इंजन की तेज आवाज कानों में पड़ रही थी।
विमान की आधी से ज्यादा सीटें यात्रियों से भरी हुई थी। उन्हीं यात्रियों में मोना चौधरी और महाजन भी मौजूद थे। मोना चौधरी ने हल्का सा मेकअप करके चेहरा बदल रखा था। सीधे तौर पर उसे पहचान पाना सम्भव नहीं था कि वो मोना चौधरी है। इस मेकअप में वो ही अनुभवी आंखें उसे पहचान सकती थी, जिन्होंने पहले बहुत अच्छी तरह उसे देख रखा हो।
मोना चौधरी और महाजन दिल्ली के इन्दिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से असम में किसी खास काम के लिए जा रहे थे। जाने का प्रोग्राम दो दिन पहले से तय था। टिकट पहले ही बुक थी।
इस वक्त विमान में बातचीत का हल्का-सा शोर था।
तभी विमान में एक बूढ़े ने प्रवेश किया। प्रवेश द्वार पर स्वागत के लिए खड़ी दो एयर होस्टेज में से एक ने उसकी टिकट देखी फिर दूसरी को उसकी टिकट थमाई, तो वो उस बूढ़े यात्री को लेकर उसकी सीट पर बिठाने के लिए एक तरफ बढ़ गई। प्रवेश द्वार पर खड़ी रह गई होस्टेज ने हाथ में पकड़ी लिस्ट में एक नाम के आगे निशान लगाया। उसके बाद सारी लिस्ट चेक की और तसल्ली से सिर हिलाते हुए विमान के आगे वाले हिस्से की तरफ बढ़ गई।
“मैम।” तभी एक यात्री ने टोका –“प्लेन कब तक टेक ऑफ होगा?”
“सब यात्री आ चुके हैं और टेक ऑफ का वक्त भी हो चुका है।” एयर होस्टेज ने मुस्करा कर कहा –“मेरे ख्याल से हम दस-बारह मिनट में जमीन छोड़ देंगे सर।”
जवाब में यात्री मुस्कराया।
एयर होस्टेज आगे बढ़ गई।
बीस मिनट बाद विमान ने रनवे छोड़ा और आकाश की ऊंचाइयों को छूता चला गया। घोषणा के बाद यात्रियों ने सीट बेल्टें खोली और बातों में लग गए। तीन एयर होस्टेज यात्रियों के बीच नजर आने लगी ताकि उनकी चाय-कॉफी कोल्ड ड्रिंक और स्नैक्स की जरूरत को पूरा किया जा सके।
महाजन ने व्हिस्की की भरी, छोटी सी चपटी बोतल निकाली और मोटा-तगड़ा घूँट भरकर उसे बंद करके वापस कमर में पैंट के साथ फंसा लिया।
“महाजन।”
“कहो बेबी।” कहते हुए महाजन ने गर्दन घुमाकर उसे देखा।
मोना चौधरी ने सीट की पुश्त से सिर टिकाकर आंखें बंद कर रखी थी।
“विशाल सिंह ने असम में खास जगह पर किसी से मिलकर उसकी मुसीबत दूर करने को कहा है। इस काम को उसने एडवांस में भारी कीमत दी है।” आंखें बंद किए मोना चौधरी शांत स्वर में कह रही थी –“मैंने काम करना स्वीकार कर लिया। लेकिन जो बात तब से खटक रही है, वो अब कह रही हूं।”
“क्या?”
“विशाल सिंह ने इस काम का लाखों रुपया हमें दिया, जबकि उसके पास ऐसे आदमी हैं, जो इन कामों को अंजाम दे सकें। पूरा कर सकें। फिर हमें ही इस काम के लिए...।”
“बेबी।” महाजन ने टोका –“ये विशाल सिंह की समस्या है। होगी कोई बात कि वो खुद इस मामले में खुलकर नहीं आना चाहता होगा। तभी तुमसे बात की। मेरे ख्याल में इस मामले में सोचने की जरूरत नहीं है।”
मोना चौधरी ने आंखें खोली, महाजन को देखा फिर पुनः पुश्त से सिर टिकाकर आंखें बंद कर ली।
विमान अपनी रफ्तार के साथ ऊंचाई पर पहुंच चुका था।
इसी वक्त।
इसी विमान में।
वो व्यक्ति मोबाइल पर, धीमे स्वर में बात कर रहा था।
“तुमने कहा था कि मैं, राजू के साथ विमान में पहुंच जाऊं, पहुंच गया।” फोन पर बात करते हुए उसकी आंखें हर तरफ सतर्कता से घूम रही थी –“तुमने कहा था कि तुम मुझे ऐसा काम करने को कहोगे, जो कि कीमत के हिसाब से मामूली होगा, यानी कि कीमत बहुत बड़ी। बोलो, अब क्या करना है मुझे।”
“वो ही मामूली काम, जिसकी कीमत बहुत बड़ी है।” जो स्वर उसके कानों में पड़ा, उस आवाज को पाठक बन्धु करोड़ों आवाजों में भी पहचान सकते हैं कि दूसरी तरफ से बख्तावर सिंह बोल रहा है। पाकिस्तानी मिलिट्री का खतरनाक थम्ब जिसके ओहदे के बारे में पाकिस्तान में उसके करीबी लोग भी नहीं जानते थे। परन्तु उसकी पहुंच हर जगह थी। मोना चौधरी से उसकी टक्कर कई बार हो चुकी थी। बराबर की टक्कर रही दोनों में । दोनों एक-दूसरे को खत्म कर देना चाहते थे। परन्तु कामयाब कोई नहीं हो पाया था।
बख्तावर सिंह इस वास्ते मोना चौधरी को खत्म कर देना चाहता था कि मोना चौधरी अक्सर उसके खास-खास मिशनों को खत्म कर देती है। टक्कर पर खड़ी हो जाती है। जबकि आधी बार तो ये सब इत्तेफाक से ही हुआ था और मोना चौधरी, बख्तावर सिंह को इसलिए खत्म करना चाहती है कि उनमें दुश्मनी की बुनियाद गहरी हो चुकी है और बख्तावर सिंह पाकिस्तान को अपना देश मानते हुए हिन्दुस्तान को नुकसान पहुंचाता रहता है।
“काम बोलो बख्तावर सिंह।” वो बोला –“तुम जानते हो कि मैं हर काम पूरा करना जानता हूं । बदले में मुझे दौलत अपनी पसन्द की चाहिए। मैं...।”
“दौलत तुम्हें अपनी पसन्द की हमेशा मिलती रही...।”
“काम बोलो बख्तावर सिंह...इस वक्त मैं विमान में हूं।”
दो पलों तक खामोशी रही फोन पर।
विमान में अब बातचीत और शोर कम-सा होने लगा था।
“जसबीर वालिया।” बख्तावर सिंह का गम्भीर स्वर कानों में पड़ा –“तुम जिन यात्रियों के बीच में बैठे हो। उसमें मोना चौधरी और महाजन है।”
“मोना चौधरी और महाजन?” जसबीर वालिया के माथे पर बल उभरे। आवाज धीमी थी।
“हिन्दुस्तान की इश्तिहारी मुजरिम मोना चौधरी और...।”
“उसका साथी नीलू महाजन।” जसबीर वालिया ने टोका –“सुन रखा है, दोनों का नाम। वो विमान में हैं?”
“तो–आगे बोलो।”
“मोना चौधरी को खत्म करना है।” बख्तावर सिंह की आवाज कानों में पड़ी।
“खत्म करना है।” जसबीर वालिया के होंठों से निकला।
“हां।”
“बख्तावर सिंह।” जसबीर वालिया की आवाज में तीखापन आ गया –“तुम मजाक कब से करने लगे। अगर मोना चौधरी को खत्म करना है तो इसके लिए नीचे ही सब कुछ हो सकता है। विमान में ये सब करना...।”
“मैंने मोना चौधरी को खत्म करने की कई बार चेष्टा की, लेकिन वो बच निकली।” बख्तावर सिंह की आवाज सख्त सी हो गई –“लेकिन विमान में वो अपना बचाव नहीं कर सकती अगर तुम ठीक से अपने काम को अंजाम दो तो।”
“आपकी, मोना चौधरी से क्या दुश्मनी जो...।”
“अपने काम से मतलब रखो। सवाल मत पूछो।”
जसबीर वालिया कुछ पलों की खामोशी के बाद कह उठा।
“विमान में किसी की जान लेने का मतलब है, खुद को मुसीबत में...।”
“ऐसा कुछ नहीं होगा।”
“क्या मतलब?”
“मेरी योजना सुनकर काम करो। सब कुछ ठीक ढंग से हो जाएगा।” बख्तावर सिंह के स्वर में सख्ती आ गई।
“कैसी योजना?”
बख्तावर सिंह की आवाज उसके कानों में पड़ने लगी।
कान पर छोटा सा मोबाइल फोन लगाये वो, बख्तावर सिंह की योजना सुनता रहा।
पूरी योजना सुनते ही जसबीर वालिया के चेहरे पर गम्भीरता आ गई।
बगल की सीट पर बैठे राजू की निगाह, उसके चेहरे पर उभरे भावों पर टिकी थी।
जसबीर वालिया के होंठों में खिंचाव आ गया था। राजू ने उसे कोहनी मारी और धीमे से बोला।
“क्या हुआ?”
