सूट पहन लेने के बाद इमरान आईने के सामने लचक-लचक कर टाई बाँधने की कोशिश कर रहा था।
‘ओह...फिर वही...छोटी-बड़ी...मैं कहता हूँ टाइयाँ ही ग़लत आने लगी हैं।’
वह बड़बड़ाता रहा।
‘लाहौल विला क़ूवत...नहीं बाँधता!’
यह कह कर उसने झटका जो मारा तो रेशमी टाई की गाँठ फिसलती हुई न सिर्फ़ गर्दन से जा लगी, बल्कि इतनी तंग हो गयी कि उसका चेहरा सुर्ख़ हो गया और आँखें उबल पड़ीं।
‘बख़...बख़...खीं...’ उसके हलक़ से घुटी-घुटी-सी आवाज़ें निकलने लगीं और वह फेफड़ों का पूरा ज़ोर लगा कर चीख़ा, ‘अरे मरा...बचाओ! सुलेमान!’
एक नौकर दौड़ता हुआ कमरे में दाख़िल हुआ। पहले तो वह कुछ समझा ही नहीं कि क्यों इमरान सीधा खड़ा हुआ दोनों हाथों से अपनी टाँगें पीट रहा था!
‘क्या हुआ सरकार?’ नौकर भर्रायी हुई आवाज़ में बोला।
‘सरकार के बच्चे मर रहा हूँ।’
‘अरे...लेकिन...मगर...?’
‘लेकिन...मगर....अगर...’ इमरान दाँत पीस कर नाचता हुआ बोला, ‘अबे, ढीली कर।’
‘क्या ढीली करूँ?’ नौकर ने हैरान हो कर कहा।
‘अपने बाप के कफ़न की डोरी...जल्दी कर....अरे मरा।’
‘तो ठीक से बताते क्यों नहीं?’ नौकर भी झुँझला गया।
‘अच्छा बे, तो क्या मैं ग़लत बता रहा हूँ? मैं, यानी इमरान एम.एस.सी., पी-एच.डी. क्या ग़लत बता रहा हूँ। अबे कमबख़्त, इसे उर्दू में इस्तेआरा और अंग्रेज़ी में मेटाफ़र कहते हैं। अगर मैं ग़लत कह रहा हूँ तो बाक़ायदा बहस कर। मरने से पहले यह ही सही।’
नौकर ने ग़ौर से देखा तो उसकी नज़र टाई पर पड़ी, जिसकी गाँठ गर्दन में बुरी तरह से फँसी हुई थी और नसें उभरी हुई थीं। यह उसके लिए कोई नयी बात नहीं थी। दिन में कई बार उसे इस किस्म की हिमाक़तों का सामना करना पड़ता था।।
उसने इमरान के गले से टाई खोली।
‘अगर मैं ग़लत कह रहा था तो यह बात तेरी समझ में कैसे आयी?’ इमरान गरज कर बोला।
‘ग़लती हुई साहब!’
‘फिर वही कहता है, किससे ग़लती हुई?’
‘मुझसे!’
‘साबित करो कि तुमसे ग़लती हुई।’ इमरान एक सोफे में गिर कर उसे घूरता हुआ बोला। नौकर सिर खुजलाने लगा।
‘जुएँ हैं क्या तुम्हारे सिर में!’ इमरान ने डाँट कर पूछा।
‘नहीं तो।’
‘तो फिर क्यों खुजा रहे थे?’
‘यूँही।’
‘जाहिल...गँवार...ख़ामख़ा बेतुकी हरकतें करके अपनी एनर्जी बर्बाद करते हो।’ नौकर ख़ामोश रहा।
‘युंग की साइकॉलोजी पढ़ी है तुमने?’ इमरान ने पूछा।
नौकर ने ‘नहीं’ में सिर हिला दिया।
‘युंग के हिज्जे जानते हो।’
‘नहीं साहब!’ नौकर उकता कर बोला।
‘अच्छा याद कर लो...जे-यू-एन-जी...युंग! बहुत-से जाहिल इसे जंग पढ़ते हैं और कुछ जुंग...! जिन्हें क़ाबलियत का हैज़ा हो जाता है वह ज़ौंग पढ़ने और लिखने लग जाते हैं...फ़्रांसीसी में जे ‘ज़’ की आवाज़ देता है, मगर युंग फ़्रांसीसी नहीं था।’
‘शाम को मुर्ग़ खाइएगा...या तीतर?’ नौकर ने पूछा।
‘आधा तीतर आधा बटेर।’ इमरान झल्ला कर बोला। ‘हाँ तो मैं अभी कह रहा था...’ वह ख़ामोश हो कर सोचने लगा।
‘आप कह रहे थे कि मसाला इतना भूना जाये कि सुर्ख़ हो जाये।’ नौकर ने संजीदगी से कहा।
‘हाँ, और हमेशा नर्म आँच पर भूनो!’ इमरान बोला। ‘कड़छी को इस तरह देगची में न हिलाओ कि खनक पैदा हो और पड़ोसियों की राल टपकने लगे। वैसे क्या तुम मुझे बता सकते हो कि मैं कहाँ जाने की तैयारी कर रहा था?’
