लालघाटी, सन 1975।

जमुना और कुक्कू जिस समय मजार पर पहुँचे, उस समय शाम के तीन बज रहे थे। ठण्ड का मौसम और घना जंगल होने के कारण अँधेरा यूँ गहरा गया था कि महसूस होता था रात होने में महज एक-डेढ़ घंटे की ही दरकार है। दरबार उठ चुका था और आबादी वाले इलाके से हर रोज वहाँ पहुँचने वाले फरियादी भी जा चुके थे। पीर सैय्यद अपनी कुटिया में आराम फरमा रहे थे जबकि उनके शागिर्द साफ़-सफ़ाई के काम में जुटे हुए थे। सूफ़ी संत सैय्यद हुसैन, बुरी बलाओं के सताए हुए लोगों के रहनुमा के रूप में मकबूल थे और उनके जलाल पर लोगों को इतना भरोसा था कि उन्होंने उन्हें पीर की उपाधि दे दी थी लिहाज़ा सैय्यद हुसैन दूर-दूर तक पीर सैय्यद के नाम से ही जाने जाते थे।

शागिर्दों से दरयाफ्त करने पर जमुना और कुक्कू को मालूम हुआ कि पीर इस वक्त उनकी समस्या पर गौर नहीं कर सकते हैं क्योंकि गद्दी से उठ जाने के बाद वे किसी मामले में हाथ नहीं डालते हैं इसलिए वे कल दरबार लगने पर आयें।

“हम हसीनाबाद से आये हैं और आज का अपना धंधा रोक कर आये हैं। अगर आज पीर बाबा ने हमारी फ़रियाद नहीं सुनी तो यहाँ रुकने की एवज में हमारा एक दिन का और हर्जा हो जाएगा।” कुक्कू ने अपने लहजे में दुनिया-जहान की दीनता भरते हुए कहा- “जो कि हमारी गरीबी के लिए मुफ़ीद नहीं होगा क्योंकि अगर हम एक दिन काम रोक देते हैं तो हमारे घर में चूल्हा जलना मुश्किल हो जाता है।”

“यहाँ आने वाले हर इंसान की ऐसी ही समस्याएं होती हैं जनाब...।” एक शागिर्द ने झाड़ू चलाना रोककर कहा- “लेकिन गद्दी का भी कुछ उसूल है।”

“परमार्थ के लिए तो कोई भी उसूल तोड़ा जा सकता है भाई साहब और फिर जलाली लोगों को क्या कोई उसूल कभी बाँध पाया है?” इस बार जमुना ने कहा।

“आप समझ नहीं रहे हैं।” एक दूसरे शागिर्द ने कहा- “पीर बाबा जब गद्दी पर होते हैं तो फरिश्तों की दुआ सीधे उन पर नाजिल होती है। रूहानी शक्तियों से उनका राबता सीधे तौर पर होता है इसलिए वे लोगों की ऊपरी बाधाओं पर विचार तभी करते हैं, जब गद्दी पर होते हैं।”

“देखिए हम किसी निजी फायदे के लिए उनके पास नहीं आये हैं बल्कि

इसलिए आये हैं क्योंकि हमारे बस्ती पर एक बहुत बड़ी आफ़त मंडरा रही है, जिससे मुक्ति केवल पीर बाबा जैसा कोई जलाली ही दिला सकता है। आप बस उन तक हमारा पैगाम पहुँचा दें, उसके बाद वे जो कहेंगे, हम मान लेंगे।”

शागिर्दों ने एक-दूसरे की ओर देखा और फिर उनमें से एक पीर सैय्यद की कुटिया में चला गया। थोड़ी देर बाद वह कुक्कू और जमुना के लिए एक अच्छी खबर लिए हुए बाहर आया:

“पीर बाबा ने तुम दोनों को बुलाया है। कुटिया के दरवाजे पर रखे बाल्टी की पानी से पैर धोकर अंदर जाना।”

एक दिन और जाया होने से बच जाने की खुशी से पुलकित होते हुए दोनों बग्घीवाले कुटी की ओर लपक पड़े। शागिर्द के बताये अनुसार उन्होंने बारी-बारी से हाथ-पैर धोया और भीतर दाखिल हो गये।

