सुनील ने अपनी मोटर साइकिल वाल्टन रोड के कोने के फुटपाथ पर चढा कर खड़ी कर दी और फिर पैदल ही वाल्टन रोड पर उस ओर बढ गया जिधर सी आई डी की ब्रांच स्पैशल इन्टैलीजैंस के डायरेक्टर कर्नल मुखर्जी की कोठी थी ।
कोठी के समीप पहुंचकर उसने लापरवाही से कोठी की चारदीवारी में लगे लोहे के फाटक को धकेलकर खोला और भीतर घुस गया । अर्धवृत्ताकार ड्राइव वे से होता हुआ वह मुख्य इमारत सामने जा पहुंचा।
उसने कालबैल के पुश पर उंगली रख दी ।
द्वार कर्नल मुखर्जी के इकलौती नौकर धर्मसिंह ने खोला । धर्मसिंह कर्नल मुखर्जी का पीर-बावर्ची भिश्ती सभी कुछ था । कर्नल साहब उसका बेहद विश्वास करते थे लेकिन पिछले कुछ केसों में कुछ ऐसी घटनाएं घटी थीं जिनकी वजह से सुनील उसे संदिग्ध निगाहों से देखने लगा था ।
कई बार बड़ी गुप्त बातें लीक हो जाती थीं और सुनील के विचार से मुखर्जी के स्पैशल इन्टैलीजेंस के स्टाफ के अतिरिक्त अगर किसी को उन बातों की जानकारी होने की सम्भावना हो सकती थी तो वह धर्मसिंह ही था । सुनील दो-तीन बार मुखर्जी पर अपना संदेह प्रकट कर चुका था । हर बार मुखर्जी ने बड़ी अच्छी तरह धर्मसिंह को ठोका-बजाया था और अन्त में इसी नतीजे पर पहुंचे थे कि सुनील का सन्देह निराधार था ।
धर्मसिंह द्वार से एक ओर हट गया और सिर नवाकर आदर पूर्ण स्वर से बोला - “साहब आपका इन्तजार कर रहे हैं ।”
सुनील भीतर प्रविष्ट हो गया ।
धर्मसिंह मुखर्जी के कमरे तक उसके साथ आया । उसने आगे बढकर कमरे का द्वार खोल दिया ।
सुनील भीतर प्रवेश कर गया ।
धर्मसिंह ने द्वार बन्द कर दिया ।
कर्नल मुखर्जी अपनी काली लकड़ी की विशाल मेज के पीछे बैठे थे । उनके नेत्र बन्द थे और उनके दांतों में बुझा हुआ पाइप दबा हुआ था ।
“गुड मार्निंग, सर ।” - सुनील द्वार के समीप खड़ा-खड़ा बोला ।
मुखर्जी ने धीरे से नेत्र खोले और सुनील को देखा । वे कुर्सी पर सम्भल कर बैठ गए । उन्होंने अपने दांतों में दबा पाइप निकाल लिया और बोले - “आओ ।”
सुनील लम्बे डग भरता हुआ उनकी मेज के समीप पहुंच गया ।
मुखर्जी ने उसे बैठने का संकेत किया ।
सुनील मेज के सामने बिछी कई कुर्सियों में से एक पर बैठ गया ।
मुखर्जी ने विचित्र नेत्रों से अपने हाथ में थमे पाइप के बाडल में झांका । फिर उन्होंने मेज पर से एक लोहे की सलाई उठाई और बाडल में भरे अधजले तम्बाकू को कुरेदने लगे । पाइप के तम्बाकू को इच्छित स्थिति में ले आने के बाद उन्होंने सलाई रख दी और पाइप को दुबारा सुलगा लिया ।
सुनील प्रतीक्षा करता रहा ।
पाइप के कई कश ले चुकने के बाद वे सुनील की ओर आकर्षित हुए ।
“तुम्हें मालूम ही होगा कि आज शीहकर के सुलतान अहमद बिन सईद भारत सरकार का आतिथ्य स्वीकार करने के लिए भारत की धरती पर कदम रख रहे हैं ।”
“जी हां, मालूम है ।” - सुनील बोला ।
“शीहकर के बारे में कुछ जानते हो ?”
“केवल इतना जानता हूं कि शीहकर फारस की खाड़ी में स्थित एक छोटा-सा अरब राष्ट्र है । भारत सरकार से उसके सम्बन्ध अच्छे हैं । बाकी अरब राष्ट्रों से शीहकर कोई विशेष वास्ता नहीं रखता है । शीहकर एक स्वतन्त्र राष्ट्र है और उस पर सुलतान अहमद बिन सईद की हकूमत है लेकिन पिछले कुछ अरसे से अंग्रेज और फ्रांसीसी दोनों ही उस पर अपने दांत गड़ाये हुए हैं ।”
“इतना काफी है ।” - मुखर्जी संतुष्टिपूर्ण स्वर में बोले - “सुलतान अहमद बिन सईद पूरी तरह अंग्रेजों के कब्जे में है । अंग्रेजों के दम पर ही वह शीहकर की हकूमत सम्भाले हुए है । सुलतान अहमद अधिकतर लन्दन में ही रहता है । डोरिस नाम की एक अंग्रेज औरत से वह मुहब्बत करता है और शीघ्र ही उससे शादी करके उसे अपनी बेगम बनाने वाला है । उसकी खातिर वह अपना मुस्लिम धर्म भी छोड़ रहा है और क्रिश्चियन बन रहा है । शीहकर एक कट्टर मुस्लिम मुल्क है । वहां की जनता अपने धर्म को बहुत महत्व देती है । सुलतान के इस एक्शन से शीहकर में बगावत फैल जाने का अन्देशा है लेकिन सुलतान को इसकी कोई विशेष परवाह नहीं है । उसे पूरा भरोसा है कि अंग्रेज स्थिति को सम्भाल लेंगे ।”
मुखर्जी एक क्षण के लिए चुप हो गए और पाइप के लम्बे-लम्बे कश लगाने लगे ।
“सुलतान अहमद का अबू दाउद नाम का एक छोटा भाई है ।” - कई क्षण बाद मुखर्जी फिर बोले - “वह सुलतान अहमद का पक्का दुश्मन है और हर समय शीहकर की सत्ता हथियाने के लिए षड्यंत्र रचता रहता है । फ्रांसीसियों ने अबू दाउद को अपना पिट्ठू बनाया हुआ है और वे गुप्त रूप से अबू दाउद के कुकृत्यों में हर प्रकार की सहायता करते हैं । अगर अहमद बिन सईद की जगह अबू दाउद सुलतान बन गया तो शीहकर पूरी तरह फ्रांसीसियों के कब्जे में आ जाएगा ।”
“इन तमाम बातों का सुलतान अहमद बिन सईद की भरत यात्रा से कोई सम्बन्ध है ?” - सुनील ने सरल स्वर से पूछा ।
“सम्बन्ध है ।” - मुखर्जी ने उत्तर दिया - “अबू दाउद भी सुलतान के साथ भारत आ रहा है । पिछले दिनों शीहकर में दो बार सुलतान की हत्या का प्रयत्न विफल हो चुका है और यह बात सर्वविदित है कि सुलतान ही हत्या के षड्यंत्र में अबू दाउद का हाथ है चाहे यह बात सिद्ध न की जा सके ।”
“तो आपका ख्याल है कि भारत में भी अबू दाउद सुलतान की हत्या करने का प्रयत्न कर सकता है ?”
“सम्भावना तो है ही । शरारत तो वह कर ही सकता है । हम नहीं चाहते कि सुलतान की भारत यात्रा के दौरन कोई अप्रिय घटना घटे ।”
“लेकिन सुलतान ऐसे खतरनाक आदमी को अपने साथ क्यों लाया है ?”
“हमें नहीं मालूम ।”
सुनील चुप रहा ।
“वैसे तो सैन्ट्रल इन्टैलीजेंस ब्यूरो के एजेन्टों और पुलिस विभाग द्वारा सुलतान की सुरक्षा का पूरा-पूरा इन्तजाम किया जा चुका है लेकिन अपनी संतुष्टि के लिए इस विषय में मैं अपने विभाग का भी थोड़ा-सा योगदान चाहता हूं ।”
“क्या ?”
“मैंने ऐसा इन्तजाम कर दिया है कि सुलतान अपनी भारत यात्रा के दौरान हर समय तुम्हें अपने साथ रखेगा ।”
“यह कैसे सम्भव है ?”
“सुनो । सुलतान अपने दल-बल के साथ एक पानी के जहाज पर आ रहा है ।”
“पानी के जहाज पर ?”
“हां । वह हवाई जहाज पर सफर करने से डरता है । इसी वजह से वह पहले राजनगर आ रहा है । वह राजनगर की बन्दरगाह पर उतरेगा और उसके बाद रेल द्वारा राजधानी ले जाया जाएगा । सुलतान का जहाज राजनगर बन्दरगाह पर हमारे पड़ोसी राष्ट्र नैट्सीकाप की ईह कैराक बन्दरगाह से आ रहा है । सुलतान तीन दिन नैट्सीकाप सरकार का भी मेहमान रहा है । भारत में उसका दो सप्ताह रहने का प्रोग्राम है । मैंने भारतीय प्रतिनिधि के रूप में ईह कैराक में सुलतान से सम्पर्क स्थापित किया था और उससे प्रार्थना की थी कि वह सिक्योरिटी की खातिर हमारे किसी आदमी को किसी बहाने अंगरक्षक के रूप में अपनी भारत यात्रा के दौरान हर समय अपने साथ रखने के लिए हामी भर दे । पहले तो सुलतान ने यह कहकर इन्कार कर दिया कि ऐसे किसी बखेड़े की जरूरत नहीं है और न ही उसे यह पसन्द है कि कोई उसकी प्राइवेसी में दखल दे लेकिन बहुत प्रार्थना करने के बाद उसने हमारी बात स्वीकार कर ली । तुम्हें इतने स्वाभाविक ढंग से उसके साथ चिपकाया जाएगा कि किसी को यह सन्देह भी नहीं होगा कि तुम स्पेशल इन्टैलीजैंस के एजेन्ट हो और किसी विशेष मिशन की खातिर तुम्हें सुलतान के साथ रखा जा रहा है ।”
“कैसे ?”
“सुलतान तुम्हारी ही उम्र का आदमी है और इंगलैंड की आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में पढता रहा है । सुलतान के राजनगर की बन्दरगाह पर कदम रखने के बाद तुम भी ‘ब्लास्ट’ के प्रतिनिधि के रूप में बाकी रिपोर्टरों के साथ सुलतान की प्रैस कान्फ्रेंस में शामिल होवोगे और वहां सुलतान एकाएक तुम्हें अपने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के पुराने सहपाठी के रूप में पहचान लेगा ।”
सुनील के नेत्र फैल गए । वह बोला - “लेकिन मैंने तो आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की सूरत भी नहीं देखी ।”
“क्या फर्क पड़ता है । जब स्वयं सुलतान अहमद बिन सईद यह कहेगा कि तुम आक्सफोर्ड में उसके साथ पढते रहे हो तो क्या कोई इस बात की हकीकत को चैंलेज करने का हौसला कर सकेगा ?”
“सुलतान मुझे पहचान लेगा !”
“जरूर पहचान लेगा । सुलतान को तुम्हारी कई तस्वीरें दिखाई जा चुकी हैं ।”
“उसके बाद मेरा काम क्या होगा ?