जसबीर वालिया ने उसे देखा। कुछ कहने को हुआ कि बख्तावर सिंह की आवाज कानों में पड़ी।
“वालिया। खामोश क्यों हो गया –मेरी योजना पसन्द नहीं आई?”
“मुझे वक्त दो। मैं...।”
“वक्त कम है। तुम...।”
“दो मिनट बाद मैं तुम्हें इसी नम्बर पर फोन करता हूं।” कहकर जसबीर वालिया ने फोन बंद करके मुट्ठी में दबा लिया। बगल की सीट पर बैठे राजू से उसकी नजरें मिली।
“क्या हुआ?” राजू की निगाह उसके गम्भीर, सख्त हो चुके चेहरे पर टिकी थी।
“इस विमान में इश्तिहारी मुजरिम मोना चौधरी और उसका साथी महाजन है।” जसबीर वालिया एक-एक शब्द चबाकर भिंचे स्वर में कह उठा –“बख्तावर सिंह कहता है कि उन दोनों को खत्म करना है।”
“खत्म करना है –विमान में?” राजू के होंठों से निकला।
“इसके लिए बख्तावर सिंह ने योजना भी बनाई है। वो यकीनन सुरक्षित योजना है। उस योजना को पूरा करने के लिए हौसले की जरूरत है, जो कि हमारे पास है।” जसबीर वालिया ने दबे स्वर में कहा।
“हमारे पास दौलत नहीं है।”
“दौलत बख्तावर सिंह देगा।”
“बोला उसने?”
“हां।”
पलों की खामोशी के बाद राजू ने कहा।
“बख्तावर सिंह हमें हमेशा कहता है कि हिन्दुस्तान में बड़े से बड़ा आतंक फैलाओ। जितना बड़ा आतंक, नोटों का सूटकेस उतना ही बड़ा। पहले उसने इस तरह किसी की हत्या करने को नहीं कहा।”
“मोना चौधरी से उसकी लगती है। बख्तावर सिंह की बातों से लगा कि वो मोना चौधरी को खत्म करने को बेताब है।”
दोनों कई पलों तक एक-दूसरे को देखते रहे।
“बख्तावर सिंह मेरे फोन का इन्तजार कर रहा है।” जसबीर वालिया बोला।
“क्या योजना बताई-बख्तावर सिंह ने?”
जसबीर वालिया ने बख्तावर सिंह की बताई योजना राजू को बताई।
“साला हमें बेवकूफ समझता है।” राजू के होंठों से निकला।
“क्या हुआ?”
“एक सूटकेस देकर वो हमसे दो काम लेना चाहता है।” राजू की धीमी आवाज में हल्का-सा कड़वापन आ गया –“इधर वो हमारा सहारा लेकर मोना चौधरी को खत्म करवा देना चाहता है और उधर जब यात्रियों से भरा प्लेन आसमान में तबाह होगा तो आतंक भी फैलेगा।”
“हां।”
“इस काम के बदले नोटों से भरे दो सूटकेस मिले तो ये काम किया जाएगा। नम्बर मिला।” राजू ने कहा –“मैं बात करता हूं बख्तावर सिंह से। काम में इस तरह की चालाकियां हमारे साथ करेगा तो हम दूसरे के लिए काम करना शुरू कर देंगे। हमारे पास पार्टियों की कमी नहीं है।”
तब तक जसबीर वालिया हाथ में दबे नन्हे से मोबाइल से खेलने लगा था। साथ ही बोला।
“बख्तावर सिंह अपने काम पूरे देखना चाहता है। नोटों से भरे सूटकेस देने में उसने कभी एतराज नहीं किया।”
“हरामी है वो। अपनी मां का भी सगा नहीं। वो तो...”
तभी उधर लाइन मिल गई थी।
“हैलो।” बख्तावर सिंह की आवाज कानों में पड़ी।
“राजू तुमसे बात करेगा।” जसबीर वालिया ने कहा।
“कराओ।”
जसबीर वालिया ने फोन राजू को दिया।
“बख्तावर।” राजू शांत स्वर में बोला –“योजना बनाना बहुत आसान होता है, लेकिन उसे अंजाम देना आसान नहीं होता।”
“जो कहना चाहते हो, वो कहो।” बख्तावर सिंह का शांत-सपाट स्वर कानों में पड़ा।
“तुम्हारी योजना मौत के सामान से कम नहीं है हमारे लिए।” राजू बोला –“फिर भी दौलत के लिए हम इस काम को पूरा कर देंगे। लेकिन तुम इस वक्त हमसे दो काम लेना चाहते हो। मोना चौधरी को खत्म करवाने के साथ-साथ जब विमान आकाश में विस्फोट के साथ तबाह होगा तो आतंक भी फैलेगा। जबकि हम तुम्हारे भाड़े के टट्टू हैं। आतंक फैलाने के तुमसे पैसे लेते हैं। किसी एक की हत्या करने के लिए नहीं।”
“बात पूरी बोलो। खत्म करो।”
“ये दो काम हैं और बड़े नोटों के दो बड़े सूटकेस मिलने चाहिए।” राजू ने दृढ़ता भरे स्वर में कहा।
“मिल जाएंगे।”
“काम हो गया समझो। हम अभी एक्शन में आ रहे हैं। नोटों के दोनों सूटकेस वहीं पहुंचा दो, जहां अक्सर तुम्हारे आदमी सूटकेस पहुंचा जाते हैं। हम वहीं पहुंच रहे हैं।”
“तुम लोगों के वहां पहुंचने से पहले, नोटों के दोनों सूटकेस पहुंच जाएंगे।”
“भविष्य में हमसे दो काम लो तो सूटकेस दो देने की बात किया करो। समझे बख्तावर सिंह।”
“इस बात का मैं खास ध्यान रखूंगा।” बख्तावर सिंह का सपाट-गम्भीर स्वर राजू के कानों में पड़ा।
“अब काम की बात बताओ।” राजू बोला –“मोना चौधरी को हम कैसे पहचानेंगे?”
“उसने जींस की पैंट और मेंहदी रंग की कॉटन की रफ शर्ट पहन रखी है। साथ में महाजन ने सफेद रंग की शर्ट और लाल जैसे रंग की टाई लगा रखी है, उनका सीट नम्बर 31-32 है। मेरे ख्याल में इतना काफी है उन्हें पहचानने के लिए। वो किसी अन्य नम्बर वाली सीट पर भी बैठे हों तो...।”
“पहचान लेंगे। वो काला बैग कहां है, जिसके बारे में तुमने जसबीर को बताया था।”
“तुम्हारे सिर के ऊपर लगेज रैक में पड़ा है।”
राजू की निगाह फौरन ऊपर गई।
ऊपर से जरा पीछे काला एयर बैग लगेज रैक में दिखा।
“दिखा बैग।” राजू बोला –“तेरा काम हो जाएगा बख्तावर सिंह।”
“वक्त कम है।”
“हमें कम वक्त में ही बढ़िया काम करने की आदत है। बैग में क्या-क्या है, बोल...”
“दो पैराशूट, टाइमबम, रिवॉल्वर, जरूरत का हर वो सामान –जिसकी तुम्हें इस वक्त जरूरत पड़ेगी। सावधानी से काम करना है तुम लोगों को –मोना चौधरी बहुत खतरनाक है। कितनी खतरनाक है, तुम नहीं समझ सकोगे। उसे अगर जरा भी एहसास हो गया कि प्लेन में कोई खेल खेला जाने वाला है तो फिर तुम लोग सफल नहीं हो सकोगे।”
“अब मोना चौधरी कुछ नहीं कर सकेगी। तुम नोटों से भरे दोनों सूटकेस वहां पहुंचा दो। इधर की फिक्र न करो। समझो काम पूरा हो गया।” कहने के साथ ही राजू ने फोन बंद किया।
जसबीर वालिया ने फोन उसके हाथ से लिया और अपनी जेब में डाल लिया।
“बख्तावर सिंह दो सूटकेस देने को तैयार है।” राजू बोला।
“मैंने पहले ही कहा था कि दौलत देने से वो मना नहीं करता। काम पूरा हुआ देखना चाहता है।” जसबीर वालिया ने गम्भीर स्वर में कहा –“मोना चौधरी और महाजन कैसे पहुंचे विमान में हम नहीं जानते। लेकिन बख्तावर को खबर थी पहले से ही कि वो विमान में जाएंगे। तभी तो हमें विमान में सीट बुक कराने को कहा। यानी कि बख्तावर सिंह पहले से ही मोना चौधरी पर नजर रखे था और योजना बना रहा था उसे मौत देने की। नोटों के दम पर ही उसने वो काला एयर बैग लगेज रैक में पहुंचा दिया। इसमें कोई शक नहीं कि बख्तावर सिंह की हर योजना बहुत ठोस होती है। हर पहलू पर गौर करके ही वो योजना बनाता है। मेरे ख्याल में हम वक्त बरबाद कर रहे हैं। विमान को जमीन छोड़े बीस मिनट हो चुके हैं। हमें अपना काम शुरू कर देना चाहिए।”
“खतरनाक काम है।” राजू जहरीले अंदाज में मुस्कराया –“लेकिन हम पूरा कर देंगे। हम हमेशा सफल हुए हैं जसबीर।”
दोनों की नजरें मिली।
“राजू।” जसबीर वालिया का स्वर गम्भीर था –“ये ऐसा खतरनाक काम है, जिसे हम पहली बार कर रहे हैं।”
“हां। लेकिन हम कर लेंगे।” राजू शब्दों को चबाकर बोला।
“कर तो लेंगे।” जसबीर वालिया ने गहरी सांस ली –“हमारा धंधा ही ऐसा है कि हर मिले काम को पूरा करके, धंधे में पांव जमाए रख सकते हैं। हमें काम की अपेक्षा, काम पूरा करने की कीमत मिलती है। हमें जुबान से निकले शब्दों की कीमत मिलती है कि हम जो कह रहे हैं सच कह रहे हैं। काम पूरा करने को कहा है तो पूरा हो जाएगा। बरसों बीत गये इस काम को करते हुए, कोई भी काम अधूरा नहीं छोड़ा।”
“ये काम भी पूरा होगा।” राजू की दृढ़ता भरी धीमी आवाज में खतरनाक भाव आ गए थे।
जसबीर वालिया ने विमान में हर तरफ नजर मारी।
होस्टेज उनके पास से जा चुकी थी।
यात्री अपने में व्यस्त नजर आ रहे थे।
“मोना चौधरी को हम कैसे पहचानेंगे...मैंने तो उसे कभी नहीं...”