‘आप!’ नौकर कुछ सोचता हुआ बोला। ‘आप मेरे लिए एक शलवार–क़मीज़ का कपड़ा ख़रीदने जा रहे थे! बीस हज़ार का लट्ठा और क़मीज़ के लिए बोसकी।’
‘गुड! तुम बहुत क़ाबिल और नमकहलाल नौकर हो! अगर तुम मुझे याद न दिलाते रहो तो मैं सब कुछ भूल जाऊँ।’
‘मैं टाई बाँध दूँ सरकार!’ नौकर ने बड़े प्यार से कहा।
‘बाँध दो।’
नौकर टाई बाँधते वक़्त बड़बड़ाता जा रहा था। ‘बीस हज़ार का लट्ठा और क़मीज़ के लिए बोसकी। कहिए तो लिख दूँ!’
‘बहुत ज़्यादा अच्छा रहेगा।’ इमरान ने कहा।
टाई बाँध चुकने के बाद नौकर ने काग़ज़ के एक टुकड़े पर पेन्सिल से घसीट कर उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।
‘यूँ नहीं!’ इमरान अपने सीने की तरफ़ इशारा करके संजीदगी से बोला, ‘इसे यहाँ पिन कर दो।’
नौकर ने एक पिन की मदद से काग़ज़ उसके सीने पर लगा दिया।
‘अब याद रहेगा।’ इमरान ने कहा और कमरे से निकल गया!...राहदारी तय करके वह ड्रॉइंग-रूम में पहुँचा...यहाँ तीन लड़कियाँ बैठी थीं।
‘वाह इमरान भाई!’ इनमें से एक बोली, ‘ख़ूब इन्तज़ार कराया! कपड़े पहनने में इतनी देर लगाते हैं।’
‘ओह, तो क्या आप लोग मेरा इन्तज़ार कर रही थीं?’
‘क्यों! क्या आपने एक घण्टा पहले पिक्चर चलने का वादा नहीं किया था?’
‘पिक्चर चलने का! मुझे तो याद नहीं...मैं तो सुलेमान के लिए...’ इमरान अपने सीने की तरफ़ इशारा करके बोला।
‘ये क्या?’ वह लड़की क़रीब आ कर आगे की तरफ़ झुकती हुई बोली, ‘बीस हज़ार का लट्ठा...और बोसकी! यह क्या है...इसका मतलब?’
फिर वह बेतहाशा हँसने लगी...इमरान की बहन सुरैया ने भी उठ कर देखा, लेकिन तीसरी बैठी रही। वह शायद सुरैया की कोई नयी सहेली थी!
‘ये क्या है?’ सुरैया ने पूछा।
‘सुलेमान के लिए शलवार-क़मीज़ का कपड़ा लेने जा रहा हूँ।’
‘लेकिन हमसे क्यों वादा किया था!’ वह बिगड़ कर बोली।
‘बड़ी मुसीबत है!’ इमरान गर्दन झटक कर बोला, ‘तुम्हें सच्चा समझूँ या सुलेमान को?’
‘उसी कमीने को सच्चा समझिए! मैं कौन होती हूँ!’ सुरैया ने कहा। फिर अपनी सहेलियों की तरफ़ मुड़ कर बोली, ‘अकेले ही चलते हैं! आप साथ गये भी तो शर्मिन्दगी ही होगी...कर बैठेंगे कोई हिमाक़त!’
‘ज़रा देखिए आप लोग!’ इमरान रोनी सूरत बना कर दर्द-भरी आवाज़ में बोला। ‘ये मेरी छोटी बहन है, मुझे अहमक़ समझती है। सुरैया, मैं बहुत जल्द मर जाऊँगा! किसी वक़्त! जब भी टाई ग़लत बँध गयी! और बेचारे सुलेमान को कुछ न कहो! वह मेरा मुहसिन है! मुझ पर एहसान करने वाला, उसने अभी-अभी मेरी जान बचायी है!’
‘क्या हुआ था?’ सुरैया की सहेली जमीला ने घबरायी हुई आवाज़ में पूछा।
‘टाई ग़लत बँध गयी थी!’ इमरान इन्तहाई संजीदगी से बोला।
जमीला हँसने लगी, लेकिन सुरैया जली-भुनी बैठी रही। उसकी नयी सहेली हैरत से उस संजीदा अहमक़ को घूर रही थी।
‘तुम कहती हो तो मैं पिक्चर चलने को तैयार हूँ।’ इमरान ने कहा, ‘लेकिन वापसी पर मुझे याद दिलाना कि मेरे सीने पर एक काग़ज़ पिन किया हुआ है।’
‘तो क्या यह इसी तरह लगा रहेगा?’ जमीला ने पूछा।
‘और क्या!’
