भाग एक
दिल्ली
1
विनीता चावला अपने पति से खफा थी क्योंकि खफा रहना उसका स्वभाव बन गया था । खफा होने की कोई वजह न भी हो तो वो वजह निकाल लेती थी । वैसे एक स्थायी वजह तो यही थी कि उसकी अपने पति संजीव चावला से शादी हुए छ: साल हो गये थे और अभी तक उन्हें औलाद का मुंह देखना नसीब नहीं हुआ था । अपने पति के कारोबार से, उसके आय के साधन से भी, उसे चिढ़ थी जिसके प्रति असंतोष वो गाहे बगाहे प्रकट करती ही रहती थी । उसका पति लेखक था इसलिये घर से ही आपरेट करता था । सहायक के तौर पर उसने गौतमी रैना नाम की एक युवती को एंगेज किया हुआ था जो कि उसकी सहायक थी, स्टेनो थी, सैक्रेट्री थी और और पता नहीं क्या क्या स्क्रिप्ट की तैयारी के सिलसिले में वो लेखक महोदय के लिए करती थी और जो उनके हाउसहोल्ड में ऐसी रच बस गयी थी कि उनकी दो सदस्यों की फैमिली का ही अंग जान पड़ती थी । बरसातों में या दिल्ली की घोर सर्दियों में उसे उत्तम नगर अपने घर जाना दुश्वारी का बायस लगे तो वो रात वहीं उनके पास ठहर जाती थी । शुरू में दो चार बार उसके घरवालों को ये सिलसिला पसन्द नहीं आया था कि जवान जहान लड़की रात को घर न लौटे लेकिन लेखक महोदय के सद्चरित्र होने का और गृहस्थ होने का सदका था कि बाद में वो आश्वस्त हो गये थे कि लड़की घर नहीं लौटी थी तो ‘सेफ हैंड्स’ में थी ।
चावला दम्पति की ईस्ट ऑफ कैलाश में अपनी छोटी सी कोठी थी जिसकी वजह से पति का दर्जा साहिबेजायदाद का था । हरियाणा में उस की एग्रीकल्चर्स लैंड थी जिस की काश्त की कमाई का हिस्सा उसके पास नियमित तौर पर पहुंचता था । लिहाजा गृहस्थी चलाने के लिये लेखक रायल्टी का ही मोहताज नहीं था और वस्तुत: इसी वजह से लेखन कार्य में, स्क्रिप्ट की तैयारी की दिशा में असिस्टेंट रखना अफोर्ड कर सकता था ।
विनीता के स्थायी असंतोष में इजाफा करने वाली एक दूसरी वजह भी थी जो कि हाल में बनी थी और गाहे बगाहे उन में तकरार का मुद्दा बन जाती थी ।
वो वजह दो सूटकेस थे जो पति संजीव चावला का एक दोस्त कैलाश कुमार खन्ना उसके घर में रख गया था । शुरू में विनीता ने न उनकी तरफ कोई तवज्जो दी थी और न कोई ऐतराज उठाया था क्योंकि वो उसे दो चार दिन की ही जहमत जान पड़ी थी ।
‘‘ये सूटकेस कब तक सम्भालोगे ?” — सुनीता अपने पति पर झल्लाई ।
‘‘कौन से सूटकेस ?” — संजीव अनमने स्वर में बोला ।
‘‘तुम्हें मालूम है कौन से सूटकेस ! तुम्हारे निजामुद्दीन वाले दोस्त खन्ना के सूटकेस जो वो दोस्ती के मुलाहजे में इधर डाल गया ।’’
‘‘अरे, ट्रेजेडी हुई उसके साथ । वर्ना ले गया होता । बदमाशों ने घर में घुस के पीट पीट के मार डाला । जिन्दा होता तो कब का अपना सामान ले गया होता ।’’
विनीता को उस ट्रेजेडी की खबर थी । घर में डाकू घुस आये थे जिन में से एक ने खन्ना की खूबसूरत बीवी किरण को अपनी हवस का निशाना बनाया था । खन्ना ने विरोध किया तो उसने खन्ना को पीट पीट कर मार डाला था और किरण के साथ बड़ी बेरहमी से मुंह काला किया था । कोठी में गोलियां चली थीं जिनकी आवाज सुन कर एक पड़ोसी ने पुलिस को फोन कर दिया था । पुलिस वहां पहुंची थी तो उसने दो आतताइयों को किचन में गम्भीर घायलावस्था में पड़ा पाया था । एक गोरा चिट्टा, खूबसूरत, मोना नौजवान था जो कि सूरत से कश्मीरी जान पड़ता था और दूसरा एक विकराल शक्ल सूरत वाला, खूंखार आंखों वाला, विशालकाय सिख था । कश्मीरी के कन्धे में और सिख की पीठ में रीड की हड्डी के करीब गोली लगी थी और बकौल उन के गोली चलाने वाला एक अन्य युवक था जो अपनी गन किरण को थमाकर वहां से खिसक गया था । किरण उन दोनों घायल बदमाशों को शूट करने पर आमादा थी जबकि पुलिस वहां पहुंची थी । पुलिस का ऐन मौके पर पहुंच जाना ही उन दोनों को किरण के हाथों जान से जाने से बचा सका था ।
बाद में मालूम हुआ था कि सिख पंजाब का कुख्यात हिस्ट्रीशीटर हरनाम सिंह गरेवाल था, गोरा चिट्टा कश्मीरी लगने वाला नौजवान उसका सदा का जोड़ीदार कौल था और दोनों में ‘प्लग और सॉकेट’ जैसा रिश्ता बताया जाता था ।
गरेवाल ने किरण की जो दुर्गति की थी, उसने किरण का दिमाग इस कदर हिला दिया था कि कई महीने उसे मेंटल असाइलम में रहना पड़ा था ।
‘‘सवा साल होने को आ रहा है ।’’ — विनीता बड़बड़ाई — ‘‘इतनी देर कोई किसी की अमानत रखता है !’’
‘‘तो क्या करूं ? — संजीव बोला — ‘‘सूटकेसों को उठा कर सड़क पर फेंक दूं ?’’
‘‘मैं कुछ नहीं जानती...’’
‘‘नहीं जानती हो तो जानो । खन्ना मेरा अजीज दोस्त था । उसकी अमानत को हिफाजत से रखना मेरा फर्ज है ।’’
‘‘कब तक रखना ?’’
‘‘जब तक उसकी बीवी किरण का कोई अतापता नहीं निकलता ।’’
‘‘जो कि जादू से निकलेगा ।’’
‘‘मैं ने पता निकालने की कोशिश की थी । बड़ी मुश्किल से मैं ये पता निकाल पाया था कि वो कहां, कौन से सानाटोरियम में थी लेकिन जब तक मैं वहां पहुंचा, वो वहां से जा चुकी थी । कहां चली गयी थी, कुछ मालूम न हो सका ।’’
‘‘और न होगा ।’’
‘‘कभी तो होगा ! निजामुद्दीन वाली उनकी कोठी पर ताला पड़ा है लेकिन वो खन्ना की अपनी मिल्कियत थी । कभी तो वो वहां लौटेगी !’’
‘‘सवा साल होने को आ रहा है, अब तक तो न लौटी !’’
‘‘लौटेगी । जरूर लौटेगी ।’’
‘‘मैं अब और इन्तजार नहीं कर सकती ।’’
‘‘क्या वाहियात बात करती हो ! काहे का इन्तजार करना है ? दो सूटकेस घर के एक कोने में पड़े हैं, क्या कहते हैं तुम्हें ?’’
‘‘क्या पता उन में बम हो !’’
‘‘नानसेंस !’’
‘‘जो फूटा तो सोचो क्या होगा !’’
‘‘कोई अक्ल की बात करो । सूटकेस में बम, जो सवा साल से नहीं फूटा, अब फूटेगा !’’
‘‘तो कुछ और होगा !’’
‘‘और क्या ?’’
‘‘कुछ भी । गैरकानूनी । जो नहीं होना चाहिए । जो हमें फंसवा सकता हो !’’
‘‘अरे, क्या ?’’
‘‘कुछ भी ।’’
‘‘फिर वही बात ! नाम तो लो किसी चीज का !’’
‘‘गैर कानूनी हथियार ! गोला बारूद ! वो क्या कहते हैं ... एके-47 !’’
‘‘एके-47 सूटकेस में आती है !’’
‘‘नॉरकोटिक्स !’’
‘‘क्या !’’
‘‘चरस ! अफीम ! गांजा ! हेरोइन ! ऐस्टेसी ! ऐसा ही कोई और आजकल के जमाने का नशा !’’
‘‘क्या पागलों जैसी बातें कर रही हो ! अरे, खन्ना कोई ड्रग्स पैडलर था ? कोई आर्म्स समगलर था ! वो शरीफ, सम्भ्रान्त, सदाचारी आदमी था, नेक शहरी था, कार्पोरेट एग्जीक्यूटिव था ।’’
‘‘मैं कुछ नहीं जानती ।’’ — विनीता झुंझलाई — ‘‘मेरे को मालूम होना चाहिए उन सूटकेसों में क्या है ! मैं और सस्पेंस बर्दाश्त नहीं कर सकती । आज ये बात साफ होनी चाहिए वर्ना...”
‘‘वर्ना क्या ?”
‘‘वर्ना अगली सड़क पर जो कूड़ाघर है, मैं उन को वहां फेंक आऊंगी ।’’
‘‘खबरदार !’’
‘‘अरे, तुम्हें होना चाहिए खबरदार । सूटकेसों में कोई गैरकानूनी चीज हुई तो हमारे हाथों में हथकड़ियां होंगी ।’’
‘‘खामखाह ! किसी को क्या पता हमारे पास क्या है !”
“पता लग गया तो ?’’
‘‘खामखाह !’’
‘‘देखो, बात को समझो । एक मिनट के लिये फर्ज करो कि सूटकेसों में कोई गैरकानूनी चीज़ है । मिसाल के तौर पर सोचो कि नॉरकॉटिक्स का, ड्रग्स का जखीरा है । अब ये सामान खन्ना का अपना तो नहीं हो सकता क्योंकि वो तो शरीफ, सम्भ्रान्त, सदाचारी वगैरह है ! अब सोचो, जिसका वो सामान है, वो उसे ट्रेस करता हमारे तक पहुंच गया तो जानते हो क्या होगा ?”
“क्या होगा ?”
‘‘हम यहीं मरे पड़े होंगे । गौतमी भी ।’’
‘‘उस बात को बहुत बढ़ा चढ़ा कर कह रही हो ।’’
‘‘मैं कुछ नहीं जानती । मेरे से अब और बर्दाश्त नहीं होता । मुझे मालूम होना चाहिये उन सूटकेसों में क्या है । आज ही, अभी ये बात साफ होनी चाहिये ।’’
‘‘कैसे ? वो एक्सरे मशीन लायें कहीं से जिससे एयरपोर्ट पर लगेज चैक होता है ?’’
‘‘खोलो ।’’
‘‘क्या !’’
‘‘अरे, ताले खोलो ।’’
‘‘चाबी कहां है हमारे पास !”
‘‘हो जायेगी । ऐसे सूटकेसों के बिल्ट-इन लॉक्स मामूली होते हैं । चार पांच मिलती जुलती चाबियां ट्राई करने पर एक लग जाती है ।’’
‘‘विनीता, ये अमानत में खयानत होगी ।’’
‘‘क्यों भला ? हम कुछ चुरा रहे हैं ? भीतर झांकना ही तो है ! कोई काबिलेएतराज चीज नहीं होगी तो वैसे के वैसे बन्द कर देंगे ।’’
‘‘हुई तो ?’’
‘‘यानी मानते हो कोई काबिलेएतराज चीज भीतर हो सकती है !’’
‘‘नहीं मानता । यूँ ही सवाल पूछा ।’’
‘‘हुई तो सूटकेस मैं इस घर में नहीं रहने देने की । अमानत में खयानत हो या कुछ और हो, उन सूटकेसों को दफा करना ही होगा !’’
‘‘ये ठीक होगा ?”