“देखा मैंने भी नहीं।” राजू ने टोका –“बख्तावर सिंह ने मोना चौधरी का हुलिया बताया है, मैं उसे पहचान लूंगा।”
जसबीर वालिया ने गर्दन घुमाकर, लगेज रैक पर मौजूद काले रंग के एयरबैग को देखा फिर विमान में नजरें घुमाते धीमे स्वर में कह उठा।
“मैं उस बैग को लेकर बाथरूम में जा रहा हूं। तुम देखो विमान में मोना चौधरी कहां है। उसकी पहचान करके फौरन बाथरूम में पहुंचो। अब मैं ये काम फौरन कर देना चाहता हूं। पैराशूट बांधने हैं। बम फिक्स करने हैं। हो सकता है, मोना चौधरी या महाजन या फिर कोई अन्य ही काम के दौरान हम पर हाथ डालने की चेष्टा करे। हमें हर तरह के हालात के लिए खुद को तैयार रखना है और काम को हर हाल में पूरा करना है।” कहने के साथ ही वालिया उठा और सीट से बाहर आकर लगेज रैक से काला एयर बैग उठाया और बाथरूम की तरफ बढ़ गया।
चालीस बरस का जसबीर वालिया समझदार, चालाक और फुर्तीला व्यक्ति था। देखने में वो शरीफ और किसी बिजनेसमैन जैसा लगता था।
राजू उससे दो-तीन साल छोटा था। देखने में वो मध्यमवर्गीय परिवार से वास्ता रखता लगता था। उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे जिन्दगी में उसने बहुत मेहनत की हो और कर रहा हो। यानी कि उन दोनों के बारे में कोई भी नहीं सोच सकता था कि वो खतरनाक इंसान हैं । ऐसे खतरनाक इंसान कि जो अपने काम को पूरा करने की खातिर कुछ भी कर सकते हैं।
☐☐☐
जसबीर वालिया काले एयरबैग के साथ विमान के एक बाथरूम में पहुंचा और भीतर से दरवाजा बंद करके बैग खोला तो उसमें दो मीडियम साइज के बॉक्स मौजूद थे। उसने एक बॉक्स खोला तो उसमें पैराशूट और रिवॉल्वर मिला। उसने फौरन पैराशूट निकाल कर पीठ पर बांधा। रिवॉल्वर निकाल कर जेब में डाली। इसके अलावा बॉक्स में आंखों पर लगाने वाला एयरटाइट चश्मा था। वो भी आंखों पर चढ़ा लिया।
तभी दरवाजे पर हल्की सी थपथपाहट हुई।
जसबीर वालिया सतर्क हुआ।
“कौन?” उसका स्वर बेहद धीमा था।
“मैं।” मध्यम सा स्वर, राजू का उसे सुनाई दिया।
जसबीर वालिया ने फौरन दरवाजा खोला। राजू के भीतर आने पर दरवाजा बंद कर लिया। पैराशूट और आंखों पर चश्मा देखकर राजू पल भर के लिए ठिठका।
“रिवॉल्वर भी है।” जसबीर वालिया ने जेब थपथपा कर कहा –“बख्तावर सिंह ने पुख्ता इन्तजाम किया है। इस दूसरे बॉक्स में भी यही सामान होगा। तुम भी जल्दी से तैयार हो जाओ।”
राजू बैग में पड़े बॉक्स को निकालता हुआ बोला।
“मोना चौधरी और महाजन को पहचान आया हूं।”
“कहां है वो?”
राजू ने बताया कि वो दोनों विमान में किस तरफ सीटों पर बैठे हैं।
राजू ने फुर्ती से पैराशूट बांध लिया था। आंखों पर एयरटाइट चश्मा डाल लिया था और रिवॉल्वर जेब में रख ली। उसके बॉक्स में से टाइम बम भी मिला।
राजू ने टाइम बम थामे जसबीर वालिया को देखा।
दोनों की नजरें मिली।
“टाइम बम सेट कर।” सर्द स्वर में जसबीर वालिया कह उठा।
“कब का वक्त रखूं?”
“तेरे को क्या लगता है कि कब का वक्त सेट करना चाहिए बम में।” जसबीर वालिया बोला।
“दस मिनट बहुत होंगे।”
“दस मिनट ज्यादा है।” जसबीर वालिया कह उठा –“हमें इस काम में पांच-छ: मिनट से ज्यादा का वक्त नहीं लगना चाहिए।”
“पन्द्रह मिनट बाद का भी बम सेट कर दें तो क्या हर्ज है?” राजू बोला।
“उन्हें कुछ मिनट मिल जाएंगे। मोना चौधरी बम तलाश करके बेकार कर सकती है। मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता । तुम आठवें मिनट पर बम का टाइम सेट कर दो।” जसबीर वालिया ने सर्द स्वर में कहा।
दांत भींचे राजू ने टाइम बम को, आठ मिनट बाद के फटने का वक्त पर सेट कर दिया।
☐☐☐
विमान आसमान की ऊंचाइयों पर था।
सब कुछ सामान्य था।
लेकिन सब कुछ असामान्य होने वाला था।
विमान के एक बाथरूम में टाइम बम, आठ मिनट के बाद के फटने के वक्त पर फिट हो चुका था और उन आठ मिनटों में आधा मिनट बीत चुका था। साढ़े सात मिनट बाकी थे।
जसबीर वालिया और राजू एक के बाद एक बाथरूम से बाहर निकले। दोनों के हाथों में रिवॉल्वरें थी। पीठ पर पैराशूट, आंखों पर एयर टाइट ग्लास और रिवॉल्वरें देखकर यात्री चौंके। सामने से आती होस्टेज उन्हें देखते ही ठिठक गई। भय से उसकी आंखें फैल गईं।
“खबरदार।” जसबीर वालिया रिवॉल्वर वाला हाथ हवा में लहराकर चीखा –“कोई भी अपनी जगह से नहीं हिलेगा। हम किसी को मारना नहीं चाहते। विमान का अपहरण नहीं करना चाहते।”
होस्टेज सहम कर एक तरफ हट गई।
रिवॉल्वर थामे जसबीर वालिया आगे बढ़ता चला गया।
यात्रियों की खौफ भरी निगाह उन पर टिक चुकी थी।
राजू रिवॉल्वर थामे चंद कदमों के फासले पर पीछे ठिठक गया था। दोनों बेहद सतर्क थे।
सनसनी से भरा सन्नाटा छा गया था विमान में।
“बेबी।” महाजन के होंठों से दबा-सा कठोर स्वर निकला –“ये क्या हो रहा है?”
“तुम्हारी तरह मैं भी अनजान हूं।” मोना चौधरी की सिकुड़ी निगाह माहौल का जायजा ले रही थी।
“उसने कहा है कि वो किसी की हत्या नहीं करना चाहता। विमान का अपहरण नहीं करना चाहता।” महाजन उसी लहजे में कह रहा था –“तो फिर क्या करना चाहता है?”
