देवराज चौहान ने कार धीमी की और सड़क के किनारे रोक दी।

ये मुम्बई का बाहरी इलाका था। हाईवे शुरू होता था यहां से। दिन के बारह बज रहे थे। सूर्य सिर पर चढ़ता जा रहा था। तेज हवा के कारण, गर्मी का एहसास ज्यादा नहीं हो रहा था। सामने ही हाईवे का बढ़िया रैस्टोरैंट था, जहां लम्बे सफर से आने वाले या जाने वाले, रुककर खाना-पीना करते थे। इस वक्त भी बाहर खुली जगह में पांच-छ: कारें खड़ी थी। लंच का वक्त करीब आते-आते यहां खासी भीड़ हो जाती थी।

बगल में बैठे जगमोहन की नजरें रैस्टोरैंट पर जा टिकी थी।

“यही है वो रैस्टोरैंट?” जगमोहन बोला।

“हां। यहीं पर उन लोगों ने मिलना है। वक्त लंच के आसपास का है।”

देवराज चौहान ने कहते हुए कार आगे बढ़ाई और रैस्टोरैंट के पास अन्य कारों के पास कार को रोक दिया- “पहले ही भीतर बैठ जाना ज्यादा ठीक रहेगा। हमें सावधान रहने की जरूरत है। क्योंकि वो जानते हैं कि हम उनके पीछे हैं।”

दोनों कार से बाहर निकले।

“अभी बारह बजकर दस मिनट हुए हैं। उनके इन्तजार में दो-तीन घंटे भी बैठना पड़ सकता है।” जगमोहन ने कहा- “हमारे पास पक्की खबर है कि उन्होंने यहां मिलना है। ऐसे में हम शाम तक ही इन्तजार करेंगे।”

कार, पार्किंग में छोड़कर दोनों भीतर प्रवेश करने वाले दरवाजे की तरफ बढ़ गये। काले शीशे के उस दरवाजे पर कोई दरबान मौजूद नहीं था। दरवाजे को खोलते हुए उन्होंने भीतर प्रवेश किया। आगे दस फीट की गैलरी थी। उसे पार किया तो बहुत बड़ा हॉल नजर आया। यहां खाने-पीने के लिये टेबलें नजर आ रही थीं। कोई टेबल दो के बैठने के लिये थी तो कोई चार-छ: या आठ के लिये। काफी बड़ी जगह में ये टेबलें बिछी थी। छत का आधा हिस्सा पक्का बना हुआ था, बाकी आधे पर नीले रंग की चादरें डाली गयी थी। जिसकी वजह से वहां पर नीली सी रोशनी फैली थी। आराम और सुखमयः जैसा माहौल था वहां।

हॉल के प्रवेश द्वार से जरा हटकर कैश काऊंटर था और उनके पास ही एक दुकान थी। जहां खाने-पीने का बेकरी का सामान रखा हुआ था। दूसरी तरफ बाथरूम की जगह थी। फर्श का सीमेंट था।

देवराज चौहान और जगमोहन ने एक ही निगाह में सब कुछ देख लिया था।

देवराज चौहान आगे की तरफ बढ़ा तो, जगमोहन भी उसके साथ हो गया। उन्होंने ऐसी टेबल संभाली कि वे हर तरफ देख सकें, परन्तु हर कोई उन्हें आसानी से न देख सके। दस-बारह टेबलों पर ही इस वक्त लोग मौजूद थे। वेटर खाने का सामान उन्हें सर्व कर रहे थे।

वेटर उनके पास आ पहुंचा था। मीनू कार्ड उनके सामने रख दिया। जगमोहन ने कार्ड को एक तरफ सरकाते हुए कहा। “हमारे दोस्तों ने आना है वे एक बजे के बाद ही आयेंगे। उसके बाद ही लंच लेंगे।”

“जी!” वेटर ने सिर हिलाया।

“अभी सिर्फ दो चाय ले आओ।”

वेटर चला गया।

एक बजने वाला था।

चाय वे कब की समाप्त कर चुके थे।

वहां करीब आधी टेबलें भर चुकी थी। लंच का वक्त लगभग होता जा रहा था। लम्बे सफर पर आने-जाने वाले लोग लंच के लिये वहां रुक रहे थे। उनकी निगाह, हर आने-जाने वाले को पहचानने वाले ढंग से देख रही थी।

“प्रेम सिंह वेष बदलकर भी आ सकता है।” जगमोहन बोला।

“कोई फर्क नहीं पड़ता।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में

कहा- “मैं उसे देखते ही पहचान लूंगा। उसकी पचपन साल की उम्र

उसे छिपने नहीं देगी। उसका माथे का निशान फौरन उसकी निशान-देही कर देता है।”

तभी वेटर वहां पहुंचा।

“कुछ और लाऊं सर?”

“आज का अखबार है?” जगमोहन ने उसे देखा।

“है सर।”

“अखबार ला दो। वक्त बिताने के लिये ज्यादा चाय पीना अच्छा नहीं होता।” जगमोहन मुस्कराया।

वेटर चला गया।

“कितने में सौदा किया उसने प्लेटों का?” जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।

लोगों की मौजूदगी की वजह से वहां मध्यम-सा शोर उठ रहा था। वेटर तेजी से भागे फिर रहे थे।

“बहुत बड़ी रकम ली है छोटा भाई से। ये नहीं मालूम हो सका कितनी। कुछ रकम प्रेम सिंह को पहुंच चुकी है और बाकी रकम आज यहां मिलेगी। जब वो प्लेटें देगा।”

“छोटा भाई खुद आयेगा प्लेटें लेने?”

“हां। उसका आना मजबूरी है। प्रेम सिंह पर वो विश्वास नहीं करेगा। नोट झाड़कर वो उसके आदमियों को नकली प्लेटें भी दे सकता है। प्लेटो के असली-नकली होने की पहचान तो छोटा भाई खुद ही करेगा।” देवराज चौहान की नजरें वहां बैठे लोगों पर जा रही थी- “प्रेम सिंह के खास आदमी ने दो लाख लेकर ये खबर हमें दी है। वो हमसे गलत नहीं कहेगा।”

तभी वेटर अखबार दे गया।

जगमोहन ने खुद को अखबार में व्यस्त कर लिया। वो जानता था कि प्रेम सिंह रैस्टोरैंट के हॉल में आयेगा तो देवराज चौहान उसे आसानी से पहचान लेगा। फिर भी वो अखबार से नजरें हटाकर कभी-कभार हॉल में बैठे लोगों को देख लेता था। लंच ले चुके लोग जा भी रहे थे और नये लोगों का आना भी जारी था।

दो बजे से दस मिनट ऊपर का वक्त हुआ था।

जगमोहन की नजरें अखबार पर थी, परन्तु वो रह-रहकर अखबार से नजरें हटाकर वहां पर बैठे लोगों पर निगाहें मार लेता था।

देवराज चौहान की नजरें प्रवेश द्वार पर टिकी थी कि कौन आ रहा है और कौन जा रहा है। हाथ की उंगलियों में सुलगती सिग्रेट थी।

वेटर टेबल पर से चाय के खाली प्याले ले जा चुका था। दो ढाई घंटे

में वे दो बार चाय पी चुके थे।

तभी देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ी। चेहरे पर सतर्कता आ ठहरी थी।

उसके देखते-ही-देखते एक परिवार ने द्वार से भीतर प्रवेश किया था। परिवार में अधेड़ पति-पत्नी थे और एक युवा जोड़ा था। देखने में लग रहा था कि कुछ दिन पहले ही उसकी शादी हुई है। लेकिन देवराज चौहान की निगाह उस अधेड़ व्यक्ति पर टिक चुकी थी। वो प्रेम सिंह ही था। उसने सूट पहना हुआ था। नकली मूंछे लगा रखी थी और आंखों पर चश्मा चढ़ा रखा था। देवराज चौहान को उसे  पहचानने में परेशानी इसलिये नहीं आई कि उसके माथे पर चाकू का, पुराना निशान था, जो कि स्पष्ट चमकता था।

“प्रेम सिंह आ गया।” देवराज चौहान ने धीमे स्वर में कहा।

जगमोहन ने फौरन अखबार टेबल पर रख दी। निगाहें सीधी

प्रेम सिंह पर जा अटकी।

“परिवार बनाकर आया है, ताकि कोई शक न करे। पांच-दस हजार में साथ नजर आने के लिए औरत खरीद ली होगी। इतना ही उस जोड़े को दिया होगा। नम्बरी हरामी है साला।”

“प्लेटें इसके पास ही होनी चाहिये।” देवराज चौहान का स्वर सपाट था।

“छोटा भाई को प्लेटें देनी हैं यहां। वो इसके पास ही होंगी।”

उन चारों ने एक टेबल संभाल ली थी। वहां से इधर स्पष्ट देखा जा सकता था। परन्तु प्रेम सिंह की निगाह इस तरफ नहीं पड़ी थी।

शायद वो निश्चिंत था कि उसका पीछा नहीं किया। परन्तु वो सोच भी नहीं सकता था कि जिन्होंने पीछा करना था, वो पहले से ही यहां मौजूद हो सकते हैं। उसके आदमी ने दो लाख के बदले सौदे की जगह बताई थी, तभी तो वो यहां, सही वक्त पर आ पहुंचे थे।

वेटर ने उनकी टेबल पर पानी के गिलास रखे और अब वो ऑर्डर ले रहा था।

“छोटा भाई नहीं पहुंचा।” जगमोहन बोला।

“वो किसी भी वक्त आ सकता है।” देवराज चौहान की नजरें एकटक उन पर थी। वेटर ऑर्डर लेकर चला गया। वो चारों आपस में इस तरह बातें कर रहे थे, जैसे सामान्य परिवार के सदस्य बातें करते हैं। कोई सोच भी नहीं सकता था कि सामान्य-सा दिखने वाला प्रेम सिंह बीस नम्बर का हरामी है। हेराफेरी-चोरी-चालाकियां-लूटपाट उसका धंधा है। हर वो काम उसका धंधा है, जहां से नोट आते नजर आयें। माया ही उसकी मां थी। बाप था।

देवराज चौहान सप्ताह भर से उसके पीछे था। उसके बारे में इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े ने बताया था कि वो कहां है। सावधानी का इस्तेमाल करते हुए वानखेड़े ने उससे ये काम करने को कहा था कि वो पुलिस वाला है। ऐसे में प्रेम सिंह का छोटा भाई, या फिर इन दोनों का कोई आदमी उसे पहचान सकता है कि पुलिस वाले पीछे लग गये हैं। जबकि देश के हित के लिये उनसे प्लेटें लेना जरूरी था।