‘मैं तो हरगिज़ न जाऊँगी।’ सुरैया ने कहा।
‘नहीं, इमरान भाई के बग़ैर मज़ा न आयेगा।’ जमीला ने कहा।
‘जियो!’ इमरान ख़ुश हो कर बोला। ‘मेरा दिल चाहता है कि तुम्हें सुरैया से बदल लूँ! काश, तुम मेरी बहन होती। यह नकचढ़ी सुरैया मुझे बिलकुल अच्छी नहीं लगती।’
‘आप ख़ुद नकचढ़े! आप मुझे कब अच्छे लगते हैं,’ सुरैया बिगड़ कर बोली।
‘देख रही हो, यह मेरी छोटी बहन है!’
‘मैं बताऊँ!’ जमीला संजीदगी से बोली, ‘आप यह काग़ज़ निकाल कर जेब में रख लीजिए, मैं याद दिला दूँगी।’
‘और अगर भूल गयीं तो...वैसे तो कोई राहगीर ही उसे देख कर मुझे याद दिला देगा।’
‘मैं वादा करती हूँ!’
इमरान ने काग़ज़ निकाल कर जेब में रख लिया। सुरैया कुछ खिंची-खिंची-सी नज़र आने लगी थी।
जैसे ही वे बाहर निकले एक मोटर साइकिल पोर्टिको में आ कर रुकी, जिस पर एक सलीक़ेदार और भारी-भरकम आदमी बैठा हुआ था।
‘हैलो, फ़ैयाज़!’ इमरान दोनों हाथ बढ़ा कर चीख़ा।
‘हैलो, इमरान माई लैड...तुम कहीं जा रहे हो?’ मोटर साइकिल सवार बोला। फिर लड़कियों की तरफ़ देख कर कहने लगा। ‘ओह माफ़ कीजिएगा...लेकिन यह काम ज़रूरी है! इमरान जल्दी करो।’
इमरान उछल कर कैंरियर पर बैठ गया और मोटर साइकिल फ़र्राटे भरती हुई फाटक से गुज़र गयी।
‘देखा तुमने!’ सुरैया अपना निचला होंट चबा कर बोली।
‘ये कौन था...?’ जमीला ने पूछा।
‘इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट का सुपरिन्टेंडेण्ट फ़ैयाज़....मगर एक बात मेरी समझ में नहीं आ सकी कि उसे भाई जान जैसे ख़ब्ती आदमी से क्या दिलचस्पी हो सकती है। अक्सर उन्हें अपने साथ ले जाया करता है।’
‘इमरान भाई दिलचस्प आदमी हैं!’ जमीला ने कहा। ‘भई, कम-से-कम मुझे तो उनकी मौजूदगी में बड़ा मज़ा आता है।’
‘एक पागल दूसरे पागल को अक़्लमन्द ही समझता है!’ सुरैया मुँह बिगाड़ कर बोली।
‘मगर मुझे तो पागल नहीं मालूम होते।’ सुरैया की नयी सहेली ने कहा।
और उसने क़रीब-क़रीब ठीक ही बात कही थी। इमरान सूरत से ख़ब्ती नहीं लगता था। ख़ूबसूरत और दिलकश नौजवान था। उम्र सत्ताईस के लगभग रही होगी! सुघड़ और सफ़ाई-पसन्द था। तन्दुरुस्ती अच्छी और जिस्म कसरती था। अपने शहर की यूनिर्विसटी से एम.एस.सी. की डिग्री ले कर इंग्लैण्ड चला गया था और वहाँ से साइन्स में डॉक्टरेट ले कर वापस आया था। उसका बाप रहमान गुप्तचर विभाग में डायरेक्टर जनरल था। इंग्लैण्ड से वापसी पर उसके बाप ने कोशिश की थी कि उसे कोई अच्छा-सा ओहदा दिला दे, लेकिन इमरान ने परवा न की।
कभी वह कहता कि मैं साइण्टिफ़िक इन्स्ट्रुमेन्ट्स की तिजारत करूँगा; कभी कहता कि अपना इंस्टीट्यूट क़ायम करके साइन्स की ख़िदमत करूँगा...बहरहाल, कभी कुछ और कभी कुछ! पूरा घर उससे परेशान था। इंग्लैण्ड से वापसी के बाद तो अच्छा-ख़ासा अहमक़ हो गया था। इतना अहमक़ कि घर के नौकर तक उसे उल्लू बनाया करते थे। उसे अच्छी तरह लूटते, उसकी जेब से दस-दस रुपये के नोट ग़ायब कर देते और उसे पता तक न चलता।
बाप तो उसकी सूरत तक देखना नहीं चाहता था। सिर्फ़ माँ ऐसी थी जिसकी बदौलत वह उस कोठी में रहता था, वरना कभी का निकाल दिया गया होता...इकलौता लड़का होने के बावजूद रहमान साहब उससे परेशान आ गये थे।।
‘पागल वो उसी वक़्त नहीं मालूम होते जब ख़ामोश हों?’ सुरैया बोली, ‘दो-चार घण्टे भी अगर इन हज़रत के साथ रहना पड़े तो पता चले।’
‘क्या काटने दौड़ते हैं?’ जमीला ने मुस्कुरा कर कहा।
‘अगर उनमें इसी तरह दिलचस्पी लेती रहीं तो किसी दिन मालूम हो जायेगा।’ सुरैया मुँह सिकोड़ कर बोली।
***
कैप्टन फ़ैयाज़ की मोटर साइकिल फ़र्राटे भर रही थी और इमरान कैरियर पर बैठा बड़बड़ाता जा रहा था। ‘शलवार का लट्ठा। बोसकी की क़मीज़...शलवार का बोसका...लट्ठी...लट्ठी...क्या था...लाहौल विला क़ूवत...भूल गया रुको। यार....रुको... शायद...’
