कपिल कुमार ने एक अन्तिम दृष्टि उस कमरे के चारों ओर फिराई जिसमें शौकत हुसैन की लाश पड़ी थी, और फिर बाहर के कमरे की ओर चल पड़ा ।
लाश पर दुबारा नजर पड़ते ही उसके शरीर में झरझुरी-सी दौड़ गई थी । शौकत हुसैन कपिल कुमार द्वारा ही सप्लाई किए हुए टेलीविजन सैट के पास जमीन पर औंधे मुंह पड़ा था । उसके शरीर के पास ही उसकी व्हील चेयर पड़ी थी जिस पर से वह शायद नीचे कालीन बिछे फर्श पर आ गिरा था ।
शौकत हुसैन अपाहिज था । एक कार दुर्घटना में उसकी रीढ की हड्डी ऐसी गम्भीर चोट खा गई थी कि उसकी कमर के नीचे का तमाम भाग लकवे का शिकार हो गया था । उसकी टांगें बेकार हो गई थीं और वह एक लम्बे अर्से से अपनी पहियों वाली कुर्सी पर पड़ा-पड़ा अपनी जिन्दगी गुजार रहा था ।
बाहर के कमरे में आकर कपिल कुमार टेलीफोन के पास पहुंचा । उसने अस्थिर हाथों से रिसीवर उठाया और पुलिस हैडक्वार्टर फोन कर दिया ।
“पुलिस हैडक्वार्टर !” - दूसरी ओर से तत्काल उत्तर मिला ।
कुछ क्षण कपिल कुमार के मुंह से आवाज नहीं निकली और फिर वह खड़े कठिन स्वर में बोला - “हैलो ।”
“यस ।” - दूसरी ओर से कोई भारी स्वर में बोला ।
“पुलिस हैडक्वार्टर ?”
“जी हां ।”
“मेरा नाम कपिल कुमार है । मैं हर्नबी रोड के चार नम्बर बंगले से बोल रहा हूं ।”
“बोलिए ।”
“यहां एक दुर्घटना हो गई है ।”
“कैसी दुर्घटना ?” - किसी ने तीव्र स्वर में पूछा ।
“बंगले के स्वामी शौकत हुसैन मर गए हैं ।”
“कैसे ?”
“मुझे मालूम नहीं । लेकिन मेरा ख्याल है उन्हें बिजली का धक्का लगा है - उनका अचेत शरीर टेलीविजन सैट के समीप पड़ा है । सैट का पृष्ठ भाग खुला हुआ है और शौकत हुसैन के बायें हाथ के पास एक पेचकस भी पड़ा है । शायद ये टेलीविजन का कोई नुक्स खुद ही दूर करने का प्रयन्न कर रहे थे कि बिजली का धक्का खा गए ।”
“आपको कैसे मालूम है कि वे मर चुके हैं ? शायद...”
“मैंने उसकी नब्ज देखी है नब्ज में कोई हरकत नहीं है और शरीर एकदम ठण्डा पड़ा है ।”
“आप उसके क्या लगते हैं ?”
“मैं उनका कुछ लगता नहीं हूं । उन्हें टेलीविजन सैट मैंने ही सप्लाई किया था । मैं तो यहां केवल यह देखने आया था कि टेलीविजन सैट अच्छी सर्विस दे रहा है या नहीं और वे अपने सैट से सन्तुष्ट हैं या नहीं ।”
“बंगले में उनके परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं है ?”
“केवल उनकी पत्नी उनके साथ रहती है और वह इस समय बंगले में नहीं है ।”
“कोई नौकर-चाकर ?”
“कोई नहीं है ।”
“देखिए मिस्टर... क्या नाम बताया था आपने अपना ?”
“कपिल कुमार ।”
“हां ! देखिए मिस्टर कपिल कुमार । आप वहीं मौजूद रहिए । प्लाइंग स्क्वाड की एक गाड़ी फौरन वहां पहुंच रही है । पुलिस के आने से पहले आप कहीं मत जाइए । लाश से दूर रहिए और किसी चीज को हाथ न खुद लगाइए और न किसी बाहरी आदमी को लगाने दीजिए ।”
“बेहतर ।”
दूसरी ओर से सम्बन्ध-विच्छेद हो गया ।
कपिल कुमार ने भी रिसीवर रख दिया ।
उसने एक झिझकपूर्ण दृष्टि पिछले कमरे की ओर डाली और फिर बाहर बरामदे में आ गया ।
वह बरामदे में रखी बेंत की कुर्सियों में से एक पर बैठ गया और धड़कते दिल से पुलिस की प्रतीक्षा करने लगा ।
एकाएक उसे एक ख्याल आया ।
वह उठा और वापिस उस कमरे में पहुंचा जहां टेलीफोन रखा था ।
उसने रिसीवर उठाया और अपनी दुकान का नम्बर डायल कर दिया ।
उसकी दुकान शंकर रोड पर स्थित थी और दुकान के ऊपर बने हुए दो छोटे-छोटे कमरों में वह रहता था ।
कुछ देर घन्टी बजती रही और फिर किसी ने रिसीवर उठा लिया ।
“मॉडर्न इलैक्ट्रोनिक्स ।” - दूसरी ओर से उसे अपने सहायक का स्वर सुना दिया ।
“पूरन ।” - वह बोला - “मैं कपिल बोल रहा हूं ।”
“यह सर ।”
“मेरा कोई फोन तो नहीं आया ?”
“नहीं सर ।”
“शौकत हुसैन साहब ने फोन नहीं किया था ?”
“नहीं, सर । लेकिन एक मैडम आपसे मिलने आई हैं ।”
“क्या ?”
“जी हां ।”
“कौन है ?”
“मैंने नाम नहीं पूछा, साहब । अब पूछूं ?”
“क्या मतलब ?” - कपिल ने और भी हैरान हो होकर पूछा - “वे अभी भी वहीं हैं ?”
“जी हां ।”
“पूछो, कौन हैं वे ?”
“अच्छा साहब ।”
एक मिनट तक शान्ति रही । फिर उनकी कान में एक उद्विग्नतापूर्ण स्त्री का स्वर पड़ा - “हैलो, कपिल, मैं सलमा बोल रही हूं ।”
हे भगवान !
कपिल दहल गया ।
सलमा इस समय उसकी दुकान पर क्या कर रही है ? उसे तो... इस समय सुपर मार्केट में होना चाहिए था । वह शौकत हुसैन की पत्नी थी ।
“सलमा !” - कपिल तीव्र स्वर में बोला - “तुम वहां क्या कर रही हो ?”
“तुम्हारा इन्तजार कर रही हूं ।” - वह व्यग्र स्वर में बोली ।
“लेकिन ।” - कपिल ने घड़ी देखी । पौने सात बजने को थे - “तुम्हें तो इस समय हमेशा की तरह सुपर मार्केट में होना चाहिए था ।”
“मैं नहीं गई ।”
“क्यों ?”
“कपिल, मेरी बात सुनो ।”
“क्या ?”
“मैं शौकत हुसैन का घर हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ आई हूं ।”
“क्या ?”
“हां ! अब मैं और ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर सकती । आज वह फिर मुझसे बहुत बुरी तरह पेश आया था । उसने मुझे नोचा, पीटा और मुझे दुनिया की गन्दी से गन्दी बात कही । कपिल, सब्र का पैमाना भर चुका है । अब मैं एक सैकेन्ड के लिए भी शौकत हुसैन के साथ रहने के लिए तैयार नहीं हूं । मैं अपना सामान भी अपने साथ ले आई हूं । मैंने फैसला कर लिया है कि मैं अब जिन्दगी में दुबारा उसकी सूरत नहीं देखूंगी ।”
“तुम कार लेकर गई हो ?” - कपिल ने तीव्र स्वर में पूछा ।
“हां । लेकिन, कपिल, तुम बोल कहां से रहे हो और इतने हड़बड़ाए हुए क्यों हो ?”
“तुम्हारे पास सामान क्या है ?” - कपिल ने उसके प्रश्न की ओर तनिक भी ध्यान न देते हुए पूछा ।
“दो सूटकेस हैं । आखिर बात क्या है ?”
“सवाल मत पूछो । बहुत भारी गड़बड़ हो गई है ।”
“क्या गड़बड़ हो गई है ?”
“सूटकेस कहां हैं ?”
“कार की पिछली सीट पर पड़े हैं ।”
“उन्हें उठाकर कार की डिग्गी में बन्द कर दो । किसी को यह मालूम नहीं होना चाहिए कि तुम शौकत हुसैन को हमेशा के लिए छोड़कर जा रही हो ।”
“लेकिन क्यों ?”
“बाद में बताऊंगा । पहले मैं जैसा कहता हूं वैसा करो ।”
“अच्छा ।”
“मेरी दुकान में से फौरन बाहर निकालो और सीधी सुपर मार्केट पहुंच जाओ । मार्केट बन्द होने से पहले वहां से बाहर मत निकलना । आठ बजे के बाद तुम सुपर मार्केट के सामने वाली सड़क और राबर्ट स्ट्रीट के क्रासिंग पर मेरी प्रतीक्षा करना ।”
“लेकिन बात क्या है ?”
“बात वहीं आकर बताऊंगा ।”
“अच्छा ।” - सलमा अनमने स्वर में बोली ।
कपिल ने रिसीवर क्रेडिल पर पटक दिया ।
उसके माथे पर पसीना चुहचुहा आया था ।
सलमा ने भी आज ही शौकत हुसैन को छोड़ने का फैसला करना था ! वह फिर बरामदे में आ गया ।
उसी क्षण उसने कानों में फ्लाइंग स्क्वाड के तीव्र सायरन की आवाज पड़ी ।
कपिल ने माथे से पसीना पोंछा और प्रतीक्षा करने लगा । पुलिस की फ्लाइंग स्क्वाड की गाड़ी तीव्र गति से बंगले के गेट में घुसी और ड्राइव वे का अर्ध वृत्ताकार रास्ता पार करती हुई बरामदे के सामने बनी पोर्टिको में एक भारी चरमराहट की आवाज के साथ आ रुकी ।
गाड़ी में से एक इंस्पेक्टर और पुलिस के चार सिपाही बाहर कूद पड़े ।
कपिल आगे बढा ।
“फोन अपने किया था ?” - इंस्पेक्टर ने अधिकारपूर्ण स्वर में पूछा ।
“जी हां ।” - कपिल बोला ।
“आप ही का नाम कपिल कुमार है ?”
“जी हां ।”
“मेरा नाम इंस्पेक्टर प्रभूदयाल है ।”
कपिल चुप रहा ।
“लाश दिखाइए ।”
कपिल पुलिस वालों को रास्ता दिखाता हुआ उस कमरे तक ले आया जिसमें लाश पड़ी थी ।
द्वार के समीप ही प्रभूदयाल ने कपिल को रोक दिया ।
वह कमरे का निरीक्षण करने लगा ।
लाश और टेलीविजन वगैरह की स्थिति बिल्कुल वैसी ही थी जैसी कपिल कुमार ने टेलीफोन पर बयान की थी ।
प्रभूदयाल कमरे की दीवार के साथ-साथ चलता हुआ टेलीविजन के समीप पहुंचा । टेलीविजन का पिछला भाग खुला हुआ था और ढक्कन और पेच जमीन पर पड़े थे ।
उसने लाश देखी ।
शौकत हुसैन लगभग अड़तालीस वर्ष का ह्रष्ट-पुष्ट व्यक्ति था । उसके चेहरे पर मौत के बाद भी गहन वेदना के भाव परिलक्षित, हो रहे थे ।
प्रभूदयाल ने उसकी नब्ज वगैरह टटोली ।
वह सत्य ही मर चुका था ।
वह वापिस द्वार के पास आ गया ।
“डॉक्टर को आने दो ।” - वह किसी व्यक्ति विशेष की ओर ध्यान दिए बिना बोला ।
कोई कुछ नहीं बोला ।
थोड़ी ही देर बाद पुलिस का डॉक्टर वहां पहुंच गया । डॉक्टर के साथ-साथ ही स्थानीय समाचार पत्रों के लगभग आधी दर्जन रिपोर्ट भी पहुंच गए ।
उनमें ‘ब्लास्ट’ का विशेष प्रतिनिधि सुनील कुमार चक्रवर्ती भी था ।
***
डॉक्टर लाश का मुआयना कर रहा था ।
इंस्पेक्टर प्रभूदयाल गम्भीर मुद्रा बनाये उसके पास खड़ा था ।
कमरे के एक कोने में कपिल कुमार और दो सिपाही खड़े थे ।
बाकी सब लोग बाहर थे ।
प्रैस के आदमियों को सिपाहियों ने दरवाजे के समीप रोक रखा था ।
प्रभूदयाल का ऐसा ही आदेश था ।
सुनील ने अपनी जेब से अपने प्रिय सिगरेट लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकाला और उसे क्रानिकल के रिपोर्टर पुलिस की ओर बढाता हुआ बोला - “सिगरेट पियो ।”
“लाओ, गुरु ।” - ललित पैकेट में से एक सिगरेट खींचता हुआ बोला - “लक्की स्ट्राइक पीने को तुम कौन सा रोज-रोज कहोगे ।”
“पैकेट ले जाओ ।” - सुनील उदारता का प्रदर्शन करता हुआ बोला ।
“न बाबा । मैं नहीं चाहता कि मुझे भी लक्की स्ट्राइक जैसा महंगा सिगरेट पीने की आदत पड़ जाए ।”
“मर्जी तुम्हारी ।” - सुनील ने अपने लिए एक सिगरेट निकाला और पैकेट जेब में डाल लिया ।
उसने माचिस निकालकर ललित का और अपना सिगरेट सुलगाया ।
सुनील ने सिगरेट के दो-तीन गहरे कश लगाये और फिर लापरवाही से बोला - “कौन था ?”
“कौन कौन था ?” - ललित ने पूछा ।
“मरने वाला ?”
“शौकत हुसैन ।”
“मैंने नाम नहीं पूछा ।”
“तो फिर क्या पूछा है, गुरु ?”
“मेरा मतलब है शौकत हुसैन साहब क्या बला थे ? मैं उनके सोशल स्टेटस वगैरह के बारे में पूछ रहा हूं । क्या बहुत महत्वपूर्ण आदमी थे वे ?”
“कभी थे ।”
“क्या मतलब ?”
“तुमने लाश तो देखी है ?”
“देखी है ।”
“सूरत ?”
“सूरत भी देखी है ।”
“पहचाना नहीं ?”
“नहीं तो । पहचानना चाहिए था क्या मुझे ?”
“पहचानना चाहिए था । मशहूर आदमी था ।”
“लेकिन था कौन ? कुछ कहोगे भी ?”
“तम्हारा सिगरेट पी रहे हैं गुरु, कहेंगे तो जरूर ।”
सुनील चुप रहा ।
“सुनील कभी मशहूर फिल्म डायरेक्टर शौकत हुसैन का नाम नहीं सुना, जिसने दिल धड़का, पतली कमर तीखी नजर और पेरिस की हसीना जैसी सिल्वर जुबली फिल्में बनाई हैं ?”
“यह वह शौकत हुसैन है ?” - सुनील आश्चर्यपूर्ण स्वर में बोला ।
“और क्या ?”
“लेकिन यह तो बम्बई में रहता था । दिल्ली कैसे पहुंच गया ?”
“जब से यह एक्सीडेन्ट में अपाहिज हुआ था, अपने फिल्मी क्षेत्र से तो एकदम अलग-सा ही हो गया था । बम्बई छोड़कर पहले कुल अरसा पूना में रहता था और फिर कुछ महीने पहले राजनगर में आकर रहने लगा था ।”
“यहां अकेला, ही रहता था ?”
“नहीं इसकी बीवी इसके साथ रहती थी ।”
“बीवी !”
“अब पूछोगे इसकी बीवी कौन है ?”
“नहीं पूछता ।”
“सुन लो । सलमा । कौन-सी कोई राज की बात है या कोई क्रानिकल का प्रोफेशनल सीक्रेट है ।”
“सलमा इसकी बीवी का नाम है ?”
“हां । शौकत हुसैन की उम्र से सलमा को भी कोई इसी जैसी बुढिया खूसट औरत मत समझ बैठना । सलमा उम्र में शौकत हुसैन से कम-से-कम पच्चीस साल छोटी है और इतनी खूबसूरत है कि देखोगे तो गश खा जाओगे ।”
“अच्छा ।”
ललित ने सिगरेट का एक गहरा कश लगाया ।
“लेकिन ऐसी जवान औरत ने शौकत हुसैन जैसे अपाहिज से शादी कैसे कर ली ?”
