साधना के होंठ सिकुड़कर गोल हो गये। उसने अपना सेलफोन निकाला और गूगल पर अद्वैत फाउंडेशन सर्च करके उसकी वेबसाइट पर पहुँची। करीब दस मिनट तक वह उस वेबसाइट पर टहलती रही और फिर उसके हाथ कुछ ऐसा लगा कि वह लगभग उछल ही पड़ी। उसकी हालत देख संगीता भी भौचक्की रह गयी।

“पहेली का हल मिल गया।” उसने चुटकी बजाते हुए कहा और फिर विभूति का नंबर डायल कर दिया।

“कहाँ हो विभू?” कॉल रिसीव होने पर उसने पूछा।

“कांफ्रेंस से अभी-अभी फ्री हुआ हूँ। ओपीडी में जा रहा हूँ।” विभूति का जवाब आया- “तुमने संगीता से मुलाक़ात कर ली?”

“हाँ और शबनम के मौत की मिस्ट्री भी साल्व हो गयी। तुमसे बात करने हॉस्पिटल आ रही हूँ।”

विभूति का जवाब सुने बिना ही कॉल डिसकनेक्ट करके साधना, संगीता से मुखातिब हुई और बोली- “थैंक यू वैरी मच स्वीट हार्ट। तुमने जो जानकारी दी है, उससे संसार पर मंडरा रहा एक बड़ा खतरा टलने जा रहा है।”

कहने के बाद वह लम्बे-लम्बे डग भरते हुए रेस्टोरेंट से बाहर निकल गयी। हैरान संगीता उसे जाते हुए देखती रही फिर वैनिटी बैग से सेलफोन निकाली, गूगल पे ओपन किया और कांटेक्ट लिस्ट के एक नंबर को आठ हजार रूपये ट्रांसफर करने के बाद उसी नंबर को डायल कर दिया।

“वो चली गयी?” कॉल रिसीव होने के बाद विभूति की आवाज़ आयी।

“हाँ सर। जितना मालूम था, उतना बता दिया उन्हें। उन मामूली बातों से ही उन्होंने न जाने ऐसा क्या कन्क्लूजन निकाल लिया कि यहाँ से शबनम के मौत की मिस्ट्री हल हो गयी, चिल्लाते हुए गयी हैं।”

“जानता हूँ।” विभूति ने सर्द आह भरकर कहा- “अब वो मेरे पास आ रही है मेरा सिर खाने के लिए। पैसे निकलवाने में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?”

“चिकनी-चुपड़ी बातों में उलझाना चाहती थीं लेकिन जैसा कि आपने कहा था, मैंने स्ट्रिक्ट रहते हुए सीधे गोल पर फोकस किया और पैसे का लिफ़ाफ़ा लिए बगैर मुँह नहीं खोली।”

“हा..हा..हा।” दूसरी ओर से विभूति के जोर से हँसने की आवाज़ आयी- “मेरी झाँसी की रानी ये कभी नहीं जान पायेगी कि तुम्हारी फीस तो केवल दो हजार थी, बाकी आठ हजार तो उसके पति का कमीशन था। कसम से, खुद को होशियार समझने वाली इन बीवियों को बेवक़ूफ़ बनाने के बाद विश्वविजेता सिकंदर वाली फीलिंग आती है।”

“मैं प्रार्थना करूँगी कि होम मिनिस्ट्री को आपके इस घोटाले की भनक न लगने पाए।” संगीता ने मुस्कुराते हुए कहा और फिर कॉल डिसकनेक्ट कर दी।

N

अभी-अभी ड्राइंग हॉल में दाखिल हुए फाह्याज़ की हालत देख लियाकत का कलेजा मुँह को आ गया। उसके हाथ के घुटने छिल गए थे, यूनिफार्म जगह-जगह से फट गयी थी और चाल में भी लड़खड़ाहट आ गयी थी। घुटनों से खून रिसना अभी बंद नहीं हुआ था लेकिन उसके चेहरे पर शिकन की एक बारीक रेखा तक नहीं थी। आते ही उसने लियाकत को लक्ष्य करके पूछा- “हसन कहाँ है?”