फ़ैयाज़ ने मोटर साइकिल रोक दी।
‘भूल गया!’ इमरान बोला।
‘क्या भूल गये?’
‘कुछ ग़लती हो गयी।’
‘क्या ग़लती हो गयी?’ फ़ैयाज़ झुँझला कर बोला। ‘यार, कम-से-कम मुझे तो उल्लू न बनाया करो।’
‘शायद मैं ग़लत बैठा हुआ हूँ।’ इमरान कैरियर से उतरता हुआ बोला।
‘जल्दी है यार!’ फ़ैयाज़ ने गर्दन झटक कर कहा।
इमरान उसकी पीठ से पीठ मिलाये हुए, दूसरी तरफ़ मुँह करके बैठ गया।
‘यह क्या?’ फ़ैयाज़ ने हैरत से कहा...
‘बस, चलो ठीक है।’
‘ख़ुदा की क़सम तंग कर मारते हो।’ फ़ैयाज़ उकता कर बोला।
‘कौन-सी मुसीबत आ गयी!’ इमरान भी झुँझलाने लगा।
‘मुझे भी तमाशा बनाओगे। सीधे बैठो न!’
‘तो क्या मैं सर के बल बैठा हुआ हूँ!’
‘मान जाओ प्यारे!’ फ़ैयाज़ ख़ुशामद के लहजे में बोला, ‘लोग हँसेंगे हम पर!’
‘यह तो बड़ी अच्छी बात है।’
‘मुँह के बल गिरोगे सड़क पर!’
‘अगर तक़दीर में यही है तो बन्दा बेबस और लाचार।’ इमरान ने दरवेशों के अन्दाज़ में कहा।
‘ख़ुदा समझे तुमसे।’ फ़ैयाज़ ने दाँत पीस कर मोटर साइकिल स्टार्ट कर दी। उसका मुँह पश्चिम की तरफ़ था और इमरान का पूरब की तरफ़! और इमरान इस तरह आगे की तरफ़ झुका हुआ था जैसे वह ख़ुद ही मोटर साइकिल ड्राइव कर रहा हो! राहगीर उन्हें देख-देख कर हँस रहे थे। ‘देखा! याद आ गया न!’ इमरान चहक कर बोला, ‘शलवार का लट्ठा और क़मीज़ की बोसकी...मैं पहले ही कहा रह था कि ग़लती हो गयी है।’
‘इमरान! तुम मुझे अहमक़ समझते हो!’ फ़ैयाज़ ने झुँझला कर कहा। ‘कम-से-कम मेरे सामने तो इस ख़ब्तीपन से बाज़ आ जाया करो।’
‘तुम ख़ुद होगे ख़ब्ती!’ इमरान बुरा मान कर बोला।
‘आख़िर इस ढोंग से क्या फ़ायदा?’
‘ढोंग! अरे कमाल कर दिया। उफ़्फ़ोह! इस लफ़्ज़ ढोंग पर मुझे वह बात याद आयी है जिसे अब से एक साल पहले याद आना चाहिए था।’
फ़ैयाज़ कुछ न बोला। मोटर साइकिल हवा से बातें करती रही।
‘हायँ!’ इमरान थोड़ी देर बाद बोला। ‘ये मोटर साइकिल पीछे की तरफ़ क्यों भाग रही है। अरे, इसका हैंडल क्या हुआ...’ फिर उसने बेतहाशा चीख़ना शुरू कर दिया। ‘हटो...बच्चो...मैं पीछे की तरफ़ नहीं देख सकता।’
फ़ैयाज़ ने मोटर साइकिल रोक दी और झेंपते हुए अन्दाज़ में राहगीरों की तरफ़ देखने लगा।
‘शुक्र है ख़ुदा का कि ख़ुद-ब-ख़ुद रुक गयी!’ इमरान उतरता हुआ बड़बड़ाया...फिर जल्दी से बोला। ‘लाहौल विला क़ूवत, इसका हैंडल पीछे है! अब मोटर साइकिलें भी उलटी बनने लगीं।’
‘क्या मतलब है तुम्हारा? क्यों तंग कर रहे हो?’ फ़ैयाज़ ने बेबसी से कहा।
‘तंग तुम कर रहे हो या मैं!...उल्टी मोटर साइकिल पर लिये फिरते हो! अगर कोई ऐक्सीडेंट हो जाये तो!’