वो पांच सौ के नोट छापने वाली सरकारी प्लेटें थीं। प्लेटें तैयार करने के बाद सरकारी दो व्यक्ति वैन में, एक बानमैन के साथ, उन्हें ठिकाने पर पहुंचाने जा रहे थे कि उस वैन का एक्सीडेंट हो गया।

दोनों व्यक्ति और गनमैन बहुत ज्यादा घायल हो गये। दो तो बेहोश हो गये थे। एक तड़प रहा था। उसकी दो जगह से हड्डियां टूट गयी थी। ये इत्तफाक ही था कि तब उधर से प्रेम सिंह निकला। रुका। घायलों को सहायता पहुंचाने की तो वो सोच भी नहीं सकता था। वो वैन की और उन तीनों की तलाशी लेने लगा कि शायद तगड़ा माल मिल जाये।

तब उसे नोट छापने वाली प्लेटें मिली।

जो घायल था। प्रेम सिंह ने उससे प्लेटों के बारे में पूछा

तो, घायल ने ये सोचकर प्लेटों के बारे में साफ-साफ बता दिया कि, पूरी बात जानकर वे उनकी सहायता करेगा। परन्तु प्रेम सिंह प्लेटें लेकर चलता बना। बाद में लोगों ने उन तीनों को हस्पताल पहुंचाया। पांच सौ के नोट छापने वाली सरकारी प्लेटों का गम्भीर मामला था। वानखेड़े फौरन उस काम में लग गया। जिस घायल कर्मचारी ने, प्रेम सिंह से बात की थी। उससे प्रेम सिंह का हुलिया मालूम करके पुलिस हैडक्वार्टर भेजा कि मालूम हो सके, कि क्या वो कोई पुराना अपराधी था।

चौथे घंटे मालूम हो गया कि वो शातिर प्रेम सिंह था।

वानखेड़े ने प्रेम सिंह का रिकार्ड पढ़ा और समझ गया कि वो प्लेटों जैसी चीज आसानी से वापस नहीं देगा। जबकि इस वक्त झगड़ा न करके, प्लेटें वापस पाने का सवाल था। वानखेड़े ने अपने तौर पर प्रेम सिंह की तलाश की और उस तक पहुंचकर, उसकी हरकतों पर नजर रखने लगा। फिर उसे मालूम हुआ कि प्रेम सिंह उन प्लेटों का सौदा खतरनाक अपराधी छोटा भाई से कर रहा है। यानि कि मामला बढ़ गया था। एक तरफ प्रेम सिंह जैसा शातिर था तो दूसरी तरफ छोटा भाई जैसा नामी अपराधी। पुलिस अगर सीधे-सीधे इस मामले में दखल देती तो प्लेटें हाथ से निकल सकती थी। उन प्लेटों के दम पर नोट छपकर बाजार में आते रहते और उन नकली नोटों की पहचान कर पाना बेहद असम्भव था। प्रेम सिंह या छोटा भाई के आदमी इस बात का भी अहसास पा सकते थे कि पुलिस की उन पर नजर है।

तब वानखेड़े के लिये सब मुसीबतों का हल देवराज चौहान बना।

वानखेड़े उस दिन तीन सितारा होटल में प्रेम सिंह पर नजर रख रहा था, जो कि किसी युवती के साथ होटल के कमरे में था कि तभी उसने देवराज चौहान को देखा। साथ में जगमोहन भी था। वो दोनों डिनर के लिये होटल में आये थे। यूं तो इंस्पेक्टर वानखेड़े, देवराज चौहान के पीछे था कि उसे गिरफ्तार कर सके। परन्तु इस वक्त हालात दूसरे थे। वो फौरन इस नतीजे पर पहुंच गया कि अगर देवराज चौहान इस मामले में उसकी जगह ले ले तो सब ठीक हो जायेगा। वानखेड़े उनके पास पहुंचा और स्पष्ट हालात उनके सामने रखकर सारी बात की। सब कुछ बताया।

चूंकि मामला नाजुक था। नकली नोटों से वास्ता रखता था। इसलिये देवराज चौहान ने बिना किसी एतराज के ये काम हाथ में लिया ओर वानखेड़े को कहा कि जरूरत पड़ने पर वो उसे फोन कर देगा। इस तरह देवराज चौहान इस मामले में आया और आज पांचवां दिन था। उन पांच सौ के नोट छापने वाली प्लेटों का सौदा हो चुका था। छोटा भाई ने कुछ रकम पहले प्रेम सिंह तक पहुंचा दी थी। बाकी की रकम और प्लेटों का लेन-देन अब यहां होने वाला था। तभी जगमोहन के होठों से निकला।

“छोटा भाई।”

“कहां?”

“वो देखो, अभी-अभी एक आदमी के साथ भीतर आया है। ठिगने कद वाला।”

देवराज चौहान की निगाह उन दोनों व्यक्तियों पर टिक गयी। जो अभी-अभी दरवाजा धकेलकर भीतर आये थे। जगमोहन के मुताबिक पांच फीट वाला छोटा भाई था। उससे लम्बा व्यक्ति उसका साथी था। छोटा भाई ने सूट पहना हुआ था। चेहरे पर खतरनाक भाव जैसे स्थाई थे।

“ठिगने कद वाला छोटा भाई है?” देवराज चौहान ने पूछा- “मैंने उसे पहले नहीं देखा।”

“वो ही छोटा भाई है। घटिया इन्सान है। एक बार मैंने उसे देखा था।”

देवराज चौहान की सख्त नजरें उस पर जा टिकी।

☐☐☐

छोटा भाई ने ठिठक कर अपने सिर के बालों पर हाथ फेरा। नजरें हर तरफ घुमाई और प्रेम सिंह पर जा टिकी। प्रेम सिंह ने उसे नहीं देखा था। वो अन्य तीनों के साथ बातों में व्यस्त था।

“तू यहीं रह।” छोटा भाई अपने साथी से बोला- “मैं प्रेम सिंह से बात करके आता हूं।” कहने के साथ ही वो आगे बढ़ गया।

जगमोहन दबे स्वर में बोला। “छोटा भाई प्रेम सिंह की तरफ जा रहा है।”

होंठ भींचे देवराज चौहान की नजरें छोटा भाई पर ही थी।

वो प्रेम सिंह के पास पहुंचा।

छोटा भाई को एकाएक करीब पाकर प्रेम सिंह चौंका फिर संभल गया।

“आओ।” प्रेम सिंह जबरन मुस्कराकर बोला- “बैठो।”

“काम निपटाओ। मुझे जाना है।” छोटा भाई अन्य तीनों पर नजर मारकर कह उठा।

“तुम्हारे हाथ में ऐसा कुछ नहीं है कि जिससे मुझे लगे कि तुम नोट लाये हो।” प्रेम सिंह ने कहा।

“मैं कभी खाली हाथ नहीं होता। प्लेटें हैं तुम्हारे पास?”

“हां” प्रेम सिंह ने कोट की छाती का वो हिस्सा थपथपाया। जिसके भीतर बड़ी जेब थी- “बाकी की रकम दो। प्लेटें ले लो।”

उसी पल, पलक झपकते ही छोटा भाई ने कोट की जेब से खुला हुआ चाकू निकाला। चाकू का फल पतला और लम्बा था। इससे पहले कि प्रेम सिंह कुछ सम्भल पाता। चाकू का फल तीव्रता से उसकी गर्दन को आधा काटता चला गया प्रेम सिंह के शरीर को झटका लगा, दूसरे ही पल वो कुर्सी पर बैठे ही बैठे शांत हो गया। उसके साथ के तीनों के चेहरे दहशत से भर उठे थे।

“मुंह से आवाज न निकले।” छोटा भाई ने शांत स्वर में कहा

और प्रेम सिंह के कोट से चाकू का फल साफ करके वापस अपनी जेब में रखा और उसकी कोट की भीतरी जेब में से प्लेटें निकाल ली। जो कि एलम्यूनियम की खूबसूरत डिब्बी में थी। मृत प्रेम सिंह के गले से झरने से गिरते पानी की तरह खून बह रहा था। रैस्टोरैंट में बातों का स्वर थमने लगा था। स्पष्ट था कि लोग डर से चुप होते जा रहे थे। कईयों ने ये सब होते देख लिया था। अपने सामने कत्ल होते देखना भी हिम्मत का काम था उन शरीफों के लिये।

छोटा भाई ने प्लेटों की डिब्बी थामें सरसरी निगाह वहां बैठे लोगों पर मारी फिर पलटकर, शीशे के दरवाजे की तरफ बढ़ गया। छोटा भाई का साथी, दोनों हाथों में रिवॉल्वरें थामें, दांत भींचे सतर्क खड़ा था। जब छोटा भाई बाहर निकल गया तो वो धीरे-धीरे पीछे सरका। वहां बैठे लोगों में से किसी ने भी उठने की कोशिश नहीं की। छोटा भाई और उसका साथी बाहर निकल गया। पीछे लाश और दहशत भरा सन्नाटा छोड़ गये।

उसी पल देवराज चौहान उठा और दरवाजे की तरफ दौड़ा। हाथ में रिवॉल्वर आ गयी थी। शीशे के दरवाजे के बाहर निकलते ही देवराज चौहान ने देखा कि वो दोनों एक कार में बैठ रहे थे। देवराज चौहान ने दांत भींचे रिवॉल्वर सीधी की और सबसे पहले निशाना लिया छोटा भाई के साथी का।

गोली उसकी छाती में जा लगी। कार में बैठते-बैठते वो नीचे जा गिरा।

छोटा भाई चौंका। उसने फुर्ती से रिवॉल्वर निकाली। देवराज चौहान की तरफ से दूसरी गोली आई। परन्तु वो कार के दरवाजे से टकराकर, छिटक गयी। जवाब में छोटा भाई ने फायर किया। जल्दबाजी में चलाई गोली, देवराज चौहान के काफी दूर से निकलकर, दीवार में जा धंसी।

तब तक छोटा भाई स्टेयरिंग सीट पर बैठ चुका था।

उसने कार स्टार्ट करने की चेष्टा की। तभी गोली ने टायर की धज्जियां उड़ा दी। कार जोरों से हिली। फिर एक तरफ से झुकी-सी महसूस हुई, छोटा भाई को। अब कार बेकार थी उसके लिये। वो फुर्ती से बाहर निकला। और कार की ओट ले ली। रिवॉल्वर उसके हाथ में दबी थी। भिंचे दांत। चेहरे पर खतरनाक भाव और भी गहरे हो गये थे। गर्मी का पसीना उसके चेहरे पर नजर आने लगा था। सूर्य सिर पर था। इस वक्त दोपहरी में चुप्पी-सी छाई हुई थी वहां।

