राजनगर के रईसों के इलाके शंकर रोड की मनोहर मैनशन नाम की एक आधुनिक इमारत के एक फ्लैट में एक सुबह एक लड़की की लाश पाई गई । सुबह नौ बजे जब नौकरानी सफाई वगैरह के लिए वहां पहुंची तो उसने फ्लैट की मालकिन को अपने विशाल बैडरूम के विशाल बैड पर मृत पाया । लड़की की छाती में एक सुराख दिखाई दे रहा था जो निश्चय ही रिवाल्वर की गोली द्वारा बना था ।
नौकरानी दहशत में चिल्लाती हुई फ्लैट से बाहर भागी ।
पुलिस घटनास्थल पर पहुंची ।
तफ्तीश द्वारा मालूम हुआ कि मरने वाली निशा नाम की एक बेहद खूबसूरत, बेहद जवान और बेहद आधुनिक युवती थी । छः महीने पहले तक वह माडलिंग का धन्धा करती थी । फिर एकाएक बिना किसी प्रत्यक्ष कारण से उसने वह धन्धा छोड़ दिया था । मनोहर मैनशन के जिस फ्लैट में वह रहती थी, उसका किराया दो हजार रुपए महीना था । फ्लैट में सुख-सुविधा और ऐश्वर्य का हर सामान मौजूद था । उसके पास एक नई चमचमाती हुई स्टैण्डर्ड कार थी और उसके बैंक में उसके नाम लगभग अट्ठासी हजार रुपया जमा था । प्रत्यक्षत: उसकी आय का कोई साधन नहीं था और न ही इस बात की सम्भावना थी कि उसे ऐश्वर्यपूर्ण जीवन के पीछे उसकी माडलिंग के धन्धे से की गई कमाई लगी हुई हो ।
पुलिस को तफ्तीश के दौरान में कुछ और बड़ी चौंका देने वाली बातें भी मालूम हुई जिनकी पुलिस ने आरम्भ में रहस्य रखने की कोशिश की लेकिन अखबार के रिपोर्टरों की घाघ निगाहों से वे बातें छुपी न रह सकीं ।
जैसे -
निशा की कार की पेमेंट जिस चैक द्वारा की गई थी, उस पर नगर के प्रसिद्ध उद्योगपति लाला मंगत राम के हस्ताक्षर थे ।
फ्लैट में मौजूद कितनी ही अन्य कीमती चीजों की कीमत चैक द्वारा अदा की गई थी और लगभग सभी चैकों पर लाला मंगत राम के हस्ताक्षर थे ।
मनोहर मैनशन के मालिक की उस फ्लैट को किराये पर उठाने की बात लाला मंगत राम के प्रतिनिधि से हुई थी, निशा से नहीं । मालिक तो ठीक से निशा को जानता भी नहीं था । मालिक खुद उस इमारत में नहीं रहता था । वह धर्मपुरे के एक मकान में अकेला रहता था और फ्लैट का किराया प्रति मास उसके घर पहुंच जाता था ।
पिछले छः महीनों में कितनी ही बार लाला मंगत राम की सूरत-शक्ल का एक आदमी मनोहर मैंशन में प्रविष्ट होता देखा गया था ।
इमारत में रहने वाला एक अन्य व्यक्ति, जो लाला मंगत राम के समय-समय पर समाचार-पत्रों में प्रकाशित होने वाले चित्रों के आधार पर उन्हें अच्छी तरह पहचानता था, यह बात दावे के साथ कहता था कि जिस रोज निशा की लाश उसके फ्लैट में बरामद हुई थी, उस रोज सुबह आठ बजे उस ने लाला मंगत राम को निशा के फ्लैट से निकलते देखा था ।
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार हत्या साढ़े सात और साढ़े आठ बजे के बीच किसी समय हुई थी । हत्या एक 36 कैलिबर की रिवाल्वर से निकली गोली से हुई थी । गोली सीधी दिल से गुजर गई थी और मृत्यु तत्काल हो गई थी ।
इमारत में रहने वाले अन्य लोगों में से किसी ने भी गोली चलने की आवाज नहीं सुनी थी ।
इमारत में पुलिस को निशा के हाथ की लिखी एक चिट्ठी मिली थी जो कि पोस्ट नहीं की गई थी । उस चिट्ठी के लिफाफे पर इंगलिश में पता लिखा हुआ था । लिफाफे पर डाक टिकटें नहीं लगी हई थीं जिससे यह जाहिर होता था कि शायद वह चिट्ठी दस्ती भेजी जाने वाली थी ।