‘‘होगा । जब खन्ना ने हमारा लिहाज न किया — गैरकानूनी सामान हमारे मत्थे मढ़ दिया तो हम क्यों करें ?”
‘‘तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे सामने आ भी गया हो कि भीतर गैरकानूनी सामान है — असलाह है, नॉरकॉटिक्स हैं !’’
‘‘पहले हां बोलो, फिर सामने भी आता है ।’’
‘‘कैसे ? क्या करोगी ?’’
‘‘ऐसे सूटकेस हमारे पास भी हैं । मैं सब की चाबियां लाती हूं । कोई तो लगेगी !’’
‘‘ठीक है । मैं इस हक में तो नहीं हूं लेकिन... कर लो अपनी मनमानी ।’’
‘‘ठीक है ।’’
‘‘लेकिन देख लेना, जैसा तुम सोच रही हो, वैसा उनमें से कुछ नहीं निकलने वाला ।’’
‘‘न निकले । तो तुम्हारे दोस्त के सूटकेस मेरे सिर माथे...’’
“खन्ना शरीफ, सम्भ्रान्त सदाचारी आदमी था, वो भला क्यों कोई गलत चीज़ मेरे मत्थे मढ़ेगा ! भला क्यों होगी कोई गलत चीज उसके पास !’’
‘‘माई डियर हसबैंड, कुछ तो गलत जरूर है, वर्ना क्यों उसे सूटकेस छुपाने की जरूरत महसूस हुई ? क्यों वो उन्हें अपने घर रखने की जगह इतने खुफिया तरीके से यहां पहुंचा के गया ?’’
‘‘होगी कोई वजह !’’
‘‘क्या ? कोई एक वजह बयान करो ।’’
संजीव को जवाब न सूझा ।
‘‘ठीक है ।’’ — वो झुंझलाया — ‘‘अब जो करना है, करो ।’’
सहमति में सिर हिलाती विनीता स्टोर में गयी और वहां से वो सूटकेस उठा कर बैडरूम में लायी ।
फिर वार्डरोब के एक दराज से उसने चाबियों का एक गुच्छा बरामद किया ।
बड़े धीरज से वो एक एक चाबी सूटकेसों के तालों में ट्राई करने लगी ।
कोई भी चाबी किसी ताले में न लगी ।
गुच्छा फेंक कर वो सीधी हुई, उसने असहाय भाव से गर्दन हिलाई ।
‘‘अब ?’’ — संजीव के स्वर में तनिक व्यंग्य का पुट आया ।
‘‘ये काम तो आज मैं करके रहूंगी ।’’ — विनीता दृढ़ता से बोली ।
‘‘कैसे ? क्या करोगी ?’’
विनीता के तुरन्त जवाब देते न बना, वो बेचैनी से पहलू बदलती रही ।
संजीव इसकी परेशानी से आनन्दित होता रहा ।
‘‘सरदार !’’ — फिर एकाएक वो तमक कर बोली ।
‘‘क्या ?’’
‘‘ताला चाबी वाला । सरदार तालाचाबी वाला । मार्केट में एक बिजली के खम्बे पर एक काला बोर्ड टंगा है जिस पर सरदार ताला चाबी वाला और एक मोबाइल नम्बर लिखा है । मुझे मालूम है ताला चाबी वाला मिस्त्री एक सरदार उस खम्बे के नीचे बैठता है । न हो तो काले बोर्ड पर लिखे मोबाइल नम्बर पर फोन कर के उसे बुलाया जा सकता है । जा कर पता करो ।’’
‘‘मैं !’’ — संजीव हड़बड़ाया — ‘‘मैं तो काले बोर्ड वाले खम्बे से वाकिफ नहीं, कैसे तलाश करूंगा ?’’
‘‘ठीक है । मैं जाती हूं ।’’
‘‘पहले एक बात सुनो ।’’
‘‘क्या बात ?’’
‘‘सूटकेस में हुई कोई गैरकानूनी, काबिलेऐतराज चीज तो वो उस सरदार मिस्त्री की जानकारी में भी आयेगी । क्या ये मुनासिब होगा ?’’
‘‘नहीं आयेगी । हम खास खयाल रखेंगे कि वो ताले ही खोले, सूटकेसों के ढक्कन न उठाये ।’’
‘‘कुछ काबिलेऐतराज न निकला तो सूटकेस बदस्तूर बन्द भी तो करने होंगे !’’
विनीता ने उस बात पर विचार किया ।
‘‘वो ताले खोलेगा ही नहीं, तालों की चाबियां भी बना कर देगा । क्या प्राब्लम है ?- काम है उसका !’’
संजीव ने हिचकिचाते हुए सहमति में सिर हिलाया ।
‘‘जाती हूं ।’’
अपार व्यस्तता का प्रदर्शन करती विनीता वहां से रुखसत हुई ।
गौतमी रैना स्टडी में थी ।
वो लगभग चौबीस साल की खूबसूरत, स्मार्ट, दुनियादार युवती थी जिसे बजातेखुद भी पढ़ने लिखने से बहुत लगाव था इसलिए वो अपनी मौजूदा नौकरी से राजी थी जो कि उसे नौकरी लगती ही नहीं थी, पिकनिक लगती थी । चावला पति पत्नी दोनों का ऐसा स्नेही स्वभाव था कि अपनी वहां मौजूदगी के दौरान उसे लगता ही नहीं था कि वो अपने घर से बाहर थी । चावला साहब का डिक्टेशन का कोई काम न हो या उसने कम्प्यूटर पर टाइपिंग न करनी हो तो किचन में जा कर मिसेज चावला का हाथ बंटा देती थी । मसलन मटर छील देती थी, प्याज टमाटर अदरक काट देती थी, और कई बार तो ऐसा भी होता था कि मुकम्मल लंच ही वो बनाती थी । इसी वजह से किचन का एक काम तो खास उसके जिम्मे होता था । चावला दम्पत्ति रात को सोने से पहले अदरक डाल कर उबाला हुआ दूध पीते थे । और ऐसा दूध रोज गौतमी उन के लिए बना कर बैडरूम में उन के सिरहाने रख कर जाती थी । वो दोनों सोने से पहले या तो उस दूध को वैसे ही पी लेते थे या माइक्रोवेव में आधा मिनट रख कर गर्म कर लेते थे । बहरहाल भाईचारा अच्छा स्थापित था जो कि विनीता के साथ तो भाईचारे से बढ़ कर था, बहनापा था ।
बैडरूम में चलते वार्तालाप की मद्धम आवाजें स्टडी में उस तक पहुंच रही थीं । आवाजों में जब उत्तेजना का पुट आने लगा तो वो उसे साफ सुनाई देने लगीं । फिर उसमें स्त्री सुलभ उत्सुकता ऐसी जागी कि वो अपनी टेबल पर से उठी, जा कर दरवाजे पर खड़ी हुई और उसमें एक झिरी बना कर सब कुछ कान लगा कर सुनने लगी ।
जो उसकी समझ में आया वो ये था कि एक अरसे से घर में दो पराये सूटकेस थे जो कि तकरार का मुद्दा थे और जिन को अब जबरन खोलने का कोई इन्तजाम किया जाने लगा था ।
तमाम सिलसिला संजीव चावला के नावल के एक चैप्टर जैसा ही था इसलिये आगे भी उसकी उत्सुकता पूर्ववत् बनी रही जब कि चोरी से कोई गुप्त वार्तालाप सुनने का उसका कोई इरादा नहीं था । उस घड़ी उसे कोई काम नहीं था इसलिये अनायास, दिल बहलाव की खातिर, उसने वो काम पकड़ लिया था ।
विनीता एक कोई पचास साल के ढीली पगड़ी, अधपकी, मैली दाढ़ी मूंछ वाले सरदार के साथ लौटी जो कि ताला-चाबी मिस्त्री था ।
कुल दस मिनट को वहां ठहरा जिसमें से दो मिनट उसने ताले खोलने में और बाकी आठ मिनट उन की चाबियां बनाने में लगाये और अपनी फीस — दो सौ रुपये — ले कर वहां से विदा हो गया ।
मिस्त्री के जाने के बाद विनीता वापिस बैडरूम में पहुंची तो गौतमी ने भीतर से चिटखनी चढ़ाये जाने की आवाज साफ सुनी । उस बात ने गौतमी की उत्सुकता को दोबाला कर दिया ।
क्या माजरा था ?
ऐसे दिनदहाड़े पहले तो कभी चिटखनी नहीं चढ़ाई गयी थी !
सरदार मिस्त्री के हाथ में उसने सौ सौ के दो नोट देखे थे इसलिए ये तो स्पष्ट था, स्थापित था कि वो अपने काम को बाखूबी अंजाम देकर गया था ।
यानी जो बन्द सूटकेस तकरार का मुद्दा थे, वो खुल चुके थे ।
दबे पांव गौतमी स्टडी से निकली और बैडरूम के बन्द दरवाजे पर पहुंची । सस्पेंस की मारी कुछ क्षण को खामोश ठिठकी खड़ी रही फिर एकाएक वो झुकी और उसने अपनी आंख की-होल के साथ सटा दी ।
विनीता ने एक सूटकेस का ढक्कन उठाया ।
तत्काल उसके नेत्र फट पड़े ।
वही हाल संजीव का भी हुआ ।
सूटकेस नोटों से ठूँसा हुआ था ।
पति पत्नी की निगाह मिली । किसी के मुंह से भी बोल न फूटा । दोनों हकबकाये कभी एक दूसरे को तो कभी खुले सूटकेस को देखते रहे ।
‘‘दाता !’’ — संजीव बड़ी मुश्किल से बोल पाया ।
विनीता ने अपने एकाएक सूख आये होंठों पर जुबान फेरी, जोर से थूक निगली और फिर कांपते हाथों से दूसरे सूटकेस का ढक्कन उठाया ।
नोट ! सूटकेस में ऊपर तक भरे हुए ।
‘‘हाय राम !’’ — विनीता भौंचक्की सी बोली — ‘‘इतने नोट !’’
‘‘दाता !’’ — संजीव के मुंह से फिर निकला ।
‘‘करोड़ों होंगे !’’ — विनीता फुसफुसाई ।
‘‘पागल हुई हो । इन दोनों आम साइज के सूटकेसों में करोड़ों रुपये आ सकते हैं कहीं !’’
‘‘ज्यादा नोट पांच सौ के हैं । एक करोड़ रुपया तो शर्तिया !’’
‘‘हूं । लेकिन...’’
‘‘देख लिया ! मैं न कहती थी कि सूटकेसों में कोई भेद है !’’
संजीव खामोश रहा ।
‘‘ये शर्तिया दो नम्बर का पैसा है । तुम्हारा दोस्त जरूर कोई ऐसी नौकरी करता था जिसमें रिश्वत का बोलबाला था । पोल खुलने लगी होगी, रेड का अन्देशा हुआ होगा तो अपना रिश्वत का हासिल यहां छुपा गया ।’’
‘‘उसकी नौकरी ऐसी नहीं थी ।’’
‘‘तो इतने पैसे का उसके पास क्या काम !’’
संजीव से जवाब देते न बना ।
‘‘उसकी मौत वाले रोज उसके घर में गुण्डे बदमाशों का डेरा था, गोलियां चली थीं, जरूर वो तमाम फसाद इस रकम की वजह से हुआ था ।’’
‘‘ये रकम तब वहां कहां थी ! ये सूटकेस तो खन्ना उस रोज से बहुत पहले यहां छोड़ गया था !’’
‘‘गुंडे बदमाश पूछते होंगे कि कहां छुपा कर आया था, वो बताता नहीं होगा, इसलिए उसकी जुबान खुलवाने की कोशिश में उसे इतनी मार लगाई कि मर ही गया ।’’
‘‘नानसेंस ! उसकी जान बीवी को बलात्कार से बचाने की कोशिश में गयी थी ।’’
‘‘तुम्हें क्या पता ?’’
‘‘अखबार में छपा था ।’’
‘‘अखबार वालों को क्या पता ? मरने वाला मर गया, बीवी पागल हो गयी, अखबार वालों को क्या पता ?’’