मिनट भर बीत गया।

कोई आवाज नहीं उभरी।

रिवॉल्वर थामें सावधानी से छोटा भाई ने सिर उठाकर रैस्टोरेंट के दरवाजे की तरफ देखा। वहां किसी को भी खड़े नहीं पाया तो समझ गया कि गोलियां चलाने वाले ने करीब ही कहीं पोजिशन ले ली है।

“बेवकूफ आदमी।” छोटा भाई दांत किटकिटा उठा- “बाप मर गया। अभी भी उसकी वफादारी में गोलियां चला रहा है। मरेगा साला।” मरने का उसका इशारा प्रेम सिंह के बारे में था।

चुप्पी लम्बी होने लगी।

तभी कार की ओट में बैठे-बैठे छोटा भाई ने चिल्लाकर कहा।

“प्रेम सिंह मर चुका है। अब उसकी वफादारी में तुम अपनी गोलियां क्यों खराब कर रहे हो। छोटा भाई हूं मैं। मुझसे दुश्मनी लेना ठीक नहीं। चले जाओ यहां से। वरना मारे जाओगे। तुमने मेरे खास आदमी को मार दिया...।”

“मैं प्रेम सिंह का आदमी नहीं हूं।”

पीछे से बेहद करीब से कठोरता से भरे ये शब्द उसके कानों में पड़े।

छोटा भाई चिहुंककर पलटा।

मात्र तीन कदम के फांसले पर देवराज चौहान दोनों हाथों में रिवॉल्वर थामे, रुख उसकी तरफ किए खड़ा था। वो कब वहां तक आ पहुंचा। छोटा भाई नहीं महसूस कर पाया इस बात को।

छोटा भाई के हाथ में भी रिवॉल्वर दबी थी।

दोनों कई पलों तक एक-दूसरे को देखते रहे।

“प्रेम सिंह के आदमी नहीं हो तुम?” आंखें सिकुड़ी हुई। आवाज में दरिन्दगी के भाव।

उसी मुद्रा में खड़े इन्कार में सिर हिलाया देवराज चौहान ने।

“मुझे जानते हो?”

देवराज चौहान ने सहमति में सिर हिलाया।

“कौन हो तुम?” दांत भींचे पूछा, छोटा भाई ने।

“देवराज चौहान।”

“कौन देवराज...ओह-तुम देवराज चौहान हो।” उसी ढंग में बोला- “डकैती मास्टर?”

देवराज चौहान का सिर पुनः सहमति से हिला।

दोनों एक-दूसरे पर रिवॉल्वरें ताने हुए

मौत भरी खामोशी में कई पल गुजर

“मेरे रास्ते में क्यों आ रहे हो?”

“प्लेटें मेरे हवाले कर दो।” देवराज चौहान का स्वर बेहद कठोर था। नजरें, उसकी आंखों में झांक रही थी।

“तुम गलत चल रहे हो देवराज चौहान।” छोटा भाई दांत भींचकर बोला- “मेरे रास्ते में आना ठीक नहीं। तुम...।”

“पांच सौ के नोट छापने वाली सरकारी प्लेटों की मुझे जरूरत है।” देवराज चौहान की आवाज में मौत के भाव आने शुरू हो गये थे - “अगर प्लेटें शराफत से मेरे हवाले कर देते हो तो तुम्हें शूट नहीं करूंगा।”

“मत भूलो देवराज चौहान कि मेरे हाथ में भी रिवॉल्वर है। नाल तुम्हारी तरफ है और उंगली ट्रेगर पर। मैं तुम्हें गोली मार सकता...।

“तुम्हें इतना बढ़िया मौका मिला। लेकिन तुमने गोली नहीं चलाई।” देवराज चौहान सर्द स्वर में कह उठा- “ये तुम्हारी जिन्दगी की आखिरी गलती है। अब तुम गलती नहीं...।”

देवराज चौहान ने उसकी आंखों से पहचाना कि वो गोली चलाने जा रहा है। लेकिन उससे पहले ही देवराज चौहान ने ट्रेगर दबाया।

गोली उसके चेहरे को उधेड़ते हुई, सिर के पीछे वाले हिस्से से निकल गयी। वो कार से टकराया और तीव्रता से लड़खड़ाकर नीचे जा गिरा। गिरने से पहले ही मर चुका था वो। रिवॉल्वर अभी भी उसके हाथ में दबी थी। देवराज चौहान ने रिवॉल्वर जेब में डाली और आगे बढ़कर उसके कोट की जेबें टटोलने लगा। प्लेटों वाली एलम्यूनियम की डिब्बी कोट की बाहरी जेब में मिली। उसे खोलकर देखा। भीतर प्लेटें थीं। डिब्बी बंद करके हाथ में थामे पलटा और रैस्टोरैंट के दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

☐☐☐

जगमोहन भी देवराज चौहान के साथ उठने लगा कि तभी उसकी निगाह टेबल पर पड़े अखबार के आखिरी पन्ने पर पड़ी। वहां पूरे पेज का इश्तिहार नजर आ रहा था। उस पर उसकी नजरें अटककर रह गयी थी। आंखें सिकोड़े वो उसे ही देखता रहा। बाहर गोलियां चलने की आवाज आई। उसकी एक निगाह बाहर निकलने वाले शीशे के दरवाजे पर मारी फिर वापस कुर्सी पर बैठकर इश्तिहार पर नजरें दौड़ाने लगा।

रैस्टोरैंट के हॉल में सन्नाटा छाया हुआ था। भीतर लाश। बाहर गोलियां चल रही थी। ऐसे में वहां से उठना भी ठीक नहीं था। हिलना भी खतरनाक था।

दो टेबल पार मौजूद वेटर जगमोहन के पास पहुंचा।

“सर।” वो घबराये दबे स्वर में कह उठा।

जगमोहन ने उस पर नजर मारी और पुन: नजरें अखबार पर टिक गयी।

“आपके साथ जो साहब थे। जो उसके पीछे गये हैं। वो मर जायेंगे।” वेटर ने सूखे स्वर में कहा।

“क्यों?” जगमोहन की निगाह अखबार पर थी।

“वो-वो मैं उसे पहचानता हूं। वो खतरनाक गैंगस्टर छोटा भाई है। वो आपके साथी को मार देगा। उन्हें भीतर बुला लीजिये।”

“वो आसानी से मरने वाला नहीं।” होंठ सिकुड़े हुए थे जगमोहन के। नजरें अखबार पर ही रहीं।

“आप मेरी बात को मजाक में ले रहे हैं। वो छोटा भाई नाम का बड़ा दादा...”

“मेरे साथी को तू जानता है?” जगमोहन ने शांत स्वर में कहा।

“आपके साथी को....? नहीं-क्यों?”

“मेरा साथी बड़ा भाई है।” जगमोहन ने अखबार से नजरें हटाकर उसे देखा।

“क्या, बड़ा भाई?”

“हाँ।”

“आप मेरी बात को मजाक समझ रहे...।” वेटर ने कहना चाहा।

“मजाक, मैं नहीं तू समझ रहा है। वो सच में बड़ा भाई है। कद में भी, वैसे भी।” जगमोहन के होठों पर शांत-सी मुस्कान उभरी और उसकी निगाह पुनः अखबार पर जा टिकी।

वेटर जगमोहन को देखकर सोच रहा था कि दुनिया में इससे बड़ा पागल दूसरा नहीं है।

दस मिनट बाद देवराज चौहान ने भीतर प्रवेश किया।

रैस्टोरेंट में मौजूद हर किसी की निगाह उस पर जा टिकी। आंखों और चेहरे पर एक ही सवाल था कि उस बदमाश का क्या हुआ, जिसके पीछे वो गया था।

देवराज चौहान टेबल के पास पहुंचा तो जगमोहन ने अखबार से नजरें हटायीं।

“ले आये।” उसके हाथ में दबी एलम्यूनियम की डिब्बी को देखा।

“रखो।” देवराज चौहान ने एलम्यूनियम की डिब्बी उसके सामने रखी- “वानखेड़े को फोन करो। बाहर दो लाशें पड़ी हैं। जब वो आये तो ये प्लेटें उसके हवाले करके बंगले पर चले जाना।”

“तुम कहां चले?”

“जो काम कर रहा था। वो पूरा करना है।” देवराज चौहान जाने को हुआ।

“एक मिनट बैठो तो।”

“क्यों?” देवराज चौहान के माथे पर बल पड़े।

“खास बात है, एक लाईन में सब कुछ समझ जाओगे।” जगमोहन ने उसकी बांह पकड़कर उसे बिठाने की कोशिश की।

देवराज चौहान बैठ गया।

हॉल में बैठे, सब लोगों की घबराई निगाह उन पर थी।

“ये देखो।” जगमोहन ने अखबार का आखिरी पन्ना, देवराज चौहान के सामने किया- “ये इश्तिहार, देश भर के ज्वैलर्स बेशकीमती जेवरातों के साथ मुम्बई में इकट्ठा हो रहे हैं कि अपने जेवरात बेच सके। जिन्हें खरीदने के लिये देश-विदेश के धन-कुबेर आ रहे हैं।

एक ही जगह पर सारे जेवरात इकट्ठा होने का मतलब है, अरबों की दौलत और...”

“हम अरबों के जेवरातों की डकैती कर लें। यही कहना चाहते हो।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।

दोनों के स्वर धीमे थे।

जगमोहन की निगाह देवराज चौहान पर जा टिकी।

“बिल्कुल यही कहना चाहता ...”