“शौकत हुसैन हमेशा से ही तो अपाहिज नहीं था । अपाहिज तो यह सलमा से शादी करने के डेढ-दो साल बाद हुआ था ।”
“आपाहिज न सही, लेकिन उम्र में फर्क तो फिर भी था ही ।”
“फिल्म उद्योग में बड़ी अनोखी-अनोखी बातें हो जाती हैं, बाबा । आशिकी में पच्चीस साल का एज डिफ्रेंस (उम्र का अन्तर) क्या मायने रखता है ! और फिर अच्छा खाता-पीता तन्दुरुस्त आदमी हो तो अड़तालीस साल की उम्र कोई ज्यादा थोड़े ही होती है । बाहर के देशों में तो वैसे भी आजकल की जवान लड़कियां पक्की उम्र के खाविंद पसन्द करने लगी हैं । चार्ली चैपलिन ने भी तो अस्सी साल की उम्र में पच्चीस-छब्बीस साल की छोकरी से शादी की थी । और सोफिया लोरेन - वह तो अपने डायरेक्टर, साठ साल के बुढऊ कार्लो पौन्ती के साथ बिना शादी किए खुलेआम ही बीवी बनकर रहती है । शौकत हुसैन और सलमा की उम्र में तो सिर्फ एक सिल्वर जुबली का ही फासला है ।”
“तुम्हें फिल्मों में बहुत दिलचस्पी मालूम होती है ।”
“कोई खास दिलचस्पी नहीं है ।” - ललित मुंह बिगाड़कर बोला ।
“तो फिर इन फिल्मी लोगों के बारे में इतनी ढेर सारी बातें कैसे जानते हो ?”
“क्रानिकल के रविवाससरीय परिशिष्ट में एक फिल्मों से सम्बन्धित कालम भी छपने लगा है । नजर पड़ ही जाती है ।”
उसी क्षण डॉक्टर लाश के पास से उठ खड़ा हुआ ।
वह प्रभूदयाल के समीप से हट गया ।
प्रभूदयाल ने लाश उठवाने का संकेत दे दिया ।
लाश एक स्ट्रेचर पर लाद दी गई और दो आदमी उसे एक भीतरी कमरे में छोड़ आए ।
“ये लाश को भीतर के कमरे में क्यों रख रहे हैं ?” - सुनील ने प्रश्न किया ।
“भगवान जाने ।” - ललित कन्धे उचकाता हुआ बोला ।
“प्रभूदयाल से पूछें ?”
“वो तो साला लाट बना हुआ है । जब तक उसका अपना मूड नहीं आएगा, कुछ बताएगा थोड़े ही ।”
“फिर भी पूछो तो सही ।”
“तुम क्यों नहीं पूछते ?”
“मेरी तो सूरत देखकर भड़क उठेगा वह ।”
“अच्छा, मैं पूछता हूं ।” - ललित ने कहा और फिर ऊंचे स्वर में बोला - “इंस्पेक्टर साहब, मौत कैसे हुई है ?”
प्रभूदयाल कुछ क्षण ललित और अन्य रिपोर्टरों की ओर देखता रहा जैसे फैसला कर रहा हो कि अभी प्रैस को कोई वक्तव्य देना चाहिए या नहीं ।
“शौकत हुसैन साहब, बिजली के धक्के से मरे हैं ।” - अन्त में वह बोला ।
“कैसे ?”
“टेलीविजन सैट में कोई नुक्स आ गया था । वे उसे पीछे से खोलकर शायद खुद ही ठीक करने का प्रयत्न कर रहे थे । जिस पेचकस से वे टेलीविजन की तारों को छेड़ रहे थे, वह आपने देखा ही है, पक्के लोहे का बना हुआ है । पेचकस का हैंडिल भी लोहे का है और उस पर किसी प्रकार का इन्सूलेशन नहीं है । पेचकस भीतर किसी नंगी तार से छू गया और उन्हें पूरे दो सौ बीस बोल्ट करेन्ट का धक्का लगा । डॉक्टर का कथन है उनकी तत्काल मृत्यु हो गई थी ।”
“पोस्टमार्टम होगा ?” - एक रिपोर्टर ने पूछा ।
“पोस्टमार्टम नहीं होगा । यह तो एक सीधा-साधा दुर्घटना का केस है । खामखाह लाश को चीरने-फाड़ने की जरूरत नहीं है ।”
“इसीलिए लाश बाहर एम्बूलेन्स में ले जाने के स्थान पर भीतरी कमरे में ले जाई गई है ।” - सुनील ललित के कान में फुसफुसाया ।
ललित ने सहमतिसूचक ढंग से सिर हिलाया ।
“आप को इस दुर्घटना की सूचना किसने दी थी ?”
प्रभूदयाल ने कपिल कुमार की ओर संकेत कर दिया ।
“आपकी तारीफ ?” - ललित ने कपिल कुमार से प्रश्न किया ।
“मेरा नाम कपिल कुमार है ।” - कपिल धीमे स्वर से बोला - “मैं रेडियो इन्जीनियर हूं । शंकर रोड पर माडर्न इलैक्ट्रानिक्स नाम की मेरी दुकान है ।”
“आप शौकत हुसैन से कैसे सम्बन्धित थे ?”
“ये टेलीविजन सेट इन्हें मैंने ही सप्लाई किया है ।” - कपिल कुमार कोने में रखे टेलीविजन सेट की ओर संकेत करता हुआ बोला ।
“अच्छा !” - किसी ने हैरानी व्यक्त की ।
“जी हां । आज मैं यहां ये ही देखने आया था कि सैट की परफारमेन्स से सन्तुष्ट हैं या नहीं ।”
“आप क्यों चिन्तित थे, सैट की परफारमैंस के बारे में ?”
“यह टेलीविजन सैट मेरा अपना बनाया हुआ है और इसे मैंने शौकत हुसैन साहब को इस गारन्टी पर बेचा था कि उन्हें इससे कोई शिकायत नहीं होगी । अभी तक मैंने इनसे सैट की कीमत भी नहीं ली थी । आज अगर वे सैट के बारे में अपनी सन्तुष्टि जाहिर कर देते तो मैं चैक ले जाता ।”
“पेचकस को तो उंगलियों के निशानों के लिए चैक किया ही गया होगा, इन्सपेक्टर साहब ।” - ललित ने प्रभूदयाल से प्रश्न किया ।
“जी हां । पेचकस को चैक किया गया है । उसकी मूठ पर शौकत हुसैन की उंगलियों के निशान मौजूद थे ।”
“शौकत हुसैन के हाथ में पेचकस कैसे आया !” - एकाएक सुनील ने पूछा ।
प्रभूदयाल ने सुनील की ओर देखा और फिर बुरा-सा मुंह बनाकर बोला - “स्टोर के फर्श पर एक टूल बाक्स गिर पड़ा है । शायद टूल बाक्स स्टोर के किसी ऊंचे शैल्फ पर पड़ा था और कुर्सी पर बैठे-बैठे मृत का हाथ उस ऊचाई तक पहुंच पाना असम्भव था इसलिए शायद उसने छड़ी की सहायता से टूल बाक्स नीचे फर्श पर गिरा दिया था ।”
“लेकिन टेलीविजन का कोई नुक्स दूर करने के लिए उसे खुद इतना बखेड़ा करने की क्या जरूरत थी, जबकि वह बड़ी आसानी से इन साहब को” - सुनील कपिल की ओर संकेत करता हुआ बोला - “बुला सकता था ।”
“इसका जवाब तो शौकत हुसैन ही दे सकता था जिसने वास्तव में ऐसा किया था ।” - प्रभूदयाल रौद्र स्वर से बोला ।
“शायद ।” - सुनील दार्शनिक भाव से बोला ।
उसने देखा कपिल कुमार ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला और फिर उसने होंठ भींच लिए ।
“शौकत हुसैन की मिसेज कहां है ?” - ललित ने पूछा ।
“मालूम नहीं ।” - प्रभूदयाल बोला - “पड़ोसियों से मालूम हुआ है कि वे हर शनिवार की शाम को शापिंग के लिए कहीं जाती हैं, कहां जाती हैं, यह किसी को मालूम नहीं है । इसीलिए उनके वापिस लौटने की प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है ।”
“बंगले में कोई नौकर-चाकर नहीं है ?”
“मालूम हुआ है कि पहले एक नौकरानी थी जो पिछली शाम को हमेशा के लिए नौकरी छोड़कर चली गई है । फिलहाल उन्होंने कोई नया नौकर नहीं रखा है ।”
रिपोर्टर प्रश्न पूछते रहे ।
सुनील ने एक सिगरेट सुलगा लिया और भीड़ में से अलग हट गया ।
उसके मस्तिष्क में कई प्रश्न उभर रहे थे ।
***
कपिल कुमार बंगले में से बाहर निकला और सड़क पर एक ओर चल दिया ।
सुनील ने अपनी साढे सात हार्स पावर की मोटर साइकिल स्टार्ट की और उसे धीमी गति से चलाता हुआ कपिल कुमार की बगल में ले आया ।
“हल्लो, सर ।” - सुनील बड़े मीठे स्वर से बोला ।
“हल्लो ।” - कपिल ने अनमने स्वर से उत्तर दिया ।
“मेरा नाम सुनील है । मैं ब्लास्ट का रिपोर्टर हूं ।”
“आई सी ।” - कपिल अनौपचारिक भाव से बोला ।
“आप रहते भी शंकर रोड पर हैं ?” - सुनील ने पूछा ।
“जी हां ! मेरी दुकान के ऊपर मेरा घर है ।”
“इधर कहां जा रहे हैं आप ?”
“इधर स्कूटर स्टैण्ड है । वहां से कोई स्कूटर...”
“मेरे साथ आइए न । मैं आपको शंकर रोड छोड़ता हुआ चला जाऊंगा ।”
“जी धन्यवाद, वास्तव में मैं अभी घर नहीं जा रहा हूं ।”
“तो चलिए जहां आप जा रहे हैं मैं आपको वहां छोड़ आऊंगा ।”
“आप क्यों कष्ट करेंगे ?”
“अजी कष्ट कैसा ? आप तो खामखाह तकल्लुफ कर रहे हैं ।”
“लेकिन मैं तो...”
“आइए भी । इसी बहाने आप से दो बातें हो जायेंगी ।”
“कैसी बातें ?”
“आप पहले बैठिए । बात रास्ते में कीजिए ।”
कपिल बड़े ही अनिच्छापूर्ण ढंग से मोटर साइकिल की पिछली सीट पर बैठ गया ।
सुनील ने मोटर साइकिल को गियर में डाल दिया ।
“किधर चलूं ?” - उसने पूछा ।
“आप कहां जायेंगे ?” - कपिल ने पूछा ।
“फिलहाल मेरी बात छोड़िए ।” - सुनील मजाक भरे स्वर से बोला - “मैं तो, जहां मैंने जाना है चला ही जाऊंगा । आप कहां जायेंगे ?”
“मेहता रोड ।” - कपिल हिचकिचाता हुआ बोला ।
“वाह ! मेहता रोड तो मेरे रास्ते में है । इसी लिए तो मैं कह रहा था, साहब कि आप खामखाह तकल्लुफ कर रहे हैं ।”
कपिल चुप रहा ।
पौने आठ बज चुके थे और पन्द्रह, बीस मिनट बाद ही उसे राबर्ट स्ट्रीट के क्रासिंग पर पहुंचना था ।
“कपिल साहब ।” - सुनील तनिक गम्भीर स्वर से बोला ।
“फरमाइए ।”
“वह टेलीविजन सैट तो बिल्कुल नया था न ?”
“जी हां । बुधवार को ही तो मैंने वह शौकत हुसैन को दिया था ।”
“फिर इतनी जल्दी उसमें खराबी कैसे आ गई ?”
“खराबी आ जाती है साहब । मशीनरी ही तो है ।”
“आपके ख्याल से टेलीविजन में क्या नुक्स हो गया होगा ?”
“कुछ कहा नहीं जा सकता साहब ।”
“दुर्घटना के बाद आपने टेलीविजन को देखा तो है न ?”
“जी हां देखा है । लेकिन उसमें दुर्घटना से पहले क्या नुक्स था, यह नहीं कहा जा सकता ।”
“क्यों ?”
“शौकत हुसैन के पेचकस द्वारा टेलीविजन में छेड़खानी करने से कहीं शार्ट सर्कट (Short Circuit) हो गया था जिसके कारण आधी दर्जन के करीब ट्यूबें भक्क से उड़ गई हैं सैट का तो पटड़ा हुआ पड़ा है । ऐसी सूरत में क्या कहा जा सकता है कि पहले क्या नुक्स था उसमें ! सम्भव है कहीं से कोई तार लूज हो गई हो या कोई ट्यूब ढीली हो गई हो या कोई डाई जायन्ट ही रह गया हो । जिसके कारण किसी सर्कट में करेन्ट का प्रवाह बन्द हो गया हो या सम्भव है, करेन्ट की लीड ही ढीली पड़ गई हो । सैट में नुक्स आने के अनगिनत कारण हो सकते हैं ।”
“आई सी ।”
सुनील कुछ क्षण चुपचाप मोटर साइकिल चलाता रहा और फिर बोला - “एक सवाल मैंने इन्सपेक्टर से भी पूछा था लेकिन उसने मजाक में उड़ा दिया ।”
“क्या ?”
“शौकत हुसैन अपाहिज आदमी था । उसका कमर से नीचे का भाग, जैसा कि मैंने सुना है एकदम बेकार हो चुका था । ऐसे आदमी सदा ही छोटे-छोटे कामों के लिए भी दूसरे की मदद के मोहताज हो जाते हैं और आदतन ऐसा कोई काम करने के बारे में नहीं सोचते जो वे सहूलियत से कर नहीं पाते । फिर भी टेलीविजन सैट एकाएक खराब हो जाने पर उसने आपको टेलीफोन नहीं किया बल्कि वह स्वयं स्टोर में गया, एक ऊंचे शैल्फ पर रखे हुए टूल बाक्स को छड़ी से फसाकर नीचे गिराया नीचे गिरे हुए औजारों में से एक पेचकस उठाया, वापिस टेलीविजन के पास आकर उसके पिछले भाग का ढक्कन खोला और फिर खुद नुक्स दूर करने की कोशिश में करेन्ट खाकर मर गया । आखिर उसने इतनी जहमत उठाई क्यों ? क्यों तभी उसने फोन करके आपको बुला लिया ?”
कपिल कुछ क्षण चुप रहा और फिर हिचकिचाता हुआ बोला - “इसका एक जवाब हो सकता है ।”
“क्या ?”
“आज साढे छः बजे टेलीविजन पर शौकत हुसैन की ही बनाई हुई फिल्म पेरिस की हसीना दिखाई जाने वाली थी । शौकत हुसैन ने मुझे बताया था कि उस फिल्म में पहली बार सलमा ने एक सहायक भूमिका निभाई थी । शौकत हुसैन टेलीविजन पर वह फिल्म देखने के लिए बेताब था । उसे कई दिन पहले से मालूम था कि आज उसकी फिल्म दिखाई जाने वाली थी । उसने मुझे विशेष रूप से कहा था कि मैं शनिवार से पहले उसके घर में टेलीविजन लगा दूं क्योंकि शनिवार को वह अपनी फिल्म जरूर-जरूर देखना चाहता है । सम्भव है आज साढे छः बजे से कुछ ही मिनट पहले टेलीविजन एकाएक खराब हो गया हो । सम्भव है कि समय इतना कम हो कि मुझे बुलाकर टेलीविजन ठीक करना उसे उचित न लगा हो । आखिर शंकर रोड से उसके बंगले तक आने में मैं पन्द्रह-बीस मिनट तो लगाता ही । चलता टेलीविजन बन्द हो जाने का कारण उसने यही समझा होगा कि भीतर कोई तार या पेच ढीला हो गया है, इसलिए टेलीविजन खुद खोल बैठने में उसे कोई हर्ज दिखाई नहीं दिया हो । इन चीजों से वास्ता न होने के कारण वह बिजली का स्विच ऑफ करना भी भूल गया होगा और उसने इस बात की ओर भी ध्यान नहीं दिया होगा कि जिस पेचकस से वह टेलीविजन की तारों से छेड़छाड़ कर रहा है उसकी मूठ भी लोहे की है ।”
“थ्योरी तो आपकी काफी शानदार है ।” - सुनील ने स्वीकार किया ।
“है तो थ्योरी ही । हकीकत तो केवल शौकत हुसैन ही जानता था ।”
“आप सलमा को जानते हो ?”
“आपका इशारा शौकत हुसैन की बीवी की ओर है ?”
“जी हां । इस केस के दौरान में तो एक ही सलमा का जिक्र आया है और वह शौकत हुसैन की बीवी है ।”
“मेरा उसे जानने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता । शौकत हुसैन को टेलीविजन सप्लाई करने के चक्कर में उसके बंगले पर कई बार गया हूं और अभी मैंने उसे देखा भी है ।”
“सुना है बड़ी खूबसूरत औरत है ।”
“ठीक सुना है आपने । और फिर उसमें हैरानी की क्या बात है ?”
“दोनों की फैमिली लाइफ कैसी थी ?”
“क्या मतलब ?”
“मेरा मतलब है कि उनमें निभती कैसी थी ! दोनों की आयु में सुना है, पच्चीस-छब्बीस साल का अन्तर था और फिर शौकत हुसैन अपाहिज भी था । क्या ये तमाम बातें उन दोनों के संबंध में तनाव का कारण नहीं बनती थी ?”
“मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है ।”
“सलमा हर शनिवार को जरूर शापिंग के लिए जाती है ।”
“सुना तो है ।”
“कहां जाती होगी ?”