संजीव खामोश रहा ।
‘‘मुझे पूरा यकीन है कि ये पैसा ही तुम्हारे दोस्त की जान जाने की वजह थी । अब उन बदमाशों को पता लग गया कि पैसा यहां है तो हमारा भी वही अंजाम होगा ।’’
‘‘वो बदमाश गिरफ्तार हैं, जेल में हैं, सजा काट रहे हैं ।’’
‘‘एक तीसरा और था जो पुलिस के आने से पहले भाग गया था । अगर वो यहां आ गया तो...”
‘‘सवा साल होने को आया । अब तक नहीं आया तो अब क्या आयेगा !’’
‘‘क्या पता लगता है !’’
‘‘यानी ये नोट हमारे लिये खतरा हैं ?’’
‘‘हो सकते हैं ।’’
‘‘फिर तो हमें दो में से एक काम करना होगा ।’’
‘‘क्या ?’’
‘‘या तो रुपया पुलिस के हवाले करना होगा...”
‘‘नैवर ।’’
‘‘या इसे जला कर राख टायलेट में बहा देनी होगी ।’’
‘‘हरगिज नहीं ।’’
‘‘तो ?”
‘‘तो...तो...सुनो, जब तुम इन्हें खन्ना की बीवी की अमानत बताते हो तो कैसे हम इन्हें जला सकते हैं या पुलिस के हवाले कर सकते हैं !’’
‘‘पास भी तो नहीं रखे रह सकते !’’
‘‘रह सकते हैं । रखेंगे । खन्ना की बीवी हमें नहीं मिलने की, इसलिये ये रुपया हमारा । फाइन्डर कीपर की विलायती थ्योरी की बिना पर ।’’
‘‘विनीता, इतना रुपया घर में रखना मौत को दावत देना है ।’’
‘‘कुछ नहीं होता । किसी को कुछ मालूम पड़ेगा तो होगा न !’’
‘‘इतने रुपये की घर में मौजूदगी में रात को नींद आ जाये तो बोलना । देख लेना, इसी सस्पेंस में पलक नहीं झपकेगी कि रुपया सलामत है या नहीं है !’’
‘‘तो क्या करें ?’’ — विनीता चिढ़ कर बोली — ‘‘सच में फूंक दें ? सच में पुलिस के हवाले कर दें ?’’
‘‘काश तुमने सूटकेसों को खोले जाने की जिद न की होती ।’’
‘‘जिद न की होती तो तुम्हें कभी मालूम न होता कि घर में लक्ष्मी का वास है ।’’
‘‘अब हम क्या करेंगे ?’’
‘‘सोच लेंगे । घर आयी लक्ष्मी का अनादर करने के अलावा कुछ भी करेंगे । अब गिनो ।’’
‘‘क्या !’’
‘‘अरे, ये रकम गिनो, मैं भी गिनती हूं, मालूम तो पड़े कितनी है !’’
‘‘अच्छा !’’ — संजीव के स्वर में स्पष्ट अनिश्चय का पुट था ।
‘‘हां । शुरू करो ।’’
पूरी रकम मोटे तौर पर गिनने में भी उन्हें आधा घन्टा लग गया ।
‘‘चौंसठ लाख !’’ — खुशी से हुमकती दमकती विनीता ने घोषणा की ।
चौंसठ लाख !
की-होल में आंख सटाये बैठी गौतमी की सांस रकम के जिक्र से ही ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गयी ।
सौ और पांच सौ की गड्डियों में ।
ऐसी कितनी गड्डियां होती होंगी चौंसठ लाख रुपयों में !
वो लोग क्या करेंगे इतनी बड़ी रकम का !
फौरन तो कुछ नहीं कर पायेंगे ।
उस वक्त छ: बजने को थे । रात को कहां ले जाते वो इतनी बड़ी रकम को ! क्यों ले जाते ? ले भी जाते तो कोई बड़ी बात नहीं थी कि किसी पुलिस के चैकिंग के लिये लगे बैरियर पर धर लिये जाते । रकम भी जाती और गिरफ्तारी भी होती ।
नहीं — उसकी अक्ल ने जवाब दिया — कुछ अरसा रकम वहीं, उस घर में ही रहने वाली थी ।
कहां ?
मालूम पड़ जायेगा ।
पड़ क्या जायेगा, वो जान के रहेगी ।
शिखर आहूजा एक कोई तीस साल का, ठीक-ठाक शक्ल सूरत वाला नौजवान था जो कि सूरत से ही बहुत चतुर सुजान जान पड़ता था । वो दवाइयां बनाने वाली एक कम्पनी में सेल्समैन था, कम्पनी का दफ्तर नेहरू प्लेस में था इसलिये अगर वो फील्ड वर्क पर न हो तो वो लंच के लिये अक्सर ईस्ट ऑफ कैलाश गौतमी रैना के पास पहुंच जाता था जिस का कि वो ब्वाय फ्रेंड था और जहां वो अमूमन लंच करते थे, वो एक छोटा सा लेकिन नफीस, सुथरा चायनीज रेस्टोरेंट था जो कि लेडी श्रीराम कालेज से सड़क पार की अजीत मार्केट नाम की एक मार्केट में था ।
उस घड़ी डेढ़ बजने को था और वो रेस्टोरेंट में एक कोने की टेबल पर आमने सामने बैठे थे । अमूमन ऐसी लंच टाइम मीटिंग का प्रस्ताव शिखर की तरफ से होता था लेकिन तब गौतमी ने उसे खास फोन कर के, ‘एक निहायत जरूरी बात’ का हवाला दे कर बुलाया था जिसकी वजह से शिखर खासा सस्पेंस में था ।
वेटर को दूर रखने के लिये आर्डर देना जरूरी था इसलिये गौतमी ने उसे चिकन स्वीट कार्न सूप का आर्डर दिया था ।
आर्डर जारी होने और उसके सर्व होने के दौरान गौतमी ने दबे स्वर में पिछली शाम का किस्सा बयान किया ।
‘‘हे भगवान !’’ — शिखर भौचक्का सा बोला — ‘‘इतना रुपया !’’
‘‘धीरे !’’ — गौतमी फुंफकारती सी बोली — ‘‘धीरे !’’
‘‘इतना रुपया !’’ — शिखर फुसफुसाया — ‘‘तेरे एम्पालयर के घर में यूं ही पड़ा है ! अनसेफ ! अनप्रोटेक्टिड ! जो कि उसका है भी नहीं !’’
‘‘हां । और इसी वास्ते ये बात जिक्र के काबिल है । संजीव चावला का जो दोस्त सवा साल पहले वो दो सूटकेस उसके पास अमानत के तौर पर रख कर गया था, उसकी तभी, कुछ दिन बाद ही बहुत मिस्टीरियस सरकमस्टांसिज में मौत हो गयी थी और साफ जाहिर है उसने सूटकेसों की बाबत किसी से कोई जिक्र नहीं किया था वर्ना अब तक तो कब का कोई उनकी फिराक में मेरे एम्पलायर के पास पहुंच चुका होता । और दिलचस्प बात ये है कि कल शाम तक तो उन लोगों को भी मालूम नहीं था कि उन सूटकेसों में क्या था । वो तो कल एकाएक बीवी ने जिद की, जुनूनी जिद की कि उन्हें मालूम होना चाहिये था कि सवा साल से घर में पड़े सूटकेसों में क्या था । नतीजतन सूटकेस खोले गये तो समझो कि करिश्मा हुआ । सवा साल से घर में लावारिस पड़े सूटकेस नोटों से लबालब भरे निकले ।’’
‘‘चौंसठ लाख !’’
‘‘हां !’’
‘‘कैसे मालूम ?’’
‘‘बाकायदा गिने उन लोगों ने ।’’
‘‘ओह !’’
‘‘अब पोजीशन ये है कि नोटों से भरे दो सूटकेस उस घर में पड़े हैं और जब तक उनकी सम्भाल की, चौकसी की कोई सूरत नहीं निकलती वो घर में ही रहेंगे ।’’
‘‘सम्भाल की सूरत निकली तो क्या निकलेगी ?’’
‘‘शायद तीन चार बैंक लाकर किराये पर लें और धीरे धीरे रुपया उन में पहुंचायें । वैसे अभी तो वो सोच ही रहे हैं कि क्या करें !’’
‘‘लौटाने का कोई इरादा नहीं !’’
‘‘किस को लौटायेंगे ? जब न मालिक की खबर है, न वारिस का पता है तो किस को लौटायेंगे !’’
‘‘ठीक !’’
‘‘ऐसा कोई अतापता निकल भी आये तो क्यों लौटायेंगे ! ऊपर वाले ने छप्पर फाड़ के भेजा है, उनका इरादा — खास तौर से बीवी का — उस बाबत चुप्पी साधे रहने का ही है । हालात का इशारा साफ है कि उन सूटकेसों की बाबत दरयाफ्त करता उन तक कोई नहीं पहुंचने वाला । यूं पहुंच सकने वाले किसी शख्स का कोई वजूद होता तो कब का पहुंच चुका होता ।’’
‘‘यानी माल उनका, उनके बाबा का !’’
‘‘हां । बीवी तो इस बाबत दृढ़ निश्चय कर भी चुकी है ।’’
‘‘ठीक । लेकिन ये जिक्र हमारे बीच किस लिये ?’’
‘‘सोचो ।’’
‘‘तुम बोलो । क्योंकि जो मैंने सोचना है, वो तो लगता है तुम सोच भी चुकी हो ।’’
‘‘है तो ऐसा ही !’’
‘‘गुड !’’
‘‘तुमने चोरों को मोर वाली मसल सुनी है न !’’
‘‘हां ।’’
‘‘इसे हम लागू कर सकते हैं ।’’
‘‘मतलब ?’’
‘‘वो रकम हम हथिया सकते हैं ।’’
‘‘क्या बात करती हो !’’
‘‘वो लोग उस रकम के मालिक नहीं है, वो उनके हाथ से निकल गयी तो वो कहीं शिकायत करने नहीं जा सकते ।’’
‘‘जा सकते हैं । दूसरे की अमानत करार दे कर जा सकते हैं ।’’
‘‘दूसरा कौन ? किस का नाम लेंगे ? किसे पेश करेंगे ? जिस को पेश कर सकते थे, वो तो गया इस दुनिया से कब का !’’
‘‘हूं ।’’
‘‘दूसरे, वो रकम वाईट मनी नहीं हो सकती । वो लोग नहीं जानते कि उस रकम की बैक ग्राउन्ड में क्या है ! वो कोई चोरी-डकैती की रकम निकली तो धर लिये जायेंगे ।’’
‘‘ओह !’’
‘‘कहने का मतलब ये है कि रकम हाथ से निकल गयी तो उसके बारे में मुंह फाड़ना वो अफोर्ड नहीं कर सकते ।’’
‘‘हाथ से निकलेगी कैसे ?’’
‘‘हम निकालेंगे । मेरा मतलब है तुम निकालोगे ।’’
‘‘कैसे !’’
‘‘वो रकम घर में मौजूद है और कुछ अरसा वहीं मौजूद रहने वाली है । आज शनिवार है । अभी तक वो घर में ही है । लॉकर के बारे वो जो करेंगे, सोमवार को करेंगे । तुम हिम्मत से काम लोगे तो वो रकम आज ही हमारे कब्जे में होगी ।’’
‘‘मैं !’’
‘‘और कौन ?’’
‘‘लेकिन मैं !’’
‘‘हां ।’’
‘‘क्या...क्या करना होगा ? क्या करना होगा ? जरूर इस बाबत तुम कुछ सोचे बैठी हो !’’
‘‘कुछ नहीं, सब कुछ ।’’
‘‘क्या ?’’
‘‘सुनो । उन के बैडरूम में बाक्स बैड्स हैं । वो दोनों सूटकेस एक बाक्स में हैं, ये मेरी गारन्टी ।’’
‘‘कैसे ?’’
‘‘मैंने अपनी आंखों से उन्हें सूटकेसों को एक बाक्स में रखते देखा था ।’’
‘‘कमाल है !’’