“मैं व्यस्त हूं। जो काम मेरे हाथ में है। वो पूरा करना है। वानखेड़े के काम की वजह से वो काम पहले ही लेट हो चुका...।”

“लेकिन ये अरबों की दौलत से कम का मामला नहीं है।”

जगमोहन इश्तिहार पर हाथ मारता कह उठा- “इतनी बड़ी दौलत एक ही जगह इकट्ठी होने के बहुत ही कम मौके सामने आते हैं। ऐसा मौका...।”

देवराज चौहान बिना कुछ कहे उठा और बाहर जाने वाले दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

दो पल तो जगमोहन न समझने वाले भाव में देवराज चौहान को जाते हुए देखता रहा।

“मेरी बात तो सुनो।” जगमोहन ने कहना चाहा।

देवराज चौहान नहीं रुका और दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया।

वहां बैठे लोगों की निगाह जगमोहन पर थी।

जगमोहन के चेहरे पर झल्लाहट के भाव उभरे। उसने अखबार को गोल करके हाथ में पकड़ा और एल्यूमिनियम वाली डिब्बी उठाकर उठा और काऊंटर पर पड़े फोन की तरफ बढ़ गया। कुर्सी पर पड़ी प्रेम सिंह की लाश को भी देखा। चेहरे पर अरबों की दौलत को लेकर सोच के भाव नाच रहे थे। उसने वानखेड़े को फोन किया उसके खास नम्बर पर। वो नम्बर वानखेड़े के मुताबिक ऐसा था कि अगर वो नहीं मिलता तो वो जहां भी होता, फौरन उस तक मैसेज पहुंच जाता। लेकिन वो खुद ही मिला।

“हैलो।” वानखेड़े की आवाज कानों में पड़ी।

“मैं। आवाज तुमने पहचान ली होगी।” जगमोहन ने काऊंटर पर बैठे आदमी पर नजर मारकर कहा।

“जगमोहन।”

“मेरी बात सुनो। पहले ये जान लो कि मैं कहां हूं।” जगमोहन ने रैस्टोरैंट का पता बताया- “रैस्टोरैंट में प्रेम सिंह की लाश पड़ी है और बाहर छोटा भाई की लाश। शायद उसके साथी की लाश भी बाहर ही है। प्लेटें मेरे पास हैं। यहां जल्दी से आओ और लाशों के साथ-साथ प्लेटें ले लो। मुझे फारिग करो।”

“आता हूँ मैं।”

जगमोहन ने रिसीवर रखा और वहां मौजूद लोगों पर नजर मारी।

“घबराने की जरूरत नहीं।” जगमोहन ने ऊंचे में कहा- “यहां पुलिस पहुंच रही है। अब सब ठीक रहेगा।”

सुनकर लोगों ने राहत की सांस ली। धीरे-धीरे वे उठने लगे। वहां से निकल जाना चाहते थे। शायद कोई भी पुलिस के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता था।

प्रेम सिंह के साथ की औरत और युवक-युवती का नया जोड़ा भी चुपचाप उठकर बाहर निकल गये थे। जगमोहन ने उन्हें जाते देखा, परन्तु रोकने की चेष्टा नहीं की। उसकी सोचें, उसका मस्तिष्क तो अरबों के जेवरातों के गिर्द घूम रहा था। जिनमें देवराज चौहान ने कोई दिलचस्पी नहीं ली और वो अरबों की दौलत छोड़ना नहीं चाहता था।

घंटे भर बाद इंस्पेक्टर वानखेड़े वहां पहुंचा। उसके साथ अन्य पुलिस वाले भी थे। वहां पहुंचते ही वो वानखेड़े के इशारे पर लाशों को संभालने में लग गये।

वानखेड़े उससे मिला।

“संभाल इसे।” एल्म्यूनियम की डिब्बी उसे थमाता हुआ बोला- “इसमें प्लेटें हैं चैक कर लो।”

वानखेड़े ने डिब्बी खोलकर प्लेटों को देखा। चेहरे पर राहत के भाव उभरे।

“देवराज चौहान कहां है?” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में पूछा।

“उसे काम था। वो गया। मैं भी चला गया होता, अगर प्लेट देने की जिम्मेवारी मुझ पर न होती।” जगमोहन ने वहां मौजूद पुलिस वालों पर नजर मारते हुए कहा- “जा रहा हूं।”

वानखेड़े गम्भीर सा उसे देखता रहा। कहा कुछ नहीं?

जगमोहन पलटा और आगे बढ़ गया। कार देवराज चौहान ले गया था। वहां से जाने के लिये कठिनता से उसे टैक्सी मिली। सीधा बंगले पर पहुंचा और सोहन लाल को फोन किया।

सोहनलाल अपने कमरे में ही था बात हुई।

“हैलो।” सोहनलाल की आवाज कानों में पड़ी।

“सोहनलाल।” जगमोहन के होठों से निकला- “कैसे हो?”

“कैसे हो?” सोहनलाल का अजीब-सा स्वर कानों में पड़ा- “इतने प्यार से पहले कभी तूने मेरा हाल नहीं पूछा। क्या बात है?”

“बात?” जगमोहन ने अपनी आवाज को पूरी तरह सामान्य बनाने की चेष्टा की- “बात कुछ भी नहीं। यूं ही तेरा हाल पूछने के लिये फोन...”

“पूछ लिया...”

“क्या?”

“हाल। मेरा हाल पूछने के लिये तूने फोन किया...

“वो तो ठीक है।” जगमोहन ने उसकी बात काटी- “बहुत ही खास बात है।”

“खास बात।” सोहनलाल का तीखा स्वर कानों में पड़ा- “एक बार तूने कहा था कि खास बात फोन पर नहीं करते। तब मुझे सिर के बल दौड़ते हुए तेरे पास आना पड़ा था।”

“वो तो मैंने मजाक में।”

“मैं मजाक नहीं कर रहा। अगर तू आ रहा हो तो मैं रुक जाऊं।

“आ रहा हूं। जाना मत।” कहने के साथ ही जगमोहन ने रिसीवर रखा- “भाव बढ़े हुए हैं साले के।” बड़बड़ा उठा।

सोहनलाल ने गोली वाली सिग्रेट का कश लिया। इस वक्त वो गद्देदार सोफे की चेयर पर धंसा, सैन्टर टेबल पर दोनों टांगें रखे पसरा पड़ा था। ए०सी० की ठण्डी हवा में वो सिर्फ तहमद डाले हुए था। जगमोहन को तो कहा था कि उसने जाना है, जबकि अभी तक नहाया भी नहीं था।

“बहुत बड़ा मामला है।” अभी वहां पहुंचे जगमोहन ने कहा।

“वो तो मैं समझ ही रहा हूं।” सोहनलाल ने सिर हिलाया- “वरना तू सिर के बल न दौड़ा आता। मेरे ख्याल में इस वक्त तेरे से पांच-दस लाख उधार भी मांगू तो तू इन्कार नहीं करेगा।”

जगमोहन ने जेब से तहे किया अखबार का इश्तिहार निकाला और खोलकर सोहनलाल के सामने कर दिया। सोहनलाल की नजरें अखबार के पूरे पन्ने पर फिरने लगी।

“ये देख।” जगमोहन व्यग्र स्वर में बोला- “देशभर के ज्वैलर्स, अपने जेवरात बेचने के लिये मुम्बई में इकट्ठे हो रहे हैं। जिन्हें खरीदने के लिये देश से ही नहीं। विदेश से भी लोग आयेंगे। जाहिर है अरबों के जेवरात एक ही जगह इकट्ठे होंगे। ये बहुत बढ़िया मौका है, अरबों की दौलत पर हाथ मारने का।”

सोहनलाल ने इश्तिहार से नजरें हटाकर, जगमोहन को देखा।

“मेरे को तो ये बता कि कौन-सा ताला-तिजोरी, वाल्ट खोलना है।” सोहनलाल शांत स्वर में बोला।

“वो तो बाद की बात है कि क्या-क्या खोलना है।” जगमोहन ने पहलू बदला- “मैं तो डकैती की बात कर रहा हूं।”

“डकैती करना या उसे अंजाम देना मेरा काम नहीं है। इस बारे में तुझे देवराज चौहान से बात करनी...।”

“की थी।” जगमोहन कह उठा- “लेकिन देवराज चौहान ने कोई दिलचस्पी नहीं ली।”

“क्यों?” सोहनलाल की आंखें सिकुड़ी।

“कहता है, व्यस्त है और मेरा कहना है कि अरबों की दौलत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिये।”

सोहनलाल गोली वाली सिगरेट का कश लेते हुए टांगें सीधी की।

“जगमोहन।” सोहनलाल गम्भीर था- “डकैती के बारे में जो फैसला करना है, वो देवराज चौहान ही करेगा। अपने तौर पर हम इस बारे में कोई फैसला नहीं ले सकते। फैसले को अंजाम नहीं दे सकते।”

“तुम ठीक कहते हो। माना कि देवराज चौहान व्यस्त है। लेकिन मैं इतनी बड़ी दौलत को देखकर आंखें बंद नहीं कर सकता। हम कोशिश करें तो इस मामले में देवराज चौहान की दिलचस्पी पैदा कर सकते हैं।”

“कैसे?”

“सारे मामले को देखना होगा। किस तरह ज्वैलर्स इकट्ठे हो रहे हैं। कौन इस सारे मामले को हैंडिल कर रहा है। यानि कि सारे प्रोग्राम कैसे बन रहे हैं?” जगमोहन बोला- “पूरी जानकारी इकट्ठी करनी होगी। उसके बाद सब कुछ देवराज चौहान के सामने रखकर बात करेंगे।”

सोहनलाल की नजरें जगमोहन पर टिकी रहीं।

“मेरी बात ठीक नहीं लगी?” उसे खामोश पाकर जगमोहन बोला।

“ठीक लगी। भागदौड़ करके मामला चैक करने में बुरा क्या है।” सोहनलाल सोच भरे स्वर में कह उठा- “ये खतरनाक मामला होगा। अरबों के जेवरातों पर सिक्योरिटी जर्बदस्त होगी। पुलिस होगी। सुरक्षा के ढेरों इन्तजाम...।”

“मालूम है। मालूम है। इसके अलावा भी बहुत कुछ होगा।”

“लेकिन पहले मामले का सिर-पांव तो मालूम कर लें। उसके बाद इस मुद्दे पर भी बात कर लेंगे। दौलत पाने के लिये मुसीबत को तो गले लगाना ही पड़ेगा। हम इस मामले को पार नहीं लगा सकते।”

“पार तो देवराज चौहान ही लगायेगा। लेकिन मालूम तो हो कि जेवरात कहां इकट्ठे होंगे। कब होंगे। उनके किस प्रोग्राम के तहत सारे कार्यक्रम... ।”

“वो तो ठीक है।” सोहनलाल ने तगड़ा कश लिया- “आजकल हाथ तंग है। भागदौड़ के लिये मेरे पास नोट नहीं... ।”

“उसकी फिक्र मत कर। बहुत हैं मेरे पास। मैं।”

“बहुत हैं?” सोहनलाल ने उसे तीखी निगाहों से देखा- “मुझे नोटों की जरूरत...।”

“इतने भी नहीं हैं।” जगमोहन ने उसे घूरा- “चलने की तैयारी कर। देखते हैं कि इस मामले को कहां से पकड़ें।”

सोहनलाल ने कश लेकर सिग्रेट ऐश ट्रे में डाली और खड़ा हो गया।

☐☐☐

रनवीर भंडारी!