उस चिट्ठी से यह जाहिर होता था कि निशा लाला मंगत राम को ब्लैकमेल कर रही थी । निशा के बैंक में जमा रकम शायद ब्लैकमेल का ही फल थी ।
निशा लाला मंगत राम को किस आधार पर ब्लैकमेल कर रही थी, यह बात पुलिस न जान सकी ।
सारे सिलसिले से साफ जाहिर होता था कि निशा लाला मंगत राम की रखैल थी और शायद वह उन्हें अपने और उनके उस नाजायज रिश्ते की वजह से बदनाम कर देने की धमकी देकर ही लाला मंगत राम को ब्लैकमेल कर रही थी ।
किसी भी अखबार ने यह बात स्पष्ट शब्दों में नहीं लिखी थी कि निशा लाला मंगत राम की रखैल थी । सबने यही लिखा था कि जाहिर होता था कि लाला मंगत राम के निशा से ‘घनिष्ठ सम्बन्ध’ थे ।
उस रहस्यमयी हत्या से लाला मंगत राम का सम्पर्क स्थापित होते ही पुलिस कमिश्नर ने जो पहला काम किया वह यह था कि उसने इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल को, जो कि केस की तफ्तीश कर रहा था, केस से हटा दिया और उसके स्थान पर स्वयं पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट रामसिंह को नियुक्त कर दिया । पिछले कुछ समय से नगर में पुलिस की बड़ी मुखालफत हो रही थी । जनता और प्रैस द्वारा पुलिस पर यह इल्जाम लगाया जा रहा था कि पुलिस नगर के राजनैतिक नेताओं और धन्ना सेठों के हाथ कठपुतली बनी हुई थी । लाला मंगत राम के मामले में पुलिस पर किसी प्रकार की तरफदारी का इल्जाम न आये और न ही एक छोटा अफसर लाला मंगत राम जैसे प्रतिष्ठित और पैसे वाले आदमी के प्रभाव में आकर उनके साथ कोई रियायत कर पाये इसीलिये पुलिस इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल को हटाकर केस पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट रामसिंह को सौंपा गया था और उसे आदेश दिया गया था कि वह समय-समय पर कमिश्नर साहब को स्थिति से अवगत कराता रहे ।
लाला मंगत राम ने स्थिति का स्पष्टीकरण इस प्रकार किया । उनके कथनानुसार निशा उनके एक ऐसे स्वर्गीय दोस्त की लड़की थी जिसके उन पर बहुत अहसान थे । एक बहुत बड़े उद्योगपति के रूप में उनकी मौजूदा तरक्की में उस दोस्त का बहुत बड़ा हाथ था । वह दोस्त सिंगापुर में कहीं रहस्यपूर्ण स्थितियों में मारा गया था । केवल छः महीने पहले ही लाला मंगत राम को खबर हुई थी कि उनके स्वर्गीय दोस्त की कोई लड़की भी थी जो उन दिनों राजनगर में थी और माडलिंग का धन्धा करती थी । अपने दोस्त का अहसान चुकाने की खातिर ही उन्होंने निशा के लिये सब कुछ किया था । उनका निशा के साथ यही ‘घनिष्ठ सम्बन्ध’ था कि वह उनके जिगरी दोस्त की बेटी थी और अपने दोस्त की इकलौती बेटी की हर सुख-सुविधा का ध्यान रखना उन्होंने अपना कर्त्तव्य समझा था ।
वह सुबह आठ बजे निशा के फ्लैट पर गये जरूर थे लेकिन उसे समय निशा जिन्दा थी और वह उसे अपने पीछे सही-सलामत छोड़कर वहां से विदा हुए थे ।
“क्या आपके पास कोई रिवाल्वर है ?” - पुलिस ने पूछा ।
“जी हां, है ।” - एक हिचकिचाहट-भरा उत्तर मिला ।
“कौन-सा मेक ?”
“36 कैलिबर की स्मिथ एण्ड बैसन ब्रांड की इम्पोर्टिड रिवाल्वर ।”
“जरा दिखाइएगा ?”
