सुबह के 9.45 बजे थे।

जगमोहन कार चला रहा था। देवराज चौहान बगल में बैठा था। ये मुम्बई का भीड़-भरा इलाका था। ट्रेफिक में कार रुक-रुक कर आगे बढ़ रही थी कि एकाएक जगमोहन ने कार को सड़क के साथ लगती गली में ले जाकर रोक दिया।

“यहाँ कहाँ?” देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा।

“सुबह छः बजे के निकले हुए हैं। खाया-पिया कुछ मुझे तो बहुत भूख लग रही है।” जगमोहन ने इंजन बंद करते हुए कहा- “बाहर सड़क पर पापा जोंस पीजा शॉप है, वहाँ से पीजा...”

“मैं ले आता हूँ...।” देवराज चौहान दरवाजा खोलते कह उठा- “मैं भी कुछ खाने की सोच रहा था।”

देवराज चौहान कार से निकला और वापस सड़क की तरफ बढ़ गया।

जगमोहन स्टेयरिंग पर उंगलियां थपथपाता इधर-उधर देखने लगा। फिर जेब से मोबाइल निकाला और नम्बर मिला कर फोन कान से लगा लिया। दूसरी तरफ बेल जाने लगी थी।

“हैलो...।” तभी फोन से एक हांफती सी आवाज निकल जगमोहन के कानों में पड़ी।

“लाला जी।” जगमोहन बोला- “जब आपको काम था तो फोन पर फोन करते जा रहे थे और जब काम हो गया तो फोन करना बंद कर दिया। आपने कल पेमेंट देनी थी। वो कल तो निकल गया। भूल गये क्या?”

“ओह जगमोहन।” वो ही आवाज पुनः कान में पड़ी- “भूला नहीं, मैं तो...।”

“व्यस्त हो गये किसी काम में। याद नहीं रहा।” जगमोहन तीखे स्वर में कह उठा।

“ये बात भी नहीं है, तुम्हारे पैसे का ही इन्तजाम कर रहा हूँ। डेढ़ करोड़ मेरी कार में मौजूद है...और बैंक जा रहा हूँ। वहाँ से एक करोड़ निकाल कर, पूरा ढाई करोड़ तुम्हारे हवाले करने के लिए फोन करने की वाला था। मैं रास्ते में हूँ।”

“तो इस वक्त आप बैंक जा रहे हैं?”

“हाँ। दस मिनट में पहुँच जाऊँगा।”

“बताओ बैंक कहाँ है, मैं वहीं आ जाता हूँ।”

“ये तो बोत अच्छी बात है।” उधर से लाला जी ने बैंक का पता बताया- “आ रहे हो ना?”

“वहीं रहना। पहुँच रहा हूँ।” कहकर जगमोहन ने फोन बंद कर दिया।

कुछ देर बाद देवराज चौहान डिब्बों में पीजा पैक करा लाया।

देवराज चौहान के भीतर बैठते ही जगमोहन ने कार स्टार्ट की।

“पीजा तो खा लो...” देवराज चौहान ने कहा।

जगमोहन ने कार आगे बढ़ाते हुए कहा- “अभी लाला से बात हुई, वो हमारे ढाई करोड़ देने के लिए बैंक बुला रहा है। बैंक का पता बताया है उसने।” कहने के साथ जगमोहन ने कार आगे बढ़ा दी- “पीजा तो मैं कार चलाते-चलाते ही खा लूंगा।”

देवराज चौहान ने डिब्बा खोल कर एक पीस जगमोहन को दिया और दूसरा खुद खाने लगा।

जगमोहन कार को गली से निकाल कर सड़क पर ले आया।

कार पुनः ट्रफिक की भीड़ का हिस्सा बन गई।

“लाला को तुमने फोन किया होगा।” पीजा खाते देवराज चौहान बोला

“हाँ। वो पैसा देने में लेट हो गया था।

“लाला शरीफ आदमी है। उसका पैसा कहीं जाने वाला नहीं।” देवराज चौहान ने कहा।

“सब के बारे में ही हम यही सोचेंगे तो कोई हमें पैसा देने को तैयार नहीं होगा। मांगना पड़ता है।” जगमोहन कार चलाने के साथ-साथ पीजा भी खाता जा रहा था- “अब हमने बंगले पर ही जाना है। कोई और काम तो है नहीं...।”

“हरी सिंह के कई फोन आ चुके हैं। एक बार उससे मिल लेना ठीक रहेगा।” देवराज चौहान ने कहा- “उसे फोन कर दो।”

“क्या कहूँ फोन पर हरी सिंह से?”

“उससे शाम की मुलाकात का कोई भी वक्त रख लेना। लेकिन मिलने की जगह तुम ही उसे बताना, उसकी बताई जगह पर हम नहीं जायेंगे।”

“समझ गया। पिज्जा खा लूं, उसके बाद फोन करता हूँ...।” कार आगे बढ़ी जा रही थी।

ट्रेफिक की भीड़ खत्म हो गई थी। ऐसे में कार दौड़ने लगी थी सड़क पर।

“वो बैंक कितनी दूर है, जहाँ लाला ने आना है?” देवराज चौहान ने कहा।

“पाँच-सात मिनट का रास्ता बचा है।”

“हैरानी है कि लाला ढाई करोड़ बैंक से निकाल कर देगा।”

देवराज चौहान ने पिज्जा का दूसरा पीस उठाते हुए कहा।

“वो कहता है कि डेढ़ करोड़ उसके पास है। एक करोड़ ही उसने बैंक से निकालना है।” जगमोहन ने बताया।

☐☐☐

9.50 बजे।

भारत सिंडिकेट बैंक के बाहर पार्किंग में मारुति ओमनी वैन आकर रुकी। चूंकि बैंक खुलने में दस मिनट बाकी थे, इसलिए भीड़ नहीं थी अभी। बैंक की ये ब्राँच सड़क पर ही पड़ती थी। सामने सड़क से गाड़ियां आ-जा रही थीं। सड़क पार मार्किट थी और दुकानें यहीं से नजर आ रही थीं।

वैन चलाने वाला 45 बरस का दूबे था। उसकी बगल में बैठा इन्सान 50 बरस का था। उसके नाम के बारे में गारण्टी से नहीं कहा जा सकता था कि उसका नाम क्या है। वो अपना नाम सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा बताता था। परन्तु दूबे किसी भी कीमत पर मानने को तैयार नहीं था कि वो सब-इंस्पेक्टर मीणा है। खैर, ये तो दोनों की आपस की बात है। अभी आगे बहुत कुछ होने वाला है, और आप लोग भी शायद इसी बात में उलझ कर रह जायें कि वो सब-इंस्पेक्टर मीणा है कि नहीं? चूंकि अपनी कहानी में उस कुछ नाम तो देना ही है, तो फिर क्यों ना हम सब-इंस्पेक्टर मीणा ही कहें उसे! सच क्या है, झूठ क्या है, वो तो वक्त आने पर ही पता चलेगा। दूबे ने गर्दन घुमाकर वैन के पीछे के हिस्से को देखा।

“वहाँ क्या देखता है?”

“सोचता हूँ कि दूबे बोला- “इस वैन में डेढ़ सौ करोड़ आ जायेंगे?”

“आ जायेंगे।”

“ना आये तो?”

“तो बाकी के बाहर फैंक देंगे। दस-बीस करोड़ कम भी हुए तो क्या फर्क पड़ता है!” सब-इंस्पेक्टर मीणा हर तरफ नज़रें मारने लगा। दो-तीन लोग ही बैंक खुलने के इन्तजार में दिखे।

“हम बैंक से डेढ़ सौ करोड़ लूट लेंगे ना गुरू...।” दूबे नर्वस सा कह उठा।

“मुझे परवाह नहीं इस बात की।” मीणा ने तीखे स्वर में कहा।

“परवाह नहीं? ये तुम क्या कह रहे हो? तुम यहाँ डेढ़ सौ करोड़ की डकैती करने आये हो और कहते हो कि...।”

“उससे भी जरूरी काम मुझे ये है कि मैंने दुनिया के सामने अपने आप को साबित करना है कि मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। कोई भी हरामजादा ये मानने को तैयार नहीं है। सावी और कामराज ने ऐसी चाल चली है कि मुझे कुत्ता बनाकर रख दिया। लेकिन मैं भी सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ। सच तक पहुँच कर रहूँगा कि मेरे खिलाफ क्या साजिश...।”

“गुरू, मुझे डेढ़ सौ करोड़ की चिन्ता है। जिसे लूटने हम बैंक

में जाने वाले हैं। तुम्हारे मामले से मुझे कोई मतलब नहीं...।”

“मैंने पहले ही शर्त रखी थी कि मेरा मामला पहले। मेरी प्लानिंग पर काम होगा। तुमने ये माना, उसके बाद ही मैं राजी हुआ हूँ, इस काम के लिए। अभी भी वक्त है, सोच लो। हम यहीं से वापस पलट जाते हैं।”

“बुरी बात क्यों कहता है?” दूबे ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

“तो कान खोलकर सुन ले। काम उसी ढंग से होगा, जो प्लानिंग तुझे बता चुका हूँ।

“ठीक है। परन्तु तुम्हारी प्लानिंग पर मुझे शंका है। तुम साबित करना चाहते हो कि तुम सब इंस्पेक्टर मीणा हो?”

