होटल सी-व्यू की मारकी में एक टैक्सी रुकी और उसमें से एक कोई चालीस साल का, गठीले बदन वाला, निहायत सख्त चेहरे वाला व्यक्ति बाहर निकला ।
उसका नाम श्याम डोंगरे था और वह ‘कम्पनी’ का मौजूदा सिपहसालार था ।
होटल सी-व्यू, जो मुम्बई के बादशाह राजबहादुर बखिया उर्फ काला पहाड़ की सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल के हाथों मौत के बाद उजड़ कर रह गया था, अब इकबाल सिंह की मिल्कियत में था और फिर से जगमग-जगमग कर रहा था । वह एक फाइव स्टार डीलक्स रेटिंग वाला होटल था और उसकी अट्ठारह मंजिली इमारत आधुनिक वास्तुकला की भव्यता का अद्वितीय करिश्मा था । वह होटल राजबहादुर बखिया की जिन्दगी में योरोप-अमेरिका तक फैले उसके एम्पायर का हैडक्वार्टर था । बखिया की मौत के बाद सोहल की धमकी के रूप में इकबाल सिंह कुछ दिन खामेश बैठा था - सोहल उसकी जानबख्शी करते वक्त उसे यह धमकी देकर गया था कि अगर उसने बखिया की जगह बखिया बनने की कोशिश की तो वह उस पर कहर बनकर टूटेगा - लेकिन बखिया की इतनी बड़ी बादशाहत हथियाने का प्रलोभन वह थोड़ा ही अरसा छोड़े रह सका था । कम्पनी के बखिया समेत सारे नामचीन ओहदेदार मारे जा चुके थे और ‘कम्पनी’ टूटती-बिखरती जा रही थी । ‘कम्पनी’ का वही इकलौता ओहदेदार था जो जीवित बाकी था । ‘कम्पनी’ से सम्बंधित लोगों की उम्मीदभरी निगाहें उसकी तरफ उठी हुई थीं लेकिन वह था कि सिर ही नहीं उठा रहा था ।
लेकिन फिर जब उसने ‘कम्पनी’ पर एक प्यादे से जरा बेहतर स्थिति वाले ओहदेदार को हावी होता पाया तो उसका खून खौला ।
उसने सोहल की धमकी को नजरअन्दाज करके ‘कम्पनी’ का दावेदार बनकर दिखा दिया ।
एक बार उसके सिर उठाने की देर थी कि सब उसके कदमों पर लोटने लगे । आखिर पिछले दिनों मुम्बई के अंडरवर्ल्ड में हुए मौत के नाच में एक वही तो इकलौता शख्स था जो बखिया की जगह लेने लायक ऊंचे दर्जे का ओहदेदार था ।
इकबाल सिंह बखिया बन गया - मुम्बई का अंडरवर्ल्ड का नया बादशाह बन गया ।
‘कम्पनी’ का हैडक्वार्टर होटल सी-व्यू फिर से आबाद हो गया ।
होटल सी-व्यू की दूसरी से पांचवीं मंजिल तक के तमाम कमरे और सुईट ‘कम्पनी’ के एम्पायर के अत्यन्त महत्वपूर्ण लोगों के लिए सुरक्षित थे । उन चार मंजिलों पर किसी अनाधिकृत व्यक्ति के कदम पड़ना असम्भव था, अलबत्ता बाकी मंजिलों पर विधिवत आधुनिक फाइव स्टार होटल चलता था । मुम्बई शहर में सोहल द्वारा मचाए गए उस कोहराम से पहले, जोकि बखिया की मौत पर जाकर खत्म हुआ था, वहां ठहरे किसी मेहमान को कानों-कान खबर नहीं होती थी कि वह होटल ‘कम्पनी’ के नाम से जानी जाने वाली किसी माफिया स्टाइल क्रिमिनल आर्गेनाइजेशन का हैडक्वार्टर था, किसी को यह पता तक नहीं लगता था कि होटल की दूसरी और पांचवीं मंजिल के बीच की चार मंजिलों में और बाकी मंजिलों में कोई फर्क था । अब सोहल की मेहरबानी से ‘कम्पनी’ की वो गोपनीयता तो भंग हो गई थी लेकिन होटल क्योंकि एयरपोर्ट के पास था और उसे अधिकतर टूरिस्ट ट्रेड हासिल था इसलिए उस बात से होटल के बिजनेस पर कोई भारी फर्क नहीं पड़ा था । अलबत्ता स्थानीय अभिजात वर्ग में अब होटल सी-व्यू को गुण्डे बदमाशों के अड्डे के नाम से ही जाना जाता था ।
ऐसी, एक बार तबाह होकर सिर उठाती, ‘कम्पनी’ का सरगना अब इकबाल सिंह था, सोहल की धमकी की तलवार जिसे अपने सिर पर अभी भी लटकती दिखाई देती थी ।
हाल ही में मुम्बई में घटी फ्रेंच पेंटिंग्स की चोरी और उनके बदले में दी जाने वाली फिरौती की घटना के साथ जब सोहल का नाम जुड़ा पाया गया था तो उसके छक्के छूट गए थे । अगर सोहल मुम्बई में सक्रिय था तो क्या वह इस हकीकत से बेखबर होगा कि इकबाल सिंह ने उसकी धमकी पर अमल नहीं किया था ! जिस शख्स के बारे में वह यह उम्मीद कर रहा था कि वह अपनी प्रेमिका की मौत के गम में दीवाना होकर जंगल-जंगल भटकने और उसकी फिराक में जान देने चला गया था, वह जब मुम्बई में ऐन ‘कम्पनी’ की नाक के नीचे इतनी बड़ी वारदात करने में कामयाब हो गया था तो किसी भी दिन उसका इकबाल सिंह तक पहुंच जाना कोई बड़ी बात न होता ।
इकबाल सिंह बखिया की बादशाहत में बहुत वरिष्ठ ओहदेदार रहा था और खुद एक खतरनाक गैंगस्टर था लेकिन बखिया के कत्ल के बाद से सोहल का कुछ ऐसा आतंक उस पर हावी था कि उसके ख्याल से ही वह कांप उठता था ।
आज उसी खौफ से प्रेरित होकर उसने अपने सिपहसालार को तलब किया था ।
डोंगरे होटल की चौथी मंजिल पर स्थित इकबाल सिंह के चार कमरों वाले सुइट के ड्राइंगरूम में पेश हुआ ।
इकबाल सिंह लगभग पचास साल उम्र का, गैंडे जैसी शक्ल-सूरत और आकार वाला गढवाली था जोकि अपनी किशोरावस्था से ही मुम्बई में आकर बसा हुआ था ।
“उसका कोई पता लगा ?” - वह सख्ती से बोला ।
डोंगरे ने इन्कार में सिर हिलाया ।
“मुंह से बोल ।” - इकबाल सिंह भुनभुनाया - “मेरे सामने मुण्डी मत हिला ।”
“नहीं लगा ।”
“यह तो पता लगा होगा कि वो मुम्बई में था ही नहीं, अभी भी यहां कहीं छुपा हुआ है या आकर चला गया ?”
“मुम्बई में तो वो यकीनन था ।” - डोंगरे कठिन स्वर में बोला - “यह साबित हो चुका है कि फ्रेंच पेंटिंग्स की चोरी की और उनकी फिरौती हासिल करने की सारी योजना उसकी थी । उस वारदात में सोहल का हाथ होने की तसदीक तो पुलिस भी कर चुकी है ।”
“तो ?”
“फिरौती की रकम तो वरसोवा बीच पर मचे खून-खराबे के बाद पुलिस के हाथ लग गई थी । सोहल ने अगर दौलत हथियाने की खातिर वो सब कुछ किया था तो उसका मिशन फेल हो गया था । इस लिहाज से तो अगली किसी वारदात की ताक में वो यहीं हो सकता है ।”
“क्या यह जरूरी है कि अगली वारदात वह मुम्बई में ही करेगा ?”
“जरूरी तो नहीं है लेकिन - लेकिन यहां जैसे उसने अपने इतने सारे हिमायती जुटा लिए थे, वैसी सलाहियात दोबारा शायद उसे यहीं हासिल हों ।”
“उसके हिमायती तो सब मारे नहीं गए थे ?”
“जो मारे गए थे, उन्हीं की पुलिस को खबर है । क्या पता मारे जा चुके लोगों के अलावा और लोग भी उसके साथ रहे हों ।”
“लेकिन” - इकबाल सिंह व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला - “कम्पनी का सिपहसालार उनके बारे में जानकारी हासिल नहीं कर सकता ! वह मुम्बई में, जिसके चप्पे-चप्पे में हमारे भेदिए फैले हुए हैं, सोहल को तलाश नहीं कर सकता !”
“कोशिश जारी है ।” - डोंगरे दबे स्वर में बोला ।
“लेकिन हासिल कुछ नहीं हो रहा ।”
“साहब, मैं तो सिर्फ कोशिश ही कर सकता हूं । अगर मेरी कोशिश में कोई कमी हो तो...”
“तेरी कोशिश में ही कमी है । सोहल का हमारे हाथ न आना इस बात का सबूत है कि तेरी कोशिश में ही कमी है । ऐसा न होता तो क्या अभी तक सोहल का काम तमाम न हो चुका होता ? लेकिन उसका काम तमाम होना तो दूर, हमें तो अभी तक यही नहीं मालूम कि वो मुम्बई में है भी या नहीं ।”
“लेकिन साहब, मैं क्या करूं...”
“मैं नहीं जानता तू क्या करे ! तू ‘कम्पनी’ का सिपहसालार है । ऐसे कामों को कामयाबी से अंजाम देना तेरा काम है । बखिया के सिपहसालार दण्डवते ने, या मैक्सवैल परेरा ने, यहां तक कि घोरपड़े ने भी, कभी बखिया से यह नहीं पूछा था कि वो क्या करे ! डोंगरे, या तो सोहल को तलाश करके ला या फिर मैं ऐसा आदमी तलाश करता हूं जोकि बतौर सिपहसालार तेरी जगह ले सके और अपने काम को तेरे से बेहतर तरीके से अंजाम दे सके ।”
“ऐसा न कीजिएगा ।” - डोंगरे गिड़गिड़ाया - “मुझे थोड़ा वक्त और दीजिए ।”
“दो हफ्ते ।”
“एक महीना ।”
“ठीक है । एक महीने के अंदर-अंदर या तो सोहल को जिन्दा या मुर्दा मेरे सामने पेश कर देना और या फिर जिन्दगी-भर दोबारा कभी मुझे अपनी शक्ल मत दिखाना ।”
डोंगरे ने सहमति में सिर हिलाया ।
कुछ क्षण खामोशी छाई रही ।
“बखिया के खिलाफ जंग में” - फिर इकबाल सिंह ने खामोशी भंग की - “जो सोहल के सहयोगी थे, तूने उनमें से किसी को टटोला ?”
“उनमें से बचा ही कौन है, साहब ? उसके सहयोगी तो शांताराम के भाई थे, तुकाराम को छोड़कर जोकि सब मारे जा चुके हैं ।”
“तुकारम को टटोला ?”
“हाल ही में टटोला था । वो अपने एक चमचे वागले के साथ अभी भी चैम्बूर वाले मकान में ही रहता है । दोनों ही आजकल कुछ करने-धरने के काबिल नहीं हैं ।”
“वो किसलिए ?”
“दोनों एक मोटर एक्सीडेंड में घायल हुए बताए जाते हैं । तुकाराम की एक टांग में कम्पाउंड फ्रैक्चर है जिसकी वजह से वो चल-फिर नहीं सकता । वागले का कंधा टूटा हुआ है, वह चल-फिर तो सकता है लेकिन कुछ करने धरने के, खासतौर से सोहल जैसे शख्स की कोई कारआमद मदद करने के, काबिल नहीं है ।”
“सोहल उन्हीं के घर में तो नहीं छुपा हुआ है ?”
“नहीं । मेरी गारंटी ।”
“लेकिन जैसे ताल्लुकात उनके सोहल से रहे हैं, उनकी रू में उनको सोहल की खबर हो सकती है !”
“साहब, अगर ऐसी कोई खबर उन्हें है तो, आप खुद जानते हैं कि, वो खबर उनसे जबरदस्ती नहीं उगलवाई जा सकती । वे टार्चर से डरने वाले आदमी नहीं । ऐसा खुद काला पहाड़ ने आजमाया था कि वे जान दे देंगे लेकिन अपनी जुबान नहीं खोलेंगे । उनका मुम्बई में कोई ऐसा सगा संबंधी भी नहीं जिसको काबू में करके जिसके माध्यम से उन पर दबाव डाला जा सके ।”
“हम उनकी निगरानी तो करवा सकते हैं !”
“उसमें क्या वांदा है !”
“उनकी निगरानी करवा । उनकी चौबीस घंटों की निगरानी करवा । न जाने क्यों मेरा दिल गवाही देता है कि अगर सोहल मुम्बई में किसी की मदद हासिल करेगा तो वह शांताराम का जिंदा बच गया वह भाई तुकाराम और उसका वह चमचा वागले ही होगा ।”
“ठीक है । मैं उनकी निगरानी का इंतजाम करवाता हूं ।”
“जिस आदमी के घर से ये लोग - सोहल और तुकाराम गिरफ्तार हुए थे...”
“अकरम लाटरीवाला ।”
“...उसकी क्या खोज-खबर है ?”
“वो तो तभी मुम्बई से ऐसा गायब हुआ था कि आज तक दिखाई नहीं दिया ।”
“कहीं ऐसा तो नहीं कि वो हो मुम्बई में ही लेकिन सिर्फ हमें दिखाई न दे रहा हो !”
डोंगरे एक क्षण खामोश रहा और फिर अनिश्चित स्वर में बोला - “मैं मालूम करूंगा ।”
यही फर्क था राजबहादुर बखिया उर्फ काला पहाड़ में और इकबाल सिंह में । बखिया का कोई ओहदेदार, खासतौर से उसका सिपहसालार, बखिया के हुजूर में कोई गोल-मोल जवाब देने की कल्पना नहीं कर सकता था जबकि इकबाल सिंह को अक्सर अहसास तक नहीं होता था कि उसे ऐसे जवाब दिए जा रहे थे जिनसे साफ जाहिर होता था कि ऐसी कोई कोशिश तो की ही नहीं गई थी जोकि उसके सिपहसालार को अपना फर्ज मानकर, उसके कहे बिना, खुद करनी चाहिए थी । बखिया की बादशाहत में रिवाज काम करके दिखाने का था, काम न होने की कोई सजती-सी वजह बयान करने का नहीं था ।
“एक बात मैं कहना चाहता था ।” - फिर डोंगरे दबे स्वर में बोला ।
“क्या ?”
“हमारा एक कूरियर माल समेत पुलिस की गिरफ्त में आ गया है ।”
“कौन कूरियर ! कौन-सा माल !”
“सिंगापुर एयरलाइंस की एक एयरहोस्टेस दो किलो हेरोइन के साथ पकड़ी गई है । हरकत किसी भेदिए की मालूम होती है । पुलिस ने सीधे उसी पर हाथ डाला था ।”
यह इकबाल सिंह के निजाम का दूसरा नुक्स था । बखिया की बादशाहत में कोई ‘कम्पनी’ के हितों के खिलाफ जाने की कल्पना तक नहीं कर सकता था । इकबाल सिंह के व्यक्तित्व में ऐसा दबदबा नहीं था । अब भेदिए धीरे-धीरे सिर उठाने लगे थे ।
“लड़की जुबान खोल सकती है ?”
