हिटलर बना फ्यूहरर

बागियों का सफाया करने की रात के बाद हिटलर और जर्मनी में पूर्ण सत्ता के बीच अब कोई दीवार नहीं थी—उस 87 वर्षीय वृद्ध राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडेनबर्ग के सिवा, जो पूर्व प्रशिया में अपनी देहाती जागीर में पड़ा मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था।

हिटलर के लिए हिंडेनबर्ग की मृत्यु का इससे बेहतर संयोग और क्या हो सकता था। हाल ही में उसने उपद्रवी, भूरी कमीजवाले सैनिकों की कमर तोड़ी थी और सेना के जनरल स्टाफ का समर्थन पक्का कर लिया था। अब उसे सिर्फ इस सवाल को सुलझाना था कि राष्ट्रपति के रूप में हिंडेनबर्ग की जगह कौन लेगा!

हिटलर ने बेशक तय कर लिया था कि हिंडेनबर्ग के बाद वह राष्ट्रपति नहीं, बल्कि जर्मनी के लोगों का फ्यूहरर (सर्वोच्च नेता) बनेगा। हालाँकि नाज़ी पार्टी के सदस्य उसे पहले ही फ्यूहरर कहने लगे थे और जर्मनी की प्रजा में भी वह इसी रूप में लोकप्रिय हो चुका था, लेकिन हिटलर की वास्तविक सरकारी पदवी सिर्फ जर्मनी के राइक चांसलर की थी।

लेकिन जर्मनी में अभी भी कुछ पुराने प्रभावशाली रूढ़िवादी थे, जो हिंडेनबर्ग की मृत्यु के बाद राजतंत्र वापस आने या किसी रूप में गैर-नाज़ी राष्ट्रवादी सरकार की आशा लगाए हुए थे। हालाँकि उन्हें लोकतंत्र पसंद नहीं था, लेकिन हिटलर शासन के अत्याचारों से भी उन्हें नफरत थी। ये उन 1,800 गर्वीले लोगों में से थे, जिनका पालन-पोषण, पढ़ाई-लिखाई राजकुमारों तथा बादशाहों के दिनों में हुई थी और वे प्राचीन संस्कारों से बँधे हुए थे। उन्हें पता था कि उनकी प्रिय पितृभूमि अब हिमलर तथा हेड्रिक जैसे खूनी कट्टरपंथियों के हाथों में है, जो अपने पुराने रीति-रिवाजों एवं मान्यताओं की जरा भी परवाह नहीं करते।

उन रूढ़िवादियों (कंजर्वेटिव) में एक था फ्रांज वॉन पपेन, जर्मनी का वाइस चांसलर, जो राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग का विश्‍वासपात्र था। लंबे चाकुओं की रात से पहले ही हिंडेनबर्ग ने नाज़ियों के बारे में यह टिप्पणी की थी, ‘‘पपेन, हालात बहुत बिगड़ रहे हैं। सोचो, तुम क्या कर सकते हो!’’ लेकिन पपेन अपनी जान बचाकर निकल भागने के सिवा कुछ नहीं कर पाया।

पपेन ने एक दाँव अभी बचाकर रखा हुआ था। पिछले दिनों अप्रैल 1934 में, उसने हिंडेनबर्ग को अपनी वसीयत में यह घोषणा करने के लिए लगभग राजी कर लिया था कि उसकी मृत्यु के बाद जर्मनी में फिर संवैधानिक राजतंत्र कायम होना चाहिए। हिंडेनबर्ग पहले तो इस बात को अपनी वसीयत में शामिल करने के लिए मान गया, लेकिन फिर उसने अपना विचार बदल दिया और उस बात को उसने हिटलर को संबोधित एक पत्र में लिख दिया, जो उसकी मृत्यु के बाद हिटलर को दिया जाना था।

फिर भी, उस समय राजतंत्र वापस लाने का विचार हिटलर और उसके समर्थकों की दृष्टि में एक मजाक से ज्यादा कुछ नहीं था। नाज़ी राइचस्टैग पूरी तरह हिटलर की जेब में था और वह ऐसी किसी भी घटना को रोकने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सकता था। अत: उसने एक ऐसे कानून का मसौदा तैयार करा दिया, जिसके अंतर्गत राष्ट्रपति का पद समाप्त कर दिया गया और स्वयं हिटलर को फ्यूहरर घोषित कर दिया गया।

2 अगस्त, 1934 को सुबह करीब 9 बजे आखिकार राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग सदा की नींद सो गए। राष्ट्रपति की मृत्यु का समाचार मिलने के कुछ घंटों के अंदर ही नाज़ी राइचस्टैग (नाज़ी लोकसभा) ने एक दिन पहले की तारीख, यानी 1 अगस्त का यह कानून घोषित कर दिया—