“भगवान जाने । इतना बड़ा शहर है । औरतों की दिलचस्पी की कोई एक जगह हो तब न ।”
“आप ठीक कह रहे हैं ।”
कई क्षण सुनील चुपचाप मोटर साइकिल चलाता रहा ।
फिर उसने गाड़ी मेहता रोड पर मोड़ा ।
“मेहता रोड पर कहां जाइयेगा ?” - सुनील ने पूछा ।
“कहीं भी उतार दीजिए ।” - कपिल लापरवाही से बोला ।
“नहीं, नहीं ।” - सुनील मित्रतापूर्ण स्वर में बोला - “आप जगह बताइए, मैं आपको वहीं छोड़ आता हूं ।”
यह रिपोर्टर का बच्चा तो पीछे ही पड़ गया । कपिल मन ही मन बुदबुदाया ।
“यहां इस इमारत के सामने उतार दीजिए ।” - प्रत्यक्ष में वह एक विशाल इमारत की ओर संकेत करता हुआ बोला ।
“ओके ।” - सुनील बोला । उसने मोटर साइकिल फुटपाथ के साथ लगाकर रोक दी ।
“अच्छा साहब ।” - कपिल मुस्कराने का भरसक प्रयत्न करता हुआ बोला - “थैंक्यू वरी मच फार दी लिफ्ट ।”
“डोंट मैंशन सर ।” - सुनील उससे हाथ मिलाता हुआ बोला ।
कपिल इमारत की ओर मुड़ा ।
“कपिल साहब ।” - सुनील एकाएक बोल पड़ा ।
कपिल फिर उसकी ओर घूमा और आशंकित स्वर से बोला - “फरमाइये ।”
“अगर आप गलत न समझे तो एक बात पूछूं ?” - सुनील गम्भीर स्वर से बोला ।
“पूछिये !”
“वैसे तो यह दुर्घटना का ही केस है । मृत खुद अपनी लापरवाही से मरा है और केस भी किसी हद तक क्लोज किया जा चुका है लेकिन फिर भी इन पुलिस वालों का भरोसा नहीं होता । कई बार वे आदतन ही हत्या से सम्बन्धित लोगों से पूछताछ करते रहते हैं । विशेष रूप से वह इन्सपेक्टर प्रभूदयाल तो...”
“आप कहना क्या चाहते हैं ?” - कपिल व्यग्र स्वर से बोला ।
“आप शौकत हुसैन के बंगले पर कितने बजे पहुंचे थे ?”
“साढे छः बजे के करीब पहुंचा था ।”
“आप सिद्ध कर सकते हैं ?”
“क्या सिद्ध कर सकता हूं ?”
“यही कि आप साढे छः बजे ही शौकत हुसैन के बंगले पर आये थे, उससे पहले नहीं...”
“न केवल मैं यह सिद्ध कर सकता हूं मैं साढे छः बजे ही शौकत हुसैन के बंगले पर आया था बल्कि यह भी सिद्ध कर सकता हूं कि साढे छः बजे से पहले मैं वहां से कम से कम चार मील दूर था । साढे छः बजे... अरे !”
“क्या हुआ ?” - सुनील तीव्र स्वर से बोला ।
कपिल ने अपनी जेब में हाथ डाला और एक लम्बा सा लिफाफा निकाल लिया । वह विचित्र नेत्रों से उस लिफाफे को घूर रहा था ।
“यह क्या है ?” - सुनील ने पूछा ।
“मैं जब साढे छः बजे शौकत हुसैन के बंगले पर पहुंचा था तो उसी समय पोस्टमैन वहां आया था । साइकिल से उतर कर बंगले के भीतर जाने की जहमत से बचने के लिए उसने मुझे ही यह लिफाफा भीतर शौकत हुसैन के पास ले जाने के लिए दे दिया था भीतर शौकत हुसैन की लाश देखकर तो मेरे होश हवास गुम हो गए थे और उसी हड़बड़ाहट में मैं इस लिफाफे को तो कतई भूल गया था ।”
“देखें ।”
कपिल ने लम्बा लिफाफा उसके हाथ में दे दिया ।
सुनील ने लिफाफा उलट-पलटकर देखा । सामने शौकत हुसैन का नाम और पता लिखा हुआ था । लिफाफे की पिछली ओर बीमा कम्पनी की लोकल ब्रांच का पता छपा हुआ था । लिफाफा काफी वजनी था ।
“बीमे की पालिसी मालूम होती है ।” - सुनील बोला ।
“शायद ।”
“इस उम्र में शौकत हुसैन को बीमा कराने की क्या सूझी ?”
“भगवान जाने ।”
लिफाफे के ऊपर एक लम्बा-सा नम्बर लिखा था ।
6804884, वह शायद पालिसी नम्बर था । सुनील ने वह नम्बर नोट कर लिया ।
“यह तो रजिस्टर्ड लेटर है ।” - एकाएक सुनील बोला - “पोस्टमैन ने आपको कैसे दे दिया ?”
“पोस्टमैन मुझे जानता था ।” - कपिल जल्दी से बोला - “शौकत हुसैन की जगह मैंने ही साइन कर दिए थे ।”
“क्या नाम है पोस्टमैन का ?”
“सूरमासिंह ।”
“मतलब यह कि सूरमासिंह की शहादत यह बात निर्विवाद रूप से सिद्ध कर सकती है कि आप साढे छः बजे ही शौकत हुसैन के बंगले पर पहुंचे थे ।”
“जी हां ।”
“और उससे पहले आप कहीं कम से कम चार मील दूर होने का जिक्र कर रहे थे ?”
“जी हां । रिंग रोड पर चौदह नम्बर कोठी में मेरा ए पी चावला नाम का एक और ग्राहक है । मैंने उसे एक रेडियोग्राम बेचा है । उसने कुछ नये लाग-फोईंग रेकार्डों का आर्डर दिया हुआ था । पांच बजे मैं उसकी कोठी पर वे रिकार्ड देने गया था ।”
“आप रिकार्ड लोगों के घर पर सप्लाई करते हैं ?”
“नहीं साहब ।” - कपिल तनिक नाराज स्वर से बोला - “चावला मेरा पुराना ग्राहक है । उससे अच्छी-खासी मित्रता हो गई है मेरी । इसलिए मैं रिकार्ड देने उसके घर चला गया था और इसी बहाने उसका रेडियोग्राम भी चैक कर आया था ।”
“आई सी ।”
“चाय वगैरह पी चुकने के बाद छः बजे वहां से निकला और फिर शौकत हुसैन के बंगले पर गया था ।”
“मतलब यह कि आपको पुलिस की उल्टी-सीधी छानबीन से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है ।”
कपिल चुप रहा ।
“यह लिफाफा अब आप किसे देंगे ?”
“शौकत हुसैन की बीवी को दूंगा और किसे दूंगा ?”
“आपको वापिस उनके बंगले पर जाना पड़ेगा ।”
“जाहिर है ।”
“कब जाइयेगा ?”
“चला जाऊंगा ।” - कपिल लापरवाही से बोला ।
सुनील ने लिफाफा उसे थमा दिया और बोला - “आपको बहुत कष्ट दिया । धन्यवाद ।”
कपिल ने उत्तर नहीं दिया ।
“सी यू ।” - सुनील बोला और उसने मोटर साइकिल स्टार्ट कर दी ।
कपिल इमारत में घुस गया ।
मेहता रोड के रोड पर ही एक पैट्रोल पम्प था जिसके कम्पाउन्ड में पब्लिक टेलीफोन बूथ लगा हुआ था ।
सुनील ने मोटर साइकिल बूथ के पास रोकी और भीतर घुस गया ।
उसने यूथ क्लब का नम्बर डायल कर दिया ।
“यूथ क्लब, गुड ईवनिंग ।” - दूसरी ओर से यूथ क्लब की टेलीफोन आपरेटर का मधुर स्वर सुनाई दिया ।
“सुनील कालिंग ।” - सुनील कायन बाक्स में सिक्के डालकर जल्दी से बोला ।
“यस मिस्टर सुनील, एण्ड हाड आई यू दिस ईवनिंग ?”
“फाइन । थैंक्यू फार आस्किंग ।”
“आजकल आप क्लब में नहीं आते हैं ?”
“आता हूं लेकिन लेट । तब तक तुम जा चुकी होती हो ।”
“अच्छा !”
“हां । रमाकान्त है ?”
“क्लब में तो हैं लेकिन कहां हैं मालूम नहीं । तलाश करना पड़ेगा । आप थोड़ी देर होल्ड कर लीजिए ।”
“बेहतर ।”
सुनील रिसीवर को कान से लगाए खड़ा रहा ।
“हल्लो सुनील ।” - थोड़ी देर बाद उसके कानों में रमाकांत का व्यस्त स्वर सुनाई दिया ।
“कैसे हो, रमाकान्त ?” - सुनील प्रेमपूर्ण स्वर से बोला ।
“अच्छा हूं । क्या काम है, जल्दी बोलो ।”
“क्या काम है ? वह क्या लड्डू-सा मार रहे हो मेरे सिर पर । टेलीफोन करने का मतलब यह थोड़े ही होता है कि कोई काम ही हो । मैंने तो केवल तुम्हारा हालचाल जानने के लिए टेलीफोन कर दिया है ।”
“मुझे मक्खन लगाने की कोशिश मत करो ।”
“मैं तुम्हें मक्खन नहीं लगा रहा हूं । तुमसे मुहब्बत जताने की कोशिश न कर रहा हूं ।”
“कम टू दी प्वाइन्ट, फार गाड सेक, कम टू दी प्वाइन्ट (भगवान के लिए मतलब की बात करो) मैं बहुत बिजी हूं ।”
“उखड़ रहे हो, उस्ताद !”
“हां, उखड़ रहा हूं ।”
“क्या बात हो गई है ?”
“छब्बीस जनवरी की रात को दमयन्ती माला की भरत नाट्यम की परफॉरमेंस का इन्तजाम किया था, पट्ठी ने ऐन मौके पर आने में असमर्थता जाहिर कर दी है ।”
“फिर कौन सी आफत आफत आ गयी ?”
“आफत तो आ ही गयी है । मैंने नगर के बड़े-बड़े लोगों को आमन्त्रित कर रखा है ।”
“एमरजेन्सी में अपनी बैले डांसर का बैले नृत्य ही करवा डालो ।”
“साले, मैंने कल्चरल प्रोग्राम की घोषणा की है । भारत नाट्यम की जगह पर बैले नृत्य तो यूं लगेगा जैसे... जैसे..” - और शायद रमाकांत को कोई तुलना नहीं सूझी - “साला पता नहीं कैसा लगेगा ?”
“मुझे तो भरतनाट्यम आता नहीं ।” - सुनील हमदर्दी-भरे स्वर में बोला - “वर्ना दमयन्ती माला की कमी मैं ही पूरी कर देता ।”
“मजाक मत करो ।” - रमाकांत नाराज स्वर से बोला ।
“रमाकांत ।” - सुनील बड़ी संजीदगी से राय देता हुआ बोला - “तुम खुद ही क्यों नहीं एक रंगारंग प्रोग्राम प्रस्तुत कर देते ? तुम्हें तो बैले नृत्य, भरतनाट्यम, कथाकली, झींगा गली, घोड़ा गली वगैरह सभी नृत्य आते हैं । मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं, तुम्हारी सोलो परफारमैंस बहुत पसन्द की जाएगी, लोग दमयन्ती माला को भूल जायेंगे ।”
दूसरी ओर भड़ाक से रिसीवर को क्रेडिल पर पटकने की आवाज आई ।
“हल्लो... रमाकांत... हल्लो... हल्लो... ओ...”
“यस मिस्टर सुनील !” - दूसरी ओर से आपरेटर की आवाज आई ।
“मैं रमाकांत से बात कर रहा था । पता नहीं कैसे लाइन कट गई ?”
“लाइन कटी नहीं, साहब ! रमाकांत साहब ने लाइन छोड़ दी है ।”
“जरा दुबारा बुला दो ।”
“अच्छा ।”
एक लम्बी इन्तजार के बाद उसे रमाकांत की आवाज फिर सुनाई दी - “बको ।”
“बकता हूं । बकता हूं ।”
“अगर इस बार कोई मजाक करने की कोशिश की तो जहां से बोल रहे हो, वहीं आकर मारूंगा तुम्हें ।”
“तुम्हें मालूम है, मैं कहां से बोल रहा हूं ?”
“नहीं । बता दो ।”
“ताकि तुम तुम मुझे यहां आकर पीट सको ?”
“हां ।”
“फिर तो...”
“अबे, फिर बकवास शुरू कर दी तुमने ।”
“अच्छा, अच्छा, काम की बात सुनो ।”
“बको ।”
“क्लब में दमयन्ती माला का नृत्य करवाने के लिए तुमने उससे कैसे सम्पर्क स्थापित किया ? तुम जानते हो उसे ?”
“फिर फालतू बातें शुरू कर दीं ।”
“यह फालतू बात नहीं है, चाचा ।” - सुनील तनिक चिढे स्वर में बोला ।
“तो फिर क्या बात है ?”
“पहले तुम मेरे सवाल का जवाब दो ।”
“दमयन्ती माला को मैंने खुद भी ट्रंककाल की थी और एक सोर्स भी था ।”
“सोर्स क्या था ?”
“बम्बई में हामटे नाम का मेरा एक जानकार है । वह फिल्म लाइन से सम्बन्धित है । उसी के माध्यम से दमयन्ती माला के राजनगर आने की बात पक्की की थी ।”
“कामटे फिल्म लाइन से कैसे सम्बन्धित है ?”
“एजेन्ट है ।”
“कैसा एजेन्ट ?”
“मुझे तो उसकी बातों से लगता है कि वह सारी बम्बई का एजेन्ट है । फिल्मी कलाकारों का, निर्माताओं का, निर्देशकों का, जूनियर कलाकारों का, फिल्मी अखबार वालों का । गर्ज यह कि फिल्म उद्योग से सम्बन्धित हर पेशे के लोगों का एजेन्ट है वह । आपने-आपको कान्टैक्ट मैन कहता है । पट्ठा पिछले पन्द्रह साल से बम्बई के फिल्म उद्योग में बिजली के खम्बे की तरह जमा खड़ा है ।”
“फिर तो उसे वहां के फिल्मी लोगों की बड़ी तगड़ी जानकारी होगी ।”
“बहोत तगड़ी । वह तो यह भी जानता, है कि कौन-सी अभिनेत्री किसी नाप की ब्रेसियरी पहनती है, कौन रबर फोम का कितना इस्तेमाल करती है, कौन अपनी खोपड़ी के सफेद बाल निकलवाने किस नाई के पास जाती है, किसकी बीवी का रोमांस किस के मियां के साथ चल रहा है, कौन...”
“काफी है । काफी ।” - सुनील ने उसे टोका ।
“तुम्हें कैसी जानकारी चाहिए ?”
“शौकत हुसैन नाम के किसी फिल्मी डायरेक्टर के बारे में सुना है ?”
“सुना है ।”
“सुना है ?”
“हां, हां । क्या लिखकर दूं ?”
“कैसे ?”
“एक बार कामटे राजनगर आया था तो उसने बताया था कि शौकत हुसैन राजनगर में रह रहा है । कामटे बड़ा अफसोस जाहिर कर रहा था कि अपाहिज हो जाने के कारण शौकत हुसैन जैसा सिल्वर जुबली फिल्में बनाने वाला डायरेक्टर फिल्म उद्योग की सेवा और जनता का मनोरंजन करने के योग्य नहीं रहता है ।”
“तुम यह जानकारी हासिल कर सकते हो कि जिस दुर्घटना में शौकत हुसैन अपाहिज हुआ था वह दुर्घटना कैसे घटी थी ?”
“कर सकता हूं लेकिन तुम्हारी इसमें क्या दिलचस्पी है ?”
“शौकत हुसैन मर गया है ।”
“अच्छा ! कब ? कैसे ?”
“अभी थोड़ी ही देर पहले मरा है । टेलीविजन को खुद ठीक करने की कोशिश कर रहा था कि बिजली का धक्का खा गया ।”
“च... च... च...।”
“तुम शौकत हुसैन के बारे में केवल यही जानना चाहते हो न कि वह अपाहिज कैसे हुआ ?”
“यह और उसने सलमा नाम की लड़की से किस हालात में शादी की और दोनों की पटती कैसी थी ? दोनों की आयु में पच्चीस साल का फर्क है । लड़की शौकत हुसैन से शादी करने को तैयार कैसे हो गई ?”
“और ?”
“अपाहिज हो जाने के बाद प्रकट है, शौकत हुसैन काम करने के काबिल तो रहा ही नहीं होगा । इसीलिए शायद उसने बम्बई शहर भी छोड़ दिया था । तुम यह पता लगाओ कि शौकत हुसैन की आर्थिक स्थिति कैसी थी और क्या उसका कोई और आय का साधन था ?”
“ऑल राइट ।”
“और शौकत हुसैन तो अपाहिज हो जाने के कारण फिल्म उद्योग से अलग है गया था लेकिन सलमा क्यों पति के साथ बम्बई से बाहर जाकर रहने के लिए तैयार हो गई ? आखिर वह भी तो अभिनेत्री थी । अगर वह फिल्मों में काम करती तो उन दोनों के लिए आय का एक स्थायी साधन बना रहता ?”
“यह भी पूछूंगा । और ?”
“एक और बीमा पालिसी का नम्बर लिख लो ।”
“बोलो ।”
“6804884”
“लिख लिया । किसकी पालिसी है यह ?”
“शौकत हुसैन की ।”
“अच्छा ।”
“मैं शौकत हुसैन के बीमे का पूरा विवरण चाहता हूं । जैसे उसने बीमा का करवाया था, कितनी रकम का करवाया था उसकी मृत्यु हो जाने पर बीमे की रकम का हकदार कौन होगा वगैरह ।”
“ओके ।”
“हर्नबी रोड के एरिया में सूरमा सिंह नाम का एक पोस्टमैन है । उससे यह पूछवाओ कि उसने कपिल कुमार नाम के एक आदमी के कितने बजे हर्नबी रोड के चार नम्बर बंगले में घुसते देखा था ?”
