो?’’
‘‘रिस्क किस बात का है? मैं अपनी ही इक्विटी के अगेंस्ट लोन ले रही हूँ; अपार्टमेंट का प्राइस बढ़ा है, तो वह मेरा ही पैसा तो हुआ।’’
‘‘मगर अपार्टमेंट का प्राइस कम भी तो हो सकता है?’’ कबीर ने फिर चिंता जताई।
‘‘कबीर, अब तुम यह मिडिल क्लास की मेंटालिटी छोड़ो... बी आप्टमिस्टिक... क्या गाना है वह.. ल, ला, ल, ला।’’ माया ने गाने की धुन याद करनी चाही।
‘‘कौन सा गाना माया?’’
‘‘वही..’’ गाना याद करते हुए माया ने कहा, ‘‘हाँ, तू मेरे साथ-साथ आसमां से आगे चल...देखा, तुम्हारे साथ रहकर मैं हिंदी गाने भी सुनने लगी हूँ।’’
कबीर, आसमां से आगे तो जाना चाहता था, मगर माया के बताए हुए रास्ते पर चलकर नहीं।
‘‘मैं ड्रिंक्स बनाती हूँ, तुम गिटार लेकर यह गाना तो बजाओ कबीर; लेट्स सेलिब्रेट।’’ माया चहक रही थी।
कबीर ने वैसा ही किया, जैसा कि माया ने उसे कहा। गिटार लेकर वह गाने की धुन छेड़ने लगा।
माया, फ़र्म में पार्टनर बन गई। उसका रोब और रुतबा और बढ़ गया। उसे अपना प्राइवेट ग्लास चैम्बर मिल गया।
‘‘तो कैसा लग रहा है यह प्राइवेट चैम्बर?’’ माया ने होंठों पर दर्प लपेटे हुए कबीर से पूछा।
‘‘हूँ... गुड।’’ कबीर ने माया की रिवॉल्विंग चेयर पर बैठते हुए उसे घुमाया।
‘‘मिस्टर कबीर, आप ये न भूलें कि आप इस फ़र्म में सि़र्फ एक असिस्टेंट हैं; पार्टनर की चेयर पर बैठने की गुस्ताखी न करें।’’ माया ने शरारत से कहा।
‘‘ओह, सॉरी मैडम।’’ कबीर ने झटपट कुर्सी से उठते हुए शरारत से सिर झुकाया।
‘‘वैसे अगर आप बॉस को खुश रखें तो आपकी जल्दी तरक्की हो सकती है।’’ माया ने चेयर पर बैठते हुए बैकरेस्ट पर आराम से पीठ टिकाई, ‘‘हूँ... तो कहो, हाउ विल यू प्ली़ज योर बॉस?’’
‘‘मैडम, आपको याद है, जब आप नई-नई लंदन आई थीं; तब एक बेरो़जगार लड़का आपको लंदन की सैर पर ले गया था, जिससे खुश होकर आपने उसकी नौकरी लगवाई थी।’’
‘‘हाँ,दैट वा़ज ए गुड फन।’’
‘‘तो इस बार आपको लंदन की सैर का एक नया एक्सपीरियंस दिया जाए?’’
‘‘किस तरह का एक्सपीरियंस?’’
‘‘रिक्शे की सवारी का।’’
‘‘रिक्शे में तो इंडिया में बहुत घूमे हैं, उसमें क्या फ़न है?’’