“साबित क्या करना है, वो तो मैं हूँ ही।”

“परन्तु तुम्हारी बात कोई मान नहीं रहा।”

“यही तो मनवाना है।” मीणा ने दाँत भींच कर कहा। दूबे ने गहरी सांस ली, फिर बोला- “तुम ये काम फिर कभी कर सकते हो। इस वक्त डेढ़ सौ

करोड़ के बारे में सोचो, जो कि बैंक से...।”

“मैं यहाँ पैसा लूटने नहीं, बल्कि अपने मकसद से आया हूँ। पैसा तो समझो कि मैं तुम्हारे कहने पर लूलूंगा।” सब-इंस्पेक्टर मीणा ने सख्त स्वर में कहा- “कोई एतराज है तो कहो, मैं...।”

“नहीं, कोई एतराज नहीं। पर तुम मामला खतरनाक की हद  तक लम्बा कर लेना चाहते हो।” दूबे ने उखड़े स्वर में कहा।

“मैं सब सालों को सीधा कर दूंगा। देखता हूँ कैसे नहीं मानते कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ... । सावी और कामराज का हाल, खासतौर से कामराज का हाल मैं बुरा कर दूंगा। वो कमीना मेरी पत्नी के साथ चिपका पड़ा है...।”

दूबे ने गहरी सांस ली।

“कामराज और सावी की सारी साजिश बे-नकाब करके रहूँगा। उसी ने ऐसा कुछ किया है कि कोई ये मानने को ही तैयार नहीं हो रहा कि मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। मान तो तुम भी नहीं रहे-जबकि मैंने कितनी बार तुम्हें कानून से बचाया...।”

“तुम वो सब-इंस्पेक्टर साहब नहीं हो...”

“वो ही हूं मैं।” मीणा दाँत भींच कर बोला- “तू एहसान फरामोश हो गया है।”

“ऐसा मत कह यार, मैं...”

“यार? वो भी वक्त था, जब मेरे सामने तू एक पाँव पर खड़ा रहता...”

“मैं तेरे सामने कभी नहीं खड़ा हुआ। मैं तुझे सिर्फ दो-तीन दिन से जानता...”

“बकवास मत कर!” मीणा ने झल्ला कर कहा- “कोई भी मुझे ये कहने को तैयार नहीं कि मैं मीणा हूँ।”

“क्योंकि तू मीणा नहीं है।

“मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा ही हूँ। तुम देखना, एक घंटे बाद ये बात सारा मुम्बई शहर कहेगा।” मीणा ने कहा और जेब से रिवाल्वर निकाल कर चैक की। चेहरे पर खतरनाक भाव थे- “तेरी रिवाल्वर भरी हुई है?”

“टना-टन।”

मीणा घड़ी पर निगाह मार कर बोला-

“दस बजने वाले हैं।”

“चल बाहर निकलते हैं।” कहकर दूबे ने अपनी तरफ का दरवाजा खोला।

दोनों वैन से बाहर आ गये।

सामने सड़क पर ट्रेफिक दौड़ रहा था। तेज शोर हो रहा था।

“दूबे...”

“हाँ गुरू... ।”

“कुछ ही देर में बैंक पर हमारा कब्जा होगा। जब ये खबर आम होगी तो बाहर के लोगों का क्या हाल होगा...।”

“पता नहीं।” दूबे बेचैनी से बोला- “मैं खुश हो जाऊँगा, अगर तुम सीधे-सीधे बैंक से डेढ़ सौ करोड़ ही लूटो। अपने को सब-इंस्पेक्टर मीणा साबित करने के फेर में बैंक पर कब्जा मत करो।”

“मैं तुझे खुश करने की जरूरत नहीं समझता।”

“यार, हम दोनों साथी हैं...तुम...।”

“ये बात हम में पहले ही तय हो चुकी है कि काम मेरी प्लानिंग से होगा। वैन से बैग उठा लो।”

दूबे ने दरवाजा खोल कर वैन से छोटा सा काला बैग उठाकर कंधे पर लटका लिया। उसके चेहरे पर परेशानी के भाव थे। वो मीणा की योजना से इत्तफाक नहीं रखता था, परन्तु मन मार कर मीणा के साथ था कि डेढ़ सौ करोड़ की रकम का मामला है। अगर कहीं ये उखड़ गया तो फिर कुछ भी नहीं हो सकेगा।

“मैं बन्दर वाली टोपी डालूंगा। उसे आँखों तक कर लूंगा, ताकि कोई मुझे पहचान ना सके।” दूबे ने कहा।

“जो मन में आये कर।” मीणा के चेहरे पर कड़वी मुस्कान फैल गई- “मैं तो चेहरा नहीं छिपाऊँगा। क्योंकि मैंने तो खुद साबित करना है कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ।”

“भाड़ में जा साले!” दूबे बड़बड़ाया- “तू सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं है।”

“क्या कहा?”

“भगवान को याद कर रहा था।”

“तू डर रहा है?”

“नहीं। पर मैं कोई भी काम करने से पहले भगवान को याद करता हूँ।” दूबे कह उठा।

“ये भगवान भी अजीब है। लोगों को मुसीबत में डाल देता है और कहता है मुझे याद करो, मैं तुम्हें मुसीबत से निकालूंगा। परन्तु होता कुछ भी नहीं। मुसीबत में फंसा बंदा और भी गहरे में धंस जाता है।”

दूबे ने मीणा को देखा। लेकिन चुप रहा।

“तुझे मेरी बात पसन्द नहीं आई?”

“मैं आने वाले वक्त के बारे में सोच रहा हूँ। हम बैंक से डेढ़ सौ करोड़ लूटने जा रहे हैं।” दूबे ने गम्भीर स्वर में कहा।

“मैं तो इस बारे में जरा भी चिन्तित नहीं हूँ।” मीणा ने खतरनाक स्वर में कहा- “मुझे तो लगता है कि मैं खेल खेलने जा रहा हूँ।”

“वहम में मत रहो गुरू। ये मौत का खेल भी साबित हो सकता है हमारे लिए।”

जवाब में मीणा दाँत भींच कर रह गया।

“बैंक खुलने जा रहा है। बैंक के कैंची गेट के पास चौकीदार आ गया है।” कहा दूबे ने।

“तू घूँघट ओढ़ ले...”

“घूँघट?” दूबे ने उसे देखा।

“बन्दर वाली टोपी से चेहरा ढक ले। क्योंकि तू नहीं चाहता कि कोई जाने कि तू बैंक लूटने में शामिल है

“मैं जेल में सारी उम्र नहीं बिताना चाहता।” दूबे ने कहा और कंधे पर लटके छोटे से बैग में से गर्म, ऊनी टोपी निकाल कर हाथ में पकड़ी और बैंक के गेट की तरफ देखकर बोला- बैंक खुल रहा है।”

“तैयार हो जा...”