“यह किसके बंगले का नम्बर है ?”
“शौकत हुसैन के ।”
“और कपिल कुमार कौन है ?”
“बाद में बताऊंगा ।”
“अच्छी बात है । और ?”
“फिलहाल बस ।”
“शुक्र है ऊपर वाले का ।” - रमाकान्त की एक गहरी सांस सुनाई दी ।
सुनील चुप रहा ।
“तुम्हें शौकत हुसैन में इतनी दिलचस्पी क्यों है ?”
“वह मशहूर आदमी था । उसका थोड़ा-सा जीवन वृत्तान्त अखबार में छापेंगे ।”
“यह बात तो नहीं है, उस्ताद ।”
“यही बात है ।”
“मत बताओ । वैसे शौकत हुसैन मरा तो अपनी लापरवाही से ही है न ?”
“हालात तो यही बताते हैं ।”
“तुम्हारा अपना क्या ख्याल है ?”
“मेरा ख्याल और लोगों से अलग कैसे हो सकता है ।”
“सलमा का क्या ख्याल है ?”
“सलमा दुर्घटना के समय बंगले पर नहीं थी । मैं पौने आठ बजे के करीब वहां से लौटा था । तब तक सलमा का कहीं पता नहीं था । मेरे ख्याल से तो उसे अभी तक यह नहीं मालूम हुआ होगा कि उसका पति मर गया है ।”
“वह गई कहां ?”
“मालूम नहीं । मैंने कुछ पड़ोसियों से बात की थी । उन्होंने पांच बजे के करीब सलमा को कार पर बंगले से बाहर जाते देखा था । पड़ोसियों से पता चला है कि सलमा हर शनिवार को पांच बजे के करीब शापिंग के लिए जाया करती है ।”
“आगे-पीछे कभी नहीं जाती ?”
“आगे-पीछे भी जाती होगी लेकिन शनिवार की शाम को तो वह जरूर ही जाया करती है ।”
“वैसे शौकत हुसैन मरा कितने बजे था ?”
“सवा छ: और साढे छ: के बीच में ही गिरा होगा । सवा छ: से पहले तो टेलीविजन पर कोई कार्यक्रम होता ही नहीं है । लाश के टेम्प्रेचर वगैरह से डॉक्टर ने भी मृत्यु का लगभग यही समय बताया है ।”
रमाकांत एक क्षण चुप रहा और फिर बोला - “ऐनी वे, मैं बम्बई कामटे को ट्रंक काल करता हूं । कोई मतलब की बात मालूम हुई तो तुम्हें फोन कर दूंगा ।”
“ओके ।” - सुनील बोला ।
दूसरी ओर से सम्बन्ध-विच्छेद हो गया ।
सुनील ने भी रिसीवर हुक पर टांग दिया ।
उसने डायरेक्ट्री खोल ली और उसमें आकाशवाणी के टेलीविजन विभाग का नम्बर देखने लगा ।
उसने रिसीवर फिर उठा लिया और टेलीविजन विभाग के एक अधिकार का नम्बर डायल कर दिया ।
दूसरी ओर से आवाज आते ही उसने सिक्के कायन बाक्स में डाले और बोला - “हैलो ।”
“यस ।” - दूसरी ओर से एक गम्भीर स्वर सुनाई दिया ।
“मैं एक जानकारी चाहता हूं, साहब ।”
“फरमाइए ।”
“आज साढे छ: बजे टेलीविजन पर कौन-सी फिल्म दिखाई गई थी ?”
“शौकत हुसैन की पैरिस की हसीना ।”
“और साढे छ: बजे से पहले ।”
“समाचार चित्र । सवा छ: बजे प्रोग्राम शुरू होता है । सवा छ: और साढे छ: बजे के बीच में समाचार चित्र दिखाया गया था । ...आप यह सब क्यों पूछ रहे हैं ?”
“धन्यवाद ।” - सुनील बोला और उसने सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया ।
फिर उसने डायरेक्ट्री में देखकर रिंग रोड के ए पी चावला का नम्बर डायल कर दिया ।
“हैलो ।” - वह बोला ।
“फरमाइए ।”
“चावला साहब हैं ?”
“बोल रहा हूं जी ।”
“साहब, इलेक्ट्रोनिक्स के कपिल कुमार आपके पास आए हैं क्या ?”
“आप कौन बोल रहे हैं ?”
“मैं उनका एक मित्र हूं । उनकी दुकान से मालूम हुआ था कि वे आपके यहां गए हैं ।”
“कपिल कुमार यहां पांच बजे के करीब आए थे लेकिन यहां से तो वे छ: बजे ही चले गए थे ।”
“उन्होंने कुछ बताया था कि वे आपके यहां से कब जायेंगे ?”
“हां । शंकर रोड के किन्हीं शौकत हुसैन साहब के पास आने वाले थे वे । कह रहे थे कि किसी टेलीविजन सैट की पेमेण्ट लेनी है ।”
“मैं वहां पता करता हूं, साहब । धन्यवाद ।”
उसने रिसीवर हुक पर टांगा और बूथ से बाहर निकल गया ।
***
जिस इमारत के सामने सुनील ने कपिल को उतारा था, कपिल उसके पिछले द्वार से निकल कर पिछली पतली में गली में आ गया ।
यह मेन रोड की ओर बढा ।
“सुपर मार्केट ।” - उसने ड्राइवर को बताया ।
टैक्सी चल पड़ी ।
वह सुपर मार्केट के सामने वाली सड़क पर टैक्सी से उतरा और राबर्ट स्ट्रीट के क्रासिंग की ओर बढा । क्रासिंग से थोड़ी ही दूर राबर्ट स्ट्रीट के फुटपाथ पर उसे सलमा की गाड़ी खड़ी दिखाई दे गई ।
कपिल कार के समीप पहुंचा ।
सलमा ने उसे देखकर कार के बाहर निकलने का उपक्रम किया ।
कपिल ने हाथ के संकेत से उसे रोका और फिर कार में उसकी बगल में आ बैठा ।
“क्या बात थी ?” सलमा चिन्तित स्वर में बोली - “तुमने इस प्रकार यहां आने के लिए क्यों कहा था ?”
कपिल कई क्षण सलमा के चेहरे को देखता रहा था और फिर गम्भीर स्वर में बोला - “सलमा, एक शॉक के लिए तैयार हो जाओ ।”
सलमा का चेहरा पीला पड़ गया । उसके नेत्रों में भय की छाया उतर आई । अनजाने में ही उसका एक हाथ उसके वक्ष पर पहुंच गया ।
“क्या हो गया है ?” - उसने भयभीत स्वर में पूछा ।
“शौकत हुसैन मर गया है ।” - कपिल धीरे-से बोला ।
सलमा के मुंह से एक सिसकारी-सी निकल गई - “क... कैसे ?”
“उसे बिजली का करेन्ट लग गया था ।”
“बिजली का करेन्ट लग गया था ! कैसे ?”
“टेलीविजन के साथ छेड़छाड़ कर रहा था ।”
“क्या ?”
“आज टेलीविजन पर उसकी फिल्म पैरिस की हसीना दिखाई जाने वाली थी वह उस फिल्म को जरूर देखना चाहता था । ऐन मौके पर शायद टेलीविजन में कोई खराबी आ गई थी और उस खराबी के पेचकस लेकर खुद ही दूर करने के प्रयत्न में वह बिजली का धक्का खाकर मर गया ।”
सलमा के नेत्रों में अविश्वास की गहन छाया झलकने लगी थी ।
“पेचकस लेकर ?” - वह बोली ।
“हां ।”
“लेकिन शौकत हुसैन को तो यह मालूम नहीं था कि बंगले में पेचकस था भी या नहीं और या तो कहां रखा था ?”
“तुम्हारा मतलब है कि उसे खुद अपने घर की चीजों की जानकारी नहीं थी ?”
“वह बंगला उसका कहां है !”
“क्या ?” - इस बार हैरान होने की बारी कपिल की थी ।
“जिस बंगले में हम रहते हैं वह शौकत हुसैन की प्रापर्टी नहीं है ।”
“तो फिर ?”
“वह बंगला उसके बम्बई के ही एक दोस्त का है । खाली पड़ा था । उसी ने हमें यह राय दी थी कि अगर वह बम्बई में नहीं रहना चाहते तो पूना रहने से तो अच्छा है कि हम उसके राजनगर के बंगले में ही रह लें । इस प्रकार खर्चा ही घट जायेगा... वैसे पेचकस कहां था ?”
“स्टोर में । स्टोर के एक शैल्फ पर टूल बाक्स रखा था, उसी में पेचकस था ।”
“लेकिन शौकत हुसैन का तो टूल बाक्स तक पहुंचना असम्भव है ।”
“उसने एक छड़ी की सहायता से टूल बाक्स शैल्फ से नीचे गिरा लिया था ।”
सलमा चुप रही । वह अभी भी बेहद सन्दिग्ध दिखाई दे रही थी ।
“तुम इतनी सन्दिग्ध क्यों हो ?”
सलमा ने उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दिया । बदले में उसने एक अन्य प्रश्न पूछ लिया - “तुमने मुझे टेलीफोन पर शौकत हुसैन की मृत्यु के बारे में क्यों नहीं बताया था और मुझे बंगले पर फौरन वापिस लौटने के स्थान पर यहां आने के लिए क्यों कहा था ?”
“मैंने यह बात तुम्हारे भले के लिए ही कही थी ।”
“इसमें मेरा क्या भला देखा तुमने ?”
“तुमने कहा था कि तुम्हारी शौकत हुसैन से बड़ी तगड़ी तकरार हो गई थी । उसने तुम्हारा अपमान किया था, तुम्हें मारा-पीटा भी था । और इस रोज के बखेड़े से तंग आकर तुम उसे हमेशा के लिए छोड़ आई थीं । तुम्हारे पीछे शौकत हुसैन बिजली का धक्का खाकर मर गया । हमेशा तो तुम उस समय सुपर मार्केट जाया करती थी और तुम मेरी दुकान पर पहुंच गई । अगर पुलिस को मालूम हो जाये कि शौकत हुसैन जैसे अपाहिज को हमेशा के लिए छोड़कर चली गई हो तो पुलिस को इस बात की बहुत सम्भावना दिखाई देगी कि शायद शौकत हुसैन ने खुदकुशी कर ली है । अपाहिज खाविन्द का तुम अकेला सहारा थी । अगर तुम उसे छोड़कर चली आती तो उसकी जिन्दगी मुहाल हो जाती । ऐसे हालात में आदमी का खुदकुशी कर लेना कोई बहुत नामुमकिन बात नहीं है । पुलिस के दिमाग में खुदकुशी का ख्याल आ जाने पर लाश का पोस्टमार्टम भी जरूर होता । हर कोई यही कहता कि तुमने अपाहिज खाविन्द को पहले तो बहुत-बहुत दुख दिए और फिर उसे हमेशा के लिए बेसहारा छोड़कर चल दी । ऐसी हालत में बेचारा खुदकुशी न करता तो क्या करता ।”
सलमा चुप रही ।
“सलमा, मरने वाला तो मर ही गया । तुम अपने सिर पर बेवफा बीवी होने का इलजाम क्यों लेती हो ? अभी किसी को मालूम नहीं है कि तुम शौकत हुसैन को हमेशा के लिए छोड़ गई हो । अगर अब चुपचाप सीधी बंगले में वापिस चली जाओ तो किसी को मालूम होगा भी नहीं । फर्क कुछ भी नहीं पड़ेगा । तुम्हारा नाम तो बदनाम होने से बचेगा ही । साथ ही पुलिस की तफ्तीश और लम्बी और बाल की खाल निकालने वाली जिरह से भी बच जाओगी ।”
सलमा चुप रही ।
“साथ ही एक बार और सोचो ।” - कुछ क्षण चुप रहने के बाद कपिल फिर बोला - “शौकत हुसैन को छोड़ देने का इरादा कर लेने के बाद तुमने अपना सामान उठाया और सीधी मेरी दुकान पर पहुंच गई अगर पुलिस और अखबार वालों को यह बात मालूम हो गई । तो जानती हो कितनी अटकलें लगायेंगे वे ? तुम एक ऐसी औरत हो जो बम्बई की फिल्म इन्डस्ट्री के ग्लैमर को बहुत करीब से देख चुका हो । तुम्हारी हैसियत की औरत का इमानदारी से अपाहिज पति के साथ निभा पाना कोई आसान काम नहीं है । ऐसी हालत में लोग मेरा नाम तुम्हारे साथ जोड़ने से हिचकेंगे क्या ?”
सलमा चुप रही ।
कपिल व्यग्रता से उसके बोलने की प्रतीक्षा करने लगा । उसे सलमा की चुप्पी बेहद खल रही थी ।
“देखो कपिल ।” - वह अन्त में, वह बेहद धीमे स्वर से बोली - “पिछली रात को शौकत हुसैन ने मुझे बेहद जलील किया था और मुझे मारा भी था । आज दिन में फिर किसी बात पर तकरार हो गई थी और फिर भड़क उठा था । उसने मुझे फिर दबोच लिया था और बुरी तरह से मुझे बालों से पकड़कर झंझोड़ा था । वह अपाहिज जरूर है लेकिन अभी भी बैल जैसा मजबूत है । उसके आधे घन्टे बाद ही मैंने अपना सामान समेट लिया था और उसे कह दिया था कि मैं जा रही हूं और दुबारा कभी लौटकर नहीं आऊंगी । कार मैं इसलिए ले आई थी क्योंकि वह शौकत हुसैन की नहीं मेरी थी । पेरिस की हसीना में काम करने की एवज में शौकत हुसैन ने मुझे प्रोड्यूसर से नगद रुपये की जगह जाहिर में तोहफे के नाम पर यह कार दिलवा दी थी ताकि मुझे इन्कम टैक्स न देना पड़े । पांच बजे के करीब मैं अपना सामान कार से लाद कर बंगले में से निकली थी । उसी वक्त शौकत हुसैन गुस्से से दीवाना हो रहा था । उस वक्त उसी दिमागी हालत यह थी कि उसके मुंह से बोल नहीं फट रहा था । उस वक्त अगर उसका बस चलता तो वह मुझे जान से मार देता ।”
“तुम कहना क्या चाहती हो ?” - कपिल व्यग्र से बोला ।
“मेरी समझ में नहीं आता कि एक ऐसा आदमी जिसकी अपाहिज जिन्दगी का अकेला सहारा, उसकी बीवी उसे हमेशा के लिए छोड़कर जा रही हो, बीवी के जाने के फौरन बाद ही टेलीविजन पर प्रोग्राम देखने की कैसे सोच बैठा ? और प्रोग्राम को भी उसने इतनी अहमियत दी कि टेलीविजन पर कोई नुक्स पैदा हो जाने पर तुम्हें फोन करने की बजाय खुद टेलीविजन ठीक करने पर जुट गया जबकि उसने न तो जिन्दगी में पहले कभी इस तरह के काम करने में कोई दिलचस्पी दिखाई है और न ही उसे इसकी कोई जानकारी है । और फिर जिस दिमागी हालत में मैं उसे छोड़कर आई थी उसमें तो यह ज्यादा मुमकिन दिखाई दिया था कि वह टेलीविजन न चलने पर गुस्से में आकर टेलीविजन ही तोड़ दे ।”
“तुम्हारा मतलब क्या है ?”
“मेरा मतलब यह है कि मुझे शौकत हुसैन का टेलीविजन ठीक करते हुए बिजली का धक्का खाकर मर जाना बड़ा अजीब लग रहा है ।”
“अजीब तो है लेकिन नामुमकिन नहीं है । इन्सान किस दिमागी हालत में कैसी हरकतें करता है, उसका सिर्फ अन्दाजा लगाया जा सकता है, दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता । और फिर यह तो हकीकत है कि शौकत हुसैन ऐेसे ही मरा है । मौके की एक-एक बात यही जाहिर करती है । तुम कहती हो कि परेशानहाल आदमी टेलीविजन न चलने पर उसे तोड़ ही डालता है लेकिन यह भी तो मुमकिन है कि टेलीविजन न चलने पर वह उसे खुद ही खोल बैठा कि कम्बख्त चलता क्यों नहीं ? और एकाएक बात याद आई - वह शराब भी तो पी रहा था ।”
“क्या ?” - सलमा चौंक पड़ी ।
“हां ! मेरा ख्याल है, हादसे से पहले शौकत हुसैन शराब भी पी रहा था ।”
“तुम्हारा ख्याल है ?”