“तुम्हें क्या हो गया?” लियाकत ने मानो उसका सवाल सुना ही नहीं।

“बाइक की स्पीड ज्यादा थी इसलिए स्लिप कर गयी लेकिन हसन कहाँ है?”

“या खुदा! मगर तुम्हारी स्पीड ज्यादा थी क्यों?”

लियाकत के सवालों पर फाह्याज़ ने झुंझलाकर उनकी ओर देखा और बगैर कोई जवाब दिये खुद ही हसन के कमरे की ओर बढ़ गया।

“अभी-अभी सोया है। कल रात भी तुमने उसे सोने नहीं दिया था, अब जगाना मत।”

हिदायत देने के बाद लियाकत ने फैमिली डॉक्टर को फोन करके उन्हें हालात से अवगत कराया और उनसे अपने किसी असिस्टेंट को घर भेजने का अनुरोध करने के पश्चात हसन के कमरे में पहुँचे लेकिन वहाँ फाह्याज़ की हरकत देख हैरान रह गये। वह हसन को जगाकर उसके कपड़े उतार रहा था।

“दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा?” वे चीखे- “ठण्ड में उसके कपड़े क्यों उतार रहे हो?”

फाह्याज़ ने न तो कोई जवाब दिया और न ही अपनी हरकतें रोकीं। जब वह

हसन का स्वेटर, शर्ट और बनियान उतार चुका तो उसके कमर के ऊपर के नग्न हिस्से का बारीकी से मुआयना करने लगा। इन सबके बीच ठण्ड से काँपता हुआ वह लड़का चेहरे पर नासमझी का भाव लिए हुए कभी लियाकत को तो कभी बाप को देखता रहा। कुछ मिनटों के बारीक मुआयने के बाद आख़िरकार फाह्याज़ को वह मिल गया, जिसकी उसे तलाश थी। उसकी निगाहें हसन के दाहिने कंधे पर ठहर गयीं और जिस्म यूँ शिथिल पड़ गया, जैसे बदन की सारी शक्ति निचोड़ ली गयी हो। अपने बेटे के कंधे पर बेहद बारीक दिखाई दे रहे नेक्रोमेंसी के निशान पर अनवरत दृष्टि गड़ाये हुए वह किसी ढहती दीवार की मानिंद फर्श पर बैठ गया।

“क्या हुआ?” लियाकत ने भी फाह्याज़ की दृष्टि का अनुसरण करते हुए हसन के दाहिने कंधे को देखा और वहाँ पर उक्त निशान को देखते ही उनके भी होठों से सिसकारी निकल गयी।

“य...ये तो...।” उन्होंने बौखलाकर फाह्याज़ की ओर देखा और फिर हसन का ख्याल करके अपना कथन अधूरा छोड़ दिया।

फाह्याज़ कुछ नहीं बोला तो कुछ देर बाद लियाकत ने काँपते होठों से कहा- “हमें कुछ करना होगा फाह्याज़।”

“क्यों परवाह करूँ मैं?” फाह्याज़ ने लियाकत पर हिकारत भरी नजर डालते हुए कहा- “लोग तो यूँ भी मरते हैं, कभी बीमारी से, कभी दुर्घटना से। अपनी और आपकी जान जोखिम में डालकर मैं हसन की जान बचा भी लूँगा तो क्या लोगों का मरना बंद हो जाएगा? शैतानियत का वजूद मिट जाएगा?”

लियाकत सकपकाकर बगले झाँकने लगे। फाह्याज़ ने वही भाषा बोली थी, जो भाषा कभी उन्होंने उसके सामने बोली थी।