सामने तख़्त पर बैठे पीर सैय्यद बड़ी-बड़ी भूरी आँखों से दरवाजे की ही ओर देख रहे थे। जब जमुना और कुक्कू की नजर उन पर पड़ी तो दोनों सहम से गये। उनके सामने मौजूद शख्सियत का डील डौल किसी देव सरीखा था। चेहरा भरा हुआ और दाढ़ी के बाल सफ़ेद व छाती तक लम्बे थे। उनके सिर पर हरे रंग का साफा और बदन पर सफ़ेद बेदाग़ कुरता था। उनके गौरवर्ण चेहरे पर एक सख्ती थी, जो कुक्कू और जमुना, दोनों को ही सामान्य नहीं लग रही थी। उनकी खौफ़जदा करती शारीरीक भाषा को देख केवल कुक्कू ही लड़खड़ाती जुबान में कुछ बोलने का साहस कर पाया- “प..प्रणाम....पीर...बाबा।”

पीर ने बड़े विशिष्ट अंदाज में गर्दन हिलाकर अभिवादन करने के बाद उन दोनों को जमीन पर बिछे आसन पर बैठने का संकेत किया। जब दोनों बैठ गये तो उनकी जुबान हरकत में आयी- “क्या मामला है तुम दोनों का?”

“हमारे कस्बे में एक नरभेड़िया आया है।” कुक्कू ने बताया।

“आदमभेड़िये अब भी जन्म लेते हैं?” पीर के नेत्र संकुचित हुए।

“ये नहीं पता पीर साहब लेकिन है तो वो नरभेड़िया ही।” इस दफे जमुना बोला।

“उसका छुआ हुआ कुछ लाये हो?”

प्रत्युत्तर में जमुना ने कुछ मुड़े-तुड़े नोट पीर की ओर बढ़ा दिये। पीर ने उन्हें थामा और आँखें बंद कर लीं। नोटों पर उंगलियाँ फिराते हुए करीब पाँच मिनट तक कोई दुआ पढ़ने के बाद उन्होंने लम्बी जम्हाई लेते हुए आँखें खोलीं।

“आदमभेड़िया ही है। किसी पुराने बदले की आग में लम्बे समय से जल रहा था, लेकिन हाल ही में अपना बदला पूरा कर लिया है उसने।”

“ह..हाँ हाँ....पीर साहब।” जमुना ने उत्साहातिरेक में कहा- “बीती हुई पूर्णिमा

को उसने जंगल में रहने वाले कबाइलियों को बहुत दर्दनाक मौत मारा है। क़त्ल-ए-आम मचा दिया उनके कबीले में।”

“हमें डर है जनाब कि अगली पूर्णमासी को उसका निशाना हम कस्बे वाले न बन जाएँ।” कुक्कू ने कहा- “मौत का जो खेल उसने कबीले में खेला, वही खेल हसीनाबाद में भी न खेल बैठे।”

“तुम लोगों का डर जायज है लेकिन डरने की जरूरत नहीं है।” पीर ने शून्य को घूरते हुए कहा- “आज रात यहीं ठहर जाओ। हम यहाँ बैठे-बैठे ही शैतान के उस औलाद को ख़त्म कर देते हैं।”

पीर का दावा सुनकर कुक्कू और जमुना ने पहले नायकीनी के भाव से एक-दूसरे को देखा फिर पीर सैय्यद को, तत्पश्चात कुक्कू ने डरते हुए पूछा- “य...यहाँ...बैठे-बैठे ही?”

“कोई शुबहा है तुम्हें?” पीर का लहजा यकायक बेहद सर्द हो गया।

“शु..शुबहा...शुबहा जैसी कोई बात नहीं है जनाब।” बात संभालने की कोशिश में कुक्कू के लहजे में खुशामद भर आयी- “उस खौफ़नाक शैतान को..।”

“वह खौफ़नाक तुम इंसानों के लिए हैं, हमारे लिए नहीं।” पीर ने कुक्कू की बात काटकर कहा- “हमारे सामने तो उसकी औकात कागज़ के एक पुतले से ज्यादा नहीं है। तुम दोनों को रात यहाँ रुकने के लिए हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि मुमकिन है कि तुम्हारे कस्बे में पहुँचते ही उसे ये इल्म हो जाए कि तुम दोनों उसकी मौत का उपाय करने गये थे और वह तुम्हें क़त्ल करने पर आमादा हो जाए।”

जमुना और कुक्कू, दोनों के बदन में सिहरन भर गयी।

“हवा और पानी भी शैतान के नुमाइंदों के लिए खबरी का काम करती है।” पीर ने आगे जोड़ा।

“लेकिन अगर उसे किसी तरह हमारे यहाँ होने की भनक लग गयी और वो यहीं आ गया या कस्बे के लोगों को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की तो?”