“फौरन तो नहीं खोलेगी । पहले तो वह हमारी तरफ से कोई मदद हासिल होने का इन्तजार करेगी । कोई मदद हासिल नहीं होगी तो जुबान खोलेगी ही ।”
“हम उसकी कोई मदद कर सकते हैं ?”
“आसानी से नहीं । जमानत उसकी होगी नहीं । उसको पुलिस की गिरफ्त के छुड़ाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ेंगे । बहुत बड़े पैमाने पर इंतजाम करना पड़ेगा ।”
“इतने बड़े आपरेशन के काबिल है वो ?”
“नहीं ।”
“नुकसान क्या कर सकती है वो हमारा ?”
“खास कुछ नहीं । हमेशा की तरह हेरोइन का पार्सल उसने कमाठीपुरे में आगे किसी को सौंपना था लेकिन पार्सल रिसीव करने वाला आदमी हमेशा नया होता है इसलिए वह उसके बारे में जानती कुछ भी नहीं होगी ।”
“फिर क्या वान्दा है । पार्सल रिसीव करने जाने वाली आदमी को रोक ले । हेरोइन का गम खा ले और लड़की को फंसने दे ।”
“लड़की” - डोंगरे धीरे से बोला - “मुझे जानती है ।”
“क्या !”
“दो साल पहले उसको इस काम के लिए तैयार करने के वास्ते मैं उससे मिला था । तब बखिया साहब जिंदा थे और मैं ‘कम्पनी’ का सिपहसालार नहीं था ।”
“हूं । लड़की तो तेरी बाबत मुंह फाड़ भी चुकी हो सकती है ।”
“मुझे उम्मीद नहीं । ऐसा होता तो पुलिस अब तक मेरे पर चढ दौड़ी होती । लड़की होशियार है । मेरे ख्याल से पहले वो पार्सल रिसीव करने वाले को पकड़वा कर ही पुलिस की मेहरबानियां हासिल करने की कोशिश करेगी । वैसा न हो पाने की सूरत में, जाहिर है कि पुलिस का दबाव उस पर बढेगा । तब वो टूट सकती है और मेरे बारे में अपनी जुबान खोल सकती है ।”
“यूं तो पुलिस ‘कम्पनी’ तक भी पहुंच सकती है ।”
डोंगरे खामोश रहा । उसने अपने होंठों पर जुबान फेरी ।
“ऐसा नहीं होना चाहिए ।”
“जी हां ।”
“अब तू क्या करेगा ?”
“मैं क्या करूंगा ?” - डोंगरे अनिश्चितत भाव से बोला ।
“यानी कि” - इकबाल सिंह उसे घूरता हुआ बोला - “यह भी मुझे ही बताना होगा कि ऐसा होने से रोकने के लिए मेरा सिपहसालार क्या करेगा !”
“जी नहीं । जी नहीं ।” - डोंगरे बौखलाया - “मैं अभी लड़की को खलास कराने का इंतजाम करवाता हूं ।”
“शाबाश !”
***
विमल ने शीशे में अपनी सूरत देखी ।
एक नया चेहरा उसे अपनी तरफ झांकता दिखाई दिया ।
वह एक नितान्त अजनबी का चेहरा था ।
मशहूर इश्तिहारी मुजरिम सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल उर्फ विमल कुमार खन्ना उर्फ गिरीश माथुर उर्फ बनवारी लाल तांगेवाला उर्फ रमेश कुमार शर्मा उर्फ कैलाश मल्होत्रा उर्फ बसन्त कुमार मोटर मकैनिक उर्फ नितिन मेहता उर्फ कालीचरण की सूरत की परछाईं भी उस चेहरे में दिखाई नहीं दे रही थी ।
डॉक्टर अर्ल स्लेटर ने उसके पुराने मशहूर चेहरे पर नया, नामालूम चेहरा जड़ने में कमाल, बल्कि करिश्मा, कर दिखाया था ।
“धन्न करतार !” - उसके मुंह से निकला ।
अपनी आवाज सुनकर वह और भी हैरान हुआ । आवाज उससे खुद न पहचानी गई । आवाज में एक अजीब-सी भर्राहट आ गई थी जिसकी वजह से वह खुद उसके लिए एक नितांत अजनबी आवाज बन गई थी ।
आपरेशन से पहले डॉक्टर स्लेटर ने उसकी सूरत बदलने की गारंटी की थी लेकिन आवाज बदलने की बाबत सिर्फ उम्मीद जाहिर की थी । उसने कहा था कि वोकल कॉर्ड्स (Vocal Cords) से सिर्फ मामूली छेड़छाड़ का ही जोखिम उठाया जा सकता था जिसकी वजह से आवाज मुकम्मल तौर पर तब्दील हो सकती थी, उसमें मामूली तब्दीली आ सकती थी या वह कतई नहीं बदली जा सकती थी । वोकल कॉर्ड्स से ज्यादा छोड़छाड़ से आदमी की बोलने की शक्ति  के सदा के लिए समाप्त हो जाने का खतरा होता था ।
शीशे में से उसकी निगाह अपने पीछे खड़े डॉक्टर स्लेटर से मिली । डॉक्टर स्लेटर मुस्कराया ।
विमल के होंठों पर भी एक कृतज्ञ मुस्कराहट उभरी ।
“तुम खुशकिस्मत हो” - डॉक्टर स्लेटर बोला - “कि तुम्हारी आवाज में भी मैं ऐसी मुकम्मल तब्दीली पैदा कर सका ।”
“शुक्रिया ।” - विमल बोला ।
“शुक्रिया अपने बनाने वाले का अदा करो । क्योंकि इसमें मेरी सर्जिकल स्किल से ज्यादा इत्तफाक का, तुम्हारे मुकद्दर का, हाथ है । शुक्रगुजार होने के लिए अपने भगवान को याद करो ।”
“डॉक्टर भी भगवान का ही स्वरूप होता है ।”
डॉक्टर मुस्कराया ।
“और” - विमल बोला - “दाता की करनी पर मेरा क्या जोर है ! वो तो” - उसका स्वर तनिक भावविहल हो उठा - “जिस तिस भावै, तिवै चलावै, जिव होवै फरमाणु । वही सब कुछ करने वाला है । मेरे जैसे पापी, अधम इंसान के किए न कभी कुछ हुआ है, न होने वाला है । तू कर्त्ता करण मैं नाहिं, जा हऊ करी न होई ।”
डॉक्टर स्लेटर के चेहरे पर असमंजस के भाव आए लेकिन वह मुंह से कुछ न बोला ।
विमल ने फिर शीशे में अपने नए चेहरे को निहारा ।
एक महीना पहले वह राजनगर नामक महानगर से कोई बत्तीस मील दूर स्थित सोनपुर के नाम से जाने वाले उस छोटे से वीरान इलाके में स्थित डॉक्टर स्लेटर के नर्सिंग होम में प्लास्टिक सर्जरी द्वारा नया चेहरा हासिल करने की नीयत से आया था । पिछली बार जब विमल वहां आया था तो डॉक्टर स्लेटर ने उससे बतौर फीस पांच लाख रूपए की मांग की थी । तब उसके पास पांच लाख रूपए नहीं थे इसलिए उसे खाली हाथ वहां से लौटना पड़ा था ।
इस बार डॉक्टर स्लेटर ने दस लाख रूपए की मांग की थी ।
बकौल उसके वह कोई गोलियां देने वाला या नुस्खे लिखने वाला डॉक्टर नहीं था और न ही उसकी सेवाओं की कोई तयशुदा मुकर्रर फीस थी, वहां फीस का फैसला फीस देने वाले की क्षमता को, उसकी पेइंग कैपेसिटी को, ध्यान में रखकर किया जाता था । पिछली बार विमल उर्फ सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल पांच लाख की फीस के काबिल केस माना गया था लेकिन अब अंडरवर्ल्ड में उसकी जो शोहरत थी, उसको मद्देनजर रखकर उसे दस लाख रूपए की फीस के काबिल केस करार दिया गया था ।
ऐन इतनी ही रकम विमल मुम्बई से लेकर वहां आया था । फ्रेंच पेंटिंग्स की चोरी और फिरौती के हाई टेंशन ड्रामे के क्लाइमैक्स पर जो एक इकलौता नोटों से भरा ब्रीफकेस उसके हाथ लगा था, उसमें ऐन इतनी ही रकम थी ।
बहरहाल उसकी एक लम्बी तलाश खत्म हो गई थी ।
उसे नया चेहरा हासिल हो चुका था ।
वह डॉक्टर स्लेटर की तरफ घूमा ।
“एक कमी अभी भी बाकी है ।” - डॉक्टर स्लेटर गंभीरता से बोला ।
“जी !” - विमल सकपकाया ।
“लेकिन वो तुम्हें खुद दूर करनी होगी ।”
“क्या ?”
“तुम्हारी सूरत से तुम्हारी शिनाख्त अब मुमकिन नहीं लेकिन तुम्हारी उंगलियों के निशानों से तुम्हारी शिनाख्त, बावजूद तुम्हारे नए चेहरे के, हो सकती है । उंगलियों के निशान मैं तब्दील नहीं कर सकता । तुम सात राज्यों में घोषित इश्तिहारी मुजरिम हो । इसलिए पुलिस के कम-से-कम सात हैडक्वार्टरों में तो तुम्हारी उंगलियों के निशान महफूज हैं ही । उंगलियों के निशानों से पुलिस तुम्हारी अब भी शिनाख्त कर सकती है ।”
विमल के चेहरे पर चिंता के भाव आये ।
“मैंने डाकू जागीर सिंह का आपरेशन किया था । एम.पी. पुलिस के पास उसकी उंगलियों के निशानों का रिकार्ड था । उसने पुलिस के ही एक अधिकारी को भारी रिश्वत देकर रिकार्ड में से अपनी उंगलियों के निशान निकलवा लिए थे और उनकी जगह किसी और नामालूम शख्स के निशान रखवा दिए थे । रूपए-पैसे के मामले में तुम्हारी सामर्थ्य भी जागीर सिंह से कम तो न होगी । आखिर इतने बड़े गैंगस्टर हो और बैंक डकैत हो ।”
विमल ने एक आह भरी ।
“क्या हुआ ?”
“पता नहीं कब मैं किसी को यह विश्वास दिलाने में कामयाब हो पाऊंगा” - विमल उदास स्वर में बोला - “कि मैं हालात का गुलाम, वक्त की बेपनाह मार खाया हुआ, कुल जहान का सताया हुआ एक निहायत मामूली इंसान हूं और आज की तारीख में रूपए-पैसे के मामले में मेरी सामर्थ्य सिफर है ।”
“ऐसी सैड स्टोरी तुम मुझे एक बार पहले भी सुना चुके हो जबकि तुम एक लाख रूपए में आपरेशन करवाने की नीयत से यहां आए थे ।”
“और खाली हाथ लौट गया था । अगर मेरे पास तब आपकी फीस - जोकि तब पांच लाख थी - भरने के काबिल माल होता तो तब क्या मैं यहां से खाली हाथ लौटा होता ?”
“लेकिन तब यहां से जाते ही तुमने अमेरिकी डिप्लोमेट सिडनी फोस्टर का अपहरण कर लिया था और करोड़ों की फिरौती हासिल की थी ।”
“जिनमें से एक कानी कौड़ी मेरे हाथ नहीं लगी थी और मेरी जान जाते-जाते बची थी ।”
“तुम मेरे सामने जिन्दा मौजूद हो, नए चेहरे से लैस जिंदा मौजूद हो, और वह नया चेहरा तुमने मुझे दस लाख की रकम अदा करके हासिल किया है । ऐसी कोई रकम अदा कर सकने वाले शख्स को मैं कोई मामूली आदमी भला कैसे तसलीम कर सकता हूं !”
“लेकिन...”
“छोड़ो ! तुम क्या हो, यह तुम्हारा जाती मामला है । मैंने उससे क्या लेना-देना है ! तुमने मुझे मेरी फीस दी, मैंने तुम्हें नया चेहरा दिया, अब तुम अपने आपको राजा कहो गया भिखारी, मुझे क्या ?”
“मैं यहां से रुख्सत कब हो सकता हूं ?”
“जब तुम चाहो । चाहो तो अभी ।”
“हूं ।”
“तुम्हारी एक चिट्ठी आई हुई है ।”
“चिट्ठी ! मेरी !”
“हां ! मेरे ऑफिस में आकर ले लेना । किसी तुकाराम की चिट्ठी है । मुम्बई से आई है ।”
“ठीक है । मैं कपड़े पहनकर आता हूं ।”
डॉक्टर स्लेटर वहां से निकल गया ।
उसके पीछे-पीछे ही सोलंकी नाम का बाक्सरों जैसे गठे शरीर वाला और टूटी नाक वाला वह शख्स भी बाहर निकल गया जो कि डॉक्टर स्लेटर का सहायक और बॉडीगार्ड था और जो अभी तक बुत बना बंद दरवाजे के साथ पीठ लगाए वहां खड़ा था ।
विमल ने अपने जिस्म से नर्सिंग होम का सूती ड्रेसिंग गाउन अलग किया और उसके स्थान पर एक चैक की कमीज, जींस और जींस के ही कपड़े की बनी जैकेट पहन ली । अपनी आंखों पर उसने अपना निगाह का चश्मा लगा लिया । उसका फेमस हिप्पी परिधान भी उस वक्त उसके अधिकार में था लेकिन अब अपने पुराने चेहरे पर चढे नए चेहरे की मौजूदगी में उसे उस परिधान को पहनना गैरजरूरी लगा रहा था ।
अपना सारा सामान उसने एक सूटकेस में बंद कर लिया और उसे उठाए हुए कमरे में बाहर निकला ।
बाहर गलियारे में उसे हेल्गा दिखाई दी । वह अपलक विमल को देखने लगी ।
हेल्गा वहां की केयरटेकर थी और सोलंकी की तरह ही डॉक्टर स्लेटर की विश्वासपात्री थी । वह एक ड्रम जैसी लम्बी-चौड़ी और बेहद कठोर हावभाव वाली औरत थी । उम्र में यह ज्यादा नहीं थी और खूबसूरत भी थी लेकिन उसके असाधारण आकार की वजह से शायद ही किसी का ध्यान उसकी कमउम्री या खूबसूरती की तरफ जाता था । पिछली बार की तरह तब भी वह तम्बू जैसे मोटे कपड़े की फ्राक पहने हुए थी जिसमें से उसकी खम्बों जैसे मजबूत टांगें और बांहें बाहर झांक रही थीं । तब भी उसके होंठ भिंचे हुए थे और चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे घर में एकाएक घुस आए किसी चोर को देख रही हो ।
“हल्लो !” - विमल मुस्कराकर बोला ।
उसके चेहरे पर कोई भाव न आया ।
“मुझे पहचाना ! मैं डॉक्टर स्लेटर के कमाल का लेटेस्ट नमूना हूं ।”
वह खामोश रही ।
वह डॉक्टर स्लेटर के विशाल, वातानुकूलित ऑफिस में पहुंचा ।
डॉक्टर स्लेटर ने उसके मांगने से पहले ही एक बन्द लिफाफा उसे सौंप दिया ।
विमल ने लिफाफे को उलटा-पलटा । लिफाफे पर लगी डाकखाने की मोहर पर से मुम्बई तो साफ पढा जा रहा था, लेकिन उस पर तुकाराम का नाम नहीं लिखा था । उसने लिफाफे को ऊंचा करके रोशनी की तरफ किया तो उसे भीतर तह करके रखी चिट्ठी का आकार तो दिखाई दिया लेकिन उस पर कहीं लिखा तुकाराम का नाम या कोई और अक्षर दिखाई न‍ दिया ।
“आप” - विमल डॉक्टर को घूरता हुआ बोला - “यह लिफाफा खोल चुके हैं ।”
“हां ।” - डॉक्टर स्लेटर बड़े इत्मीनान से बोला - “यहां कभी मेरे से प्लास्टिक सर्जरी कराने आए मरीज की चिट्ठी नहीं आती । मैं नहीं चाहता कि लोगों को मालूम हो कि ऐसे मरीज को कहां अप्रोच किया जा सकता है । तुम्हारे नाम यहां यूं चिट्ठी आना यहां होने वाला ऐसा पहला वाकया है इसलिए मुझे मालूम होना चाहिए था कि वह चिट्ठी कैसी थी और उसमें क्या लिया था ।”
“कैसी है चिट्ठी ? क्या लिखा है इसमें ?”