“तुम्हें साये की तरह सुलतान के साथ लगे रहना है और उसकी जान की हर प्रकार से रक्षा करनी है । इस चाहते हैं कि वह भारत की भूमि से सुरक्षित रूप से प्रस्थान कर जाये उसके बाद चाहे उसके अपने देशवासी उसे सूली पर चढा दें या उसके दुश्मन उसे गोली से उड़ा दें ।”
“मैं सतर्क रहूंगा ।”
मुखर्जी कुछ क्षण चुप रहे और फिर बोले - “दरअसल सुलतान अहमद के धर्म परिवर्तन करके अंग्रेज लड़की से शादी करने के इरादे ने बड़ा घपला कर दिया है । शीहकर के लोग अपने धर्म पर बहुत मरते हैं । वहां के मौलवी, और काजी और ऐसे धर्म के ठेकेदार सुलतान से बहुत नाराज हैं । अबू दाउद को सुलतान के खिलाफ शीहकर की जनता को भड़काने का और भी अच्छा बहाना मिल गया है । सुलतान के धर्म परिवर्तन के विचार से लोग कितने क्रुद्ध हैं इस बात का अनुमान तुम इनसे लगा सकते हो कि राजनगर में जो अरब रहते हैं वे सुलतान के राजनगर आगमन पर उसके विरुद्ध एक प्रदर्शन का आयोजन कर रहे हैं जबकि साधारणतया जब कोई विदेशी मेहमान आता है तो उसके भारत में बसे देशवासी बड़े जोश-खरोश से उसका स्वागत करते हैं ।”
सुनील चुप रहा ।
“सुलतान का जहाज कल सुबह नौ बजे राजनगर की बन्दरगाह पर आ लगेगा । तुम पहले हो अपने अखबार के प्रतिनिधि के रूप में वहां मौजूद रहना ।”
“बेहतर ।”
“बाद में सुलतान और तुम्हारे बीच में जो ड्रामा होगा उसकी रूपरेखा मैं तुम्हें बता ही चुका हूं ।”
“यस सर ।”
“कोई दिक्कत हो तो मुझे सूचित कर देना ।”
“ओके सर ।”
“और इसे रख लो ।” - मुखर्जी बोले और उन्होंने अपनी मेज के एक दराज में से एक रिवाल्वर निकालकर सुनील के सामने रख दी ।
सुनील उस रिवाल्वर को बहुत बार हैंडल कर चुका था । वह 38 केलिबर की दस फायर करने वाली मोजर नामक जर्मन रिवाल्वर थी, मोजर अपनी प्रकार के हथियारों में सबसे अधिक खतरनाक थी, उसकी गोली की मार शरीर में इतना बड़ा झरोखा बना देती थी कि देखकर दहशत होने लगती थी । उस रिवाल्वर मे केवल एक ही खराबी थी कि कभी-कभी गोली चलने के बाद गोली का खोल निकलकर इतनी जोर से मुंह से आकर टकराता था कि एक बार तो आंखों के सामने सितारे नाच जाते थे । खोल से चोट तो लगती थी लेकिन साथ ही इस बात की संतुष्टि भी होती थी कि जिसे गोली लगी होती उसका तो इससे एक लाख गुणा बुरा हाल हुआ होगा ।
सुनील ने रिवाल्वर को उठाकर अपनी पैंट की बैल्ट में खोंस लिया और ऊपर से कोट बटन के बन्द कर लिए ।
***
सुलतान अहमद बिन सईद एक बेहद ठिगने कद का शक्ल-सूरत में साधारण-सा लगने वाला आदमी था । वह अपनी राष्ट्रीय पोशाक पहने हुए जहाज पर से उतरा था । उसने अपने सिर पर एक अरब ढंग की पगड़ी बांधी हुई थी जिसमें लगा एक विशाल हीरा सूर्य के प्रकाश में सूर्य की ही तरह जगमगा रहा था ।
राजनगर के मेयर ने केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधियों के साथ सुलतान का स्वागत किया ।
बाद में सुलतान गार्ड आफ आनर का निरीक्षण किया । फिर बन्दरगाह पर विशेष रूप से बनाये गए एक प्लेटफार्म पर पहले केन्द्रीय सरकार के एक प्रतिनिधि और फिर सुलतान के औपचारिक भाषण हुए ।
सुनील बड़ी शान्ति से प्रेस रिपोर्टरों के झुण्ड में खड़ा सब कुछ देखता रहा ।
अन्त में सुलतान अपने दो अन्य सहयोगियों के साथ प्रेस रिपोर्टरों की ओर आकर्षित हुआ ।
“जन्टलमैन ।” - सुलतान अपनी दाईं ओर खड़े एक लगभग पच्चीस वर्ष के युवक की ओर संकेत करता हुआ मीठे स्वर में बोला - “यह मेरा भाई है अबू दाउद ।”
अबू दाउद एक लम्बे ऊंचे कद का सुन्दर युवक था । वह अपनी राष्ट्रीय पोशाक के स्थान पर एक विलायती ढंग का सूट पहने हुए था । उसके चेहरे पर कठोरता और बेरुखी के भाव थे ।
“और यै हैं शीहाब अल जूरी ।” - सुलतान अपनी बाईं ओर खड़े एक वृद्ध की ओर संकेत करता हुआ बोला - “शीहकर के शाही इमाम और मेरे वजीर ।”
शीहाब अल जूरी अरब ढंग का लम्बा लबादा पहने हुए था । उसके चेहरे पर बड़ी पवित्र-सी लगने वाली बर्फ जैसी सफेद लम्बी दाढी और मूछें थीं । उसके दायें हाथ में तसबीह थी जिसके मनके अनजाने में ही उसकी उंगली और अंगूठे में से गुजरते जा रहे थे । उसका चेहरा स्लेट की तरह साफ था ।
तत्काल ही फोटोग्राफर के कैमरों के फ्लैश बल्ब चमक उठे ।
इसके बाद प्रेस रिपोर्टरों ने सुलतान पर प्रश्नों की बौछार कर दी - “आपकी भारत के बारे में क्या राय है ? फ्रांस से आपके सम्बन्ध कैसे हैं ? इंगलैंड से आपके सम्बन्ध कैसे हैं ? क्या यह सच है कि शीहकर में बगावत होने वाली है ? ... वगैरह ।”
सुलतान ने एक भी प्रश्न का उत्तर देने का प्रयत्न नहीं किया, वह मुस्कराता हुआ सारे प्रश्न सुनता रहा ।
रिपोर्टरों के थोड़ा चुप हो जाने के बाद वह मधुर स्वर में बोला - “जन्टलमैन, मैं इन्सान हूं, कोई कम्प्यूटर नहीं । मैं पचास आदमियों से एक साथ कैसे बात कर सकता हूं ? मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैं आपके हर प्रश्न का उत्तर दूंगा लेकिन ऐसे नहीं, आप अपने लोग अपने प्रश्न एक कागज पर लिखकर दीजिए और फिर अपने में से एक प्रतिनिधि चुनकर उसे वे प्रश्न सौंप दीजिए । मैं बड़ी शान्ति से आपके प्रतिनिधि का सारे उचित प्रश्नों का उतर दे दूंगा । मैं आपको... सुनील ।”
सुलतान के चेहरे पर इतना तीव्र भाव परिवर्तन हुआ कि प्रैस वाले एकदम स्तब्ध हो गए । जो लोग सुनील को जानते थे वह एकदम सुनील की ओर देखने लगे ।
सुनील झिझकने का अभिनय करता हुआ अपने स्थान पर खड़ा रहा ।
सुलतान लपककर सुनील के समीप पहुंचा और बड़ी गर्मजोशी से सुनील से हाथ मिलाने लगा ।
“फेंसी मिटिंग यू हेयर, भाई डियर सुनील ।” - सुलतान बोला - “तुमने पहचाना मुझे ?”
“यस, योर हाईनैस ।” - सुनील शिष्ट स्वर में बोला ।
“हाईनैस नहीं, अहमद कहो ।”
“आप सुनील को कैसे जानते हैं ?” - लगभग सभी कण्ठों से एक ही प्रश्न फूटा ।
“जन्टलमैन ।” - सुलतान बोला - “सुनील मेरा पुराना मित्र है । आक्सफोर्ड में हम दोनों सहपाठी रह चुके हैं । मुझे इससे यहां मिलकर बहुत खुशी हुई है ।”
कुछ रिपोर्टरों ने सुनील और सुलतान की इकट्ठी तस्वीर खींच डाली ।
“अब मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप लोग सुनील को ही अपना प्रतिनिधि चुन लें । अब आप अपने प्रश्न लिखकर सुनील को दे दीजिये । मैं आपके सब प्रश्नों का उत्तर दूंगा । इसी बहाने मुझे अपने पुराने मित्र से बातें करने का अवसर भी मिल जायेगा ।”
और सुलतान सुनील से आखिरी बार हाथ मिलाकर अबू दाउद और शीहाब अल जूरी के साथ वहां से हट गया ।
कई रिपोर्टर बड़े संदिग्ध भाव से सुनील को देख रहे थे ।
“बड़ी ऊंची छलांग लगाई है गुरु ।” - क्रानिकल का रिपोर्टर ललित सुनील से बोला ।
“संयोग की बात है ।”
“तुमने कभी बताया नहीं कि तुम आक्सफोर्ड में पढते थे ।”
“इसमें ऐसी खासतौर पर बताने लायक क्या बात थी ?” - सुनील सहज स्वर में बोला - “मैं आक्सफोर्ड में ही तो पढता था, चांद पर तो नहीं पढता था ।”
“और न ही कभी तुमने इस बात का जिक्र किया था शीहकर का सुलतान तुम्हारा सहपाठी था ।”
“मुझे मालूम ही नहीं था कि वह शीहकर का सुलतान बन गया है । अब वह आक्सफोर्ड में मेरे साथ पढता था तो उस समय तो मुझे सिर्फ यह मालूम था कि वह किसी अरब देश के सुलतान का लड़का है । उस समय मुझे यह तो सूझा ही नहीं था कि बाद में वह खुद सुलतान बन जायेगा और वह भी इतनी जल्दी इतनी छोटी उम्र में । मैं तो उसे भूल ही चुका था । मुझे तो यह कभी ख्वाब में भी सहीं सूझा था कि शीहकर का वर्तमान सुलतान मेरा पुराना सहपाठी अहमद निकल आयेगा ।”
“तुम्हारी तो चांदी हो गई गुरु ।” - ललित बोला - “अब ‘ब्लास्ट’ तो स्पेशल नम्बर निकालेगा शायद । ‘ब्लास्ट’ तो इस समाचार को फ्रन्ट पेज पर बैनर हैडलाइन्स में निकालेगा - सरप्राइज एनकाउन्टर आफ सुलातन अहमद बिन सईद आफ शीहकर विद अवर स्टाफ कारस्पान्डैन्ट सुनील कुमार चक्रवर्ती दे वर ओल्ड फ्रेन्ड्स । वाह... मजे हैं प्यारे ।”
“मजे हैं तो तुम्हारे पेट में दर्द क्यों हो रहा है ?”
“बात ही दर्द होने वाली है । हमारे बाप ने भी अगर हमें पढने के लिए आक्सफोर्ड भेजा होता तो आज हम भी शायद किसी सुलतान के यार होते । फिर ब्लास्ट की जगह क्रानिकल ने झण्डे गाड़ दिए होते और यार लोग इसी बात पर तनख्वाह में सौ रुपये की तरक्की मार जाते ।”
“मुझे तुम्हारी हालत पर अफसोस है ।” - सुनील हंसता हुआ बोला ।
“अफसोस तो कर लो । लेकिन मेरे प्रश्नों के जो उत्तर सुलतान दे उन्हें बीच में सेंसर करने की कोशिश मत करना । टोटल इन्फर्मेशन मेरे हाथ में आनी चाहिए ।”
“ओके ।”
सब रिपोर्टरों ने अपने-अपने प्रश्न लिखकर बड़ी अनिच्छापूर्ण ढंग से सुनील को थमा दिए ।
सुलतान तब तक एक खुली कार में जलूस की सूरत में नगर की ओर रवाना हो चुका था ।
***
सुलतान इहमब बिन सईद को ‘सम्राट’ नाम के सरकारी होटल की आठवी मंजिल पर ठहराया गया था । होटल की आठवी मंजिल के सारे कमरे सुलतान, उसके सहयोगी, सचिव अंगरक्षक और नौकर-चाकरों के लिए बुक किये जा चुके थे ।
सुलतान के सिक्योरिटी स्टाफ को पहले ही सुनील के बारे में बता दिया था इसलिए सुनील को सुलतान के पास पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं हुई ।
सुलतान ने मुस्कराकर सुनील का स्वागत किया और उसे एक कुर्सी पर बैठने का संकेत किया ।
सुनील भारी संकोच का अनुभव करत । हुआ बैठ गया ।
सुलतान सहज स्वर से बोला - “विस्की पियोगे सुनील ?”