बैंक खुलते पाकर बाहर मौजूद पाँच-छः लोग गेट के पास जा पहुँचे थे।

मीणा और दूबे की आँखें मिलीं। फिर वो दोनों भी उस तरफ बढ़ गये। चेहरा छिपाने के लिए टोपी दूबे के हाथ में थी और वो उसे सिर और चेहरे पर डालने को तैयार था।

देखते ही देखते चौकीदार ने कैंची खोल दिया। बाहर खड़े पाँच छः लोग भीतर प्रवेश करने लगे। उनमें एक औरत थी, जिसने छोटा सा पामेरियन कुत्ता साथ ले रखा था। उसकी गोल्डन जंजीर थाम रखी थी। बाकी पाँच लोगों में लाला, देवराज चौहान और जगमोहन भी थे।

सब भीतर प्रवेश कर गये।

दूबे ने फुर्ती से हाथ में पकड़ी टोपी सिर पर डाली और अगले ही पल चेहरा ढाँप लिया। टोपी उसने नाक तक ले ली थी। अब सिर्फ उसकी आँखें ही दिख रही थीं। तब तक सब-इंस्पेक्टर मीणा भीतर प्रवेश करके, चौकीदार के पेट से रिवाल्वर लगा चुका था।

चौकीदार हक्का-बक्का रह गया।

दूबे ने रिवाल्वर थामें भीतर प्रवेश किया।

“य...ये क्या कर रहे हो?” चौकीदार घबराया सा कह उठा।

“तू इसको बता, हम क्या कर रहे हैं!” मीणा ने दूबे से कहा

और उसके कंधे पर लटका छोटा सा काला बैग ले लिया।

दूबे ने चौकीदार की दो-नाली लेकर एक तरफ दीवार के पास रख दी।

चौकीदार डरा सा दूबे को देख रहा था। दूबे सही मायनों में डकैत लग रहा था। छिपा चेहरा। झलकती आँखें। तब तक मीणा रिवाल्वर और बैग थामें आगे बढ़ गया था।

कईयों ने ये नजारा देख लिया था।

कुत्ते वाली औरत के होंठों से चीख निकल गई थी।

“चुप रहो!” मीणा ऊँचे स्वर में बोला- “हम बैंक लूटने आये हैं। किसी की जान नहीं लेंगे। हमें मजबूर मत करना गोली चलाने के लिए। जैसा हम कहते हैं, वैसा ही करो।”

तब तक दूबे ने चौकीदार से कह कर बैंक का गेट बंद करवा

दिया था। वहाँ ताला लगा दिया गया।

दूबे ने उससे चाबी लेकर अपनी जेब में डाली और कहा- “अपनी बन्दूक से गोलियाँ निकाल कर मुझे दो।”

“वो...वो खाली है।” चौकीदार के होंठों से निकला।

“खाली है?”

“हाँ...”

“खोल के दिखा।”

चौकीदार ने आगे बढ़कर बन्दूक उठाई और जल्दी से खोल कर उसे दिखाई

वो सच में खाली थी।

“ये खाली क्यों है?”

“गोलियां नहीं हैं। ऊपर लिख भेजा हुआ है मैनेजर साहब ने...। लेकिन अभी तक गोलियाँ नहीं आईं।”

“कब से खाली है बन्दूक...?”

“पन्द्रह दिन हो गये।”

“भाड़ में जाओ! बैंक के गार्ड हो और बन्दूक खाली रखते हो?” दूबे ने कहा और पलट कर बैंक में नजर मारी।

बैंक में सन्नाटा छा चुका था।

मीणा काले बैग से स्प्रे की एक शीशी निकाल कर वहाँ लगे सी.सी. टी.वी. कैमरों पर स्प्रे कर रहा था। वो स्प्रे दूबे ने सफेद पेंट से तैयार की थी। एक बार लैंस पर स्प्रे हो जाने के बाद सी.सी.टी.वी. कैमरे कोई तस्वीर रिकार्ड नहीं कर सकते थे। दूसरे हाथ में मीणा ने रिवाल्वर थाम रखी थी।

जगमोहन ने अजीब से स्वर में देवराज चौहान से कहा- “ये क्या हो रहा है?”

“बैंक को लूटने आये हैं।”

“मतलब कि डकैती?”

“कुछ भी समझ लो।”

“भला इन्हें इस बैंक में से क्या मिलेगा?” जगमोहन बोला।

“दो-तीन करोड़ तो मिल जायेंगे। इनके लिए बहुत होंगे।”

देवराज चौहान ने कहा।

“ये सिफ दो ही हैं। शायद इनके बाकी साथी बाहर हों।”

देवराज चौहान की निगाह मीणा और दूबे पर जा रही थी।

“हमें क्या करना चाहिये...?” पूछा जगमोहन ने।

“हमने कुछ भी नहीं करना है। जैसे बाकी लोग हैं, वैसे ही हम हैं।” देवराज चौहान बोला।

“हमारे पास रिवाल्वरें हैं, सालों को...।”

देवराज चौहान ने जगमोहन को घूरा।

जगमोहन सकपका कर चुप हो गया।

“कोई हमारी डकैती को खराब करने की कोशिश करे तो हमें कैसा लगेगा?” देवराज चौहान बोला।

“बुरा। बहुत बुरा...।”

“हम इतने भी शरीफ नहीं हैं कि हमारे सामने कोई डकैती कर रहा हो तो हम उसे पकड़ लें। क्यों पकड़ें? हम भी तो डकैती करते हैं। डकैतियों से हमने बे-पनाह दौलत इकट्ठी कर रखी है। अगर हमारे सामने कोई और डकैती करता है तो हमें उससे चिढ़ नहीं होनी चाहिये। कोई और गलत काम हो रहा हो तो हम उसे रोकने की कोशिश भी करें। डकैती जैसे काम को हम नहीं रोकेंगे मतलब ही नहीं बनता हमारा। फिर बैंक का पैसा तो वैसे भी इंश्योर्ड होता है।”

“तुम ठीक कहते हो।” जगमोहन मुस्करा पड़ा।

“ये इनकी मेहनत है, ये अगर सफल होते हैं तो होने दो।”

कहने के साथ ही देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई।

तभी मीणा की निगाह देवराज चौहान पर पड़ी तो वो उसी पल कह उठा- “ऐ, तुम बैंक में सिग्रेट पी रहे हो? जानते नहीं कि बैंक में सिग्रेट पीना मना है?”

“इस वक्त बैंक तुम्हारे कब्जे में है।” देवराज चौहान ने कहा

“तो?”

“ऐसे में तुम्हें कोई एतराज नहीं होगा, अगर मैं सिग्रेट पिऊँ...”

“तुम्हें मुझसे डर नहीं लग रहा?” मीणा ने मुँह बनाया।

“नहीं। क्योंकि मैं तुम्हारे खिलाफ कुछ नहीं कर रहा। सिर्फ सिग्रेट ही पी रहा हूँ। तुम अगर चाहो तो मैं किसी भी काम में तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ।” देवराज चौहान ने मुस्करा कर कहा।

“तुम किसी काम के नहीं हो बच्चे। ये बैंक डकैती है। तुम भला मेरी क्या सहायता करोगे?” मीणा ने कहा और बैंक में नजरें दौड़ाईं। हर कोई उसे और दूबे को देख रहा था।

दूबे रिवाल्वर थामे एक तरफ खड़ा था।

मीणा ने महसूस किया कि अभी बैंक के स्टॉफ में बहुत कम लोग हैं।

“मैनेजर कहां है?” मीणा ने ऊंचे स्वर में कहो।

डर से भरा सन्नाटा छाया रहा।

“सुना नहीं, मैंने मैनेजर को बुलाया है। इस बैंक का मैनेजर किधर है?” मीणा ने पुनः कहा।

सत्तावन-अठावन साल का एक व्यक्ति बैंक के काऊंटर के पीछे से निकल कर मीणा के पास आ पहुँचा। वो घबराया सा लग रहा था। चेहरे पर परेशानी नाच रही थी।

“तुम हो मैनेजर?” मीणा ने उसे घूरा

“ह...हाँ...”

“तो घबरा क्यों रहा है?”

वो सूखे होंठों पर जीभ फेर कर चुप रहा।

“नाम बता अपना...।”

“बसन्त गुप्ता...।”

“तो गुप्ता है तू... । हूँ, तेरे को पता है कि हम इस बैंक में डकैती करने आये हैं।”

बसन्त गुप्ता ने सिर हिलाया।

“तो तेरा क्या फर्ज बनता है ऐसे मौके पर? बैंक में अलार्म स्विच है कि नहीं?”

“ह...है...”

“बजाया तूने अलार्म?”

“न...नहीं...।”

“तेरे को पता नहीं कि किस मौके पर क्या करना है? पुलिस तेरे को बीसियों बार समझा के गई होगी कि ऐसे किसी मौके पर तूने कैसे अलार्म बजाना है। मौके पर तुम लोग सब कुछ भूल जाते हो। चल, बजा अलार्म...।”

“क्या?” बसन्त गुप्ता के होंठों से सिटपिटाया स्वर निकला।

“अलार्म बजा।” मीणा कह उठा- “बैंक में डकैती पड़ रही है तो अलार्म बजाना तेरा काम है। मेरा नहीं...।”

मैनेजर बसन्त गुप्ता बौखलाया सा खड़ा, उसे देखता रहा।

“सुना नहीं तूने गुप्ते...”