“यहाँ आने की हिमाकत वो नहीं कर सकता है और न ही कस्बे में कोई काबिल-ए-जिक्र तबाही ला सकता है।” पीर ने दो टूक लहजे में कहा- “इसकी दो वजहें हैं। पहली ये कि इस मजार की हवा मेरी गुलाम है, जो यहाँ से हसीनाबाद तक का सफ़र तय करके शैतान के बेटे कोई ख़बर पहुँचाने की गुस्ताखी नहीं कर सकती। और दूसरी ये कि वह सामूहिक क़त्ल कर सके, इतना ताकतवर केवल पूर्णिमा की रात होता है। तुम दोनों मामूली हाड़-मांस के बने आदमी हो, तुम्हें वह आसानी से क़त्ल कर सकता है लेकिन कस्बे में मौत का नंगा नाच खेलने के लिए उसे पूनम का इंतजार करना होगा क्योंकि केवल उसी रात को वह जानवर बनकर अपनी पाशविक प्रवृत्तियों का इस्तेमाल कर पाता है बाकी दिनों तो वह एक आम इंसान होता है।”

“फिर तो जनाब कस्बे के लोगों को उसके खिलाफ़ करके उसे आसानी से हराया जा सकता है। सोते हुए में उसका क़त्ल किया जा सकता है या उसे जहर दिया जा सकता है।”

“जरूर।” पीर सैय्यद के होठों पर व्यंग्य भरी मुस्कान उभरी- “लेकिन जब तक तुम कस्बे के लोगों को पशुपति की यकीन न आने वाली असलियत पर यकीन दिलाओगे तब तक वह तुम्हें इस दुनिया से मिटा चुका होगा। रही बात धोखे से उसका क़त्ल करने की, तो कोशिश करके देख सकते हो। ये देखना मेरे लिए भी दिलचस्प होगा कि जिसका रहनुमा खुद शैतान हो, उसे तुम लोग कैसे क़त्ल कर पाते हो।”

“अगर इतनी आसेबी बातें उसके साथ जुड़ी हुई हैं तो ये भी हो सकता है कि जिस पल हम हसीनाबाद से निकले हों, उसी पल उसे हमारे इरादे की भनक लग गयी हो।” जमुना ने कहा।

“ऐसा हुआ होता तो कोई हैरानी की बात नहीं होती लेकिन ऐसा हुआ नहीं है क्योंकि तुम्हारा सही-सलामत यहाँ आ जाना ही ये साबित करता है कि उसे तुम्हारे इरादे की भनक अभी तक नहीं हुई है।”

“या फिर भनक हो चुकी है लेकिन वह किसी दूसरे फिराक में है।”

कुक्कू की व्यक्त की गयी संभावना पर इस दफे पीर सैय्यद भी खामोश रह गये।

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राजनगर, वर्तमान।

सुबोध की निगाहें लैपटॉप के क्रोम ब्राउज़र में ओपन एक वेबपेज पर टिकी हुई थीं, जिस पर किसी गुजराती न्यूज़पेपर के पुराने अंक का न्यूज था। हालाँकि वेबपेज का कंटेंट गुजराती भाषा में था लेकिन उस पर दो तस्वीरें थीं, जो न केवल उस कंटेंट में उसकी रूचि का सबब बनी थीं बल्कि उसे सुखद आश्चर्य से भी भर दी थीं। पहली तस्वीर में एक आदमी की नग्न लाश पेट के बल पड़ी हुई थी और उसकी पीठ पर नेक्रोमेंसी का सिगिल उसी अंदाज में नुमाया हो रहा था, जिस अंदाज में विनायक की छाती पर नुमाया हुआ था। दूसरी तस्वीर में उसी आदमी की लाश पीठ के बल पड़ी हुई थी और छाती से लेकर पेट, हाथ और पैरों तक चाकू से काटे जाने के घातक निशान दिखाई दे रहे थे। लाश खून से लथपथ थी। मरने वाले की उम्र तीस से अधिक दिखाई दे रही थी। विनायक के केस में कोई बढ़त मिलने की उम्मीद में सुबोध के रोंगटे खड़े हो गये लेकिन गुजराती न समझ पाने की विवशता में उसकी मुट्ठियाँ भींच गयीं। वेबपेज को बुकमार्क करने के बाद उसने लिंक को अपनी ईमेल आईडी पर सेंड किया ही था कि उसका सेलफोन बजा। कामरान का फोन था।