लेकिन पुलिस को रिवाल्वर देखना नसीब नहीं हुआ । रिवाल्वर लाला मंगत राम अपने बैडरूम में मौजूद राइटिंग टेबल के एक दराज में रखते थे । दराज में से रिवाल्वर गायब थी । लगता था, दराज का ताला किसी ने जबरदस्ती खोला था । ताला मामूली था और आसानी से खुल जाने वाला था । लाला मंगत राम के कथनानुसार अगर रिवाल्वर का जिक्र न आता तो वे रिवाल्वर दराज में देखने जाते भीं नहीं । और कई दिन गुजर जाने के बाद भी उन्हें खबर नहीं होती कि मेज की दराज में से रिवाल्वर गायब है ।
पुलिस ने ब्लैकमेल का जिक्र किया तो लाला मंगत राम ने बड़े कठोर शब्दों में इस बात का विरोध किया । उन्होंने कहा कि यह बात सोचना भी मूर्खता थी कि निशा उन्हें ब्लैकमेल कर रही थी । बहू तो वैसे ही निशा के कह देने भर से अपना सर्वस्व उसके हवाले कर देने के लिए तैयार थे, ऐसी स्थिति में भला निशा को उन्हें ब्लैकमेल करने की क्या जरूरत थी और फिर किस आधार पर ?
लेकिन निशा के फ्लैट में मिला उनके नाम लिखा पत्र साफ सिद्ध करता है कि निशा उन्हें ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रही थी और वह अपनी कोशिश में कामयाब भी हुई थी ।
“नानसैंस !” - लाला मंगत राम का संक्षिप्त और स्पष्ट उत्तर था ।
“उस पत्र के बारे में आपकी राय ?”
“मैं इस विषय में कुछ नहीं कह सकता ।”
प्रैस को जो सूचनायें प्राप्त हुई वे सब पुलिस से प्राप्त हुई । लाला मंगत राम ने प्रैस को किसी प्रकार का बयान देने से, यहां तक कि प्रैस प्रतिनिधियों से मिलने तक से, सरासर इन्कार कर दिया ।
इसलिये जब लाला मंगत राम के प्राइवेट सेक्रेटरी ने ‘ब्लास्ट’ के दफ्तर में फोन करके उसे अपने आफिस में बुलाया तो सुनील को कई सुखद सम्भावनायें दिखाई देने लगीं और जब सेक्रेटरी ने उसे यह बताया कि लालाजी उससे मिलना चाहते थे तो उसकी खुशी का पारावार नहीं रहा । लालाजी उसमें किसी भी वजह से क्यों नहीं मिलना चाहते थे, कम से कम वह उन तक पहुंचा तो सही और सम्भव था वे उसके दो-चार सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हो जाते !
यानी कि ‘ब्लास्ट’ को एक इतने सनसनीखेज केस से सम्बन्धित ‘एक्सक्लूसिव फर्स्ट हैंड मैटर’ मिलने की सम्भावना हो गई थी ।
***
लाला मंगत राम एक लगभग साठ वर्ष का हृष्ट-पुष्ट वृद्ध था । ‘लाला’ शब्द को सार्थक करने वाली उसमें कोई बात नहीं थी । वह योरोपियन परिधान पहनता था और सूरत-शक्ल से लगता भी योरोपियन ही था । देश के दस सबसे बड़े उद्योगपतियों में उसकी गिनती होती थी और देश के विभिन्न भागों में फैली हुई उसकी लगभग एक दर्जन कपड़ा, चीनी और खाद बनाने वाली मिलें थीं । पिछले साल भारत सरकार द्वारा उसे पद्म भूषण की उपाधि से अलंकृत किया गया था । पिछले पांच सालों से वह फैडरेशन ऑफ इन्डियन चैम्बर आफ कामर्स एण्ड इन्डस्ट्रीज का अध्यक्ष था और पिछली टर्म में लोकसभा का निर्वाचित सदस्य भी रह चुका था । सत्तारूढ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से उसके अच्छे सम्बन्ध थे और देश का बच्चा-बच्चा उसे देश के एक महत्वपूर्ण और सम्मानित नागरिक के रूप में जानता था । यही वजह थी कि हत्या का इतना तगड़ा