“अ...अलार्म बजाऊँ...।”

“ढोल पीटू क्या? एक बार में सुन लिया कर।” मीणा इस वक्त हर तनाव से मुक्त नजर आ रहा था।

“बजाऊँ?” बसन्त गुप्ता की समझ में अभी भी आ रहा था।

“लिख कर दूँ क्या? अलार्म कहाँ बजता है, पुलिस स्टेशन में ना?”

“न...हीं। बैंक में लगा है, तेज आवाज के साथ पाँच मिनट बजता रहेगा।”

“जा, बजा के वापस आ... ।”

मैनेजर बसन्त गुप्ता अजीब सी स्थिति में फंसा, पलट कर चल दिया। वो समझ नहीं पा रहा था कि जो लोग बैंक लूटने आये हैं, वो ही खतरे का अलार्म बजाने को क्यों कह रहे हैं। मैनेजर के जाते ही दूबे चेहरा ढांपे पास पहुँचा और आहिस्ता से, बेचैनी से कह उठा- “गुरू, सोच लो! अभी भी वक्त है। सब कुछ अपने कब्जे में है। इस वक्त बैंक में डेढ़ सौ करोड़ की रकम पड़ी है। अलार्म बजने के बाद यहाँ पुलिस आ जायेगी। मैनेजर को रोको, और हम पैसा लेकर निकल चलते हैं।”

“चुप रह। मुझे काम करने दे।” मीणा धीमे स्वर में बोला।

“अलार्म बजते ही हम फंस जायेंगे...।”

“मैंने ये साबित करना है कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ। देखता हूँ कि अब वो कैसे नहीं मानते। साला कोई भी मेरी बात को सच नहीं मान रहा। हैरानी है कि हर कोई मुझे पहचानने से इन्कार क्यों कर रहा है?”

दूबे मन ही मन खीज उठा। बोला- “पैसा लेकर भाग लो। ये बात तुम फिर कभी साबित...।”

“मैं इसी बात के लिए, तेरे काम में शामिल हुआ हूँ। पैसे की परवाह नहीं है मुझे।”

“तुम जो भी हो, अपने को साबित करके क्या साबित करना चाहते हो? भाड़ में गया सब-इंस्पेक्टर मीणा। यहाँ से पैसा लूटने के बाद तुम राजे-महाराजाओं की तरह जिन्दगी... ।”

“मैंने सावी और कामराज को सबक सिखाना है। मैं उनकी साजिश कामयाब नहीं होने दूंगा। उन दोनों ने साजिश रचकर, मुझे मेरी ही जिन्दगी से बाहर निकाल फेंका। हालात ये हैं कि मुझे अपने को ही साबित करने के लिय इतना बड़ा कदम उठाना पड़ा। वरना मैं तुम्हारे साथ काम करने को कभी भी तैयार नहीं होता।”

“लगता है, तुम्हें मैं नहीं समझा सकता।” दूबे ने हार मानने वाले अन्दाज में कहा।

“मुझे समझाना ही नहीं चाहिये।”

“मुझे डेढ़ सौ करोड़ की चिन्ता है। इसके अलावा मुझे और कोई चिन्ता नहीं है।”

“और मुझे अपने को साबित करने की चिन्ता है। हम दोनों के मकसद अलग-अलग हैं, परन्तु बाद में हम दोनों की मंजिल एक ही हो जायेगी। चिन्ता मत कर। बाद में हम पैसा ले जाने में कामयाब हो जायेंगे।”

“विश्वास नहीं होता...”

“मुझ पर तुझे भरोसा है ना?” मीणा बोला।

दूबे ने मीणा को देखा, फिर बोला- “तू बहुत उल्टे ढंग से काम कर रहा है...।”

मीणा मुस्करा पड़ा।

“तूने पहले कभी डकैती की है?” दूबे ने पूछा।

“पुलिस वालों से तू क्या अपेक्षा करता है कि वर्दी पहन कर वो डकैती करेगा?” मीणा बोला।

“तू पुलिस वाला नहीं, तू कोई शातिर है। तूने तो मेरा दिमाग भी घुमा रखा है।” दूबे ने बेचैनी से कहा।

“बच्चा है अभी तू...”

“ये बता कि तूने कौन सा बड़ा काम किया है?”

“बड़ा काम?” मीणा के चेहरे पर कड़े भाव उभरे।

“हाँ...”

“ये मेरा पहला और आखिरी काम है कि रिवाल्वर पकड़ कर इस तरह बैंक में घुस आना।”

“तू मुझसे अपनी असलियत छिपा रहा है। सच क्यों नहीं बता देता?”

“सच ही कहा है। मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।”

“बकवास मत कर। सब-इंस्पेक्टर साहब को मैं अच्छी तरह जानता था, वो तुम नहीं हो।”

“जानता था? मैं तेरे सामने जिन्दा खड़ा...”

“15-17 दिन पहले वो मर चुके हैं। तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो ही नहीं सकते।”

“मैं लम्बा-चौड़ा तेरे सामने जिन्दा खड़ा हूँ, और तू मुझे मरा कह रहा...”

“ये साला यूँ ही बकवास करता रहेगा।” दूबे बड़बड़ाया और उसके पास से हट गया

रिवाल्वर थामे मीणा की निगाह बैंक में फिरने लगी।

देवराज चौहान के होंठ सिकुड़े हुए थे। नजरें मीणा और दूबे पर थीं।

“ये पागल लोग लगते हैं।” जगमोहन ने धीमे से देवराज चौहान से कहा।

देवराज चौहान चुप रहा।

“बैंक लूटने आये हैं और खुद ही कह रहे हैं कि अलार्म बजाओ।” जगमोहन पुनः बोला।

“कोई तो बात है जो ये ऐसा कह रहे हैं।” देवराज चौहान ने कहा।

“बात कुछ भी हो, लेकिन ये तो पैसा लूटने आये हैं। फिर अलार्म बजाने को क्यों कह रहे हैं?”

“इसके पीछे कोई तो खास वजह होगी।”

“मुझे तो हंसी आ रही है इन डकैतों की बातों पर।” जगमोहन का स्वर कड़वा हो गया।

देवराज चौहान की निगाह मीणा और दूबे पर बारी-बारी जा रही थी।

तभी पास खड़ा लाला कह उठा- “जगमोहन, ये क्या हो गया? मैं तो यहाँ एक करोड़ निकलवाने आया...।”

“आराम से रह लाला। इन लोगों का खेल ज्यादा नहीं चलने वाला।” जगमोहन कह उठा।

ठीक इसी पल अलार्म चीख उठा।

बहुत तीखी और तेज आवाज थी अलार्म की।

मीणा के चेहरे पर मुस्कान आ गई अलार्म बजते ही। जबकि दूबे की नजर आती आँखों में व्याकुलता उछालें मारने लगी थी, अलार्म की तीखी आवाज कानों के पर्दे फाड़ रही थी। ये आवाज बैंक के बाहर निकलकर दूर-दूर तक लोगों को सुनाई दे रही होगी। खतरे के अलार्म पर पुलिस ने तुरन्त आ जाना था। अलार्म की आवाज पर औरत का पामेरियन कुत्ता भौंकने लगा।

“इसे चुप कराओ।” मीणा ने ऊँची आवाज में औरत से कहा।

“वो अलार्म की आवाज सुनकर चौंक रहा है। अभी चुप हो जायेगा।” औरत बोली।

“तुम्हें बैंक में कुत्ता नहीं लाना चाहिये था।”

“तुम बैंक लूटने आ गये और मुझे कुत्ता लाने को मना कर रहे हो? नसीयत मत दो मुझे।” औरत कह उठी।

“तुम अपने पति से भी ऐसे ही बोलती हो?” मीणा ने उसे घूरा।

“कम से कम तुम तो मेरे पति नहीं हो।”

मीणा ने गहरी सांस लेकर मुँह फेर लिया।

तभी मैनेजर बसन्त गुप्ता इधर आता दिखा।

मीणा उसे देखता रहा। पास आकर वो हड़बड़ाये स्वर में कह उठा- “तु... मने जैसा कहा था, मैंने वैसा ही किया। अलार्म बजा दिया।”

अलार्म तेज आवाज में, चीखे जा रहा था।

“मेरी बात मानोगे तो तुम सब सुरक्षित रहोगे।” गुप्ता ने सिर हिला दिया।

“ये बंद कब होगा अलार्म?”