‘‘कोई कमाल नहीं । जब मेरी निगाह ही उन पर थी तो कोई कमाल नहीं ।’’
‘‘आगे बढ़ो ।’’
आगे विनीता ने उसे अदरक में उबाले दूध की बाबत बताया ।
‘‘आज शाम’’ — फिर बोली — ‘‘मैं वहां से लेट निकलूंगी और दूध के दोनों गिलासों में बेहोशी की दवा मिलाकर उनके सिरहाने रख कर जाऊंगी ।’’
‘‘बेहोशी का दवा ! वो कहां से आयेगी ?’’
‘‘उन्हीं के पास से आयेगी । मेरा एम्पालयर कभी कभी नींद की गोली खाता है । गोलियों की शीशी उसके बैडरूम में बैड की साइड टेबल पर ही पड़ी होती है । मैं उस शीशी में से कुछ गोलियां चुरा लूंगी और उनके दूध में मिला दूंगी ।’’
‘‘कितनी ?’’
‘‘दोनों को लम्बी नींद सुलाने के लिये तीन तीन काफी होंगी ।’’
‘‘यानी छ: गोलियां !’’
‘‘हां !’’
‘‘संजीव चावला को पता नहीं लगेगा ?’’
‘‘नहीं लगेगा । वो सौ गोलियों की शीशी है जो अभी तीन चौथाई से ज्यादा फुल है । उसमें से कुछ गोलियों की घट बढ़ उसकी निगाह में नहीं आने वाली ।’’
‘‘इतनी गोलियां एक साथ खाने पर कोई उलटा असर हो गया तो ?’’
‘‘कोई उलटा असर नहीं होगा । सिवाय इसके कि घनघोर नींद सोयेंगे और सुबह देर से सो के उठेंगे ।’’
‘‘यूं अक्सर लोग बाग नींद में ही मर जाते हैं । अखबारों में अक्सर छपता है ।’’
‘‘जब ढेरों गोलियां खा जाते हैं — ऐसा वही करते हैं जिन की खुदकुशी की मंशा होती है — महज तीन गोलियों से कोई नहीं मरता ।’’
‘‘और ?’’
‘‘और बस मेनडोर की चाबी होनी चाहिये तुम्हारे पास ।’’
‘‘कैसे होगी ?’’
‘‘मैं दूंगी ।’’
‘‘क्या करोगी ?’’
‘‘वो चाबी अमूमन ड्राईंगरूम में डायनिंग टेबल पर या वाल कैबिनेट के टॉप पर पड़ी होती है जिसकी तरफ या रात को तब तवज्जो दी जाती है जब क्लोजिंग टाइम होता है या सुबह को जब मेनडोर खोला जाना होता है या उन दोनों ने घर को लॉक कर के कहीं जाना होता है । ऐसा जाना दिन में हो तो वो मुझे निकाल बाहर नहीं करते । वो या तो मुझे भी साथ ले के जाते हैं या घर को मेरे हवाले कर के जाते हैं । रात में हो तो बात जुदा है ।’’
‘‘ठीक ! ठीक ! लेकिन तुम करोगी क्या ?’’
‘‘चाबी कब्जे में करूंगी, बहाने से मार्किट में जाऊंगी और उसकी डुप्लीकेट चाबी बनावा लूंगी ।’’ — वो एक क्षण ठिठकी और फिर बड़े अर्थपूर्ण स्वर में बोली — ‘‘तुम्हारे लिये । तुम्हारे काम आने के लिये । तुम्हारे खास काम आने के लिये ।’’
‘‘वो चाबी को मिस नहीं करेंगे ?’’
‘‘मुश्किल से आधे घण्टे के लिये चाबी घर से गायब होगी । नहीं करेंगे । मैं ने बोला न वो सारा दिन लावारिस कहीं भी पड़ी रहती है !’’
‘‘मुझे क्या करना होगा ?’’
‘‘ये कोई पूछने की बात है !’’
‘‘मैं रात को किसी घड़ी वहां पहुंचूगा, डुप्लीकेट चाबी से मेनडोर का ताला खोल कर भीतर दाखिल होऊंगा और दोनों सूटकेस वहां से निकाल लाऊंगा !’’
‘‘एक्जैक्टली ।’’
‘‘मेनडोर पर अन्दर की तरफ चिटखनी होती है । वो लगी हुई हो तो ताला खोल लेने के बावजूद बाहर से दरवाजा नहीं खुल सकता ।’’
विनीता तत्काल संजीदा हुई ।
‘‘चिटखनी है तो सही वहां भी !’’ — फिर उसके मुंह से निकला ।
‘‘तो ?’’
‘‘तो कुछ नहीं । मैं वो चिटकनी बिगाड़ दूंगी । तुम निश्चिन्त रहो, आज रात वो लोग ताला बन्द कर के चिटखनी चढ़ायेंगे तो वो नहीं चढ़ेगी ।’’
‘‘हैरान नहीं होंगे कि एकाएक चिटखनी कैसे बिगड़ गयी ?’’
‘‘होंगे तो हो लें । ऐसी चीज़ें बिगड़ती ही रहती हैं, उनके बिगड़ने का कोई कैलेंडर थोड़े ही होता है !’’
‘‘बिगड़ी पायेंगे तो क्या करेंगे ?’’
‘‘क्या करेंगे ! अगले रोज या ठीक करायेंगे या चेंज करायेंगे ।’’
‘‘हूं ।’’
‘‘ये एक रूटीन बात होगी जिसकी की तरफ वो कोई खास तवज्जो नहीं देने वाले ।’’
‘‘तुम्हारा मतलब है ये उन के जेहन में नहीं आयेगा कि चिटखनी जानबूझ कर बिगाड़ी गयी थी ?’’
‘‘नहीं आयेगा । मैंने चिटखनी को डैमेज नहीं करना, बस उसके लिवर को इतना बिगाड़ना है कि वो ऊपर चौखट में लगी आंख न पकड़े ।’’
‘‘कर लोगी ?’’
‘‘हां ।’’
‘‘डुप्लीकेट चाबी मेन डोर में न लगी तो ?’’
‘‘क्यों नहीं लगेगी ? मैं उसे आजमा के तुम्हें दूंगी तो क्यों नहीं लगेगी ?’’
‘‘फिर भी किसी वजह से, किसी भी वजह से दरवाजा न खुला तो ?’’
‘‘तो क्या ! ठण्डे ठण्डे लौट आना ।’’
‘‘यानी मिशन फेल्ड ! प्रॉजेक्ट ड्राप्ड !’’
‘‘इतनी जल्दी नहीं । इतनी आसानी से नहीं । फिर कुछ और सोचेंगे ।’’
‘‘तब तक गाड़ी छूट गयी तो ?’’
‘‘नहीं छूटेगी । हालात पुकार कर कह रहे हैं कि वो रकम कुछ दिन और उस घर में ही रहने वाली है ।’’
‘‘वो लोग बैड पर बेहोश पड़े होंगे तो मैं बैड का बाक्स कैसे खोलूंगा ?’’
‘‘नाओ यू आर इरीटेटिंग मी ।’’
‘‘नो ! नेवर !’’
‘‘हट्टे कट्टे नौजवान हो । एक जिस्म को एक पहलू से दूसरे पहलू लुढ़काना ही तो होगा ! क्या प्राब्लम है ?’’
‘‘हूं ।’’
‘‘कोई और आब्जेक्शन ?’’
‘‘है तो सही एक !’’
‘‘बोलो वो भी ।’’
‘‘आधी रात को मैं कहीं पुलिस की चैकअप का शिकार हो गया गया तो ? मेरी कार को कहीं पुलिस के किसी चैकिंग बैरियर पर रोक लिया तो ?’’
‘‘बस, यही एक रिस्क है थोड़ा जो तुम्हें झेलना पड़ेगा ।’’
‘‘ईस्ट ऑफ कैलाश से विकासपुरी तक ऐसी पिकेट एक से ज्यादा मिल सकती है !’’
‘‘दुआ करना कि तुम्हारे साथ शुभ शुभ बीते ।’’
‘‘हूं ।’’
‘‘रात को पुलिस की निगाह जरायमपेशा तबके पर होती है । तुम शरीफ, सम्भ्रान्त व्यक्ति हो, अव्वल तो तुम्हें रोका नहीं जायेगा, रोका जायेगा तो सरसरी निगाह दौड़ा कर ही चला जाने दिया जायेगा ।’’
‘फिर भी ...’’
‘‘नो और भी । ऐसा मौका जिन्दगी में एक ही बार आता है । जिन्दगी गुजर जायेगी, वैसे इतनी बड़ी रकम नहीं कमा पाओगे ।’’
‘‘ये बात तो ठीक है तुम्हारी !’’
‘‘थोड़ा रिस्क है लेकिन थोड़ा ही है । अब जवाब बोलो अपना ।’’
‘‘मैं रिस्क लेने को तैयार हूं ।’’
‘‘गुड !’’
‘‘मुझे क्या मिलेगा ?’’
‘‘वैसे तो हमारा सब कुछ साझा है । आगे जब जिन्दगी एक होने वाली है तो सब कुछ भी तो एक ही होगा । नो ?’’
‘‘यस ।’’
‘‘ फिर भी जवाब चाहते हो तो जवाब है फिफ्टी फिफ्टी ।’’
‘‘यानी बत्तीस लाख मेरे, बत्तीस लाख तुम्हारे ?’’
‘‘हां ।’’
‘‘बहुत सुखद सपना है ।’’
‘‘साकार होगा । पाजिटिव थिंकिंग रखो, कोई विघ्न नहीं आयेगा, कोई फच्चर नहीं पड़ेगा ।’’
‘‘गॉड ब्लैस यू, माई डियर ।’’
‘‘कोई और बात ?’’
‘‘है तो सही एक । बुरा न मानो तो पूछूं ?’’
‘‘आपसदारी में बुरा नहीं माना जाता । पूछो !’’
‘‘जो कैरीकेचर तुमने खींचा है, वो इसे एक मालूमी काम जाहिर करता है, खुद ही क्यों नहीं कर लेती हो ?’’
‘‘वजह है ।’’
‘‘क्या ?’’
‘‘उस हाउसहोल्ड में तीन ही मेम्बर हैं जिनमें मैं एक हूं । मुझे उम्मीद तो नहीं ऐसा होगा । लेकिन बाद में फिर भी कोई होहल्ला मचा तो मेरी तरफ तवज्जो जा के रहेगी । मेरी कोई पड़ताल होने की सूरत में मेरे पास अपने बचाव के लिये वाटर टाइट एलीबाई होना जरूरी है जो अगर मैं खुद ही उस काम को अंजाम दूंगी तो नहीं हो पायेगी ।’’
‘‘ठीक ।’’
‘‘इसी वजह से काम हो जाने के बाद दो दिन मुझे तुम से दूर रहना होगा ।’’
‘‘ये की न समझदारी की बात ।’’
‘‘उस दौरान वारदात की बाबत चावला दम्पत्ति का रुख भी उजागर हो जायेगा ।अगर वो खामोश बैठ गये तो बात ही क्या है, उस बाबत कुछ करने की कोशिश की तो उसकी खबर मुझे लग के रहेगी, जो कि अच्छी बात होगी ।’’
‘‘अच्छा !’’
‘‘भई, फोरवार्न्ड इज फोरआर्म्ड ।’’
‘‘ठीक । वैसे तुम समझती हो कि तुम पर कोई शक होगा ?’’
‘‘नहीं । काहे को होगा ? किस बिना पर होगा ?’’
‘‘दैट्स गुड ।’’
‘‘जब मेरे पर शक मुमकिन नहीं होगा तो ये किसी बाहरी आदमी, किसी चोर का काम माना जायेगा जिसने इसे कैसे अंजाम दिया, तफ्तीश का मुद्दा होगा ।’’
‘‘ठीक ।’’
‘‘कोई और बात ? कोई और शंका ?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘मैं चलती हूं ।’’ — विनीता उठ खड़ी हुई — ‘‘बिल तुम भर देना और शाम को छ: बजे यहीं मिलना ।’’
शिखर की भवें उठीं ।
‘‘अरे, भई, चाबी लोगे कि नहीं लोगे ?’’