“विस्की ?” - सुनील के मुंह से निकला ।
“हां ।” - सुलतान बोला ।
“नहीं आप पीजिये ।” - सुनील शिष्ट स्वर में बोला ।
सुलतान बिना कुछ बोले बाथरूम में गया और वहां से एक विस्की की बोतल और दो गिलास लेकर लौटा ।
“वैसे तुम पीते हो न ?” - सुलतान ने पूछा ।
“जी हां, पीता तो हूं ।”
“तो फिर इन्कार मत करो ।” - सुलतान बोतल बोतल खोलकर दो गिलासों में शराब डालता हुआ बोला - “जो विस्की में तुम्हें पिलाने वाला हूं, वह दुनिया भर में किसी दूसरे आदमी को हासिल नहीं है । इस विस्की का नाम ग्लेनार्डरी है और यह ब्रांड फ्रांस की कम्पनी किर्फ मेरे लिए बनाती है ।”
सुनील चुप रहा ।
“पियो ।” - सुलतान ने आदेश दिया ।
सुनील ने एक गिलास उठा लिया ।
जितने समय में सुनील ने अपनी विस्की कर एक घूंट पिया, उतने समय में सुलतान दो पैग पी गया । इतनी छोटी उम्र में ही लगता था, वह तगड़ा पियक्कड़ बन गया था ।
सुलतान ने अपने गिलास में फिर विस्की डाल ली ।
उसी क्षण किसी ने द्वार खटखटाया ।
“कौन ?” - सुलतान ने आवाज लगाई ।
“शीहाब ।” - उत्तर मिला ।
सुलतान ने जल्दी से अपने गिलास की विस्की हलक मे उड़ेली और सुनील से बोला - “जल्दी गिलास खाली करो ।”
सुनील ने भी हड़बड़ाहट में फौरन अपना खाली कर दिया ।
सुलतान ने बोतल और दोनों गिलास उठाए और उन्हें बाथरूम में कहीं रख आया ।
“मैं शीहाब अल जूरी के सामने विस्की नहीं पीता हूं और कोशिश भी यहीं करता हूं कि उसे मालूम भी न होने पाए कि मैं विस्की पीता हूं । बोतल भी मैंने बाथरूम में पानी की टंकी में छुपाकर रखी हुई थी । शीहाब बेहद धर्मपरायण आदमी है और मुझे भी अपने जैसा बनाना चाहता है । उसे यह जानकर बहुत दुख है होगा कि मैं शराब पीता हूं ।”
“उसे मालूम नहीं ?” - सुनील ने पूछा ।
“उसने सुना बहुत होगा लेकिन उसने कभी मुझे विस्की पीते देखा नहीं है । और शीहाब अल जूरी ऐसा बूढा है जो अपने कानों पर नहीं आंखों पर विश्वास रखता है ।”
सुनील चुप हो गया ।
“आ जाइए ।” - सुलतान ने आवाज दी ।
शीहाब परेशान-सा द्वार खोलकर भीतर घुस आया ।
“अल्लाह ।” - वह हांफता हुआ बोला - “अल्लाह ।”
“क्या हुआ ?”
“प्रेस रिपोर्टर ।” - वह बोला - “रिपोर्टरों में फंस गया था मैं ।”
“रिपोर्टर ।” - सुलतान तीव्र स्वर से बोला - “रिपोर्टर कहां मिल गए थे आपको ?”
“नीचे होटल की लाबी में ।”
“मेरा भाई कहां है ?”
“वह रिपोर्टरों को इन्टरव्यू दे रहा है ।”
“उसे फौरन यहां लेकर आइए ।” - सुलतान नाराज स्वर से बोला - “पता नहीं रिपोर्टरों के सामने क्या अनाप-शनाप बक रहा होगा वह ।”
शीहाब अल जूरी उल्टे पांव वापिस लौट गया ।
पांच मिनट बाद वह अबू दाउद के साथ वापिस लौटा ।
“मुझे क्यों बुलाया है ?” - अबू ने रुक्ष स्वर से पूछा ।
“मैंने तुम्हें यह याद दिलाने के लिए बुलाया है ।” - सुलतान कठोर स्वर से बोला - “कि मेरे या शीहाब अल जूरी के अलावा मेरी पार्टी का कोई आदमी प्रेस वालों से शीहकर या वहां की हकूमत से सम्बन्धित किसी भी विषय पर बातचीत नहीं करेगा ।”
अबू दाउद के चेहरे पर क्रोध और घृणा के मिले-जुले भाव उभरे और विलीन हो गए ।
“मुझे आशा है कि भविष्य में तुम इस बात को याद रखोगे ।”
“मैं याद रखूंगा ।” - अबू दाउद अबतापूर्ण स्वर में बोला ।
सुलतान ने आग्नेय नेत्रों से अबू की ओर देखा और फिर उसकी ओर से पीठ फेर ली ।
शीहाब अल जूरी ने अबू को संकेत किया ।
फिर दोनों कमरे से बाहर निकल गए ।
शीहाब जाती बार दरवाजा बन्द कर गया ।
“यह मेरा भाई है ।” - सुलतान भड़क कर बोला - “जो हर समय मेरी पीठ में छुरा भौंकने का मौका तलाश करता रहता है । चौबीस घण्टे यह मेरे कत्ल की साजिश रचता रहता है ताकि मेरी जगह यह खुद शीहकर का सुलतान बन सके । फ्रांसीसियों ने इसे खरीदा हुआ है और यह समझता है कि उनकी मदद से यह मेरा तख्ता पलटने में कामयाब हो जाएगा ।”
सुनील ने चुप रहना ही उचित समझा ।
“यह शीहकर की जनता को यह कह कर मेरे खिलाफ भड़काता रहता है कि मैं गद्दार हूं, मैंने अपने देश को अंग्रेजों के हाथ बेच दिया है । अब खुद यह जनता में यह नारा बुलन्द करता रहता है कि शीहकर के मालिक शीहकर लोग ही होने चाहिये अंग्रेज नहीं । मेरे देश की मूर्ख जनता यह नहीं समझती कि अगर मेरी जगह अबू दाउद सुलतान बन गया तो फर्क केवल इतना पड़ेगा कि मुल्क अंग्रेजों की जगह फ्रांसीसियों के हाथ में चला जाएगा ।”
“अगर, भगवान न करे ।” - सुनील ने झिझकते हुए पूछा - “आपको कुछ हो जाए तो शीहकर ही गद्दी का मालिक अबू दाउद बन जाएगा ।”
“हां ।” - सुलतान बोला - “इसलिए तो यह दिन रात मेरी हत्या की साजिशें करता रहता है । दो बार मुझे जहर भरा खाना खिलाने की कोशिशें की जा चुकी हैं । एक बार मुझ पर गोली चलाई गई थी लेकिन खुदा के शुक्र से मैं बाल-बाल बच गया था ।”
“आप जानते हैं कि इन तमाम हरकतों के पीछे अबू दाउद का हाथ है ?”
“हां ।”
“फिर भी आप अबू दाउद को आजाद घूमने देते हैं !” - सुनील ने आश्चर्य से पूछा ।
“मैं अबू दाउद को जिन्दगी भर के लिए जेल में सड़ने के लिए डाल सकता हूं लेकिन मैं ऐसा करना नहीं चाहता ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि ऐसा करने से अबू दाउद शीहकर की जनता की निगाहों में हीरो बन जाएगा । लोग यही समझेंगे कि मैं अपने अधिकारों का अनुचित प्रयोग करके अपने भाई पर जुल्म कर रहा हूं । अबू दाउद को गिरफ्तार करके मैं उसके शीहकर को अंग्रेजों के प्रभाव से मुक्त करवाने के महान मिशन में रुकावट डाल रहा हूं ।”
सुनील चुप रहा ।
“लेकिन मैं शीघ्र ही अपने इस नमकहराम भाई का सिर कुचलने में सफल हो जाऊंगा । मेरे पास अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि मेरी हत्या करवाने की साजिश के पीछे मेरे भाई का हाथ है । एक बार मेरे हाथ कोई सबूत लग जाए फिर मैं इसे चौराहे पर फांसी चढा दूंगा ।”
“आप अबू दाउद को भारत यात्रा पर अपने साथ क्यों लाए हैं ?”
“ताकि मेरी गैरमौजूदगी में यह शीहकर में रहकर कोई हंगामा न खड़ा कर सके । ताकि इसे खुले आम शीहकर की जनता को मेरे खिलाफ भड़काने का मौका न मिल सके । मैं अपने इस खतरनाक भाई को अपनी निगाहों के सामने ही देखना चाहता हूं ।”
“लेकिन... लेकिन” - सुनील हिचकता हुआ बोला - “अगर इसने यहां आपको जान से जान से मारने की कोशिश की तो ?”
“एक दूसरे मुल्क में आकर यह इतना बड़ा हौसला नहीं कर सकता । लेकिन फिर भी अगर मेरी भारत यात्रा के दौरान मुझे कुछ हो गया तो इसकी शत प्रतिशत जिम्मेदार अबू दाउद पर होगी ।”
सुनील चुप रहा ।
“तुम्हारे सिक्योरिटी अफसरों के इकरार करने पर मैं तुम्हें हर समय अपने साथ रखने के लिए तो तैयार हो गया हूं । लेकिन तुम्हारे ख्याल से क्या इस प्रकार के किसी इन्तजाम से कोई फायदा हो सकता है ?”
“सावधानी बरतने में क्या हर्ज है ?”
“हर्ज यह है कि इससे मेरे एकान्त में खलल पड़ता है । विशेष रूप से जब कि डोरिस भी यहां आने वाली है ।”
“डोरिस !”
“डोरिस उस अंग्रेज की लड़की का नाम है जिससे मैं शादी करने वाला हूं । वह राजनगर के ही एक अन्य होटल में मौजूद है । शाम होने तक मैं उसे यहां अपने पास बुलवा भेजूंगा । उसके बाद मेरी भारत यात्रा के दौरान वह साथ ही रहेगी । भारत से ही मैं सीधा इगलैंड चला जाऊंगा और वहां अंग्रेजी तौर-तरीकों के अनुसार डोरिस से शादी कर लूंगा ।”
“मैं आपकी तनहाई में किसी प्रकार की बाधा बनने की कोशिश नहीं करूंगा ।”
“हां, ऐसा ही करना ।” - सुलतान बोला - “वर्ना मुझे तुमको अपनी सेवाओं से मुक्त करना पड़ेगा ।”
सुलतान चुप हो गया और फिर नहीं बोला ।
***
शाम को डोरिस भी सुलतान के पास सम्राट होटल में पहुंच गई । डोरिस एक खुले-खुले हाथ-पांव वाली लगभग पच्चीस साल की बेहद खूबसूरत लड़की थी । कद में वह सुलतान अहमद बिन सईद से कम से कम एक फुट ऊंची थी । सुनील को वह बड़ी ही दुश्चरित्र और कमीनी-सी औरत लगी । सुलतान उसके मोहपाश मे बुरी तरह फंसा हुआ था लेकिन जब डोरिस उससे प्यार जताती थी या प्यार-भरी बातें करती थी तो वह अभिनय करती हुई मालूम होती थी आंतरिक रूप से उसे सुलतान से कोई विशेष मुहब्बत मालूम नहीं होती थी । लगता था कि केवल रुतबा और दौलत हासिल करने के लिए ही उसने सुलतान को अपने रूपजाल में फांसा हुआ था ।
शाम के अखबारो में सुलतान से सम्बन्धित एक बड़ी सैन्सेशनल न्यूज छपी । उस न्यूज के अनुसार सुलतान के पास कम से कम पचास लाख रुपये की कीमत के बेशकीमती हीरे जवाहरात थे जो एक सफेद रंग के चमड़े के छोटे से सूटकेस में बन्द थे और जिस सूटकेस को सुलतान कभी अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देता था । वह सफेद सूटकेस सुनील ने भी देखा या लेकिन उसे कभी यह नहीं सूझा था कि उसमें इतने कीमती हीरे भरे हुए होंगे ।
सुनील को अब अपना काम और भी कठिन मालूम होने लगा । अब उसे सुलतान की जान के साथ-साथ उसके माल की भी हिफाजत करनी होगी ।
हीरों के बारे में अखबारों में छप जाने से सुलतान भी खुश नहीं था । अखबार में यह समाचार देखकर उसने अपने निजी नौकरों को बहुत डांटा था क्योंकि अखबार बालों को हीरों की जानकारी केवल नौकरों द्वारा ही हो सकती थी ।
अब दाउद हाथ में अखबार में अखबार लिए उबलता हुआ सुलतान के कमरे में आया ।
“अहमद, क्या यह सच है ?” - अबू दाउद क्रोधित स्वर से बोला ।
उस समय सलतान के कमरे में शीहाब अल जूरी और सुनील के अतिरिक्त प्रतिरक्षा विभाग का एक प्रतिनिधि बैठा था जो सुलतान को उसकी राजधानी की यात्रा के बारे में बताने आया था ।
“क्या सच है ?” - सुलतान ने सरल स्वर से पूछा ।
“कि तुम अनपे साथ पचास लाख रुपये की कीमत के हीरे लिए फिर रहे हो ?”
“मैं अभी व्यस्त हूं । इस विषय में तुमसे फिर कभी बात करूंगा ।”
“टालो मत ।” - अबू दाउद गरजकर बोला - “मैं पूछता हूं क्या तुम सचमुच शीहकर से अपने साथ हीरे लीये हो ?”
सुलतान ने एक वितृष्णापूर्ण दृष्टि कमरे में मौजूद बाकी लोगों पर डाली और पिर धैर्यपूर्ण स्वर से बोला - “हां, लाया हूं ।”
“क्यों, क्यों ?” - अबू दाउद पांव पटकता हुआ गरजा - “वे तुम्हारी अपनी प्रोपर्टी नहीं है । शीहकर के शाही खजाने का माल है । और उस पर सल्तनत का अधिकार है । तुम्हें शाही खजाने से इस तरह हीरे चुरा लाने का कोई हक नहीं है ।”
“मैं शीहकर का सुलतान हूं । सल्तनत की हर चीज मेरी सम्पत्ति है । मैं उसे जिस ढंग से चाहूंगा, इस्तेमाल करूंगा । किसी को मुझे रोकने का हक नहीं है । अब तुम निकलो यहां से ।”
“लेकिन...”