‘चलो बैठो।’ फ़ैयाज़ उसे खींचता हुआ बोला।
मोटर साइकिल फिर चल पड़ी।
‘अब तो ठीक चल रही है।’ इमरान बड़बड़ाया।
मोटर साइकिल शहर से निकल कर वीराने की तरफ़ जा रही थी और इमरान ने अभी तक फ़ैयाज़ से यह भी पूछने की ज़हमत गवारा नहीं की थी कि वह उसे कहाँ ले जा रहा है।
‘आज मुझे फिर तुम्हारी मदद की ज़रूरत महसूस हुई है!’ फ़ैयाज़ बोला।
‘लेकिन मैं आजकल बिलकुल ग़रीब हूँ।’ इमरान ने कहा।
‘अच्छा! तो क्या मैं तुमसे उधार माँगने जा रहा था?’
‘पता नहीं! मैं यही समझ रहा था! अरे बाप रे, फिर भूल गया!...लठमार का...पाजामा....और क़मीज़...लाहौल विला क़ूवत...बोसका...’
‘प्लीज़ शट अप...इमरान....यू फ़ूल!’ फ़ैयाज़ झुँझला उठा।
‘इमरान...’ कैप्टन फ़ैयाज़ ने ठण्डी साँस ले कर फिर उसे मुख़ातिब किया।
‘ऊँ...हाँ।’
‘तुम आख़िर दूसरों को बेवक़ूफ़ क्यों समझते हो?’
‘क्योंकि...हा...अरे बाप रे, यह झटके....यार ज़रा चिकनी ज़मीन पर चलाओ!’
‘मैं कहता हूँ कि अब यह सारी हिमाक़तें ख़त्म करके कोई ढंग का काम करो।’
‘ढंग...लो यार...इस ढंग पर भी कोई बात याद आने की कोशिश कर रही है।’
‘जहन्नुम में जाओ।’ फ़ैयाज़ झल्ला कर बोला।
‘अच्छा।’ इमरान ने बड़ी आज्ञाकारिता से गर्दन हिलायी।
मोटर साइकिल एक लम्बी-चौड़ी इमारत के सामने रुक गयी, जिसके फाटक पर तीन-चार वर्दीधारी कॉन्स्टेबल नज़र आ रहे थे।
‘अब उतरो भी।’ फ़ैयाज़ ने कहा।
‘मैं समझा शायद अब तुम मुझे हैंडल पर बिठाओगे।’ इमरान उतरता हुआ बोला।
वे उस वक़्त एक देहाती इलाक़े में खड़े हुए थे जो शहर से ज़्यादा दूर न था। यहाँ बस यही एक इमारत इतनी बड़ी थी, वरना इस बस्ती में मामूली क़िस्म के कच्चे-पक्के मकान थे। इस इमारत की बनावट पुराने ढंग की थी। चारों तरफ़ सुर्ख़ रंग की लखौरी ईंटों की ऊँची-ऊँची दीवारें थीं और सामने एक बहुत बड़ा फाटक था जो ग़ालिबन सदर दरवाज़े के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा होगा।
कैप्टन फ़ैयाज़ इमरान का हाथ पकड़े हुए इमारत में दाख़िल हो गया। अब भी इमरान ने उससे यह नहीं पूछा कि वह उसे कहाँ और क्यों लाया है।
दोनों एक बड़े दालान से गुज़रते हुए एक कमरे में आये। अचानक इमरान ने अपनी आँखों पर दोनों हाथ रख लिये और मुँह फेर कर खड़ा हो गया। उसने एक लाश देख ली थी जो फ़र्श पर औंधी पड़ी थी और उसके गिर्द ख़ून फैला हुआ था।
‘इन्ना लिल्लाहि वइन्ना इलैहि राजिऊन!’ वह काँपती आवाज़ में बड़बड़ा रहा था।
‘ख़ुदा उसके रिश्तेदारों पर रहमत करे और उसे सब्र की तौफ़ीक़ अता फ़र्माये।’
‘मैं तुम्हें दुआए-ख़ैर करने के लिए नहीं लाया।’ फ़ैयाज़ झुँझला कर बोला।
‘कफ़न-दफ़न के लिए चन्दा वहाँ भी माँग सकते थे। आख़िर इतनी दूर क्यों घसीट लाये?’