“पाँच वक्त का नमाजी होना, सुबह-शाम मंदिर की आरती में शरीक होना, गीता-कुरआन पढ़ना; ये सब आसान है अब्बू; हम और आप कोई भी कर सकता है लेकिन इंसान बनना निहायत ही मुश्किल काम है क्योंकि हमें इंसान बनाने के एवज में अल्लाह ने हमसे जो उम्मीदें रखी हैं, उन्हें निभाने की कोशिश में हमें हर पल एक कठिन इम्तिहान से गुजरना होता है, हर मखलूक के दु:ख दर्द में शरीक होना पड़ता है, अपने फर्ज के प्रति ईमानदार होना पड़ता है और अपने ईमान को मुसलसल रखना पड़ता है।” फाह्याज़ साँस लेने के बाद आगे बोला- “मैं वही कर रहा था जबकि आप बार-बार खतरे का हवाला देकर मुझे अपने कदम पीछे खिंचने के लिए उकसाते रहे। अगर मैंने आपकी बात मान ली होती तो आज मैं भी अपने बेटे के बदन पर मौत का ठप्पा देखकर उतने ही गहरे अँधेरे में होता, जितने गहरे अँधेरे में इससे पहले काली परछाईं का शिकार हुए लोग थे। आज अगर मुझे मालूम है कि अपने बेटे को बचाने के लिए मुझे क्या करना चहिए तो सिर्फ इसलिए क्योंकि मैंने किसी आसमानी आफ़त, किसी नेक्रोमेंसी के निशान से डरकर अपने फ़र्ज़ से मुँह नहीं मोड़ा।”

लियाकत को कोई शब्द नहीं सूझे। वे खामोशी अख्तियार किये हुए अपने बेटे के चेहरे को देख रहे थे, जहाँ एक अलग किस्म का आत्मविश्वास नजर आ रहा था। एक ऐसा आत्मविश्वास, जिसकी रोशनाई से केवल उनका ही चेहरा दमकता है, जिन्हें खुद पर भरोसा होता है।

“आप चिंता मत कीजिए।” भावनाओं का क्षणिक ज्वार थमने के बाद फाह्याज़ का लहजा थोडा नर्म हुआ- “आपके पोते को मैं कुछ नहीं होने दूँगा।”

“मुझे अपने पोते के साथ-साथ अपने बेटे की भी चिंता है।” लियाकत ने डबडबाई आँखों से कहा- “वादा करो कि उसे भी कुछ नहीं होने दोगे?”

“नहीं होने दूंगा, वादा रहा।” फाह्याज़ ने लियाकत की दोनों हथेलियों को अपनी हथेलियों के बीच लेते हुए कहा और फिर साधना को फोन लगाया।

“हैलो!” कॉल रिसीव होने पर उसकी आवाज़ आयी।

“आपकी खोज कहाँ तक पहुँची मैम?” फाह्याज़ ने गंभीर लहजे में पूछा।

“मैं आपकी पत्नी की मौत का राज़फाश कर चुकी हूँ, जल्द ही आपसे मिलती हूँ, शायद आज शाम ही।”

“दरअसल मैंने आपको ये बताने के लिए फोन किया है कि हमारे पास वक्त नहीं है क्योंकि अब मेरा बेटा भी चुना जा चुका है। कामरान ने उसकी तस्वीर बनाई है और इसी के साथ उसके कंधे पर नेक्रोमेंसी का निशान बन रहा है।”

“दैट्स ग्रेट।” साधना का चहका हुआ स्वर आया- “दुर्गा माँ हमें रास्ता दिखा रही हैं।”

“क्या मतलब?” फाह्याज़ चौंका।

“आपके बेटे का ब्लड ग्रुप ओ नेगेटिव है, राईट?”

“ह..हाँ।”

“यस।” इस बार आयी साधना की आवाज़ ऐसी थी, जैसे वह खुशी से उछल रही हो।

“आप मेरा मजाक उड़ा रही है न? मेरे बेटे पर मौत का निशान लग चुका है और आप खुश हो रही हैं?”

“आप उसे लेकर श्रीमन्नारायण हेल्थ केयर आ जाइए। मैं यहीं पर अपने हसबैंड विभूति वैरागी की ओपीडी में हूँ। उसका कुछ टेस्ट करवाने के बाद सारा खुलासा करती हूँ।”

कहने के बाद साधना ने फाह्याज़ को विचित्र तरद्दुद में छोड़कर कॉल डिसकनेक्ट कर दिया।

“क्या हुआ?” फाह्याज़ के चेहरे पर उलझन देख लियाकत ने पूछा।

“हसन को लेकर आपको श्रीमन्नारायण हॉस्पिटल जाना होगा। वहाँ डॉक्टर विभूति वैरागी की ओपीडी में मेरी पहचान की एक महिला डॉक्टर से आपको मुलाक़ात करनी है, आगे वह खुद आपको गाइड करेगी। मैं खुद चला जाता लेकिन सुबोध कुछ इम्पोर्टेन्ट इनफार्मेशन के साथ घर आ रहा है।”