अहमद एकदम उछलकर खड़ा हो गया । उसके नेत्र लाल हो गये और वह क्रोध से थर-थर कांपता हुआ चिघाड़ा - “गैट आउट ।”
अबू दाउद का दोबारा बोलने का होसला नहीं हुआ । वह एकदम घूमा और पांव पटकता हुआ कमरे से बाहर निकल गया ।
कुछ क्षण कमरे में मौत का-सा सन्नाटा छाया रहा । फिर सुलतान अपने स्थान पर बैठ गया और एक गहरी सांस लेकर शान्त स्वर में बोला - “आई एम सारी जन्टलमैन ! आपने देख ही लिया होगा कि शीहकर के शाही खानदान के लोग लड़ने-झगड़ने का मामले में अनपढ और जाहिल लोगों से किसी रूप में कम नहीं हैं ।”
कोई कुछ नहीं बोला ।
“आप फरमाइये क्या कह रहे थे आप ?” - सुनील प्रतिरक्षा मन्त्रालय के प्रतिनिधि से सम्बोधित हुआ ।
प्रतिनिधि ने खंखारकर अपना गला साफ किया और फिर झिझकते स्वर में बोला - “रात को ग्यारह बजे तक एक्सप्रेस गाड़ी राजनगर से राजधानी की ओर रवाना होती है । उस गाड़ी में आपके लिए एयरकन्डीशन्ड डीलक्स कोच लगाया जा रहा है । वह गाड़ी सुबह दस बजे राजधानी पहुंच जायेगी । राजधानी के स्टेशन पर स्वयं प्रधानमन्त्री आपके स्वागत के लिए मौजूद होंगी । वहां से आपको राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए सीधा राष्ट्रपति भवन ले जाया जायेगा ।”
“बड़ी अच्छी बात है कि गाड़ी दस बजे राजधानी पहुंचेगी । मैं सुबह उठना खासतौर पर नापसन्द करता हूं ।” - सुलतान मुस्कराकर बोला ।
“यह आपके डीलक्स कोच का नक्शा है ।” - प्रतिनिधि एक ब्लू प्रिंट सुलतान के सामने मेज पर फैलाता हुआ बोला - “इसमें चार केबिन हैं । आप जिस ढंग से चाहें इस्तेमाल कर सकते हैं । आपके बाकी स्टाफ को डीलक्स कोच के अगले स्लीपर कोच में स्थान दिया जा सकता है ।”
“शायद इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी ।” - सुलतान नक्शा देखता हुआ बोला - “इस कोच में चार केबिन हैं । एक मुझे जाहिए, एक डोरिस के लिए, एक अबू दाउद के लिए और एक शीहाब अल जूरी के लिये । नौकर गलियारे के फर्श पर सो जाएंगे ।”
“उनका दूसरे डिब्बे में इन्तजाम हो जायेगा ।”
“कोई जरूरत नहीं । वे लोग इस प्रकार सोने के आदी हैं । लेकिन... लेकिन इस कोच में सुनील के लिए जगह नहीं ।”
“आपका मतलब है कि सुनील राजधानी भी आपके साथ ही जायेगा ?” - शीहाब अल जूरी हैरानी से बोला ।
“हां ! सुनील मेरा दोस्त है । मैं इसे इतनी जल्दी छोड़ना नहीं चाहता ।” - सुलतान बोला ।
“तो फिर वह अगले कम्पार्टमेंट में सो जायेगा ।” - शीहाब अल जूरी बोला । फिर एकदम वह सुनील की ओर घूमकर बोला - “आपको तो कोई एतराज नहीं होगा ?”
सुनील के उत्तर देने से पहले ही सुलतान बोल पड़ा - “नहीं ! सुनील का प्रबन्ध भी इसी कोच में होना चाहिए ।”
सुनील ने शान्ति की सांस ली ।
“केबिन काफी बड़े हैं ।” - प्रतिनिधि बोला - “और हर केबिन में दो बर्थ हैं । किसी के साथ केबिन शेयर करने में हर्ज न समझें तो...”
“इन्हें अबू दाउद के साध रहने दीजिए ।” - शीहाब अल जूरी ने राय दी ।
शीहाब अल जूरी के कहने के ढंग से ही स्पष्ट था कि वह खुद अपने साथ तो दूसरे आदमी की मौजूदगी चाहता नहीं था । डोरिस के केबिन का सवाल ही पैदा नहीं होता । सुलतान अहमद को तो ऐसा सुझाव देना भी असीम नीच लगता था । केवल अबू दाउद ही बाकी रह जाता था । और वह भी शायद ऐतराज करता ।”
“अबू दाउद को कहने की जरूरत नहीं है ।” - सुलतान निर्णयात्मक स्वर से बोला - “लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूं, मुझे कोई दिक्कत नही होगी ।”
शीहाब फिर नहीं बोला । उसके दाएं हाथ को उंगलियां मशीन की तरह तसबीह के मनकों पर फिरने लगीं ।
“और ?” - सुलतान ने प्रतिरक्षा-मन्त्रालय के प्रतिनिधि से प्रश्न किया ।
प्रतिनिधि ने बाकी का प्रोग्राम भी बता दिया । शाम को सिटी हाल में सुलतान के नागरिक अभिनन्दन का आयोजन था । उसके बाद सम्राट होटल के ही विशेष रूप से सुसज्जित डाइनिंग हाल में राष्ट्र के कुछ नेताओं और नगर के गणमान्य व्यक्तियों के साथ शाही मेहमान के लिए एक विशेष भोज का प्रबन्ध था । भोज के पश्चात सुलतान स्टेशन जायेंगे और राजनगर की जनता के प्रतिनिधियों की ओर से उन्हें विदाई दी जायेगी ।
सुलतान ने सहर्ष सारे प्रोग्राम को ओके कर दिया । प्रतिरक्षा मन्त्रालय का प्रतिनिधि विदा हो गया ।
***
सम्राट होटल में विशेष रूप से सजाये गये डाइनिंग हाल में भोज का आयोजन था । भोज में परोसी जाने वाली बहुत-सी वस्तुयें सुलतान के निजी रसोइए के निरीक्षण में बनाई गई थीं ।
सुनील की पार्टी में से केबल शीहाब अल जूरी ही एक ऐसा आदमी था जो शुरूआत से औपचारिक रूप से अतिथियों की भीड़भाड़ में शामिल हुआ था लेकिन जल्दी ही वह क्षमा प्रार्थना करके वापिस अपने कमरे में चला गया । उसके चले जाने के बाद सुलतान ने सुनील को बताया था कि शीहाब अलजरी बेहद धर्मपरायण आदमी था । उसके संस्कार ऐसे नहीं थे कि वह ऐसी हंगामाखेज पार्टियों से आनन्दित हो सके ।
भोज के बाद एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आरंभ हुआ । कार्यक्रम का आरम्भ हुआ एक भारतीय नाट्यक्रम की नर्तकी के प्रदर्शन से ।
सुलतान मेजर और अन्य राष्ट्रीय नेताओं के बीच में बैठा हुआ था । सुनील सुलतान कम से कम पन्द्रह सीटें दूर बैठा हुआ था । उस स्थिति में सुनील का सुलतान के पास बैठना सम्भव भी नहीं था और न ही सुलतान ने भी आयोजकों से इस प्रकार कोई विशेष आग्रह किया था ।
सुनील से थोड़ी दूर डोरिस बैठी हुई थी ।
अबू दाउद उसे भीड़भाड़ में कहीं दिखाई नहीं देता था ।
एकाएक किसी ने पीछे से सुनील के कन्धे को छुआ ।
सुनील ने घूमकर देखा । अरब ड्रेस पहने हुए एक आदमी खड़ा था शायद वह सुलतान के नौकरों की टीम में से एक था ।
“आपका टेलीफोन है, मास्टर ।” - अरब सिर झुकाकर बोला ।
“तुम जानते हो, मैं कौन हूं ?”
“यस मास्टर, आप हिज हाईनस के मित्र हैं । मिस्टर सुनील ।”
“टेलीफोन किसका है ?”
“मालूम नहीं । मैंने पूछा नहीं मास्टर ।”
सुनील उठ खड़ा हुआ और अरब के पीछे हो लिया ।
“मैंने आपरेटर से काल नीचे कमरे में ट्रांसफर करवा ली है ।” - अरब मार्गदर्शन करता हुआ बोला - “ताकि आपको आठवी मंजिल पर जाने की जहमत न उठानी पड़े ।”
“थैंक्यू ।” - सुनील बोला ।
अरब उसे एक कमरे में ले आया । अरब ने द्वार खोला और बड़े आदरपूर्ण ढंग से शीश नवाकर खड़ा हो गया ।
सुनील कमरे के भीतर प्रवेश कर गया । टेलीफोन पलंग के समीप एक मेज पर पड़ा था । सुनील टेलीफोन की ओर बढा ।
उसी क्षण उसे लगा जैसे उसके सिर पर पहाड़ आ गिरा हो । उसके नेत्रों के सामने लाल-पीले सितारे नाच गये । किसी ने पीछे से उसके सिर पर कड़ी वजनी चीज का प्रहार किया था । सुनील चकराकर फर्श पर ढेर हो गया ।
चेतना लुप्त होने से पहले उसने कमरे का द्वार भड़ाक से वन्द होने की आवाज सुनी ।
न जाने कितनी देर बाद उसे होश आया । उसने नेत्र खोले लेकिन गहन अन्धकार के अतिरिक्त उसे अपने आसपास कुछ भी दिखाई नहीं दिया । उसने अपने हाथ-पांव हिलाने का प्रयत्न किया तो उसे मालूम हुआ कि उसकी टांगे टखनों के पास बड़ी मजबूती से एक दूसरे से बंधी हुई थी । उसी प्रकार उसके हाथ पीठ पीछे बंधे हुए थे और उसके मुंह में भी कपड़ा ठूंसकर ऊपर से पट्टी बांधी हुई थी ।
सुनील ने पूरा जोर लगाकर मुंह से आवाज निकालने की कोशिश की लेकिन आवाज के स्थान पर एक भारी-सी गों-गों के सिवा कुछ न निकला । उसने अपने पांव फैलाये और वे दूसरी ओर किसी ठोस वस्तु से जा टकराये । पैरों से टटोलने पर उसे मालूम हुआ था कि वह दरवाजा था । सुनील ने जोर-जोर से द्वार पर पैर पटकने आरम्भ कर दिए ।
अगले ही क्षण दरवाजा खुला और प्रकाश की एक क्षीण-सी किरण सुनील के ऊपर दौड़ गई । उस प्रकाश में सुनील इतना ही जान पाया कि वह बाथरूम में बन्द था ।
फिर द्वार पर एक आदमी का साया दिखाई दिया ।
“मिस्टर ।” - साया कठोर स्वर से बोला - “अगर शोर मचाने की कोशिश करोगे मचाने की कोशिश करोगे तो मुझे तुम्हारी खोपड़ी तोड़नी पड़ेगी ।”
सुनील चुप रहा ।
साया आगे बढा और फिर उसके शरीर पर झुक गया । उसने सुनील के बन्धनों को टटोला और फिर जब सन्तुष्ट हो गया कि बन्धन ढीले तो नहीं हो गए हैं तो वह फिर सीधा खड़ा हो गया ।
“चुपचाप पड़े रहो ।” - साया तनिक नम्र स्वर से बोला - “तुम्हें विश्वास दिलाता हूं तुम्हें कुछ नहीं होगा ।”
साया बाहर निकल गया ।
जाती बार वह फिर बाथरूम का द्वार बन्द कर गया ।
बाथरूम में दोबारा घुप्प अन्धकार छा गया ।
सुनील कुछ क्षण बिना हिले-डुले फर्श पर पड़ा रहा फिर उसने स्वयं को बन्धनमुक्त करने की लम्बी और बोरिंग क्रिया आरम्भ कर दी ।
वह अपने हाथों को उमेठकर एक विशेष स्थिति में ले आया और फिर उसने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी को दीवार के साथ सुलाकर उसके एक विशेष भाग पर दबाव डाला ।
घड़ी के खोल में से एक पतला ब्लेड जैसा पैना चाकू बाहर निकल आया । उसने अपनी कलाइयों को इस प्रकार उमेठा कि चाकू का फल रस्सियों के सम्पर्क में आ गया । वह अपनी कलाइयों को धीरे-धीरे मरोड़ने लगा । चाकू का नाजुक फल धीरे-धीरे रस्सी पर रगड़ खाने लगा ।
एक सदी जितना समय गुजर जाने के बाद सुनील को रस्सी का एक बन्द टूटता हुआ महसूस हुआ । उसने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया और लम्बी-लम्बी सांसें लेने लगा ।
इस प्रकार के बन्धन काट पाने के लिए एक लम्बे समय और भारी धैर्य की जरूरत होती थी ।
थोड़ी देर बाद वह फिर बन्धन काटने के भागीरथ प्रयत्न में जुट गया ।
उसी क्षण कमरे का द्वार दोबारा खुला और एक साया फिर बाथरूम में प्रविष्ट हुआ ।
सुनील ने हाथ-पांव ढीले छोड़ दिए और नेत्न बन्द कर लिए । अगर उस आदमी को पता लग गया कि वह अपने बन्धन किसी हद तक काटने में सफल हो गया है तो...