मुम्बई का जाना-माना इज्जतदार जौहरी। नये-नये जेवरात डिजाईन तैयार करने में महारत हासिल थी। फिल्मी अभिनेत्रियां तक उसके यहां से अपने जेवरात तैयार करवाती थीं। उम्र उसकी बयालीस-चवालीस से ज्यादा नहीं थी। दो साल पहले जेवरातों को तैयार करवाने आई अभिनेत्री से आंख लग गयी। थोड़ा-सा दिल भी लगा। संसार में सबसे ज्यादा खूबसूरत उसे वो ही लगने लगी। परन्तु अभिनेत्री की खास करीबी न हासिल न कर पाया। उसने हार नहीं मानी और एक फिल्म शुरू करने की घोषणा कर डाली। उस अभिनेत्री को लेकर ‘ताज होटल’ में फिल्म का मुहूर्त शॉट कर डाला।

शानो-शौकत दिखाने के लिये पैसा पानी की तरह बहाया।

अभिनेत्री फिल्म में काम करने का दो करोड़ लेती थी, लेकिन उसे पांच करोड़ दिया। इतना ही बहुत था। अभिनेत्री उस सोने के अंडे को क्यों छोड़ती। फिल्म हिट हो जाती, तो उसकी अगली फिल्म में भी वो ही होगी। नहीं हिट हुई तो करोड़ों का माल तो उसने निचोड़ ही लिया।

रनवीर भंडारी की पत्नी नयना ने, अपने पति को, ये कहकर बहुत मना किया, फिल्म बनाना उसके बस का नहीं है। वो बाप-दादाओं का, जेवरातों का काम करता रहे। लेकिन रनवीर भंडारी पर अभिनेत्री की खूबसूरती का भूत सवार था। अब तो भूत बैडरूम तक जा पहुंचा था। रनवीर भंडारी को लगा कि फिल्म बनाने का काम बहुत बढ़िया है। पैसे की कोई कमी नहीं थी। उसकी साख ऐसी थी कि एक इशारे पर पैसा आता रहा।

मात्र सवा साल में वो फिल्म पूरी हो गयी।

इस बीच वो अभिनेत्री उसकी दूसरी पत्नी बनकर रही।

पत्नी नयना सब जानती थी परन्तु अपने पति पर उसका बस नहीं चल रहा था।

बहरहाल जब फिल्म बनकर हॉल में उतरी तो, पहले दिन के चार शो के अलावा वो दोबारा किसी हॉल पर नजर ही नहीं आई।

बिना कहानी की, वो बेहद घटिया फिल्म बनी थी।

रनवीर भंडारी का तो बुरा हाल हो गया। सारा पैसा लोगों से लेकर लगाया, था। अपना भी लगा दिया था। सोचा था जो लगा है, वो तो वापस आ जायेगा। परन्तु सब कुछ मिट्टी में। वो अभिनेत्री जो उसके साथ जीने-मरने की कसमें खाया करती थी शूटिंग के दौरान।

फिल्म को पिटा पाकर, उससे फोन पर भी बात करने को तैयार नहीं हुई।

रनवीर भंडारी का चेहरा तो सामान्य ही रहता, परन्तु आसमान से सड़क पर आ गिरा था रनवीर भंडारी।

अभिनेत्री का भूत सिर से उतरा तो सामने बीवी नयना को पाया।

नयना ने एक-एक पल का हिसाब उससे गिनकर लिया। उसके सामने सिर उठाने के काबिल नहीं रहा था रनवीर भंडारी। बच्चों से भी दबा-दबा रहता कि बाहरी औरत के चक्कर में वो बहुत मोटी रकम गंवा चुका है। इस दौरान जेवरातों के बिजनेस की तरफ ध्यान नहीं दिया तो अब वो धंधा मंदा पड़ गया था। उसके ग्राहक जेवरात बनवाने के लिये कहीं और जाने लगे थे। उधर मालूम हुआ कि उस अभिनेत्री ने अपना फ्लैट बेचकर, करोड़ों का नया बंगला खरीद लिया है साथ में बहुत ही खूबसूरत लड़का रहने लगा है, जो कि उसके साथ ही दो फिल्मों में हीरो बनकर आ रहा है। अभिनेत्री ने उससे ढाई करोड़ रुपया उधार लिया था कि जल्द ही वापस दे देगी। ये पैसा उसने बैडरूम में बंद, उन क्षणों में मांगा था जब वो उसके नाम चांद-सितारे भी कर सकता था। यानि कि उसी की दौलत से बंगला खरीदा। वो जानता था कि ढाई करोड़ वापस नहीं मिलेगा। उसकी दौलत से बंगला खरीदा और साथ में दूसरे को रख लिया।

रनवीर भंडारी ने जब हिसाब लगाया तो कुल मिलाकर पचास करोड़ के नीचे पाया खुद को। जो अपना गया वो अलग। बाजार का पचास करोड़ रुपया देना था। जो ब्याज लग रहा था वो अलग। उसने महसूस किया कि इतना पैसा नहीं दे पायेगा। कहां से लायेगा? जेवरातों का काम तो वैसे भी ठप्प सा हो रहा है ऐसे में उसका बंगला, बाप-दादा का जेवरातों का विशाल शोरूम । अन्य प्रोपर्टी वगैरहा, हर चीज नीलाम हो जायेगी। तब भी पचास करोड़ पूरा नहीं होगा। अलबत्ता लेनदारों को चैन आ जायेगा कि अब उसके पास देने को कुछ नहीं रहा।

उसके हक में इस वक्त सबसे बेहतर ये बात थी कि उसके कंगाल होने की बात हर कोई नहीं जान पाया था। लेनदारों ने मुंह बंद रखा हुआ था अभी, ये सोचकर कि शायद वो कहीं से पैसे का इन्तजाम करके उन्हें लौटा दे। उनका पैसा वापस आ जायेगा। अगर उन्हें मालूम हो जाता कि रनवीर भंडारी भीतर से पूरी तरह दीवालिया हो चुका है तो उसके बंगले और शोरूम की नीलामी करवा देने में देर न लगाते।

भीतर-ही-भीतर वो हद से ज्यादा परेशान था कि आने वाले वक्त में क्या होगा, जब सबको मालूम हो जायेगा कि जो किसी को फूटी कौड़ी लौटाने के भी काबिल नहीं है।

पचास करोड़ देना था लोगों का और इन्तजाम पचास लाख का कर पाना भी सम्भव नहीं था। इतनी बुरी हालत है। ये बात उसने नयना के सामने भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं की थी। उसकी बीती हरकतों पर नयना तो हमेशा ही जली-भुनी लगती थी। अगर ये मालूम हो गया कि वो कंगाली तक नंगा हो गया है तो नयना अवश्य उसका सिर फोड़ देगी।

☐☐☐

आज नाश्ता करके तैयार होने के बाद, रनवीर भंडारी बैडरूम में ही कुर्सी पर बैठ गया था। मन खराब था उसका। सोचो में यही था कि कहां से पैसे का इन्तजाम करे। सिग्रेट सुलगाकर कश लेने लगा।

तभी उसकी पैंतीस वर्षीय बीवी नयना ने भीतर प्रवेश किया।

वो सजी-धजी तैयार थी और इतनी खूबसूरत थी कि किसी फिल्म अभिनेत्री से कम नहीं लग रही थी। अपनी उम्र से दस साल कम लगती थी। अब रनवीर भंडारी को अपनी बीवी ही खूबसूरत लगती थी। अभिनेत्री का भूत तो कब का गायब हो चुका था।

उसे वहां बैठे पाकर नयना ठिठकी।

“काम पर जाने का इरादा नहीं है?” नयना ने कहा।

रनवीर भंडारी ने नयना को देखा कहा कुछ नहीं।

“या फिर यूं कहो कि शोरूम पर कस्टमर्स कम और वो लड़कियां ज्यादा आती हैं, जो हीरोइन बनना चाहती हैं और उनके ख्याल में तुम उन्हें हिरोईन के तौर पर चांस दे सकते हो।” नयना की आवाज में जहरीला पन आ गया।

रनवीर भंडारी ने होंठ भींचकर पहलू बदला।

“एक बात तो बताओ।” नयना एकाएक खा जाने वाले स्वर में कह उठी- “जब तुम उस हिरोईन पर फिदा हुए। उसे लेकर भारी-भरकम रकम के साथ फिल्म बनाई। उसके साथ बैडरूम में सोने लगे तो तुम्हें मेरा ध्यान नहीं आया कि मुझे पता चलेगा तो तब तुम्हारा क्या होगा।”

रनवीर भंडारी उसे देखने लगा।

“ये तो अच्छा हुआ कि तुम्हारी फिल्म नहीं चली। चल जाती तो तुम जैसा घटिया इन्सान घर वापस न लौटता और बाहर दसियो बैडरूम तैयार कर चुका होता। तब तो तुम्हें ये भी ख्याल न आता कि तुम्हारी बीवी खुद किसी हीरोईन से कम नहीं है। वो भी तो फिल्म में काम कर सकती है। लेकिन तुम पर तो उस हरामजादी की मुस्कान का नशा सवार था। उसके लिये न तो तुमने पैसे की परवाह की। न बच्चों की और न मेरी।”

“ब-बस करो। कब तक ये बातें कहती... ।”

“जब तक कि जिन्दा हूं या तुम जिन्दा हो। ये बातें होती रहेंगी। नयना दांत किटकिटा कर कह उठी- “ये सोचो कि वो वक्त मैंने कैसे निकाला होगा, जब मुझे मालूम होता था कि तुम उस अभिनेत्री के साथ रातें रंगीन कर रहे हो। कोई और होती तो मर जाती। लेकिन मैं तुम्हारी हरकतों का अंत देखना चाहती थी। मेरा दिल कहता था कि तुम एक दिन यहीं आकर मरोगे और यही हुआ।”

रनवीर भंडारी ने सूखे होठों पर जीभ फेरी। उसे देखता रहा।

वो आगे बढ़ी और टेबल पर दो कागज रखती हुई बोली।

“ये बिल चुका देना।”

“बिल?” उसके होठों से निकला।

“हां। कल मैंने होटल में अपने जन्मदिन की पार्टी दी थी। सवा लाख वहां खर्च हुआ और बेटी स्कूल की तरफ से मारीशस जा रही है सप्ताह के लिये। डेढ़ लाख वो देना है।”

“समझा करो नयना।” रनवीर भंडारी के होठों से निकला- “मेरा हाथ तंग है। मैं...”