जर्मन सरकार ने निम्‍नलिखित कानून बनाया है, जिसे एतद् द्वारा लागू किया जाता है—

धारा-1—राइक अर्थात् जर्मन साम्राज्य के राष्ट्रपति का पद अब जर्मन चांसलर के पद में शामिल रहेगा। इसके फलस्वरूप जर्मन राज्य के राष्ट्रपति के वर्तमान अधिकार फ्यूहरर और राइक चांसलर एडोल्फ हिटलर को अंतरित हो जाएँगे। अपने डिप्टी का चयन वही करेगा।

धारा-2—यह कानून जर्मनी के राष्ट्रपति वान हिंडेनबर्ग की मृत्यु के समय से ही लागू माना जाएगा।

तकनीकी दृष्टि से यह कानून अवैध था, क्योंकि इसने जर्मन संविधान में राष्ट्रपति के उत्तराधिकार संबंधी उपबंधों का उल्लंघन किया था। लेकिन अब उसका कोई महत्त्व नहीं रह गया था। किसी ने भी कोई आपत्ति नहीं उठाई। हिटलर स्वयं कानून बन गया।

नए फ्यूहरर कानून की घोषणा होने के तत्काल बाद जर्मन ऑफिसर कोर और जर्मन सेना में प्रत्येक सैनिक को निष्ठा की एक बिलकुल नई शपथ दिलाई गई—

‘‘मैं ईश्‍वर का नाम लेकर यह पवित्र शपथ लेता हूँ—मैं जर्मन साम्राज्य और जर्मनी की प्रजा के फ्यूहरर, सशस्त्र सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर एडोल्फ हिटलर के प्रति बिना शर्त आज्ञाकारी रहूँगा और एक वीर सैनिक के रूप में किसी भी समय इस शपथ का मान रखने के लिए अपना जीवन संकट में डालने के लिए तैयार रहूँगा।’’

यह अभूतपूर्व शपथ वैयक्तिक रूप से हिटलर के प्रति थी, जर्मन राज्य या संविधान के प्रति नहीं, जैसा कि सेना की पिछली शपथ में होता था। हिटलर के प्रति आज्ञाकारी होने का मतलब था कि सैनिक सम्मान संहिता के अनुसार सभी वरदीधारियों के लिए उसकी आज्ञा का पालन करना उनका पावन कर्तव्य होगा। इस तरह जर्मन सेना को फ्यूहरर का निजी हथियार बना दिया गया।

हिंडेनबर्ग की अंत्येष्टि के बाद नाज़ियों ने राष्ट्रव्यापी जनमत-संग्रह की योजना बनाई, ताकि जर्मनी के लोग फ्यूहरर के नए अधिकारों के संबंध में अपनी स्वीकृति व्यक्त कर सकें और इस तरह दुनिया की नजर में हिटलर की पद प्रतिष्ठा पर न्यायोचित होने का ठप्पा लग जाए।

इसी बीच में हिंडेनबर्ग की अंतिम इच्छा और वसीयत प्रकाश में आ गई, जो पपेन ने हिटलर को सौंपी थी। संबंधित दस्तावेजों में हिंडेनबर्ग द्वारा हिटलर को संबोधित वह पत्र भी था, जिसमें सम्राट् का राजतंत्र पुन: कायम करने का सुझाव दिया गया था। हिटलर ने उस संदेश को अनदेखा कर दिया और वह पत्र नष्ट कर दिया, जैसे कि वह संदेश कभी प्रकाशित ही नहीं हुआ या कभी वह पत्र मिला ही नहीं। पत्र में क्या लिखा था, इसका खुलासा युद्ध के बाद पपेन ने किया।

नाज़ियों ने हिंडेनबर्ग की तथाकथित राजनीतिक वसीयत प्रकाशित की, जिसमें उसने पितृभूमि की सेवा में बिताए वर्षों का लेखा-जोखा दिया था और हिटलर के बारे में प्रशंसा एवं शुभकामनाओं के कुछ शब्द लिखे थे। वह वसीयतनामा शायद नाज़ी जालसाजी थी और उसका प्रयोग बड़ी कुशलता से आगामी जनमत-संग्रह में हिटलर के लिए अधिक-से-अधिक ‘सकारात्मक’ समर्थन प्राप्त करने हेतु व्यापक प्रचार अभियान का हिस्सा बनाकर किया जा रहा था।

19 अगस्त को जर्मनी में मतदाता सूची में दर्ज लगभग 95 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान में भाग लिया और हिटलर को 3.8 करोड़ ‘सकारात्मक’ (कुल वोटों का 90 प्रतिशत) वोट मिले। अब हिटलर दावा कर सकता था कि वह जर्मन राष्ट्र का फ्यूहरर है, क्योंकि उसे लोगों से भारी बहुमत प्राप्त हुआ है।