सस्पेक्ट होने के बावजूद लाला मंगत राम अभी तक आजाद था । गृहमन्त्री तक से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध रखने वाले करोड़पति सेठ को गिरफ्तार करने के नाम पर एक बार तो पुलिस कमिश्नर को भी पसीना आ जाना स्वाभाविक था जबकि अगर लाला मंगत राम के स्थान पर कोई साधारण आदमी होता तो अब तक कब का अगर हत्या के अपराध में नहीं तो कम से कम हत्या के सन्देह के अपराध में गिरफ्तार करके जेल के सीखचों के पीछे पहुंचवा ही दिया गया होता, बाद में वह भले ही छूट जाता ।
“लालाजी तुमसे मिलना चाहते हैं ।” - सैक्रेट्री ने सुनील को यूं बताया जैसे वह किसी अदना आदमी को देश के राष्ट्रपति से मिलने का अवसर दे रहा हो ।
“किस सिलसिले में ?” - सुनील ने पूछा ।
“यह तो लालाजी ही बतायेंगे ।”
“बेहतर ।”
सुनील सैक्रेट्री के सामने एक कुर्सी पर बैठ गया । उसने अपना लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकालकर एक सिगरेट सुलगा लिया और बड़े निर्लिप्त भाव से उसमें कश लगाने लगा ।
सैक्रेट्री के चेहरे पर ऐसे भाव आये जैसे वह सुनील के सिगरेट पीने से एतराज करने वाला हो लेकिन वह कुछ बोला नहीं । उसकी सूरत से ऐसा लग रहा था जैसे उसे यह बात बड़ी नागवार गुजर रही थी कि एक अखबार का मामूली रिपोर्टर लाला मंगत राम जैसे महान आदमी से मिलने के विचार मात्र से थर्रा क्यों नहीं गया था ।
कितनी ही देर सैक्रेट्री कभी सुनील के लापरवाही-भरे मूड को, कभी उसके परिधान को और कभी उसके, उसके सामने रखे सिगरेट के पैकट को देखता रहा ।
“क्या देख रहे हो ?” - एकाएक सुनील बोला ।
सैक्रेट्री एकाएक यूं टोके जाने की वजह से हड़बड़ा गया । फिर वह स्वयं को सुसंयत करने का प्रयत्न करता हुआ बोला - “प्रैस रिपोर्टरों के बड़े ठाट-बाट हैं ।”
“हां” - सुनील लापरवाही से बोला - “लाला लोगों के सैक्रेट्रियों से अच्छे हैं ।”
सैक्रेट्री के चेहरे ने कई रंग बदले ।
“कुछ कहने से पहले एक बात ध्यान में रखना, दोस्त” - सुनील मीठे स्वर में बोला - “मैं तुम्हारे लाला से मिलने आया हूं, तुमसे नहीं । तुम्हारा लाला मेरे से बड़ा आदमी हो सकता है, तुम नहीं ।”
सेक्रेटरी ने कुछ कहने के लिये मुंह खोला । उसके नेत्रों में क्रोध को चमक दिखाई दी, फिर उसके जबड़े मजबूती से भिंच गये । उसने अपने सामने एक मोटा-सा रजिस्टर सरका लिया और उसके पन्ने पलटने लगा ।
तीसरे सिगरेट के दौरान सेक्रेटरी की मेज पर रखे तीन टेलीफोन में से एक का बजर बजा । सेक्रेटरी ने बड़ी तत्परता से उस टेलीफोन का रिसीवर उठाया, टेलीफोन पर लगा एक बटन दबाया और फिर आदरपूर्ण स्वर में बोला - “यस, सर ।”
सैक्रेट्री एक क्षण सुनता रहा और फिर बोला - “राइट, सर ।”
उसने रिसीवर टेबल पर रख दिया और अपने स्थान से उठता हुआ सुनील से बोला - “आओ ।”
सुनील उठ खड़ा हुआ । उसने सिगरेट ऐश-ट्रे में झोंक दिया और सैक्रेट्री के साथ हो लिया ।