“ऐसा कुछ नहीं लिखा जिससे मेरा वास्ता हो ।”
“हूं ।”
विमल ने चिट्ठी खोलकर पढ़ी । लिखा था:
सरदार,
मैं अभी भी टूटी टांग के साथ पलंग पर हूं । वागले मेरे से बेहतर हालत में है, चलता-फिरता है लेकिन कमजोर है । इकबाल सिंह तेरी वार्निंग को पूरी तरह से नजरअन्दाज करके अब पूरी तौर पर बखिया की जगह बखिया बना बैठा है । उसे एक बात का सख्त अफसोस है कि तू मुम्बई में इतनी बड़ी वारदात कर गया और उसे खबर न लगी । वो अपने आदमियों से बहुत खफा है और उनके अंजाम से धमका कर उन्हें तेरे को जिंदा या मुर्दा तलाश कर लाने को ललकार रहा है । लेकिन तेरा सोनपुर वाला काम अगर तसल्लीबख्श हो गया है तो डरने की कोई बात ही नहीं । वहां से निपटकर तेरे को फौरन मुम्बई आने का है, क्योंकि इधर कुछ लोगों के पास एक बहुत बड़ा कारनामा करने की स्कीम है लेकिन उन्हें आर्गेनाइज करने लायक कोई नेता नहीं । मैं तो शामिल हो नहीं सकता । वागले किसी हल्के काम के लिए शायद शामिल हो सके । काम जोखम का है लेकिन इतना मोटा माल हाथ लगने की उम्मीद है कि एक बार की कामयाबी के बाद एक लम्बा अरसा कुछ भी करना जरूरी नहीं होगा । उसी से इकबाल सिंह से टक्कर लेने की वो बुनियाद बनेगी जो तकदीर से पिछली बार न बन सकी । बिना वक्त खराब किए मुम्बई लौट वर्ना सिलसिला किन्हीं और हाथों में चला जाएगा ।
तुकाराम
विमल ने चिट्ठी को तह करके वापस लिफाफे में धकेला और लिफाफे को दोहरा मोड़कर अपनी जेब में रख लिया ।
“किसी बड़ी डकैती में शामिल होने का दावतनामा है ?” - डॉक्टर स्लेटर बोला ।
“हां ।” - विमल भावहीन स्वर में बोला ।
“यह तुकाराम वही तो नहीं जिसके चार भाई बखिया की जिन्दगी में उसके साथ छिड़ी भयंकर गैंगवार में मारे गए थे ?”
“वही है ।”
“काफी कांटे का आदमी है । तुम्हें बताया ही गया था कि यहां हर बड़े दादा की कारगुजारियों की फाइल रखी जाती है क्योंकि नया चेहरा हासिल करने के लिए देर-सवेर उसके यहां आने की हमें हमेशा उम्मीद होती है ।”
“फिलहाल तुकाराम को आपकी खिदमत की जरूरत नहीं ।”
“आगे पड़ सकती है । हम इन्तजार करेंगे ।”
“आपके पास देश के हर बड़े दादा की फाइल होती है । इकबाल सिंह की भी होगी !”
“है ।”
“आपको यह भी मालूम होगा कि मैंने उसे वार्निंग दी थी कि अगर उसने बखिया की जगह बखिया बनने की कोशिश की तो मैं उसे नेस्तनाबूद कर दूंगा और इसी वजह से इससे पहले कि मैं उस पर चढ़ दौडूं, इकबाल सिंह मुझे तलाश करवा कर मेरा काम तमाम करवा देने का ख्वाहिशमंद है ।”
“मालूम है ।”
“आपकी मेहरबानी से अब वो मेरी सूरत नहीं पहचान सकता ।”
“दुरुस्त ।”
“लेकिन आप ही की मेहरबानी से पहचान भी सकता है । क्योंकि आप...”
“तुम मूर्ख हो” - डॉक्टर स्लेटर सख्ती से बोला - “और मेरी तौहीन कर रहे हो ।”
“अपनी रिसर्च के लिए आपको बहुत दौलत की जरूरत है । मेरे नए चेहरे की जानकारी के बदले में इकबाल सिंह आपको मालामाल कर सकता है ।”
“मुझे किसी के ऐसे रहमोकरम की जरूरत नहीं । मेरी जरूरत के लायक दौलत मेरे पास है । बच्चे, दस लाख रूपए जो मैंने तुमसे लिये, वो सिर्फ प्लास्टिेक सर्जरी की फीस नहीं, वो इस बात की भी फीस है कि हमारी वजह से तुम्हारे नये चेहरे की जानकारी कभी किसी को नहीं होगी । हम लोग दगाबाज नहीं, अलबत्ता काम निकल जाने के बाद तुम्हारे जैसे मेरे पेशेन्ट दगाबाज हो सकते हैं । दगाबाज भी और नाशुक्रे भी ।”
“जी !”
“मैंने सोलंकी को कहा है कि वो तुम्हें स्टेशन तक छोड़ आए । वही रास्ते में तुम्हें बताएगा कि मेरे पेशेन्ट कैसे दगाबाज और नाशुक्रे हो सकते हैं और हकीकतन क्यों उन्हें ऐसा नहीं होना चाहिए ! सो लोंग, मिस्टर सोहल, आई विश यू आल दि बैस्ट इन युअर न्यू वर्ल्ड विद युअर न्यू फेस ।”
“थैंक्यू ।”
***
इन्स्पेक्टर अशोक जगनानी अपने आला अफसर ए.सी.पी. मनोहर देवड़ा के सामने पेश हुआ ।
“लड़की कुछ बकी ?” - देवड़ा ने पूछा ।
“नो, सर ।” - अशोक जगनानी बोला - “दस घंटे हो गए हैं पूछताछ करते हुए । उसने अभी तक यह रट नहीं छोड़ी है कि उसे नहीं मालूम था कि पैकट में हेरोइन थी ।”
“उसने क्या समझा था, क्या था पैकेट में ?”
“कहती है सिंगापुर में पैकेट उसे यह कहकर सौंपा गया था कि उसमें सरकारी कागजात थे जोकि मुम्बई में सिंगापुर कौन्सूलेट के डिप्लोमैटिक बैग में भेजे जाने से रहे गए थे ।”
“नानसेंस ! यह कोई चलने वाली कहानी है !”
“लेकिन वो तोते की तरह इस कहानी को बार-बार रटती जा रही है ।”
“भेदिया क्या कहता है ?”
“वो कहता है कि एयरहोस्टेस ‘कम्पनी’ के पे-रोल पर है और ‘कम्पनी’ की रेगुलर कूरियर है ।”
“फिर तो इस लड़की का टूटना बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है ।”
“जी हां ।”
“उसे यहां बुलाओ ।”
“यस, सर !”
कुछ क्षण बाद अशोक जगनानी ने लड़की को ए.सी.पी. के सामने पेश किया ।
लड़की का नाम शी हान था और वह उस वक्त भी सिंगापुर एयनलाइन्स की यूनीफार्म में थी ।
“प्लीज सिट डाउन ।” - देवड़ा मीठे स्वर में बोला ।
लड़की एक कुर्सी पर बैठ गई ।
“इन्हें कोई कॉफी-वाफी पिलाई ?” - देवड़ा जगनानी से बोला ।
“कॉफी ! इसे !” - जगनानी सख्ती से बोला - “काहे को ?”
“भई, ये हमारी गैस्ट हैं ।”
“यह नारकाटिक्स स्मगलिंग में पकड़ी गई मुजरिम है ।”
“शी इज ए वूमैन आफ्टर आल ।”
“स्मगलर स्मगलर होता है, वो औरत हो या मर्द । और मेरी निगाह में नारकाटिक्स स्मगलर तो न औरत होता है और न मर्द, वो मोरी का कीड़ा होता है जो हमारे घरों को, हमारे बच्चों को, तबाह करने का सामान करता है । ऐसे मोरी के कीड़े को जल्द-से-जल्द मसल देना चाहिए ।”
“मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूं, मैं तुम्हारे आक्रोश को समझता हूं, लेकिन कॉफी एक कामन कर्टसी है जिसे हम इन ख्यालात पर कायम रहकर भी निभा सकते हैं ।”
“मैं अभी इन्तजाम करता हूं ।” - जगनानी अनिच्छापूर्ण स्वर में बोला ।
“दैट्स ए गुड ब्वाय ।”
जगनानी ने कॉफी का इन्तजाम किया ।
लड़की तुरन्त बड़े कृतज्ञभाव से कॉफी की चुस्कियां लेने लगी ।
“तो तुम्हें नहीं मालूम था” - ए.सी.पी. देवड़ा मीठे स्वर में बोला - “कि पैकेट में हेरोइन थी ?”
लड़की ने इन्कार में सिर हिलाया ।
“डिप्लोमैटिक पेपर्स यूं तो नहीं भेजे जाते ! ऐसा किया भी जाना था तो पैकेट प्लेन के कप्तान को सौंपा गया होता !”
“पैकेट मुझे सौंपा गया था ।” - वह बोली ।
“तुमने पैकेट की बाबत कप्तान को बताया था ?”
“नहीं ।”
“वजह ? ऐसी बेतरतीब बात की खबर प्लेन के कप्तान को तो होनी चाहिए थी !”
“मुझे... मुझे तब यह बात बेतरतीब नहीं लगी थी ।”
“कितने साल से एयरहोस्टेस हो ?”
“दो साल से ।”
“फिर भी नहीं जानतीं कि ऐसी कोई बात गलत होती है, बेतरतीब होती है !”
“पहले कभी ऐसा कुछ हुआ नहीं था ।”
“अगर हम यह कहें कि ऐसे पैकेट तुम पहले भी अक्सर लाती रही हो ?”
“तो मैं कहूंगी कि यह झूठ है ।”
“हूं । यह पैकेट यहां मुम्बई में तुमने किसको सौंपना था ?”
“कौन्सूलेट से एयरपोर्ट पर पहुंचे किसी आदमी को ।”
“उसका नाम ?”
“मुझे नहीं मालूम !”
“यानी कि जो कोई भी तुम्हें एयरपोर्ट पर आकर कहता है कि वह कौन्सूलेट से आया आदमी था, तुम उसे पैकेट दे देतीं ?”
“वह ‘कोई भी’ आदमी न होता । वह वो आदमी होता जिसे मेरी और मेरे हाथ भेजे गए इस पैकेट की खबर होती ।”
“यानी कि जिस शख्स ने तुम्हें सिंगापुर में पैकेट दिया था, उसने यहां कौन्सूलेट में भी फोन लगाया होगा कि पैकेट तुम्हारे हाथ, सिंगापुर एयरलाइन्स की एयरहोस्टेस शी हान के हाथ, भेजा जा रहा था ?”
“हां ।”
“यानी कि कौन्सूलेट से पूछे जाने पर हमें यह जवाब मिलेगा कि उन्हें इस तरीके से एक पैकेट के यहां आगमन की खबर है ?”
“हां ।”
“जगनानी, कौन्सूलेट में फोन करो और मेरी वहां के किसी जिम्मेदार आदमी से बात करवाओ ।”
“यस सर ।” - जगनानी तत्पर स्वर में बोला ।
लड़की तुरन्त व्याकुल दिखाई देने लगी । उसने अब तक हाथ में थमा कॉफी का कप नीचे रख दिया ।
“शायद कौन्सूलेट में किसी को खबर न हो ।” - वह बोली ।
“ऐसा कैसे हो सकता है ! फ्लाइट आए दस घण्टे हो चुके हैं । उन्हें पहले नहीं तो अब मालूम होगा । अब तक तो उन्होंने खुद तुम्हारी खोज-खबर लेनी शुरु कर दी होगी ।”
वह खामोश रही ।
“यह कहानी नहीं चलने वाली, मैडम ।” - जगनानी कर्कश स्वर में बोला - “तुम नारकाटिक्स स्मगलर हो और पहले से अपनी यह करतूत दोहराती चली आ रही हो, यह बात देर-सवेर तुम्हें कबूल करनी ही पड़ेगी ।”
“तुम्हारी सहूलियत के लिए” - देवड़ा सहानुभूतिपूर्ण स्वर में बोला - “इसे हम तुम्हारा फर्स्ट औफेंस मान सकते हैं ।”
“यह रेगुलूर कूरियर है ।” - जगनानी भड़का ।
“लेकिन नौजवान है, नासमझ है, वक्ती लालच में फंसी हुई है और नहीं जानती कि कैसी निश्चित तबाही और बरबादी की राह पर बढ रही है ।” - देवड़ा बोला - “शायद यह भी नहीं जानती कि नारकाटिक्स स्मगलिंग कितना बड़ा इन्टरनैशनल क्राइम है और इसकी कितनी सख्ता सजा हो सकती है ।”
“सख्ता सजा !” - लड़की के मुंह से निकला ।
“दस साल ! आठ साल ! पांच साल से कम तो हरगिज नहीं ।”
“प... पांच साल !”
“यानी कि कैरियर खत्म । नौजवानी खत्म । खूबसूरती खत्म । यूं कह लो कि जिन्दगी खत्म ।”
उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं ।
“लेकिन तुम्हारी हरकत को फर्स्ट औफेंस करार दिए जाने पर तुम्हारे लिए काफी उम्मीद हो सकती है ।”
“क... क्या ?”
“हम कोशिश करेंगे कि तुम्हें सजा हो ही न बशर्ते कि...”
देवड़ा जानबूझकर ठिठक गया ।
“क्या ! क्या !” - लड़की व्याकुल भाव से बोली ।
“बशर्ते कि तुम इस आदमी की पूरी जानकारी दो जिसने तुम्हें पैकेट सौंपा था और उस आदमी की भी पूरी जानकारी दो जिसको तुमने यहां मुम्बई में पैकेट सौंपना था ।”
“पहले आदमी की पूरी जानकारी मैं दे सकती हूं लेकिन दूसरे की नहीं ।”
“वजह !”
“दूसरे की पूरी जानकारी मुझे है ही नहीं ।”
“ऐसा कैसे हो सकता है ?”