“हैलो!” रिसीव करने के बाद वह बोला।

“सर...सर...उस आसमानी आफ़त ने अभी-अभी मुझसे एक और...पेटिंग बनवायी है....।” दूसरी ओर से कामरान की घबराई हुई आवाज़ आयी।

“व्हाट?” सुबोध कुर्सी समेत उछल पड़ा।

“मैंने...मैंने....फाह्याज़ साहब को फोन लगाया...।” कामरान ने टूटे फूटे लहजे में कहना जारी रखा- “लेकिन उन्होंने मेरा फोन काट दिया...। शायद कहीं बिजी थे वो।”

“गेट रिलैक्स। ये बताओ कि तस्वीर कहाँ है अभी?”

“ईजल पर ही लगी हुई है। मैंने उसकी फोटो आप दोनों को वाट्सएप पर भेजी है।”

“उसे लेकर हमारे पास आओ। तुम्हें गुजराती तो आती है न?”

“अम्मी को आती थी, उन्हीं के जरिये थोड़ा बहुत जान पाया हूँ।”

“दैट्स गुड। घबराने की जरूरत नहीं है। हम इस बार पेटिंग वाली शख्सियत को ढूंढ लेंगे।”

“म...मैं अभी आता हूँ।”

“आराम से आओ। तब तक मैं तुम्हारी भेजी हुई फोटो देखता हूँ।”

कॉल डिसकनेक्ट करने के बाद सुबोध ने फोन का डाटा कनेक्शन ऑन किया तत्पश्चात वाट्सएप ओपन किया लेकिन फिर कामरान की भेजी हुई इमेज को डाउनलोड करके ज्यों ही देखा, उसे चार सौ चालीस वोल्ट का झटका लगा। फोन उसके हाथ से फिसलकर टेबल पर जा गिरा।

“य..ये...नहीं हो सकता। ये पॉसिबल नहीं है।”

उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। उसने मोबाइल उठाया, इमेज को दोबारा देखा और जब यकीन हो गया तो काँपती उंगलियों से फाह्याज़ का नंबर डायल किया।

“आप कहाँ है सर?” कॉल अटेंड होने के बाद उसने फाह्याज़ के ‘हैलो’ के जवाब में पूछा।

“बाइक पर हूँ।” दूसरी ओर से फाह्याज़ की आवाज़ आयी- “कल रात का वाकया बताया ही था आपको, उसी की बाबत फ़िज़ा बेगम से रूबरू होते हुए पुलिस स्टेशन आ रहा हूँ। कोई ख़ास बात?”

“बहुत बड़ी घटना हो गयी है सर। पहले आप बाइक किनारे लगा लें।”

“किनारे ही हूँ।” फाह्याज़ हँसा- “पुलिस वाला होकर ट्रैफिक नियम कैसे तोड़ सकता हूँ? लेकिन आप सस्पेंस क्यों क्रिएट कर रहे हैं?”

“सर कामरान फिर से ट्रांस में गया था और इस बार उसने एक और पेटिंग बनाई है।”

“कहाँ है वो।” फाह्याज़ का लहजा संजीदा हुआ।

“मैंने उसे थाने आने के लिए कह दिया है।”

“मैं आ रहा...।”

“एक मिनट सर...।” सुबोध ने कहा- “आप घर जाइए, आपके बेटे की जान को खतरा है।”

लाइन पर कुछ पलों के लिए खामोशी छा गयी, फिर फाह्याज़ की सर्द आवाज़ आयी- “क्या तुम वही कहना चाह रहे हो, जो मैं समझ रहा हूँ?”

“ह..हाँ...सर...।” सुबोध ने हिचकिचाते हुए कहा- “कामरान ने पेटिंग की फ़ोटो भेजी है मुझे, आपको भी भेजी है, पर शायद आपने अभी देखा नहीं है उसे। पेटिंग में हसन का ही चेहरा है। मुझसे पहचानने में कोई भूल नहीं हुई है क्योंकि हसन के पिछले बर्थडे पर उससे मिल चुका हूँ।”

इस बार लाइन पर खामोशी छायी तो लम्बे समय तक काबिज रही। अंतत: सुबोध को कहना पड़ा- “आर यू ऑन द लाइन।”