‘यार इमरान, ख़ुदा के लिए बोर न करो! मैं तुम्हें अपना एक बेहतरीन दोस्त समझता हूँ।’ फ़ैयाज़ ने कहा।
‘मैं भी यही समझता हूँ। मगर प्यारे पाँच रुपये से ज़्यादा न दे सकूँगा। अभी मुझे...लट्ठी का बोसका ख़रीदना है!...क्या लट्ठी...लो यार, फिर भूल गया! क्या मुसीबत है।’
फ़ैयाज़ चन्द लम्हे खड़ा उसे घूरता रहा, फिर बोला।
‘यह इमारत पिछले पाँच बरसों से बन्द रही है। क्या ऐसी हालत में यहाँ एक लाश की मौजूदगी हैरत-अंगेज़ नहीं है।’
‘बिलकुल नहीं।’ इमरान सिर हिला कर बोला। ‘अगर यह लाश किसी अमरूद के दरख़्त पर पायी जाती तो मैं उसे अजूबा मान लेता।’
‘यार, थोड़ी देर के लिए संजीदा हो जाओ।’
‘मैं शुरू ही से रंजीदा हूँ।’ इमरान से ठण्डी साँस ले कर कहा।
‘रंजीदा नहीं संजीदा!’ फ़ैयाज़ फिर झुँझला गया।
इमरान ख़ामोशी से लाश की तरफ़ देख रहा था...वह आहिस्ता से बड़बड़ाया। ‘तीन ज़ख़्म।’
फ़ैयाज़ उसे मूड में आते देख कर कुछ निश्चिन्त-सा नज़र आने लगा।
‘पहले पूरी बात सुन लो!’ फ़ैयाज़ ने उसे मुख़ातिब किया।
‘ठहरो।’ इमरान झुकता हुआ बोला। वह थोड़ी देर तक ज़ख़्मों को ग़ौर से देखता रहा फिर सिर उठा कर बोला, ‘पूरी बात सुनाने से पहले यह बताओ कि इस लाश के बारे में तुम क्या बता सकते हो?’
‘आज दिन में बारह बजे यह देखी गयी!’ फ़ैयाज़ ने कहा।
‘ऊँह! मैं ज़्यादा अक़्लमन्दी का जवाब नहीं चाहता।’ इमरान नाक सिकोड़ कर बोला।
‘मैं यह जानता हूँ कि किसी ने उस पर तीन वार किये हैं।’
‘और कुछ!’ इमरान उसे सवालिया नज़रों से देख रहा था।
‘और क्या?’ फ़ैयाज़ बोला।
‘मगर...शेख़ चिल्ली दोयम...यानी अली इमरान एम.एस-सी., पी-एच.डी. का ख़याल कुछ और है।’
‘क्या?’
‘सुन कर मुझे उल्लू सही अहमक़ बटा दो समझने लगोगे।’
‘अरे यार, कुछ बताओ भी तो सही।’
‘अच्छा सुनो! क़ातिल ने पहला वार किया!...फिर पहले ज़ख़्म से पाँच-पाँच इंच का फ़ासला नाप कर दूसरा और तीसरा वार किया और इस बात का ख़ास ख़याल रखा कि ज़ख़्म बिलकुल सीध में रहें। न एक सूत इधर न एक सूत उधर।’
‘क्या बकते हो?’ फ़ैयाज़ बड़बड़ाया।
‘नाप कर देख लो मेरी जान! अगर ग़लत निकले तो मेरा क़लम सर कर देना...आँ...शायद मैं ग़लत बोल गया...मेरे क़लम पे सर रख देना...’ इमरान ने कहा और इधर-उधर देखने लगा। उसने एक तरफ़ पड़ा हुआ एक तिनका उठाया और फिर झुक कर ज़ख़्मों के बीच का फ़ासला नापने लगा! फ़ैयाज़ उसे हैरत से देख रहा था।
‘लो’ इमरान ने उसे तिनका पकड़ाता हुआ बोला। ‘अगर यह तिनका पाँच इंच का न निकले तो किसी की दाढ़ी तलाश करना।’
‘मगर इसका मतलब?’ फ़ैयाज़ कुछ सोचता हुआ बोला।
‘इसका मतलब यह कि क़ातिल और मक़तूल दरअस्ल आशिक़ और माशूक़ थे।’
‘इमरान प्यारे, ज़रा संजीदगी से।’
‘ये तिनका बताता है कि यही बात है।’ इमरान ने कहा। ‘और उर्दू के पुराने शाइरों का भी यही ख़याल है। किसी का भी दीवान उठा कर देख लो! दो-चार शेर इस क़िस्म के ज़रूर मिल जायेंगे जिनसे मेरे ख़याल की ताईद हो जायेगी। चलो, एक शेर सुन ही लो—
‘‘मोच आये न कलाई में कहीं
सख़्त जाँ हम भी बहुत हैं प्यारे’’
‘बकवास मत करो। अगर मेरी मदद नहीं करना चाहते तो साफ़-साफ़ कह दो।’ फ़ैयाज़ बिगड़ कर बोला।
‘फ़ासला तुमने नाप लिया! अब तुम ही बताओ कि क्या बात हो सकती है।’ इमरान ने कहा।
फ़ैयाज़ कुछ न बोला।
‘ज़रा सोचो तो।’ इमरान फिर बोला। ‘एक आशिक़ ही उर्दू शाइरी के मुताबिक़ अपने महबूब को इस बात की इजाज़त दे सकता है कि वह जिस तरह चाहे उसे क़त्ल करे। क़ीमा बना कर रख दे या नाप-नाप कर सलीक़े से ज़ख़्म लगाये। यह ज़ख़्म बदहवासी का नतीजा भी नहीं। लाश की हालत भी यह नहीं बताती कि मरने से पहले मक़तूल को किसी से जद्दो-जेहद करनी पड़ी हो। बस ऐसा मालूम होता है जैसे चुपचाप लेट कर उसने कहा जो मिज़ाजे-यार में आये...’