“ऐसा ही है ।”
“लेकिन पैकेट को तुमने यहां कहीं तो पहुंचाना ही था ।”
“हमेशा भी तो कहीं पहुंचाती रही हो ।” - जगनानी कर्कश स्वर में बोला ।
देवड़ा ने हाथ उठाकर जगनानी को खामोश रहने के लिए कहा और लड़की की तरफ देखा ।
“मुझे मुम्बई की हमेशा एक नई जगह बताई जाती है” - लड़की धीरे से बोली - “जहां हमेशा मुझे एक नया आदमी मिलता है ।”
“तुम उसे पहचानती कैसे हो ?”
“मैं उसे नहीं, वो मुझे पहचानता है । मुझे एक कोड वर्ड बताया जाता है । जो शख्स वो कोड वर्ड दोहराता है, उसी को मैं पैकेट सौंप देती हूं ।”
“इस बार का कोड वर्ड क्या है ?”
“गोल्डन ड्रैगन ।”
“जगह ?”
“कमाठीपुरे में न्यू बाम्बे रेस्टोरेन्ट ।”
“कब पहुंचना है ?”
“ग्यारह बजे ।”
देवड़ा ने घड़ी देखी, दस बजे थे ।
“मैडम के” - फिर उसने आदेश दिया - “ठीक टाइम पर कमाठीपुरे के न्यू बाम्बे में पहुंचने का इन्तजाम करो ।”
“यस, सर ।” - जगनानी तत्पर से बोला ।
***
सोलंकी खामोशी से एक खड़खड़ स्टेशनवैगन चला रहा था । विमल अपने पाइप के कश लगाता हुआ उसकी बगल में बैठा था । अपना नया चेहरा उसे अभी बहुत असुविधाजनक लग रहा था । उसे अपने माथे की चमड़ी खिंच कर तन गई लग रही थी और मुंह चलाने पर यूं अनुभव होता था जैसे चेहरे पर गोंद का लेप लगकर सूख गया हो ।
“आदत हो जाएगी ।” - सोलंकी जैसे उसके मन के भाव पढता हुआ बोला - “चन्द दिनों में आदत हो जाएगी ।”
विमल ने विस्मित भाव से उसकी तरफ देखा और फिर सहमति में सिर हिलाते हुए पाइप का गहरा कश लगाया ।
“नया चेहरा हासिल हो जाने के बाद अब कुछ पुरानी आदतों से भी तुम्हें किनारा कर लेना चाहिए ।”
“मतलब ?”
“हर आदमी के कुछ खास हावभाव, कुछ खास मैनरिजम होते हैं जिनसे चाहे वो पहचाना न जा सके लेकिन देखने वाले की तवज्जो जरूर उसकी तरफ जाती है, पहचान चाहे वो न पाये लेकिन यह सोचे बिना नहीं रह सकता कि इस शख्स की फलां हरकत ऐन उस शख्स जैसी है जिसे वह कभी जानता था लेकिन इस शख्स की सूरत नहीं मिलती ।”
“तुम्हारी इशारा मेरे पाइप की तरफ है ?”
“पाइप की तरफ भी और आंखों पर से चश्मा उतारकर उसी हाथ की पीठ आंखों पर फेरने की तुम्हारी खास आदत की तरफ भी । और भी तुम्हारी कई छोटी-मोटी आदतें मैंने नोट की हैं ।”
“मैं इन आदतों को छोड़ने की कोशिश करूंगा ।”
“तमाम न छोड़ सको तो ऐसी मोटी-मोटी, ज्यादा तवज्जो में आने वाली आदतें तो छोड़ ही दो ।”
“डॉक्टर साहब कह रहे थे कि रास्ते में तुम मुझे कोई शिक्षा देने वाले थे ।”
“मैंने तुम्हें एक छोटी-सी कहानी सुनानी है । उससे कोई शिक्षा हासिल करना या न करना तुम्हारी मर्जी पर मुनहसर है ।”
“मैं सुन रहा हूं । कहानियां सुनने का मुझे काफी शौक है ।”
“एक बार एक बहुत बड़ा डकैत यहां डॉक्टर साहब से नया चेहरा हासिल करने आया था । मुंह मांगी फीस के बदले डॉक्टर साहब ने उसे नया चेहरा दिया था । सर्जरी के बाद डकैत ने शीशे में अपनी सूरत देखी तो उसे लगा कि करिश्मा हो गया था । तब उसके जेहन में ये नापाक ख्याल आया था कि अगर वह डॉक्टर साहब का कत्ल कर दे तो फिर कभी किसी को मालूम नहीं हो पाएगा कि उस नए चेहरे के नीचे कौन-सा चेहरा दफन था । ऐसा ख्याल करना उसकी मूर्खता थी क्योंकि डॉक्टर स्लेटर वन हंड्रेड परसेंट भरोसे के काबिल शख्स हैं लेकिन उस डकैत ने डॉक्टर स्लेटर पर शक किया और समझा कि उसके नये चेहरे का राज राज रह सकता था । नतीजतन मुझे उसका नया चेहरा उससे छीन लेना पड़ा ।”
“कैसे छीना उसका नया चेहरा ? गिरफ्तार करवा दिया उसे ?”
सोलंकी के चेहरे पर एक बड़ी क्रूर मुस्कराहट आई ।
“ओह !” - विमल बोला - “तो तुम डॉक्टर स्लेटर के बॉडीगार्ड ही नहीं, जल्लाद भी हो ।”
“समझदार आदमी हो ।”
“तुम समझते हो कि तुम मेरे से भी मेरा नया चेहरा छीन सकते हो ?”
“जब चाहूं । मामूली काम है ।”
“मुझे ढूंढोगे कैसे ?”
“तुम्हें ढूंढना जरूरी नहीं होगा । आज के बाद तुम्हारा सोनपुर में कदम भी रखना तुम्हारे ऐसे किसी नापाक इरादे की दस्तावेज होगा ।”
“यानी कि मैं यहां डॉक्टर साहब का शुक्रगुजार होने भी आऊंगा तो तुम समझोगे कि मैं उनका कत्ल करने आया हूं ?”
“डॉक्टर साहब का जितना शुक्रगुजार होना जरूरी था, उससे कहीं ज्यादा शुक्रगुजार होकर तुम जा रहे हो । जुबानी भी और दस लाख रूपए की फीस की सूरत में भी । फिर भी कोई कसर रह गई हो तो मैं अभी तुम्हें वापस डॉक्टर साहब के पास ले चलता हूं । घुमाऊ गाड़ी ?”
“नहीं ।”
“कुछ भी करना, मिस्टर, आज के बाद इधर का रुख न करना । कहते हैं अक्लमंद को इशारा ही काफी होता है । तुम अक्लमंद हो न ?”
“सर्जरी से दिमाग में कोई नुक्स न हो गया हो तो हूं ।”
“गुड ।”
उसने स्टेशनवगैन सोनपुर के स्टेशन के सामने लॉकर रोकी ।
वहां से विमल ने ट्रेन में सवार होना था -
सुनील के शहर राजनगर जाने के लिए ।
***
न्यू बाम्बे रेस्टोरेन्ट कमाठीपुरे के घने इलाके में एक चारमंजिली इमारत के ग्राउन्ड फ्लोर पर था । सड़क के पार भी वैसी ही चारमंजिली इमारतों की कतार थी जिनमें से जो इमारत न्यू बाम्बे रेस्टोरेन्ट वाली इमारत के ऐन सामने पड़ती थी, उसकी दूसरी मंजिल के एक कमरे में श्याम डोंगरे मौजूद था । उसके साथ अब्दुल गनी नाम का एक दुबला-पतला मरघिल्ला-सा लेकिन निहायत क्रूर चेहरे वाला व्यक्ति मौजूद था । वह व्यक्ति रायफल का क्रैक-शाट था । टेलीस्कोपिक रायफल को हैंडल करने में उसे महारत हासिल थी । रायफल के अपने अचूक निशाने से वह ‘कम्पनी’ के लिए पहले भी कई कत्ल कर चुका था ।
“लड़की गिरफ्तार है” - डोंगरे धीमे किन्तु स्पष्ट स्वर में बोला - “हो सकता है वह यहां आए ही नहीं । लेकिन अगर आएगी तो उसके साथ उसके इर्द-गिर्द मक्खियों की तरह भिनभिनाते दर्जनों सादी वर्दी वाले पुलिसिये होंगे जो लड़की के कान्टैक्ट को गिरफ्तार करने की नीयत से लड़की को वहां लेकर आएंगे ।”
“यानी कि” - अब्दुल गनी बोला - “लड़की अगर यहां आएगी तो पूरी प्रोटेक्शन के साथ आएगी ।”
“दुरुस्त । वो प्रोटेक्शन आती बार बहुत जोरों पर होगी लेकिन लौटती बार मिशन नाकामयाब हो गया जानकर पुलिसिए लापरवाह हो चुके होंगे । इसलिए तूने लड़की को तब शूट करना है जब वो यहां से लौट रही हो, न कि तब जबकि वो यहां पहुंची हो ।”
अब्दुल गनी ने सहमति में सिर हिलाया ।
“काम हो जाने के बाद रायफल तूने साथ नहीं रखनी । इसे तूने कहां छुपाना है, यह मैं तेरे को बता चुका हूं । काम हो जाने के बाद तूने खिसकना किधर से है, यह भी तेरे को समझा चुका हूं । अब्दुल गनी, कोई कोताही न हो । तेरे को फेल नहीं होने का है ।”
“पहले कभी हुआ, बाप !”
“पहले की बात पहले के साथ गई । मैं अब की बात बोला । क्या ?”
“मेरे कू फेल नहीं होना मांगता ।”
“हां ।”
“बाप, अगर छोकरी के यहां पहुंचते ही मेरे कू लगे कि मैं उसे खलास कर सकता हूं तो करूं या नहीं ?”
“जरूर कर । तेरे को जो मुनासिब लगे कर । मेरी कोई राय मानना भी तेरे लिए जरूर नहीं । लेकिन” - डोंगरे एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला - “काम - होना - चाहिए ।”
“बराबर होएंगा, बाप ।”
“बढिया ।”
***
“मैं मिस्टर सुनील कुमार चक्रवर्ती से मिलना चाहता हूं ।”
रेणु ने एक सरसरी निगाह चैक की कमीज और डेनिम की जींस जैकेट पहने, भराई आवाज में बोले उस चश्माधारी युवक पर डाली जो ‘ब्लास्ट’ के रिसैप्शन पर खड़ा ‘ब्लास्ट’ के चीफ रिपोर्टर से मिलने की ख्वाहिश जाहिर कर रहा था ।
“किस सिलसिल में ?” - रेणु ने पूछा ।
युवक के चेहरे पर एक मीठी मुस्कुराहट आई ।
“सिलसिला से उन्हीं को बताऊं तो बेहतर नहीं रहेगा ?” - वह बोला - “यूं मुझे अपनी बात दो बार नहीं कहनी पड़ेगी ।”
“आपका शुभ नाम ?”
“वि - नितिन । नितिन मेहता ।”
“आप उधर तशरिफ रखिए, मैं मालूम करती हूं कि मिस्टर चक्रवर्ती ऑफिस में हैं या नहीं !
“शुक्रिया ।”
रेणु फोन पर बात करने लगी ।
फिर उसने फोन रख दिया, एक चपरासी को तलब किया और उसे साहब को चक्रवर्ती साहब के ऑफिस में छोड़ आने का आदेश दिया ।
चपरासी विमल को सुनील के ऑफिस में छोड़ आया ।
सुनील की पैनी निगाह एकबारगी आगंतुक के सिर से पांव तक फिर गई ।
“विराजिए ।” - फिर वह बोला ।
“शुक्रिया ।” - विमल एक कुर्सी पर बैठ गया ।
“क्या नाम बताया था आपने अपना ?”
“नितिन मेहता ।”
“एक नितिन मेहता साहब को कभी मैं भी जानता था । बड़ी अजीमोश्शान हस्ती थे वो साहब लेकिन” - सुनील ने फिर बारीकी से विमल की सूरत को परखा - “उनसे आपकी शक्ल तो नहीं मिलती । कतई नहीं मिलती ।”
विमल खामोश रहा ।
सुनील ने अपनी जेब से लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकालकर अपने विशिष्ट अन्दाज से उसे यूं झटका कि केवल एक सिगरेट पैकेट से बाहर आधा उछल आया ।
“सिगरेट !” - वह पैकेट विमल की तरफ बढाता हुआ बोला ।
“जी नहीं, शुक्रिया । मैं पाइप पीता हूं । अगर इजाजत हो तो...”
“हां, हां । शौक से ।”
विमल ने अपनी जेब से अपना पाइप और तम्बाकू का पैकेट निकाला ।
“मेरे वाकिफकार नितिन मेहता भी पाइप ही पीते थे ।” - सुनील वही सिगरेट जो उसने विमल को पेश किया था, अपने होंठों से लगाता हुआ बोला ।
“अच्छा !”
“आपका कद-काठ, रख-रखाव सब कुछ उनसे मिलता है लेकिन सूरत नहीं मिलती, आवाज नहीं मिलती ।”
“कतई नहीं ।”
“जी हां । कतई नहीं ।”
“यानी कि” - विमल तनिक विनोदपूर्ण स्वर में बोला - “मैं पास हो गया ।”
“किस बात में ?”
“अगर आप मुझे नहीं पहचान सके तो कोई और भला क्योंकर पहचान पाएगा मुझे ?”
“मतलब ?” 
उत्तर देने से पहले विमल अपना पाइप सुलगाने के लिए ठिठका ।
“जनाब” - फिर वह ढेर सारा धुआं उगलता हुआ बोला - “अगर मैं कहूं कि मैं वही नितिन मेहता हूं जिसका अक्स इस वक्त आपके जेहन में है तो ?”
“क्या !” - सुनील अचकचाया ।
“और अगर मैं कहूं कि मैं सोहल हूं ।”
“सोहल ! कौन सोहल ?”
“आज की तारीख में हिन्दोस्तान में एक ही तो सोहल है जिक्र के काबिल । और वो भी अखबार के दफ्तर में ।”
“सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल ?”
“वही ।”
“जिसका सिर पर दो लाख का इनाम है ?”
“बिल्कुल वही । सुनील साहब, अगर मैं कहूं कि मैं वही मशहूर लेकिन बदकिस्मत इश्तिहारी मुजरिम सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल हूं तो ?”
“तो मैं कहूंगा कि तुम झूठ बोल रहे हो या मजाक कर रहे हो ।”
विमल मुस्कराया ।
“प्यारेलाल, मैं माजाकपसन्द आदमी हूं लेकिन बेहूदा, बेमानी मजाक पसन्द नहीं करता ।”
“मैं कैसा भी मजाक पसंद नहीं करता ।” - विमल बड़ी संजीदगी से बोला ।
“सुनील कुछ क्षण हकबकाया-सा उसका मुंह देखता रहा और फिर धीरे से बोला - “तो तुम सोहल हो ?”
“जी हां ।”
“तो फिर मैं तुम्हारी सूरत क्यों नहीं पहचान पा रहा ?”
“प्लास्टिक सर्जरी की वजह से ।”
“आवाज क्यों नहीं पहचान पा रहा ?”
“वो भी सर्जरी की वजह से ।”
“मैंने कभी नहीं सुना कि सर्जरी से आवाज भी तब्दील हो सकती है ।”
“अब सुन लीजिये ।”
“मुझे अभी भी यकीन नहीं आ रहा कि तुम सोहल हो ।”
“और कौन ऐसा अहमक होगा जो अखबार के दफ्तर में आकर अपने सोहल होने का दावा करेगा ?”