“य...ये तो हसन की ही पेटिंग है...।” फाह्याज़ का थका-थका सा स्वर सुनाई दिया- “मुझसे उस एंटिटी की क्या दुश्मनी है। पहले मेरी पत्नी....और अब मेरा बेटा..।”

“आप पहले घर जाइए सर, मैं आ रहा हूँ। मेरे पास आपको बताने के लिए और भी कुछ है।”

“मैं इंसान से अपने बेटे को बचा सकता हूँ...।” फाह्याज़ ने मानो सुबोध की बात सुनी ही नहीं- “लेकिन किसी काली परछाईं से उसे कैसे बचा पाऊँगा।”

“आप अभी से होपलेस क्यों हो रहे हैं? जबकि हम जानते हैं कि हम चेन को ब्रेक कर देंगे तो मौतों का सिलसिला भी थम जायेगा। हसन को बचाकर हम ऐसा ही करेंगे। इस श्रृंखला को भंग कर देंगे। इस बार आपके बेटे को चुनकर उस एंटिटी ने बहुत बड़ी गलती कर दी है। ये सिलसिला अब थम जाएगा। इसे थमना ही होगा क्योंकि हम हसन को किसी भी कीमत पर मरने नहीं दे सकते।”

“तुम्हें क्या पता चला है?” इस बार फाह्याज़ का स्वर कुछ हद तक संतुलित था।

“कामरान के पहुँचते ही मैं उसे लेकर आपके घर आ रहा हूँ। फिर बात करते

हैं।”

सुनने के बाद फाह्याज़ ने कॉल डिसकनेक्ट कर दी। सुबोध ने भी सेलफोन मेज पर रखा और दराज से पेनड्राइव निकालकर लैपटॉप के जैक में लगा दिया तत्पश्चात एक वीडियो क्लिप को ट्रांसफर पर लगाने के बाद कुर्सी की पुश्त से पीठ टिका ली। इस पल उसे फाह्याज़ के साथ पूरी सहानुभूति थी क्योंकि वह जानता था कि बेटे को समय न दे पाने के बावजूद फाह्याज़ उससे कितना प्यार करता था। उसे कुछ हो जाने का मतलब था, फाह्याज़ को ऐसा झटका लगना, जिससे उबरना उसके लिए नामुमकिन की हद तक मुश्किल होता।

‘नहीं-नहीं एक निर्दोष मासूम की जान इतनी सस्ती नहीं हो सकती।’             

बड़बड़ाते हुए सुबोध ने जब मॉनिटर की ओर देखा तो पाया कि विडियो क्लिप पेनड्राइव में ट्रांसफर हो चुका था।

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रेस्टोरेंट में मौजूद राउंड टेबल्स में से एक को कब्जाई हुई साधना ने स्टाल से चेहरा छुपाई हुई उस युवती को ध्यान से देखा, जो अभी-अभी तयशुदा वक्त से दस मिनट बाद पहुँची थी और फिर अधिकारपूर्ण लहजे में बोली- “बैठो।”

वह, साधना की टेबल के इर्द-गिर्द पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गयी फिर इधर-उधर देखकर ये सुनिश्चित की कि उसकी जान-पहचान का कोई शख्स वहाँ नहीं है तत्पश्चात स्टाल उतार दी।

“इतनी सावधानी?” साधना ने भवें उंचकाईं। लड़की को कम उम्र का पाकर मानो उसे अपनी सुपरीआरिटी दिखाने का मौक़ा मिला गया- “एटॉमिक मिसाइल का लांच कोड शेयर करने वाली हो?”

“कैश कहाँ है?” लड़की उसके तंज से प्रभावित हुए बगैर मुद्दे की बात पर आयी- “विभूति सर से दस हजार की बात हुई थी।”

साधना ने पहले से कहीं अधिक तीक्ष्ण निगाहें लड़की पर जमा दीं। खुद को महिलाओं की नेत्री समझने वाली उस औरत को लड़की का वह एटिट्युड पसंद नहीं आया लेकिन लड़की भी उसी के जैसी मिजाज वाली निकली। वह भी उसकी आँखों में आँखें डाले हुए उसे घूरती रही।

“देखो बेटी..।” साधना ने नर्म लहजे में कुछ कहने की कोशिश की।

“मेरा नाम संगीता है।” लड़की उसकी बात काटकर बोली- “बेवजह मेरी माँ बनने की कोशिश मत कीजिए। पहले कैश का लिफ़ाफ़ा दीजिए फिर जो पूछना है पूछिए और इजाजत दीजिए।”