तभी दांत भींचे नयना आगे बढ़ी और जोरदार चांटा रनवीर भंडारी के गाल पर मारा।

रनवीर भंडारी हक्का-बक्का सा नयना को देखने लगा। वो सोच भी नहीं सकता था कि नयना उसे चांटा मार सकती है। जो उसकी आवाज पर सिर झुका देती थी। आज चांटा मार रही है। ये उसके ही कर्म थे कि, अपनी इज्जत वो खुद ही मिट्टी में मिला चुका था।

“करोड़ों रुपया उसे दे दिया कि उसके साथ सो सको। मेरे से तो मजे मिलते ही नहीं थे। या फिर तुमने मुझे मुफ्त की समझ लिया था। नयना का चेहरा गुस्से से धमक उठा- “हाथ तंग है तो जाकर उस हरामजादी से ले आओ पैसा, जिसे दिया था। वो पैसा भी देगी और अपने साथ लिटाकर प्यार भी करेगी।”

रनवीर भंडारी ने होंठ भींच लिए। मुंह दूसरी तरफ फेर लिया था।

नयना खा जाने वाली निगाहों से उसे घूरती रही।

“एक बात कान खोलकर सुन लो।” नयना पूर्ववत् स्वर में कह उठी- “अगर तुम्हारे पास मेरे और मेरे बच्चों के लिये पैसा नहीं है तो इस घर से चले जाओ। दोबारा मुझे सूरत मत दिखाना। अगर तुम नहीं जा सकते तो मुझे कहो, बच्चों को लेकर मैं चली जाती हूं। सच बात तो ये है कि तुम्हारा गंदा चेहरा देखकर मुझे तुम्हारी जरूरत महसूस ही नहीं होती।”

रनवीर भंडारी चुप रहा।

“तुम क्या समझते हो कि मुझे नहीं मालूम कि तुम कंगाल हो चुके हो।” गुस्से से नयना का खूबसूरत चेहरा स्याह-सा होने लगा था- “सब मालूम हो चुका है कि भिखारी हो चुके हो। इन्तजार उस दिन का है, जब बंगला और शोरूम नीलाम होंगे। मुझे कोई चिन्ता नहीं है। चिन्ता तो तुम्हें होनी चाहिये। मेरा और मेरे बच्चों का हाथ थामने वाले बहुत दौलतमंद लोग मौजूद हैं। वो मेरी खूबसूरती पर मरते हैं। कई ऑफर मुझे आ चुके हैं कि, रनवीर भंडारी खत्म हो चुका है। मैं चाहूं तो उनके साथ शादी कर सकती हूं। लेकिन पहले की तरह अब भी मैं जल्दी नहीं करूंगी। सब्र से काम लेते हुए, अंत तक, तुम्हारा अंत देखूगी कि फिल्म अभिनेत्री के दीवाने का अंत कैसा होता है। वो सब देखने में मुझे अच्छा लगेगा। उसके बाद मैं दूसरे मर्द का हाथ थामूंगी। शरीफ और दौलतमंद आदमी का हाथ।”

रनवीर भंडारी एकटक, नयना को थकी-सी निगाहों से देखता रहा।

नयना ने नफरत भरी निगाहों से उसे देखा और पलटकर बाहर निकलती चली गयी।

रनवीर भंडारी खाली-खाली निगाहों से उस दरवाजे को देखता रहा, जहां से नयना बाहर निकलकर गयी थी। उसे स्पष्ट तौर पर लगने लगा था कि अपनी अच्छी बीवी को, अपनी ही गलती की वजह से खो चुका है।

जाने कब तक वो इसी तरह खामोशी में कुर्सी पर बैठा रहा।

फोन की बेल ने उसकी सोचों को तोड़ा और हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया।

“हैलो।” आवाज इतनी धीमी थी कि जैसे सांस ले रहा हो।

“भंडारी साहब, नमस्कार।”

दूसरी तरफ प्रवेश गोदरा था। जो कि रनवीर भंडारी का खास आदमी था। वो उसका नौकर नहीं था। पार्टनर नहीं था। लेकिन जेवरातों के धंधे में उसे मोटे-मोटे फायदे कराकर अपना हिस्सा ले लेता था।

रनवीर भंडारी के जेवरात बिकवाने के लिये प्रवेश गोदरा मोटे ग्राहक पटाता था।

“कहाँ गोदरा।” धीमा स्वर ही था रनवीर भंडारी का।

“आप घर पर हैं। मैं तो आपके शो-रूम के केबिन में बैठा, कब से आपके आने का इन्तजार कर रहा हूं।”

“जेवरात खरीदने के लिये किसी को लाये...।”

“नहीं। अपना ही काम है।”

“क्या?”

“आप यहां आ नहीं रहे क्या?”

“अभी पक्का नहीं।” रनवीर भंडारी थके से स्वर में बोला- “तुम कहो।”

“हाथ तंग चल रहा है।” प्रवेश गोदरा की आवाज कानों में पड़ी- “खर्चे पानी के लिये पन्द्रह-बीस हजार।”

“अभी इन्तजाम नहीं है।”

“क्या-पन्द्रह-बीस हजार नहीं हैं।”

“गोदरा हैं तो बहुत, लेकिन पहले जरूरी-खर्चे निपटाने हैं। फिर...”

“जरूरी खर्चे? क्या मेरा खर्चा जरूरी खर्चों में नहीं आता भंडारी साहब।” प्रवेश गोदरा का शांत स्वर कानों में पड़ा- “सालों से मैं आपके लिये, यानि कि सिर्फ आपके लिये काम करता आ रहा हूं।

दूसरे ज्वैलर्स ने मुझे बुलाने के लिये कितना लालच दिया। लेकिन मैं, आपको छोड़कर नहीं गया। अब मुझे जरूरत पड़ी तो...।”

“गोदरा। मैंने हमेशा तुम्हें अपने दोस्त की तरह माना।”

“लेकिन।” उधर से प्रवेश गोदरा ने बात काटकर कहा- “मैं बिजनेस को बिजनेस की तरह लेता हूं। अपनी मेहनत को छोड़ता नहीं और जब कभी खुश होकर आपने इनाम के तौर पर ज्यादा देने की कोशिश की तो वो पैसे मैंने कभी लिए नहीं।”

रनवीर भंडारी ने गहरी सांस ली। टेबल पर रखे उन ‘बिलों’ को देखा जो नयना रख गयी थी।

“दो-तीन दिन बाद मुझे मिलना। शायद इन्तजाम हो जाये।” उसने धीमे स्वर में कहा।

“लेकिन...।” दूसरी तरफ से प्रवेश गोदरा ने कहना चाहा।

रनवीर भंडारी ने रिसीवर रख दिया। अपने हाथ तंग की वजह से वो अपने से ही उखड़ा हुआ था कि अपनी बेवकूफियों की वजह से उसका क्या हाल हो गया। अभिनेत्री को पाने की खातिर फिल्म न बनाता तो पहले की तरह, आज भी शानदार जिन्दगी बिता रहा होता, जबकि आज उसके पैसों के दम पर वो अभिनेत्री, शानदार जिन्दगी बिताने लगी है। टेबल पर पड़े बिलों को हाथ बढ़ाकर थामा और उठने को हुआ कि पुनः फोन की बेल बजी।

रनवीर भंडारी के चेहरे पर एकाएक तीखेपन के भाव आ गये। रिसीवर उठाते ही कह उठा।

“गोदरा तेरे को बोला है कि दो-तीन दिन के बाद मिलना। तब ही कुछ...।”

“भंडारी साहब।”

कहते-कहते एकदम चुप हो गया था रनवीर भंडारी।

जो स्वर उसके कानों में पड़ा था वो ज्वैलर्स संघ के अध्यक्ष लक्ष्मीचंद मित्तल का था।

“ओह मित्तल साहब।” रनवीर भंडारी संभला और जल्दी से कह उठा- “नमस्कार-नमस्कार।”

“लगता है, आपको किसी दूसरे के फोन का इन्तजार था।” दूसरी तरफ से लक्ष्मीचंद मित्तल का मुस्कुराहट से भरा स्वर कानों में पड़ा।

“ज-जी हां-जी हां।” वो कह उठा- “फारेन की पार्टी है। दो करोड़ के जेवरात खास डिजाईनों में मेरे से बनवाना चाहती है। लेकिन मेरे पास तो पहले से ही ऑर्डर बहुत है। लम्बी बुकिंग है। वक्त नहीं है और वो जल्दी पर जल्दी किए हुए है।”

“कभी-कभी ऐसी पार्टी भी टकरा जाती है। खैर, आप तो जानते ही हैं कि देश भर के नामी ज्वैलर्स मुम्बई में अपने जेवरातों के साथ इकठ्ठा होने वाले हैं। ये सारा इन्तजाम ज्वैलर्स संघ ने ही किया है। ऐसे में हमारी ही ड्यूटी बनती है कि इकट्ठे होने वाले जेवरातों को हम तगड़ी-से-तगड़ी सुरक्षा दें। कोई बुरा हादसा न हो।”

“आप ठीक कह रहे हैं।”

“इसके लिये सिक्योरिटी के और अन्य इन्तजाम कर लिये गये वो अपना काम ठीक से कर रहे हैं या नहीं, ये देखने के लिये हम लोगों ने चार समझदार लोगों को चुना है। उन चार में से एक नाम आपका भी रखा गया है। मेरे ख्याल से आप अपना कीमती वक्त निकालकर थोड़ा-सा समय हमें अवश्य देंगे।”

“क्यों नहीं।” रनवीर भंडारी कह उठा- “ये तो मेरा सौभाग्य है कि मुझे इतनी इज्जत दी जा रही है।”

“कब आपके पास वक्त होगा कि आपको सारी सिक्योरिटी के बारे में समझाया जा सके। ताकि आप इस बात को चैक कर सकें कि सिक्योरिटी के इन्तजाम ठीक से हो रहे हैं या नहीं। बाकी तीनों से भी मिल लीजियेगा जो इस काम में आपके साथ होंगे।” लक्ष्मीचंद मित्तल की आवाज कानों में पड़ी।

“इस काम के लिये तो मेरे पास वक्त ही वक्त है। आप जब कहेंगे, मैं पहुंच जाऊंगा।”

“अभी आ सकते हो।”

“पहुंच जाता हूं। कहां आना है।”