“ठहरो । अगर तुम सोहल हो तो तुम्हें मालूम होगा कि जब तुम पहली बारी यहां आए थे तो मैं तुम्हें कहां मिला था ।”
“रिसैप्शन पर ।” - विमल तत्काल बोला ।
“हमारे में क्या वार्तालाप हुआ था ?”
“मैंने आपसे आपके अखबार की मोर्ग के बारे में पूछा था । मेरे तब के हुलिये और हिप्पी लिबास पर गौर फरमाते हुए तब आपे पूछा था कि क्या मैं जानता था कि मोर्ग किस चिड़िया का नाम होता था । तब मैंने भी आपसे एक सवाल पूछा था ।”
“क्या ?”
“कि क्या आप जानते थे कि तहजीब किस चिड़िया का नाम होता था ।”
“हूं ।”
“अपनी असलियत साबित करने के लिए मैं अमेरिकन डिप्लोमेट सिडनी फोस्टर के यहां हुए अपहरण का सारा ड्रामा सीन टू सीन सुना सकता हूं लेकिन उससे आपकी तसल्ली नहीं होगी क्योंकि तब आप कहेंगे कि ये बातें तो अखबार पढकर भी जानी जा सकती हैं, अपहरण में शरीक किसी शख्स की जुबानी सुनी जा सकती हैं, खुद सोहल की जुबानी सुनी जा सकती हैं । लेकिन एक सबूत ऐसा है जो सोहल और सिर्फ सोहल पेश कर सकता है ।”
“क्या ?”
विमल ने पाइप दांतों में दबाया और फिर पहले अपनी जैकेट की जिप और फिर कमीज के बटन खोले ।
“मेरी छाती पर” - विमल बोला - “आपको पंचर वूंड का वो निशान दिखाई दे रहा होगा जोकि नूरपूर के समुद्र तट पर पीटर नाम के मवाली के मेरी छाती में बर्फ काटने वाला सुआ उतार देने से बना था ।”
सुनील ने बहुत गौर से विमल की छाती का मुआयना किया ।
“ऐसा निशान” - सुनील जिदभरे स्वर में बोला - “किसी की भी छाती पर हो सकता है ।”
“लेकिन” - विमल बोला - “यह निशान बनने की वो वजह हर कोई नहीं बता सकता जो मैंने बताई ।”
“नूरपूर से तुम कहां ले जाए गए थे ?”
“तारकपुर । एक चतुर्वेदी नाम के डॉक्टर के घर । घर पर आबादी से बाहर एक फार्म जैसी जगह में था ।”
“वहां तुम्हें कौन लाया था ?”
“आप और आपका जौहरी नाम का एक फ्रेंड ।”
“साथ में और कौन था ?”
“मेरी जोड़ीदार जगमोहन ।”
“वहां जब तुम्हें लगा था कि तुम मर रहे हो तो तुमने अपनी एक आखिरी ख्वाहिश जाहिर की थी । वह ख्वाहिश क्या था ?”
“मैं मरने से पहले एक बार नीलम से मिलना चाहता था ।”
“तारकपुर से तुम कहां गए थे ?”
“चण्डीगढ । नीलम के साथ ?”
“कैसे ?”
“हैलीकॉप्टर पर ।”
“तुम सोहल हो ।” - सुनील निर्णयात्मक स्वर में बोला ।
“शुक्रिया ।” - विमल ने अपने कपड़े व्यवस्थित कर लिए ।
“तो तुम्हारी ख्वाहिश पूरी हो गई आखिरकार ? नया चेहरा हासिल हो गया तुम्हें ?” 
“जी हां ।”
“अब तो नीलम के साथ चैन की जिन्दगी बिता सकते हो तुम ।”
“नहीं ।” - विमल के स्वर में अवसाद का गहरा पुट आ गया ।
“क्यों ?”
“नीलम अब इस दुनिया में नहीं है ।”
“क्या ! क्या हुआ उसे ?”
विमल ने बताया ।
“ओह !” - सुनील हमदर्दीभरे स्वर में बोला ।
“सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल की सारी लाइफ स्टोरी ही यह है” - विमल कातर स्वर में बोला - “कि सुख उसकी किस्मत में नहीं लिखा । इत्मीनान उसके मुकद्दर में नहीं लिखा । उसका अपनी जिन्दगी पर दावा उस कुत्ते जितना ही है जो दर-दर की ठोकरें खाता हैं, दुर-दुर करता गली-गली भटकता है ।”
“जो हुआ उसे भूल जाओ ।”
“कहना आसान है ।”
“भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि जो हुआ, अच्छा हुआ, जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है, जो होगा अच्छा ही होगा ।”
“जो तुध पावे नानका सोई भला कार ।”
“ऐग्जैक्टली ! भूत का पश्चताप बेकार है । भविष्य की चिन्ता बेकार है । वर्तमान चल रहा है ।”
विमल खामोश रहा । उसने पाइप का एक गहरा कश लगाया ।
“यह सच है” - सुनील ने पूछा - “कि मुम्बई में फ्रेंच पेटिंग्स की चोरी के पीछे भी तुम्हारा हाथ था ?”
“सच है ।”
“मकसद क्या था उस हरकत के पीछे ?”
“दौलत हासिल करना ।”
“ओह ! तो अब तुम दौलत के दीवाने हो गए हो ! पहले तो दौलत जबरन तुम्हारे गले पड़ती थी तो तुम उसे झटक देते थे ।”
“पहले मेरी जिन्दगी में दौलत का, खासतौर से हराम की दौलत का, कोई रोल नहीं था ।”
“अब है ?”
“आगे होगा । दौलत हासिल होगी तो होगा । अभी तक दौलत एक छलावा ही साबित हो रही है । चार पैसे नया चेहरा हासिल करने के लिए हाथ लग गए, यह भी करिश्मा जानिए ।”
“आई सी ।”
“सुनील साहब, आप यह समझिये कि मैं एक खाली, बेमानी जिन्दगी जी रहा हूं । मेरी मौत तो नीलम की मौत के साथ ही हो गई थी । अब तो वह एक खोखला जिस्म है जिससे रूह अलग कर दी गई और जिसे अपने अनगिनत पापों के प्रायश्चित के तौर पर मैं एक सलीब की तरह ढो रहा हूं ।”
“जिन्दगी का कोई मकसद हासिल हो जाए तो जिन्दगी फिर से जिन्दगी बन जाती है ।”
“हां । ठीक फरमाया आपने । हर कोई कहता है कि इन्सानी जिन्दगी का कोई मकसद होना चाहिए । नीलम के बगैर मुझे क्योंकि अपनी जिन्दगी का कोई मकसद नहीं दिखार्द दे रहा इसलिए दो मकदस मैं अपनी जिन्दगी पर जबरन थोपने जा रहा हूं ।”
“वो क्या ?”
“एक तो आर्गेनाइज्ड क्राइम की मुखालफत और दूसरे गरीब, बेसहारा, मजलूम लोगों की मदद ।”
“यानी कि रोबिन हुड बनने का इरादा है !”
“यही समझ लीजिये ।”
“यानी कि इतना बड़ा सूरमा अब सखी हातिम बनेगा !”
“सूरमाई सिर्फ मारकाट, दंगा-फसाद में ही नहीं, जनाब । हमारे धर्मग्रन्थ में लिखा है कि सूरा सो पहचानिए जो लरे दीन के हेत ।”
“तो अब तुम दीन के हित में लड़कर सूरमा बनोगे ।”
“कोशिश करूंगा ।”
“शुरुआत क्या राजनगर से करने का इरादा है ?”
“नहीं । मुम्बई से । जहां इकबाल सिंह नाम का वो शख्स रहता है जोकि, बावजूद मेरी वार्निग के, बखिया बनने से बाज न आया, जोकि आज की तारीख में आर्गेनाइज्ड क्राइम का सबसे बड़ा महंत है ।”
“अकेला चना भाड़ फोड़ लेगा ?”
“मिशन में खुदगर्जी का हाथ न हो तो हिमायती मिल जाते हैं । पाक और मजबूत इरादों के लिए रास्ते अपने आप खुलने लगते हैं ।”
“हूं । तो अब तुम इकबाल सिंह से भिड़ने मुम्बई जा रहे हो !”
“जी हां ।”
“यहां कैसे आए ?”
“अपने मोहसिन से, अपने जीवनदाता से मिलने । उसका एक बार फिर से शुक्रगुजार होने । मैं आज अगर जिंदा हूं तो आपकी वजह से । तारकपुर में आपने मेरे लिए जो कुछ किया था, वो कोई अपने किसी सगेवाले के लिए नहीं करता । सुनील साहब, मेरी जिन्दगी आपकी अमानत है । आप इसके मालिक हैं । इसलिये मैं ऐसा समझता हूं कि कम-से-कम आपको मेरे नये चेहरे की जानकारी जरूर होनी जाहिए ।” - अपनी जैकेट की जेब से विमल ने एक लिफाफा निकालकर सुनील के सामने रख दिया - “इस लिफाफे में मेरी दो तस्वीरें हैं । एक तस्वीर मेरी पुरानी सूरत की है और दूसरी मेरे नये चहेरे की । मेरे प्लास्टिक सर्जन और उसके स्टाफ के अलावा, जोकि गोपनीयता के लिए वचनबद्ध हैं, अब, सिर्फ आप जानते हैं कि आज कि तारीख में मशहूर इश्तिहारी मुजरिम सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल देखने में कैसा लगता है ! अब आप जब चाहें मेरे नये चेहरे की पोल खोल सकते हैं और मुझे गिरफ्तार करवा सकते हैं ।”
“मैं ऐसा क्यों करूंगा ?”
“इस वक्त तो कोई वजह नहीं दिखाई देती लेकिन आइंदा जिन्दगी मे वजह निकल सकती है । आइंदा जिन्दगी में शायद आपको मेरी कारगुजारियों से इत्तफाक न रहे, आइंदा जिन्दगी में शायद कभी मैं आपको समाज के लिए वांछनीय और हितकर व्यक्ति न लगूं । तब मेरे नये चेहरे की तस्वीर मुझे गिरफ्तार करवाने में आपके काम आएगी । सुनील साहब, मेरी जिन्दगी आपकी धरोहर है, इसे आप जब चाहें मेरे से वापस ले सकते हैं ।”
“तम भावुक हो रहे हो भावुकतावश ही यह कदम उठा रहे हो ।”
“शायद ।”
“भावुक होना बुरी बात नहीं होती लेकिन भावुकता पर ज्ञान का अंकुश न होना बुरी बात होती है । तुम जो कुछ कर रहे हो, कोरी भावुकता के वश में होकर कर रहे हो । मैंने तुम्हारे लिए क्या किया था, क्यों किया था, कैसे किया था, वो कहानी अब खत्म हो चुकी है ।”
“आपकी तरफ से खत्म हो चुकी हो सकती है, लेकिन मेरी तरफ से तो वो कहानी मेरे साथ ही खत्म होगी ।”
“मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूं लेकिन साथ ही तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि मेरी वजह से तुम्हारा कभी कोई अहित नहीं होगा । इसलिए मेरे पास अपने नये चेहरे की तस्वीर छोड़कर जाना बेमानी है ।”
“इस वक्त बेमानी है, आगे इसके कई मायने निकल सकते हैं ।”
“चलो, तुम्हारी मर्जी । अब चलो, बार में चल कर एक-एक ड्रिंक लेते हैं और तुम्हारे नये चेहरे को सैलीब्रेट करते हैं ।”
“मैं माफी चाहता हूं कि...”
“क्या ? अब यह न कह देना कि ड्रिंक नहीं करते हो ! इतने सूरमा सरदार होकर ड्रिंक नहीं करते हो !”
“वो बात नहीं । दरअसल मैं ट्रेन की टिकट लेकर आया हूं । ऐसी किसी सैलीब्रेशन में मेरी गाड़ी छूट जाएगी ।”
“मुम्बई की गाड़ी ?”
“जी हां ।”
“भई, मेरे से मिलने आए थे, वक्त तो निकालकर आना था !”
“आप हुक्म कीजिए मैं जाता ही नहीं । मैं अभी टिकट फाड़कर फेंक देता हूं ।”
“नहीं-नहीं । उसकी जरूरत नहीं । चलो एक-एक कप कॉफी ही हो जाए । उसके लिए तो वक्त है न ?”
“जी हां, उसके लिए तो वक्त है ।”
सुनील ने एक पैड अपने सामने रखा खींचा और बालपैन से उस पर कुछ शब्द घसीटे । फिर उसने घंटी बजाई और पैड पर लिखा हुआ वरका फाड़ लिया ।
चपरासी मानसिंह वहां पहुंचा ।
“कॉफी लाओ ।” - सुनील वह वरका उसे पकड़ाता हुआ बोला ।
चेहरे पर उलझन के भाव लिए मानसिंह ने वह वरका थामा । 
“जरा जल्दी हाथ-पांव हिलाओ ।” - सुनील बोला - “साहब ने जल्दी जाना है ।”
“जी, साहब ।”
मानसिंह केबिन से बाहरा निकल गया ।
सुनील नया सिगरेट सुलगाने लगा ।
तभी मानसिंह वापस लौटा ।
“अब क्या है ?” - सुनील रूखे स्वर में बोला - “अभी यहीं हो ! गए नहीं !”
“साहब” - मानसिंह बोला - “आपको बड़े साहब बुला रहे हैं ।”
“ओह ! तम चलो मैं आता हूं ।”
“उन्होंने फौरन बुलाया है ।”
“अच्छा, अच्छा ।” - सुनील कुर्सी से उठता हुआ बोला, फिर वह विमल से सम्बोधित हुआ - “बॉस का बुलावा आया है, मैं अभी आता हूं ।”
विमल ने सहमति में सिर हिलाया ।
“मैं बस गया कि आया ।”
“आप आराम से जाइए, आराम से लौटिये । मैं आपके साथ कॉफी पीकर ही जाऊंगा ।”
“गुड !”