‘‘मगर आपने कभी रिक्शेवाले से प्यार नहीं किया होगा।’’ कबीर ने शरारत से माया को देखा।
‘‘क्या मतलब? तुम चलाओगे रिक्शा?’’ माया ने चौंकते हुए कहा। कहते हुए उसके होंठों से हँसी भी छलक पड़ी।
‘‘हाँ मेमसाब।’’ कबीर ने फिर शरारत से सिर झुकाया।
शाम को कबीर ने माया को घर पहुँचकर तैयार रहने को कहा। सर्दियों के दिन थे। शाम जल्दी ढल चुकी थी। आसमान में अँधेरा था। हवा में कड़कती ठंढ थी। माया, सिल्क की लांग ड्रेस के ऊपर फ्लीस का मोटा पुलओवर जैकेट पहनकर तैयार थी। कबीर, खूबसूरत सा साइकिल रिक्शा लेकर पहुँचा। रिक्शे की सवारी सीट सामने की ओर से छोड़कर बाकी सभी ओर से पीले रंग की पॉलिथीन की मोटी शीट से घिरी थी। पॉलिथीन की शीट पर पीछे की ओर, ब्रिटेन का फ्लैग, यूनियन जैक बना हुआ था। साइकिल के हैंडल, प्लास्टिक के लाल और पीले फूलों से सजे हुए थे।
‘‘इतना सुंदर रिक्शा कहाँ से ले आए?’’ माया ने चहकते हुए पूछा।
‘‘अपना जुगाड़ है मेमसाब।’’ कबीर ने ठेठ देसी अंदा़ज में कहा।
‘‘अच्छा, पिकेडिली सर्कस का क्या लोगे भैया।’’ माया ने शरारत से पूछा।
‘‘जो वाजिब लगे दे देना मेमसाब; रात का ब़खत है और ठंढ भी बहुत है।’’ कबीर ने हाथ रगड़ते हुए माया पर शरारती ऩजर डाली।
‘‘एक थप्पड़ पड़ेगा तो सारी ठंढ निकल जाएगी; चलो रिक्शा चलाओ।’’ माया ने रिक्शे पर बैठते हुए हँसकर कहा।
कबीर ने रिक्शा चलाना शुरू किया। लंदन में साइकिल रिक्शे बहुत कम चलते हैं। बस थोड़े बहुत सेंट्रल लंदन में ही चलते हैं... जो, लोग अपने शौक के लिए इस्तेमाल करते हैं। माया के लिए ये अलग किस्म का और बेहद रोमांटिक अनुभव था। कबीर, धीमी ऱफ्तार से गुनगुनाते हुए, रिक्शा खींच रहा था। बीच-बीच में वह मुड़कर माया को देखता। माया के चेहरे का एक्साइटमेंट उसे अच्छा लग रहा था।
‘‘भैया, थोड़ा ते़ज चलाओ; इतना धीरे क्यों चला रहे हो? लगता है कुछ खाते नहीं हो, सारा पैसा दारू में उड़ा देते हो।’’ माया ने फिर से शरारत की।
‘‘मेमसाब, जल्दी चलाऊँगा तो हम जल्दी पहुँच जाएँगे; इतनी सुंदर सवारी हो तो उसके साथ ज्यादा से ज्यादा ब़खत बिताने का मन करता है।’’ कबीर ने भी वैसी ही शरारत की।
‘‘हाय राम, बहुत बेशर्म रिक्शेवाले हो; ऐसे भी कोई बात करता है लेडी़ज सवारी के साथ?’’
‘‘मेमसाब! ऐसे तो रिक्शे वाले से भी बात नहीं करनी चाहिए; मजूरी करते हैं, ग़ुलामी नहीं।’’
‘‘अच्छा, तुमसे प्यार करूँ तो ग़ुलामी करोगे?’’ माया ने थोड़ा आगे झुकते हुए एक नटखट मुस्कान बिखेरी।
कबीर ने मुड़कर माया को देखा। उसके चेहरे पर बिखरी नटखट मुस्कान उसे बहुत अच्छी लग रही थी। माया को इस तरह शरारत करते हुए उसने कम ही देखा था। अपनी मंज़िल की ओर भागती माया, जिसे ते़ज ऱफ्तार पसंद थी, आज रिक्शे की धीमी सवारी में छोटी-छोटी शरारतों का म़जा लेती हुई कुछ अलग ही लग रही थी। कबीर की आँखें माया के चेहरे पर टिक गयीं।
‘‘कबीर वाच...।’’ अचानक से माया चीखी।
माया का चेहरा निहारते हुए कबीर का ध्यान, रिक्शे की दिशा पर नहीं रहा था। रिक्शे का अगला पहिया सड़क के किनारे बने फुटपाथ के कर्ब से टकराकर फुटपाथ पर चढ़ा, और रिक्शे का बैलेंस पूरी तरह बिगड़ गया। कबीर ने रिक्शे को सँभालने की कोशिश की, मगर नाकाम रहा। रिक्शा, पलटकर सड़क पर गिरा, और साथ ही कबीर और माया भी। पीछे से आती एक कार के ड्राइवर ने जोर से ब्रेक लगाया। एक चरचराहट के साथ कार के टायर सड़क पर रगड़े; मगर रुकते-रुकते भी कार रिक्शे से टकरा गयी। माया को एक ज़ोर का धक्का लगा और वह रिक्शे से छिटक कर लुढ़कती हुई सड़क पर जा गिरी।