“दोनों ने पैराशूट बांध रखे हैं।” मोना चौधरी की आवाज सर्द थी।
“मतलब कि उनका विमान से कूदने का इरादा है।”
मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा। वो हर तरफ देख रही थी।
जसबीर वालिया निकासी द्वार के पास जाकर खड़ा हो गया था।
तभी एक होस्टेज ने विमान के उस हिस्से की तरफ जाना चाहा, जिधर पायलट था।
“कोई अपनी जगह से नहीं हिले। कोई भी। जो जहां है, वहीं रहे।” जसबीर वालिया बेहद खतरनाक स्वर में गुर्राया।
होस्टेज ठिठक गई। दूसरी होस्टेज बाथरूम की तरफ दूर खड़ी थी।
आठ मिनट में से अब तक दो मिनट बीत चुके थे।
टाइम बम फटने में छ: मिनट बाकी थे।
“मोना चौधरी कौन है विमान में?” जसबीर वालिया दहाड़ा।
इन शब्दों के साथ ही विमान में मौत से भरी खामोशी छा गई।
“मोना चौधरी कौन है ?” जसबीर वालिया गला फाड़कर पुनः दहाड़ा।
हर कोई स्तब्ध-सा बैठा था।
एकाएक मोना चौधरी उठी और खड़ी हो गई।
“मैं हूं मोना चौधरी।”
यात्रियों की निगाह फौरन मोना चौधरी की तरफ गई।
जसबीर वालिया ने मोना चौधरी को देखा फिर दूर खड़े राजू पर नजरें गई।
राजू ने फौरन सहमति से सिर हिला दिया कि ये ही मोना चौधरी है।
मोना चौधरी कठोर निगाहों से जसबीर वालिया को देख रही थी।
एकाएक महाजन उठा और मोना चौधरी के पास से होकर, आगे की तरफ जरा-जरा करके बढ़ने लगा।
“तुम मुझे नहीं जानती।” जसबीर वालिया जहरीले-कड़वे स्वर में कह उठा –“लेकिन मैं तुम्हें जानता हूं। पहले नाम से जानता था और अब चेहरे से भी जान गया। मालूम है तेरे को, ये पहचान किसने कराई?”
चेहरे पर सर्द भाव उभरे। आंखें सिकुड़ गईं।
“किसने?”
“बख्तावर सिंह ने।”
“बख्तावर?” मोना चौधरी चौंकी।
महाजन जरा-जरा करके उसकी तरफ सरकता जा रहा था।
“इधर आओ।” जसबीर वालिया ने दूर खड़ी एयर होस्टेज को रिवॉल्वर वाला हाथ हिलाकर बुलाया।
होस्टेज का चेहरा फक्क पड़ा।
“आओ।” जसबीर वालिया गुर्राया।
एयर होस्टेज लड़खड़ाते कदमों से उसकी तरफ बढ़ी।
मोना चौधरी पैनी निगाहों से जसबीर वालिया को देख रही थी और स्पष्ट तौर पर महसूस कर रही थी कि इस इंसान को उसने पहले कभी नहीं देखा। परन्तु इसके द्वारा बख्तावर सिंह का नाम लिए जाने का मतलब था खतरा। बख्तावर सिंह अपने आप में मुसीबत का दूसरा रूप था।
“तुम्हारा बख्तावर सिंह से क्या वास्ता है?” मोना चौधरी शब्दों को चबाकर बोली।
तब तक एयर होस्टेज पास आ पहुंची थी।
“दरवाजा खोलो।” जसबीर वालिया गुर्राया –“मैंने विमान से बाहर कूदना है।”
“लेकिन...।” होस्टेज ने कांपते से स्वर में कहना चाहा।
“जो मैंने कहा है, वो करो। जल्दी।” जसवीर वालिया ने रिवॉल्वर उसकी तरफ की।
“गोली मत चलाना। मुझे मत मारना। मैं...मैं खोलती हूं।” होस्टेज ने थरथराते हुए स्वर में कहा और फौरन आगे बढ़कर हाथ की कंपकंपाती उंगलियों से डोर लॉक हटाने की चेष्टा करने लगी।
“बख्तावर सिंह के साथ तुम्हारा क्या वास्ता है?” मोना चौधरी पुन: बोली।
“वो मुझे दौलत देता है और मैं हिन्दुस्तान में आतंक फैलाता हूं।” जसबीर वालिया वहशी स्वर में कह उठा –“आतंक फैलाना मेरा धंधा है। लेकिन इस बार आतंक के साथ-साथ तुम्हें भी खत्म करने का काम मेरे हवाले कर दिया। तुम भी कम नहीं हो। अण्डरवर्ल्ड में बहुत आतंक है तुम्हारा। लेकिन असली आतंक क्या होता है, वो तुम अब देखोगी। मेरे विमान से कूदते ही मिनट भर के भीतर ही टाइम बम फट जाएगा। समझी क्या-वो आखिरी एक मिनट ऐसा होगा, जो तुम्हें सच्चे आतंक से रू-ब-रू कराएगा। आतंक का असली चेहरा दिखाएगा तुम्हें।”
मोना चौधरी के दांत भिंच गए।
तभी तेज आवाज के साथ हवा का तीव्र तूफानी झोंका जसबीर वालिया की पीठ से टकराया। वो जोरों से लड़खड़ाया। शायद गिर भी जाता अगर उसके हाथ में पास ही दीवार में लगी रॉड हाथ में न आ जाती। वो तुरन्त ही संभल गया था। विमान का दरवाजा खुल गया था। नीचे को झूलने लगा था। तीव्र हवा भीतर आ रही थी। दरवाजा खुलने पर विमान को मध्यम-सा झटका लगा था फिर संभल गया। परन्तु विमान कुछ टेढ़ा हो गया था। दरवाजा खुलने और हवा भीतर आने पर विमान के बैलेंस पर असर पड़ा था।
मोना चौधरी के दांत भिंच गए थे। जसबीर वालिया उससे दूर था। पैराशूट बांधे खुले दरवाजे पर खड़ा था। कभी भी बाहर कूद सकता था। विमान में टाइम बम लगा पड़ा था। जो कभी भी फट सकता था।
“क्या नाम है तुम्हारा?” मोना चौधरी भिंचे स्वर में बोली।
“अब नाम बताने में कोई हर्ज नहीं।” जसबीर वालिया दरिन्दगी भरे स्वर में ठहाका लगा उठा –“तुम सब मरने वाले हो। मेरा नाम याद रखने को कोई भी जिन्दा नहीं बचेगा। जसबीर वालिया कहते हैं मुझे मोना चौधरी।”
“जसबीर वालिया।” मोना चौधरी दांत भींच कर कह उठी।
यात्री मौत के खौफ में, सहमे से बैठे थे।
महाजन बहुत हद तक करीब सरक आया था वालिया के। महाजन के जरा-जरा सरकने की गति इतनी कम थी कि जसबीर वालिया को उसके अपनी तरफ बढ़ने का एहसास नहीं हो पाया था।
“तुम पागल हो।” मोना चौधरी कड़वे स्वर में कह उठी –“बख्तावर सिंह ने मुझे मारने को कहा है तो मुझे मारो। मेरे साथ-साथ इन बेगुनाह यात्रियों को क्यों मार रहे...।”
“बख्तावर सिंह दोनों बातों की कीमत दे रहा है मुझे। तुम्हें मारने की भी और आसमान में विमान में विस्फोट करके आतंक फैलाने की भी।” कहने के साथ ही उसने कलाई में बंधी घड़ी देखी –“सिर्फ तीन मिनट बचे हैं, बम फटने में। अब हमारी कभी भी मुलाकात नहीं होगी।” इसके साथ ही उसने दूर खड़े राजू को पुकारा –“राजू –मैं जा रहा हूं, तुम भी आ जाओ।”
“आया।” राजू का खतरनाक-वहशी, बेचैनी से भरा स्वर वहां गूंजा।
“रुक जाओ।” मोना चौधरी चीखी –“इतना बड़ा पागलपन मत करो, विमान में विस्फोट करने...।”
जसबीर वालिया मोना चौधरी को देखकर वहशी अंदाज में हंसा।
“सिर्फ दो मिनट बचे हैं और आखिरी एक मिनट में तुम्हें आतंक का चेहरा नजर आयेगा कि असली आतंक क्या होता...।”
ठीक इसी पल मात्र पांच कदमों की दूरी पर पहुंच चुके महाजन ने लम्बी छलांग मारी, जसबीर वालिया को पकड़ने के लिए। जसबीर वालिया ने उसे हरकत में आते देख लिया था। वो खुले दरवाजे पर पीठ किए खड़ा था। इधर महाजन हरकत में आया, उधर उसी क्षण जसबीर वालिया ने पीठ के बल विमान के दरवाजे के बाहर छलांग लगा दी।
तब तक महाजन उसके करीब पहुंच चुका था। परन्तु जसबीर वालिया का आधे से ज्यादा शरीर विमान से बाहर हो चुका था। विमान के फर्श पर गिरते ही महाजन के हाथ में जसबीर वालिया की पिंडली आ फंसी। महाजन ने फुर्ती से उसे अपनी तरफ खींच कर रोकना चाहा।
लेकिन हुआ उल्टा ही।
जसबीर वालिया उसे अपने साथ विमान के बाहर खींचता-लेता चला गया। चार-पांच सेकेंड का खेल रहा ये। महाजन फौरन समझ गया था कि क्या हो रहा है। क्या होने जा रहा है। एक पल के लिए उसने सोचा कि उसकी पिंडली छोड़ दे, वरना वो भी नीचे जा गिरेगा। परन्तु इसके आगे उसे कुछ भी सोचने का मौका नहीं मिला। जसबीर वालिया की पिंडली थामे, महाजन भी उसके साथ विमान से बाहर गिरता चला गया। और इस वक्त आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था विमान।
☐☐☐
जसबीर वालिया के साथ-साथ महाजन को भी विमान से बाहर गिरते पाकर मोना चौधरी की आंखें फैल गई। वो स्तब्ध-सी खड़ी रह गई। मस्तिष्क में अजीब से भूचाल ने उछाल मारी।
कुछ विमान यात्री भय और आतंक से चीखने लगे थे।
खौफ में घिरी मोना चौधरी के शरीर में कम्पन उभरा। विमान में विस्फोट होने वाला था। दो मिनट का वक्त बाकी था। तभी तो जसबीर वालिया बाहर कूद गया था पैराशूट बांधे। टाइम बम विमान में ही था। परन्तु वक्त इतना कम था कि कुछ भी किया नहीं जा सकता था। सौ से ज्यादा यात्री थे विमान में। मोना चौधरी की
आंखों की पुतलियां घूमी। यात्रियों के दहशत से भरे चीखते चेहरों को बुत की तरह खड़ी देखने लगी। अगर सच में विमान में टाइम बम फटने वाला था और वक्त जसबीर वालिया का बताया हुआ ही था तो बचने का कोई रास्ता नहीं था।
एकाएक मोना चौधरी के मस्कि को तीव्र झटका लगा। उसकी नजर राजू पर पड़ी, जो कि पीठ पर पैराशूट बांधे, हाथ में रिवॉल्वर दबाए विमान के खुले दरवाजे की तरफ भाग रहा था।
बारह-चौदह कदम दूर था विमान के खुले दरवाजे से।
उसी पल मोना चौधरी के शरीर में बिजली-सी भर आई। वो भागी और उछली। उसका शरीर राजू से टकराया। दोनों नीचे जा गिरे। मोना चौधरी फौरन संभली और बैठे ही बैठे, नीचे पड़े राजू पर झपटी। राजू संभलने की कोशिश कर रहा था मोना चौधरी ने उसके सिर के बाल पकड़े और जोरों से सिर नीचे मारा। एक ही वार में वो तड़पकर बेहोश हो गया।
मोना चौधरी फुर्ती से खड़ी हुई और उसकी पीठ पर बंधा पैराशूट खोला और उसे अपनी पीठ पर बांधने लगी। चेहरा धधक-सा रहा था। दांत भिंचे हुए थे। एक-एक पल कीमती था अगर जसबीर वालिया के कहे मुताबिक सच में विमान में बम-विस्फोट होने वाला था। पैराशूट बांधकर, मोना चौधरी ने बेहोश राजू के हाथ में दबी रिवॉल्वर ली अपनी जेब में डालते हुए खुले दरवाजे की तरफ भागी कि ठिठक गई। कुछ कदमों की दूरी पर आंसुओं से भरे चेहरे के साथ खड़ी एयर होस्टेज उसे देख रही थी।
“मैं नहीं जानती क्या होने वाला है।” मोना चौधरी ऊंचे स्वर में बोली –“लेकिन जब तक सांस है, तब तक हिम्मत का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। विमान में पैराशूट है?”