ये बात होने के बाद, रनवीर भंडारी ने रिसीवर रख दिया। सिर्फ एक ही बात सोच रहा था कि अगर ज्वैलर्स संघ के अध्यक्ष लक्ष्मीचंद मित्तल को मालूम होता कि वो फूटी कौड़ी का नहीं रहा। कर्जाई हो चुका है। आज उसकी साख खोखलेपन के खोल से ढकी हुई है तो इतनी बड़ी जिम्मेवारी में कभी भी उसे शामिल नहीं किया जाता।

तभी उसका हाथ अपने गाल पर पहुंच गया। जहां नयना का चांटा पड़ा था। साथ ही नयना का कहा एकाएक शब्द उसके कानों में गूंज रहा था। अपनी पत्नी का दोबारा विश्वास जीतने के लिये पुन: उसे दौलत मंद बनना होगा। आर्थिक स्थिति मजबूत होनी जरूरी थी, पहले की तरह। लेकिन वो जानता था कि ये सब सम्भव नहीं। लेनदारों ने जल्दी ही उसकी हर चीज नीलाम करवा देनी थी। सब खत्म हो गया था।

☐☐☐

प्रवेश गोदरा, रनवीर भंडारी का विश्वसनीय व्यक्ति था। पांच साल से वो पूरी तरह रनवीर भंडारी के साथ था। हीरों का जर्बदस्त पारखी था वो। हीरे-जवाहरातों की दलाली करना उसका पेशा था।

रनवीर भंडारी अक्सर किसी ऐसे आदमी की जरूरत महसूस करता था, जो उसके कामों की देखभाल कर सके। ऐसे में प्रवेश गोदरा उसे ठीक लगा तो उसे अपने साथ रख लिया। प्रवेश गोदरा ने धीरे-धीरे रनवीर भंडारी का विश्वास पूरी तरह जीत लिया था। उसे कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। रनवीर भंडारी का इशारा होते ही वो काम को फौरन पूरा कर देता था।

प्रवेश गोदरा की हर जरूरत को रनवीर भंडारी पूरी करता था।

दोनों में बढ़िया पट रही थी।

आज पहली बार गड़बड़ हुई कि रनवीर भंडारी ने पैसे देने से स्पष्ट इन्कार कर दिया था। प्रवेश गोदरा ने बात करने के बाद रिसीवर रखा और शोरूम से बाहर आ गया। सामने ही खड़ी कार में ड्राईविंग सीट पर कमल शर्मा बैठा था। जैसे वो रनवीर भंडारी का सहयोगी था। उसी तरह कमल शर्मा इस काम में उसका सहयोगी था। पास में ज्यादा काम आ जाने पर वो कुछ काम कमल शर्मा के हवाले कर देता था। कमल शर्मा पर गोदरा को पूरा विश्वास था। उसने काम में कभी भी हेराफेरी नहीं की थी। दोनों दोस्तों की तरह रहते थे। कपल शर्मा को ही जरूरत थी पैसों की तो, गोदरा ने रनवीर भंडारी से पैसे मांगे थे।

वो कार में बैठा तो, कमल शर्मा ने कार आगे बढ़ा दी।

“क्या हुआ?” उसे खामोश पाकर, कमल शर्मा बोला- “भंडारी से बात हुई?”

“वो अभी पहुंचा नहीं शो रूम मे। घर फोन किया तो मिला।”

प्रवेश गोदरा ने सोच भरे स्वर में कहा- “उसने मना कर दिया।”

“क्या?” कमल शर्मा हैरान हुआ- “पन्द्रह हजार देने को मना कर दिया।”

“हां।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा- “बोलता है हाथ तंग है।”

“भाड़ में गया हाथ तंग । उससे डेढ़-दो लाख लेना है। तुम अपना पैसा उससे मांग रहे...।”

“अपना हो या पराया। हाथ तंग है तो तंग है। देने को है नहीं तो देगा कहां से।” प्रवेश गोदा के चेहरे पर शांत मुस्कान उभरी- “मैं उसके काम का आदमी हूं। मेरे को वे दस लाख के लिये भी इन्कार नहीं करेगा। बशर्ते कि माल उसकी जेब में हो। फिल्म बनाकर वो खुद को तबाह कर चुका है। वो हीरोईन, भंडारी को पूरी तरह निचोड़ गयी है।”

“हिरोईन का बुखार भी तो, भंडारी के सिर पर चढ़कर बोल रहा था! तुमने समझाने की कोशिश की तो, तब तुम्हारी बात भी सुनने को तैयार नहीं हुआ था।” कमल शर्मा कड़वे स्वर में बोल पड़ा।

“दौलत और औरत, अक्सर इन्सान का दिमाग खराब कर देती है।”

“इसका मतलब, रनवीर भंडारी अब हमारे काम का नहीं रहा वो...”

“इतनी जल्दी फैसले पर मत पहुंचो।” कहते हुए प्रवेश गोदरा ने सिग्रेट सुलगा ली।

कमल शर्मा ने उसे देखा।

“क्या मतलब?”

“भंडारी ने बाजार की भारी रकम वापस करनी है। जल्दी वापस करनी है। उसे वापस दिए बिना, उसका गुजारा भी नहीं। और देने को जेब में पैसा नहीं।” प्रवेश गोदरा ने सोच भरे स्वर में कहा- “ऐसे में कोई तो उसे इन्तजाम करना ही पड़ेगा।”

“अब उसे कौन पैसा देगा?” कमल शर्मा के होठों से निकला।

“मालूम नहीं। लेकिन कहीं से उसे इन्तजाम करना पड़ेगा पैसे का। पैसे का इन्तजाम होने तक वो चैन से नहीं बैठेगा। अगर इन्तजाम नहीं हो पाया तो उसके शरीर पर पड़े कपड़े तक नीलाम हो जायेंगे।”

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दो दिन के बाद।

जगमोहन और सोहनलाल से बात हुई।

“हम खास कुछ सहीं मालूम कर पाये।” सोहनलाल ने गोली वाली सिग्रेट सुलगा ली।

“ठीक कहते हो। इस काम में ज्वैलर्स संघ के लोग बहुत सावधानी बरत रहे हैं।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा- “हम ये भी नहीं मालूम कर पाये कि वो जगह कौन सी होगी, जहां उन अरबों के जेवरातों को बेचने के लिये इकट्ठा किया जायेगा।”

“देर-सवेर में ये बात तो खुल ही जायेगी कि कहां पर जेवरातों को रखा जा रहा है।”

“मात्र ये बात मालूम होने से काम नहीं चलने वाला हमारा।”

जगमोहन एक-एक शब्द पर जोर देकर कह उठा- “इस सिलसिले में हमें एक-एक बात मालूम होनी चाहिये। तभी देवराज चौहान से बात कर सकेंगे।”

कश लेता सोहनलाल, जगमोहन को देखने लगा।

“क्या हुआ?”

“मेरी पहचान का एक ज्वैलर्स है। दो साल पहले मैंने उसे दस लाख का हेरा-फेरी का माल बेचा था।” सोहनलाल ने कहा- “इस मामले के बारे में उससे पूछा जा सकता है।”

“वो बतायेगा?”

“पक्का बतायेगा। मेरे को देखकर तो वो घबरा जायेगा कि उस दस लाख की खरीददारी की बात न खुल जाये। वो नहीं चाहेगा कि मैं उसके पास ज्यादा देर ठहरूं। ऐसे में वो जल्द-से-जल्द बताकर, मुझे अपने पास से दफा करना चाहेगा।”

“पहले क्यों नहीं सोची ये बात?”

“अब सोच ली। यही बहुत है।”

“चल। उसके पास अभी चलते हैं।”

“तुम नहीं। उसके पास में ही जाऊंगा। इन बातों में वो अंजान आदमी को सामने पाकर, मुंह नहीं खोलेगा।”

“ठीक है।”जगमोहन बोला- “उससे ज्यादा से ज्यादा जानकारी मालूम करने की चेष्टा करना।”

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अगले दिन प्रवेश गोदरा, शोरूम के केबिन में, रनवीर भंडारी से मिला।

“लगता है। कल आप बहुत व्यस्त रहे।” गोदरा बैठता हुआ कह उठा- “मैंने शाम को भी फोन किया लेकिन…”

“हां।” रनवीर भंडारी ने शांत भाव में सिर हिलाया- “देर रात तक मैं मित्तल साहब के साथ था।”

“मित्तल साहब।” प्रवेश गोदरा की आंखें सिकुड़ी- “ज्वैलर्स संघ के अध्यक्ष लक्ष्मीचंद मित्तल की बात तो नहीं कर रहे।”

“उन्हीं की बात कर रहा हूं।” रनवीर भंडारी बोला- “कुछ दिनों बाद हीरे-जेवरातों की प्रदर्शनी हो रही है। देश भर के ज्वैलर्स अपने नायाब, नये डिजाईनों वाले कीमती जेवरातों के साथ मुम्बई में इकट्ठे हो रहे हैं। उन्हें खरीदने के लिये देश-विदेश के धनी व्यक्तियों को बुलावा दिया गया है। अरबों के जेवरात इकट्ठे होंगे। ऐसे में उनकी सुरक्षा के प्रबन्धों का इन्तजाम किया गया है और उन सुरक्षा प्रबंधों के इन्तजाम पर नजर रखने के लिये चार व्यक्तियों के ऊपर जिम्मेवारी सौंपी गयी है। उन चार में से एक मैं हूं।”

“ओह।”

“कल सारे सुरक्षा इन्तजाम मुझे और उन तीनों को समझाये गये। ताकि हम देख सकें कि सब काम ठीक से हो रहे हैं या नहीं।” रनवीर भंडारी बोला- “इसी में कल का वक्त लगा।”

“बहुत जिम्मेवारी वाला काम आपको सौंपा गया है।” प्रवेश गोदरा ने, भंडारी की आंखों में झांका।

रनवीर भंडारी ने हौले से सिर हिलाया।

“अभी।” प्रवेश गोदरा धीमे स्वर में कह उठा- “ये बात नहीं खुली कि फिल्म बनाने के चक्कर में, आप पचास करोड़ के कर्जदार हो चुके हैं और इन रुपयों को चुका पाने की स्थिति में नहीं हैं और भविष्य में भी आपके पास ऐसा कोई रास्ता नहीं कि, इन पैसों का इन्तजाम करके, लोगों को पैसा वापस दे सकें।”