“इसकी जरूरत नहीं है, मैं ही जाऊँगा। डॉक्टर को मैंने फोन कर दिया है, वे तुम्हारे चोट की ड्रेसिंग के लिए किसी को भेजते होंगे।”

“थैंक यू।”

“क्या अब मैं मर जाऊंगा?” हसन ने अपने कंधे पर बन रहे निशान को देखते हुए मासूमियत के साथ पूछा।

“बिल्कुल नहीं।” फाह्याज़ ने उसका गाल थपथपाते हुए कहा- “मत भूलो कि तुम एक ब्रेव पुलिस ऑफिसर के बेटे हो। मेरी बन्दूक देखकर मौत भी तुम्हारे पास आने से डरेगी। अब कपड़े पहनोगे या पतलून भी उतार दूँ?”

हसन ने शरमा कर चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया। लियाकत उसे कपड़े पहनाने लगे।

N

फ़िज़ा को ज्यों ही तबस्सुम के स्कूल से लौट आने की आहट मिली, वह तमतमाती हुई कमरे से बाहर आयी। माँ के भीतर उफनते ज्वालामुखी से बेखबर तबस्सुम सोफ़े पर बैठी शूज निकाल रही थी लेकिन उस पल चिहुंक सी गयी, जब क्रोधाग्नि के शोलों में लिपटे फ़िज़ा के ये लफ़्ज उसके कानों में गये- “बदजात! ये क्यों नहीं बतायी कि उस लड़के का बाप पुलिसवाला है?”

‘बदजात’ शब्द तबस्सुम के लिए नया था। हालाँकि उसे इसका मतलब नहीं पता था लेकिन माँ का लहजा ही ये बताने के लिए पर्याप्त था कि वह शब्द सामान्य परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जाने वाला नहीं था। तबस्सुम ने जब माँ की ओर गर्दन घुमायी तो उसे इतना मौक़ा ही न मिल सका कि कोई सवाल पूछ पाती या मामले को समझने की कोशिश कर पाती। अगर उसके बालमन को कुछ समझ में आया तो बस इतना कि माँ इतना गुस्सा पहले कभी नहीं हुई थी, जब उसका चेहरा दहकते अंगारों की भांति लाल हो गया हो और आँखों में खून उतर आया हो। फ़िज़ा उसकी अम्मी है, तबस्सुम का ये विश्वास उस पल बुरी तरह डगमगा गया कि जब फ़िज़ा ने उसका गला अपने पंजे में जकड़ा और उसे जमीन से दो फुट ऊपर हवा में टांग दिया।

“बेवक़ूफ़ लड़की!” उसके हलक से किसी वहशी के समान गुर्राहट निकली-

“तेरी वजह से मेरी आज़ादी खतरे में पड़ी, तेरी वजह से मुझे फिर से पहचान बदलने की जरूरत पड़ गयी।”

तबस्सुम गले से गूं-गूं की आवाज़ निकालते हुए छटपटाने लगी। फ़िज़ा की भयानक भंगिमाएं देख उसका ये यकीन पुख्ता हो गया कि वह औरत उसकी माँ की शक्ल में कोई और थी लिहाजा वह अपनी पूरी क्षमता के साथ गले से घुटी-घुटी सी आवाज़ निकालते हुए मेड को बुलाने की कोशिश करने लगी।

उसकी कोशिश रंग लायी और कुछ ही पलों में मेड भागती हुई ड्राइंग हॉल में आयी। वहाँ का नजारा देखकर पहले तो वह कुछ पलों तक हतप्रभ खड़ी रही फिर तबस्सुम को छुड़ाने की कोशिश में फिज़ा को जोर-जोर से झकझोरने लगी। मेड भारी-भरकम थी, अकूत ताकत तो नहीं रखती थी लेकिन इतनी सक्षम तो थी ही कि छरहरी कद-काठी वाली फिज़ा को शारीरिक बल में पछाड़ सके लेकिन यहाँ पर उसकी ये गलतफहमी दूर हो गयी कि उसकी मालकिन की जिस्मानी ताकत उससे कम थी। उसने अपनी पूरी ताकत लगा दी लेकिन बच्ची पर फिज़ा के शिकंजे को तनिक भी ढीला न कर सकी।

“या खुदा! आपको क्या हो गया बीबी जी, क्यों अपनी ही बच्ची की जान लेने पर तुल गयीं आप?”