‘पुरानी शाइरी और हक़ीक़त में क्या लगाव है?’ फ़ैयाज़ ने पूछा।
‘पता नहीं।’ इमरान सोचने वाले अन्दाज़ में सिर हिला कर बोला, ‘वैसे, अब तुम पूरी ग़ज़ल सुना सकते हो। मक़ता मैं अर्ज़ कर दूँगा।’
फ़ैयाज़ थोड़ी देर ख़ामोश रहा फिर बोला, ‘यह इमारत तक़रीबन पाँच साल से ख़ाली रही है!...वैसे हर जुमेरात को सिर्फ़ चन्द घण्टों के लिए उसे खोला जाता है।’
‘क्यों?’
‘यहाँ दरअस्ल एक क़ब्र है जिसके बारे में मशहूर है कि वह किसी शहीद की है। चुनांचे हर जुमेरात को एक शख़्स उसे खोल कर क़ब्र की साफ़-सफ़ाई करता है।’
‘चढ़ावे वग़ैरा चढ़ते होंगे?’ इमरान ने पूछा।
‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। जिन लोगों का यह मकान है वे शहर में रहते हैं और उनसे मेरे क़रीबी ताल्लुक़ात हैं। उन्होंने एक आदमी इसीलिए रख छोड़ा है कि वह हर जुमेरात को क़ब्र की देख-भाल कर लिया करे...यहाँ लोगों की भीड़ नहीं होती। बहरहाल, आज दोपहर को जब वह यहाँ आया तो उसने यह लाश देखी।’
‘ताला बन्द था?’ इमरान ने पूछा।
‘हाँ। और वह य़कीन के साथ कह सकता है कि कुंजी एक लम्हे के लिए भी नहीं खोयी और फिर यहाँ इस क़िस्म के निशान नहीं मिल सके जिनकी बिना पर कहा जा सकता कि कोई दीवार फलाँग कर अन्दर आया हो।’
‘तो फिर यह लाश आसमान से टपकी होगी!’ इमरान ने संजीदगी से कहा। ‘बेहतर तो यह है कि तुम उसी शहीद की मदद तलब करो जिसकी क़ब्र...’
‘फिर बहकने लगे!’ फ़ैयाज़ बोला।
‘इस इमारत के मालिक कौन हैं और कैसे हैं?’ इमरान ने पूछा।
‘वही मेरे पड़ोस वाले जज साहब।’ फ़ैयाज़ बोला।
‘हाय, वही जज साहब!’ इमरान अपने सीने पर हाथ मार कर होंट चाटने लगा।
‘हाँ वही...यार, संजीदगी से...ख़ुदा के लिए।’
‘तब मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।’ इमरान मायूस अन्दाज़ में सर हिला कर बोला।
‘क्यों?’
‘तुमने मेरी मदद नहीं की।’
‘मैंने?’ फ़ैयाज़ ने हैरत से कहा। ‘मैं नहीं समझा।’
‘ख़ुदग़र्ज़ हो न। भला तुम मेरे काम क्यों आने लगे?’
‘अरे तो बताओ न। मैं वाक़ई नहीं समझा।’
‘कब से कह रहा हूँ कि अपने पड़ोसी जज साहब की लड़की से मेरी शादी करा दो।’
‘बको मत...हर वक़्त बेतुकी बातें।’
‘मैं संजीदगी से कह रहा हूँ।’ इमरान ने कहा।
‘अगर संजीदगी से कह रहे हो तो शायद तुम अन्धे हो।’
‘क्यों।’
‘उस लड़की की एक आँख नहीं है।’
‘इसीलिए तो मैं उससे शादी करना चाहता हूँ। वह मुझे और मेरे कुत्तों को एक नज़र से देखेगी।’
‘यार, ख़ुदा के लिए संजीदा हो जाओ!’
‘पहले तुम वादा करो।’ इमरान बोला।
‘अच्छा बाबा, मैं उनसे कहूँगा।’
‘बहुत बहुत शुक्रिया! मुझे सचमुच उस लड़की से कुछ हो गया है...क्या कहते हैं उसे...लो यार, भूल गया...हालाँकि कुछ देर पहले उसी का तज़किरा था।’
‘चलो छोड़ो, काम की बातें करो।’
‘नहीं उसे याद ही आ जाने दो। वरना मुझ पर हिस्टीरिया का दौरा पड़ जायेगा।’
‘इश्क़।’ फ़ैयाज़ मुँह बना कर बोला।
‘जियो! शाबाश!’ इमरान ने उसकी पीठ ठोंकते हुए कहा। ‘ख़ुदा तुम्हारी मादा को सलामत रखे। अच्छा अब यह बताओ कि लाश की शिनाख़्त हो गयी या नहीं।’
‘नहीं! न तो वह इस इलाक़े का बाशिन्दा है और न जज साहब के ख़ानदान वाले उससे वाक़िफ़ हैं।’
‘यानी किसी ने उसे पहचाना नहीं।’
‘नहीं!’