सुनील केबिन से बाहर निकल गया ।
विमल ने पीछे सुनील द्वारा मेज पर छोड़ पैड अपने करीब घसीट लिया । उसने पैड उठाकर उसका रुख रोशनी की तरफ करके गौर से पैड का मुआयना किया ।
“वाहे गुरु सच्चे पातशाह” - फिर उसके मुंह से निकला - “तू मेरा राखा सबनी थाहीं ।”
फिर उसने पैड अपने सामने रखे, पैन-स्टैण्ड में से एक बाल प्वायंट पेन निकाला और तेजी से पैड पर लिखने लगा ।
***
एक टैक्सी कमाठीपुरे में न्यू बाम्बे रेस्टारेन्ट के ऐन सामने रुकी और अपना बड़ा-सा बैग सम्भाले शी हान उसमें से बाहर निकली । उस वक्त वह एयरहोस्टेस की पोशाक की जगह एक जीन्स और मर्दाने स्टाइल की कमीज पहने थी ।
रेस्टोरेन्ट के करीब सड़क पर खड़ा पान चबाता एक खुली दाढी वाला लम्बे-चौड़े जिस्म वाला अधेड़ आयु का मैला-कुचैला सिख खड़ा था । उसका नाम हजारा सिंह था और वह उस इलाके का डोप पैडलर था । वैसे तो वह हमेशा कमाठीपुरे की सड़कों पर ही भटकता फिरता रहता था लेकिन उस रोज श्याम डोंगरे की हिदायत पर वह न्यू बाम्बे रेस्टोरेंट के इर्द-गिर्द मंडरा रहा था । उसे कहा गया था कि वह वहां किसी विदेशी युवती के आगमन पर निगाह रखे और कोई असाधरण बात असाधारण बात नोट करे तो फौरन उसे इसी काम के लिए बताए गए एक खास नम्बर पर फोन करें । हजारा सिंह, जो डोप बेचता-बेचता खुद भी डोप एडिक्ट बन चुका था, अगर पूरे होशोहवास में होता तो उसे यह बात निश्चय ही असाधारण लगती कि उसी क्षण टैक्सी पर वहां पहुंची चीनी लगने वाली युवती ने टैक्सी का भाड़ा अदा नहीं किया था । वह टैक्सी से निकली थी और रेस्टोरेंट में दाखिल हो गई थी और टैक्सी फौरन वहां से रवाना हो गई थी ।
हजारा सिंह ऐन उसके पीछे रेस्टोरेंट में दाखिल हो गया ।
भीतर अपेक्षाकृत ज्यादा भीड़ थी । वह नहीं जानता था कि वह भीड़ उन दर्जन-भर सादी वर्दीवाले पुलिसियों की वजह से थी जोकि पहले से वहां मौजूद थे । वह यह भी नहीं जानता था कि जो टैक्सी चीनी मेम को वहां पहुंचा के गई थी, उसे भी एक पुलिसिया चला रहा था ।
और भी कितने ही सादी वर्दी वाले पुलिसिए रेस्टोरेंट के इर्द-गिर्द मंडरा रहे थे ।
सड़क के पार एक एम्बेसेडर खड़ी थी जिसके शीशे काले होने की वजह से बाहर से उसके भीतर नहीं झांका जा सकता था । भीतर पिछली सीट पर सादे कपड़ो में ए.सी.पी. मनोहर देवड़ा और इंस्पेक्टर अशोक जगनानी मौजूद थे । वह गाड़ी वायरलैस उपकरणों से लैस थी और पलक झपकते वहां दर्जनों और पुलिस की गाड़ियां तलब कर लेने में सक्षम थी ।
सामने की इमारत की दूसरी मंजिल के एक कमरे में अपनी टेलीस्कोपिक रायफल के साथ अब्दुल गनी मौजूद था । लड़की को टैक्सी से निकालकर अकेली रेस्टोरेंट की ओर बढती पाकर वह बहुत खुश हुआ था । और भी ज्यादा सहूलियत की बात यह हुई थी कि टैक्सी फौरन वहां से विदा हो गई थी । लेकिन अभी उसने अपना निशाना साधा ही था कि वह वह विकराल सूरत वाला सरदार लड़की और उसके बीच में आ गया था । हरामजादा इतना लम्बा-चौड़ा था कि वह ठिगनी-सी चीनी लड़की तो उसकी ओट में मुकम्मल तौर पर छुप गई थी ।
फिर रेस्टोरेंट का दरवाजा खाली हो गया ।
सरदार और लड़की दोनों भीतर कहीं गायब हो गए थे ।
उसकी एक आह भरी और राइफल के ट्रीगर पर से अपनी उंगली हटा ली ।
अब इंतजार ।
वह कमरा जिसमें वह मौजूद था, लगता था, लगता था कि कई महीनों बाद खोला गया था । वह धूल-मिट्टी से बुरी तरह से अटा हुआ था । जगह-जगह जाले लगे दिखाई दे रहे थे, जिनमें बहुत डरावनी लगने वाली मकड़ियां विचर रही थीं, छिपकलियों की भी वहां भरमार थी और कभी कभार इक्का-दुक्का चूहा भी किसी-न-किसी कोने से झांकता दिखाई दे जाता था ।
अब्दुल गनी सड़क की तरफ खुलने वाली खिड़की के पास एक कुर्सी पर बैठा था । खिड़की का एक शीशा उसने जानबूझकर इतना तोड़ दिया था कि उसमें से रायफल की नाल बाहर निकल पाती और टेलीस्कोपिक साइट के रास्ते में कोई व्यवधान न आता ।
कुर्सी पर सब्र की प्रतिमूर्ति बना बैठा अब्दुल गनी प्रतीक्षा करता रहा ।
***
सुनील ने मलिक साहब के केबिन में कदम रखा ।
मलिक साहब के उसने न्यूज एडीटर राय के साथ किसी गम्भीर मन्त्रणा में मग्न पाया ।
“सर ।” - सुनील खंखारकर गला साफ करता हुआ बोला ।
मलिक साहब ने सिर उठाया, सनील को देखा और फिर बोले - “कम आफ्टर समटाइम । यू कैन सी आई एम बिजी ।”
“मेरा काम ज्यादा जरुरी है ।” - सुनील गम्भीरता से बोला ।
मलिक साहब ने घूरकर उसे देखा ।
“और सीक्रेट भी ।” - सुनील अविचलित भाव से बोला ।
“यानी कि” - मलिक साहब बोले - “जो कुछ तुम कहना चाहते हो वो राय के सामने नहीं कहा जा सकता ।”
“जी हां ।”
“मै राय से बहुत इम्पॉर्टेंट प्वायन्ट डिसकस कर रहा था ।”
“मेरे पास उससे कहीं ज्यादा इम्पॉर्टेंट प्वायन्ट है ।”
“जोकि इन्तजार नहीं कर सकता !”
“ऐग्जैक्टली, सर ।”
मलिक साहब ने एक आह भरी और फिर राय से बोले - “आप पधारिये, मैं आपको अभी फिर बुलाता हूं ।”
निगाहों से सुनील की तरफ भाले-बर्छियां बरसाता राय विदा हुआ ।
उसके जाते ही सुनील लपककर मलिक साहब के करीब पहुंचा ।
“नाओ” - मलिक साहब सख्ती से बोले - “लैट्स सी हाउ इम्पॉर्टेंट युअर प्वायन्ट इज । एण्ड इट बी रीयल इम्पॉर्टेंट ।”
“इट इज । इट इज ।” - सुनील बोला - “बशर्ते कि आप मशहूर इश्तिहारी मुजरिम सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल के कारनामों को इम्पॉर्टेंट और न्यूजवर्दी मानते हों ।”
“तुम्हारा प्वायन्ट उस इश्तिहारी मुजरिम सोहल से ताल्लुक रखता है ?”
“जी हां ।”
“आगे बढो । मैं सुन रहा हूं ।”
“मेरे हाथ में एक ऐसा जरिया आया है जिससे हमें सोहल के आइन्दा कारनामों की एक्सक्लूसिव, फस्ट हैण्ड जानकारी हासिल हो सकती है ।”
“यह कोई ऐसी बात नहीं जो राय के सामने नहीं कही जा सकती थी । आखिर वह ‘ब्लास्ट’ का न्यूज एडीटर है ।”
“मैं जो अगली बात कहने जा रहा हूं, वो राय के सामने नहीं कही जा सकती थी ।”
“वो क्या बात है ?”
“सोहल इस वक्त हमारे ऑफिस में मौजूद है ।”
“क्या !” - मलिक साहब बुरी तरह चौंके ।
“वो मेरे केबिन में बैठा है ।”
“और तुमने उसे अभी तक गिरफ्तार नहीं कराया ! वो मशहूर इश्तिहारी मुजरिम है । उसके सिर पर दो लाख रूपए का इनाम है । वो पुलिस को ढूंढे नहीं मिल रहा । उसकी गिरफ्तारी तो अपने आप में एक निहायत सनसनीखेज न्यूज है ।”
“मैं उसे गिरफ्तार नहीं करा सकता ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि वो मेरा फ्रेंड है ।”
“वो” - मलिक साहब हकबकाए से उसकी तरफ देखने लगे - “वो खूनी, वो डकैत, वो किडनैपर, वो डेन्जरस क्रिमिनल तुम्हारा फ्रेंड है ?”
“यस, सर ।”
“ऐसा कैसे मुमकिन है ?”
“यह एक लम्बी कहानी है, इस वक्त जिसे सुनाने का मेरे पास वक्त नहीं है ।”
“तुम चाहते क्या हो ?”
“मैं चाहता हूं कि ‘ब्लास्ट’ के हित में उसका पीछा करने की इजाजत दी जाए । इस तरीके से आने वाले चन्द दिनों में जो कोहराम वो मजाने वाला है, उसकी सिर्फ हमें नॉलेज होगी । एक्सक्लूसिव । फर्स्ट हैण्ड ।”
“यानी कि वो फिर कोई बड़ा क्राइम करने पर आमादा है ?”
“ऐसा ही लगता है ।”
“अगर ऐसा है तो हमें उसे रोकना चाहिए । ही शुड बी अरैस्टिड इमीजियेटली ।”
“सर, उसकी गिरफ्तारी कितनी ही बड़ी न्यूज क्यों न हो, सिर्फ उससे ‘ब्लास्ट’ को कुछ हासिल नहीं होने वाला । लेकिन अगर आप मुझे कुछ दिनों की छुट्टी दें और फ्री हैण्ड दें तो आने वाले दिनों में ‘ब्लास्ट’ की भारी जयजयकार हो सकती है ।”
“अगर मैं छुट्टी न दूं तो ?”
“तो मैं बिना छुट्टी उसके पीछे जाऊंगा ।”
“नतीजा जानते हो क्या होगा ?”
“जानता हूं । आप मुझे नौकरी से निकाल देंगे”
“जो कि तुम्हारे लिए कोई खास सजा नहीं होगी ।” - मालिक साहब एक गहरी सांस लेकर बोले - “मैं जानता हूं तुम्हें नौकरी की कितनी परवाह है !”
“सर” - सुनील उतावले स्वर में बोला - “यह वक्त जाया करने वाला काम नहीं । जो फैसला करना है, जल्दी कीजिये ।”
“तुम्हें अपना वो वादा याद है जो तुमने मेरे बेटे के कत्ल के बाद मेरे से किया था ?”
“जी हां, यदि है । मैने आपसे वादा किया था कि मैं कभी ‘ब्लास्ट’ की नौकरी छोड़कर नहीं जाऊंगा । लेकिन जब आप खुद मुझे निकालेंगे तो...”
सुनील ने जानबूझकर वाक्य अधूरा छोड़ दिया ।
“ठीक है, भाड़ में जाओ । जो जी में आए करो । गैंगस्टर्स से दोस्तियां निभाओ । किडनैपर्स और बैंक रॉबर्स के गले में गलबहियां डाले घूमो । किलर्स और...”
“मुझे पांच हजार रूपए भी चाहिए । एक्सपैंस एकाउण्ट में ।”
“एकाउण्टेण्ट से ले लो । नाओ, गैट दी हैल आउट आफ हेयर ।”
“थैंक्यू सर ।” - सुनील बोला और उनके ऑफिस से बाहर निकल गया ।
पीछे मालिक साहब कुछ क्षण गहन विचारपूर्ण मुद्रा बनाए बैठे रहे, फिर उन्होंने मेज पर पड़े कई टेलीफोनों में से एक का रिसीवर उठाया और उसके बजर का बटन दबाया । दूसरी ओर से उत्तर मिला तो वे बोले - “गैट मी पुलिस हैडक्वार्टर । इमीजिएटली ।”
***
मनोहर देवड़ा ने अपनी कलाई घड़ी पर निगाह डाली । इन्तजार करते डेढ घण्टा हो चुका था ।
“कोई नहीं आने का ।” - एकाएक वह उखड़े स्वर में बोला - “या तो लड़की झूठ बोल रही है और या दुश्मनों को हमारी नीयत की खबर लग गई है । उन्हें मालूम हो गया मालूम होता है कि माल पकड़ा गया है और लड़की गिरफ्तार है ।”
“ऐसा कैसे हो सकता है, सर !” - उसके पहलू में बैठे अशोक जगनानी ने प्रतिवाद किया - “लड़की की गिरफ्तारी को तो पूरी तरह से गोपनीय रखा गया था ।”
“सामने दिखाई दे रहा है कि गिरफ्तारी गोपनीय नहीं रही ।”
“लेकिन, सर...”
“बरखुदार, जब दुश्मन के कैम्प में हमारे भेदिये हो सकते हैं तो क्या पुलिस फोर्स में दुश्मन के भेदिए नहीं हो सकते ? जबकि पुलिस का सिपाही गुण्डे-बदमाशों से ज्यादा बिकाऊ है ।”
“ओह !”
“काल ऑफ दि आपरेशन । अब यहां बैठे रहने में कुछ नहीं रखा ।”
“राइट, सर !”
जगनानी ने आगे ड्राइवर के बगल में बैठे व्यक्ति को संकेत किया । वह व्यक्ति सहमति में सिर हिलाता कार से बाहर निकाला और रेस्टोरेन्ट की तरफ बढ़ा ।
थोड़ी देर बाद उसी आदमी के साथ चलती शी हान रेस्टोरन्ट के दरवाजे पर प्रकट हुई ।
जो टैक्सी उसे वहां लाई थी, वो सड़क पर फिर प्रकट हो गई थी और अब रेस्टोरेन्ट की तरफ बढ़ रही थी ।
तभी भीतर रेस्टोरेन्ट में दरवाजे के करीब की मेज पर बैठा एक व्यक्ति भौंचक्का-सा शीशे के उस जग को देखने लगा जो अभी साबुत था और अभी उसके परखच्चे उड़े हुए थे ।
फिर एकाएक शी हान के मुंह से एक चीख निकली और उसकी सफेद रंग की कमीज उसके बाएं वक्ष के ऊपर एकाएक खून से लाल होने लगी ।
फिर कोहराम मच गया ।
***
सुनील अपने केबिन में पहुंचा ।
विमल वहां नहीं था ।
कॉफी के दो अनछुए कप मेज पर पड़े थे ।
वह गलियारे में चपरासी मानसिंह के पास पहुंचा ।
“जो साहब अभी मेरे केबिन में बैठे थे” - उसने व्यग्र भाब से पूछा - “वो कहां गए ?”
“टायलेट ।” - मानसिंह बड़े इत्मीनान से बोला ।
“ओह ! टायलेट ! कितनी देर हुई ?”
“काफी देर हो गई है । साहब, आपने मुझे यह क्यों लिखकर दिया था कि मैं उल्टे पांव आकर आपको कहूं कि आपके मलिक साहब बुला रहे थे ?”