उसने मुंह खोला और कुछ कहे बिना सहमति से सिर हिला दिया।
“बेहतर होगा यात्रियों को पैराशूट बांधने को दे दो। विमान से कूद जाओ। इतना तो स्पष्ट है कि विमान में कोई गड़बड़ होने वाली है। ऐसा न होता तो वो व्यक्ति विमान से कूदता नहीं।” इसके साथ ही मोना चौधरी दौड़ी और खुले दरवाजे से बाहर कूदती चली गई।
विमान से बाहर आते ही मोना चौधरी का शरीर जोरों से लहराया फिर तीव्रता से नीचे गिरने लगा। बहुत नीचे थी जमीन। नीचे कुछ छोटे-छोटे पहाड़ और हरियाली ही हरियाली नजर आ रही थी। दूर-दूर तक यही आलम था। स्पष्ट था कि नीचे घना, गहरा जंगल दूर-दूर तक फैला है। आबादी के निशान न दिखे मोना चौधरी को।
तभी मोना चौधरी की निगाह बहुत दूर खुले पैराशूट पर पड़ी। पांच-छ: किलोमीटर की दूरी पर था वो नजारा, लेकिन मोना चौधरी की आंखों ने धुंधला सा ही, परन्तु वो सब देखा।
खुला पैराशूट तेजी से नीचे जा रहा था। उसे इस चीज की झलक स्पष्ट मिली कि पिंडली थामे कोई, यानी कि महाजन लटका हुआ है, यही वजह थी कि पैराशूट बोझ ज्यादा होने की वजह से तेजी से नीचे जा रहा था। अब दूर होने की वजह से पैराशूट नजर आना बंद होता जा रहा था। वो नीचे भी पहुँच चुका था। मोना चौधरी ने मन ही मन राहत की सांस ली कि महाजन सुरक्षित था।
एकाएक मोना चौधरी के शरीर को झटका लगा। वेग के साथ जाता उसका शरीर कुछ थम-सा गया। नीचे जाने की रफ्तार कम हो गई। पैराशूट खुल गया था। अब पैराशूट के सहारे उसका शरीर सामान्य रफ्तार से जमीन की तरफ जाने लगा था।
तभी उसके कानों में विस्फोट की आवाज पड़ी।
मोना चौधरी की नजरें घूमी।
विमान जो बहुत दूर जा चुका था। छोटा सा नजर आने लगा था। स्पष्ट तौर पर वो मोना चौधरी को आसमान में टुकड़ों में बिखरता नजर आया और साथ में धुआं ही धुआं। हालांकि ये मंजर बहुत दूर था फिर भी स्पष्ट था। मोना चौधरी जानती थी कि इस विस्फोट के बाद किसी का भी बच पाना सम्भव नहीं था। क्योंकि विमान जमीन से बहुत ऊपर आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था। विमान में क्या हुआ। क्यों हुआ, ये सब बताने के लिए ये सब बताने के लिए कोई गवाह जिन्दा नहीं बचा था। वो-महाजन या फिर जसबीर वालिया नाम का व्यक्ति ही हकीकत जानता था।
मोना चौधरी ने उस दिशा की तरफ नजर मारी, जिधर दूसरा पैराशूट था।
वो पैराशूट नजर नहीं आया।
यानी कि महाजन और जसबीर वालिया वाला पैराशूट जमीन पर पहुंच चुका था।
मोना चौधरी ने नीचे नजर मारी। उसके जमीन को छूने में दो-तीन मिनट बाकी था। चेहरे पर गम्भीरता और गुस्सा था। बीते पांच-छ: मिनट में जो हुआ, वो भयानक हादसा था। जबदरस्त योजना के साथ विमान को आकाश में ही बम विस्फोट से उड़ा दिया गया था, सौ से ज्यादा मासूम लोग मारे गए थे।
वो और महाजन, इत्तेफाक से किस्मत से बच गए थे।
मोना चौधरी ने पुन: नीचे देखा।
नीचे गहरी हरियाली थी। जंगल जैसा नजारा था हर तरफ।
पैराशूट में फंसी मोना चौधरी, धीमी रफ्तार से नीचे जाती जा रही थी।
☐☐☐
जसबीर वालिया पर घबराहट हावी हो गई थी, जब महाजन ने उसकी पिंडली थामी और वे विमान से बाहर आ गए थे। चूंकि पिंडली थामने की वजह से दोनों एक-दूसरे से जुड़े पड़े थे। इसलिए बेहद तेज रफ्तार के साथ जमीन की तरफ बढ़े। भय की वजह से दिल की धड़कनें तक थम गई थी, जसबीर वालिया की।
तीस सेकेंड से ज्यादा का वक्त बीता कि दोनों को तीव्र झटका लगा। पैराशूट खुल गया था। उसकी पिंडली थामे महाजन तेजी से हवा में झूलने लगा। पैराशूट खुलने के पश्चात उनके नीचे जाने की रफ्तार सामान्य हो गई थी। अगर पैराशूट न खुलता तो नीचे जमीन से टकराते ही बहुत बुरी मौत मरना था दोनों ने। बुरी हालत तो महाजन की थी। उसने दोनों हाथों से जसबीर वालिया की पिंडली थाम रखी थी, जमीन से इतनी ऊपर, हवा में पिंडली थामे खुद को बचाकर रखना आसान काम नहीं था। डर की वजह से ही पिंडली से पकड़ छूट सकती थी। परन्तु वो महाजन था। मौत से खेलने वाला नीलू महाजन। हर तरह के हालातों में खुद पर काबू रखना आता था उसे।
तभी ऊपर से जसबीर वालिया उसे गालियां निकालने लगा।
“छोड़ साले! मेरी टांग छोड़।” इसके साथ ही टांग को जोरों से झटका देने लगा।
महाजन जानता था कि इस वक्त हिम्मत का साथ छोड़ा तो जान से जाएगा।
उसने जसबीर वालिया की पिंडली सख्ती से थाम रखी थी।
जब अपनी इस कोशिश में वह कामयाब न हुआ तो, वो दूसरा जूते वाला पांव महाजन को मारने लगा कि उसकी पिंडली छोड़ दे। सिर तो महाजन का नीचे था। परन्तु ठोकरें महाजन के उन हाथों पर मारने लगा जो उसकी पिंडली पर लिपटे हुए थे। चूंकि वो स्वयं भी पैराशूट से बंधा हवा में था, इसलिए ठोकरें ठीक से न लगा पा रहा था। इधर महाजन भी उसकी पिंडली पर जकड़ा, हाथों का शिंकजा छोड़ने को तैयार नहीं था। जानता था वो कि उसकी पिंडली से पांव हटे नहीं कि सैकड़ों फीट नीचे जमीन से टकराकर मर जाना था।
विमान से कूदते समय महाजन ने जब उसकी पिंडली थामी तो उसी हड़बड़ी के वक्त के दौरान जसबीर वालिया के हाथों में दबी रिवॉल्वर विमान से बाहर ही गिर गई थी। अगर रिवॉल्वर न गिरी होती तो आसानी से उसने पिंडली के साथ लटकते महाजन के सिर में गोली मार देनी थी। जसबीर वालिया की गालियां रह-रहकर उसे सुनाई दे रही थी और महाजन का ध्यान पूरी तरह पिंडली की पकड़ पर था।