“हां । मुझे यह बात अभी सूझी है । शौकत हुसैन की लाश देखकर मेरी एकदम तबीयत खराब होने लगी थी । मैं बेहद घबरा गया था । पहियों वाली कुर्सी के पास ही एक शीशे का गिलास पड़ा था । मैंने वही गिलास उठा लिया था और उसी कमरे से अटैच्ड बाथरूम की ओर भागा था । वहां से वह गिलास पानी से भरकर पीने ही लगा था कि मुझे उसमें से विस्की की बू आने लगी थी । मैंने वह पानी फेंक दिया था और फिर गिलास को अच्छी तरह धोकर पानी पिया था । मैं शराब नहीं पीता हूं, इसलिए उसकी बू मुझे बहुत नागवार गुजरती है ।”
सलमा फिर चुप हो गई ।
“अगर तुम्हारे जाने के बाद से वह सच ही विस्की पी रहा था तो मुमकिन है टेलीविजन पर प्रोग्राम शुरू होने के समय से पहले वह काफी हद तक शाम के वाक्ये को भूल चुका हो । फिल्म तो बहरहाल वह देखना चाहता ही था । इसीलिए उसने मुझे खास तौर पर कहा था कि मैं टेलीविजन शनिवार से पहले-पहले ले आऊं ।”
सलमा फिर भी कुछ नहीं बोली ।
कपिल उसका मुंह देखता रहा ।
“अब मैं क्या करूं ?” - एकाएक वह बोली ।
“तुम क्या करो ?” - कपिल अप्रिय स्वर से बोला - “तुम वापिस बंगले पर जाओ ।”
“वहां तो आऊंगी ही । अब तो पौने नौ बजने को हैं । मार्केट तो आठ बजे ही बन्द हो जाती है । पूछे जाने पर इतनी देर से लौटने की क्या वजह बताऊंगी मैं ?”
“ओह ! उसका इन्तजाम मैं किए देता हूं ।”
“क्या इन्तजाम करोगे ?”
“मैं तुम्हारे कार के स्पेयर टायर की हवा निकाल देता हूं । पूछे जाने पर तुम कह देना कि रास्ते में पंचर हो गया था । टायर बदलने में देर लग गई थी ।”
सलमा ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
“अपना एक हेयर पिन देना ।”
“क्या करोगे ?”
“टायर की हवा निकालूंगा ।”
सलमा ने बालों में से हेयर पिन निकालकर उसे दे दिया ।
कपिल कार से बाहर निकल गया ।
उसने पिन की सहायता से कार के स्पेयर टायर की हवा निकाल दी ।
वह वापिस ड्राइविंग सीट वाली साइड की खिड़की के सामने आ खड़ा हुआ ।
“वैसे केस क्लोज हो चुका है ।” - कपिल बोला - “पुलिस तुम से दो चार सीधे-साधे हमदर्दी भरे सवाल पूछेगी । लेकिन ज्यादा सवाल पूछे जाने पर भी यह हरगिज मत जाहिर होने देना कि आज तुम उसे छोड़कर चली गई थी और न ही कोई ऐसी बात करना जिससे यह जाहिर होने लगे कि शौकत हुसैन अपनी लापरवाही से नहीं बल्कि जानबूझकर खुदकुशी करके मरा है ।”
“मुझे डर लग रहा है ।”
“किस बात का ?”
“मुझे लग रहा है कि मैं पुलिस को तमाम बातें न बताकर कोई गुनाह कर रही हूं ।”
“ऐसी कोई बात नहीं है । मरने वाला तो मर ही गया है । तुम्हें अभी भी उसी सोसायटी में जिन्दा रहना है । ऐसी सूरत में अपने आपको खामख्वाह की पब्लिसिटी और बदनामी की हालत से बचाये रखने के लिए थोड़ी-सी होशियारी बरतना कोई गुनाह नहीं है ।”
“अच्छा ।” - सलमा गहरी सांस लेकर बोली ।
कपिल ने झुककर धीरे से उनका स्टियरिंग व्हील पर रखा कांपता हुआ हाथ थपथपाया और फिर कार से अलग हो गया । सलमा ने गाड़ी स्टार्ट कर दी ।
एकाएक कपिल को अपने जेब में पड़े हुए शौकत हुसैन के नाम बीमा कम्पनी के पत्र का ख्याल आया ।
“सुनो ।” - वह सलाम को रोकता हुआ बोला ।
“हां ।”
“यह शौकत हुसैन की एक चिट्ठी थी । जब मैं तुम्हारे बंगले पर पहुंचा था तो पोस्टमैन ने भीतर ले जाने को दी थी । हड़बड़ाहट के कारण अभी तक यह मेरी ही जेब में पड़ी हुई है ।”
सलमा ने भावहीन ढंग से हाथ बढा दिया ।
“बीमा कम्पनी की चिट्ठी है ।” - कपिल उसे लिफाफा देता हुआ बोला - “क्या शौकत हुसैन ने जीवन बीमा करवाया हुआ था ?”
“हां ।” - सलमा अनिश्चयपूर्ण स्वर में बोली ।
“कितने रुपये का ?”
“मुझे मालूम नहीं । शौकत हुसैन के जाती मामलों में मैंने कभी दिलचस्पी नहीं ली ।”
कपिल चुप हो गया ।
सलमा ने कार को गियर में डाल दिया ।
अगले ही क्षण कार कोलतार की चिकनी सड़क पर दौड़ी जा रही थी ।
***
सुनील ब्लास्ट के आफिस में स्थित अपने केबिन में मेज पर सिर रखे सो रहा था ।
एक चपरासी ने उसे धीरे से झिंझोड़ कर जगाया ।
“क्या है ?” - सुनील ने बिना नेत्र खोले अलसाये स्वर से पूछा ।
“आपका फोन है ।” - चपरासी ने बताया ।
सुनील ने अपनी मेज पर रखे टेलीफोन की ओर हाथ बढा दिया ।
“यहां नहीं साहब ।” - चपरासी ने उसे टोका ।
सुनील ने आंखें खोल दीं और चिढे स्वर से बोला - “अबे, सारी बात एक ही बार क्यों नहीं कह देता !”
“साहब, राय साहब के टेलीफोन पर आपकी काल है, कोई रमाकांत साहब आपको पूछ रहे हैं । मैंने उन्हें लाइन होल्ड करने के लिए कहा है । जाकर बात कर लीजिए और नींद मुझे भी बहुत आ रही है ।”
सुनील उठ खड़ा हुआ । उसने एक जोरदार अंगड़ाई ली और फिर अपने उलझे हुए बालों में हाथ फिराता हुआ बोला - “टाइम क्या हुआ है ?”
“एक बज चुका है ।”
“अच्छा ।”
सुनील केबिन से बाहर निकल आया और रेलिंग लगे गलियारे में चलता हुआ राय के कमरे की ओर बढ गया ।
राय ब्लास्ट को न्यूज एडीटर था ।
उसने एक उचटती हुई दृष्टि अपनी बाईं ओर डाली ।
विशाल रोटरी मशीन अभी शान्त थी इसलिए वातावरण भी शांत थी ।
सुनील राय के कमरे में आ गया ।
राय अपनी सीट पर मौजूद नहीं था ।
वह एक कुर्सी पर ढेर हो गया और फिर रिसीवर उठाकर कान पर लगाता हुआ बोला - “यस सर, रमाकांत सर ।”
“शौकत हुसैन के बारे में जानकारी पेपर में छापने के बारे में तुम वाकई सीरियस थे ?” - रमाकांत एकदम सीधा मतलब की बात पर आता हुआ बोला ।
“हां । एकदम सीरियस था ।”
“अभी पेपर प्रैस में नहीं गया ?”
“नहीं । अभी तक घन्टा है ।”
“मेरे पास तुम्हारे काम की कुछ जानकारी है ।”
“एक मिनट ठहरो ।” - सुनील बोला । उसने मेज पर रखा एक पैड अपने सामने सरका लिया और जेब में से पैंसिल निकालता हुआ बोला - “शुरू हो जाओ ।”
“पहले सलमा और शौकत हुसैन की शादी की बात सुनो ।”
“सुनाओ ।”
“जो कुछ मैं तुम्हें बताने जा रहा हूं, वह सब मेरी कमरे में टेलीफोन पर हुई बातचीत पर आधारित है ।”
“ठीक है तुम अपना रिकार्ड चालू करो ।”
“सलमा ने सन् पैंसठ की सितम्बर में शौकत हुसैन से शादी की थी । सलमा उस प्रकार की सैकड़ों खूबसूरत लड़कियों में से एक है जो फिल्म लाइन के आकर्षण में आकर एक्ट्रेस बनने की शौक में या तो खुद अपनी मर्जी से बम्बई चली आती है और या फिर वह अपने प्रेमियों, पतियों या पेशेवर दलालों द्वारा बरगला कर लाई जाती थी । सलमा मई में बम्बई आई थी । कहां से आई थी और किसके साथ आई थी यह कामटे को मालूम नहीं है ।”
“तुम तो कहते थे कि कामटे सब कुछ जानता है ।”
“स्टार्स के बारे में । सलमा तो कभी स्टार बन ही नहीं पाई ।”
“खैर, फिर ।”
“वैसे कामटे का ख्याल है कि वह यू पी के किसी शहर की है और बम्बई अपने भाई के साथ आई थी ।”
“आगे बोलो ।”
“सलमा उन दिनों सुबह से शाम तक विभिन्न फिल्मी कारखानों के चक्कर लगाया करती थी लेकिन उसे हीरोइन बनाने के लिए कोई तैयार नहीं था । डायरेक्टर लोग उसे उल्टे, सीधे आश्वासन देकर उसका सत्यानाश करने में तो दिलचस्पी लेते थे लेकिन कोई उसे हीरोइन बनाने के विषय में गम्भीरता से नहीं सोचता था । लड़की खूबसूरत थी इसलिए हर कोई बड़ी मुहब्बत से पेश आता था, उसको स्टार बना देने के बड़े-बड़े दावा करता था, उसे बड़े प्यार से अपने फ्लैट पर आमंत्रित करता था लेकिन जब कुछ कर दिखाने का अवसर आता था तो वह एकदम कन्नी काट जाता था ।”
“इस प्रकार तो उसकी बड़ी दुर्गति हुई होगी ?”
“उसकी क्या ऐसी कोई लड़की, जिसकी कोई बैक न हो बम्बई में यूं ही अपने-आपको बरबाद कर लेती है हर लड़की फुटबाल की तरह एक फिल्मी राक्षस की गोद से दूसरे फिल्मी राक्ष की गोद में उछाली जाती है तब तक उसकी आंखें खुलती हैं और उसे मालूम होता है कि बम्बई में वास्तव में कोई भी किसी नई लड़की को केवल उससे खूबसूरत चेहरे से प्रभावित होकर उसे हीरोइन बना देने के बारे में गम्भीरता से नहीं सोचता, तब तक वह इतना नीचे गिर चुकी होती है कि उस गन्दगी से उभरने का इरादा हमेशा के लिए त्याग देती है ।”
“सलमा की इतनी बुरी हालत हुई बम्बई में ।”
“सौभाग्यवश और लड़कियों की तरह सलमा की बम्बई में इतनी बुरी हालत नहीं हुई । नई लड़कियों के बारे में आदतन बदनीयत दो-चार प्रोड्यूसर डायरेक्ट्रों से तो वह भी टकराई लेकिन जल्दी ही एक ऐसी घटना हो गई जिसके कारण वह बम्बई की गन्दगी के पाताल में गहरी उतरने से बच गई ।”
“वह घटना क्या थी ?” - सुनील ने पूछा । उसका पैंसिल वाला हाथ तेजी से राइटिंग पैड पर चल रहा था । वह अपना और रमाकांत का सारा वार्तालाप शार्ट हैंड में लिख रहा था ।
“वह शौकत हुसैन से टकरा गई थी ।” - रमाकांत की आवाज आई - “शौकत हुसैन कोई एकदम देवता आदमी तो नहीं था लेकिन बम्बई के बाकी डायरेक्ट्रों के मुकाबले में काफी शरीफ और ईमानदार था । शौकत हुसैन सलमा से मिला और उसकी खूबसूरती से बेहद प्रभावित हुआ । उन दिनों शौकत हुसैन सफल फिल्में बनाने के नाते काफी मशहूर था । उन्हीं दिनों वह पैरिस की हसीना बना रहा था । फिल्म की तीन-चार रीलें बना भी चुकी थी फिल्म में एक लड़की का ऐसा कैरेक्टर था जिसकी अभी जरा भी शूटिंग नहीं हुई थी शौकत हुसैन ने अपने निर्माता से उस रोल के लिए एक नई लड़की अर्थात सलमा को ले लेने की जोरदार सिफारिश की थी । निर्माता नई लड़की लेना नहीं चाहता था लेकिन शौकत हुसैन के प्रबल अनुरोध पर वह मान गया और सलमा पैरिस की हसीना की कास्ट में शरीक कर ली गई ।”
“फिर ?”
“फिर सलमा एक्ट्रेस बन गई । फिल्म के रिलीज होने से पहले ही दोनों ने शादी कर ली । शौकत हुसैन का ख्याल था कि सलमा का नाम एकदम उस जैसे बड़े डायरेक्टर के साथ जुड़ जाने से सलमा की अच्छी-खासी पब्लिसिटी हो जाएगी और शौकत हुसैन को उसे अगली किसी फिल्मी में हीरोइन का चांस दिलाने में काफी सहूसियत रहेगी लेकिन हुआ इससे उल्टा ।”
“क्या मतलब ?”
“सलमा के शौकत हुसैन से शादी कर लेने के कारण लोग उल्टे सलमा से बिदकने लगे ।”
“क्यों ?”
“भई, बम्बई के फिल्मी लोग ऐसी लड़कियों से बहुत बिदकते हैं जो फिल्म उद्योग में कदम रखते ही अपने ऊपर पति रूप में एक ‘नो ट्रेस पासिंग’ (प्रवेश निषेध) का साइन बोर्ड जड़ लेती हैं बम्बई में तो ऐसी अन अटैच्ड लड़कियां पसन्द की जाती हैं जिनके काले कारनामों का हिसाब रखने वाला कोई न हो ।”
“लेकिन तुम्हारे अपने कथनानुसार, सलमा तो कोई ऐसी लड़की नहीं थी जो किसी प्रकार के कुकर्मों में हिस्सा लेने में कोई ऐतराज करती ।”
“उसे कोई ऐतराज नहीं था लेकिन शौकत हुसैन को तो ऐतराज था । आखिर वह उसका पति था और अपनी बीवी की हर प्रकार से हिफाजत करना वह अपना फर्ज समझता था । वह भला कैसे बर्दाश्त कर सकता कि उसकी बीवी महज हीरोइन बनने के लालच में जिस-तिस के बिस्तर की शोभा बनती फिरे । नतीजा यह हुआ कि शौकत हुसैन खुद तो उसे हीरोइन का रोल दिलवा नहीं पाया और उसने सलमा को अपने ढंग से कोशिश करने की इजाजत नहीं दी ।”
“लेकिन तुमने यह नहीं बताया कि सलमा शौकत हुसैन से शादी के लिये कैसे तैयार हो गई ?”
“बताया तो है बाबा । सलमा ने सोचा था कि एक सफल फिल्म निर्देशक से सम्बन्धित हो जाने के कारण उसके लिए फिल्म उद्योग में अपने कदम जमाने का रास्ता खुल जाएगा उसने शौकत हुसैन से शादी कर ली । दरअसल उस शादी में दोनों का ही स्वार्थ था । शौकत हुसैन पक्की उम्र का आदमी था, उसे सलमा जैसी हसीन बीवी मिल रही थी और सलमा को भविष्य की तरक्की के लिए शौकत हुसैन की छत्रछाया मिल रही थी । और देखा जाए तो सलमा को तो शौकत हुसैन से शादी करने में हर हालत में फायदा था । वैसे भी वह एक गरीब घर की लड़की थी । अपनी जिन्दगी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे किसी का तो मुंह देखना ही था । मैट्रीमनियल-कैच की हैसियत से भी क्या बुरा था वह ? सलमा चाहे हीरोइन न ही बन पाती, शौकत हुसैन से शादी करके उसने अभी अभाव रहित भविष्य की तो गारन्टी कर ही ली थी । शौकत हुसैन से शादी करके तो उसने अकलमन्दी का परिचय दिया था ।”
“शायद तुम ठीक कह रहे हो ।” - सुनील ने स्वीकार किया ।
“कामटे कहता है कि उन दिनों तो यह अफवाह भी थी कि सलमा ने ही शौकत हुसैन को शादी के लिए उकसाया था ।”
“पैसे के मामले में सहूलियत-भरी जिन्दगी हासिल करने के लिए ?”
“हां ।”
“अगर ऐसी बात थी तो उसने शौकत हुसैन को ही क्यों फंसाया ?” - किसी निर्माता सेठ को फंसाती, किसी मोटे प्रोड्यूसर को फंसाती या शौकत हुसैन से तगड़े डायरेक्टर को फंसाती ?”
“सम्भव है उसने ऐसी कोशिश की हो लेकिन शौकत हुसैन के अलावा कोई फंसा ही नहीं ?”
“सम्भव है ।” - सुनील ने स्वीकार किया ।
“खैर, तुम आगे सुनो ।”
“सुन रहा हूं ।”
“पेरिस की हसीना के बाद शौकत हुसैन ने एक और फिल्म बनाई थी । वह नायिका प्रधान फिल्म थी इसलिए शौकत हुसैन के बहुत इसरार करने पर भी निर्माता उस रोल के लिए नई लड़की लेने को तैयार नहीं हुआ था । शौकत हुसैन ने एक अन्य पुरानी अभिनेत्री को लेकर वह फिल्म बनाई थी । उस फिल्म के निर्माता ने शौकत हुसैन से यह वायदा किया था कि अगली फिल्म में वह सलमा को हीरोइन का चांस देने पर एतराज नहीं करेगा । इस बीच सलमा और शौकत हुसैन दोनों ने स्वत्रन्त्र रूप से और मिलकर भी इस दिशा में कभी प्रयत्न किए लेकिन दुर्भाग्य से बात कहीं बनी नहीं । उस नायिका प्रधान फिल्म की समाप्ति के बाद भी तो सलमा हीरोइन न बन पाई ।”
“क्यों ?”