“पाँच मिनट बाद...”

“हूँ। पुलिस स्टेशन एक किलोमीटर दूर है यहाँ से...!” मीणा बोला।

“ह... हाँ...।” गुप्ता ने सिर हिलाया।

मीणा ने दूबे को देखा

दूबे हाथ में रिवाल्वर थामे, चेहरा ढांपे उसे देख रहा था। मीणा मुस्कराया।

दूबे ने दूसरी तरफ मुँह फेर लिया। वो उसे मन ही मन ढेरों गालियाँ दे रहा था।

“तुम मुझे क्या देख रहे हो?” मीणा, बजते अलार्म के बीच ऊँचे स्वर में कह उठा।

“मैं...मैं समझ नहीं पा रहा कि तुम क्या करना चाहते हो?’

“मैं पैसा लूटने आया हूँ। पता चला कि आज तुम्हारे बैंक में 150 करोड़ की बड़ी रकम मौजूद है और सासाराम एंड संस कम्पनी के लोग आने वाले हैं, वो डेढ़ सौ करोड़ ले जाने के लिए।” मीणा ने कहा।

बसन्त गुप्ता घबरा कर चुप कर गया।

“चुप रहने से काम नहीं चलेगा। मैं जानता हूं कि मैंने सही कहा है, बोलो...”

“ह... हाँ...तुमने ठीक कहा।”

“वो डेढ़ सौ करोड़ हम ले जायेंगे।” मीणा मुसकराया।

बसन्त गुप्ता हिचका फिर हिम्मत करके कह उठा- “एक बात मुझे समझ नहीं आई...।”

“पूछ।”

“तुम लोग बैंक लूटने आये हो?”

“हाँ...तो...?”

“त...तो अलार्म क्यों बजवाया?”

“ताकि पुलिस आ जाये। सबको पता चल जाये कि मैं बैंक लूट रहा हूँ...।”

बसन्त गुप्ता कुछ कहना चाहकर भी, चुप ही रहा।

“तुम्हें लग रहा होगा कि मैं पागल हूँ...।”

बसन्त गुप्ता ने फौरन सहमति से सिर हिला दिया।

जवाब में मीणा मुस्करा कर रह गया। फिर उसकी निगाह बैंक काउंटर के पीछे जा टिकी। वहाँ पाँच महिलाएं और चार आदमी डरे से, सब एक साथ ही खड़े थे।

“तुम्हारे बैंक का स्टाफ इतना कम क्यों है?” मीणा ने पूछा।

“बाकी का स्टॉफ आ चुका होगा। वो लोग बाहर होंगे।” मैनेजर बसन्त गुप्ता ने कहा।

“सब इतनी देरी से आते हैं?”

“नहीं। आज ही उन्हें देर हुई। रात स्टॉफ के एक आदमी के बेटे की शादी थी। पूरा स्टॉफ शादी में था। इसलिये उन्हें आने में कुछ देर हो गई। बैंक स्टॉफ के पचास लोग हैं।” गुप्ता ने बेचैनी से कहा।

“मेरे लिए अच्छा ही है कि यहाँ कम लोग हैं। उन्हें संभालने की सिरदर्दी नहीं होगी।”

अलार्म तेजी से चीखे जा रहा था।

“एक बात कहूँ...।” मैनेजर गुप्ता ने धीमे से कहा।

“दो कह...” मीणा ने मुस्करा कर ऊँचे स्वर में कहा।

“अलार्म बज गया है। अब तुम लोग यहां से बच कर नहीं जा सकते।’ गुप्ता बोला।

“हम निकल जायेंगे।”

“पुलिस आती ही होगी...”

“उसी के आने का इन्तजार है।”

“मैं समझा नहीं...।”

“तुम वो ही समझो, जो तुमसे कहूँ। हर बात को समझने की कोशिश मत करो।”

मैनेजर गुप्ता ने शराफत से सिर हिला दिया।

पाँच मिनट पूरे हो गये

अलार्म बजना बंद हो गया, परन्तु कानों में जैसे अब भी अलार्म की आवाज गूंज रही थी। अलार्म के बंद होने पर बैंक के फोनों की घंटियां बजती सुनाई देने लगीं।

“मैनेजर!” मीणा ने कहा- “बैंक के फोन बज रहे हैं। ये पुलिस के ही फोन होंगे। वो पूछना चाहते होंगे कि अलार्म क्यों बजा। उन्हें बता दो कि बैंक में डकैती हो रही है। हथियारबंद डकैतों ने बैंक पर कब्जा कर लिया है।”

मैनेजर बसन्त गुप्ता ने अजीब सी निगाहों से मीणा को देखा।

“अब क्या है?” मीणा ने मुँह बनाया।

“बता दूँ उन्हें?” गुप्ता के होंठों से निकला।

“हाँ, सब कुछ बता दो। तुम्हें पूरी छूट है कि उन्हें जो भी बताना चाहते हो, बता दो।”

मैनेजर गुप्ता तुरन्त बजते फोन की तरफ बढ़ गया।

तभी कुत्ते वाली औरत झल्ला कर कह उठी- “आखिर ये सब कब तक चलेगा?”

“क्यों पूछ रही हो?” मीणा ने उसे देखा।

“मैंने ब्यूटीशियन से टाईम ले रखा है। चार दिन इन्तजार के बाद आज का टाईम दिया है उसने। फुल बॉडी ट्रीटमेंट का मैंने साढ़े तीन हजार का पैकेज लिया है। पैसे निकलवाने बैंक आई थी। वो मेरा इन्तजार कर रही होगी।”

“तुम्हें पैकेज लेने की क्या जरूरत है, तुम तो यूँ ही खूबसूरत हो।” मीणा कह उठा।

“कोई वजह है कि मैं और भी खूबसूरत दिखना चाहती हूँ। तुम अपना काम जल्दी खत्म करो कि मैं जा सकूँ।”

“मुझे वक्त लगेगा।”

“तो मुझे यहाँ से जाने दो। नहीं तो वो फिर हफ्ते बाद का वक्त देगी। नकचढ़ी है वो...।”

“चिन्ता मत करो, उसे मैं यहीं बुलवा दूंगा तुम्हारे लिए...।”

“मजाक कर रहे हो?”

“जुबान बंद रखो।”

जगमोहन ने धीमे स्वर में देवराज चौहान से कहा- “बैंक मैनेजर फोन पर बातें कर रहा है और बैंक लूटने वालों को इसकी जरा भी परवाह नहीं।”

“मैं देख रहा था उन्हें। उसी ने मैनेजर को बात करने भेजा है।” देवराज चौहान बोला।

“मुझे समझ नहीं आ रहा कि आखिर ये क्या हो रहा है। बैंक क्या इस तरह लूटे जाते हैं? खुद ही कहकर मैनेजर से खतरे का अलार्म बजवा दिया। फिर मैनेजर को फोन पर बातें करने भेज दिया। पैसों की तो इन लोगों ने कोई बात नहीं की। आखिर ये लोग चाहते क्या हैं?” जगमोहन ने उलझे स्वर में कहा।

“कोई बात तो है। ये लोग कुछ करना चाहते हैं।”

“क्या?”

“मैं नहीं समझ पा रहा हूँ। लेकिन इनका उद्देश्य खतरनाक हो सकता है। ये चाहते हैं कि बाहर पुलिस आ जाये।”

“क्या पता ये बैंक ना लूटना चाहते हों?”

“बैंक में ऐसी स्थिति बनाकर, कौन नहीं चाहेगा कि जाते वक्त नोट भी साथ जे जाये?” देवराज चौहान ने मीणा और दूबे को देखते हुए कहा- “इन्तजार करो। जल्दी ही नई बात सामने आयेगी।”

रिसीवर वापस रखकर मैनेजर बसन्त गुप्ता वापस मीणा के पास आया।

“हाँ, क्या बात हुई, कौन था?” मीणा ने पूछा।

“पुलिस थी, वो पूछ रहे थे कि सायरन क्यों बजा? मैंने उन्हें बता दिया कि बैंक में लूट हो रही है।”

“अच्छा किया।” मीणा ने तसल्ली भरे अन्दाज में सिर हिलाया- “और क्या पूछा उन्होंने?”