सैक्रेट्री उसे एक सिनेमा हाल जैसे विशाल कमरे में ले आया । उस कमरे पर दीवारों की पालिश से चमचमाती हुई लकड़ी मढी हुई थी । खिड़कियों पर भारी रेशम के परदे पड़े हुए थे और फर्श पर इतना मोटा और मुलायम कालीन बिछा हुआ था कि चलते समय सुनील को अपना पांव आधा फुट तक भीतर धंस जाता महसूस होता था । कमरे के बीचोंबीच एक बिलियर्ड टेबल से भी बड़ी आबनूस की लकड़ी की मेज लगी हुई थी जिसके पीछे एक राजसिंहासन जैसी कुर्सी पर लाला मंगत राम बैठा था । सुनील और सैक्रेट्री के आगमन पर उसने सिर नहीं उठाया ।
“देशपाण्डे आने वाला है” - लाला मंगत राम बोला - “उसके आते ही मुझे खबर करना ।”
“यस सर ।” - सैक्रेट्री बोला । उसने एक क्षण लाल मंगत राम के दोबारा बोलने की प्रतीक्षा की और फिर कमरे से बाहर निकल गया । जाती बार वह अपने पीछे दरवाजा बन्द कर गया ।
सुनील आगे बढा ।
लाला मंगतराम ने अपनी आंखों पर लगा चश्मा उतारकर मेज पर रख दिया । कुछ क्षण उसकी तीखी निगाहें यूं सुनील का परीक्षण करती रहीं जैसे सुनील खुर्दबीन के नीचे रखा कोई कीड़ा हो ।
सुनील धैर्यपूर्ण मुद्रा बनाये खड़ा रहा ।
“बैठो ।” - अन्त में लाला मंगत राम बोला ।
सुनील एक कुर्सी पर बैठ गया । दोनों के बीच में इतना फासला था कि सुनील को लग रहा था जैसे वह दूसरे कमरे में बैठा हुआ हो ।
“तो तुम हो सुनील कुमार चक्रवर्ती ?”
“जी हां ।” - सुनील गम्भीर स्वर में बोला ।
“मैंने तुम्हारी बहुत तारीफ सुनी है ।”
सुनील चुप रहा ।
“मेरे हितचिन्तकों का कहना है कि तुम मेरी मदद कर सकते हो ।”
“जरूरी नहीं ।”
लाला मंगत राम की भृकुटि तन गई ।
“क्या मतलब ?” - वह तीव्र स्वर में बोला ।
“मैंने अर्ज किया है कि जरूरी नहीं है कि आपकी मदद कर सकूं । मदद करने की इच्छा होते हुए भी यह जरूरी नहीं है कि मैं आपकी मदद कर सकूं ।”
“लेकिन अभी तुमने यह तो सुना ही नहीं कि मैं तुमसे क्या मदद चाहता हूं ।” - वह पूर्ववत् तीव्र स्वर में बोला ।
“मैं अन्दाजा लगा सकता हूं ।”
“क्या अन्दाजा लगा सकते हो ?”
सुनील कुछ क्षण चुप रहा और फिर बड़े सन्तुलित स्वर में बोला - “मैं यह अन्दाजा लगा सकता हूं कि शंकर रोड के एक फ्लैट में निशा नाम की माडल की हत्या के साथ अपना नाम जुड़ जाने की वजह से जितना आपको चिन्तित होना चाहिए, आप उससे ज्यादा चिन्तित हैं । आपको जिस किसी ने भी मेरा नाम सुझाया है उसने आपके दिमाग में यह गलत ख्याल भर दिया है कि मैं कोई जादूगर हूं । मैं अपना जादू का डण्डा फिराऊंगा और सब कुछ ठीक हो जायेगा । लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है । मैं कोई जादूगर नहीं । मेरे पास कोई जादू का डंडा नहीं ।”
“लेकिन तुम एक होशियार आदमी हो ।”
सुनील ने लाला मंगत राम के कथन का विरोध नहीं किया ।
कई क्षण कमरे में सन्नाटा रहा ।
अन्त में लाला मंगत राम ने ही मौन तोड़ा - “तुम अखबार के रिपोर्टर हो । अपराध सूंघने के मामले में साधारण आदमी से ज्यादा तेज नाक रखते हो । तुम्हारा क्या ख्याल है, मैंने हत्या की है ‌!”
“जब हकीकत बयान कर सकने वाले महानुभाव ही सामने बैठे हैं तो मैं अपना ख्याल जाहिर करके क्या हासिल कर पाऊंगा ?”
“मैं इसी सवाल को दूसरे तरीके से पूछता हूं । क्या निशा की हत्या के इल्जाम में मैं फंस सकता हूं ?”
“वैसे तो आजकल इन्साफ पैसे वालों की जरखरीद लौंडी बना हुआ है लेकिन मेरी निजी राय यही है कि आप सरासर फंस सकते हैं ।”
“कैसे ?”