“शौकत हुसैन एक एक्सीडैन्ट हो गया ।”
“एक्सीडैन्ट का सलमा के हीरोइन बनने से क्या ताल्लुक था ?”
“ताल्लुक था । निर्माता तो केवल शौकत हुसैन की खातिर सलमा को हीरोइन का चांस देने को तैयार हो गया था । सलमा को हीरोइन बनाने में उनकी कोई निजी दिलचस्पी तो थी नहीं । शौकत हुसैन का एक्सीडैन्ट हो जाने के बाद खुद शौकत हुसैन उसके किसी काम का नहीं रहा था । फिर वह सलमा को ही हीरोइन बनाने की जहमत क्यों उठाता ? जब उसी की शौकत हुसैन में दिलचस्पी नहीं रही तो सलमा में भी दिलचस्पी नहीं रही ।”
“मतलब यह कि सलमा हीरोइन नहीं बनी ?”
“नहीं बनी और अफवाह तो यह भी है कि शौकत हुसैन के एक्सीडेन्ट से पहले ही निर्माता ने सलमा को हीरोइन का चांस देने से साफ इन्कार कर दिया था । वह अपने वादे से साफ मुकर गया था । बहरहाल कारण कुछ भी रहा हो नतीजा यह था कि सलमा हीरोइन न बनी और आज तक नहीं बनी । पेरिस की हसीना उसकी पहली और आखिरी फिल्म थी ।”
“एक्सीडैन्ट कैसे हुआ था ?”
“उसकी भी सुनो । बम्बई में मालाबार हिल पर एक प्रोड्यूसर रहता था । किसी जमाने में शौकत हुसैन ने उसकी एक फिल्म डायरेक्ट की थी । उस प्रोड्यूसर ने अपनी कोठी पर एक बहुत बड़ी फिल्मी पार्टी का आयोजन किया था । उस पार्टी में बम्बई के लगभग सभी प्रसिद्ध फिल्मी लोग वहां उपस्थित थे । शौकत हुसैन भी वहां आमंत्रित था । शौकत हुसैन पार्टी में सलमा को साथ लेकर गया था । सलमा को वह ऐसी पार्टियों में हमेशा साथ लेकर जाया करता था । हर ऐसी पार्टी पर बड़े-बड़े निर्माता मौजूद होते थे । शौकत हुसैन सोचता था कि शायद किसी के साथ सलमा के लिए बात करने का अवसर निकल आये ।”
“फिर ?”
“कामटे कहता था कि बम्बई जैसी टोटल प्राहिबिशन वाली स्टेट में भी ऐसी पार्टियों में खूब शराब उड़ाई जाती है और वैसे भी आजकल तो दूसरे के माल पर बेरहमी से हाथ साफ करने का रिवाज ही हो गया है । शौकत हुसैन भी उस पार्टी में ढेर सारी शराब पी गया । सलमा को हीरोइन बनाने के लिए किसी से बात कर पाया या नहीं यह तो मालूम नहीं, लेकिन आधी रात के बाद जब वापिस लौटने का समय हुआ तो वह नशे में धुत्त था । कामटे भी उस पार्टी में मौजूद था । उसका कथन है कि शौकत हुसैन का सलमा सहारा देकर इमारत से बाहर निकाल लाई थी । इतनी ज्यादा शराब पी लेने के बावजूद शौकत हुसैन खुद गाड़ी चलाने का इसरार कर रहा था । सलमा उस हालत में स्टयरिंग उसके हाथ में नहीं देना चाहती थी । उसकी नजर में तो शौकत हुसैन सीधी और सपाट सड़क पर भी गाड़ी चला पाने की स्थिति में नहीं था । मालाबार हिल की ढलुआ और घुमावदार सड़क पर तो वह निश्चय ही एक्सीडेंट कर बैठता । लेकिन शौकत हुसैन नशे की झोंक में जिद किये जा रहा था कि गाड़ी वह ही चलाएगा । इसी बात को लेकर दोनों में प्रोड्यूसर की कोठी के सामने झगड़ा भी हुआ था । लेकिन जब सलमा किसी भी सूरत में स्टेयरिंग शौकत हुसैन के हाथ में देने के लिए तैयार नहीं हुई तो अन्त में शौकत हुसैन ने ही हथियार डाल दिए । वह कार में जा बैठा । सलमा कार चलाने लगी ।”
“फिर भी ऐक्सीडेंट हो गया ।” - सुनील हैरानी से बोला ।
“बीच में मत टोको बाबा । वह उस प्रकार का एक्सीडेंट नहीं था जैसा तुम सोच रहे हो ।”
“तो फिर क्या हुआ था ?”
“मैं वही बता रहा हूं ।”
“बताओ ।”
“सलमा मालावार हिल की रिज रोड पर गाड़ी चला रही थी उन लोगों ने मैरिन ड्राइव की ओर जाना था । रात के दो बजे थे, रिज रोड सुनसान पड़ी थी । सलमा बड़ी सावधानी से ढलुवां सड़क पर गाड़ी चला रही थी । शौकत हुसैन उसकी बगल में बैठा बैठा न जाने कब सो गया था । उसी क्षण पीछे से एक कार आई और उसने सलमा को रुकने का संकेत किया ।”
“ये सब बात तुम्हारे दोस्त कामटे को कैसे मालूम है ?”
“बाद में सलमा ने पुलिस को बयान दिया तो उसमें उसी ने ये बात बताई थीं ।”
“खैर, फिर क्या हुआ ?”
“सलमा ने सड़क पर कार रोकी और बाहर निकल आई । दूसरी कार उसकी कार से कोई दस गज रुकी थी । दूसरी कार में से जो युवक निकाला उसे सलमा जानती थी । वह आकाश कुमार नामक प्रसिद्ध अभिनेता था और मालाबार हिल वाले प्रोड्यूसर की पार्टी में वह भी मौजूद था । वह भी कार से बाहर निकल आया । सलमा उसके समीप पहुंची । आकाश कुमार ने बताया कि सलमा कोठी पर अपना पर्स भूल आई थी वह सलमा से दो-तीन मिनट बाद ही कोठी से चला था और उसे यकीन था कि वह रास्ते में सलमा को पकड़ लेगा इसलिए वह पर्स अपने साथ ले आया था । सलमा पर्स लेने के बाद अभी धन्यवाद क पूरा शब्द कह ही रही थी कि वह अप्रत्याशित घटना घटित हो गई जो बाद में एक्सीडेंट का रूप धारण कर बैठी ।”
“क्या हुआ ?”
“सलमा ने कार को जिस स्थान पर पार्क किया था, उससे आगे सड़क पर बड़ी गहरी ढाल थी । न जाने कैसे सलमा की कार अपने आप ही उस ढलान पर लुढकने लगी । शौकत हुसैन फ्रन्ट सीट पर सोया पड़ा था । कार लुढकी जा रही है, उसे इस बात की तनिक भी जानकारी नहीं थी और जब तक सलमा और आकाश कुमार की नजर कार पर पड़ी, कार इतनी ज्यादा गति पकड़ चुकी थी कि भागकर उस पर चढ पाना और उसे रोक पाना सम्भव नहीं था ।”
“लेकिन यह कैसे सम्भव है ? क्या सलमा ने कार को पार्किंग ब्रेक लगाकर नहीं छोड़ा था ?”
“सलमा कहती है वह कार को पार्किंग ब्रेक लगाकर ही कार के नीचे उतरी थी ।”
“फिर भी कार एकाएक लुढक गई ?”
“हां ।”
“कैसे ?”
“भगवान जाने । शायद ब्रेक ठीक नहीं था या शायद ब्रेक ठीक से लगा ही नहीं पाई थी । वैसे बाद में शौकत हुसैन ने कहा था कि शायद अनजाने में उसी का हाथ पार्किंग ब्रेक से छूटकर उसे रिलीज कर बैठा था ।”
“फिर ?”
“शौकत हुसैन की तकदीर अच्छी थी जो मरने से बच गया । कार सड़क से नीचे उतर गई थी और सीधी सड़क के किनारे जमीन में पड़े ड्रमों से जा टकराई थी साधारणतया ऐसी हालत में गाड़ी ड्रमों को भी उखाड़ती हुई नीचे गहरे गड्ढे में जा गिरती है लेकिन उस बार ऐसा नहीं हुआ । गाड़ी ड्रमों से टकराई और एकदम घूम गई । उसका पिछला भाग पैंतालिस के कोण पर गड्डे में जा गिरा मगर अग्रभाग ड्रमों से ही उलझा रहा । मतलब यह कि गाड़ी गड्ढे में गिरने से बच गई । उसी क्षण वहां से एक और कार गुजरी । आकाश कुमार और उस गाड़ी के आदमियों ने किसी प्रकार शौकत हुसैन को बुरी तरह पिचकी हुई गाड़ी में से बाहर निकाला । उसे फौरन हस्पताल ले जाया गया । बाद में डाक्टरों ने बताया कि उसकी कमर के नीचे का सारा भाग पैरेलाइज सा हो गया है और उसकी दोनों टांगे बेकार हो गई हैं ।”
“यह दुर्घटना हुए कितना अरसा हो चुका है ?”
“मैं तुम्हें एकदम ठीक तारीख बताता हूं । दुर्घटना सन् 1967 की बीस अप्रैल को हुई थी ।”
“उसके बाद ?”
“हस्पताल से निकलने के बाद शौकत हुसैन किसी काम-धाम के काबिल तो रहा नहीं । उसकी सारी जिन्दगी पहियों वाली कुर्सी की मोहताज हो गई थी ।”
“उसने बम्बई क्यों छोड़ी ?”
“कामटे कहता है कि उसके बम्बई छोड़ने का मूल कारण सलमा थी । शौकत हुसैन की जिन्दगी तो घर की चारदीवारी तक ही सीमित हो गई थी सलमा ने थोड़े ही दिनों बाद अपनी शादी से पहले के दिनों जैसी उच्छ्रन्खल जिन्दगी आरम्भ कर दी थी । शौकत हुसैन घर पर पड़ा रहता था और सलमा आधी-आधी रात को पार्टियों में गुलछर्रे उड़ाकर वापिस लौटती थी । सलमा की हरकतों के कारण ही उन दिनों शौकत हुसैन बेहद चिड़चिड़ा और गुस्सैल आदमी हो गया था । वह क्रोध में सलमा पर बेवफाई की तोहमत लगाता था तो सलमा रोने लगती थी और कहती थी कि वह तो केवल किसी फिल्म में रोल हासिल करने का प्रयत्न कर रही है ताकि कोई आय का साधन बन सके और वह तो स्वप्न में भी अपने अपाहिज पति को धोखा देने के बारे में नहीं सोच सकती । प्रमाणस्वरूप जब शौकत हुसैन ने उसे बम्बई छोड़कर पूना रहने के लिए कहा तो वह फौरन तैयार हो गई ।”
“लेकिन सलमा की बात तो ठीक थी । शौकत हुसैन तो कमाने के काबिल रहा नहीं था । ऐसी सूरत में आय के लिए सलमा ही कुछ कर सकती थी ।”
“ठीक है लेकिन शौकत हुसैन ने इस बात की परवाह नहीं की । उसके पास तीस-चालीस हजार रुपया था और वह फिलहाल उसी पर निर्भर कर रहा था ।”
“लेकिन तीस-चालीस हजार रुपया जिन्दगी-भर तो नहीं चल सकता न ?”
“हैदराबाद में कहीं उसका एक भाई रहता था और हार्डवेयर का अच्छा-खासा बिजनेस कर रहा था । वह शौकत हुसैन को सहर्ष किसी प्रकार की आर्थिक सहायता देने के लिए तैयार था लेकिन शौकत हुसैन हुसैन का आत्मसम्मान उसे दूसरों के सामने हाथ फैलाने से रोक रहा था । वह चाहता था कि जब तक गुजर होती है करे और उसके बाद ही किसी की सहायता के बारे में सोचे ।”
“इसका मतलब यह हुआ कि राजनगर रहते समय शौकत हुसैन की आर्थिक स्थिति कोई खास अच्छी नहीं रही होगी ?”
“ऐसा ही मालूम होता है ।”
“फिर वह ऐसे शानदार बंगले में कैसे रह पाता था ? टेलीफोन जैसी महंगी चीज कैसे खरीद पाता था ? और सुना है उसके पास कार भी है ।”
“टेलीविजन और कार के बारे में तो मुझे मालूम नहीं लेकिन बंगला उनका अपना नहीं है ।”
“ऐसे बंगले का तो किराया भी कम नहीं होगा ।”
“किराया उसे देना नहीं पड़ता । बंगला उसके बम्बई के ही किसी यार का है और साल में दस महीने खाली पड़ा रहता है । उसी ने शौकत हुसैन को कहा कि अगर वह चाहे तो पूना छोड़कर राजनगर जाकर उसके बंगले में रहने लगे । शौकत हुसैन भी पूना नहीं रहना चाहता था ।”
“क्यों ?”
“पूना बम्बई से इतनी ज्यादा दूर नहीं है कि सलमा बम्बई की फिल्म लाइन की रंगीन जिन्दगी की गर्मी पूना में महसूस न कर सके । शौकत हुसैन सलमा को फिल्मी ग्लैमर के आकर्षण से बहुत दूर रखना चाहता था । उसे लगता था सलमा बम्बई या बम्बई के आसपास रहकर उसकी लाचारी को कभी-न-कभी धोखा दे जाएगी ।”
“सलमा राजनगर आने के लिए तैयार हो गई ?”
“तैयार हो ही गई होगी । बम्बई में तो वह हर ढंग की कोशिशें करके देख चुकी थी किसी ने भी उसे एक अभिनेत्री के रूप में स्वीकार नहीं किया था । उल्टा बम्बई में रहकर उसके खराबियों की लपेट में आ जाने के ज्यादा चांस थे आखिर वह भी तो एकदम मूर्ख नहीं रही होगी न इतनी अक्ल तो उसे भी आ ही गई होगी कि एक्ट्रेस बनने के लालच में फिल्मी प्रभूओं को अपने शरीर की भेंट चढाते रहने से यह कहीं अच्छा है कि वह अपने पति के ही आश्रय में रहे । और फिर अभी तो शौकत हुसैन ऐसा कोई कंगाल भी नहीं था ।”
सुनील चुप रहा ।
उसी क्षण राय ने कमरे में प्रवेश किया उसने बोलने के लिए मुंह खोला लेकिन सुनील ने उसे हाथ के संकेत से चुप रहने के लिए कहा ।
“सलमा और शौकत हुसैन के बारे में और कोई बात ?”
“बस ।”
“उस बीमे की पालिसी का कुछ पता चला जिसका मैंने तुम्हें नम्बर दिया था ?”
“अभी नहीं । बीमा कम्पनी का दफ्तर खुलने से पहले इस विषय में कोई प्रयत्न भी नहीं किया जा सकता । लेकिन मैं पोस्टमैन सूरमा सिंह को चैक करवाया था ।”
“क्या कहा उसने ?”
“उसने कपिल कुमार को हर्नबी रोड के चार नम्बर बंगले में ठीक छः बजे घूमते देखा था । सूरमासिंह कपिल कुमार को जानता है । उसने कपिल कुमार को शौकत हुसैन के नाम की एक चिट्ठी भी दे दी थी ताकि खुद उसे बंगले के भीतर न जाना पड़े । डाक बांटते हुए उस दिन सूरमासिंह लेट हो गया था इसलिए वह सारी डाक जल्दी-से-जल्दी निपटाना चाहता था ।”
इसका मतलब यह हुआ कि कपिल कुमार हर कदम पर शत-प्रतिशत सच बोल रहा है । सुनील ने सोचा ।
“ओके रमाकांत ।” - अन्त में वह बोला - “थैंक्यू वैरी मच फार ऐवरीथिंग ।”
“शुक्र है ।” - रमाकांत ने गहरी सांस ली ।
“किस बात का ?”
“कम-से-कम तुम शुक्रगुजार तो हो ।”
“यह तो मैं हमेशा से...”
“खैर, और कुछ ?”
“फिलहाल बस । केवल उस बीमे की पालिसी का ख्याल रखना । उसके बारे में जानकारी हासिल होते ही मुझे सूचना दे देना ।”
“ओके ।”
“गुड नाइट, दैन ।”
“गुड मार्निंग ।” रमाकांत ने संशोधन किया ।
“आल राइट । गुड मार्निंग ।”
सम्बन्ध-विच्छेद हो गया ।
सुनील ने रिसीवर को क्रेडिल पर पटक दिया और उठ खड़ा हुआ । उसने पेन्सिल जेब में रखी और वह पैड जिस पर वह शार्ट हैण्ड में लिख रहा था, राय की ओर सरका दिया ।
“इसमें” - वह बोला - “शौकत हुसैन और उसकी पत्नी सलमा के बारे में ढेर सारा मसाला है । आज के पेपर में जितना इस्तेमाल हो सकता है कर लेना ।”
और इसके पहले कि राय के मुख से एक शब्द भी निकल पाता वह कमरे से बाहर निकल गया ।
***
अगले दिन शाम को लगभग तीन बजे रमाकांत का टेलीफोन आया ।
“बीमे की पालिसी के बारे में सुनो ।” - रमाकांत बोला ।
“सुनाओ ।”
“6804884 शौकत हुसैन की लाइफ इन्श्योरेंस की पालिसी है ।”
“यह तो जाहिर था ।”
“बीमे की रकम एक लाख रुपये थी, समय बीस साल और मासिक प्रीमियम की शर्त थी ।”
“नामिनी जीवन बीमा कराने वाले के मर जाने के बाद जिसे बीमे की रकम मिलती है, कौन है ?”