‘‘ओह ! ओके ! ओके, माई डियर ।’’
���
संजीव चावला साढ़े दस बजे सो के उठा ।
उसने वाल क्लॉक पर निगाह डाली तो उसे सख्त हैरानी हुई ।
इतना लेट तो वो कभी सो कर नहीं उठता था !
फिर ये देखकर उसे और भी हैरानी हुई कि उसके पहलू में बीवी अभी भी सोई पड़ी थी । उसने उसे झिंझोड़ा ।
‘‘उंह !’’ — वो कुनमुनाई — ‘‘सोने दो ।’’
‘‘अरे, साढ़े दस बजे हैं ।’’
‘‘क्या !’’ — विनीता हड़बड़ा कर उठी — ‘‘आज इतनी नींद कैसे आ गयी ?
‘‘मैं खुद हैरान हूं । हम बिना अलार्म साढ़े छ: बजे उठने वाले लोग कैसे साढ़े दस तक सोये रहे !’’
‘‘हैरानी है । मेरा तो अभी भी उठने को जी नहीं चाह रहा है ।’’
‘‘उठ भी जाओ, मैं चाय बनाता हूं ।’’
‘‘नहीं, मैं बनाती हूं ।’’
‘‘ठीक है फिर ।’’
संजीव उठ कर अटैच्ड बाथ में चला गया तो विनीता भी जमहाईयां लेती, अंगड़ाईयां तोड़ती बैड पर से उतरी । उसने कम्बल को तह कर के बैड के उधर के बाक्स में डाला, फिर दूसरी तरफ पहुंची । उसने दूसरा — संजीव का — कम्बल उठाया, उसे तह किया और उधर के बाक्स का ढक्कन उठाया ।
उसके मुंह से तीखी चीख निकली ।
कम्बल उसके हाथ से छूट गया ।
चीख संजीव को बाथरूम में सुनाई दी । आतंक के हवाले वो बगूले की तरह बैडरूम में पहुंचा ।
‘‘क्या हुआ ?’’ — वैसे ही आतंकित स्वर में वो बोला ।
विनीता फटी फटी आंखों से खुले बाक्स में देख रही थी और दायें हाथ से उस की तरफ इशारा कर रही थी ।
‘‘अरे, हुआ क्या !’’ — वो झल्लाया — ‘‘कुछ मुंह से भी तो बोलो !’’
‘‘सू-सूटकेस !’’ — विनीता फंसे कण्ठ से बोली ।
‘‘क्या हुआ उन्हें ?’’
‘‘नहीं है !’’
‘‘नहीं हैं ! कहां नहीं हैं ?’’
‘‘बाक्स में नहीं हैं । जहां रखे थे ।’’
‘‘क्या !’’
संजीव लपक कर बाक्स के पहलू में पहुंचा, उसने आंखें फाड़े उसके भीतर झांका ।
जहां सूटकेस पड़े होने चाहियें थे, खाली वो जगह उसकी तरफ झांक रही थी ।
‘‘कहां गये !’’ — उसके मुंह से निकला ।
‘‘मैं क्या बोलूं ? — विनीता कातर भाव से बोली — ‘‘जो मुझे दिखाई दिया वही तुम देख रहे हो ।’’
‘‘हे भगवान ! क्या जादू हो गया !’’
वो लपक कर मेनडोर पर पहुंचा जिस को उसने मजबूती से वैसे बन्द पाया जैसे कि वो होना चाहिये था । चिटखनी पिछली रात बिगड़ गयी थी इसलिये नहीं लगी हुई थी लेकिन मेनडोर का लॉक बिल्कुल ठीक से बन्द था ।
उसने सारे फ्लैट का चक्कर लगाया ।
कहीं भी किसी चोर की आमद की चुगली करने वाली कोई बात उसे न मिली ।
क्या माजरा था !
वो वापिस बैडरुम में लौटा ।
विनीता ने व्याकुल, प्रश्नसूचक निगाह से उसकी तरफ देखा ।
‘‘रात को कोई यहां आया’’ — संजीव दबे स्वर में बोला — ‘‘और सूटकेस निकाल कर ले गया । लेकिन कौन आया कैसे भीतर दाखिल हो पाया, ये जानने का हमारे पास कोई जरिया नहीं ।’’
‘‘अरे, इससे भी बड़ी बात ये है कि उसे खबर कैसे थी कि यहां नोटों से भरे सूटकेस मौजूद थे ?’’
‘‘ठीक कहा तुमने । कैसे थी ?’’
‘‘गौतमी !’’
‘‘क्या ?’’
‘‘कल हमारे यहां हमारे अलावा कोई था तो गौतमी थी । सूटकेसों की बाबत किसी को कुछ मालूम हो सकता था तो गौतमी को मालूम हो सकता था ।
‘‘अरे, उसको चोर ठहरा रही हो !’’
‘‘नहीं । लेकिन सवाल तो मैं उससे जरूर करूंगी ।’’
‘‘ज्यादती करोगी उसके साथ । वो बहुत सिंसियर लड़की है, हमारे साथ उसका इतना स्नेहभाव स्थापित है, मैं उससे चोरी जैसी किसी हरकत की कल्पना नहीं कर सकता ।’’
‘‘मैं भी नहीं कर सकती । लेकिन फिर कहती हूं, सवाल तो मैं उससे जरूर करूंगी ।’’
‘‘कुछ हाथ नहीं आयेगा । नाहक बेचारी का दिल दुखाओगी ।’’
‘‘फिर भी...’’
‘‘ठीक है, करना । आती ही होगी ।’’
‘‘वो जवाबतलबी बेमानी निकली तो क्या होगा ?’’
‘‘क्या होगा क्या मतलब ?’’
‘‘हमारे घर चोरी हुई है, कुछ तो हमें करना होगा !’’
‘‘क्या करना होगा ? तुम समझती हो हम थाने जाकर रपट लिखा सकते हैं तो ऐसा नहीं हो सकता ।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘घर में इतनी बड़ी रकम की मौजूदगी का हम क्या जवाब देंगे ? क्या बोलेंगे कहां से आयी हमारे पास ?’’
विनीता खामोश रही ।
‘‘पुलिस हमारे ही खिलाफ केस बना देगी । बोल देगी हम ढंके छुपे समगलर हैं, काला बाजारिया हैं, ब्लैक मनी को वाइट करने के धन्धे में हैं । क्या जवाब देंगे हम ?’’
विनीता को जवाब न सूझा ।
‘‘इतनी बड़ी रकम की यहां मौजूदगी का जिक्र करना तो मुसीबत है ही, किसी करिश्माई तरीके से पुलिस ने रकम बरामद कर दिखाई तो और भी बड़ी मुसीबत होगी ।’’
‘‘तो क्या करेंगे हम ?’’
‘‘क्या करेंगे ! खामोश बैठने के अलावा कोई चारा नहीं । माल जिसके नसीब में था, वो ले गया । हम यही कह सकते हैं कि कम ईजी गो ईजी ।’’
‘‘कोई साजिश तो हमारे खिलाफ बीती रात बराबर हुई है । और उस साजिश में गौतमी का दखल बराबर हो सकता है । ऐसा मैं इसलिये कह रही हूं क्योंकि उसके अलावा और किसी का दखल मुझे मुमकिन दिखाई नहीं देता । हमें उस लड़की के साथ सख्ती से पेश आना चाहिये । हो सकता है यूं रकम का सुराग मिल जाये, उसकी वापसी हो जाये । क्या खयाल है ?’’
संजीव ने कोई खयाल जाहिर न किया ।
गौतमी में उसकी ऐसी ही निष्ठा थी, ऐसा ही विश्वास था ।
रविवार दोपहर के करीब गौतमी रैना ईस्ट ऑफ कैलाश संजीव रैना के यहां पहुंची ।
पिछली रात के मिशन की कामयाबी की खबर उसे रात को ही मोबाइल पर मिल गयी थी और तब से वो हवाओं के हिंडोलों पर झूल रही थी ।
रविवार उसका छुट्टी का दिन था, लेकिन उसके एम्पलायर का छुट्टी वाले दिन भी कभी कभार ऐसा बुलावा आ जाना कोई बड़ी बात नहीं थी, कोई नयी बात नहीं थी ।
पति पत्नी उसे निहायत संजीदासूरत ड्राइंगरूम में बैठे मिले ।
गौतमी का दिल लरजा ।
क्योंकि चोर का दिल छोटा ।
फिर उसने अपने आप को काबू में किया और सशंक भाव से पूछा — ‘‘क्या बात है ? खैरियत तो है ?’’
जवाब देने की जगह पति ने पत्नी की तरफ देखा ।
‘‘बैठ ।’’ — विनीता गम्भीरता से बोली ।
‘‘लेकिन...’’
‘‘बैठ तो सही !’’
गौतमी झिझकती सी उसके सामने बैठ गयी ।
‘‘कल यहां’’ — विनीता बोली — ‘‘एक खास बात वाकया हुई थी । उस से बड़ी बात, कहीं बड़ी बात, रात को हुई, तेरे को इस बाबत कुछ मालूम है ?’’
‘‘आप पहेलियां बुझा रही हैं ।’’
‘‘विनीता, साफ बोल ।’’ — संजीव बोला ।
विनीता ने सहमति में सिर हिलाया और बोली — ‘‘इस घर में सवा साल से दो पराये सूटकेस मौजूद थे जिनकी बाबत हमें नहीं मालूम था कि उन में क्या था । कल हमारे सस्पेंस की हद हो गयी थी इसलिये हमने वो सूटकेस खुलवा लिये थे । कल एक झोलझाल सिख यहां आया था, तुझे उसकी खबर होगी ! नहीं ?’’
‘‘हां । आप लौटीं थीं तो मैं ने उसे आपके साथ देखा था । लेकिन मुझे ये नहीं मालूम कि वो कौन था ।’’
‘‘अब जान ले । वो ताला-चाबी मिस्त्री था जिससे हमने उन दो सूटकेसों के ताले खुलवाये थे ।’’
‘‘ओह ! सूटकेसों में क्या था ?’’
‘‘तुझे नहीं मालूम ?’’
‘‘नहीं । मालूम होता तो पूछती ! फिर मालूम होता भी तो कैसे होता ?’’
‘‘सूटकेस हमने अपने बैडरूम में खुलवाये थे, तब तू स्टडी में थी, चाहती तो मालूम कर सकती थी ।’’
‘‘कैसे ?’’
‘‘कैसे भी ।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘यूं ही । उत्सुकतावश । घर में सस्पेंस का माहौल बने तो उत्सुकता होती ही है !’’
‘‘सस्पेंस ! सस्पेंस किसलिये ?’’
‘‘तुझे नहीं मालूम ?’’
‘‘फिर वही सवाल ! गुस्ताखी माफ, विनीता जी, आप ये तो बोलिये मुझे क्या नहीं मालूम ! कोई हिंट तो दीजिये !’’
‘‘गौतमी’’ — संजीव बोला — ‘‘उन सूटकेसों में चौंसठ लाख रुपया था ।’’
गौतमी के मुंह से हैरानीभरी तीखी सिसकारी निकली ।
‘‘रात को सूटकेस बैडरूम में बाक्स बैड में थे, सुबह नहीं थे ।’’
‘‘नहीं थे ! क्या मतलब ?’’
‘‘वही मतलब जो नहीं थे का होता है । सूटकेस अपनी जगह से गायब थे ।’’
‘‘ओह ! तो आप ये समझते हैं कि वे सूटकेस मैंने चुरा लिये ?’’
‘‘अरे नहीं’’ — संजीव हड़बड़ा कर बोला — ‘‘मेरा मतलब है — बल्कि विनीता का मतलब है — कि शायद... शायद उस बाबत तुम्हें कुछ मालूम हो !’’
‘‘कैसे होगा ! जिस चीज के वजूद की ही मुझे खबर नहीं, उसके गायब होने की बाबत कुछ कैसे मालूम होगा मुझे ! यहां कोई चोर घुसा...’’