साधना भीतर ही भीतर सुलग गयी लेकिन प्रत्यक्ष में उसे कहना पड़ा- “देखो

संगीता, ये मामला हम महिलाओं के हित से जुड़ा हुआ है। उस अस्पताल में एक निर्दोष महिला के साथ कुछ गलत हुआ है, मैं उसी की पड़ताल कर रही हूँ। मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है।”

“तो मैं कहाँ इंकार कर रही हूँ मैम। बैठी तो हूँ आपके सामने।”

साधना फिर से उसे घूरने लगी।

“तो मैं चलूँ?” संगीता उठने का उपक्रम करती हुई बोली।

जब साधना को भान हो गया कि लड़की चंट है और चिकनी चुपड़ी बातों से दाल नहीं गलने वाली तो वह वैनिटी बैग से एक लिफ़ाफ़ा निकालकर मेज पर रख दी।

“जी अब पूछिए, क्या पूछना है।” लड़की लिफ़ाफ़े को अपने हैण्ड बैग के हवाले करने के बाद बोली।

“काम के बारे में मेरे पति ने तो तुम्हें बताया ही होगा?”

“जी हाँ। लेट शबनम बानो, जो एट मंथ की प्रेग्नेंट थीं, के बारे में आपको वो बातें जाननी हैं, जो रिकॉर्ड में मेंशन नहीं हैं।”

“एक्चुअली मुझे बस ये जानना है कि उस केस में एनाफिलैक्सिस की असली वजह क्या थी क्योंकि डॉक्यूमेंट्स में जो मेंशन है, वह पेशेंट की मौत को ठीक से जस्टिफाई नहीं कर पा रहा है और हमारी नजर में जो जस्टीफिकेशन होना चाहिए, वह डॉक्यूमेंट्स में दर्ज नहीं हैं।”

“आपको उनकी मौत की वजह क्या लगती है?”

“शबनम को गलत खून चढ़ा दिया गया था।” साधना ने स्पष्ट लहजे में कहा।

“जब आपको पहले से पता है तो आपने दस हजार रूपये क्यों खर्च किये?”

“बस ये पता करने के लिए कि एक टॉप क्लास हॉस्पिटल में इतनी घातक गलती कैसे हुई? क्या ये महज शबनम का दुर्भाग्य था या फिर कोई साज़िश?”

“ये सही है कि उस औरत की मौत गलत खून चढ़ाने से ही हुई थी लेकिन ये गलती कैसे हुई, इस बारे में मैं कुछ नहीं जानती। हमने प्रीट्रांसफ्यूजन टेस्ट किया था। शबनम का ब्लड ग्रुप ओ नेगेटिव था। ट्रांसफ्यूजन के लिए लाया गया ब्लड भी सेम था फिर मिस्टेक कहाँ पर हुई, ये किसी को समझ में नहीं आया, नर्सिंग स्टाफ को तो बिल्कुल भी नहीं।”

“हीमोलिटिक ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन के सिम्प्टम्स तो ट्रांसफ्यूजन के दौरान ही नजर आने लगते हैं, फिर किसी स्टाफ का ध्यान इस पर क्यों नहीं गया?”

“ये ड्यूटी स्टाफ की गलती थी। उन्होंने इसे सामान्य एलर्जी समझकर गंभीरता से नहीं लिया होगा।”

“मेन पेंच यहीं पर अटका हुआ है कि गलत खून आख़िर चढ़ा कैसे?” साधना

ने मेज पर मुक्का मारते हुए पूछा- “कुछ ऐसा बता सकती हो, जिसे हॉस्पिटल ने पेशेंट के अटेंडेन्ट्स से छिपाया रहा हो।”

“जाहिर है, मौत की वजह छिपायी गयी। हॉस्पिटल ये कैसे मेंशन कर देता कि पेशेंट को गलत खून चढ़ा दिया गया था।”

“मेरा मतलब है कि ब्लड की मिसमैचिंग की वजह तलाशने के लिए हॉस्पिटल ने अपनी ओर से कोई कोशिश की थी? कोई टेस्ट या कोई मेडिकल इन्वेस्टीगेशन?”

“शबनम का ब्लड सैंपल लेकर कुछ टेस्ट किये थे और फिर इस केस को लेकर अद्वैत फाउंडेशन की रिसर्च टीम के साथ एम.एस. ने एक घंटे मीटिंग की थी। इसका विशेष ध्यान रखा था कि ये बातें बाहर न आने पाएं।”