रनवीर भंडारी के होंठ भिंच गये।

“मित्तल साहब ने इतनी बड़ी जिम्मेवारी का हमराज आपको इसलिए बना लिया कि, वो यही समझ रहे हैं कि आप सम्पन्न जौहरी हैं, पहले की तरह। नई स्थिति को वो नहीं जानते कि एक घटिया हीरोईन के फेर में पड़कर आपने अपने को बरबाद कर लिया है।”

गोदरा गम्भीर था- “मेरे ख्याल से आप इतने बड़े कर्जे से नहीं उभर सकते।”

रनवीर भंडारी देर तक खामोश रहा फिर कह उठा।

“तुम्हारा डेढ़-दो लाख रुपया मैं अवश्य दे दूंगा।”

“आप मुझे गलत समझ रहे हैं भंडारी साहब। मुझे अपने तिनके जैसे पैसे की परवाह नहीं है। मैं तो आपके बारे में सोच रहा हूं। मैं अपना सब कुछ देकर आपकी हालत ठीक कर सकता होता तो मुझे खुशी होती। ये ठीक है कि कभी हमारे सम्बन्ध बिजनेस की वजह से बने थे। लेकिन आज हममें अपनापन है। मुझे सच में दुःख है कि आप इस हाल तक पहुंच गये। जब आपने फिल्म बनाने के बारे में बताया तो मैंने आपको रोकने की कोशिश की थी कि ऐसा मत कीजिये।

हीरे-जेवरातों का काम करने वालों के लिये, फिल्म बनाना अच्छा काम नहीं है। लेकिन आप तो उस हिरोईन...।”

“चुप हो जाओ गोदरा।” रनवीर भंडारी गहरी सांस लेकर कह उठा।

प्रवेश गोदरा, उसके फीके चेहरे को देखने लगा

“मेरे मुंह से ये शब्द भी अब अच्छे नहीं लगते कि,फिल्म बनाकर मैंने गलती की। क्योंकि इन शब्दों का इस्तेमाल बहुत बार कर चुका में हूं।” रनवीर भंडारी ने सूखे होठों पर जीभ फेरी- “इस वक्त मैं ये नहीं सोचता कि मुझे कितना और कहां-कहां नुकसान हुआ। सोचने को मेरे पास ये हैं कि पचास करोड़ की रकम मैं नहीं चुका सकता और देनदारों को जल्दी ही मेरी स्थिति का एहसास हो जायेगा। तब वो मेरा बंगला ये शो रूम और मेरी हर प्रोपर्टी को निलाम कर देंगे। मेरा परिवार खत्म हो जायेगा। मेरी पत्नी मेरा साथ छोड़ देगी। बच्चे मुझे पसन्द नहीं करेंगे। सच तो ये है कि आज मैं पूरी तरह बरबाद हूँ।

प्रवेश गोदरा ने गहरी सांस ली और उठ खड़ा हुआ।

“आप जैसा बढ़िया इन्सान कहीं का नहीं रहा इस बात का मुझे हमेशा अफसोस रहेगा।”

रनवीर भंडारी सूनी निगाहों से गोदरा को देखता रहा।

“मेरे लायक कोई सेवा हो तो बता दीजियेगा।”

“गोदरा।” वो थके स्वर में बोला- “क्या सब कुछ ठीक नहीं हो सकता?”

“हो सकता है अगर आप अपना सारा कर्जा चुका दें। सारा काम पहले की तरह चलने लगेगा।”

“सारा कर्जा? पचास करोड़ रुपये।” रनवीर भंडारी बड़बड़ा उठा- “असम्भव। इतने पैसे का इन्तजाम कभी नहीं हो सकता। सब कुछ खो दिया मैंने। घर-बिजनेस और अब वो दिन भी दूर नहीं कि अपनी जिन्दगी भी मुझे खत्म करनी पड़ेगी। बिना पैसे वाली जिन्दगी मैं नहीं जी सकूँगा। लोगों से नजरें नहीं मिला सकूँगा। तब खुद को खत्म करना पड़ेगा मुझे।”

उसे देखते हुए प्रवेश गोदरा सोच रहा था कि वो सच कह रहा है। वो एक ऐसा अमीर इन्सान था कि दौलत ही उसकी जिन्दगी थी।

दौलत नहीं तो जिन्दगी भी नहीं। फुटपाथ पर वो नहीं रह सकेगा।

आत्महत्या ही उसे कष्टों से मुक्ति दे सकेगी।

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शाम को सोहनलाल और जगमोहन की मुलाकात हुई।

“कुछ पता चला?” जगमोहन ने पूछा।

“हां। दो-तीन बढ़िया खबरें हैं।” सोहनलाल बोला- “एक तो ये कि मुम्बई के किसी होटल में जेवरातों की बिक्री के लिये, हाल किराये पर लिया गया है।”

“होटल का नाम नहीं पता चला?”

“नहीं।” सोहनलाल ने इन्कार में सिर हिलाया- “उस ज्वैलर्स ने बताया है कि होटल के उस हॉल में सुरक्षा इन्तजामों पर ध्यान दिया जा रहा है। इसलिये होटल का नाम चंद खास लोगों को ही मालूम है। जब सुरक्षा इन्तजाम पूरे हो जायेंगे, जो कि होने ही वाले हैं तो होटल का नाम भी सबको बता दिया जायेगा। तब अखबारों में इश्तिहार दिया जायेगा कि फलां-फलां दिन से उस होटल में,जेवरातों की बिक्री अथवा जो भी प्रोग्राम होगा, घोषणा की जायेगी।”

“और?”

“और ये कि शहर के चार ज्वैलर्स को सुरक्षा इन्तजामों की देख-रेख की जिम्मेवारी सौंपी गयी है कि सुरक्षा के इन्तजाम करने वाले, ठीक ढंग से सारे इन्तजाम कर रहे हैं या नहीं? इस बात को वे समय-समय पर चैक करते रहेंगे। उन चारों ज्वैलर्स के बारे में, उसने मुझे बता दिया है।”

“ये अच्छी खबर है।”जगमोहन के होठों से निकला- “कौन-कौन से हैं वो चारों ज्वैलर्स, जो सुरक्षा इन्तजामों की देख-रेख कर रहे हैं।”

सोहनलाल ने चारों के नाम-पते बताये।

जगमोहन चेहरे पर सोचो के भाव समेटे, सोहनलाल को देखता रहा

“सोहनलाल।”जगमोहन ने गम्भीर स्वर में खामोशी तोड़ी- “इन चारों में से कोई भी एक हमारे काम का हो सकता है।”

“क्या मतलब?”

“कौन से होटल के हॉल में वो हीरे-जेवरात रखे जायेंगे। ये बात तो हम इन ज्वैलर्स पर नजर रखकर मालूम कर सकते हैं। परन्तु इससे भी जरूरी बात है, जो ये जानते हैं। अगर वो बात हमें मालूम...।”

“सुरक्षा इन्तजामों के बारे में कह रहे हो।” सोहनलाल ने टोका।

“हां। ये चारों जानते हैं कि अरबों के जेवरातों पर, जब उन्हें होटल के हॉल में रखा जायेगा तो, क्या-क्या सुरक्षा के इन्तजाम होंगे। कैसे इन्तजाम होंगे।” जगमोहन ने सोहनलाल की आंखों में देखा- “अगर इनसे हमें जेवरातों पर हो रही सिक्योरिटी के बारे में मालूम हो जाये तो, जेवरातों पर आसानी से हम हाथ डाल सकेंगे।”

“बेवकूफों वाली बात कह रहे हो।”

जगमोहन, सोहनलाल को देखता रहा।

“जिन चारों ज्वैलर्स पर सुरक्षा व्यवस्था की देख-रेख सौंपी गयी है, सौंपने वालों ने बहुत सोच-समझकर ही ये काम उन्हें दिया होगा। वे गड़बड़ वाले समय में मामला संभालने की हिम्मत रखते होंगे।”

सोहनलाल बोला- “वे हमें क्यों बतायेंगे कि अरबों के जेवरातों की सिक्योरिटी के लिये क्या-क्या इन्तजाम किए गये हैं।”

“पत्थरों का मुंह खुलवाने के लिये, जरूरी तो नहीं कि उन पर चोट मारी जाये। अपना दर्द तो हर कोई सहन कर लेगा, लेकिन कभी-कभी खास अपनों का दर्द सहन करना कठिन हो जाता है।”

जगमोहन का स्वर शांत था।

सोहनलाल चौंककर जगमोहन को देखने लगा।

“क्या कहना चाहते हो?”

“तुम अच्छी तरह समझ रहे हो कि मैं क्या कहना चाहता हूं।”

जगमोहन ने कहा- “लेकिन अभी ये सब करने की जरूरत नहीं। इन चारों में से कोई एक हमारे काम का है या नहीं। ये मालूम करना होगा।

अच्छा तो यही होगा कि कोई एक हमारे काम का निकल आये। तब हमें ज्यादा परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।”

सोहनलाल, जगमोहन को देखता रहा।

“क्या सोच रहे हो?” जगमोहन ने टोका।

“मुझे नहीं लगता कि इन चारों में से कोई हमारे काम आयेगा। कोई हमें नहीं बतायेगा कि अरबों के जेवरातों को कैसी सिक्योरिटी में रखा जायेगा।” सोहनलाल ने सोच भरे स्वर में कहा- “इन चारों में से अगर किसी को अपनी जान या अपने परिवार की जान ज्यादा प्यारी है तो उसे रिवॉल्वर के दम पर ये सब बातें पूछी जा सकती।”

“ठीक कहते हो। ये तो करना ही होगा। अगर ऐसा करना पड़ा तो उसे अपने पास ही तब तक कैद में रखना होगा, जब तक कि डकैती को अंजाम न दे दें। अगर आजाद हो गया तो वो ये बात खोल सकता है कि रिवॉल्वर के दम पर उससे सब कुछ पूछ लिया गया है। ऐसे में या तो जेवरातों को बेचने का प्रोग्राम कैंसिल हो जायेगा। या फिर सिक्योरिटी का सिस्टम बदल दिया जायेगा या बेहद तगड़ी सिक्योरिटी का इन्तजाम किया जायेगा। वे सतर्क हो जायेंगे।” जगमोहन ने कहा- “मेरे ख्याल में हमें इन चारों ज्वैलर्स के बारे में जानकारी इकट्ठी करनी चाहिये, जो अरबों के जेवरातों की सुरक्षा-व्यवस्था की देख-रेख कर रहे हैं। उसके बाद सोचेंगे कि क्या करना है।”

“दो के बारे में तुम जानकारी इकट्ठी करो।” सोहनलाल बोला- “दो के बारे में मैं। इस तरह काम जल्दी निपट जायेगा।”

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