‘‘तुझे कैसे मालूम !’’ — सुनीता तीखे स्वर में बोली ।
‘‘क्या ?’’
‘‘कि यहां कोई चोर घुसा !’’
‘‘इसमें मालूम होने वाली कौन सी बात है ! ये चोर का काम नहीं तो क्या आप के वो सूटकेस हवा में उड़ गये !’’
‘‘गौतमी ! डोंट गिव मी लिप्स । डोंट एक्ट स्मार्ट विद मी ।’’
‘‘आप नाहक मेरे पर बरस रही हैं । मुझे आप के सूटकेसों के बारे में, उन के यहां होने, न होने के बारे में कुछ मालूम नहीं है ...’’
‘‘कल रात मेन डोर की भीतर की चिटखनी बिगड़ी पायी गयी थी ।’’
‘‘तो ?’’
‘‘कल रात वो भीतर से लग नहीं सकी थी ।’’
‘‘तो ?’’
‘‘किसी ने बाहर से ताला खोला । चिटखनी न लग पायी होने की वजह से उसे सहूलियत हुई ।’’
गौतमी का दिल लरजा ।
औरत तो उसकी उम्मीद से ज्यादा पहुंची हुई थी ।
‘‘तो आप ये कहना चाहती हैं’’ — प्रत्यक्षत: वो बोली — ‘‘कि मैंने वो चिटखनी बिगाड़ी, मैंने रात को किसी घड़ी यहां आ कर, फूंक मार कर बाहर से मेन डोर का ताला खोला, आप दोनों को बैड से उठा कर एक बाजू रखा, बाक्स में से सूटकेस निकाले, आपको वापिस यथास्थान टिकाया और सूटकेसों के साथ यहां से चम्पत हो गयी ?’’
किसी ने जवाब न दिया, दोनों एक दूसरे को मुंह देखने लगे ।
वैसा हुआ हो जो नहीं हो सकता था ।
‘‘अगर ऐसा है तो मुझे गिरफ्तार कराइये...’’
‘‘अरे, नहीं ।’’ — संजीव जल्दी से बोला ।
‘‘...ताकि हकीकत सामने आये । ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो ।’’
‘‘अरे, हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं ।’’
‘‘मैडम का जान पड़ता है जो कि साफ मुझे चोर ठहरा रही हैं ।’’
वो सुबकने लगी ।
‘‘अरे, हम तो सिर्फ पूछ रहे थे...’’
‘‘ये इनसाइड जॉब है ।’’ — विनीता गुस्से से बोली ।
गौतमी जोर से रोने लगी ।
‘‘चुप हो जा, गौतमी ।’’ — संजीव पुचकारता सा बोला ।
‘‘आप पुलिस को बुला रहे हैं ?’’
‘‘अरे, नहीं । हम तो बस...’’
‘‘तो मुझे इजाजत दीजिये । मैं ऐसी जगह नौकरी नहीं कर सकती जहां मेरे पर चोर होने का खुल्ला इलजाम लगाया जा रहा हो ।’’
‘‘तू गलत समझ रही है ।’’
‘‘तो ठीक क्या है ?’’
‘‘तू खाली इतना बता कि तू इस बाबत कुछ जानती है ?’’
‘‘मैं कुछ नहीं जानती । न मेरे लिये कुछ जानना मुमकिन था ।’’
‘‘फिर तो बात ही खत्म है । नहीं, विनीता !’’
विनीता ने जवाब न दिया, उसके चेहरे पर संशय और असंतोष के भाव बने रहे ।
‘‘जब इतनी बड़ी वारदात हो गयी’’ — गौतमी बोली — ‘‘इतनी बड़ी रकम यहां से चोरी हो गयी तो पुलिस को तो आप को वैसे ही खबर करनी चाहिये ।’’
‘‘हम नहीं कर सकते ।’’ — संजीव असहाय भाव से बोला ।
‘‘क्यों ?’’
‘‘वजह खुद समझ ।’’
‘‘मेरे समझ में तो कुछ नहीं आ रहा !’’
‘‘तो हम भी नहीं समझा सकते ।’’
‘‘ओह !’’
‘‘तू मेरी बात का फाइनल जवाब दे ।’’ — विनीता गुस्से से बोली — ‘‘तेरा इस वारदात से कुछ लेना देना नहीं ! तुझे इस बाबत कोई खबर नहीं !’’
‘‘आई स्वियर बाई माई गॉड मुझे इस बाबत कोई खबर नहीं । मुझे नोटों वाले सूटकेसों की कोई खबर नहीं । होती भी तो उन्हें चोरी कर लेने का मुझे सपने में भी खयाल न आता । खयाल आता तो खयाल पर अमल करने का कोई तरीका मुझे सात जन्म न सूझता ।’’
‘‘मुझे तेरी बात पर विश्वास है ।’’ — संजीव बोला ।
विनीता ने ऐसा कोई विश्वास जाहिर न किया ।
जो कि गौतमी के लिये चिन्ताजनक बात थी ।
‘‘मैं अब इजाजत चाहती हूं ।’’ — वो बोली ।
‘‘इजाजत चाहती है ?’’ — संजीव बोला ।
‘‘हमेशा के लिये ।’’
‘‘अरे, नहीं । पागल हुई है क्या ? हमने तेरे से कुछ पूछा तो इसलिये पूछा क्योंकि तुझे अपना जाना । अब गुस्सा थूक और जा के कल के नोट्स टाइप कर । तब तक मैं नयी डिक्टेशन की तैयारी करता हूं ।’’
मन ही मन चैन की सांस लेते गौतमी ने सहमति में सिर हिलाया ।
���
मंगलवार सुबह दस बजे गौतमी रैना विकासपुरी शिखर आहूजा के टॉप फ्लोर के किराये के फ्लैट पर पहुंची जहां कि वो अकेला रहता था । वो एक मामूली एलआईजी फ्लैट था जिसमें बैठक के अलावा एक ही बैडरूम था ।
बल्लियां उछलती वो शिखर के रूबरू हुई ।
शिखर भी वैसे ही उछलता, दमकता, हुमकता उससे मिला ।
‘‘कामयाबी मुबारक !’’ — वो जोश से बोला ।
‘‘तुम्हें भी !’’ — गौतमी भी वैसे ही जोश से बोली ।
‘‘हम मिलियनेयर बन गये !’’
‘‘हां । कहीं चैकिंग हुई थी ?’’
‘‘न ! दो जगह पुलिस की नाकाबन्दी से गुजरा पर किसी ने मुझे रुकने को न बोला ।’’
‘‘गुड ! कोई काम होना हो तो ऐसे ही निर्विघ्न होता है ।’’
‘‘तुम बोलो, तुम्हारे साथ कोई विघ्न वाली बात हुई ?’’
‘‘होने लगी थी पर किसी सिरे न चढ़ सकी ।’’
‘‘क्या हुआ था ?’’
‘‘परसों इतवार को चावला जी ने खास मुझे घर बुलाया था और मेरी क्लास ली थी । चोर बहकाने की कोशिश की थी ।’’
‘‘अरे !’’
‘‘लेकिन मैंने भी रोने-सुबकने तड़पने-भड़कने का ऐसा सांग एण्ड डांस ड्रामा पेश किया था कि उनकी एक नहीं चली थी । हसबैंड तो साफ सॉरी बोलने लगा था ।’’
‘‘वाइफ ?’’
‘‘वो खामोश थी लेकिन खामोश रहना उसकी मजबूरी थी क्योंकि मुंह खोलने लायक उसके पास कुछ नहीं था ।’’
‘‘वो किस्सा अब खत्म है न ।’’
‘‘हां ।’’
‘‘कोई फिक्र की बात तो नहीं ?’’
‘‘नहीं । होती तो दो दिन गुजर गये, अब तक सामने आयी होती ।’’
‘‘गुड ।’’
‘‘अब निकालो ।’’
शिखर ने सहमति में सिर हिलाया और फिर बैडरूम में गया जहां से वो दो सूटकेसों के साथ लौटा । इसने दोनों सूटकेस आजूबाजू सैंटर टेबल पर रखे ।’
‘‘क्या देखा ?’’ — गौतमी सस्पेंसभरे स्वर में बोली ।
‘‘कुछ नहीं ।’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘भई, सूटकेस लाक्ड हैं ।’’
‘‘खोलने की कोशिश न की ?’’
‘‘न ! सोचा, शायद तुम्हारे पास चाबी हो !’’
‘‘नहीं है । कहां से होती !’’
‘‘तो फिर ?’’
‘‘अब खोलो ।’’
‘‘कैसे ?’’
‘‘कैसे भी । और कुछ नहीं होता तो ताले तोड़ दो ।’’
‘‘तोड़ दूं ?’’
‘‘हां । अब ये सूटकेस हमारे किस काम आने वाले हैं । चाबी होती भी तो हमने इन से पीछा छुड़ाना ही था ।’’
‘‘ठीक !’’
शिखर ने पहले घर में उपलब्ध दो तीन चाबियां तालों में ट्राई कीं फिर कहीं से एक लम्बा पेचकस बरामद किया और उसकी मदद से उमेठ कर तालों के खटकों को तोड़ा ।
सस्पेंस से कांपती गौतमी ने दोनों हाथों से एक साथ दोनों सूटकेसों के ढक्कन उठाये और फिर यूं चिहुंक कर पीछे हटी जैसे शेषनाग दिखाई दे गया हो ।
दोनों सूटकेसों में कपड़े भरे थे ।
एक में जनाना, एक में मर्दाना ।
‘‘तुम गलत सूटकेस उठा लाये हो ?’’ — वो चीखती सी बोली ।
‘‘कैसे होगा ? बाक्स बैड में ये दो ही सूटकेस थे ।’’
‘‘तुम्हें देखना चाहिये था...’’
‘‘कैसे देखता ? जब ताले बन्द थे ? — अभी भी बन्द थे — तो कैसे देखता ?’’
‘‘वजन से अन्दाजा करना चाहिये था । सूटकेस भर नोटों का वजन कपड़ों से कहीं ज्यादा होता है ।’’
‘‘क्यों, भई ? नोट ढोना मेरा रोजमर्रा का काम है ! मुझे क्या मालूम नोटों से भरे सूटकेस का वजन कैसा होता है कितना होता है !’’
‘‘जाने दो ये बातें । तुम्हीं से कहीं कोई गलती हुई है, कोताही हुई है, लापरवाही हुई है ।’’
‘‘लेकिन कैसे ? कैसे ? बताओ कैसे ?’’
गौतमी ने जवाब न दिया, उसने बेचैनी से, बेबसी से पहलू बदला ।
‘‘तुमने जो मुझे कहा, जो समझाया, वो मैंने किया । अब समझाओ कहां गलत किया, क्या गलत किया मैंने ?’’
‘‘मेरी समझ में कुछ आये तो समझाऊं न !’’
‘‘ये सूटकेस वही हैं ?’’
‘‘बिल्कुल वही हैं । मैं इन्हें रंग से पहचानती हूं, साइज से पहचानती हूं ।’’
‘‘तो फिर इनमें कपड़ों का क्या काम ! नोट कहां गये ?’’
‘‘अरे, इन से ज्यादा अहम सवाल है कपड़ों वाले सूटकेसों का बाक्स बैड्स में क्या काम ?’’
‘‘क्या काम !’’
कुछ क्षण खामोशी रही ।
‘‘क्या एक ही किसम के’’ — फिर शिखर बोला — ‘‘दो जोड़ा सूटकेस हो सकते हैं ? एक जोड़ा नोटों वाला, दूसरा कपड़ों वाला...’’
‘‘बकवास न करो ।’’ — गौतमी चिढ़कर बोली — ‘‘ऐसा होता तो क्या वो लोग हाल दुहाई दे रहे होते माल लुट जाने की ! इतवार सुबह का उनका मिजाज ही इस बात का सबूत था कि नोटों वाले सूटकेस ही चोरी गये थे ।’’
‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ? जब मैं...’’