अगले दिन, 20 अगस्त को, जर्मनी में सभी सरकारी पदाधिकारियों के लिए वफादारी की अनिवार्य शपथ का शुभारंभ किया गया, जो इस प्रकार थी—

‘‘मैं वचन देता हूँ—मैं जर्मन राज्य और जर्मनी की प्रजा के फ्यूहरर एडोल्फ हिटलर के प्रति निष्ठावान् एवं आज्ञाकारी रहूँगा, कानूनों का आदर करूँगा और अपने औपचारिक कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करूँगा। ईश्‍वर मेरी मदद करना।’’

हिटलर ने अंतत: जर्मनी में पूरी सत्ता हासिल कर ली।

दो सप्ताह बाद न्यूरेंबर्ग में वार्षिक नाज़ी रैली के दौरान फ्यूहरर की महान् घोषणा पढ़कर सुनाई गई—‘‘अगले हजार साल के लिए जर्मनी का जीवन-स्वरूप निश्‍चित रूप से निर्धारित हो चुका है। उन्नीसवीं सदी के ‘निर्भीक युग’ की शुरुआत हमसे हुई। अगले हजार वर्ष तक जर्मनी में कोई क्रांति नहीं होगी।’’

रैली से पहले हिटलर ने एक उदीयमान फिल्म निर्देशक लेनी राइफेंस्टॉल को बुलाया और उससे सप्ताह भर चलनेवाले कार्यक्रम की फिल्म बनाने के लिए कहा। सन् 1934 की न्यूरेंबर्ग रैली की जो फिल्म उसने बनाई, उसका नाम खुद हिटलर ने चुनकर रखा, ‘इच्छा-शक्ति की विजय’ (ट्राइअम्फ ऑफ द विल) और इस फिल्म ने अब तक के सबसे प्रभावशाली प्रचार विवरण के रूप में अपनी धाक जमा दी।

न्यूरेंबर्ग कानून

सन् 1933 में नाज़ियों ने सत्ता में आने के क्षण से ही जर्मनी के यहूदियों का उत्पीड़न करने के उद्देश्य से अनेक भेदमूलक कानूनों की झड़ी लगा दी। हिटलर के बारह वर्ष के शासन के दौरान यहूदियों के विरुद्ध 400 से अधिक नियम-कानून जारी किए गए, जिनके अंतर्गत उनपर हर तरह के प्रतिबंध थोप दिए गए। यहाँ तक कि वे न तो सिंफनी ऑर्केस्ट्रा में शामिल हो सकते थे और न ही बिल्ली पाल सकते थे।

राइक अर्थात् जर्मन साम्राज्य के आरंभिक वर्षों में यहूदी-विरोधी नियम-कानून एक नाज़ी अधिकारी तंत्र द्वारा बनाए गए थे, जिसमें उग्र सुधारवादी और संयमी दोनों तरह के सामीवाद-विरोधी थे। किसी भी अधिकारी को सामीवाद-विरोधी बनने में कोई नैतिक पाप नहीं दिखता था। तथापि संयमशील अधिकारियों को विदेशी प्रतिक्रिया और जर्मनी की अभी भी नाजुक अर्थव्यवस्था पर यहूदी-विरोधी निषेधाज्ञाओं से पड़ सकनेवाले विघटनकारी प्रभाव की चिंता थी।

वर्ष 1933 में जर्मनी में रह रहे 5,03,000 यहूदियों में से करीब 70 प्रतिशत बड़े नगरों में रहते थे, जैसे कि बर्लिन, फ्रैंकफर्ट और ब्रेसनाक में। उन नगरों में बहुत से युवा यहूदियों ने गैर-यहूदी जर्मन परिवारों में विवाह किया था।

हालाँकि यहूदियों की जनसंख्या उस समय जर्मनी की कुल 5.5 करोड़ आबादी के 1 प्रतिशत से भी कम थी, फिर भी हिटलर उन्हें स्वभाव से ही जर्मन लोगों का ‘घातक शत्रु’ मानता था। लेकिन हिटलर का सामीवाद-विरोधी अधिकारी वर्ग, चाहे उग्र सुधारवादी हो या संयमशील, इस बात से पूरी तरह असहमत था कि यहूदियों के विरुद्ध वास्तव में कौन सी कानूनी (या गैर-कानूनी) काररवाई की जानी चाहिए। अधिकारी वर्ग के अंतर्विरोध के कारण एक समन्वित सामीवाद-विरोधी नीति बनाने के कार्य में गतिरोध उत्पन्न हो गया।

अधिकारियों के गड़बड़-घोटाले से तंग आकर स्थानीय भूरी कमीजवाले गुंडों ने अकसर अपने आस-पड़ोस में स्थानीय यहूदियों पर अपना गुस्सा निकालना शुरू कर दिया और मध्य 1935 तक बाजारू घटनाओं की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हो गई।