साया उसके समीप पहुंचा । फिर उसने अपने जूते की ठोकर से सुनील की पसलियों को टटोला ।
सुनील ने नेत्न खोल दिए और फिर उसने अपने शरीर को साए की ठोकर से परे सरका लिया । साथ ही उसके मुंह से गों-गों की विरोधपूर्ण आवाज निकली ।
साया नीचे झुका । पहले उसने उसके मुंह पर बंधी हुई पट्टी को टटोला फिर उसने उसके पैरों के बन्धन को चैक किया । फिर उसका हाथ सुनील की कलाइयों की ओर बढा ।
सुनील ने अपनी कलाइयों को अपने शरीर के नीचे दबा लिया ।
साए ने एक ही झटके से उसके शरीर को उलट दिया । अगले ही क्षण साए के मुंह से एक आश्चर्य भरी सिसकारी निकल गई ।
वह एकदम उठ खड़ा हुआ । फिर साये का दायां पांव हवा में घूमा और पूरी शक्ति से सुनील की पसलियों से टकराया । उस प्रहार से बच पाना असम्भव था । सुनील पीड़ा से बिलबिला उठा ।
उसी स्थान पर साये के जूते की दूसरी ठोकर पहले से भी ज्यादा ओर से टकराई । सुनील के चेहरे पर वेदना के तीव्र भाव उभरे । उसकी आंखों के आगे अन्धकार छाने लगा ।
तीसरी ठोकर सबसे अधिक प्रचण्ड थी । उस ठोकर के झटके से सुनील का शरीर कम से कम एक फुट पीछे छिटक गया । लेकिन इस बार उसे पहले जितनी पीड़ा महमूस नहीं हुई क्योंकि फौरन वह होश खो बैठा ।
जब उसे होश आया तो उसकी पसलियां ताजे जख्म की तरह दुख रही थीं । उसने अपनी कलाई पर बंधी रस्सियों को अनुभव किया । उसकी कलाइयां नई रस्सियों से बांध दी गई थीं और उसकी कलाई पर से उसकी घड़ी गायब थी ।
बाहर कमरे में से किसी प्रकार की आवाज नहीं आ रही थी ।
सुनील कुछ क्षण बिना हिले-डुले नेत्र बन्द किए हुए पड़ा रहा । उसकी पसलियां अब भी बुरी तरह दुख रही थीं । लेकिन सुनील दर्द की परवाह किए बिना दुबारा अपनी कलाइयों के बन्धन ढीले करने में जुट गया ।
कई घण्टे गुजर गए ।
उसकी कलाई पर बंधी रस्सियां टस से मस नहीं हुई ।
हताश होकर सुनील ने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया ।
सवेरा हो गया ।
सुबह के प्रकाश की किरणें बाथरूम की खिड़की के शीशों से भीतर फूटने लगीं ।
उसी क्षण सुनील को बाहर के कमरे में किसी की उपस्थिति की आहट सुनाइ दी ।
सुनील अपने एक दूसरे के साथ बंधे हुए पैर जोर-जोर से दरवाजे के साथ टकराने लगा ।
कमरे के बाहर से आने वाली आहट एकदम बन्द हो गई । सुनील पूर्ववत द्वार प्रहार करता रहा ।
फिर दूसरी ओर से किसी के कदमों की आहट सुनाई दी । कोई बाथरूम के द्वार के समीप पहुंचा । फिर द्वार की नाब घूमी और धीरे-धीरे द्वार खुलने लगा ।
द्वार पूरा खुला तो सुनील की दृष्टि सम्राट होटल के एक वेटर पर पड़ी ।
सुनील के मुंह से फिर गों-गों की आवाज निकलने लगी और वह अपने हाथ-पांव पटक कर वेटर को अपने बन्धन खोलने का संकेत देने लगा ।
भय और आतंक से वेटर के नेत्न फैल गए । उसके मुंह से एक हल्की-सी सिसकारी निकली और वह उल्टे पांव वहां से भाग खड़ा हुआ ।
सुनील निराश हो गया । उसने फिर अपने हाथ-पांव ढीले छोड़ दिए ।
लगभग पांच मिनट बाद वही वेटर फिर भागता हुआ कमरे में प्रविष्ट हुआ । इस बार उसके साथ एक लगभग पचास साल का सूटबूटधारी आदमी था ।
सुनील उसे पहचानता था । वह होटल का मैनेजर था । वेटर और मैनेजर ने मिलकर जल्दी-जल्दी सुनील के बन्धन खोल दिए । फिर उन्होने उसकी बगलों में हाथ डाल-कर उसे अपने पैरों पर खड़ा करने का प्रयत्न किया । लेकिन कई घण्टे लगातार बंधे रहने की वजह से सुनील के अंग में रक्त का प्रवाह इस हद तक रुक चुका था कि सुनील के पांव उसके शरीर का भार नहीं सम्भाल पा रहे थे ।
कितनी ही देर वेटर और मैनेजर मिलकर उसके शरीर के विभिन्न अंगों को हथेलियों से रगड़ते रहे ।
अन्त में सुनील की जुबान खुली - “प... पानी ।”
वेटर झपटकर पानी ले आया ।
सुनील ने कांपते हाथों से गिलास थामा और गटागट पी गया । उसने गिलास वेटर को थमा दिया और लम्बी-लम्बी सांसें लेने लगा ।
“क्या हआ था मिस्टर सुनील ?” - मैनेजर ने व्यग्र स्वर से पूछा । शायद वह सुनील को जानता था ।
“सुल्तान अहमद बिन सईद कैसे हैं ?” - मैनेजर के प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर सुनील ने पूछा ।
“कैसे हैं, क्या मतलब ?” - मैनेजर हैरानी से बोला ।
“म... मेरा मतलब है, उन पर किसी प्रकार का आक्रमण...”
“सवाल ही पैदा नहीं होता ।” - मैनेजर बोला - “पुलिस और सीआईडी की इतनी बड़ी सुरक्षा के बावजूद कौन आदमी सुलतान का अहित करने का साहस कर सकता है । सुलतान अपने दल के साथ राजनगर रेलवे स्टेशन से सकुशल प्रस्थान कर गए हैं सुनील साहब । मैं खुद उन्हें ट्रेन पर विदा करने गया था । और ट्रेन पर भी सीक्रेट सर्विस के लोगों का भरपूर पहरा है ।”
सुनील की जान में जान आई । उसने, छुटकारे की एक गहन निश्वास ली । शायद शत्नुओं का दांव नहीं चल पाया था ।
“लेकिन आप इस हालत में कैसे पहुंच गए ?” - मेनेजर ने पूछा ।
सुनील ने उसे बता दिया ।
“आपको जो आदमी फोन के लिए बुलाने आया था, वहा अरब ड्रैस में था ?” - मैनेजर ने पूछा ।
“हां ।”
“और सूरत से भी अरब ही लगता था ?”
“हां ।”
“लेकिन होटल में सुलतान की पार्टी के लोगों के अतिरिक्त कोई भी ड्रैस में नहीं था । सुलतान की पार्टी में छ: अरब नौकर थे जिनमें से तीन सुलतान से सम्बन्धित थे, दो अबू दाउद से और एक शीहाब अल जूरी से । उन नौकरों में से तो कोई बुलाकर नहीं ले गया था आपको ?”
“मैं कह नहीं सकता । जो आदमी मुझे बुलाने आया था, मैंने ठीक से उसकी सूरत नहीं देखी थी और न ही मैंने सुलतान की पार्टी के छ: नौकरों को अच्छी तरह से देखा है ।”
“कमाल है । भरे पूरे होटल में ऐसी घटना हो गई और किसी को खबर भी नहीं हुई ।”
“यह कमरा आपने किसको दिया हुआ था ?” - सुनील ने पूछा ।
“किसी को भी नहीं ?” - मैनेजर बोला - “यह कमरा तो खाली था । आज यह किसी को दिया जाने वाला था इसलिए वेटर सफाई करने आया था और यहां आप इस हालत में मिल गए ।”
सुनील विचारपूर्ण मुद्रा बनाये चुपचाप बैठा रहा ।
“लेकिन किसी ने आपकी एसी हालत क्यों की ?” - मैनेजर हैरानी-भरे स्वर से बोला ।
“मैं सुलतान के साथ डीलक्स कोच में उन्हीं के केबिन में राजधानी तक सफर करने वाला था । शायद कोई यह नहीं चाहता था कि मैं सुल्तान के साथ सफर करूं ।”
“लेकिन क्यों ?”
“भगवान जाने ।”
“मैं पुलिस को फोन करूं ?”
“नहीं । कोई जरूरत नहीं ।”
सुनील अपने स्थान से उठ खड़ा हुआ ।
उसी क्षण उसकी दृष्टि कमरे के दूसरे कोने में रखी एक छोटी-सी तिपाई पर पड़ी । तिपाई पर उसकी मोजर रिवाल्वर और घड़ी पड़ी थी ।
सुनील लम्बे डग भरता हुआ तिपाई के समीप पहुंचा और उसने दोनों चीजें उठा लीं ।
“ये...” - मैनेजर ने कहना चाहा ।
“ये दोनों चीजें मेरी हैं ।” - सुनील बोला ।
“रिवाल्वर भी ?”
“हां ।”
मैनेजर विचित्र नेत्रों से सुनील को घूरने लगा ।
“थैंक्यू फार दि रेस्क्यु ।” - सुनील बोला लम्बे डग भरता हुआ कमरे से बाहर निकल गया ।
वह होटल की लाबी में से होता हुआ होटल से बाहर निकल गया । होटल की लाबी में मौजूद लोग उसे बुरी तरह घूर रहे थे । वजह सुनील का हुलिया था । उसके सूट में सिलवटें पड़ी थीं, कमीज मैली हो गई थी और उसका कालर बुरी तरह मुड़ा-तुड़ा हुआ था । टाई की नाट ढीली थी और वह एक मैली धज्जी की तरह गले में लटक रही थी । उसके बाल बिखरे हुए थे और चेहरा उजड़ा हुआ मालूम हो रहा था । सम्राट जैसे महंगे होटल के नफासत पसन्द मेहमान उसे यूं नाक सिकोड़ कर देख रहे थे जैसे कोई बेहद अवांछित व्यक्ति जानबूझकर होटल का वातावरण बिगाड़ने के लिए वहां घुस आया हो ।
सुनील लोगों की निगाहों की परवाह किए बिना बाहर सड़क पर आ गया ।
एकाएक उसे अपने पर्स का ख्याल आया । उसने जेब टटोली, पर्स जेब में मौजूद था । उसने जेब से पर्स निकाला और उसे खोल कर देखा । पर्स को छेड़ा नहीं गया था । शायद उसे गिरफ्तार करने वालों को उसकी जेब में मौजूद रुपये या उसकी कीमती घड़ी में कोई दिलचस्पी नहीं थी ।
होटल की बगल में ही कालटैक्स का पैट्रोल पम्प था जहां डाकतार विभाग का नीला बोर्ड टंगा दिखाई दे रहा था, जिस पर लिखा था - आप यहां से स्थानीय टेलीफोन कर सकते हैं ।
सुनील ने जेब से दस-दस पैसे के दो सिक्के निकाल लिए और फोन के समीप पहुंच गया ।
उसने कर्नल मुखर्जी का नम्बर डायल किया । कुछ देर दूसरी ओर घंटी बजती रही और फिर किसी ने रिसीवर उठा लिया ।
“राजनगर 88321 !” - सुनील ने कायन बाक्स में सिक्के डालने के बाद व्यग्रता से पूछा ।
“यस ।” - दूसरी ओर से उसे कर्नल मुखर्जी की आवाज सुनाई दी ।
“सर, क्या आप आवाज से पहचान सकते हैं कि मैं कौन बोल रहा हूं ?”
कुछ क्षण दूसरी ओर से कोई आवाज नहीं आई और फिर मुखर्जी का तनिक विचलित स्वर सुनाई दिया - “तुम ! कहां से बोल रहे हो ?”
“मैं राजनगर में ही हूं, सर ।”
“क्या ?” - मुखर्जी का हैरानी भरा स्वर सुनाई दिया - “तुम्हें तो इस समय रेलगाड़ी में शाही मेहमान के साथ होना, चाहिए था ।”
“बहुत गड़बड़ हो गई है, सर ।” - सुनील खेदपूर्ण स्वर में बोला - “मैं सारी बात आपको बाद में बताऊंगा । सर, इस समय सवा आठ बजे हैं । शाही मेहमान की रेलगाड़ी दस बजे राजधानी पहुंचेगी । क्या कोई ऐसा इन्तजाम सम्भव है जिससे मैं रेलगाड़ी से पहले राजधानी पहुंच जाऊं ?”