जमीन करीब आ चुकी थी।
महाजन देख चुका था कि पैराशूट द्वारा वो जहां उतर रहे हैं, वो जंगली इलाका है। कहीं-कहीं छुट-पुट पहाड़ दिख जाते थे, वरना हर तरफ घना जंगल ही था। विमान में हुए विस्फोट की आवाज और विमान के परखच्चे उड़ते देखे महाजन ने। फौरन उसने आंखें बंद कर ली थी। मस्तिष्क में मोना चौधरी का चेहरा उभरा। सुलग उठा उसका खून। लेकिन इस वक्त उसके बस में कुछ नहीं था। मन में जसबीर वालिया के प्रति ढेर सारी नफरत आ ठहरी थी। मौत से भरी नफरत।
आ गई जमीन।
नीचे घना पेड़ था।
उसकी पिंडली थामे महाजन नीचे ही देख रहा था। देखते ही देखते ऊंचे घने पेड़ से उसके पांव टकराये। वो पेड़ के ऊपरी हिस्से से भीतर घुसता चला गया। जब खुद को पेड़ के बीच पाया तो उसने पिंडली छोड़ी और पेड़ की टहनियों-तनों से टकराता हुआ नीचे गिरने लगा कि कुछ पलों बाद उसकी बांह मोटे से तने पर पड़ी तो दूसरी बांह भी उस पर डालकर झूल गया। लेकिन बांहों का दम अब खत्म हो चुका था। देर तक हवा में जसबीर वालिया की पिंडली सख्ती से थामे रहा था, जिसकी वजह से बांहें दर्द से अकड़ गई थी। कुछ पलों तक तो दोनों बांहों को तने में फंसाये झूलता रहा। फिर हिम्मत जवाब देने पर तना छोड़ दिया।
उसका शरीर नीचे की शाखाओं से टकराता हुआ, जमीन पर जा गिरा। जमीन से कंधा टकराया था। होंठों से पीड़ा भरी कराह निकली। साथ ही सुकून भी कि मौत से बचकर धरती पर आ पहुंचा है। महाजन कई पलों तक आंखें बंद किए वैसे ही पड़ा रहा। बंद आंखों के पीछे मोना चौधरी का चेहरा नाचा।
जिसे विमान में छोड़ आया था।
विमान में बम ब्लास्ट हो गया था।
उसने अपनी आंखों से विमान के परखच्चे उड़ते देखे थे।
वो जानता था ‘बेबी’ नहीं बच पाई होगी। दूसरा पैराशूट उसने दूरी पर देखा था। यानी कि जसबीर वालिया का साथी बच निकला था।
मोना चौधरी की मौत का एहसास होते ही महाजन का खून सुलग उठा। जमीन पर पड़े ही पड़े उसने नजरें घुमाई कुछ ही दूर एक पेड़ को ढांपे पैराशूट नजर आया। महाजन उठा। पूरा शरीर दर्द और अकड़ाहट से भरा महसूस कर रहा था वो। बांहें तो सुन्न सी लग रही थी।
दूर तरफ नजर मारी और खुद को घने जंगल में होने का एहसास हुआ। ऊपर भी सब कुछ पेड़ की पत्तियों से ढका हुआ था। कहीं-कहीं से थोड़ा-बहुत आसमान नजर आ जाता था। पत्तियों में से कहीं-कहीं से सूर्य की किरणें तीखी सी नीचे आती नजर आ जाती थी।
चेहरे पर दरिन्दगी समेटे महाजन पैराशूट की तरफ धीरे-धीरे बढ़ रहा था। वहां मोना चौधरी का हत्यारा मौजूद था, जसबीर वालिया नाम का वो व्यक्ति। उसे बुरी मौत मार देना चाहता था महाजन।
☐☐☐
जसबीर वालिया पैराशूट सहित पेड़ में फंस गया था। टांग में मोटी टहनी की रगड़ से खरोंच सी आ गई थी। लेकिन हाथ-पांव टूटने से बच गया था। जमीन पर आकर वो खुश था कि काम भी निपट गया और बच भी गया। बहुत खतरे वाला काम बख्तावर सिंह ने मौके पर उसे करने को कहा था।
लेकिन काम पूरा हो गया था।
मोना चौधरी भी मारी गई और आसमान की ऊंचाइयों में उड़ते विमान में विस्फोट करके आतंक फैला दिया था। महाजन उसके साथ-साथ नीचे आ गया था। बच गया था। परन्तु महाजन की उसे परवाह नहीं थी। बख्तावर सिंह ने मोना चौधरी को खत्म करने को कहा था। महाजन को नहीं।
जसबीर वालिया को खुद पर विश्वास था कि महाजन उसके लिए कोई समस्या नहीं बन सकेगा।
पेड़ पर ही फंसे जसबीर वालिया ने कुछ देर तक अपनी सांसों को संयत किया। फिर पैराशूट की बेल्ट खोली और पेड़ की टहनियाँ-तनों का सहारा लेते नीचे उतरने लगा। वो जानता था कि किसी जगह पर इस वक्त घने जंगल में है। ऐसे घने जंगल से निकलना आसान नहीं होता। परन्तु उसके पास रास्ता था, आसानी से जंगल से निकल जाने का। इसलिए बहुत हद तक निश्चिंत था वालिया इस बारे में।
पेड़ से नीचे उतरते ही ठिठका।
सामने से उसने थके-टूटे हाल में महाजन को इस तरफ आते देखा। परन्तु उसके चेहरे पर वहशी भाव नाच रहे थे। जसवीर वालिया ठिठका। चेहरे पर मौत से भरे भाव आ ठहरे थे।
चार कदमों के फासले पर पहुंच कर महाजन ठिठक गया था। अब उसकी सांसें किसी फुंफकारों से कम नहीं लग रही थी। वालिया को सामने पाकर, महाजन भीतर ही भीतर जल उठा था।
दोनों की नजरें मिली।
जसबीर वालिया के चेहरे पर जहरीली मुस्कान उभरी।
महाजन की आंखें अंगारों के समान सुलग उठीं।
“क्या नाम बताया था तूने।” महाजन के होंठों से दबी-दबी-सी गुर्राहट निकली –“जसबीर...क्या जसबीर...।”
“जसबीर वालिया।” वो शब्दों को चबाकर जहरीले स्वर में बोला।
“जानता है तूने किसको मारा?”
“मैंने किसी को नहीं मारा।” जसबीर वालिया पूर्ववतः स्वर में कह उठा –“मेरा तो काम है आतंक को...।”
“तूने सैकड़ों मासूमों को बुरी मौत मारा।”
“मामूली बात है मेरे लिए। ऐसा मैं कई बार कर चुका हूं।” व्यंग्य से हंस पड़ा वो।
“लेकिन ‘बेबी’ को तूने पहली बार मारा है जसबीर वालिया।”
“बेबी?”
“मोना चौधरी।” महाजन को गुस्से की आग लगी हुई थी।
“मोना चौधरी ने तो मरना ही था। बख्तावर सिंह ने बहुत मोटी रकम...।”
“बेबी का मरना, मैं सहन नहीं कर सकता जसबीर वालिया।” महाजन गुर्रा उठा –“तू नहीं जानता, वो मेरे लिए क्या थी। तीन जन्मों से उसका मेरा रिश्ता था। पूरे तीन जन्मों से...”