साधारण नागरिकों ने भी गॉबेल्स के सामीवाद-विरोधी प्रचार से कुछ उत्साहित होकर अनायास प्रदर्शनों में भाग लेना शुरू कर दिया।

बकेरियाई राजनीतिक पुलिस ने वर्ष 1935 के ग्रीष्मकाल में एक ऐसी ही घटना का विवरण दर्ज किया—

‘‘...हाइजेंब्रूकेन में स्विमिंग पूल में यहूदी-विरोधी प्रदर्शन हुए। लगभग 15-20 युवा स्नानकर्ताओं ने स्नानागार से लगे पार्क में नारेबाजी करके तरणताल से यहूदियों को निकाल बाहर करने की माँग की।...बहुत से अन्य नहानेवालों ने भी उनके सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया, जिससे ऐसा लगा कि शायद वहाँ आनेवाले अधिकतर लोग भी यहूदियों को हटाने की माँग कर रहे हैं।... नाज़ी पार्टी का जिला नेता, जो तरणताल में नहा रहा था, पूल सुपरवाइजर के पास गया और माँग की कि यहूदियों को वहाँ से हटा दिया जाए। सुपरवाइजर ने इस आधार पर इनकार कर दिया कि उसके लिए सिर्फ स्नानागार प्रशासन के अनुदेशों का पालन करना अनिवार्य है और एक बात यह है कि कौन यहूदी है, कौन नहीं, इसका भेद करना आसान नहीं है। सुपरवाइजर के इनकार के फलस्वरूप उसके और जिला प्रतिनिधि के बीच कुछ कहा-सुनी हो गई। इस घटना के मद्देनजर स्पा एसोसिएशन ने आज स्नानागार के प्रवेश-द्वार पर एक नोटिस लगा दिया, जिस पर लिखा—‘यहूदियों का अंदर आना मना है।’

डिप्टी फ्यूहरर रुडोल्फ हैस ने सहज यहूदी-विरोधी काररवाइयों को रोक देने का आदेश दे दिया—यहूदियों का लिहाज करके नहीं, बल्कि यह सोचकर कि ‘‘...पार्टी सदस्य राजनीतिक पुलिस से न झगड़ें, जिसमें अधिकतर पार्टी सदस्य हैं और यहूदी समुदाय पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा। ऐसे मामलों में राजनीतिक पुलिस शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी उपायों पर अमल करने में फ्यूहरर के कड़े अनुदेशों का केवल पालन कर सकती है, ताकि फ्यूहरर के लिए यह संभव हो कि यहूदियों पर अत्याचार किए जाने और उनका बहिष्कार किए जाने के जो आरोप विदेशों में लग रहे हैं, वह उनकी भर्त्सना कर सके।’’

वर्ष 1935 के ग्रीष्मकाल के अंतिम दिनों में बाजारू हिंसा और प्रदर्शनों में बहुत कमी हो गई थी। लेकिन अधिकारियों के मतभेद बढ़ गए और न्यूरेंबर्ग रैली में तो वे खुलकर सामने आ गए।

9 से 15 सितंबर तक आयोजित वार्षिक रैली में आखिरी दिन नाज़ी राइचस्टैग का एक विशेष सत्र रखा गया था, जिसमें हिटलर को राष्ट्र संघ (लीग ऑफ नेशंस) और फासिस्ट इटली के बारे में एक बड़ी विदेशी नीति की घोषणा करनी थी। लेकिन हिटलर ने अपने विदेश मंत्री कांस्तेंटिनवॉन न्यूरथ की सलाह पर अल्प-सूचना पर, भाषण देने का कार्यक्रम रद्द कर दिया।

भाषण देने का कार्यक्रम अचानक रद्द किए जाने से यह सवाल उत्पन्न हुआ कि राइचस्टैग अपने विशेष न्यूरेंबर्ग सत्र के दौरान क्या करेगा। न्यूरेंबर्ग में उग्र, सुधारवादी सामीवाद-विरोधियों ने मौका लपक लिया अैर हिटलर को सुझाव दिया कि इस विशेष सत्र में यहूदियों से संबंधित किसी बड़े नए कानून की घोषणा करने का यह सबसे अच्छा अवसर है।