“आपके रिवाल्वर की चोरी वाली बात बड़ी लचर लगती है । मैडिकल रिपोर्ट के अनुसार यह बात भी दावे के साथ नहीं कही जा सकती कि आपने सुबह आठ बजे निशा को अपन फ्लैट में जीवित और सही-सलामत छोड़ा था । और निशा के आपने किसी सिंगापुरवासी स्वर्गीय दोस्त की लड़की होना और आपकी बाप के अहसान से दबे होने के कारण बेटी की मदद करने वाली कहानी पर तो बच्चा भी विश्वास नहीं करेगा । लालाजी, निशा एक मशहूर माडल थी । सारे देश की पत्रिकाओं में उसकी तस्वीरें छपती थीं । एक-एक पत्रिका में आधी-आधी दर्जन से अधिक विज्ञापनों में निशा की सूरत दिखाई देती थी । सिनेमाओं में कितनी ही विज्ञापन फिल्मों में वह दिखाई जाती थी । राजनगर के ही कितने ही चौराहों पर साबुन और कपड़ों के ऐसे विज्ञापनों के बैनर लगे हुए हैं जिनमें निशा दिखाई देती है । आपकी अपनी टैक्सटाइल मिल के बने कपड़ों की फैशन परेड में वह शामिल हो चुकी है लेकिन फिर भी आपको निशा की खबर केवल छः महीने पहले हुई ! निशा का बाप आपका जिगरी दोस्त था, आपकी मौजूदा तरक्की में उसका इतना बड़ा हाथ था कि आप निशा की खातिर कुछ भी करने को तैयार थे, फिर भी आपको खबर ही नहीं थी कि आपके दोस्त की कोई लड़की भी थी । यह बात कैसे सम्भव हो सकती है ? निशा कोई बच्ची नहीं, चौबीस-पच्चीस साल की नौजवान लड़की थी और आपको चौबीस-पच्चीस साल यह खबर नहीं हुई कि आपके जिगरी दोस्त की कोई लड़की भी है ? कैसा जिगरी दोस्त था वह आपका ? या शायद निशा पैदा होते ही आनन-फानन चौबीस-पच्चीस साल की हो गई थी ? लालाजी, चौबीस-पच्चीस साल की लड़की बनने के लिये चौबीस-पच्चीस साल ही लगते हैं ।”
“आल राइट । निशा मेरे किसी जिगरी दोस्त की लड़की नहीं थी । फिर मेरा क्या सम्बन्ध था उससे ?”
“आपका उससे कोई हमदर्दी या कर्त्तव्य निभाने वाला सम्बन्ध नहीं था । आपका उससे वही सम्बन्ध था जो हम लोग शिष्टाचार के नाते, बात शत-प्रतिशत सिद्ध हो जाने से पहले, अपनी जुबान पर नहीं लाना चाहते ।”
“यानी ?”
“वह आपकी रखैल थी ।”
“समझदार आदमी हो ।”
“कम से कम इस नतीजे से तो मेरी समझदारी जाहिर नहीं होती । यह नतीजा तो एक चौथी जमात का बच्चा भी निकाल सकता है ।”
“बहरहाल हो समझदार आदमी । मुझे तुमसे मिलकर खुशी हुई । यहां पास आकर बैठो ।”
सुनील अपने स्थान से उठा और लाला मंगत राम द्वारा इंगित उसके समीप की एक कुर्सी पर बैठ गया ।
लाला मंगत राम ने उससे यूं हाथ मिलाया जैसे सुनील अभी-अभी कमरे में प्रविष्ट हुआ हो ।
“मुझे तुमसे मिलकर वाकई खुशी हुई है” - लाला मंगत राम इस बार बड़े मित्रतापूर्ण स्वर में बोले - “मेरे शुभचिन्तकों ने तुम्हारी गलत तारीफ नहीं की थी । मुझे विश्वास है तुम जरूर मेरा भला करोगे । मुझे इस जंजाल से मुक्ति दिलाने में मेरी मदद करोगे ।”
सुनील चुप रहा ।
“बरखुरदार, सबसे पहली बात मैं तुमसे यही कहना चाहता हूं कि मैंने खून नहीं किया ।”
“लेकिन हालात तो आप ही की ओर उंगली उठाते हैं और ब्लैकमेल वाले ऐंगल का भी आपने कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं दिया है ।”
“सुनते जाओ । बीच में मत टोको ।”
“सॉरी ।”
“मेरा कोई दुश्मन मेरे पीछे पड़ा हुआ है जो दो बार मेरी हत्या करने का कोशिश कर चुका है ।”
“जी !”