‘‘चुप करो एक मिनट ।’’
शिखर ने होंठ भींचे ।
गौतमी ने उतावले भाव से सूटकेस के कपड़ों को टटोला, उलटा पलटा ।
तत्काल उसके माथे पर बल पड़े । फिर उसने एक एक कपड़े को जांचा परखा । आखिर उसने सिर उठाया और अपलक शिखर की ओर देखा ।
‘‘क्या हुआ ?’’ — शिखर तनिक हड़बड़ाया ।
‘‘ये मर्दाना कपड़े’’ — गौतमी सन्तुलित स्वर में बोली — ‘‘संजीव चावला के साइज के नहीं हैं । ये जनाना कपड़े उसकी बीवी विनीता के स्तर के नहीं हैं । मुझे यकीनी तौर से मालूम है वो ऐसे कपड़े नहीं पहनती ।’’
‘‘क्या मतलब हुआ इसका ?’’
‘‘तुम बोलो ।’’ — गौतमी बदस्तूर उसे अपलक घूरती बोली ।
‘‘मैं क्या बोलूं ?
‘‘और कौन बोले ?’’
शिखर एक क्षण खामोश रहा फिर बोला — ‘‘क्या कहना चाहती हो ?’’
‘‘तुम्हें मालूम है क्या कहना चाहती हूं !’’
‘‘पहेलियां न बुझाओ ।’’
‘‘तुम पहेलियां न बुझाओ । साफ बोलो रुपया कहां छुपाया ?’’
‘‘मैंने ?’’
‘‘और किसने ?’’
‘‘लेकिन...’’
‘‘लेकिन वेकिन की कोई गुंजाइश नहीं है, शिखर आहूजा, सब तुम्हारी करतूत है ।’’
‘‘खामखाह !’’
‘‘इतनी बड़ी रकम ने तुम्हारा ईमान खराब कर दिया है । तुम बेईमान हो गये हो । तुम सारी रकम खुद डकार जाना चाहते हो । लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगी ।’’
‘‘वाट नानसेंस, अरे, मैं...’’
‘‘क्या मैं ? क्या नानसेंस ? तुम सही सूटकेस निकाल कर लाये थे । यहां तुमने उन्हें खोला, नोट निकाले और नोटों की जगह ये कपड़े भर दिये जो कि पता नहीं किन के हैं । तुम्हारे तो न होंगे क्यों कि जनाना कपड़ों का तुम्हारे पास क्या काम ! तुमने सूटकेसों में से नोट निकाल, इनमें कपड़े भरे, इन्हें बदस्तूर बन्द किया और ये जाहिर करने मेरे सामने पेश कर दिये कि तुमने इन्हें खोला नहीं था । शिखर आहूजा, मुझे नहीं मालूम था तुम ऐसे कमीने, ऐेसे धोखेबाज शख्स निकलोगे, दौलत की शक्ल दिखाई देते ही तुम यूं बदल जाओगे कि तुम्हारे मन में हमारे ताल्लुकात का भी लिहाज नहीं रहेगा ।’’
‘‘अरे, मैंने कुछ नहीं किया ।’’ — वो झल्लाया ।
‘‘कुछ नहीं किया, सब कुछ किया । इतना सब कुछ किया कि कुछ करने को बाकी न छोड़ा । अब माल निकलो वर्ना...’’
‘‘क्या वर्ना ?’’
‘‘तुम्हारी खैर नहीं ।’’
‘‘धमका रही हो ?’’
‘‘ठीक पहचाना । धमका रही हूं ।’’
‘‘क्या कहने ! क्या करोगी तुम ?’’
‘‘मैं चावला साहब को सब कुछ सच सच बना दूंगी ।’’
‘‘तुम्हारी मजाल नहीं हो सकती ।’’
‘‘तुम देखना मेरी मजाल !’’
‘‘फिर तेरा क्या होगा, बसन्ती !’’
‘‘मेरा कुछ नहीं होगा । जो होगा तेरा होगा, कमीने ।’’
‘‘कैसे होगा ? फिर पूछ रहा हूं, क्या करोगी ?’’
‘‘सुनो क्या करूंगी, मैं चावला साहब को बोलूंगी कि कल तुम मेरे से मिलने आये थे तो मैंने आपसदारी में बोल लिया था — जो कि मेरी नादानी थी — कि घर में दो सूटकेसों में चौसठ लाख रुपया मौजूद था । तुम लालच की जकड़ में आ गये, नतीजतन रात को तुमने घर में पैठ लगाई और सूटकेस चुरा ले गये ।’’
‘‘मेन डोर का ताला मैंने कैसे खोल लिया ?’’
‘‘मुझे क्या पता कैसे खोल लिया ! ताले खोलने का हुनर तुम्हें आता होगा ! मैं क्या तुम्हारी सारी खामियों से वाकिफ हूं ।’’
‘‘घर के मालिकान को बेहोश किसने किया ?’’
‘‘तुम्हीं ने किया । घर में दाखिला पा लिया तो कुछ सुंघा दिया उन्हें ताकि वो बेहोश हो जाते ।’’
‘‘जिस नौबत से तुम मुझे डरा रही हो, वैसी सच में आ गयी तो मैं खामोश रहूंगा ? मैं नहीं दुहाई दूंगा कि मेन डोर की डुप्लीकेट चाबी तुमने मुझे मुहैया कराई थी, तुमने मुझे बताया था कि सूटकेस कहां थे ! तुमने चावला पति पत्नी के दूध में नींद की गोलियां घोली थीं ।’’
‘‘पड़े दुहाई देते रहना । तुम्हारी दुहाई का कोई असर नहीं होगा, कोई नतीजा सामने नहीं आयेगा ।’’
‘‘क्यों नहीं आयेगा ? मैं फंसा तो तुम भी फंसोगी । तुम साजिश में मेरी जोड़ीदार मानी जायेगी ।’’
‘‘जब कानूनी तौर पर कुछ होगा तब ।’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘सुनाे क्या मतलब ! मेरी कहानी सुनने के बाद चावला साहब सीधे अपने इलाके के थाने में जायेंगे और एसएचओ से डील करेंगे ।’’
‘‘कैसा डील ?’’
‘‘चौंसठ लाख की रकम से ताल्लुक रखता डील । बरामद रकम में एचएचओ की मनमर्जी की हिस्सेदारी । उसकी मर्जी फिफ्टी फिफ्टी की हो तो भी नो प्राब्लम । फिर थानेदार तुम्हारी ऐसी दुम ठोकेगा कि तुम्हारे प्राण कांप जायेंगे, तुम उस दिन को कोसोगे जब तुम्हारे मन में मेरे साथ बेइमानी करने का खयाल आया । ये दिल्ली शहर है, यहां का करप्ट पुलिस आफिसर बत्तीस लाख रुपये की बड़ी रकम के लिये सोचो, क्या नहीं कर गुजरेगा ! कहने का मतलब ये है, शिखर आहूजा, कि तेरी खैर नहीं । पुलिस से वास्ता प्राण कम्पाऊ तजुर्बा होगा तेरे लिये । इट विल बी ए नाइटमेयर फार यू, यू डर्टी डबल क्रासिंग सन ऑफ ए बिच ।’’
‘‘तेरा भी अंजाम बुरा होगा ।’’
‘‘मुझे कुछ नहीं होगा । बड़ी हद मेरी नौकरी जायेगी जो कि तुम्हारी दुरगत के मुकाबले में कोई बहुत बड़ी सजा नहीं होगी । तुम औरत के आंसुओं की ताकत को नहीं जानते । जब मैं रो रो के दुहाई दूंगी कि तुमने मुझे बरगलाया था तो चावला साहब पसीजे बिना नहीं रहेंगे । फिर वो ये भी कैसे भूल पायेंगे कि आधी रकम की बरामदी में मैं निमित्त बनी थी ।’’
‘‘तुम्हारे हाथ तो कुछ न आया न !’’
‘‘मेरे लिये यही तसल्ली काफी होगी कि तुम्हारे हाथ कुछ न आया । एक कमीने, धोखेबाज, दोगले, यारमार, लानती शख्स के हाथ कुछ न आया ।’’
खामोशी छा गयी ।
‘‘चलती हूं ।’’ — जिसे आखिर गौतमी ने भंग किया — ‘‘मेरे जाने के बाद कहीं फरार हो जाना चाहो तो तुम्हें खुली छूट है लेकिन देख लेना, एसएचओ तुम्हें पाताल में से भी खोद निकालेगा । गुडबाई, मिस्टर डबलक्रासर ।’’
‘‘एक मिनट रुको ।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘मुझे सोचने दो ।’’
‘‘अभी सोचने को बाकी है कुछ ?’’
‘‘हां ।’’
‘‘ठीक है, सोचो ।’’
वो सच में विचारपूर्ण मुद्रा बनाये कई क्षण खामोश रहा ।
‘‘मैं अपनी गलती मानता हूं ।’’ — आखिर बोला — ‘‘जो मैं ने किया वो मुझे नहीं करना चाहिये था । दौलत की चकाचौंध ने मेरा दिमाग हिला दिया था, और आज मैं वो कदम उठा बैठा था जो मुझे नहीं उठाना चाहिये था ।’’
‘‘आज ?’’
‘‘हां ।’’
‘‘तीन दिन बाद आज बेईमानी सूझी !’’
‘‘यही समझ लो ।’’
‘‘हूं ।’’
‘‘रोज हर घड़ी इतनी बड़ी रकम सामने दिखाई देती थी तो जेहन में सौ तरह के नापाक, फरेबी खयाल आते थे ।’’
‘‘जिन में से एक पर आखिर आज अमल किया ?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘बढ़िया । आसमानी बाप तुम्हारी खतायें माफ करे । अब बोलो, रकम कहां है ?’’
‘‘यहां नहीं है ।’’
‘‘तो कहां है ?’’
‘‘मेरे एक दोस्त के पास है । गिरीश राठी नाम है । एक बार तुम उससे मिल भी चुकी हो ।’’
‘‘मुझे याद नहीं ।’’
‘‘कोई बड़ी बात नहीं । कपड़े ?’’
‘‘मर्दाना खुद उसके हैं, जनाना उसकी बीवी के हैं जो आजकल अपने दो बच्चे के साथ मायके गयी हुई है ।’’
‘‘रकम उसके पास है । इस गिरीश राठी के पास ?’’
‘‘हां ।’’
‘‘किस हालत में ?’’
‘‘उसी हालत में जिसमें थी । सिर्फ सूटकेस जुदा हैं । मेरे हैं ।’’
‘‘कहां रहता है ?’’
‘‘बाली नगर ।’’
‘‘उसे मालूम है सूटकेसों में क्या है ?’’
‘‘हां ।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘बताना जरूरी था । उसके बिना वो उन की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था ।’’
‘‘इतनी बड़ी रकम तुमने उसको सौंप दी ! क्यों सौंप दी ? कैसे सोच लिया कि दौलत के लालच के मामले में उसका मिजाज तुमसे जुदा होगा !’’
‘‘वो मेरे से बाहर नहीं जा सकता ।’’
‘‘जैसे तुम मेरे से बाहर नहीं जा सकते थे !’’
‘‘अब छोड़ो वो बात । वक्ती जोशोजुनून में गलती किसी से भी हो सकती है ।’’
‘‘तो रकम तुम्हारे गिरीश राठी नाम के दोस्त के पास है जो कि बालीनगर में रहता है ?’’
‘‘हां ।’’
‘‘यहां मंगाओ । फौरन ।’’
उसने सहमति में सिर हिलाया और मोबाइल निकाल कर उस पर काल लगाई ।
फिर लगाई ।
‘‘काल नहीं लग रही ।’’ — फिर बोला — ‘‘फोन स्विच्ड ऑफ मालूम होता है ।’’
‘‘फट्टा है ।’’
‘‘मैं सच कह रहा हूं ।’’
‘‘मुझे तुम्हारे सच पर यकीन नहीं ।’’
‘‘अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊं ?’’