हिटलर ने उनका सुझाव मान लिया और एक ऐसा कानून बनाने का विचार उसे सूझा, जिसके अंतर्गत यहूदियों और जर्मन लोगों के बीच अंतर-विवाह तथा यौन संबंधों की मनाही हो। उग्र सुधारवादी कुछ समय से यही चाह रहे थे। 14 सितंबर को, यानी राइचस्टैग के विशेष सत्र से पहले की रात, नाज़ी विधिवेत्ताओं ने नए कानून के चार मसौदे हिटलर को पेश किए। हिटलर ने चौथा संस्करण चुना, जो कम-से-कम विवादास्पद था, हालाँकि उसने एक महत्त्वपूर्ण पंक्ति उसमें से काट दी, जो इस प्रकार थी—‘यह कानून केवल ओजस्वी एवं शक्तिशाली यहूदियों पर लागू होगा।’ आधी रात के समय हिटलर ने उन विधिक पदाधिकारियों से कहा कि उसे राइक अर्थात् जर्मन नागरिकता के बारे में भी एक कानून चाहिए। पदाधिकारियों ने होटल की व्यंजन-सूची (फूड मीनू) के पीछे झटपट लिख-लिखाकर अस्पष्ट शब्दावली में एक कानून का प्रारूप तैयार कर दिया, जिसमें यहूदियों को जर्मन नागरिक बताया गया। हिटलर ने रात को 2.30 बजे उस मसौदे को मंजूरी दे दी।

अगले दिन रात 8 बजे राइचस्टैग के विशेष सत्र में हिटलर ने एक छोटा सा भाषण दिया, जिसमें उसने नए कानूनों को एक ऐसा प्रयास बतलाया, जिसके जरिए ‘किसी भी समस्या का वैधानिक नियमन किया जा सकेगा और यदि वह प्रयास दुबारा विफल हो जाता है तो अंतिम समाधान के लिए वह समस्या कानून के माध्यम से राष्ट्रीय समाजवादी पार्टी के पास भेज दी जाएगी।’

न्यूरेंबर्ग कानूनों की घोषणा से नाज़ी अधिकारी वर्ग में इस बात को लेकर अप्रत्याशित रूप से अत्यधिक भ्रम पैदा हो गया और गरमागरम बहस छिड़ गई कि एक यहूदी को किस तरह परिभाषित किया जाए, जबकि वस्तु-स्थिति यह थी कि उस समय तक यहूदियों एवं जर्मनों के बीच बड़े पैमाने पर अंतर-विवाह हो चुके थे।

इसके परिणामस्वरूप दो माह बाद एक अनुपूरक नाज़ी आदेश जारी किया गया, जिसमें एक ‘पूर्ण यहूदी’ की व्याख्या उस व्यक्ति के रूप में की गई, जिसके कम-से-कम तीन यहूदी दादा-दादी या नाना-नानी हों। जिनके तीन दादा-दादी या नाना-नानी (ग्रांड पैरेंट्स) से कम हों, उन्हें वर्णसंकर अर्थात् दोगला माना जाएगा।

फिर भी बहुत भ्रांति बनी रही। बहुत से मामलों में यहूदी परिवार की पृष्ठभूमि के बारे में वंश-विषयक प्रमाण ही मौजूद नहीं थे, जो बहुत जरूरी होते हैं। नतीजा यह सामने आया कि 3,50,000 जर्मन लोगों को वर्णसंकर श्रेणी में रखा जा सकता है। 50,000 ने यहूदी धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लिया है, 2,10,000 आधे यहूदी हैं और 80,000 को एक-चौथाई यहूदी माना जा सकता है।

आश्‍चर्य की बात है, अनेक जर्मन यहूदियों को न्यूरेंबर्ग कानूनों की घोषणा से राहत महसूस हुई। वे सोच रहे थे बुरे-से-बुरा समय बीत चुका है और अंतत: उन्हें इतना तो पता चल ही गया कि उनकी क्या स्थिति है तथा यह भी कि भले ही उनके अधिकार कम हो गए हों, वे अब अपना जीवन वर्तमान हालात के अनुसार जी सकते हैं। कुछ हद तक वे ठीक भी थे। अगले कुछ वर्षों के दौरान नाज़ियों ने यहूदियों के संबंध में सोच-सोचकर और मंद गति से कदम उठाए। तीसरे राइक में यहूदियों के लिए यह शांतिपूर्ण समय था, क्योंकि तब हिटलर का ध्यान पूरी तरह राजनयिक कार्यकलापों तथा सैनिक सुदृढ़ीकरण पर लगा हुआ था।

राजनयिक हलकों में हिटलर विश्‍वसनीयता प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रहा था। पिछले कुछ वर्षों में नाज़ी जर्मनी में अंतरराष्ट्रीय प्रेक्षकों ने अविश्‍वसनीय घटनाओं को अपनी आँखों से देखा था, जिनमें ये घटनाएँ शामिल थीं—जनवरी 1933 में क्रांतिकारी ढंग से सत्ता हथियाना, फरवरी में राइचस्टैग भवन में रहस्यपूर्ण तरीके से आग लगना, अप्रैल में यहूदी-विरोधी बहिष्कार, मई में किताबों की होली जलाना, भूरी कमीजवालों द्वारा सड़कों पर वहशी हिंसा, नजरबंदी शिविरों के बारे में अफवाहों का सुना जाना, पहले से बदनाम जेस्टेपो की जानकारी मिलना, जून 1934 के खूनी खेल का साक्षी होना और हिटलर का फ्यूहरर के रूप में सम्राट्-सा राज्यारोहण।