“पूछा कि डकैत कितने हैं, क्या कोई उन्हें पहचानता है, मैंने कहा, नहीं। मैंने उन्हें बता दिया कि डकैत दो हैं और स्ट्रांग रूम में रखा 150 करोड़ लूटना चाहते हैं। पुलिस ने कहा कि हम दस मिनट में ही वहाँ पहुँच रहे हैं। तब तक हम डकैतों को किसी तरह रोके तो मैंने बता दिया कि अभी उन्होंने रुपये नहीं समेटे। निकलने में वक्त लगेगा।”

“तुम समझदार हो।”

“वो पूछ रहे थे कि उनके पास क्या हथियार हैं तो मैंने कहा दोनों के पास रिवाल्वरें हैं और अभी तक उन्होंने किसी को नहीं मारा। एक ने चेहरा गर्म-ऊनी टोपी में छिपा रखा है। मुझे फोन पर बात करने की पूरी इजाजत है कि मैं किसी से भी कोई भी बात कर सकता हूँ। मैंने उन्हें बताया कि तुम लोग दोस्तों की तरह पेश आ रहे हो...।”

“उल्लू के पट्टे हैं सब...।”

“क्या...क्या मतलब?” गुप्ता घबरा कर बोला।

“तुमसे नहीं कह रहा। पुलिस वालों से कह रहा हूँ।” कहने के साथ ही मीणा वहाँ से हिला और बैंक काउन्टर के पीछे पड़ी टेबल पर जा चढ़ा और ऊँची आवाज में बोला- “तुम सब मेरी बात ध्यान से सुनो। सुन रहे हो क्या?”

कईयों की गर्दनें हिलीं।

देवराज चौहान और जगमोहन की निगाह मीणा पर ही थी।

“तुम लोगों को मुझसे घबराने की जरूरत नहीं है। मैं बुरा आदमी नहीं हूँ। मैं पुलिस वाला हूँ...।”

“पुलिस वाला?”

“ये तो पुलिस वाला है...”

“मैं नहीं मानता...। ये खतरनाक डकैत है।”

कई लोगों के स्वर उभरने लगे।

“खामोश हो जाओ। मेरी बात सुनो।” मीणा ने ऊँचे स्वर में कहा।

आवाजें थमने लगीं।

“मैंने सच कहा है कि मैं पुलिस वाला हूँ। सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ मैं...।”

“पुलिस वाले क्या ऐसे होते हैं?”

“ये मेरी अपनी समस्या है कि ऐसा बनना पड़ा मुझे। मेरे खिलाफ मेरे ए.सी.पी. ने ऐसी साजिश रची कि अब कोई भी ये मानने को तैयार नहीं कि मैं इन्दर प्रकाश मीणा, पुलिस वाला हूँ। यहाँ तक कि मेरी पत्नी भी नहीं मान रही, बल्कि वो तो मुझे पहचानने से ही इन्कार कर रही है। ये ही हाल मेरे पड़ोसियों का है और अन्य मिलने वालों का है। लगता है उस साजिश ने मेरा अस्तित्व ही गुम कर दिया है। मेरी ये लड़ाई अपने ही अस्तित्व को वापस पाने की है।”

“तुम्हारी बातें यकीन करने लायक नहीं हैं।” एक बैंक कर्मचारी औरत ने कहा।

“मैं सच कह रहा हूँ। ए.सी.पी. ने मेरी बीवी को फंसा लिया है। वो पागल सी होकर, उस पर फिदा है। मेरे बैंक का एकाऊँट भी वो इसी साजिश के तहत अपने नाम करा रही है...और कोई भी मेरी बात नहीं सुन रहा। मेरी बात को सब सुनें और गम्भीरता से लें, इसी कारण मैंने बैंक पर कब्जा किया है।”

“तो तुम बैंक लूटने नहीं आये?”

“क्यों नहीं लूटूँगा?” मीणा ने दूर रिवाल्वर लिए दूबे पर निगाह मारी- “मेरे साथी को पैसे की जरूरत है। इसीलिये मैं जाते वक्त बैंक का पैसा भी ले जाऊँगा।”

“तुम झूठे हो।” बैंक की दूसरी महिला कर्मचारी ने कहा- “तुम पैसा ही लूटने आये हो। तुम पुलिस वाले नहीं हो सकते। सब कुछ तुमने झूठ कहा है।”

“अगर मैं पैसा ही लूटने आया होता तो बैंक का अलार्म बजाने को क्यों कहता?”

“ये तुम जानो कि...।”

“चुप रहो।” मीणा का स्वर कठोर हो गया- “ये मत भूलो कि मैं तुम्हें गोली मार सकता हूँ।”

वो चुप हो गई।

“डरो मत।” मीणा ने अपने गुस्से पर काबू पाया- “मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है। मैं तुम लोगों की ही तरह शरीफ आदमी हूँ। किसी को दुःख तकलीफ देना मेरा काम नहीं है। ये जो भी हो रहा है, सब कुछ मैं मजबूरी में कर रहा हूँ... कि अपने खिलाफ होने वाली साजिश का हर तिनका बिखेर दूं।”

सबकी निगाह मीणा पर थी।

“मैं तुम सब से सहयोग की आशा रखता हूँ। मैं मुसीबत में फंसा, बरबाद हुआ पड़ा इन्सान हूँ। आप सब को मुझसे सहानुभूति होनी चाहिये। ये लड़ाई लड़कर मैं अपना अस्तित्व वापस पाना चाहता हूँ।”

“तुमने गलत रास्ता अपनाया है। तुम्हें इस तरह बैंक को कब्जे में नहीं...”

“मैं जानता हूँ कि मैंने जो किया है, ठीक किया है। मुझे किसी की सलाह की जरूरत नहीं है। मैं सिर्फ आपसे सहयोग की आशा रखता हूँ। कम से कम इतना तो सहयोग कर ही सकते हैं कि आप सब शांत रहें।”

सब चुप रहे।

“मैं फिर कहता हूँ कि मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा पुलिस वाला हूँ। तुम लोग मुझे मजबूर नहीं करोगे तो मैं किसी के साथ भी सख्ती नहीं करूँगा। सब का दोस्त बनकर रहूँगा।”

“तुम रिवाल्वर जेब में क्यों नहीं रख लेते?”

“इसका हाथ में ही रहना ठीक है। ताकि तुम लोगों को पता रहे कि मैं गोली भी मार सकता हूँ। मैं नहीं चाहता कि मैं तुम में से कोई हीरो बनने की कोशिश करे। मुझे पकड़ने की कोशिश करे और मारा जाये। ये रिवाल्वर तुम लोगों को इस बात का अहसास दिलाती रहेगी कि तुम सबने शांत रहना है और मुझे सहयोग करना है।” इतना कह कर मीणा छलांग मार कर टेबल से नीचे उतरा और दूबे की तरफ बढ़ गया। सन्नाट छाया था वहाँ

दूबे रिवाल्वर थामें अपनी जगह सतर्क खड़ा था।

“सब ठीक चल रहा है ना दूबे...।”

“भाड़ में जाओ! तुमने अलार्म बजवा कर सारी मेहनत मिट्टी में मिला दी।” दूबे धीमे स्वर में भड़का।

“यही तो हमारी प्लानिंग थी...।”

“हमारी नहीं, तुम्हारी प्लानिंग थी। अब हमारा यहाँ से बच निकलना सम्भव नहीं हो पायेगा।”

“तुम मेरी प्लानिंग जानते थे ना?”

“हाँ।

“फिर अब क्यों रो रहे हो। मेरे हिसाब से सब ठीक चल रहा है।”

“ये तुम्हारा सब-इंस्पेक्टर मीणा वाला किस्सा, अब हमें ले डूबेगा।” दूबे ने दाँत भींच कर कहा।

“बकवास मत करो। ये किस्सा नहीं हकीकत है। मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा ही हूँ....।”

“बहुत गुरू आदमी है तू। तभी तो मेरे साथ काम करने की इच्छा जागी थी।” एकाएक दूबे मुस्करा पड़ा।

“अब तो तेरी इच्छा पूरी हो गई।”

“परन्तु मेरे ढंग से नहीं हुई। बाहर पुलिस आ रही होगी। मैनेजर किससे बात कर रहा था?”

“पुलिस से। बाहर पुलिस पहुँचने वाली होगी।”

“पता नहीं अब क्या होगा...।”

“मेरे पे भरोसा रख। सब ठीक रहेगा।” मीणा ने विश्वास भरे स्वर में कहा।

“तू तो दौलत के साथ निकल जायेगा, बाद में मुझे भी तो निकलना है...मैं...।”

“आदमी तैयार कर आया है ना तू?”