“उसकी बीवी । सलमा ।”
“बीमा करवाया कब गया था ?”
“दस अप्रैल सन् 1967 को ।”
“क्या ?” - सुनील हैरानी से बोला ।
“इसमें हैरान होने की क्या बात है ?”
“तुम्हारा मतलब है कि शौकत हुसैन ने दुर्घटना होने से केवल दस दिन पहले बीमा करवाया था ! तुमने कहा था न कि एक्सिडेन्ट बीस अप्रैल को हुआ था ।”
“हां, यार यह बात तो मैंने सोची ही नहीं थी ।”
“पुलिस या बीमा कम्पनी ने किसी गड़बड़ का सन्देह नहीं किया था ?”
“नहीं ही किया होगा । वैसे सन्देह की गुंजायश भी नहीं थीं । वह तो केवल एक दुर्घटना थी । अभिनेता आकाश कुमार खुद इस बात का गवाह था और फिर बीमा कम्पनी ने केस को जिस ढंग से डील किया था, इससे लगता था कि कोई सन्देह नहीं किया गया था ।”
“बीमा कम्पनी ने क्या किया था ?”
“दुर्घटना के बाद शौकत हुसैन ने बीमा कम्पनी को बम्बई के एक माने हुए डॉक्टर का सर्टिफिकेट दिया था जिसका आशय यह था कि दुर्घटना के कारण शौकत हुसैन पूरे जन्म के लिए अपाहिज हो गया है और इस स्थिति में कतई नहीं रहा है कि खुद अपनी रोजी कमा सके । बीमा कम्पनी के डॉक्टर ने भी शौकत हुसैन का मुआयना किया था और शौकत हुसैन के डॉक्टर के कथन की पुष्टि की थी ।”
“इससे फर्क क्या पड़ा ?”
“बहुत ढेर सारा फर्क इससे तो । शौकत हुसैन ने उसके बाद अभी एक दो प्रीमियम ही दिए थे कि पालिसी की एक धारा के अनुसार उसे भविष्य में प्रीमियम जमा करवाने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया था ।”
“क्या मतलब ?”
“भई, जीवन बीमे की एक शर्त यह भी थी और सभी की पालिसी में होती है, कि अगर बीमा करवाने वाला बीमा करवाने के बाद किसी समय किसी दुर्घटना में इतना घायल हो जाए कि वह अपने सारे जीवन के लिए इनवैलिड हो जाए और स्वयं अपनी रोजी कमा पाने के योग्य न रहे तो उसे बीमे का प्रीमियम जमा कराने से तत्काल मुक्ति मिल जाती है । पालिसी मैच्योर हो जाने पर से पूरी रकम भी मिल जाती है । जैसे शौकत हुसैन ने सन् 67 में बीस साल का जीवन बीमा कराया था और फिर एक दुर्घटना में अपाहिज हो गया था । उस बीमे का प्रीमियम जमा कराना दुर्घटना के बाद ही बन्द कर दिया था लेकिन फिर भी बिना एक पैसा भी जमा करवाए उसे सन् 1987 में पालिसी मैच्योर हो जाने पर एक लाख रुपया मिल जाएगा ।”
सुनील के मुंह से सीटी निकल गई ।
“लेकिन अब तो शौकत हुसैन मर ही गया है ?” - थोड़ी देर बाद उसने नया प्रश्न किया ।
“अगर बीमा कम्पनी इस बात पर सन्देह न करे कि शौकत हुसैन एक दुर्घटना के कारण मरा है तो अब एक लाख रुपया सलमा को मिल जाएगा ।”
“लेकिन अगर बीमा कम्पनी शक करे तो ?”
“कैसा शक ?”
“जैसा मान लो शौकत हुसैन की हत्या हुई हो ?”
“क्या उसकी हत्या हुई है ?” - रमाकांत ने तनिक सन्दिग्ध स्वर में पूछा ।
“हुई नहीं है लेकिन मैं केवल अपनी जानकारी के लिए पूछ रहा हूं ।”
“अगर शौकत हुसैन की हत्या भी हुई है तो भी सलमा को बीमे की रकम मिल जाएगी बशर्ते कि हत्या खुद सलमा ने ही न की हो ।”
“तुम्हें तो बीमे के बारे में बड़ी जानकारी मालूम होती है । लगे हाथों एक बात ओर बता दो ।”
“क्या ?”
“अगर शौकत हुसैन ने आत्महत्या की हो ?”
“तो सलमा को एक नया पैसा नहीं मिलेगा ।”
“अच्छा ।” - सुनील चौंका ।
“जी हां ।”
“जीवन बीमे की यह शर्त भी होती है अगर बीमा करवाने वाला बीमा करवाने के एक साल के भीतर आत्महत्या कर ले तो बीमा कम्पनी बीमे की रकम चुकाने की किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है ।”
“अगर वह एक साल बाद आत्महत्या करे ?”
“तो कोई फर्क नहीं पड़ता ।”
“वैसे क्या इस प्रकार की बातों की बीमा कम्पनी खुद भी तफ्तीश करती है कि बीमा करवाने वाल कैसे मरा ?”
“अक्सर नहीं करती । इन मामलों में वह पुलिस के फैसलों को ही स्वीकार कर लेती है बशर्ते कि किसी गहरे फ्रॉड का अन्देशा न हो ।”
“इस केस में प्रभूदयाल दुर्घटना द्वारा मृत्यु कहकर केस क्लोज कर चुका है लाश का पोस्टमार्टम भी नहीं हुआ था और अभी तक लाश दफना भी दी गई होगी । इसका मतलब यह हुआ कि सलमा को बिना किसी रुकावट के नकद एक लाख रुपया मिल जाएगा ?”
“बिल्कुल ।”
सुनील सोचने लगा ।
“और कोई हुक्म है योर लार्डशिप ?” - रमाकांत का नाटकीय स्वर उसके कान में पड़ा ।
“नहीं धन्यवाद । तुम्हारे छब्बीस जनवरी के प्रोग्राम का क्या हुआ ? दमयन्ती माला मानी या नहीं ?”
“नहीं मानी ।”
“तो फिर कोई नर्तकी बुलवा लो ।”
“नहीं । मैंने सोचा है इस बार मैं ही भारत-नाट्टयम प्रस्तुत कर दूं । क्या ख्याल है ? कहो हीं... हीं... हीं...”
“हीं... हीं... हीं...।” - सुनील मुंह बिचकाकर बोला ।
रमाकांत ने रिसीवर क्रेडिल पर पटक दिया ।
सुनील ने धीरे से रिसीवर क्रेडिल पर सरका दिया और विचारपूर्ण मुद्रा बनाए बैठा रहा । उसके छिन्द्रावेशी मस्तिष्क में कई सम्भावनाएं जन्म ले रही थीं ।
***
सुनील ने अपनी मोटर साइकिल हर्नबी रोड के चार नम्बर बंगले के सामने के फुटपाथ पर चढा दी ।
उसने मोटर साइकिल को वहीं पार्क किया और बंगले के कम्पाउण्ड में प्रवेश कर गया ।
बरामदे में पहुंचकर उसने देखा, भीतरी कमरे का द्वार खुला था । उसने अपने आगमन की सूचनार्थ बैल पुश पर उंगली रख दी ।
भीतर घन्टी बजने की जोरदार आवाजा सुनाई दी ।
“कौन है ?” - भीतर से एक पुरुष स्वर सुनाई दिया ।
“मिसेज शौकत हुसैन घर में है ?” - सुनील ऊंचे स्वर में बोला ।
किसी ने उत्तर नहीं दिया और फिर समीप आते कदमों की आहट सुनाई दी ।
द्वार पर जो आदमी प्रकट, हुआ, वह कपिल कुमार था । उसने कमीज की बांहे ऊपर चढाई हुई थीं और वह अपने हाथ में एक पेचकस थामे हुए था ।
“आप !” - सुनील तनिक हैरानी से बोला ।
कपिल कुमार भी उसे फौरन पहचान गया ।
“जी हां ।” - वह बोला - “कहिए रिपोर्टर साहब, क्या हाल है ?”
“दुआ है आपकी ।”
“कैसे तशरीफ लाए ?”
“कल सलमा जी जो बंगले पर मौजूद नहीं थीं । सोचा आज घर होंगी । उन्हीं से बातें कर लें ।”
“किस सिलसिले में ?”
“कोई सिलसिला तो निकल आएगा और कुछ नहीं इतना तो जान ही लेंगे कि पति की मृत्यु की उन पर क्या प्रतिक्रिया हुई है और भविष्य में वे क्या करने वाली हैं ।”
“आपके लिए इन बातों का क्या महत्व है ?”
“हमारे लिए तो कोई महत्व नहीं है, साहब । लेकिन हमारा अखबार पढने वाले ऐसी बातों में काफी दिलचस्पी जाहिर करते हैं ।”
“सलमा तो नहीं है यहां ।”
“कहां गई ?”
“वे तो राजनगर ही छोड़ गई हैं । आगरा में उनके कोई रिश्तेदार रहते हैं, उन्हीं के पास चली गई है ।”
“अच्छा ।”
“जी हां । बेचारी अपने पति की मृत्यु से बहुत दुखी थीं और फिर अब यहां रहने के कोई मायने भी तो नहीं थे ।”
“अपना सामान वगैरह भी ले गई हैं ।”
“जी हां ।”
“तो फिर आप... बुरा मत मानिए, साहब । आप यहां क्या कर रहे हैं ?”
“टेलीविजन वापस ले जाने आया हूं ।”
“वापस ले जाने ?”
“जी हां । मुझे टेलीविजन की कीमत तो अभी मिली नहीं थी । कल मैं कीमत लेने आया था । तब तक वह दुर्घटना हो गई थी । सलमा कहती थी कि उसे तो टेलीविजन की जरूरत है नहीं इसलिए मैं जो ट्यूब वगैरह जल गई हैं, उनके पैसे चार्ज कर लूं । जितने दिन टेलीविजन उन्होंने चलाया है, उसका किराया ले लूं और टेलीविजन वापस ले जाऊं ।”
“ठीक ही तो है ।” - सुनील सहमतिसूचक ढंग से सिर हिलाता हुआ बोला - “विधवा औरत है । उसके लिए तो एक-एक पैसे की कीमत है ।”
“जी हां ।” - कपिल कुमार बोला - “मैंने किराया तो नहीं लिया है लेकिन जली हुई ट्यूबों के तीन सौ रुपये चार्ज कर लिए हैं ।”
सुनील ने अपनी जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और उसे कपिल की ओर बढाता हुआ बोला - “सिगरेट पीजिए ।”
“जी नहीं, धन्यवाद ।” - कपिल शिष्ट स्वर में बोला - “मैं सिगरेट नहीं पीता ।”
“अच्छा ।” - सुनील सहज स्वर में बोला और उसने एक सिगरेट सुलगा लिया ।
प्रत्यक्ष था वह अभी टहलना नहीं चाहता था ।
कपिल ने एक प्रश्नसूचक दृष्टि उसके चेहरे पर दौड़ाई और फिर बोला - “मैंने तो जरा टेलीविजन पैक करना है ।”
“जी हां, जी हां । जरूर कीजिए ।”
कपिल घूमा और उस कमरे की ओर चल पड़ा जहां दुर्घटना हुई थी ।
सुनील भी लापरवाही से सिगरेट के छोटे-छोटे कश लेता हुआ उसके पीछे हो लिया ।
कपिल ने एक उड़ती-सी नजर उस पर डाली लेकिन मुंह से कुछ नहीं बोला ।
दोनों दुर्घटना वाले कमरे में आ गए ।
टेलीविजन के पास टेलीविजन का एरियल और एक तार का गुच्छा पड़ा था । टेलीविजन का पृष्ठ भाग अभी भी खुला हुआ था ढक्कन पहले वाली स्थिति में ही पड़ा था ।
पहियों वाली कुर्सी अपनी स्थिति से हटाई नहीं गई थी ।
कपिल टेलीविजन के पास पहुंचा उसे उसके पिछले भाग का ढक्कन उठा लिया ।
“कौन-सी ट्यूबें जली हैं ।” - सुनील ने टेलीविजन के समीप आकर पूछा ।
कपिल ने टेलीविजन के भीतर लगी कुछ ट्यूबों की ओर संकेत कर दिया और एक अन्य स्थान पर उंगली रखता हुआ बोला - “यहां 220 वोल्ट एसी करेन्ट आता है । यहीं-कहीं शौकत हुसैन ने पेचकस छुआ दिया होगा ।”
“आई सी ।” - सुनील बोला ।
कपिल ने चुपचाप ढक्कन को टेलीविजन के पृष्ठ भाग पर लगाया और ढक्कन से किनारों पर लगे पेचकसों की पोजीशन ठीक करने लगा ।
सुनील सिगरेट के कश लगाता हुआ अनजाने में ही पहियों वाली कुर्सी पर बैठ गया ।
पहियों वाली कुर्सी उसे साधारण कुर्सियों से काफी ऊंची लगी । सामने के भाग में सीट के नीचे की ओर एक पट्टा-सा लगा हुआ था जो शायद पांव टिकाने के काम आता था ।
सुनील ने कुर्सी को पहिये के सहारे चलाया और टेलीविजन के और समीप आ गया ।
कपिल ढक्कन के पेच कस रहा था ।
सुनील उस कुर्सी पर बैठा हुआ शौकत हुसैन की लाचार जिन्दगी की कल्पना कर रहा था ।
ऊपर के दोनों पेच कस चुकने के बाद कपिल नीचे के पेच कस रहा था ।
“जरा वह कवर पकड़ाना ।”
जिस कुर्सी पर सुनील बैठा था उसकी बगल में ही एक प्लास्टिक का तह किया कवर रखा था जो शायद टेलीविजन को ढकने के काम आता था ।
सुनील ने कुर्सी पर बैठे-बैठे ही उस ओर हाथ बढाया लेकिन कुर्सी ऊंची होने के कारण हाथ जमीन पर रखे कवर तक पहुंचा नहीं । सुनील कुर्सी से उतर आया उसने प्लास्टिक का कवर उठाकर कपिल को थमा दिया जो तब तक चारों पेच कस चुका था ।
कपिल कवर की तहें खोलने लगा ।
सुनील फिर कुर्सी पर आ बैठा ।
एकाएक उसके मस्तिष्क में बिजली-सी कौंध गई । उसके नेत्र फैल गए और चेहरे पर व्यग्रता और उत्तेजना के भाव छा गए ।
उसने सिगरेट को फर्श पर फेंक दिया और एकदम बदले स्वर में बोला - “जरा ठहरना ।”
कपिल टेलीविजन पर कवर चढाते-चढाते रुक गया ।
उसने प्रश्नसूचक दृष्टि से सुनील की ओर देखा ।
सुनील कुर्सी को एददम टेलीविजन के करीब ले आया उसने देखा टेलीविजन के पिछले ढक्कन के नीचे के पेच जमीन से लगभग आठ इंच ऊंचे थे ।
“जरा पेचकस, मुझे देना ।” - सुनील बोला ।
“क्या बात है ?” - कपिल ने उलझनपूर्ण स्वर में पूछा ।
“पेचकस तो दो ।”
कपिल ने उसे पेचकस थमा दिया ।
सुनील पेचकस लेकर कुर्सी पर बैठा-बैठा ऊपर के पेच खोलने लगा ।
पेच बड़ी आसानी से खुल गए ।
“क्या कर रहे हो तुम ?” - कपिल तनिक खीझ-भरे स्वर में बोला ।
“जरा एक मिनट सब्र करो, अभी तुम्हें भी पता लग जाएगा ।” - सुनील बोला ।
सुनील अब नीचे के पेचों तक पेचकस पहुंचाने का प्रयत्न करने लगा ।
अगले ही क्षण एक बड़ी महत्वपूर्ण बात दिन की तरह स्पष्ट हो गई ।
पहियों वाली कुर्सी पर बैठे-बैठे टेलीविजन के पिछले ढक्कन के नीचे के पेच खोल पाना असम्भव था । पेच इतने नीचे पड़ते थे कि उन तक पहुंचता ही नहीं था ।
सुनील सीधा हो गया ।
“कुछ समझ में आया ?”
“क्या ?” - कपिल उलझनपूर्ण स्वर में बोला ।
“शौकत हुसैन ने टेलीविजन के पीछे का ढक्कन कैसे उतारा ? पहियों वाली कुर्सी पर बैठे-बैठे ढक्कन के नीचे के पेच नहीं खोले जा सकते ।”
कपिल हक्का-बक्का-सा उसका मुंह देखता रहा ।
“क... क्यों नहीं खोले जा सकते ?” - वह बोला ।
सुनील कुर्सी से उठ गया और बोला - “तुम खुद कोशिश करके देखो ।”
कपिल कुछ क्षण हिचकिचाया । फिर उसने सुनील के हाथ से पेचकस ले लिया और कुर्सी पर जा बैठा । पहले उसने कुर्सी पर सभी ढंग से बैठकर अपना पेचकस नीचे के पेचों तक पहुंचाने का प्रयत्न किया लेकिन वह असफल रहा ।
फिर वह एकदम सरककर कुर्सी के सिरे पर आ गया ।
“शौकत हुसैन अपाहिज था ।” - सुनील बोला - “उसके कपर के नीचे का भाग एकदम निष्क्रिय था । वह तुम्हारी तरह सरककर कुर्सी के सिरे तक नहीं पहुंच सकता था ।”
“शायद किसी प्रकार पहुंच गया हो ।”
“कैसे पहुंच गया हो ?”