तबस्सुम के जिस्म का सारा खून उसके चेहरे पर उतर आया था, आँखें बाहर उबल गयी थीं और हवा में लटके उसके पैर फांसी के फंदे पर लटके इंसान के पैरों के समान छटपटा रहे थे। उसके गले से आवाज़ निकलनी बंद हो चुकी थी और ये आभास होने लगा था कि उसका छटपटाना भी अब किसी भी पल थमने वाला है। मेड, फिज़ा का शिकंजा ढीला करने का जितना प्रयास कर रही थी, उतना ही उसे ये एहसास होता जा रहा था कि वह पहाड़ को हिलाने की कोशिश कर रही है। फिर कुछ ऐसा हुआ, जिसकी मेड को ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। ठीक उस पल, जब तबस्सुम की साँसें हमेशा के लिए थमने वाली थीं, फिज़ा ने उसे छोड़ दिया।

वह किसी बेजान गुड़िया की भांति फर्श पर जा गिरी। उसकी साँसें अवरुद्ध हो गयी थीं और मात्र पलकों में हल्का-हल्का कंपन हो रहा था। पलकों का वह मामूली कंपन ही था, जो उस लड़की के जिस्म में अभी भी जीवन के शेष होने का संकेत दे रहा था अन्यथा वह बेजान हो चुकी थी।

मेड, तबस्सुम को सँभालने के लिए उसकी ओर दौड़ी। उसे अपनी गोद में उठायी और मुँह से साँसें देने लगी। करीब पाँच मिनट की कोशिश के बाद जब लड़की की साँसें अनवरत हुईं तो मेड, फिज़ा की ओर घूमी और यही वह पल था, जब उसकी आँखें हैरत से फैलती चली गयीं।

वो फिज़ा नहीं थी लेकिन जो भी थी, बेहद अजीब और डरावनी थी। वह

खूबसूरत और जवान तो थी लेकिन उसके लंबे बाल सफ़ेद थे, भंवें सफ़ेद थीं और जिस्म पर मौजूद मखमली चोगा भी सफ़ेद था, जो जमीन पर दूर तक फ़ैल रहा था। मेड के बदन में सिहरन भर गयी। सामने खड़ी उस भयानक मखलूक को देख अर्द्धबेहोशी की हालत में पहुँची तबस्सुम और भी खौफ़जदा होकर मेड की गोद में चेहरा छिपाने लगी लेकिन मेड के लिए छिपने का कोई जरिया नहीं था, दूर-दूर तक नहीं था।

“क..कौन हो...हो..तुम? मेम साहब कहाँ हैं?”

“वह तो साल भर पहले मर गयी।” वह अजीब औरत जबड़े भींचते हुए बोली- “रोड एक्सीडेंट में मौत केवल तुम्हारे साहब की नहीं हुई थी, तुम्हारी मेम साहब की भी हुई थी। जब कार घाटी में गिरी थी, तो एक नहीं दो-दो जिस्म लाशों में तब्दील हुए थे लेकिन एक जिस्म लोगों को लाश के रूप में बरामद हुआ और दूसरा जिस्म घायल के रूप में। वो घायल जिस्म, जिसे दुनिया ने फिज़ा का जिस्म समझा, हमारा जिस्म था। मेडिकल साइंस ने जिसकी तीमारदारी की, वो हम थे। हमने फिज़ा की शक्ल अख्तियार करके इस दुनिया में उसकी जगह ली। इतनी खामोशी से किसी का क़त्ल करो कि इल्म होना तो दूर दुनिया वालों को उसकी लाश का भी पता न लगे फिर उस इंसान की शक्ल अख्तियार कर लो। तुम इंसानों की दुनिया में छिपने के इस तरीके की कामयाबी दर सौ फीसदी है। तुम ख्वाब में भी नहीं सोच पाते हो कि जिसे तुम अपना साथी समझ रहे हो, असल में वह एक जिन्न भी हो सकता है, जो तुम्हारे अजीज की शक्ल में इस दुनिया में रह रहा होता है। न जाने कितने ऐसे सैकड़ो जिन्न है, जो आदमजात की दुनिया में घूम रहे हैं, हम भी उनमें से एक हैं।”