नाज़ियों के लिए यहूदियों के विरुद्ध आगे कोई भी ऐसी काररवाई करने से कदम पीछे हटाना जरूरी था, जिससे दुनिया की नजर में हिटलर की विश्‍वसनीयता को झटका लगने की आशंका हो। फ्यूहरर को दुनिया के सामने ऐसी छवि पेश करनी थी, जिसे गंभीरता से लिया जाए, न कि किसी सामीवाद-विरोधी हुजूम का नेता माना जाए।

यहूदियों को बाद में देख लिया जाएगा। फिलहाल हिटलर के सामने दो लक्ष्य थे—जर्मन सेना को दुबारा खड़ा करना और जर्मन साम्राज्य (राइक) का विस्तार करने के अवसरों का लाभ उठाना। वर्ष 1936 के आरंभ में उसने एक खतरनाक जुआ खेलने का निश्‍चय किया और अपने सैनिकों को जर्मनी के विसैन्यीकृत क्षेत्र (अर्थात् वह इलाका, जहाँ से सेना हटा ली गई हो) राइनलैंड को कूच करने के लिए भेज दिया। नाज़ियों द्वारा जबरन कब्जे में लिया गया यह सबसे पहला प्रदेश था।

नाज़ियों का राइनलैंड को कूच करना

दक्षिण-पूर्व बवेरिया में बर्शतिस्गडेन शहर के बहुत ऊपर एडोल्फ हिटलर ने पहाड़ों पर घंटों एकांत में बिताए। जहाँ वह ठहरा था, वहाँ से आल्यूस पहाड़ की चोटियों और नीचे घाटी का सुंदर दृश्य नजर आता था। हिटलर ने इसी स्थान पर रहकर जर्मनी के भविष्य के बारे में चिंतन किया और सभी बड़े निर्णय लिये।

कभी-कभी वह सप्ताहों या महीनों तक भी सोच-विचार करता रहता था। लेकिन, जब वह कोई अंतिम निर्णय कर लेता था तो उस पर अटल रहता था और फिर कोई भी उसे अपना फैसला बदलने के लिए राजी नहीं कर सकता था।

15 मार्च, 1935 को हिटलर अपने पहाड़ी विश्राम-स्थल से चल पड़ा और वापस बर्लिन आ गया। उसने तत्काल मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई और सेना के जनरल स्टाफ सदस्यों को भी उपस्थित होने के लिए कहा। फिर उसने एक बड़े निर्णय की घोषणा की। उसने कहा कि जर्मनी वर्सेलिस संधि द्वारा लगाए गए सैनिक प्रतिबंधों को तोड़ देगा और अपना पुन:शस्त्रीकरण करेगा।

सभा-भवन में मौजूद किसी भी व्यक्ति ने कोई आपत्ति नहीं की, न ही किसी ने कोई चिंता जताई। उस घोषणा के बाद नाज़ी विधिक पदाधिकारियों ने तुरंत आवश्यक कानूनों का प्रारूप तैयार करने का काम शुरू कर दिया; जबकि प्रचार मंत्री जोसेफ गॉबेल्स ने हिटलर के साथ बैठकर उन वास्तविक घोषणाओं को कागज पर उतारा, जिन्हें नाज़ी पार्टी सदस्यों एवं जर्मन जनता को पढ़कर सुनाया जाना था।

शनिवार, 16 मार्च को कैबिनेट व सेनापतियों की एक और बैठक हुई, जिसमें उन्होंने हिटलर के मुँह से उन घोषणाओं को सुना और सुनने के बाद वहाँ मौजूद सभी लोगों ने फ्यूहरर के लिए हार्दिक शुभकामनाओं के रूप में ‘तीन बार जयघोष’ किया। तत्पश्‍चात् गॉबेल्स ने जल्दी से बुलाए गए प्रेस सम्मेलन में विश्‍व की जानकारी के लिए उन घोषणाओं का खुलासा किया।

पत्रकारों को बताया गया कि फ्यूहरर ने यह निर्णय किया है कि जर्मनी में सेना में अनिवार्य भरती पुन: शुरू की जाएगी और नई सेना में 36 नए डिवीजन होंगे, जिनमें कुल सैनिकों की संख्या 5,50,000 होगी।

यह घोषणा वास्तव में जर्मनी द्वारा सन् 1919 में प्रथम विश्‍व युद्ध में उसकी हार के बाद हस्ताक्षरित वर्सेलिस संधि के भाग पाँच का खुला उल्लंघन था। संधि को भंग करने का मतलब था जर्मनी के प्रथम विश्‍व युद्ध पूर्व शत्रुओं फ्रांस और इंग्लैंड को लज्जित करना।