“तीन जन्मों से?” जसबीर वालिया हंसा।
“हां तीन जन्मों से। तू नहीं समझेगा...।”
“बेकार की बातों की आड़ ले रहा...।”
“क्यों लूंगा मैं आड़। इस वक्त मुझे किसी की आड़ लेने की जरूरत नहीं।” महाजन के शब्दों से जैसे आग निकल रही थी –“मैं तो ये बता रहा हूं कि तूने बेबी को मार दिया। मेरे तीन जन्मों की साथी को मार दिया। मैं तुझे जिन्दा नहीं छोडूंगा।”
हंस पड़ा जसबीर वालिया।
“तू मेरा क्या बिगाड़ेगा। किस्मत वाला निकला कि मुझे पकड़ कर इतनी ऊंचाई से ठीक-ठाक नीचे आ गया। पैराशूट बढ़िया क्वालिटी का था कि उसने तेरा बोझ भी संभाल लिया। तू मुझे क्या मारेगा। हालत देख अपनी। मेरी पिंडली पकड़े, लटककर तेरा हाल बुरा हो चुका है। तू...।”
“अब तू मरेगा, जसबीर वालिया। बुरी मौत मारूंगा तुझे।” महाजन दांत किटकिटा उठा –“मैं...।”
तभी जसबीर वालिया ने पास ही गिरी पड़ी सूखे पेड़ की मजबूत टहनी उठाई और दोनों हाथों में पकड़कर, सिर से ऊपर उठाते हुए जोरदार वार महाजन के सिर पर किया।
बचने के लिए वक्त कम था। महाजन ने फौरन सिर दूसरी तरफ किया।
सूखी टहनी जोरों से उसके कंधे से टकराई।
महाजन के होंठों से कराह निकली। थका-टूटा तो वो पहले से ही था। वो जोरों से लड़खड़ाया।
खुद को संभाल न सका और नीचे जा गिरा। इसके साथ ही उसने उठने की चेष्टा की।
जसबीर वालिया ने दांत भींचकर उसके सिर का निशाना लेते हुए दूसरी बार टहनी घुमा दी। टहनी महाजन के सिर से टकराई। साथ ही टहनी के टूटने की ‘कड़ाक’ की आवाज उभरी। महाजन के होंठों से चीख निकली। दोनों हाथों से सिर को थामे दो-तीन करवटें ली। फिर वहीं पड़ा रह गया। दोनों हाथ सिर पर ही टिके रहे। सिर से बहता खून हाथों की उंगलियां रंगने लगा।
जसबीर वालिया की खूंखार नजरें कई पलों तक उस पर टिकी रही।
महाजन के शरीर में जरा भी हरकत नहीं हुई।
जसबीर वालिया आगे बढ़ा और जूते की ठोकर से महाजन के शरीर को हिलाया। महाजन का टेढ़ा पड़ा शरीर सीधा हुआ। दोनों बांहें इधर-उधर जमीन पर फैल गई। हथेलियों पर, सिर से बहने वाला खून लगा था। वो बेसुध था। बेहोश था या मर गया था। जसबीर वालिया ने ये जानने की चेष्टा नहीं की। जहरीली नजरों से वो महाजन के चेहरे को देखता रहा फिर बड़बड़ा उठा।
“तीन जन्मों का साथ। पागल हो गया है जो ऐसी बातें करने लगा। मोना चौधरी की मौत से बहुत तकलीफ पहुंची हरामजादे को।” फिर वो पलटा और जंगल को इधर-उधर देखते हुए आगे बढ़ने लगा।
कुछ कदम उठाने के बाद ठिठका। हाथ पैंट की जेब पर गया। दूसरे ही पल उसने जेब में मौजूद छोटा-सा मोबाइल फोन निकाल कर स्क्रीन को देखा।
फोन चालू था। स्क्रीन पर कनेक्शन ओ.के. का निशान आ रहा था।
जसबीर वालिया की आंखें चमक उठी। उसने फौरन नम्बर मिलाए। बात भी हो गई।
“हैलो।” बख्तावर सिंह का भारी स्वर कानों में पड़ा।
“बख्तावर । मैं वालिया...।”
“गुड। कहो।”
“काम हो गया है। मोना चौधरी भी मारी गई और आकाश की ऊंचाइयों पर विमान में विस्फोट भी हो गया।”
“मैं जानता था कि तुम ये काम कर दोगे। कहां से बोल रहे हो?”
“पैराशूट से जंगल में उतरा हूं। मालूम नहीं ये जंगल कहाँ है मैं...।”
“नक्शा देखकर मैं मालूम कर लूंगा कि तुम इस वक्त कौन से जंगल में हो सकते हो। विमान का रास्ता मुझे मालूम है कि उसने कहां से गुजरना था। तुम जंगल में किसी ऐसी खुली जगह पहुंचो, जहां से कोई हैलीकॉप्टर तुम तक पहुंच सके। तुम्हें देख सके।”
“मैं समझ गया।”
“राजू कहां है?”
“वो भी ठीक है। उसके मेरे उतरने में पांच-सात किलोमीटर का फर्क है। मालूम नहीं, वो इतनी देर से विमान से क्यों कूदा। शायद मोना चौधरी ने उसे रोकने की-पकड़ने की चेष्टा की हो।”
“ऐसा ही हुआ होगा। चिन्ता की कोई बात नहीं। हैलीकॉप्टर तुम दोनों को उस जंगल से बाहर निकाल ले जाएगा। तुम जंगल में खुली जगह पहुंचो कि हैलीकॉप्टर तुम्हें देख सके। मैं नक्शा देखकर चेक करता हूं कि तुम इस वक्त किस जंगल में हो सकते हो।”
“ठीक है जल्दी करो बख्तावर सिंह। मैं...”
“तुम्हें वहां से निकालने की मैं बहुत जल्दी करूंगा।” बख्तावर सिंह का शांत-भारी स्वर कानों में पड़ा –“तुम हमेशा मेरे काम आए हो। मेरे कई बड़े-बड़े काम किए हैं तुमने। आगे भी करने हैं। मोना चौधरी मेरे लिए परेशानी का दूसरा नाम थी। कई बार हाथों में आकर निकल गई। मैं उसकी मौत का बहुत ख्वाहिशमंद था वालिया।”
“मैंने तुम्हारी परेशानी दूर कर दी।”
“तुम्हारा एहसानमंद हूं मैं...।”
“एहसान को छोड़ो और मुझे यहां से निकालो। मेरे ठिकाने पर नोटों के दोनों सूटकेस...।”
“तुम्हारे पहुंचने से पहले पहुंच जाएंगे। इन्तजार करो। मैं तुमसे अभी बात करता हूं।”
वालिया ने फोन बंद किया और जेब में रख लिया। वो निश्चिंत था कि इस जंगल से निकल जाएगा। बख्तावर सिंह पर उसे पूरा भरोसा था। बरसों का साथ था बख्तावर सिंह से। वो अपने काम के आदमियों की कद्र करना जानता था और जसबीर वालिया उसके काम का आदमी था।
वालिया तेज-तेज कदमों से जंगल में अनजानी दिशा की तरफ बढ़ गया। किसी ऐसी खुली जगह को तलाश करना था, जहां से हैलीकॉप्टर वाले उसे देख सकें। हैलीकॉप्टर उतर सके या फिर हैलीकॉप्टर से सीढ़ी लटका कर उसे इस घने जंगल से बाहर निकाल सके।
महाजन को देखने का उसने एक बार भी कष्ट नहीं किया था। वो उसी हाल में वैसे ही पड़ा था।
☐☐☐
मोना चौधरी का पैराशूट, बहुत ऊंचे-लम्बे पेड़ पर अटक गया। जमीन को छूने से पहले ही मोना चौधरी के शरीर को झटका लगा और वो रुककर हवा में झूलने लगी। जमीन बीस फीट नीचे थी। अटके पैराशूट ने आधा पेड़ ढांप लिया था। पैराशूट की बेल्ट में फंसी मोना चौधरी ने आस-पास देखा।
हर तरफ घना-हरा जंगल था। जमीन में नमी थी, जैसे एक-दो दिन पहले बरसात हुई हो।
दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आया।
सब कुछ शांत था। परन्तु घने जंगल में सुनसानी, भय-सा उभार रही थी।
होंठ भींचे मोना चौधरी ने एक हाथ से पैराशूट की डोरी पकड़ी और दूसरे हाथ से छाती पर बंधी बेल्ट खोली तो नीचे गिरने को हुई। लेकिन डोरी पकड़े होने की वजह से झूल गई। फिर डोरी छोड़ी तो उसके दोनों पांव नीचे जा टिके। मामूली-सी लड़खड़ाने के बाद वो संभली। उसकी नजरें हर तरफ फिरने लगी।
जमीन पर मिट्टी के अलावा जंगली घास नजर आ रही थी। छोटे-छोटे जंगली पौधे थे, जिन पर नीले-लाल-पीले फूल लगे नजर आ रहे थे। ऊंचे-घने-छोटे, हर तरह के पेड़, वहां फैले थे। वातावरण में नमी और ठंडक का एहसास हो रहा था।
कुछ दूरी पर दो-ढाई फीट ऊंचा छोटा-सा पहाड़ी पत्थर नजर आया तो मोना चौधरी उस पर जा बैठी। वो थकी-सी नजर आ रही थी। बीते पन्द्रह मिनटों में वो वक्त के जिस खतरनाक दौर से निकली थी। उसे भुला पाना कठिन था। वो विमान में चैन भरा सफर कर रही थी, परन्तु वो विमान आसमान में ही बम विस्फोट के साथ-साथ टुकड़े हो गया। भीतर मौजूद सौ से ज्यादा लोग बुरी मौत मारे गए थे। उसने अपनी आंखों से आसमान में विस्फोट के साथ विमान के टुकड़े होते देखे थे। तेज काला धुआं, बिखरते टुकड़े। दूर होने की वजह से इंसानी शरीरों को बिखरते न देख सकी थी।
राहत की बात थी कि महाजन बच गया था।
महाजन?