“ज..जिन्न....तुम..तुम..जिन्न...हो?” मेड को ऐसा महसूस हुआ, जैसे किसी ने उसकी शक्ति निचोड़ ली हो। उसके हाथ-पाँव थरथराने लगे।

“बहुत कम होता है ऐसा, जब अल्लाह के बनाये हुए दो सबसे होशियार, काबिल और नायाब मखलूक एक-दूसरे से रूबरू होते हैं। फिजाएं खामोश हो जाती हैं, वक्त ठहर जाता है और खुदा भी आसमान से झुककर इस नजारे का दीदार करने लगता है।”

“तुम किस मकसद से हमारी दुनिया में आयी हो?” मेड, तबस्सुम को सीने से लगाये हुए पीछे खिसकने लगी।

“तुम जानती हो हसीना बानो कि ऐसा क्या है, जिसे तुम इंसान और हम जिन्न एक जैसा ही महसूस करते हैं?” हसीना खामोश रही तो जेनी [1] ने स्वयं जवाब दिया- “जज्बात। ये हम दोनों एक जैसा महसूस करते हैं। रिश्ते हमारी दुनिया में भी होते हैं और हम उन्हें निभाने का जज्बा भी रखते हैं। हम जब मोहब्बत करते हैं तो तुम इंसानों की तरह ही टूटकर करते हैं और कभी-कभी हमारी ये मोहब्बत तो कायनात के उसूलों को भी तोड़ देती है। हम कुदरत से भी बगावत कर बैठते हैं।” उस मखलूक ने क्षणिक अंतराल के बाद बड़े ही सर्द लहजे में कहा- “ऐसी ही एक बगावत हमने भी की है।”

“कैसी बगावत?”

“एक ऐसी बगावत...।” इस बार जेनी का लहजा और भी सर्द हो गया- “जिसके एवज में एक बड़ी जिम्मेदारी हमारे मुकद्दर का हिस्सा बन गयी।”

“कौन...कौन...सी जिम्मेदारी?”

हसीना के सवाल पर जेनी की भाव-भंगिमाओं में अप्रत्याशित परिवर्तन हुआ। उसके चेहरे पर मौजूद कठोर भाव शनै:-शनै: करुण भावों में तब्दील हो गये। हसीना को लगा कि वह उसके सवाल का जवाब देगी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

“इतनी मामूली नहीं है हमारी कहानी कि तुम्हारे चंद सवालों के जवाब में महज कुछ लफ्जों में बयाँ कर दिया जाए। अँधेरी दुनिया की न जाने कितनी काली दास्तानें हमने हमारे बालों और भौंहों की सफ़ेदी के पीछे छिपा रखी है।”

“तो अब क्या चाहती हो तुम?” हसीना ने पूछा।

“एक नयी पहचान, ताकि तुम इंसानों की दुनिया में चैन से रहते हुए हम अपने माँ होने का फर्ज निभा सकें। फिज़ा के रूप में हम यही कर रहे थे लेकिन अब इस पहचान में छिपना हमारे लिए मुश्किल है क्योंकि कई लोग हमारे राज़ तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं। हमें अब एक नये पहचान की जरूरत है, और हम जानते हैं कि वह पहचान हमें कहाँ मिलेगी।”

जेनी ने फिर से फिज़ा की शक्ल अख्तियार की और इससे पहले कि हसीना कुछ कह पाती, वह ड्राइंग हॉल से बाहर निकल गयी। उसके जाने के बाद हसीना ने लगभग बेहोश हो चुकी तबस्सुम को सोफ़े पर लिटाया और सेंटर टेबल पर रखे राइटिंग पैड के पन्ने पलटकर उस फोन नंबर तक पहुँची, जो फाह्याज़ लिखकर गया था। उसे अब भी ये यकीन करने में मुश्किलें पेश आ रही थीं कि वह साल भर से एक जिन्न के साथ थी। एक ऐसे प्राणी के साथ थी, जिसका जिक्र उसने केवल किस्से-कहानियों में सुना था। और जो अब हमेशा के लिए जा चुकी थी, शायद।