हर कोई यह जानने के लिए उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा था कि इस खबर को सुनकर उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी। हिटलर के कुछ चौकस सेनानायकों ने सोचा कि फ्रांस शायद तत्काल सैनिक आक्रमण कर दे। लेकिन, राजनयिक स्तर पर कुछ विरोध जताए जाने के अलावा कुछ भी नहीं हुआ।

जर्मनी के पुराने शत्रुओं के विरुद्ध हिटलर के जीवन की यह पहली बाजी थी और वह जीत गया। वह जानता था कि फ्रांस में गंभीर राजनीतिक मतभेद चल रहे हैं और इंग्लैंड आर्थिक मंदी की जकड़ में है। उसने यह दाँव लगाया कि उन दोनों देशों में जो आंतरिक समस्याएँ चल रही हैं, उनके कारण वे फौजी काररवाई करने का साहस नहीं कर पाएँगे और उसकी यह सोच सच साबित हुई।

लेकिन फिर भी हिटलर ने सोचा कि विश्‍व के लोकतांत्रिक देशों एवं जर्मनी के नजदीकी पड़ोसियों के जख्मों पर मरहम लगाना जरूरी है। अनिवार्य भरती की घोषणा के दो माह बाद, 21 मई को, वह बर्लिन में राइचस्टैग के समक्ष पेश हुआ और एक मैत्रीपूर्ण भाषण दिया—‘‘जर्मनी शांति चाहता है।... हममें से कोई भी किसी को धमकी देना नहीं चाहता।’’ हिटलर ने घोषित किया। फिर उसने एक तेरह सूत्री शांति-कार्यक्रम पढ़कर सुनाया, जिसमें सभी तरह के वादे थे, जैसे कि—जर्मनी वर्सेलिस संधि की सभी अन्य शर्तों का सम्मान करेगा, जिनमें राइनलैंड से सेना हटाना भी शामिल है। जर्मनी यूरोप में शांति की रक्षा हेतु सामूहिक व्यवस्था में सहयोग के लिए तैयार है और जर्मन सरकार अपने पड़ोसी देशों के साथ अनाक्रमण संधियों को पूरा कराने के लिए सिद्धांत रूप में तैयार है।

इस तरह हिटलर का शस्त्र-संकोची पाश्‍चात्य लोकतांत्रिक देशों के साथ कूटनीति करने का तरीका कामयाब हो गया। उसकी मौलिक शब्दाडंबरपूर्ण घोषणाएँ सामान्यत: शनिवार को हुआ करती थीं, ताकि अन्य सरकारों को पहले कुछ सोचने का भी मौका न मिले और वे चकित रह जाएँ। ऐसा किसी चलती काररवाई के बीच या असलियत सामने आने के बाद होता था और फिर एक समझौताकारी भाषण दिया जाता था, जिसमें आश्‍वस्त करनेवाले वादे होते थे।

हिटलर की चालों के बीच काफी समय-अंतराल होता था, जिसके दौरान वह बर्शतिस्गडेन वापस चला जाता और अपनी अगली चाल के बारे में सोच-विचार करता रहता, जैसे कोई शतरंज खिलाड़ी सभी संभावित परिणामों पर विचार करके अपनी चाल चलता है।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के खेल में हिटलर ने अगला कदम उठाने में एक वर्ष लगा दिया और यह उसके संपूर्ण जीवन का सबसे बड़ा जोखिम था। शनिवार, 7 मार्च, 1936 की सुबह जर्मन सेना की तीन बटालियनें राइन नदी पर बने पुलों को पार करके जर्मनी के औद्योगिक केंद्र राइनलैंड में प्रवेश कर गईं। इस विसैन्यीकृत क्षेत्र में राइन नदी के पश्‍चिमी भाग से लेकर फ्रांस की सीमा तक का इलाका और नदी का पूर्वी भाग भी आता था, जिसमें कोलोन, डसेलडोर्फ तथा बॉन नगर शामिल थे।

उसी दिन सुबह 10 बजे हिटलर के विदेश मंत्री कांस्तेंतिन वॉन न्यूरथ ने फ्रांस, ब्रिटेन एवं इटली के राजदूतों को बुलाया और उन्हें एक लंबा ज्ञापन थमा दिया, जिसमें कहा गया था कि जर्मन सरकार ने ‘...राइनलैंड के विसैन्यीकृत भूभाग में राइक (जर्मन साम्राज्य) की पूर्ण एवं अबाधित प्रभुसत्ता बहाल कर दी है।’

वर्सेलिस संधि का यह एक और घोर उल्लंघन था।

दोपहर के समय हिटलर तुरत-फुरत बुलाई गई राइचस्टैग की बैठक के सामने प्रस्तुत हुआ। उस समय उसके साथ कई घबराए हुए-से जनरल थे। राइचस्टैग के 600 सदस्यों को कुछ भी पता नहीं था कि क्या हो रहा है। हिटलर ने जैसे ही उन्हें बताया कि जर्मन सैनिक राइनलैंड को कूच कर गए हैं, वे फ्यूहरर की जय-जयकार के नारों के बीच खुशी से उछल पड़े।