मोना चौधरी की सोचें बिखरने लगी।
जसबीर वालिया नाम बताया था उसने अपना।
कहा था कि बख्तावर सिंह ने उसे उसकी हत्या करने और विमान में विस्फोट करने को कहा था। बख्तावर सिंह? पाकिस्तानी मिलिट्री की खतरनाक शख्सियत। उसका ओहदा क्या था। ये बात मोना चौधरी कभी नहीं समझ सकी थी। परन्तु उसकी पहुंच हर तरफ थी। वो हिन्दू था। परन्तु पाकिस्तान में पैदा हुआ था। उसके पुरखे पाकिस्तान के थे। बंटवारा होने के बाद, उसका परिवार पाकिस्तान वाले हिस्सों में ही रहा। हिन्दू होते भी खुद को पाकिस्तानी कहलवाना पसन्द करता था। पाकिस्तान की मिट्टी को अपनी मां कहता था। जिस मिट्टी की गोद में पढ़-पलकर बड़ा हुआ, उसके लिए आज वो मर मिटने के लिए तैयार था। तभी तो वो पाकिस्तानी मिलिट्री का थम्ब माना जाता था। अपने देश के लिए वो जान तक देने को तैयार रहता था।
वो पाकिस्तानी मिलिट्री का थम्ब था तो साथ में पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सी के कामों को भी संभालता था। मोना चौधरी और बख्तावर सिंह के रास्ते कई बार एक हो चुके थे। मोना चौधरी अक्सर बख्तावर सिंह के कामों में कांटा बनकर उभरी। कभी इत्तेफाक से तो कभी हिन्दुस्तान की मिलिट्री सीक्रेट सर्विस के चीफ मिस्टर पहाड़िया ने कोई काम करने को कहा तो तब भी टकराव हुआ।
बख्तावर सिंह मोना चौधरी नाम के खतरे को पहचान चुका था। उसे खत्म करना चाहता था कि उसकी राह में रह-रहकर मुसीबत पैदा करने वाली मोना चौधरी खत्म हो जाए। कई कोशिशें बख्तावर सिंह ने उसे मारने की की। परन्तु सफल नहीं हो सका। विमान में विस्फोट कराकर, उसे मारने की कोशिश सबसे खतरनाक थी। लेकिन किस्मत ने साथ दिया। वो ही नहीं, मौत के मुंह से महाजन भी बच निकला था।
मोना चौधरी का मस्तिष्क इन्हीं सोचों में उलझ गया।
वो मामले को समझने की कोशिश करने लगी।
सफेद और काले धंधों के बादशाह विशाल सिंह ने असम में उसे कोई काम करने को कहा था और उसकी हां पर दो दिन पहले ही विमान में टिकट बुक करा दी थी। यानी कि वो कहां और कैसे जा रही थी, ये बात बख्तावर सिंह तक, दो दिन पहले ही पहुंच गई थी और उसने उसे खत्म करने की खतरनाक तैयारी कर ली थी। लेकिन बख्तावर सिंह को उसके प्रोग्राम का कैसे पता चला?
मोना चौधरी जानती थी कि बख्तावर सिंह के हाथ पूरे हिन्दुस्तान में फैले थे।
तो क्या उन हाथों में एक हाथ विशाल सिंह भी था? विशाल सिंह ने कहीं बख्तावर सिंह के कहने पर तो उसे विमान में नहीं भेजा कि वो अपने मौत से भरे खेल को अंजाम दे सके। ऐसा हो सकता है। यकीनन ऐसा ही हुआ होगा, वरना...वरना बख्तावर सिंह उसको मारने के लिए ऐसी जानलेवा योजना न बना पाता। पैराशूटों को विमान में पहुंचाना। रिवॉल्वरों को और...।
मोना चौधरी के दांत दृढ़ता से भिंच गए। वो समझ गई कि विशाल सिंह, बख्तावर सिंह का ही आदमी है और उसे विमान में कहीं भेजने की योजना भी बख्तावर सिंह की थी। परन्तु इस वक्त कुछ नहीं हो सकता था। विशाल सिंह बहुत दूर था यहां से। वो यहां घने जंगल में फंसी हुई थी। जसबीर वालिया के बारे में भी कुछ नहीं जानती थी; जो मौत से भरे, इस खेल का सबसे खास मोहरा बना था।
मोना चौधरी चट्टानी पत्थर से उठ खड़ी हुई।
इस वक्त उसके सामने सबसे बड़ा काम तो ये था कि जंगल से बाहर निकलना। जाने ये कौन-सा जंगल था। राह-रास्तों से अनजान थी। किधर जाना है, पता नहीं था। जब वो पैराशूट से नीचे आ रही थी तो तब ध्यान नहीं रहा कि ऊपर से, जंगल के रास्तों के बारे में जानकारी पा ले। देख ले। मोना चौधरी ने जेब थपथपाई। राजू नाम के व्यक्ति की रिवॉल्वर उसकी जेब में थी।
मोना चौधरी ने गहरी सांस ली और जंगल के अनजाने रास्ते पर, आगे बढ़ गई। किधर जाना है और किधर नहीं, कुछ नहीं मालूम था उसे। झाड़ियों और पेड़ों से रास्ता बनाती मोना चौधरी आगे बढ़ती रही। दोपहर के तीन बज रहे थे। परन्तु उस घने जंगल की जमीन पर कहीं-कहीं धूप की तीखी-तेज किरणें पड़ रही थी।
जमीन की हालत बता रही थी कि, धूप वहां तक नहीं पहुंच पाती थी।
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महाजन को वहां पड़े आधा घंटा ही बीता था कि एकाएक आहटें-सी उभरी और धीरे-धीरे घने पेड़ों की ओटों से कई आदमी-औरत नजर आने लगे। जो कि सावधानी से महाजन को घेरने की मुद्रा में आगे बढ़ रहे थे। उनके हाथों में भाले-बरछे-कटार थे। शरीरों पर कुछ ऐसे कपड़े थे, जैसे कि जिसे जो मिला हो, पहन लिया। अधिकतर औरतें अर्धनग्न-सी लग रही थी। इन लोगों का रंग स्याह काला था। किसी-किसी ने अपने शरीर पर कुछ मल रखा था। राख या मिट्टी जैसी कोई चीज।
उनमें एक था जो कि उनमें सबसे सभ्य लग रहा था।
वो तीस की उम्र का था। उसके बाल ढंग से कटे हुए थे। घुटनों तक जाती हाफ पैंट पहनी हुई थी। अच्छी-सी टी-शर्ट शरीर पर थी। पांवों में एक्शन शूज थे। दाएं हाथ में अमेरिकन मेक की महंगी रिवॉल्वर थाम रखी थी। बायें हाथ की उंगलियों में विदेशी सिगरेट फंसी सुलग रही थी। उसने हाथ से सबको वहीं रुकने का इशारा किया और रिवॉल्वर थामे सावधानी से कश लिया। रह-रहकर वो कश ले रहा था। चेन स्मोकर लगता था वो। उसके चेहरे पर सतर्कता और गम्भीरता एक साथ नजर आ रही थी।
महाजन के पास पहुंचकर ठिठका वो।
रिवॉल्वर थामे देखता रहा महाजन को।
फिर सावधानी से नीचे झुका और रिवॉल्वर की नाल से महाजन के चेहरे को हिलाया। इसके साथ ही उसे एहसास हो गया कि वो सच में बेहोश है। फौरन ही उसकी निगाह पेड़ पर बिछे पैराशूट पर पड़ी। फिर हर तरफ नजरें दौड़ाई और कश लेते हुए रिवॉल्वर जेब में डाल ली।
“जोगल।” दूर खड़े एक व्यक्ति ने ऊंचे स्वर में कहा –“सब ठीक है?”
“हां। सच में बेहोश है।” जोगल नाम के उस व्यक्ति की निगाह पुन: बेहोश महाजन पर जा टिकी।
“ये ही उस विमान से पैराशूट से कूदा था, जिसके विस्फोट में टुकड़े होते हमने देखे।”
“पैराशूट से उतरने वाले दो थे बकम।” कहते हुए जोगल, महाजन के पास ही घुटनों के बल बैठ गया और उसे देखने के बाद कह उठा –“इसके सिर पर चोटें हैं। पास ही ये टूटी लकड़ी है। ये देख। मेरे ख्याल में पैराशूट से उतरने वाले दोनों व्यक्तियों में झगड़ा हुआ और वो इसे बेहोश करके, यहीं छोड़कर चला गया।”
बकम नाम का व्यक्ति पास आ पहुंचा था।
“चोटें तगड़ी हैं।” बकम बोला।
“हां।” जोगल ने सिर हिलाते हुए कश लिया और खड़ा हो गया –“विमान में विस्फोट। एक पैराशूट से दो का नीचे उतरना। वो भी खतरनाक अंदाज में। मामला समझ से बाहर है। ये होश में आया तो पता चल पाएगा। इसे बस्ती भेजो। जख्मों पर दवा वगैरह लगाओ।”
“वो तो ठीक है।” बकम ने गम्भीर स्वर में कहा –“वो दूसरा पैराशूट भी है जो यहां से बहुत दूर...।”
“इसे इलाज के लिए बस्ती में भेजो और तुम किसी को साथ लेकर सावधानी से उधर जाओ, जहां दूसरा पैराशूट उतरा है। अगर वो उतरने वाला हाथ आ सके तो...।”
“समझ गया।” बकम ने सिर हिलाया।
“उधर जाते हुए लापरवाह मत होना। उधर पावली की बस्ती है। वो...।”
“मैं सावधान रहूंगा जोगल।”
सोचों में डूबे जोगल ने नई सिगरेट सुलगा ली।
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