फैसला करने में मुखर्जी ने केवल एक क्षण लगाया । वे बोले - “तुम हवाई अड्डे पर पहुंचो । मैं आता हूं ।”
“राइट सर ।” - सुनील बोला और रिसीवर को हुक पर लटका कर बाहर निकल आया ।
***
कर्नल मुखर्जी का इन्तजाम बड़ा पक्का था । राजनगर से वायु सेना का एक हवाई जहाज मुखर्जी और सुनील को राजधानी के एयरोड्रम पर ले आया । वहां गृह मन्त्रालय की एक गाड़ी पहले से ही उनकी प्रतीक्षा कर रही थी ।
जिस समय मुखर्जी और सुनील कार से रेलवे स्टेशन के सामने उतरे उस समय दस बजने में केवल दो मिनट शेष थे ।
रेलवे स्टेशन पर पुलिस का कड़ा पहरा था ।
मुखर्जी ने आगे बढकर पुलिस के एक उच्चाधिकारी को अपना परिचय दिया और फिर किसी ने उन्हें भीतर जाने से नहीं रोका ।
राजधानी के स्टेशन पर एक विशिष्ट प्लेटफार्म था जो केवल देश के राष्ट्रपति और अन्य बड़े नेताओं द्वारा ही प्रधानमन्त्री शाही मेहमान के स्वागत के लिए मौजूद थीं ।
उसी क्षण ट्रेन ने रेलवे स्टेशन की हद में प्रवेश किया । गाड़ी थोडी देर रेंगती रहने के बाद रुक गई ।
शाही मेहमान का डीलक्स कोच ठीक उस स्थान के सामने आकर रुका जहां प्रधानमन्त्री और देश के अन्य नेता सुलतान के स्वागत के लिए खड़े थे ।
तत्काल ही कोच के मुख्य द्वार पर अपनी अरब वेशभूषा में सुसज्जित शीहाब अल जूरी और अबू दाउद दिखाई दिए । दोनों नीचे प्लेटफार्स पर उतर आए ।
मन्त्रालय के एक उच्चाधिकारी ने आगे बढकर उनका स्वागत किया और सुलतान के बारे में पूछा ।
“हिज हाईनस अभी अपने केबिन में हैं ।” - शीहाब अल जूरी ने बताया ।
सुनील की जान में जान आई ।
लोग प्रतीक्षा करने लगे ।
पांच मिनट गुजर गए ।
सुलतान अहमद बिन सईद के दर्शन नहीं हुए ।
सुनील फिर चिन्तित हो उठा ।
“सुलतान इतनी देर क्यों लगा रहा है ?” - उसने मुखर्जी से पूछा ।
“सुलतान कोई छोटा-मोट आदमी थोड़े ही है ।” - मुखर्जी तनिक व्यंग्यपूर्ण स्वर में फुसफुसाये - “एक पूरी हकूमत का मालिक है । फिर उसका मिजाज भी तो शहंशाहों जैसा ही होगा । केबिन में बैठा अपनी हीरों वाली पगड़ी ठीक कर रहा होगा । उसे इस बात की परवाह करने की क्या जरूरत है कि स्वयं प्रधानमन्त्री प्लेटफार्म पर उनके स्वागत के लिए खड़ी हैं ।”
सुनील चुप रहा ।
पांच मिनट और गुजर गए ।
सब के चेहरे पर व्यग्रता की स्पष्ट छाप दिखाई देने लगी ।
“बाई गाड, दीज ईस्टर्न रूलर्स हैव नो सैंस आफ टाईम ।” - उनकी बगल में खड़ा एक विदेशी बड़बड़ाया ।
“तुम यहीं ठहरो ।” - मुखर्जी बोलो - “मैं पता करता हूं, क्या बात है ।”
सुनील ने सहमति सूचक ढंग से सिर हिला दिया । मुखर्जी आगे बठ गए ।
फिर सुनील ने शीहाब अल जूरी को दुबारा कोच में प्रवेश करते देखा ।
थोड़ी देर बाद ही वह वापिस बाहर आया ।
“हिज हाईनेस के केबिन का द्वार भीतर से बन्द है ।”
शीहाब अल जूरी बेहद चिन्तित स्वर से बोला - “मैंने द्वार खटखटाया है लेकिन भीतर से कोई उत्तर नहीं मिला हैं । मुझे भय है हिज हाईनस को कुछ हो न गया हो ।”
“क्या हो सकता है उन्हें ?” - किसी ने प्रश्न किया ।
“हिज हाईनेस को कभी-कभी मूर्छा का दौरा पड़ जाता है ।”
उसके बाद कर्ई लोग एक साथ बोलने लगे ।
मुखर्जी वापस सुनील के पास आए ।
“आओ मेरे साथ ।” - मुखर्जी बोले - “सुलतान के केबिन का द्वार दूसरी चाबी से खोलने की कोशिश की जा रही है ।”
सुनील मुखर्जी के साथ कोच में घुस गया ।
सुनील ने देखा अबू दाउद प्लेटफार्म पर खड़ा था । उसके चेहरे पर किसी प्रकार की चिन्ता का भाव नहीं था । एकाएक सुनील को सुलतान अहमद के शब्द याद हो आए - “अगर मेरी भारत यात्रा के दौरान मुझे कुछ हो गया ।” - सुलतान ने कहा था - “तो इसकी शत प्रतिशत जिम्मेदारी अबू दाउद पर होगी ।”
सुलतान के केबिन का द्वार खोला गया । केबिन खाली था ।
शीहाब अल जूरी लपक कर केबिन से सम्बन्धित बगल के एक छोटे से केबिन में घुस गया । उस केबिन के एक भाग में टायलेट रूम था और दूसरे में शावर बाथ था । दोनों भागों को बीच में से एक पर्दे द्वारा विभक्त किया गया था ।
छोटा केबिन भी खाली था ।
एक क्षण तो किसी के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया । सब मूर्खों की तरह एक-दूसरे का मुंह देखते रहे । फिर शुरूआत शीहाब अल जूरी ने की ।
“अल्लाह ! अल्लाह...!” - वह जोर-जोर से तसबीह फेरता हुआ बड़े व्यथापूर्ण स्वर से चिल्लाया- “मेरे मालिक को क्या हो गया ?”
पलक झपकते ही जंगल की आग की तरह यह समाचार चोरों तरफ फैल गया कि सुलतान अपने केबिन में नहीं हैं ।
सुलतान के गायब हो जाने का समाचार सुनते ही सीक्रेट सर्विस के उन दो अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए जिन्होंने सुलतान की सुरक्षा की खातिर राजनगर से राजधानी तक सलतान के डीलक्स कोच में ही सफर किया था ।
एकाएक सुनील को डोरिस का ख्याल आया । वह भी तो इसी कोच में सुलतान के साथ राजधानी में आ रही थी । सुलतान के गायब हो जाने की वजह से डोरिस की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया था ।
सुनील ने सीक्रेट सर्विस के दो अधिकारियों में से एक को पकड़ लिया ।
“सुलतान के साथ अंग्रेज महिला भी तो इसी कोच में सफर कर रही थीं ?” - उसने पूछा ।
“जी हां ।” - उत्तर मिला - “मिस डोरिस ।
“वे कहां गई ?”
“वे तो पिछले स्टेशन पर उतर गई थीं ।”
“क्या ?” - सुनील हैरानी से बोला ।
“हां ।”
“क्यों ।”
“मुझे नहीं मालूम । न ही मैंने पूछा था । गाड़ी रामगंज के स्टेशन पर पर रुकी तो वे केबिन से निकलकर गलियारे में आ गई थीं । उन्होंने वहीं उतर जाने की इच्छा व्यक्त की थी । मेरे कोई प्रश्न करने का सवाल ही नहीं था । मैंने कोच का द्वार खोल दिया था । और उनका सामान प्लेटफार्म पर रख दिया था ।”
“क्या सामान था ?”
“सफेद रंग के चमड़े के तीन सूटकेस थे ।”
“सुलतान, शीहाब अल जूरी या अबू दाउद में से किसी ने डोरिस को रामगंज के स्टेशन पर उतरते देखा था ?”
“शायद नहीं । उस समय सब लोग अपने-अपने केबिनों में बन्द थे ।”
“राजनगर से यात्रा आरम्भ होने पर कोई असाधारण घटना तो नहीं घटी थी ?”
“जी नहीं । बड़े स्वाभाविक ढंग से सफर आरम्भ हुआ था । गड़बड़ की कोई गुंजाइश ही नहीं थी । मैं और मेरा साथी दोनों रात-भर बिना एक पल के लिए भी आंख बन्द किए कोच की निगरानी करते रहे थे । कोच से बाहर निकलने के कोच के एक ही कोने में आमने-सामने दो दरवाजे हैं । दोनों पर मैंने ताला लगाया हुआ था और चाबी मेरे पास थी । मुझे तो समझ नहीं आ रहा कि यह करिश्मा कैसे हो गया ? सुलतान तो लगता है किसी जादू के जोर से रेलगाड़ी में से गायब हो गए हैं ।”
“सुल्तान को तुमने आखिरी बार कब देखा था ?”
“सुल्तान को आखिरी बार मैंने रात के लगभग बारह बजे देखा था । वे अपने केबिन में से निकले थे और उन्होंने बाहर आकर मिस डोरिस के केबिन का द्वार खटखटाया था । मिस डोरिस का केबिन सुल्तान के केबिन के बगल में ही था । दोनों केबिनों के बीच में भी एक दरवाजा है लेकिन फिर भी न जाने क्यों सुलतान ने बाहर आकर गलियारे वाला द्वार खटखटाना उचित समझा था । द्वार तत्काल ही खुल गया था और सुलतान डोरिस के केबिन में प्रवेश कर गये थे ।”
“फिर तुमने सुलतान को डोरिस के केबिन से बाहर निकलते भी देखा था ?”
“हां ।”
“क्या मतलब ?” - सुनील तीव्र स्वर में बोला ।
“दरअसल हम लोग कोई गलियारे की निगरानी तो कर नहीं रहे थे ।” - उत्तर मिला - “मैं और मेरा साथी तो द्वार के पास जो खुली जगह है, वहां बैठे रहते थे । वहां से गलियारा दिखाई नहीं देता है । बीच में थोड़ा-थोड़ा देर बाद उठकर हम दबे पांव गलियारे का एक राउन्ड लगा आते थे । पहली बार संयोगवश हमारी सुलतान पर नजर पड़ गई थी । बाद में सुलतान गलियारे में होकर अपने कमरे में गए या दोनों केबिनों के बीच के दरवाजे से ही अपने केबिन में चले गए हमें नहीं मालूम ।”
“या शायद वे अपने केबिन में गये ही न हों ।”
“सम्भव है ।”
“तुमने सारी रात में गलियारे में किसी और को देखा था ? विशेष रूप से अबू दाउद, शीहाब अल जूरी या डोरिस में से किसी को ।”
“अबू दाउद को देखा था ।”
“कब ?”
“रात को लगभग एक बजे । वह गलियारे में खड़ा था । उसी समय मैं गलियारे का चक्कर लगाने लिए निकला था, इसलिए मैंने उसे देख लिया था ।”
“गलियारे में क्या कर रहा था वह ?”
“उसका कथन था कि वह मुझे ही तलाश कर रहा था ।”
“क्यों ?”
“वह काफी पीना चाहता था ।”
“रात के एक बजे ?”
“जी हां ।”
“फिर ?”
“मैंने डाइनिंग कार में से उसे काफी मंगवा दी थी ।”
“अब एक बात का जरा सोचकर जवाब दो । तुम्हें उसके व्यवहार में कोई असाधारण बात दिखाई दी थी ?”
वह हिचकिचाया ।
“हिचकिचाने की जरूरत नहीं ।” - सुनील बोला - “सुलतान के गायब हो जाने के रहस्य का पर्दा उठाने के लिए छोटी से छोटी बात भी बड़ी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है ।”
“अबू दाउद से सामना होने पर मुझे ऐसा लगा था ।” - वह फिर भी हिचकिचाहट भरे स्वर में बोला - “जैसे वह एकाएक मुझे गलियारे में देखकर हड़बड़ा गया था । और मेरा ख्याल है अपनी हड़बड़ाहट छुपाने के लिए उसने खामखाह ही मुझे काफी का आर्डर दे डाला था ।”
“और ऐसी कोई बात जो तुम्हारी नजर में महत्वपूर्ण रही हो ?”
वह सोचने लगा ।
सुनील धैर्य से उसके दुबारा बोलने की प्रतीक्षा करने लगा
“एक बात मेरे दिमाग में थोड़ी-सी खटकती तो थी ।” - अन्त में वह बोला - “लेकिन इस बात की पूरी सम्भावना है की मुझे धोखा हुआ हो ।”
“क्या ?”