कपिल ने उत्तर नहीं दिया । वह कुर्सी पर अपने शरीर को वांछित स्थिति में लाने का प्रयत्न करता रहा ।
कुर्सी के एकदम सिरे पर पहुंच जाने के बाद ही वह अपने शरीर को इतना झुका पाया कि उसके हाथ में थमा पेचकस नीचे पेचों तक पहुंच गया ।
जब तक यह पेच खोल पाया तब तक वह यूं हांफ रहा था मानो वह मील भर की रेस लगाकर आया हो ।
“एक अपाहिज आदमी इतनी मेहनत नहीं कर सकता ।” - सुनील बोला ।
“लेकिन कुछ तो उसने किया ही होगा ।” - कपिल अपनी सांस नियन्त्रित करता हुआ बोला - “वर्ना ये सब बखेड़ा कैसे हुआ ? किसी-न-किसी तरह तो उसने पिछला ढक्कन खोला ही होगा ।”
“शायद तुम ठीक कह रहे हो ।”
कपिल चुप रहा ।
“स्टोर कहां है ?” - एकाएक सुनील ने पूछा ।
“उस गलियारे में दाईं ओर का दरवाजा स्टोर का है ।” - कपिल एक ओर संकेत करता हुआ बोला ।
“आओ तो जरा ।” - सुनील बोला ।
कपिस कुर्सी से उठ खड़ा हुआ ।
“कुर्सी भी साथ ले आओ ।”
कपिल कुर्सी को पीछे से धकेलता हुआ गलियारे की ओर बढा ।
दोनों स्टोर में आ गए ।
“पेचकस कहां था ?”
“उस बक्से में ।” - कपिल ने ऊपर सैल्फ पर रखे एक लकड़ी के छोटे से बक्से की ओर संकेत कर दिया ।
“जरा कुर्सी पर बैठो तो ।” - सुनील बोला ।
कपिल हिचकिचाता हुआ कुर्सी पर बैठ गया ।
एक कोने में एक छड़ी पड़ी थी । सुनील ने वह छड़ी उठाकर उसके हाथ में दे दी ।
“एक मिनट को तुम स्वयं को शौकत हुसैन की जगह समझो । उस बक्स को तुमने छड़ी के मुड़े हुए भाग से अटकाकर नीचे गिराना है ताकि तुम उसमें से एक पेचकस हासिल कर सको । जरा करो ।”
कपिल ने झिझकते हुए छड़ी को बक्से की ओर बढाया । उसने छड़ी को बक्से में फंसाया और झटका दिया ।
बक्सा भड़ाक से फर्श पर आ गिरा और उसके भीतर का सारा सामान फर्श पर बिखर गया ।
“अब तुम कुर्सी पर बैठे-बैठे बिना अपने शरीर के नीचे के भाग को हरकत में आये एक पेचकस उठाओ ।”
कपिल नीचे झुका । कुर्सी के ऊंचे पहियों के कारण उसका हाथ किसी सूरत में पेचकस तक नहीं पहुंच सका ।
कुर्सी के सिरे पर सरक आने के बाद भी उसका हाथ पेचकस से कम-से-कम तीन इंच दूर था ।
उसके चेहरे पर पसीना आ गया ।
वह एक झटके से कुर्सी से उठ खड़ा हुआ ।
सुनील कुर्सी पर जा बैठा । उसने जमीन से पेचकस उठाने का प्रयत्न किया लेकिन असफल रहा ।
सुनील कुर्सी से उठ खड़ा हुआ ।
उसने एक नया सिगरेट सुलगा लिया ।
“क्या समझे ?” - वह गम्भीर स्वर में बोला ।
कपिल चुप रहा ।
“जरा एक बार फिर बताओ । तुम जब यहां आए थे, उस समय तुमने क्या देखा था ?”
“वही जो मैं पहले बता चुका हूं । शौकत हुसैन की लाश फर्श पर औंधे मुंह पड़ी थी । उसके दाएं हाथ के पास पेचकस पड़ा था । टेलीजिन का पिछला ढक्कन खुला था और उसके भीतर झांकने से मुझे कई जले हुए बल्ब भी दिखाई दे गए थे । मैंने यही समझा कि शौकत हुसैन टेलीविजन से छड़खानी करता हुआ बिजली का धक्का खाकर मर गया है और फिर अपनी कुर्सी से नीचे फर्श पर आ गिरा है ।”
“तुमने उसके मृत शरीर को हाथ लगाया था ?”
“हां मैंने उसकी नब्ज देखी थी ।”
“वह मर चुका था ?”
“हां ।”
“लाश एकदम ठण्डी पड़ चुकी थी ?”
“हां ।”
“तुम यहां साढे छः बजे के आस-पास आए थे ?”
“हां ।”
“और तुम्हारे ख्याल से शौकत हुसैन कितने बजे मरा होगा ?”
“मेरे ख्याल से तो छः और साढे छः के बीच में मरा होगा । टेलीविजन का सायंकालीन प्रोग्राम सवा छः बजे शुरू होता है । उसी समय के आस-पास उसने टेलीविजन को हाथ लगाया होगा ।”
“ऐसी सूरत में तुम्हें उसकी लाश एकदम ठण्डी नहीं मिलनी चाहिए थी ।”
“क्यों ?”
“बिजली का धक्का खाकर मरने वालों के शरीर का टैम्प्रेचर तो बढ जाता था । आधे घन्टे के अन्दर टैम्प्रेचर इतना डाउन कैसे हो सकता है कि लाश छूने पर तुम्हें उसके शरीर में जरा भी हरारत महसूस न हो ?”
“भगवान जाने क्या मामला है । मैं कोई डॉक्टर तो नहीं हूं ।”
“डॉक्टर होने की क्या जरूरत है । यह तो कामन सैंस की बात है ।”
“मेरा अनुमान ही तो है कि वह छः और साढे छः के बीच मरा है । सम्भव है वह काफी पहले मरा हो ।”
“पांच बजे ?”
“सम्भव है ।”
“पांच बजे वह टेलीविजन से छेड़खानी क्यों कर रहा था जबकि सवा छः बजे से पहले प्रोग्राम ही नहीं शुरू होता और खुद उनकी फिल्म साढे छः बजे दिखाई जाने वाली थी ।”
“भगवान जाने क्यों कर रहा था ।”
“अगर कोई कारण रहा भी हो तो उसने टेलीविजन को खोला कैसे ? तुम अभी देख ही चुके हो कि पहियों वाली कुर्सी पर बैठे-बैठे जमीन पर पड़ा पेचकस नहीं उठा सकता है और न ही उसके लिए टेलीविजन के ढक्कन के नीचे के पेच खोल पाना सम्भव है । फिर वह टेलीविजन का कोई नुक्स खुद दूर करने के चक्कर में कैसे मर गया ?”
“मुझे क्या मालूम ?” - कपिल एकाएक झल्लाकर बोला - “यह सब कुछ तुम मुझसे क्यों पूछ रहे हो ?”
“चिल्लाते क्यों हो यार ?” - सुनील हैरान होकर बोला ।
“सारी ।” - कपिल परेशान स्वर में बोला ।
“मैं तो केवल अपनी विचारधारा को शब्द दे रहा हूं, केवल तर्क कर रहा हूं । आखिर तुम भी तो एक पढे-लिखे समझदार इन्सान हो, अपने भेजे में दिमाग रखते हो । वर्तमान स्थिति में क्या तुम्हें शौकत हुसैन का उस ढंग से मर जाना सम्भव लगता है, जैसा कि समझा जा रहा है ?”
कपिल ने उत्तर नहीं दिया ।
“क्यों ?”
कपिल फिर भी चुप रहा ।
“इस सारी गुत्थी का एक ही हल सम्भव है ।”
“क्या ?”
“शौकत हुसैन की हत्या की गई है ।” - सुनील से बम सा छोड़ दिया ।
कपिल कुमार की आंखें फटी रह गई ।
“हां शौकत हुसैन की हत्या की गई है और मैं तुम्हें बता सकता हूं कि हत्या किसने की है ।”
“क... क... किसने... की है ?” - कपिल ने लड़खड़ाते हुए स्वर से पूछा ।
“शौकत हुसैन की बीवी सलमा ने ।”
“यह असम्भव है । सलमा तो उस समय घर पर भी नहीं थी । वह तो पांच बजे के आसपास ही कार लेकर बंगले से बाहर जाती देखी गई थी ।”
“तो फिर क्या हुआ ? उसने हत्या उसी समय की होगी ?”
“लेकिन कैसे ?”
“उसने बिजली के दो नंगे तार सीधे शौकत हुसैन के शरीर छुआ दिये होंगे शौकत हुसैन तत्काल मर गया होगा । फिर उसने उसकी लाश को जमीन पर गिरा दिया होगा । उसके दाएं हाथ के पास एक बिना इन्सूलेशन का पेचकस रख दिया होगा ।”
“लेकिन पेचकस पर तो शौकत हुसैन की ही उंगलियों के निशान थे ?”
“वह क्या कठिन काम है । शौकत हुसैन की हत्या कर चुकने के बाद सलमा ने पेचकस की मूठ पर शौकत हुसैन का दांया हांथ थमा दिया होगा ताकि उस पर शौकत हुसैन की उंगलियों के निशान आ जाएं । फिर उसने टेलीविजन का पिछला ढक्कन खोल डाला होगा और किसी इन्सूलेशन वाले पेचकस की सहायता से टेलीविजन में शार्ट सर्कट कर दिया होगा ताकि कुछ बल्ब जल जाएं और सारी स्थिति यही जाहिर करे कि शौकत हुसैन टेलीविजन से छेड़-छाड़ करता हुआ बिजली का धक्का खा गया ।”
“लेकिन सलमा को क्या जरूरत पड़ी है कि वह शौकत हुसैन की हत्या करे ?”
“जरूरत क्यों नहीं है । उसने अपने अपाहिज पति से छुटकारा मिलता है और साथ ही मिलते हैं उसके जीवन बीमे के एक लाख रुपये । क्या सलमा की स्थिति की औरत के लिए एक हत्या कर देने के लिए काफी तगड़ा उद्देश्य नहीं है । पुलिस की जानकारी में एक बार यह पहलू आने की देर है, वे तो सलमा के जीवन बखिया उधेड़कर रख देंगे । फिर पहले एक्सीडैन्ट की बात भी सामने आएगी जो शौकत हुसैन के बीमा करवाने के केवल दस दिन बाद हो गया था । अगर शौकत हुसैन तब मर जाता तो तभी सलमा को बीमे का एक लाख रुपया मिल जाता । पुलिस को यह सिद्ध करने में कतई भी दिक्कत नहीं होगी कि सलमा शौकत हुसैने से पीछा छुड़ाना चाहती थी ।”
“पहले भी ?”
“हां, पहले भी ।”
“पहले क्यों ?”
“क्योंकि जिस उम्मीद में उसने शौकत हुसैन जैसे अपने से पच्चीस साल बड़े मर्द से शादी की थी उसकी वह उम्मीद पूरी नहीं हो पाई थी । अपने भरसक प्रयत्नों के बावजूद भी शौकत हुसैन उसे हीरोइन नहीं बना पाया था ।”
“तुम्हें सलमा के बारे में इतनी बातें कैसे मालूम हैं ?”
“मैंने पता लगाया है । मैं तो केवल इतनी बातें ही जान पाया हूं । पुलिस तो ऐसी तफ्तीश के लिए बहुत साधन सम्पन्न होती है । वे तो यह भी जान जाएंगे कि सलमा अच्छे चरित्र की औरत नहीं थी और धनलोलुप भी थी । शौकत का कोई आय का साधन तो रहा नहीं था । सलमा खुद लाख कोशिशों के बावजूद भी फिल्मों में रोल प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाई थी । शौकत हुसैन की जमा पूंजी कितने दिन तक चल सकती थी । प्रत्यक्ष था कि धीरे-धीरे वे लोग गरीबी की ओर बढ रहे थे । समला जैसी चमक-दमक पसन्द करने वाली औरत गरीबी से, समझौता नहीं कर सकती । शौकत हुसैन की हत्या के रूप में एक अपाहिज पति से छुटकारा और एक लाख रुपये की बीमे की रकम की प्राप्ति उसके लिए काफी तगड़ा लालच हो सकता है ।”
“लेकिन मुझे विश्वास नहीं होता कि सलमा हत्या कर सकती है ।”
“जिन हालात में हत्या हुई है, उनमें सलमा के अतिरिक्त और कोई हत्यारा हो ही नहीं सकता । इस बात में, सलमा की ही दिलचस्पी हो सकती है कि शौकत हुसैन की हत्या के बाद वातावरण ऐसा बना रहे जिससे यही मालूम हो कि शौकत हुसैन अपनी लापरवाही का शिकार हो गया है ।”
कपिल चुप रहा ।
सुनील ने सिगरेट का आखिरी कश लगाकर उसे फर्श पर फेंक दिया ।
वह स्टोर से बाहर निकल गया ।
कपिल कुर्सी वहीं छोड़कर उसके पीछे हो लिया ।
“अब तुम क्या करोगे ?” - कपिल ने बाहर वाले कमरे में आकर पूछा ।
“क्या मतलब ?”
“मतलब यह कि ये सब बातें तुम पुलिस को बताओगे ?”
“मैं नहीं बताऊंगा लेकिन पुलिस को मालूम हो जायेंगी ।”
“तुम क्यों नहीं बताओगे और तुम्हारे बताये बिना पुलिस को कैसे मालूम हो जाएगी ?”
“मैं ब्लास्ट का रिपोर्टर हूं । कोई पुलिस का कर्मचारी या वालन्टियर नहीं हूं । जो नई बातें मुझे मालूम हुई हैं, वे पहले ब्लास्ट के माध्यम से ही पुलिस उन्हें जान पायेगी ।”
“तुम्हें इस बात की कोई गुंजायश दिखाई नहीं देती कि शायद सलमा ने हत्या न की हो ?”
“चलो मान लो सलमा ने हत्या नहीं कि लेकिन हत्या तो हुई ही है । जैसे पहले सोचा गया था कि शौकत हुसैन टेलीविजन से छेड़छाड़ करता हुआ अपनी लापरवाही से मर गया है, वह बात को असम्भव है ही । अगर ब्लास्ट इस ओर संकेत न भी करे कि हत्या सलमा ने की है तो भी पुलिस जब इसे हत्या का केस मानकर नये सिरे से तफ्तीश शुरू करेगी तो सबसे पहले सन्देह के निशाने पर सलमा ही आएगी । उसके बाद उसके विरुद्ध इतने अधिक तत्व निकल आएंगे कि उसके लिए अपना बचाव करना असम्भव हो जाएगा । पुलिस के सन्देह के दायरे में जब एक आदमी आ जाता है तो पुलिस उससे बहुत कुछ कुबुलवा लेती है । अगर सलमा हत्यारी सिद्ध हो गई तो बीमा कम्पनी भी एक लाख रुपये के भुगतान के दायित्व से मुक्त हो जाएगी ।”
कपिल चुप रहा ।
“तुम्हें मालूम है सलमा आगरा में कहां गई है ?” - सुनील ने पूछा ।
“नहीं ।” - कपिल ने उत्तर दिया ।
“मुझे दुख है इतनी महत्वपूर्ण खबर प्रैस में देने के पहले सलमा का इन्टरव्यू नहीं ले सकता ।”
“ब्लास्ट का तो सायंकाल एडीशन भी छपता है न ?”
“छपता है लेकिन सायंकाल एडीशन अब तक प्रेस में जा चुका होगा । यह समाचार तो कल के पेपर में ही जायेगा ।”
“ओह ।”
“अब मैं तुमसे एक प्रार्थना करना चाहता हूं ।”
“क्या ?”
“इस बारे में तुम कल तक चुप ही रहना । अगर दूसरे अखबार वालों को इस नई बात की भनक पड़ गई तो सारा मजा किरकिरा हो जाएगा । हम चाहते हैं कि इतना बड़ा रहस्योद्घाटन केवल ब्लास्ट में ही छपे । हम अपने पाठकों को और पुलिस को भी सरपराइज देना चाहते हैं ।”
कपिल ने सहमतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
“थैंक्यू ।” - सुनील बोला ।
“कपिल ने उत्तर नहीं दिया ।”
“मैं चला ।” - सुनील बोला ।
“किधर जाओगे ?” - कपिल ने पूछा ।
“बैंक स्ट्रीट । वहां मैं रहता हूं । उस ओर चलना हो तो चलो ?”
“नहीं । मैं तो यह टेलीविजन सैट लेकर अपनी दुकान पर जाऊंगा।”
“ओके ।” - सुनील ने उससे मिलने के लिए हाथ बढा दिया ।
कपिल ने धीरे से हाथ छू कर छोड़ दिया ।
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