कार ड्राइवर ने झटपट अपने मोबाइल फ़ोन से इमरजेंसी का नंबर मिलाकर एम्बुलेंस बुलाई। तीन मिनट के भीतर, सायरन बजाती एम्बुलेंस पहुँच गई। एम्बुलेंस से पैरामेडिक्स की टीम निकली। पैरामेडिक्स ने झटपट, माया और कबीर को उठाकर स्ट्रेचर पर लिटाया और उन्हें एम्बुलेंस के भीतर लेकर गए। कबीर को कम चोटें आई थीं। वह होश में था। माया को का़फी चोटें लगी थीं, वह बेहोश थी। उसके सिर से खून भी बह रहा था। एम्बुलेंस, सायरन बजाती ते़जी से सेंट थॉमस एक्सीडेंट एंड इमरजेंसी हॉस्पिटल की ओर दौड़ी।
इमरजेंसी वार्ड के बिस्तर पर लेटा कबीर, अपने पैरों में बँधी पट्टियों को देख रहा था। उसके सिर पर भी हल्की चोट आई थी, जिसे ग्लू कर दिया गया था। माया आईसीयू में थी। कबीर को अपनी लापरवाही पर गुस्सा आ रहा था। बेपरवाही तो कुछ हद तक अच्छी होती है, मगर क्या उसे इस तरह की लापरवाही करनी चाहिए, जिससे किसी की जान खतरे में आ जाए। माया को कुछ हो गया तो? कितनी दुर्घटनाओं का बोझ वह अपने ऊपर लेगा? नेहा की मौत का, प्रिया के अवसाद का, और अब माया...।
‘‘आपकी पार्टनर को मल्टीपल इन्जुरी़ज हैं; ब्रेन में ब्लड क्लॉट भी बन गया है; हम दवाइयाँ दे रहे हैं, मगर शायद ऑपरेशन करना पड़े।’’ डॉक्टर नायक ने इमरजेंसी वार्ड के बेड पर लेटे कबीर को बताया।
‘‘वो ठीक तो है न डॉक्टर? ज़्यादा सीरियस तो नहीं है?’’ कबीर ने घबराते हुए पूछा।
‘‘अभी कुछ कह नहीं सकते... कभी-कभी ब्रेन इंजुरी फेटल भी हो जाती है; दूसरे इंटरनल ऑर्गंस में भी चोट आई है... ब्लड लॉस का़फी हुआ है।’’
कबीर की घबराहट और बढ़ी। उसके पास माया के किसी रिश्तेदार का कोई कांटेक्ट नंबर भी नहीं था। ऐसे में उसे सि़र्फ प्रिया की याद आई।
‘‘डॉक्टर! एक फ़ोन कर सकता हूँ?’’ कबीर ने पूछा।
‘‘आप आराम करें; जिसे भी इन्फॉर्म करना है, बता दें, हम उन्हें फ़ोन कर देंगे।’’ डॉक्टर नायक ने कहा।
कबीर ने अपने मोबाइल फ़ोन से प्रिया का नंबर निकालकर ड्यूटी नर्स को दिया। ड्यूटीनर्स, प्रिया को फ़ोन करने वार्ड से बाहर निकल गई।
‘‘हे कबीर! क्या हुआ? कैसे हो?’’ हॉस्पिटल पहुँचते ही प्रिया ने घबराई आवा़ज में पूछा।
‘‘मैं ठीक हूँ प्रिया, मगर माया ठीक नहीं है।’’
‘‘क्या हुआ माया को? मैं मिल सकती हूँ उससे?’’ प्रिया की घबराहट कुछ और बढ़ी।
‘‘अभी नहीं प्रिया; अभी तो शायद वह होश में भी नहीं आई है; ब्रेन में ब्लड क्लॉट बन गया है, शायद ऑपरेशन भी करना पड़े।’’
‘‘ओह! यह सब कैसे हुआ?’’ प्रिया की घबराहट चिंता में बदल गई।
‘‘बताता हूँ प्रिया, मगर पहले ये बताओ, तुम्हारे पास माया के घर वालों का कांटेक्ट नंबर है? उन्हें इन्फॉर्म कर सकती हो?’’
‘‘कबीर, तुम्हें नहीं पता कि माया का कोई नहीं है?’’ प्रिया ने आश्चर्य से पूछा।
‘क्या!’ कबीर चौंक उठा।
‘‘हाँ कबीर; माया के पेरेंट्स की डेथ उसके बचपन में ही हो गई थी; उसके दादा-दादी ने उसे पाल कर बड़ा किया... अब तो वे भी नहीं रहे।’’
‘‘ओह! माया ने कभी बताया ही नहीं।’’
‘‘तुमने कभी पूछा ही नहीं होगा; तुम हो ही ऐसे लापरवाह।’’
कबीर को अब जाकर समझ आया, कि माया में सफलता और संपन्नता की इतनी ललक क्यों है... अनाथ थी... अभावों से गु़जरी रही होगी।
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