सुनील ने उसके प्रश्न की तरफ ध्यान न दिया । वह टायलेट की तरफ लपका ।
विमल वहां नहीं था ।
वह रिसैप्शन पर पहुंचा ।
रेणु ने उसके मुलाकाती को वहां से बाहर जाते नहीं देखा था ।
रिसप्शन पर उस वक्त काफी भीड़ थी, उस माहौल में रेणु की वहां से कूच करते विमल पर निगाह न पड़ना कोई बड़ी बात नहीं थी ।
वह वापस अपने केबिन में लौटा ।
उसकी लैटर पैड पर तो उसने उस पर अंकित एक इबारत की पहली लाईन में अपना नाम लिखा पाया ।
उसने झपटकर पैड उठा लिया और वह इबारत पढ़ने लगा ।
लिखा था:
सुनील साहब,
पैड पर कॉफी का आर्डर आपने बाल प्वायन्ट पैन से लिखा था इसलिए जो कागज आपने फाड़कर चपरासी को दिया था, उसके निचले कागज पर भी आपकी लिखी इबारत का अक्स आ गया था जोकि साफ पढा जा सकता था । मुझे यह पढ़कर बड़ी हैरानी हुई थी कि आपने चपरासी को कॉफी का रुक्का लिखकर नहीं दिया था बल्कि यह लिखकर दिया था कि वह उल्टे पांव आकर आपको यह खबर करे कि आपका बॉस आपको बुला रहा था । आपने ऐसा क्यों किया, यह मेरी समझ से बाहर है । यूं मुझे गिरफ्तार कराने का इरादा तो निश्चय ही आपका नहीं रहा होगा क्योंकि जो आदमी वैसे ही आपके हवाले है, उसको गिरफ्त में लेने के लिए कोई अतिरिक्त चतुराई दिखाना तो बेमानी है । लेकिन मुझे पीछे बिठाकर बहाने से खिसकने की कोई न कोई तो वजह होगी ही । बहरहाल मेरा दिल गवाही दे रहा है कि मुझे फौरन यहां से कूच कर जाना चाहिए । मैं जा रहा हूं लेकिन बहुत जल्द फोन पर आपसे बात करूंगा । अगर आपकी मंशा मुझे गिरफ्तार करवाने की ही थी तो मैं वापस आकर गिरफ्तार होने के लिए ऐन उसी कुर्सी पर बैठ जाऊंगा जिस पर से कि मैं अभी उठकर जा रहा हूं ।
मैं निरगुणिआरे को गुणु नाहीं आपे तपसु पइयोई । फिलहाल सत श्री अकाल ।
आपका मुरीद
सोहल
सुनील कुछ क्षण अपलक उस इबारत को देखता रहा फिर उसने एक गहरी सांस ली और पैड में से कागज को फाड़कर आपनी मेज की दराज में डाल दिया ।
तभी इबारत के बाहर कहीं फ्लाइग स्क्वायड के सयारन की आवाज गूंजी ।
***
अब्दुल गनी ने अपना माथा पीट लीया ।
जिन्दगी में पहली बार वह अपने मिशन में नाकाम रहा था ।
एक छिपकली... ऐन उसके घोड़ा खींचने को तत्पर हाथ पर आकर गिरी थी ।
गोली लड़की की खोपड़ी से टकराने की जगह उसके कान के करीब से होकर से होकर गुजर गई थी ।
बला की फुर्ती दिखाते हुए उसने दूसरी गोली चलाई थी लेकिन एक बार बौखला गया होने की वजह से दूसरी बार वह उतना सच्चा निशाना नहीं लगा पाया था जितने की उसे शोहरत हासिल थी । उसने दूसरी बार लड़की की खोपड़ी की जगह अपेक्षाकृत बड़े टारगेट को निशाना बनाया था । गोली लड़की की छाती में लगी थी लेकिन, जैसा कि वह चाहता था, ऐन उसके दिल में से नहीं गुजरी थी ।
और गोली चला पाने का सवाल ही नहीं था, वह तो खुशकिस्मत था कि दूसरी गोली भी चला पाया था । लड़की धराशायी होते ही दर्जनों लोगों द्वारा घेर ली गई थी और उसे दिखाई देनी बन्द हो गई थी ।
रायफल हाथ में थामे वह कमरे की बाईं ओर मौजूद टायलेट के दरवाजे की तरफ लपका । दरवाजा खोलकर वह टायलेट में दाखिल हुआ । उसने कमोड पर चढ़कर वहां दीवार में बना वो रोशनदान खोला जो इमारत के संकरे से सर्विस शाफ्ट में खुलता था । फिर उसने जेब से नायलोन की एक मजबूत डोरी निकाली । उसने उसका एक सिरा रायफल के घोड़े के गार्ड में पिरोकर मजबूती से बांध दिया । फिर उसने रायफल को डोरी के सहारे रोशनदान से बाहर सर्विस शाफ्ट में लटका दिया और डोरी का दूसरा सिरा रोशनदान में लगी की सलाख के साथ बांध दिया । फिर उसने राशनदान बन्द कर दिया । अब रोशनदान के मैल से धुंधलाए शीशों में से न लोहे की सलाख दिखाई दे रही थी और न सलाख के साथ बंधी रस्सी की गांठ ।
वह टायलेट से बाहर निकला । उसने टायलेट के दरवाजे के सामने कुछ फर्नीचर सरका दिया और फिर कमरे से बाहर निकला ।
बाहर गलियारे में कोई नहीं था लेकिन नीचे से कोलाहल की और फर्श को रौंदते भारी कदमों की आवाजें आ रही थीं ।
वह सीढियों की तरफ बढा और निविघ्न इमारत की छत पर पहुंच गया ।
उधर से उसने छतें फांदते हुए घटनास्थल से दूर निकल जाना था ।
वह उकडूं हुआ छत पर आगे को लपका ।
“कौन है ?” - एकाएक उसे एक ललकारभरा स्वर सुनाई दिया - “खबरदार !”
अब्दुल गनी के छक्के छूट गए । उसे पहचानते देर न लगी कि वह किसी पुलिसिए का स्वर था । लड़की की हिफाजत के लिए वहां डोंगरे की अपेक्षा से कहीं ज्यादा इन्तजाम था । पुलिस इमारतों की छतों पर भी मौजूद थी । बहरहाल खबरदार तो वह हुआ लेकिन खबरदार होकर ठिठका नहीं ।
वह पूरी शक्ति से आवाज की विपरीत दिशा में भागा । छत के सिरे पर पहुंचकर उसने अगली इमारत की छत की तरफ छलांग लगाई ।
तभी एक फायर हुआ ।
वह अभी हवा में ही था कि गोली उसकी पीठ में आकर लगी । एक क्षण के लिए उसका शरीर हवा में गतिशून्य हुआ और फिर वह दोनों इमारतों के बीच की गली की पक्की जमीन पर जाकर गिरा ।
अब्दुल गनी नाम के क्रैक शाट की इहलीला समाप्त हो गई ।
***
सुनील बगोले की तरह मलिक साहब के ऑफिस में दाखिल हुआ ।
भड़ाक से दरवाजा खुलने की आावाज सुनकर मलिक साहब ने हड़बड़ाकर सिर उठाया ।
“क्या हुआ !” - वे सख्ती से बोले - “आग लग गई इमारत में !”
कालीन बिछे फर्श को रौंदता सुनील मेज के करीब पहुंचा ।
“पुलिस कैसे पहुंच गई ?” - वह बोला ।
“चिल्लाओ नहीं । मैं बहरा नहीं हूं ।”
“यहां पुलिस कैसे पहुंच गई ?”
“मैंने फोन किया था ।”
“किसलिए ?”
“उस इश्तिहारी मुजरिम को गिरफ्तार करवाने के लिए और किसलिए ?”
“मैंने आपको कहा था कि वो मेरा फ्रेंड है ।”
“हां । कहा था । वो तुम्हारा फ्रेंड है । मेरा नहीं ।”
“आपने मेरे सीक्रेट की यह कद्र की ?”
“यह कोई रखने लायक सीक्रेट नहीं था । इस समाज के लिए भी मेरी कोई जिम्मेदारी है । फर्ज है । सर्वत्र के भले के लिए एक आदमी को नाराज किया जा सकता है । मैं एक खतरनाक इश्तिहारी मुजरिम का आजाद विचरना समाज के लिए हितकारी नहीं मानता ।”
“उसकी आजादी में हमारे अखबार का फायदा है ।”
“मैं ऐसे फायदे का तलबगार नहीं जो मुझे शरीफ और नेक शहरियों की जान और माल को खतरे में डालकर हासिल होने वाला हो ।”
“वो भी कभी एक शरीफ और नेक शहरी था जिसे आपके समाज ने जबरन मुजरिम बना दिया ।”
“तुम खामखाह जज्बाती हो रहे हो । इतने बड़े समाज में कहीं-न-कहीं, कभी-न-किसी के साथ कोई-न- कोई ज्यादती हो ही जाती है । कोई जुल्म हो ही जाता है । लेकिन इससे मजलूम को खून-खराबे, लूटपाट पर उतारू हो जाने का लाइसेंस नहीं मिल जाता । गलत काम गलत ही है, चाहे वो मजबूरी से किया जाए, चाहे मर्जी से । इन्साफ न हासिल होने पर या इन्साफ हासिल होने में देर लगने पर मुजरिम को जबरन इन्साफ की गद्दी हथिया लेने का अख्तियार नहीं हासिल हो जाता । तुम्हारा वो कथित दोस्त कितना ही भलामानस क्यों न रहा हो, उस पर कितना ही जुल्म क्यों न हुआ हो लेकिन आज अगर वह समाज में मुजरिम का दर्जा रखता है तो अपने गुनाहों की वजह से, वो खतरनाक इश्तिहारी मुजरिम करार दिया गया है तो अपने गुनाहों की वजह से, और सजा पाएगा तो भी अपने गुनाहों की वजह से । कानून अन्धा होता है । उसे मुजरिमों की अच्छाइयों से कुछ लेना-देना नहीं होता ।”
“लेकिन इन्सान अन्धा नहीं होता, उसे दूसरे इन्सान की अच्छाइयों से लेना-देना होता है ।”
“तो पड़े लेते-देते रहो । तुम अपना काम करो । कानून को अपना काम करने दो ।”
सुनील को जवाब न सूझा ।
“और फिर मुजरिम के साथ खुद मुजरिम बन जाना कहां की समझदारी है ?”
“कौन बन रहा है मुजरिम के साथ मुजरिम ?”
“तुम और कौन !”
“मैंने क्या जुर्म किया है ?”
“जैसे तुम्हें मालूम नहीं ! यू आर हारबरिंग ए क्रिमिनल । एक मुजरिम को, एक खतरनाक इश्तिहारी मुजरिम को, पनाह देना जुर्म नहीं तो और क्या है !”
सुनील चुप रहा ।
“अब यह बताओ” - मालिक साहब बदले स्वर में बोला - “वो गिरफ्तार हुआ या नहीं ?”
“नहीं ।”
“नहीं ?”
“वो पुलिस के आगमन से पहले ही यहां से कूच कर चुका था ।”
“फिर भी इतना भड़क रहे हो !”
“मैं... आई एम सॉरी । आई एम सॉरी, सर ।”
“नैवर माइंड । उसके लौट के आने की उम्मीद है ?”
“नहीं ।”
“लेकिन गिरफ्तार वो फिर भी हो सकता है । मेरी फोन काल की वजह से पुलिस को इतना तो पता लग ही गया है कि वो राजनगर में है । देख लेना पुलिस उसकी तलाश में शहर का चप्पा-चप्पा छान मारेगी ।”
सुनील खामोश रहा । सोहल के बारे में मलिक साहब के ख्यालात जान चुकने के बाद उनके सामने सोहल के नए चेहरे का जिक्र करना हिमाकत थी ।
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शी हान सरकारी हस्पताल के इन्टेन्सिव केयर यूनिट में भरती थी । वो अभी जिन्दा थी लेकिन डॉक्टरों ने उसकी जिन्दगी बनी रहने की बाबत कोई गारन्टी नहीं की थी, अलबत्ता आपरेशन द्वारा रायफल की शक्तिशाली गोली उसके जिस्म से निकाली जा चुकी थी ।
अब्दुल गनी की शिनाख्त हो चुकी थी, जिन हालात में वो मरा था वे उसी के हमलावर होने की तरफ इशारा कर रहे थे लेकिन इस बात का कोई भी अकाट्य सबूत सामने नहीं आया था ।
केस की गम्भीरता से प्रभावित होकर पुलिस कमिश्नर जुआरी खुद हस्पताल पहुंचा था ।
ए.सी.पी. देवड़ा ने उसे वारदात का सारा ब्यौरा दिया ।
“ऐसे मुश्किल हालात में” - कमिश्नर बोला - “लड़की के कत्ल की कोशिश इस बात की तरफ साफ इशारा है कि वो ऐसा कुछ जानती है जो हमारे लिए फायदेमंद साबित हो सकता है । लड़की की आई मौत पर तो हमारा कोई वश नहीं लेकिन अब यह जबरन लाई मौत से नहीं मरनी चाहिए । लोकल थाने का एस.एच.ओ. कौन है ?”
“पटवर्धन ।”
“उसे तलब करो ।”
“वो यहीं है । मैं अभी बुलाता हूं ।”
एक पचास साल का, इन्स्पेक्टर की वर्दी में बुरी तरह से फंसा हुआ, मोटा, थुलथुल मराठा कमिश्नर के हुजूर में पेश हुआ । वह उस थाने को इंचार्ज था जिसके इलाके में वो हस्पताल पड़ता था ।
पटवर्धन ने कमिश्नर को सैल्यूट मारा ।
“क्या बात है !” - कमिश्नर उसे घूनता हुआ बोला - “कभी कुर्सी से हिलते-डुलते नहीं हो ?”
“जी !” - पटवर्धन बौखलाकर बोला ।
“ऐसे खमीरे की तरह फूले हुए, थुलथुल जिस्म के साथ अपनी ड्यूटी को क्योंकर अंजाम दे पाते हो ?”
पटवर्धन के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं ।
“जी... जी वो क्या है कि...”
“मुझे मालूम है वो क्या है” - कमिश्नर सख्ती से बोला - “जो मैं कहने जा रहा हूं, उसे कान खोल कर सुनो ।”
“जी, जी हां । जी हां ।”
“यहां इन्टेन्सिव केयर यूनिट में शी हान नाम की एक लड़की भरती है । उस लड़की की जान लेने के लिए उस पर एक हमला हो चुका है । हमलावरों की बदकिस्मती से वो अभी जिन्दा है । इसलिए उसकी जान लेने की दोबारा कोशिश की जा सकती है । अब इस बात की जिम्मेदारी तुम्हारे सिर पर आयद होती है कि ऐसी कोई कोशिश कामयाब न होने पाए ।”
“यर, सर । मैं अभी यहां पर कड़ा पहरा बिठाता हूं ।”
“वो तो तुम बिठाओगे ही । तुम्हारे बिठाए पहरेदारों से मैं क्या उम्मीद करता हूं, वो सुनो ।”
“यर, सर ।”
“पहले ऐसे बहुतेरे वाकयात हो चुके हैं जिनमें बावजूद पहरेदारी और चौकसी के ऐेसे माहौल में किसी की जान की हिफाजत न हो सकी । इस बार हिफाजत फेल हो जाने का मैं कोई फिल्मी या किताबी एक्सक्यूज नहीं सुनना चाहता । मैं नहीं चाहता कि बाद में मुझे यह सुनने को मिले कि कोई खिड़की के रास्ते ऊपर चढ आया था या छत फाड़ कर आसमान से टपका था, या जिसे पहरेदारों ने कोई डॉक्टर या कम्पाउण्डर या नर्स या बिजलीवाला या नलकेवाला या जमादार या चपरासी या कोई पुलिस का आला अफसर समझा था, वही कातिल था और कत्ल करने में कामयाब हो गया था । अब यह देखना तुम्हारा काम है कि कोई कातिल कैसे भी बहुरूप में यहां कदम न रखने पाये । इस इन्टेन्सिव केयर युनिट में किसी का भी अकेले दाखिल होना मना है, चाहे वो यहां का मैडीकल सुपरिन्टेन्डेन्ट हो, चाहे पुलिस कमिश्नर । जिस किसी का भी भीतर दाखिल होना जरूरी हो, उसके साथ कम-से-कम दो हथियारबन्द आदमी जाएं और हर पल उस पर निगाह रखें । पहरेदार ऐसे बिठाए जाएं जो पाने सगे बाप का लिहाज न करें, जो ऊंघने न लग जाएं, जो किताबें या पत्रिकाएं न पढने लग जाएं, जो नर्सों या आयाओं के साथ फ्लर्ट करने की कोशिश न करें और जो वहां भीषण आग भी लग जाए तो अपनी पहरेदारी की पोस्ट न छोड़ें, समझ गए ?”