“मेरा ख्याल है कि जब डोरिस राजनगर से गाड़ी में सवार हुई थी, उस समय उसके पास सफेद रंग के चमड़े के दो सूटकेस थे लेकिन जब वह रामगंज के स्टेशन पर उतरी थी उस समय उसके पास तीन सूटकेस थी ।”
एकाएक सुनील के नेत्रों के सामने सुलतान का हीरे जवाहरातों वाला सफेद सूटकेस घूम गया ।
“तीनों सूटकेस एक ही टाइप के थे ?” - उसने पूछा ।
“हां ।”
“और साइज में भी एक जैसे थे ?”
“नहीं, एक सूटकेस बाकी दो सूटकेसों से छोटा था ।”
सुनील कुछ क्षण विचारपूर्ण मुद्रा बनाये चुपचाप खड़ा रहा ।
“तुम्हारा नाम क्या है ?” - अन्त में उसने पूछा ।
“वाजपेयी ।” - उत्तर मिला ।
“ओके वाजपेयी । मैं तुमसे फिर बात करूंगा ।”
“ओके ।”
सुनील वाजपेयी को वहीं खड़ा छोड़कर सुलतान के केबिन की ओर बढा ।
केबिन में पुलिस और सीक्रेट सर्विस के आदमी छानबीन कर रहे थे । केबिन में ही एक ओर मुखर्जी भी खड़े थे ।
सुनील मुखर्जी के समीप जा खड़ा हुआ ।
“कहां चले गए थे ?” - मुखर्जी ने धीमें स्वर से पूछा ।
“मैं सीक्रेट सर्विस के उन आदमियों मे से एक से बात कर रहा था जिन्होंने राजनगर से यहां तक इसी कोच में सफर किया था ।”
“कुछ हासिल हुआ ?”
“कोई विशेष बात नहीं । आप एक बात का पता लगवाइए ।”
“क्या ?”
“सुलतान के पास शाही के हीरे जवाहरातों से भरा हुआ सफेद रंग का एक छोटा-सा सूटकेस था । क्या वह अभी भी सुलतान के सामान में मौजूद है ?”
“मैं अभी पता लगवाता हूं ।” - मुखर्जी बोले और आगे बढ कर पुलिस के एक अधिकारी से बात करने लगे ।
सुलतान के सामान को चैक किया गया । सूटकेस गायब था ।
हीरों के सूटकेस के गायब होने की बात भी तत्काल सबको मालूम हो गई ।
अबू दाउद को जब यह बात मालूम हुई तो वह क्रोध से बिफर पड़ा और वह भारत सरकार के सुरक्षा अधिकारियों को बुरी तरह लगा ।
“सर !” - सुनील ने मुखर्जी को बताया - “सुलतान की प्रेमिका डोरिस न जाने क्यों गाड़ी से रामगंज के स्टेशन पर ही उतर गई है । सीक्रेट सर्विस के वाजपेयी से मालूम बातों से मुझे ऐसा संकेत मिला है कि हीरों का सूटकेस डोरिस ले गई है । आप डोरिस की तलाश करवाइए ।”
“अच्छा ।”
“यहां कोई सूत्र मिला है ?”
“अभी काम हो रहा है ।” - मुखर्जी ने बताया - “केबिन के विभिन्न भागों में से उंगलियों के निशान वगैरह डैवलप किए जा रहे हैं । सुलतान के बिस्तर की हालत को देखकर मालूम होता है कि सुलतान उस पर सोया नहीं था ।”
“मतलब यह कि सोने के नौबत आने से पहले ही सुलतान कहीं गायब हो गया था ?”
“ऐसा ही मालूम होता है ।”
उसी क्षण सुनील ने देखा, एक आदमी एक कैंची की सहायता से केबिन के फर्श पर बिछे कालीन को बीच से काट रहा था ।
“यह कालीन क्यों काटा जा रहा है ?” - सुनील ने पूछा ।
“कालीन पर कोई तरल पदार्थ बिखरा है । कालीन के उतने टुकड़े को काटकर पुलिस लेबोरेट्री में भेजा जा रहा है जहां टैस्ट करके यह पता लगाया जाएगा कि यह तरल पदार्थ क्या है ?”
“गन्ध वगैरह से कुछ मालूम नहीं हुआ ?”
“गलीचे में से हल्की-सी सौंप जैसी गन्ध आ रही है, लेकिन कोई उस गन्ध को पहचान नहीं पाया है ।”
“हल्की-सी सौंप जैसी गन्ध ।”
“हां । तुम पहचानते हो क्या ऐसी किसी गन्ध को ?”
“सुलतान ग्लेनार्डरी नाम की एक विशेष प्रकार की विस्की पीता है जो फ्रांस की एक कम्पनी केवल उसी के लिए बनाती है । सम्राट होटल में सुलतान से उस विस्की का एक पैग मुझे भी पिलाया था । उस विस्की में से हल्की-सी सौंप की गन्ध आती है ।”
“फिर तो गलीचे पर किसी प्रकार वह विस्की ही बिखर गई होगी ?”
“यही सम्भव मालूम होता है ।”
तब तक गलीचे का टुकड़ा काटा जा चुका था ।
मुखर्जी के संकेत पर सुनील ने वह टुकड़ा अपने हाथ में ले लिया और उसे सूंघकर देखा । उसमें से निश्चय ही ग्लेनार्डरी विस्की की गन्ध आ रही थी ।
सुनील ने टुकड़ा वापस लौटा दिया ।
“सुलतान शीहाब अल जूरी से छुपकर विस्की पीता था ।” - सुनील बोला - “और अपनी विस्की की बोतल भी शीहाब अल जूरी की नजरों से छुपाकर रखता था ताकि शीहाब अल जूरी की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुंचे । सम्राट होटल में उसने बोतल को बाथरूम में छुपाया हुआ था । सम्भव है यहां भी बाथरूम में ग्लेनार्डरी विस्की की बोतल मौजूद हो ।”
बाथरूम की तलाशी ली गई । वहां विस्की की बोतल तो नहीं मिली लेकिन बाथरूम में रखे आइस बाक्स के पानी में तैरता हुआ एक चौकोर कागज मिला जो वास्तव में ग्लेनार्डरी विस्की का लेबल था । प्रत्यक्ष था कि सुलतान ने अपनी विस्की की बोतल उस आइस बाक्स में रखी थी लेकिन सुलतान के सारे केबिन की भरपूर तलाशी के बावजूद भी बोतल के कहीं दर्शन नहीं हुए ।
“बोतल कहां गई ?”
“सम्भव है ।” - सुनील ने सुझाया - “कि सुलतान ने बोतल की सारी विस्की पी ली हो या बोतल की सारी विस्की फर्श पर बिछे कालीन पर बिखर गई हो और फिर सुलतान ने खाली बोतल उठाकर खिड़की के रास्ते चलती हुई गाड़ी में से बाहर फेंक दी हो ।”
“ऐसा ही हुआ होगा ।”
वे लोग पर्दा हटाकर छोटे केबिन के उस भाग में आ गए जिसमें शावर लगा हुआ था । पुलिस को वहां कोई सूत्र नहीं मिला । नहाने के साबुन का एक टुकड़ा केबिन के फर्श पर गिर पड़ा था । एक पुलिस अधिकारी ने साबुन का वह टुकड़ा उठा लिया और उसे दीवार के साथ लगी साबुन रखने के लिए प्रयुक्त होने वाली ट्रे में रख दिया ।
सुनील ने देखा साबुन का टुकड़ा हल्का-सा कुचल गया था । ऐसा लगता था जैसे असावधानीवश उस पर किसी का पांव पड़ गया था ।
सुनील ने सबकी नजर बचाकर ट्रे पर से वह टुकड़ा उठाया और अपनी जेब में डाल दिया ।
मुखर्जी ने उसे साबुन जेब में डालते देखा लेकिन मुंह से कुछ नहीं बोले ।
फिर नौकरों को बुलाया गया ।
सुलतान की पार्टी के छः नौकरों से अधिकारियों ने भरपूर सवाल किए लेकिन नतीजा कुछ भी न निकला । सारे नौकर रात भर घोड़े बेचकर सोते रहे थे । सुलतान के केबिन में क्या हुआ किसी को कुछ खबर नहीं थी ।
जब नौकर लौटने वाले थे तो एकाएक सुनील ने प्रश्न किया - “तुममें से सुलतान की विस्की कौन रखता था ?”
कुछ क्षण तक कोई कुछ नहीं बोला । फिर एक नौकर बागे बढकर बोला - “मैं रखता था ।”
“क्या नाम है तुम्हारा ?”
“करामत अली ।”
“क्या सुलतान की विस्की की कोई बोतल फर्श पर गिर-कर टूट गई थी ?”
“कोई बोतल टूटी तो नहीं थी, मालिक लेकिन...” - और करामत अली हिचकिचाने लगा ।
“लेकिन क्या ?”
“सुलतान की विस्की की एक बोतल चोरी हो गई थी ।”
“चोरी हो गई थी ! कब ? कैसे ?”
“सम्राट होटल से चलने से पहले हिज हाईनेस ने मुझे ग्लेनार्डरी विस्की की चार बोतलें दी थीं । मैंने ये बोतलें ट्रेन में आकर केबिनों की कतार के सिरे पर बनी छोटी-सी पैन्ट्री के एक शैल्फ में रख दी थीं । ट्रेन में आने के एक घन्टे बाद हिज हाईनेस ने मुझसे विस्की की एक बोतल मंगवाई थी मैं शैल्फ में से विस्की निकालने गया तो देखा, वहां चार के स्थान पर केवल तीन बोतलें पड़ी थीं ।”
“क्या मतलब ?” - सुनील ने तीव्र स्वर से पूछा ।
“एक बोतल चोरी हो गई थी मालिक ।” - करामत अली सिर झुकाकर बोला ।
“कौन ले गया ?”
“मालूम नहीं । मैं कई सालों से हिज हाइनेस की सेवा में हूं । यह पहला मौका था जब ऐसी घटना हुई थी ।”
“तुमने बोतलें कहां रखी थीं यह बात किस-किसको मालूम थी ?”
“मेरे ख्याल से तो किसी को भी मालूम नहीं या ।”
“तुमने इस चोरी की बात सुलतान को बताई थी ?”
“जी हां ।”
“सुलतान पर इस बात की क्या प्रतिक्रिया हुई थी ?”
“वे बहुत नाराज हुए थे । उन्होंने एक-एक को बुलाकर डांटा था और चोरी के बारे में पूछा था लेकिन यह मालूम नहीं हो सका था कि बोतल किसने चुराई है ?”
“सुलतान ने अबू दाउद से भी चोरी के बारे में पूछा था ?”
“हां मालिक । और इस बात पर शहजादा बहुत नाराज भी हुआ था कि उसको चोर समझा जा रहा है ।”
“तुम्हारे ख्याल से विस्की की बोतल कौन चुरा सकता है ?”
“मेरे ख्याल से तो कोई नहीं चुरा सकता है । नौकरों का तो विस्की की ओर गलत निगाहों से देखने का हौसला नहीं हो सकता । शाही इमाम शीहाब अल जूरी तो विस्की का जिक्र भी आने से अल्लाह को याद करने लगते हैं, वे तो विस्की को हाथ भी नहीं लगाएंगे । शहजादा अबू दाउद और मिस डोरिस मुझसे मांगकर बोतल ले सकते थे । बाकी रह जाते हैं आपके दो सरकारी आदमी । उनका विस्की चुराने का सवाल ही पैदा नहीं होता ।”
“तो फिर बोतल कहां गई ?”
“अल्लाह जाने ।”
“अच्छी बात है । जाओ ।”
करामत अली छुटकारे की गहरी सांस लेता हुआ वहां से चला गया ।
उसके बाद सारे डीलक्स कोच की तलाशी की बारी आई । अधिकारियों ने नौकरों को कोच से बाहर निकाल दिया और शीहाब अल जूरी और अबू दाउद से प्रर्थना की वे थोड़ी देर के लिए रेलवे स्टेशन के रिटायरिंग रूम में चले जायें । शीहाब अल जरी को तो इसमें कोई ऐतराज वाली बात दिखाई नहीं दी और वह फौरन अपना केबिन छोड़कर रिटायरिंग रूम में जाने के लिए तैयार हो गया लेकिन अबू दाउद भड़क उठा ।
“मैं अपने केबिन में ही रहूंगा ।” - वह बोला ।
“मैं आपको विश्वास दिलाता हूं साहब ।” - सुपरिन्टेन्डेन्ट कपूर बोला - “कि रिटायरिंग रूम भी केबिन जितना ही आरामदेय है ।”
“होगा । फिलहाल यहीं रहना चाहता हूं ।”
“लेकिन क्यों ?”