‘‘समझाओ नहीं, एक्ट करो । रकम यहां मंगाओ ।’’
‘‘कैसे मंगाऊं ? जबकि फोन... सुनो, मैं तुम्हें वहां लेकर चलने को तैयार हूं ।’’
‘‘ठीक है । लेकिन इस बार कोई धोखा, कोई फरेब हुआ तो तुम्हारा अंजाम बुरा होगा । यू विल बी सॉरी फार दि डे यू वर बार्न ।’’
‘‘अब मैं अपनी गलती कबूल कर तो चुका ! उस पर पछता तो चुका !’’
‘‘चलो ।’’
वो बाली नगर पहुंचे ।
शिखर ने कार को एक जगह खड़ी किया और दोनों बाहर निकले ।
‘‘ये गिरीश राठी की कार है ।’’ — उनके सामने ही पार्किंग में उन की ओर मुंह किये खड़ी एक नीली आल्टो की तरफ इशारा करता शिखर बोला — ‘‘इसका मतलब है वो घर पर है ।’’
गौतमी ने खामोशी से सहमति में सिर हिलाया ।
दोनों टॉप फ्लोर के एक फ्लैट पर पहुंचे । शिखर ने काल बैल बजाई ।
दरवाजा लगभग उसी की उम्र के एक दुबले पतले, मामूली शक्ल सूरत वाले आदमी ने खोला ।
उसके चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं ।
‘‘मैं तुम्हारा ही इन्तजार कर रहा था ।’’ — एक तरफ हटता वो व्याकुल भाव से बोला ।
शिखर का माथा ठनका, उसने घूर कर उसे देखा ।
वो बेचैनी से पहलू बदलने लगा और बार-बार थूक निगलने लगा ।
‘‘ये गिरीश राठी है ।’’ — शिखर बोला — ‘‘ये मेरी फ्रेंड गौतमी रैना है ।’’
गिरीश ने सहमति में सिर हिलाया ।
वो दोनों भीतर दाखिल हुए ।
‘‘फोन क्यों बंद था ?’’ — शिखर ने पूछा ।
‘‘फोन !’’ — वो हकलाता सा बोला — ‘‘है ही नहीं मेरे पास ।’’
‘‘कहां गया ?’’
‘‘छिन गया ।’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘ब-बोलता हूं ।’’
‘‘और तुम मेरा इन्तजार क्यों कर रहे थे ?’’
‘‘ब-बोलता हूं वो भी ।’’
‘‘हकला क्यों रहे हो ? हवास क्यों उड़े हुए हैं तुम्हारे ?’’ — फिर एकाएक उसे एक खयाल आया — ‘‘माल ! माल तो सेफ है न !’’
‘‘न-नहीं है ।’’
‘‘क्या !’’
‘‘नहीं है ।’’
‘‘क्या हुआ ?’’
‘‘लुट गया ।’’
‘‘क्या बकते हो !’’
‘‘मैं सूटकेसों के साथ तुम्हारे घर से लौट रहा था कि रास्ते में डाकू पड़ गये ।’’
‘‘क्या !’’
‘‘राह चलती सड़क पर मेरी आल्टो को इन्टरसेप्ट किया । यूं एकाएक एक इनोवा आगे अड़ा दी कि टक्कर हो गयी, कार अपने आप ही रुक गयी । तीन आदमी इनोवा से बाहर निकले, एक ने मेरी कनपटी से गन की नाल सटा दी और दो ने दोनों सूटकेस कब्जा लिये । मेरा मोबाइल छीन लिया, मेरा बटुवा निकाल लिया और फिर ये जा वो जा ।’’
‘‘तौबा ! कौन थे वे लोग ?’’
‘‘मुझे क्या पता ! मैं तो किसी को पहचानता नहीं था !’’
‘‘फिर ?’’
‘‘थर थर कांपता मैं यहां लौटा ।’’
‘‘यहां क्यों ? मेरे पास क्यों नहीं ?’’
‘‘दहशत की उस घड़ी में मुझे यहीं लौटना सूझा ।’’
‘‘फोन क्यों न किया ?’’
‘‘कैसे करता ? फोन तो छिन गया था ।’’
‘‘अरे, किसी लैंडलाइन से, किसी पीसीओ से फोन करता !’’
‘‘मुझे तेरे फोन की उम्मीद थी । मैंने सोचा था काल नहीं लगेगी तो तू ही मेरे से कान्टैक्ट करेगा ।’’
‘‘अरे, इतनी बड़ी वारदात हो गयी । बाद में तो मेरे पास आ के मरता !’’
‘‘मैंने सोचा था । फिर खयाल आया कि कहीं ऐसा न हो कि मैं इधर से चलूं और तू उधर से चल दे । इसलिये मैंने तेरा यहीं इन्तजार करना मुनासिब समझा ।’’
‘‘मैं न आता तो तू इन्तजार ही करता रहता ? चाहे शाम हो जाती, चाहे अगला दिन हो जाता ?’’
‘‘आखिर तो मैं कुछ करता ही इस बाबत !’’
‘‘आखिर अभी नहीं हुई थी ?’’
‘‘वो... वो क्या है कि...’’
‘‘जब वारदात हुई तो पुलिस को खबर क्यों न की ?’’
‘‘कैसे करता ? माल की टाइप तो सोच ! जो माल लुटा था, उसकी बाबत क्या जवाब देता ?’’
शिखर ने असहाय भाव से गर्दन हिलाई, वैसे ही असहाय भाव से उसने गौतमी की तरफ देखा ।
‘‘सभी बावन गज के ।’’ — गौतमी धीरे से बोली — ‘‘कोई कम नहीं । न तुम न तुम्हारा दोस्त ।’’
शिखर सकपकाया, उसने घूर कर गौतमी की तरफ देखा ।
गौतमी के मिजाज में कोई फर्क न आया ।
‘‘इट्स युअर फ्यूनरल ।’’ — वो पूर्ववत् धीरे से बोली — ‘‘तुम भुगतोगे ।’’
वो हड़बड़ाया ।
‘‘तुम भुगतोगे । मुझे तुम्हारे यार से कोई लेना देना नहीं । आपस में फैसला कर लो कि कौन ज्यादा चतुर सुजान है ।’’
‘‘हूं ।’’ –शिखर ने लम्बी हूंकार भरी, वो कुछ क्षण खामोश रहा, फिर उसने दोबारा गिरीश राठी की तरफ तवज्जो दी ।
‘‘तो’’ — वो संजीदगी से बोला — ‘‘किसी ने तेरे को रास्ते में इन्टरसैप्ट किया ?’’
‘‘हं-हां ।’’ — गिरीश फंसे कण्ठ से बोला ।
‘‘तेरी कार के आगे इनोवा अड़ा दी, तुझे रोकने के लिये एक्सीडेंट कर दिया !’’
‘‘हां ।’’
‘‘उन्हें... उन अनजान लोगों को खबर कैसे थी कि सूटकेसों में क्या था ? कैसे जानते थे कि तेरी कार में चौंसठ लाख रुपया अवेलेबल था ?’’
‘‘मुझे क्या पता !’’
‘‘अपना कोई अन्दाजा ही बता !’’
‘‘मेरा कोई अन्दाजा नहीं ।’’
‘‘तो वो बात बोल जिसमें किसी अन्दाजे की जरूरत नहीं ।’’
‘‘क्या बात ?’’
‘‘सच में तू समझता है कि तू यूं अमानत में खयानत कर सकता है !’’
‘‘क्या !’’
‘‘कि तेरी सरकाई गोली मुझे हजम हो जायेगी ? कि सारा माल तू हड़प जायेगा ?’’
‘‘क्...क्या...क्या बोला ?’’
‘‘दोनों सूटकेस निकाल कर मेरे सामने रख वर्ना’’ — शिखर के हाथ में एक खतरनाक खंजर प्रकट हुआ — ‘‘मैं तेरी आंतें निकालकर तेरे सामने रखता हूं ।’’
‘‘ये जुल्म है ।’’
‘‘साले, पता नहीं क्यों मेरे अन्दर से एकाएक आवाज आने लगी थी कि तू कोई गुल खिलायेगा इसलिये मैं हर सिचुएशन के लिये तैयार हो के आया था ।’’
‘‘यार, तू मेरे पर नाहक शक कर रहा है...’’
‘‘नाहक !’’
‘‘और नहीं तो क्या ! अब जो हुआ...’’
‘‘एक इनोवा ने तुझे इन्टरसेप्ट किया, तेरी कार उससे टकरा के रुकी ?’’
‘‘हां ।’’
‘‘मैंने देखी नीचे खड़ी तेरी आल्टो कार । उसके फ्रंट पर तो एक मामूली सी खरोंच भी नहीं है । ऐसा क्योंकर मुमकिन हुआ, महा श्याने !’’
‘‘वो... वो... क्या है कि...’’
शिखर ने इतनी जोर का थप्पड़ उसे मुंह पर रसीद किया कि उसकी गर्दन फिरकी की तरह घूम गयी । फिर बाज की तरह झपट्टा मारकर उसने उसे दबोच लिया और उसके गले पर खंजर रख दिया ।
‘‘जो बोला वो करता है या’’ — शिखर खूंखार लहजे से बोला — ‘‘काटूं गला ।’’
‘‘नहीं ! नहीं !’’ — छटपटाना, तड़पता गिरीश बोला — ‘‘नहीं ।’’
‘‘तो बोल सूटकेस कहां हैं ?’’
‘‘सामने का फ्लैट खाली है । उसकी चाबी मेरे पास है । वहां हैं ।’’
‘‘चाबी निकाल ।’’
‘‘कैसे निकालूं । गर्दन छोड़ो तो...’’
शिखर ने पकड़ ढीली कर दी ।
गर्दन मसलता गिरीश जोर जोर से हांफने लगा । फिर उसने वहीं से एक चाबी बरामद की और शिखर को पेश की ।
‘‘ले के आ ।’’ — शिखर बोला ।
‘‘ये भाग जायेगा ।’’ — गौतमी बोली ।
‘‘सामने तो जाना है । भाग के दिखाये !’’
‘‘मैं नहीं भागूंगा ।’’ — गिरीश गिड़गिड़ाया, उसके कसबल निकल चुके थे — ‘‘उलटे पांव लौटूंगा ।’’
‘‘जा ।’’
वो सच में ही उलटे पांव लौटा ।
दो सूटकेसों के साथ ।
शिखर ने जेब से दो चाबियां निकालीं और दोनों सूटकेसों को खोला ।
गौतमी ने हैरानी से उसकी तरफ देखा ।
वो धूर्तभाव से हंसा । उसने दोनों सूटकेसों के ढक्कन उठाये ।
‘‘चौकस !’’ — वो बोला ।
गौतमी ने सहमति में सिर हिलाया ।
शिखर ढक्कन गिराने लगा तो गिरीश गिड़गिड़ाता सा बोला — ‘‘कुछ तो इधर कर, यार ।’’
शिखर सकपकाया ।
‘‘चिड़िया का चुग्गा ही सही । इतनी बेइज्ज्ती हुई, कुछ तो खामियाजा मिले !’’
शिखर हंसा ।
‘‘ठीक है ।’’ — फिर बोला — ‘‘तू भी क्या याद करेगा !’’
उसने एक सूटकेस में से पांच सौ के नोटों की एक गड्डी उठाई और उसे यूं गिरीश की तरफ फेंका जैसे कुत्ते को हड्डी डाली हो ।
‘‘बाप का माल है !’’ — गौतमी तीव्र विरोधपूर्ण स्वर में बोली ।
‘‘थैंक्यू ।’’ — गड्डी लपकता गिरीश कृतज्ञ भाव से बोला ।
‘‘ठीक है ।’’ — दरवाजे पर से आवाज आयी — ‘‘बाकी हमारे लिये छोड़ दो ।’’
तीनों ने चिहुक कर एक साथ दरवाजे की तरफ देखा ।
दरवाजे पर दो अजनबी खड़े थे ।
एक गोरा चिट्टा, खूबसूरत, क्लीनशेव्ड नौजवान जो सूरत से कश्मीरी जान पड़ता था ।
और दूसरा विकराल शक्ल सूरत वाला, खूंखार आंखों वाला, विशालकाय, वैसा ही क्लीनशेव्ड लेकिन अधेड़ ।
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