“यस, सर ।”
“कोई बात, कोई सम्भावना मेरे कहने से रह गई हो तो उस पर खुद गौर करना । इन्स्पेक्टर पटवर्धन, अगर फिर भी यहां वारदात हो गई तो मैं तुम्हारा पुरा थाना मुअत्तल कर दूंगा और सब के लिए कोताही और लापरवाही की सख्त सजा का इन्तजाम करूंगा । खासतौर से तुम्हारे लिए ।”
“यस, सर ।” - थरथर कांपता हुआ थानाध्यक्ष बोला ।
“यू कैन गो नाओ ।”
थानाध्यक्ष सैल्यूट मारकर यूं वहां से भागा जैसे उसका किसी दैत्य से पीछा छूट रहा हो ।
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“शाबाश !” - इकबाल सिंह अंगारों पर लोटता हुआ बोला - “शाबाश । यानी कि जिसे मरना था वो जिन्दा है और जिसने मारना था वो मर चुका है !”
“ऐसा पहले कभी नहीं हुआ ।” - डोंगरे परेशानहाल स्वर में बोला - “अब्दुल गनी पहले कभी फेल नहीं हुआ ।”
“ऐसा भी पहले कभी नहीं हुआ कि फेल होने वाले सिपहसालार ने वापस ‘कम्पनी’ में सूरत दिखाने की बेगैरत हरकत की हो ।”
“साहब, यकीन जानिए, फेल होने जैसी कोई वजह नहीं थी । अब्दुल गनी का खुद गोली खाकर मारा जाना ही इस बात का सबूत है कि कोई गैरमामूली, कोई अनहोनी बात हो गई थी ।”
“बकवास !”
“और लड़की को गोली बराबर लगी है ।”
“लेकिन वो मरी नहीं है ।”
“बचने वाली भी नहीं है । बहुत खस्ता हालत में है । पुलिस में हमारा जो भेदिया है, वो कहता है कि सम्भावना उसके बिना होश में आए मर जाने की है ।”
“मुझे सम्भावना नहीं, गारन्टी चाहिए ।” - इकबाल सिंह गर्जा ।
“हस्पताल पर बहुत सख्त पहरा है ।” - डोंगरे धीरे से बोला - “वहां परिन्दा भी पर नहीं मार सकता ।”
“मैं कुछ नहीं जानता । लड़की की मौत का सामान करना तेरा काम है । तू उसे कैसे करेगा, यह तेरा सिरदर्द है । मुझे फौरन से पेश्तर लड़की की मौत की खबर मिलनी चाहिए, चाहे इसके लिए तुझे सारे मरीजों को, डॉक्टरों, नर्सों समेत हस्पताल की पूरी इमारत को ही नेस्तनाबूद क्यों न करना पड़े । क्या ?”
“मैं” - डोंगरे मरे स्वर में बोला - “करता हूं कोई इन्तजाम ।”
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लड़की के कान्टैक्ट के न पकड़े जाने का सबसे ज्यादा अफसोस इन्स्पेक्टर अशोक जगनानी को हुआ था । लड़की की गिरफ्तारी को इतना गोपनीय रखा गया था कि उस पर आक्रमण होने का उसे कतई कोई अन्देशा नहीं था, फिर ऐसे आक्रमण से सावधान रहने का व्यापक प्रबन्ध किया गया था लेकिन फिर भी लड़की पर लगभग घातक आक्रमण हो गया था डोप स्मगलरों के गिरोह का भण्डाफोड़ करने का एक नायाब मौका और उसके हाथ से निकल गया था ।
वैसे तो पुलिस की नौकरी में अशोक जगनानी हर प्रकार के अपराधियों के खिलाफ था लेकिन मादक पदाथों का धन्धा करने वालों पर सदा ही उसका दिल चाहता था कि वह वहीं हाथ के हाथ खुद ही उसे सजा दे डाले !
मौत की सजा !
कभी खुद उसका बाप रूपचन्द जगनानी ऐसे नशों की गिरफ्त में था और परिवार के सर्वनाश का कारण बना था ।
कमाठीपुरे में हुई वारदात के बारे में उसने फिर अपने भेदिए से बात की ।
भेदिए का नाम गुंटप्पा था और वह खुद स्मगलर रह चुका था ।
भरपूर कोशिशों के बावजूद वह कमाठीपुरे के इलाके के किसी डोप पैडलर का नाम तक न सप्लाई कर सका ।
फिर शाम को ड्यूटी ऑफ होने पर अशोक जगनानी ने खुद अपनी कोशिशों से कोई नतीजा हासिल करने का फैसला किया ।
जो कुछ हुआ था, उसकी वजह से न्यू बाम्बे रेस्टोरेन्ट अब उसका खास तवज्जो में आ गया था ।
शाम को उसने एक बन्द स्टेशनवैगन का इन्तजाम किया जिसे उसने न्यू बाम्बे रेस्टोरेन्ट के ऐन सामने सड़क के पार ले जाकर फुटपाथ के साथ लगाकर खड़ा किया । फिर वह चुपचाप स्टेशनवैगन के पृष्ठभाग में पहुंच गया । स्टेशनवैगन के रेस्टोरेन्ट की ओर के पहलू में एक टैलीलैंस वाला कैमरा भी लाया था जो जरूरत के वक्त फासले से भी क्लोज-अप जैसी तस्वीर तो खींच ही सकता था, साथ ही उसका टैलीलैंस दूरबीन का भी काम दे सकता था ।
फिर एक बेहद उबाऊ और थका देने वाली निगाहबीनी शुरु हुई ।
उसकी मेहनत जाया न गई ।
आधे घन्टे की निगाहबीनी के बाद एक चीज उसकी खास तवज्जो में आई ।
वह चीज एक वजन तोलने की मशीन थी जो रेस्टोरेन्ट के प्रवेशद्वार के करीब पड़ी हुई थी । उसने अनुभव किया वह मशीन वहां काफी लोकप्रिय थी । आते-जाते वो लोग भी खामखा उसके प्लेटफार्म पर सवार हो जाते थे जिनकी वजन तोलने की कोई मर्जी नहीं होती थी - जैसे वो एक खुली दाढी वाला अधेड़ सिख जोकि अपनी खुली दाढी और पान से बैंगनी हुए दांतों और मसूढों की वजह से देखने में बड़ा विकराल लगता था ।
उस घड़ी वो फिर मशीन के प्लेटफार्म पर कदम रख रहा था ।
जगनानी ने टैलीलैंस एडजस्ट किया और व्यू फाइन्डर में से बड़े गौर से उसे देखने लगा ।
सरदार ने मशीन में एक सिक्का डाला, मशीन की पहले से जलती-बुझती-बुझती लाल-पीली बत्तियां ज्यादा जोर से जगमगाई और फिर वजन बताने वाली एक टिकट मशीन की कटोरी में आकर गिरी । सरदार ने कटोरी में हाथ डालकर वह टिकट उठाई तो जगनानी चौंका ।
कटोरी में से टिकट उठाते समय उसने कटोरी में भूरा-सा कुछ रख दिया था ।
सरदार मशीन से उतरने के लिए वापस घूमा तो जगनानी ने फोरन उसकी तस्वीर खींच ली ।
उनके वहां से हटते ही सिगरेट के कश लगाता एक कोई पैंतीस साल का व्यक्ति  मशीन पर चढा । उसने भी मशीन में सिक्का डाला, कटोरी में टिकट आकर गिरा तो उसने उसे उठा लिया और वहां से विदा हो गया ।
जगनानी ने टैलीलैंस में से साफ देखा कि विकराल शक्ल वाले सरदार ने कटोरों में जो भूरा-सा कुछ रखा था, वह अब वहां से गायब था ।
जगनानी का माथा ठनका ।
कोई आधे घन्टे बाद फिर वही कुछ हुआ ।
तो यह बात है - वह मन-ही-मन बोला ।
डोप पैडलिंग के एक अनोखे तरीके का नजारा उसने किया था ।
वह भूरा-सा कुछ निश्चय ही डोप की पुड़िया होती थी जो सरदार वहां छोड़ता था और जिसे उसका ग्राहक वहां से उठा लेता था ।
अब उस इलाके के कम-स-कम एक डोप पैडलर की सूरत से वह वाकिफ था । उसकी तस्वीर उसके पास थी ।
उसकी मेहनत जाया नहीं गई थी ।
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रूपचन्द जगनानी ने घड़ी पर निगाह डाली ।
नौ बजने को थे ।
“किसी खास ही डयूटी में फंस गया पुटड़ा ।” - वह बोला ।
मीरा ने बड़ी संजीदगी से सहमति में सिर हिलाया ।
“मैं चलता हूं ।” - वह बोला - इतवार को आऊंगा ।”
“नहीं ।” - उसकी गोद में बैठी आठ साल की शिल्पा मचल कर बोली - “अभी मत जाओ, दादाजी । अभी हम और कहानी सुनेंगे ।”
“शिल्पा !” - मीरा सख्ती से बोली - “उठो वहां से । दादाजी ने जाना है ।”
“दादाजी क्यों जाते हैं ?” - शिल्पा बोली - “यहां हमारे साथ क्यों नहीं रहते ?”
रूपचन्द जगनानी और उसके इकलौते जीवित बेटे अशोक जगनानी की बीवी मीरा जगनानी दोनों में से कोई कुछ न बोला ।
रूपचन्द जगनानी अपने बेटे और उसके परिवार के साथ क्यों नहीं रहता था, इसका जवाब उस बच्ची को समझाना कठिन था ।
बारह साल पहले रूपचन्द जगनानी अपनी बीवी और अशोक से छोटे दो लड़कों के साथ अपनी खटारा मोटरसाइकल पर खार में स्थित अपनी ससुराल जा रहा था । अशोक उनके साथ सिर्फ इसलिए नहीं था क्योंकि तब वह सोलह साल का था और उन लोगों के साथ मोटरसाइकल पर नहीं बैठ सका था । बैठ तो ठीक से उसकी बीवी और उसके बारह और आठ साल के दो लड़के भी नहीं सकते थे लेकिन नशे की तरंग में हमेशा ही उसकी यही जिद होती थी कि वह खार तक उन्हें मोटरसाइकल पर ही लाद कर ले जाएगा । अशोक की मां जानती थी कि उसका पति डोप एडिक्ट था लेकिन साथ ही खुद इस बात की गवाह थी कि इतनी सवारियों के साथ वह दर्जनों बार मोटरसाइकल चला चुका था ।
इस रोज वे खार न पहुंच सके ।
रास्ते में पोटरसाइकल का एक ट्रक के साथ भीषण एक्सीडेंट हुआ जिसमें रूपचन्द के दोनों बच्चे और बीवी मारे गए । वह खुद कैसे बच गया, यह एक करिश्मा था । चोटें उसे बेतहाशा आई थी लेकिन सब जल्दी ठीक हो जाने वाली थीं ।
और अनोखी बात यह हुई थी कि जिस एक्सीडेंट में उसकी बीवी और दो बेटे तत्काल मृत्यु को प्राप्त हुए थे, उसमें वह बेहोश तक नहीं हुआ था । पुलिस जब घटनास्थल पर पहुंची थी तो उन्होंने अपने और अपने परिवार के खून से रंगे रूपचन्द जगनानी को सड़क के किनारे पुर्जा-पुर्जा हुई मोटरसाइकल के करीब अपने दोनों बच्चों की लाशों को छाती से लिपटाए और अपनी मृत बीवी का कुचला हुआ सिर गोद में रखे अपलक शून्य में झांकते पाया था ।
उस हादसे में अशोक सिर्फ इसलिए मरने से बच गया था क्योंकि उसका अपनी मां और भाइयों के साथ मोटरसाइकल पर बैठ पाना सम्भव नहीं था ।
बाद में रूपचन्द ने अशोक को उसके मामा के घर भेज दिया और स्वयं महालक्ष्मी के पुल के करीब एक चाल के एक कमरे में अकेला रहने लगा जहां कि वह आज भी रहता था । नशा करना तो उसने तभी छोड़ दिया था लेकिन उसके मन में एक वहम कील की तरह ठुक गया था कि वह अपने परिवार के लिए बहुत मनहूस था । अपने अभिशप्त साये से अशोक को बचाए रखने के लिए उसने तभी से अशोक को अपने से अलग कर दिया था और वह आज भी अलग था । अशोक पढ-लिखकर पुलिस में भरती हुआ, मीरा से उसकी शादी हुई, उनके शिल्पा नाम की खूबसूरत बच्ची पैदा हुई लेकिन हर किसी के भरपूर अनुरोध के बावजूद उसने उन लोगों के साथ रहना कबूल नहीं किया । वजह वह किसी को नहीं बता सकता था लेकिन उसके मन में तब भी यह वहम घर किए था कि उसने अपने इकलौते बेटे के परिवार के साथ रहना कबूल किया तो उसका मनहूस साया सारा परिवर तबाह कर देगा ।
अपनी शादी के वक्त वह कार्पोरशन के दफ्तर में ड्राफ्टसमैन था और आज छप्पन साल की उम्र में भी वही नौकरी कर रहा था । बीच में तब उसकी नौकरी जाते-जाते बची थी जब कि किसी ने दफ्तर में उसकी शिकायत कर दी थी कि वह डोप एडिक्ट था । कितना ही अरसा वह सस्पेंड रहा था और उस सस्पेंशन का समापन नौकरी से बर्खास्तगी पर आकर खत्म होना लगभग निश्चित था जब कि उसके परिवार के साथ वह हौलनाक ट्रेजेडी हुई थी और फिर ह्ममीनिटेरियन ग्राउन्ड्स पर सख्त वार्निग के साथ उसे उसकी ड्राफ्ट्समैन की नौकरी पर बहाल कर दिया गया था ।
सस्पेंशन के दौरान अपने इकलौते बच्चे को पालने के लिए उसने जो यन्त्रणाएं भुगती थीं वो साक्षात नर्क से कम न थीं । उन्हीं दुश्वारी के दिनों के सदके तब से लेकर अब तक वह एक ऐसे जरायमपेशा कार्य में मशगूल था जिसकी भनक भी अगर उसके इन्स्पेक्टर बेटे को लग जाती तो कहर बरपा जाता ।
वह मटके का कलैक्टर था ।
बतौर कलैक्टर उसे जमा हुई रकम पर एक प्रतिशत कमीशन मिलती थी । उस अतिरिक्त आमदनी का चस्का, यह उसका दुर्भाग्य था कि, वह आज तक नहीं छोड़ सका था ।
“दादा जी ।” - शिल्पा फिर मचली - “कहानी सुनाओ न !”
“नहीं बेटी ।” - उसे गोद से उतारकर उसकी मां के हवाले करता हुआ रूपचन्द जगनानी उठ खड़ा हुआ - “बाकी कहानी इतवार को । दादा जी ने जाना है न !”
“आप यहां क्यों नहीं रहते ?”
“उसकी भी एक कहानी है बेटी, जो जब तू बड़ी हो जाएगी तो मैं तुझे सुनाऊंगा ।”
फिर मुम्बई पुलिस के कर्मठ एवं कर्तव्यनिष्ठ इन्स्पेक्टर अशोक जगनानी का मटका कलैक्टर पिता वहां से विदा हो गया ।