“क्योंकि मैं नहीं चाहता कि आप लाग तलाशी के बहाने मेरी निजी चीजों से छेड़खानी करें ।”
“हिज हाइनेस के गायब हो जाने के रहस्य को जानने के लिए हर चीज की तलाशी लेना बहुत जरूरी है ।”
“आप औरों की तलाशी लीजिए । मेरी तलाशी लेने का आपको कोई अधिकार नहीं है ।”
“तलाशी ली जानी बहुत जरूरी है, साहब ।” - कपूर तनिक कड़े स्वर में बोला - “मैं आपको विश्वास दिलता हूं कि आपकी निजी वस्तुओं कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा ।”
“नहीं ।”
“लेकिन...”
“शायद आप लोगों को यह मालूम नहीं है कि मेरे भाई अहमद की मौत के बाद शीहकर का सुलतान मैं हूं । अब भारत के एक मित्र राष्ट्र का सुलतान होने के नाते मैं आप लोगों से अच्छे व्यवहार की अपेक्षा करता हूं ।”
“आपको कैसे मालूम है कि आपके भाई सुलतान अहमद की मौत हो गई है ?” - कपूर के बोलने से पहले ही सुनील ने तीव्र स्वर से प्रश्न किया ।
अबू दाउद एकदम हड़बड़ा गया ।
“मेरा ख्याल है कि अहमद की हत्या हो चुकी है ।” - वह हड़बड़ाए स्वर में बोला - “वर्तमान स्थिति में यही बात सम्भव मालूम होती है । किसी ने सुलतान अहमद की हत्या करके खिड़की के रास्ते चलती गाड़ी में से बाहर फेंक दिया है ।”
“किसने ?”
“डोरिस ।” - अबू दाउद अपने स्वर को सन्तुलित करता हुआ बोला - “वही मेरे भाई को उंगलियों पर नचाती रही है । उस विलायती औरत की नीयत पर मुझे शुरू से ही शक था । वही सुलतान की हत्या करके सुलतान के हीरों से भरे सूटकेस को लेकर भाग निकली है और आप लोग हैं कि सांप के निकल जाने के बाद लकीर पीट रहे हैं । आपको चाहिए कि आप डोरिस को गिरफ्तार करें न कि छोटी-छोटी बातों के लिए मुझे परेशान करते रहें ।”
“आपने अपने भाई की हत्या नहीं की ?” - सुनील ने सरल स्वर में पूछा ।
“मैंने ! मैं भला अपने भाई की हत्या क्यों करता ?”
“शीहकार की हकूमत हथियाने के लिए ।”
“आप लोग मुझ पर ऐसे उलटे-सीधे इलजाम लगाकर मेरा अपमान कर रहे हैं ।” - अबू दाउद चिल्लाया - “मैं मांग करता हूं कि आप मुझे फौरन अपने प्रधानमन्त्री से मिलायें । अब मैं शीहकर का सुलतान हूं ।”
“जब तक यह बात सिद्ध नहीं हो जाती कि सुलतान की हत्या हो गई है तब तक आप शीहकर के सुलतान नहीं हैं ।”
अबू दाउद का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा ।
“मै फ्रंसीसी दूतावास में फोन करता हूं ।” - वह चिल्लाया और फिर पांव पटकता हुआ केबिन से बाहर निकल गया ।
“कहीं यह सचमुच ही कोई बखेड़ा न खड़ा कर दे ।” - कपूर चिन्तित स्वर में बोला ।
“पहले ही काफी बखेड़ा हो गया है । और फालतू बखेड़ा क्या हो सकता है ?” - सुनील बोला - “और फिर मेरी नजर में तो अबू दाउद मर्डर सस्पैक्ट नम्बर वन है ।”
कपूर ने चिन्तापूर्ण ढंग से सिर हिला दिया । सारे कोच की तलाशी ली गई । अब दाउद के सामान में से एक 37 कैलिबर की अमेरिकन रिवाल्वर मिली लेकिन उसमें से कोई फायर नहीं किया गया था । इसके अतिरिक्त कहीं कोई सूत्र नहीं मिला ।
मुखर्जी और सुनाल कोच से बाहर आ गए ।
“क्या राय है तुम्हारी ?” - मुखर्जी ने अपना पाईप सुलगाते हुए पूछा ।
“मुझे तो एक ही बात सम्भव मालूम होती है, सर ।” - सुनील ने गम्भीरता से उत्तर दिया - “किसी ने सुलतान अहमद बिन सईद की हत्या करके उसे ट्रेन से बाहर फेंक दिया है ।”
“लेकिन मिस्टर, फिर अभी तक सुलतान की लाश क्यों नहीं मिली ?” - मुखर्जी बोले - “राजनगर राजधानी के रास्ते से तो अभी कम से कम आधी दर्जन गाड़ियां गुजर चुकी हैं । किसी की तो नजर लाश पर पड़ी होती ?”
“सर, आप राजनगर से राजधानी तक की रेलवे लाइन की बड़ी बारीकी से छानबीन करवाइए । रेलवे लाइन के आसपास और भी कई महत्वपूर्ण सूत्र मिलने की सम्भावना है ।”
“रेलवे लाइन की छानबीन हो रही है ।”
“और डोरिस ?”
“उसकी भी तलाश जारी है । लेकिन मिस्टर, यह कतई जरूरी नहीं है कि हीरों वाला सूटकेस डोरिस ले गई हो । डोरिस के पास दो के स्थान पर तीन सूटकेस देखे जाना यह सिद्ध करता है कि उसके पास हीरों का सूटकेस भी था । सम्भव है डोरिस के पास शुरू से ही तीन सूटकेस हों और तुम्हारे वाजपेयी को गलतफहमी हुई हो ?”
“तो फिर हीरों वाला सूटकेस कहां गया ?”
“डोरिस का हीरे ले जाना युक्तितसंगत नहीं लगता । वह तो सुलतान की बेगम बनने वाली थी । उसे चुराने की क्या जरूरत थी लेकिन तुम्हारे अपने कथनानुसार अबू दाउद यह सुनकर बहुत भड़का था कि सुलतान शीहकर के शाही हीरे अपने साथ ले आया है । अबू दाउद को लाखों रुपयों के हीरों का लालच ज्यादा युक्तिसंगत मालूम होता है, सम्भव है उसने पहले से ही किसी से तय किया हुआ हो कि जब गाड़ी एक विशेष स्थान पर पहुंचेगी, उस समय वह हीरों का सूटकेस खिड़की से बाहर फेंक देगा ताकि उसका साथी बड़ी सहूलियत से सूटकेस वहां से ले जाये और बाद में किसी पूर्व निर्धारित स्थान पर अबू दाउद को सौंप दें ।”
“सम्भव है ।” - सुनील से स्वीकार किया ।
“देखो ।” - एकाएक मुखर्जी पटाक्षेप-सा करते हुए बोले - “मैंने तुम्हारे लिए स्पेशल पहचान पत्र बना दिया है । उसकी मौजूदगी में तुम्हें कोई भी, किसी प्रकार की निजी छानबीन करने से रोकेगा नहीं ।”
और मुखर्जी ने सुनील को एक कागज थमा दिया ।
“ओके सर ।”
मुखर्जी के पीठ फेरते ही सुनील ने अपनी जेब से एक लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकाला और एक सिगरेट सुलगा लिया । वह सिगरेट के लम्बे-लम्बे कश लेने लगा ।
एक सिगरेट की समाप्ति के बाद उमने दूसरा सिगरेट सुलगाया और रिटायरिंग कक्ष की ओर चल दिया । शीहाब अल जूरी रिटयरिंग कक्ष में दाउद-सा बैठा हुआ तसबीह फेर रहा था । सुलतान के गायब हो जाने से सब से अधिक दुखी वह मालूम होता था ।
सुनील को देखकर वह बड़े अवसादपूर्ण ढंग से मुस्कराया ।
“अबू दाउद कहां है ?” - सुनील ने पूछा ।
“मालूम नहीं । फ्रेंच एम्बैसेडर को फोन करने गया होगा ।”
“मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं ।”
“पूछो ।”
“आपको तो मालूम ही था कि मैं सुलतान के साथ राजधानी तक सफर करने वाला था ?”
“हां ।”
“फिर जब मैं स्टेशन नहीं पहुंचा तो आप लोगों ने सोचा नहीं कि मैं कहां गायब हो गया ?”
“ऐसा सोचने की कोई वजह ही नहीं थी । एक आदमी सुलतान के पास एक समाचार लेकर आया था कि एक बहुत ही जरूरी काम पर जाने से तुम सुलतान के साथ ट्रेन में सफर नहीं कर सकोगे और यह कि तुम सुलतान को राजधानी स्टेशन पर मिलोगे ।”
“जब कि वास्तव में मैं सम्राट होटल के ही एक कमरे में कैद था ।”
शीहाब अल जूरी चुपचाप तसबीह फेरता रहा ।
“सम्राट होटल में जो आदमी मुझे टेलीफोन के बहाने बुलाकर ले गया था वह एक अरब था और सम्राट के और नौकरों जैसा ही अरब परिधान पहने हुए था । मैंने आपकी पार्टी के सारे नौकरों की सूरत देखी है लेकिन वह उनमें से नहीं था ।”
“राजनगर में भी बहुत अरब रहते हैं ।” - शीहाब अल जूरी ने सुझाव दिया ।
“क्या सुलतान की पार्टी में से कोई आदमी राजनगर के अरबों सम्पर्क में था ?”
“सम्राट होटल में अबू दाउद के कमरे में मैंने कुछ स्थानीय अरब लोगों को आते दखा था और अबू दाउद खुद भी कई घण्टे अपने होटल से गायब रहा था ।”
“क्या नौकरों में से कोई होटल छोड़कर शहर गया था ?”
“मैं केवल अपने नौकर चिराग अली के बारे में कह सकता हूं । वह होटल छोड़कर कहीं नहीं गया ।”
“सुलतान अहमद के बाद शीहकर का सुलतान कौन बनेगा ?”
“अब दाउद ।” - शीहाब अनिच्छापूर्ण स्वर से बोला ।
सुनील ने शीहाब से विदा ली और बाहर आ गया । सीढियों में उसे अबू दाउद मिल गया ।
“शीहाब अल जूरी तुम्हारे बारे में बड़ी भयानक बातें कहता है ।” - सुनील बोला ।
“क्या कहता है वह ?” - अबू दाउद नाराज स्वर से बोला ।
“कहता है, सुलतान की हत्या तुमने की है ।”
“वह पाखंड़ी बूढा कुछ भी कह सकता है । वह मुझसे नफरत करता है क्योंकि वह जानता है कि अगर मैं सुलतान बन गया तो सबसे पहले मैं उसी को ऐसी-तैसी करूंगा ।”
“तुम्हें अपने भाई की मौत का अफसोस नहीं है ?”
“मुझे क्यों अफसोस होने लगा ! मैं तो कहता हूं, अच्छा हुआ वह मर गया । मुझे तो तब अफसोस होगा । अगर वह जिन्दा निकल आया । रास्ता छोड़ो । बहुत सवाल पूछ लिए तुमने ।”
सुनील एक ओर हट गया । अबू दाउद दनदनाता हुआ सीढियों पर चढ गया ।
सुनील नीचे प्लेफार्म पर आ गया ।
नीचे उसे सुपरिनटेन्डेन्ट कपूर मिल गया ।
“कोई नई बात ?” - सुनील ने पूछा ।
“सुलतान के केबिन में बिछे गलीचे का जो शराब से भीगा हुआ टुकड़ा पुलिस लैबोरेटरी में टैस्टिंग के लिए भेजा गया था, उसकी बड़ी सैन्सेशनल रिपोर्ट आई है ।”
“क्यों ?”
“गलीचे पर बिखरी शराब में इतनी बड़ी मात्रा में एक घातक जहर पाया गया है जो पचास आदमियों को मार देने के लिए काफी हो । इस नई खोज में इस तथ्य की और पुष्टि हो जाती कि सुलतान की हत्या हुई है ।”
“मुझे तो इस विषय में कभी भी संदेह नहीं था कि सुलतान की हत्या हुई है । सुलतान की हत्या की स्कीम तो राजनगर में ही बन चुकी थी ।”
“तुम्हें कैसे मालूम ?”
“सीधी बात है । मैं सुलतान के साथ उसके केबिन में सफर करने वाला था । मेरी सुलतान के केबिन में मौजूदगी सुलतान की हत्या की स्कीम को फेल कर सकती थी । इसलिए मुझे पहले ही सम्राट होटल में कैद करके रास्ते से हटा दिया गया ।”
कपूर चुप रहा ।
“रेलवे लाइन के रास्ते की छानबीन हो रही है ?”
“हां लेकिन अभी तक कोई रिपोर्ट नहीं आई है ।”
“जब रिपोर्ट आए तो मुझे भी बताना ।”
“अच्छा ।”
सुनील वहां से हट गया ।
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