“हाँ।”

“कितने?”

“पन्द्रह। जब मैं उन्हें फोन करूँगा तो वो यहाँ आकर बाहर मौजूद पुलिस पर हमला करेंगे।”

“ठीक है। अब तू उसी भगदड़ में निकल जाना। क्या उन आदमियों को पता है कि तू क्या कर रहा है?”

“नहीं। मैंने उन्हें नोट देकर समझा दिया था कि फोन करके उन्हें जगह बताऊँगा कि उन्होंने कहाँ पर हमला करना है।”

“सब ठीक है, फिर तू घबराता क्यों है? अब मैं पुलिस वालों का दिमाग सीधा कर दूंगा। ए.सी.पी. कामराज की तो बुरी हालत कर दूंगा। ये बात शायद कोई नहीं जानता होगा कि वो मेरी बीवी से चिपका हुआ है। अब ये बात मैं सबको बताऊँगा तो डिपार्टमेंट को जवाब देते ना बन पायेगा कामराज से।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा- “नंगा कर दूंगा उसे।”

“तेरी इन बातों से मुझे कोई मतलब नहीं...!” दूबे ने मुँह बनाकर कहा- “ये टोपी गालों को चुभ रही है।”

मीणा ने दूबे को देखा, जिसकी सिर्फ आँखें ही दिखाई दे रही थीं।

“गर्मी में ऊनी-गर्म टोपी पहनेगा तो ये ही हाल होगा। उतार दे इसे...।”

“उतार दी तो लोग मेरा चेहरा देख लेंगे।”

“फिर पहने रह।” मीणा ने मुस्कराकर कहा और पलट कर ने देवराज चौहान की तरफ बढ़ते कह उठा- “तुम सिग्रेट पी रहे थे। एक मुझे भी देना।” मीणा देवराज चौहान के पास पहुँच कर ठिठक गया।

देवराज चौहान ने पैकिट निकाल कर उसे सिग्रेट दी। सिग्रेट सुलगा भी दी। फिर बोला- “मैं तुम्हारा मामला जरा भी नहीं समझ पाया।”

“समझने को है ही क्या?” कश लेकर मीणा ने कहा।

“यही कि तुम सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हो और ये बात साबित करना चाहते हो।”

मीणा देवराज चौहान को देखने लगा। चेहरे पर सोच के भाव थे, फिर कह उठा- “ये बात पूरी तरह सच है कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ।” आवाज में गम्भीरता थी- “मेरे ए.सी.पी. कामराज ने मेरी पत्नी सावी को पाने के लिए ऐसी साजिश रची कि मैं उस साजिश में बुरी तरह फंस गया। अब हालात ये हैं कि सावी ने मुझे पहचानने से इन्कार कर दिया। मेरे साथी पुलिस वाले भी मुझे नहीं पहचान रहे। पड़ौसी, यार-दोस्त कोई भी मुझे नहीं पहचानता।”

“ये कैसे सम्भव है?” देवराज चौहान ने कहा।

“सम्भव? यही तो मेरे साथ हो रहा है। इन सब बातों को मैं भुगत रहा हूँ...” मीणा ने दुखी स्वर में कहा।

“हैरानी है।”

“उस वक्त मुझे भी बहुत हैरानी हुई थी, जब मुझे किसी ने नहीं पहचाना। तब से लेकर अब तक इसी बात को लेकर परेशान हूँ मैं। कहाँ कहाँ नहीं गया मैं! कहाँ-कहाँ धक्के नहीं खाये! परन्तु किसी ने मेरी बात नहीं...।”

“और ये सब साजिश तुम्हारे ए.सी.पी. कामराज की है?”

देवराज चौहान बोला।

“यकीनन।” मीणा ने दृढ़ स्वर में कहा- “मेरी पत्नी सावी से उसका चक्कर जाने कब से चल रहा था। कम से कम मुझे तो हवा नहीं लगी, क्योंकि सावी ने ऐसा कभी-एहसास ही नहीं होने दिया मुझे। जो भी हो, मैं कामराज के रास्ते का कांटा था। मुझे रास्ते से हटाने के लिए उसने साजिश रची और वो कामयाब भी हो गया। लेकिन मैं उसे बे-नकाब करके रहूँगा... मैं...”

“इन बातों के लिए तुम्हें बैंक पर कब्जा करने की क्या जरूरत थी?” देवराज चौहान की निगाह मीणा के चेहरे पर थी।

“बहुत जरूरत थी। क्योंकि कामराज की साजिश के तहत कोई भी इस बात को गम्भीरता से नहीं ले रहा कि मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। हैरानी ये कि मुझे कोई पहचान तक नहीं रहा।”

“तुम्हारी बात पर यकीन नहीं होता।” देवराज चौहान बोला।

“ये ही तो चक्कर है कि मेरी बात पर कोई यकीन नहीं कर रहा। मेरी बात को कोई गम्भीरता से सुनता तो मामले का कोई हल निकलता। अब तक सब ठीक हो चुका होता।’’ मीणा ने दुःख भरे स्वर में कहा- “परन्तु अब मैंने बैंक पर कब्जा कर लिया है। अब सबको मेरी बात सुननी ही होगी कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ और ये सब गड़बड़ कामराज कर रहा है।”

“क्या तुम अपनी पत्नी को वापस पाने के लिए, ये सब कर रहे हो?”

“नहीं।” मीणा गुर्रा उठा- “भाड़ में जाये सावी! अब मुझे उससे प्यार नहीं रहा। उसने अपनी हरकतों से मुझे बहुत दुःख पहुँचाया है। उसके लिए मेरे दिल में जो प्यार था, वो खत्म हो गया है। मैं तो अब सावी और कामराज की साजिश बेनकाब करके अपना खोया वजूद वापस पाना चाहता हूँ। वो कामराज है तो मैं भी मीणा हूँ। उनकी साजिश कामयाब नहीं होने दूंगा।”

“इसके लिए तुम ये सब जो कर रहे हो, कानून तुम्हें छोड़ेगा नहीं....”

“मैं सब ठीक कर लूंगा।” मीणा ने विश्वास भरे स्वर में कहा- “कामराज और सावी की साजिश बेनकाब करके, अपना वजूद साबित करके, बैंक से नोट लेकर निकल जाऊँगा और कहीं पर आराम से जिन्दगी बिताऊँगा।”

“इस बैंक से तुम्हें ज्यादा नोट नहीं मिलने वाले।” पास खड़ा जगमोहन बोल पड़ा।

मीणा मुस्करा पड़ा। सिग्रेट का कश लिया। फिर बोला- “तुम्हारा क्या ख्याल है कि मुझे कितने नोट मिल सकते हैं?”

“एक-दो करोड़... “ जगमोहन ने कहा।

“शायद तुम्हें पता नहीं कि इस वक्त बैंक में 150 करोड़ रुपये मौजूद हैं।”

जगमोहन के मस्तिष्क में जैसे धमाका हुआ।

“150, यानि...यानि डेढ़ सौ करोड़?” हक्का-बक्का रह गया जगमोहन।

“हाँ। डेढ़ सौ करोड़...”

जगमोहन के चेहरे के भाव देखने लायक थे। वो हड़बड़ाया सा कह उठा- “यार, क्यों मजाक कर रहे हो। इस ब्राँच में इतना पैसा...।”

“आमतौर पर नहीं होता।” मीणा ने उसकी बात काट कर कहा- “परन्तु सासाराम एंड संस जैसी बड़ी कम्पनी ने अपने खाते से आज डेढ़ सौ करोड़ निकालना था। कम्पनी ने कुछ दिन पहले बैंक से कह दिया था। इसलिए कम्पनी को देने के लिए बैंक ने कल दोपहर ही, 150 करोड़ की रकम मंगवा ली थी।”

जगमोहन के चेहरे पर व्याकुलता थी।

“मैं नहीं मानता...।”

मीणा हौले से हंसा, फिर कह उठा- “वो मैनेजर खड़ा है, उससे पूछ लो...।”

जगमोहन फौरन मैनेजर की तरफ बढ़ गया।

“तुमने अलार्म बजवा कर बाहर पुलिस बुला ली।” देवराज चौहान बोला।

“ये जरूरी था।”

“पुलिस तुम्हें यहाँ से जाने नहीं देगी।”

मीणा के चेहरे पर कड़वे भाव आ ठहरे।

“उसी पुलिस का हिस्सा हूं मैं। मैं जानता हूँ कि पुलिस को कैसे संभालना है।” मीणा ने कहा।

“तो तुम सारी प्लानिंग करके आये हो?”