जब वे शांत-संयत हुए हिटलर ने सत्यभाव से उन्हें वचन दिया—‘‘पहले हम यह शपथ उठाते हैं कि हम अपने लोगों का सम्मान पुन: प्राप्त करने के लिए किसी ताकत के आगे नहीं झुकेंगे, बल्कि हार स्वीकार करने के बजाय सम्मान के साथ कठोर-से-कठोर मुसीबतों का सामना करेंगे। दूसरे, हम यह शपथ लेते हैं कि अब हम यूरोप के लोगों के बीच समझौता कराने के लिए पहले से कहीं अधिक प्रयास करेंगे, विशेषकर अपने पश्‍चिमी पड़ोसी राष्ट्रों के साथ किसी समझौते पर पहुँचने के लिए।...यूरोप में हमारी कोई प्रादेशिक माँग नहीं है। जर्मनी कभी शांति भंग नहीं करेगा।’’

एक बार फिर सारे विश्‍व को यह जानने की उत्सुकता थी कि फ्रांस और ब्रिटेन की प्रतिक्रिया क्या होगी। राइनलैंड में प्रवेश करनेवाले जर्मन सैनिकों को ये आदेश भी दिए गए थे कि यदि फ्रांस की फौज आक्रमण करे तो वे राइन नदी का पुल पार कर तुरंत वापस आ जाएँ। लेकिन फ्रांस में राजनीतिज्ञ अपने सेनापतियों को काररवाई करने के लिए राजी नहीं कर सके और वे सैनिक काररवाई के ब्रिटिश सहायता एवं समर्थन प्राप्त करने में भी असमर्थ रहे। अत: उन्होंने कुछ नहीं किया। फ्रांस की फौज अपने एक सौ डिवीजन के साथ टस से मस नहीं हुई, उस समय भी, जब हलके-फुलके हथियारों से लैस जर्मन सैनिकों ने राइनलैंड पर कब्जा जमा किया। हालाँकि फ्रांस और ब्रिटेन दोनों का वर्सेलिस संधि तथा परस्पर सहायता के लोकार्नो समझौते के अनुसार विसैन्यीकृत क्षेत्र की रक्षा करने का दायित्व था।

हिटलर के लिए एक बहुत बड़ा जुआ था, ऐसा जुआ जिसमें उसका सबकुछ जा सकता था, अगर पुराने शत्रुओं ने उसके सैनिकों को धूल चटा दी होती। बाद में हिटलर ने निजी तौर पर कबूल किया, ‘‘राइनलैंड में कूच करने के 48 घंटों का समय मेरे जीवन में अत्यंत कष्टप्रद समय था। यदि फ्रांस की फौज राइनलैंड में कूच कर गई होती तो हमें अपनी दुम दबाकर वहाँ से लौटना पड़ता; क्योंकि हमारे पास इतने भी सैन्य साधन नहीं थे कि हम एक मध्यम दर्जे के हमले का भी सामना कर पाते।’’

राइनलैंड में जब जर्मन सैनिक स्वस्तिक ध्वज के तले आगे बढ़ रहे थे, जर्मन पादरियों ने उन पर आशीर्वाद बरसाए और महिलाओं ने उनके रास्ते में फूल बिखेरे। कोलोन में लोग खुशी से पागल हो उठे।

कुछ सप्ताह बाद, 29 मार्च को, एक राष्ट्रव्यापी जनमत-संग्रह कराया गया, जिसमें जर्मनी में पंजीकृत वोटरों में से 99 प्रतिशत ने मतदान किया और 98.8 प्रतिशत ने राइनलैंड पर हिटलर द्वारा पुन: कब्जा किए जाने के पक्ष में ‘हाँ’ कहकर अपनी स्वीकृति दी। फ्यूहरर लोकप्रियता की नई बुलंदियों को छूने में कामयाब हो गया।

इस विजय के बाद हिटलर फिर बर्शविस्गडेन में अपने पहाड़ी शरण्य-स्थल में आराम करने और अपने अगले कदम के बारे में सोच-विचार करने के लिए लौट गया। इस बीच में बर्लिन और पूरे जर्मनी में आगामी ग्रीष्मकालीन ओलंपिक्स का आयोजन करने की तैयारियाँ चल रही थीं। नाज़ी शासन के लिए बर्लिन ओलंपिक्स का आयोजन सारी दुनिया के लोगों के सामने आधुनिक व्यवस्था का दिखावा करने का सुनहरा अवसर था। यह एक ऐसा मौका भी होगा, उन्होंने सोचा, जब नाज़ी एथलीट अपनी नैसर्गिक श्रेष्ठता से सबको प्रभावित कर देंगे।