‘उसके पास कोई ऐसी चीज़ मिली नहीं जिससे उसकी शख़्सियत पर रोशनी पड़ सके।’
‘कोई नहीं...मगर ठहरो!’ फ़ैयाज़ एक मेज़ की तरफ़ बढ़ता हुआ बोला। वापसी पर उसके हाथ में चमड़े का थैला था।
‘यह थैला हमें लाश के क़रीब पड़ा मिला था।’ फ़ैयाज़ ने कहा।
इमरान थैला उसके हाथ से ले कर अन्दर की चीज़ों का मुआइना करने लगा।
‘किसी बढ़ई के औज़ार।’ उसने कहा। ‘अगर ये मक़तूल ही के हैं तो...वैसे उस शख़्स की ज़ाहिरी हालत अच्छी नहीं...लेकिन फिर भी यह बढ़ई मालूम नहीं होता...!’
‘क्यों!’
‘उसके हाथ बड़े मुलायम हैं और...हथेलियों में खुरदुरापन नहीं है। ये हाथ तो किसी मुसव्विर या रंगसाज़ ही के हो सकते हैं।’ इमरान बोला।
‘अभी तक तुमने कोई काम की बात नहीं बतायी,’ फ़ैयाज़ ने कहा।
‘एक अहमक़ आदमी से इससे ज़्यादा की उम्मीद रखना अक़्लमन्दी नहीं।’ इमरान हँस कर बोला।
‘उसके ज़ख़्मों ने मुझे उलझन में डाल दिया है।’ फ़ैयाज़ ने कहा।
‘अगर तुमने मेरे ज़ख्मों पर मरहम रखा तो मैं उन ज़ख़्मों को भी देख लूँगा।’
‘क्या मतलब।’
‘जज साहब की लड़की!’ इमरान इस तरह बोला जैसे उसे कुछ याद आ गया हो। ‘इस मकान की एक कुंजी जज साहब के पास ज़रूर रहती होगी।’
‘हाँ, एक उनके पास भी है।’
‘है या थी।’
‘यह तो मैंने नहीं पूछा!’
‘ख़ैर, फिर पूछ लेना। अब लाश को उठवाओ...पोस्टमॉर्टम के सिलसिले में ज़ख़्मों की गहराइयों का ख़ास ख़याल रखा जाये।’
‘क्यों?’
‘अगर ज़ख़्मों की गहराइयाँ भी एक दूसरे के बराबर हुईं तो समझ लेना कि यह शहीद मर्द साहब की हरकत है।’
‘क्यों फ़िजूल बकवास कर रहे हो।’
‘जो कह रहा हूँ...उस पर अमल करने का इरादा हो तो अली इमरान, एम.एस.सी., पी-एच.डी. की ख़िदमात हासिल करना। वरना कोई...क्या नहीं...ज़रा बताओ तो मैं कौन-सा लफ़्ज़ भूल रहा हूँ।’
‘ज़रूरत!’ फ़ैयाज़ बुरा-सा मुँह बना कर बोला।
‘जीते रहो...वरना कोई ज़रूरत नहीं।’
‘तुम्हारी हिदायत पर अमल किया जायेगा...और कुछ?’
‘और यह कि मैं पूरी इमारत देखना चाहता हूँ।’ इमरान ने कहा।
पूरी इमारत का चक्कर लगा लेने के बाद वे फिर उसी कमरे में लौट आये।
‘हाँ भई, जज साहब से ज़रा यह भी पूछ लेना कि उन्होंने सिर्फ़ इसी कमरे की हालत बदलने की कोशिश क्यों कर डाली है, जबकि पूरी इमारत उसी पुराने ढंग पर रहने दी गयी है। कहीं भी दीवार पर प्लास्टर नहीं दिखाई दिया...लेकिन यहाँ है..’
‘पूछ लूँगा।’
‘और कुंजी के बारे में भी पूछ लेना...और...अगर वह महबूबा यकचश्म मिल जाये तो उससे कहना कि तेरे नीमकश को कोई मेरे दिल से पूछे...शायद ग़ालिब की महबूबा भी एक ही आँख रखती थी...क्योंकि तीरे-नीमकश इकलौती आँख का ही हो सकता है!’
‘तो इस वक़्त और कुछ नहीं बताओगे।’ फ़ैयाज़ ने कहा।
‘यार, बड़े एहसान फ़रोश हो....फ़रोश...शायद मैं फिर भूल गया कि कौन-सा लफ़्ज़ है?’
‘फ़रामोश!’
‘जियो। हाँ तो बड़े एहसान फ़रामोश हो। इतनी देर से बकवास कर रहा हूँ और तुम कहते हो कुछ बताया ही नहीं।’
***
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