“हां। मैंने सब सोच रखा है।”

“फिर भी पुलिस तुम्हें छोड़ने वाली नहीं। बेशक तुम पुलिस का ही हिस्सा हो। पुलिस की कार्यशैली जानते हो। लेकिन ये मत भूलो कि तुम सिर्फ एक पुलिस वाले हो और बाहर सैकड़ों पुलिस वाले हैं।”

“मैं उन्हें चकमा दे दूंगा। लेकिन इस काम में बहुत वक्त पड़ा है। अभी तो उनसे बहुत बातें करनी हैं मैंने।” मीणा के दाँत भिंचते चले गये- “कामराज की साजिश की ईंट से ईंट बजानी है मैंने...मैं...”

तभी जगमोहन वापस आ पहुँचा। चेहरे पर मुस्कान थी।

उसने मीणा से कहा- “तुम ठीक कहते हो। बैंक में डेढ़ सौ करोड़ पड़ा है।”

“सब-इंस्पेक्टर मीणा हर बात ठीक कहता है।”

“तुम चाहो तो मुझे भी अपने साथ इस काम में ले सकते हो।” जगमोहन बोला

मीणा ने जगमोहन को घूरा- “क्या मतलब?”

“तुम लोग सिर्फ दो हो। तीसरे की भी जरूरत पड़ सकती है। मैं तुम्हारा साथ देने को तैयार हूँ...।”

“पर तुम मेरा साथ क्यों दोगे?” “

“तुम 150 करोड़ हासिल करने वाले हो। काम हो जाने के बाद दस-बीस-पच्चीस करोड़ मुझे भी दे देना।”

मीणा ने हाथ बढ़ा कर जगमोहन का कंधा थपथपाया।

“ये सब करना तुम जैसे बच्चों का खेल नहीं है।”

जगमोहन ने सकपका कर, देवराज चौहान को देखा।

देवराज चौहान, जगमोहन को ही तीखी निगाहों से देख रहा था।

जगमोहन गहरी सांस लेकर दूसरी तरफ देखने लगा।

मीणा उनके पास से हट गया।

“जहाँ नोट देखो, वहीं तम्बू लगा लेते हो तुम... ।” देवराज चौहान ने व्यंग्य से कहा।

“वो...वो 150 करोड़ का मामला है। मैंने सोचा कि कश लेते हुए कुछ...”

“चुप रहो...”

मीणा, मैनेजर बसन्त गुप्ता के पास पहुँचा, जो कि एक टेबल पर पड़े तीन फोनों पर बात कर रहा था, जो कि रह-रह कर बज रहे थे। एकाएक मीणा पलट कर, सबसे ऊँचे स्वर में कह उठा- “आप सब लोग मजे से बैठ जाईये। टेंशन-चिन्ता की कोई बात नहीं। हम सब दोस्त हैं और मुझे आप में से किसी के साथ भी नाराजगी नहीं है। मुझे सहयोग दीजिये और ऐसा कोई काम ना हो कि जिससे मेरे लिए परेशानी खड़ी हो।”

फिर मीणा ने मैनेजर बसन्त गुप्ता को देखकर कहा- “क्यों मैनेजर, फोन पर क्या बातें हो रही हैं?”

“बैंक के बाहर पुलिस वाले पहुँच गये हैं।” गुप्ता ने बताया।

“तो उल्लू के पट्टे आ गये!” मीणा ने मुँह बना कर कहा।

गुप्ता सकपकाया, फिर रिसीवर उसकी तरफ बढ़ाकर बोला- “इंस्पेक्टर तुमसे बात करना चाहता है।”

“कौन इंस्पेक्टर?”

“जिसके पुलिस स्टेशन के अण्डर में बैंक आता है।”

“तुमने उसे बताया कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ...।”

“हाँ, मैंने उन्हें तुम्हारा पूरा नाम बताया।”

“तो क्या जवाब मिला?”

“कुछ नहीं, वो तुमसे बात करना चाहता है।”

“मैं छोटे आफिसरों से बात नहीं करना चाहता। कह दो उससे।”

गुप्ता पुनः फोन पर बात करने लगा।

मीणा पास खड़ा बैंक में नजरें दौड़ाने लगा।

दूबे रिवाल्वर थामे सब पर नजर रख रहा था।

अब सब लोग यहाँ-वहाँ बैठ गये थे। बैंक की एक कर्मचारी औरत अपने बड़े से हैंडबैग में से कंघा निकालकर बालों को संवारने लगी थी। दूसरी लिपस्टिक लगा रही थी।

तथा बैंक का कर्मचारी दूबे से कह उठा- “मुझे बाथरूम जाना है।”

“जा। मैं तेरे साथ चलता हूँ। देख लूं कि बाथरूम में कोई खिड़की तो नहीं है, जिससे बाहर निकला जा सके।”

बैंक कर्मचारी और दूबे बाथरूम की तरफ बढ़ गये।

गुप्ता कान से रिसीवर हटाकर, मीणा से बोला- “वो कहता है कि मैं सीनियर इंस्पेक्टर हूँ। तुम्हें मेरे से बात करनी चाहिये।

“सीनियर इंस्पेक्टर!” मीणा ने होंठ सिकोड़े- “साले को तरक्की नहीं मिली होगी। कोई कारनामा करके नहीं दिखाया होगा।”

गुप्ता रिसीवर थामें मीणा को देखता रहा।

“नाम क्या है उसका?”

“इंस्पेक्टर हीरालाल खरे...।”

“हीरालाल खरे। सुना नहीं ये नाम...।” मीणा ने हाथ आगे बढ़ाया- “ला, रिसीवर दे।”

गुप्ता ने तुरन्त रिसीवर मीणा को थमा दिया।

“हाँ बोल।” मीणा ने फोन पर बात की

“मैनेजर गुप्ता बता रहा है कि तुम पुलिस वाले हो।” उधर से हीरालाल खरे की आवाज कानों में पड़ी।

“सब-इंस्पेक्टर मीणा... । इन्दर प्रकाश मीणा।”

“सच में पुलिस वाले हो?”

“तुम्हें शक क्यों है?”

“तुम जो काम कर रहे हो, वो काम पुलिस वाला नहीं कर सकता।”

“मेरी तरह तुम भी फंसे होते तो तुम भी ये ही करते।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा।

“तुम बैंक लूटना चाहते हो?”

“ये बाद की बात है। पहले मैं कुछ और करना चाहता हूँ... ।”

“क्या?”

मीणा दो पल चुप कर कह उठा- “मैंने बैंक लूटना होता तो मैं मैनेजर से बैंक का सायरन ना बजवाता, मैं...”

“मैनेजर सब बातें मुझे बता चुका है। आखिर तुम चाहते क्या हो?”

“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। लेकिन इस बात को कोई स्वीकार नहीं कर रहा।”

“ये कैसे सम्भव है कि तुम जो हो, वो बात कोई ना माने?”

“ये ही हो रहा है। मैं सबसे कहते-कहते, परेशान हो गया हूँ, जब मेरी बात किसी ने नहीं सुनी तो आखिरकार मुझे इस बैंक पर कब्जा करना पड़ा, ताकि सब लोग मेरी बात पर ध्यान दें।”

“तुम अजीब बात कह रहे हो...।”

“सच में बात तो अजीब ही है, लेकिन मैं यूँ ही जिन्दगी भर पुलिस की नौकरी करता रहा। सब पुलिस वाले बेकार होते हैं। जरूरत पड़ने पर अपने साथी की भी मदद नहीं करते। पुलिस स्टेशन में मेरी सीट मुझसे छीन ली गई। मेरी जगह किसी और पुलिस वाले को बिठा दिया गया। कोई मेरी बात नहीं सुन रहा।”

“मुझे तुम्हारी बातों पर यकीन नहीं। तुम खामखाह मुझे उलझा रहे...”

“इसीलिए, इसी कारण से मुझे बैंक पर कब्जा करके, अपनी बात कहनी पड़ रही है, क्योंकि मेरे सच पर कोई यकीन नहीं कर रहा। मैं भी देखता हूँ कि तुम लोग कब तक मेरी बात पर यकीन नहीं करते।”

उधर से हीरालाल खरे की आवाज नहीं आई।

मीणा गुस्से से रिसीवर थामे रहा।

गुप्ता, मुँह उठाये, कुर्सी पर बैठा, मीणा को देख रहा था।