“पहला प्रयत्न चार महीने पहले किया गया था जब मैं पद्मभूषण का खिताब हासिल करने के लिये नई दिल्ली गया था । वहां किसी ने मेरी कार में बम रख दिया था और बम की तारों को इस प्रकार इग्नीशन में जोड़ दिया था कि इग्नीशन आन करते ही कार भक्क से उड़ जाती । लेकिन उस रात गलती से कार की हैडलाइट्स आन रह गई जिसके परिणामस्वरूम सवेरा होने तक सारी बैटरी डिसचार्ज हो गई । ड्राइवर से इंजन स्टार्ट नहीं हुआ तो उसने कार का हुड उठाया और उसे बम दिखाई दिया ।”
“क्या बम इतना शक्तिशाली था कि फटने पर वह ड्राइवर के साथ-साथ पिछली सीट पर बैठे आपकी भी जान ले सकता था ?”
“इससे भी ज्यादा शक्तिशाली था । वह मेरी कार को क्या, एक पूरे ट्रक के परखचे उड़ा देने के लिये काफी था । नई दिल्ली में देशपाण्डे नामक मेरा एक दोस्त है जो वहां एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेन्सी का डायरेक्टर है । मैंने फौरन उसे सूचित किया ।”
“उसे क्यों ? पुलिस को क्यों नहीं ?”
“क्योंकि मुझे शक था कि उस घटना के पीछे मेरे एक रिश्तेदार का हाथ था जिसे कि मेरे मर जाने से बहुत फायदा था । रिश्ता इतना नाजुक था कि पूरी गारन्टी के बिना मैं उस पर अपना शक जाहिर करना नहीं चाहता था और इसलिये तफ्तीश के लिये मैंने पुलिस को बुलाने के स्थान पर देशपाण्डे को बुलाया जो कि मैंने अच्छा ही किया था । देशपाण्डे को पूरा विश्वास था कि इस घटना के पीछे मेरे उस रिश्तेदार का कोई हाथ नहीं था ।”
“यह विश्वास हो जाने के बाद आपने पुलिस में रिपोर्ट की ?”
“तब तक बहुत देर हो चुकी थी । देशपाण्डे का भी यही ख्याल था कि इतने दिन बाद रिपोर्ट करने से हासिल तो कुछ भी नहीं होता, उलटे मेरी हंसी उड़ती ।”
“देशपाण्डे ने यह पता लगाया कि वास्तव में बम वाली उस घटना के पीछे किसका हाथ था, यानी कि आपकी जान का दुश्मन कौन था ?”
“पता न लग सका ! लेकिन उस दिन के बाद मैंने देशपाण्डे को बाडीगार्ड के रूप में अपने साथ रखना आरम्भ कर दिया । देशपाण्डे लाइसेंसशुदा प्राइवेट डिटेक्टिव एजेन्सी का डायरेक्टर है, उसके पास रिवाल्वर रखने का लाइसेंस है और उसका निशाना अचूक है । अगले दो महीने कोई घटना नहीं घटी और फिर जब मैं देशपाण्डे को अपने से अलग करने का ख्याल ही कर रहा था कि शिमला में फिर किसी ने मेरी जान लेने की कोशिश की ।”
“कैसे ?”
“मैं होटल में अपने कमरे में था । खिड़की खुली थी । किसी ने मुझ पर फायर किया लेकिन देशपाण्डे की निगाह फायर करने वाले पर पहले पड़ गई थी । वह आदमी बाहर सड़क पर था । देशपाण्डे ने उस पर गोली चलाई । गोली उस के शरीर में कहीं लगी जिसकी वजह से उसका निशाना चूक गया और मैं बच गया लेकिन वह आदमी भागने में कामयाब हो गया । देशपाण्डे के होटल से बाहर निकलने से पहले ही वह आदमी वहां से गायब हो चुका था ।”
“आपने इस घटना की रिपोर्ट पुलिस को की ?”
“नहीं ।”
“जी !” - सुनील हैरानी से बोला - “दूसरी बार आपकी जान लेने की कोशिश की गई और फिर भी आपने पुलिस को रिपोर्ट नहीं की ?”
“वह मेरी गलती थी । मैं स्वीकार करता हूं वह मेरी गलती थी लेकिन हर आदमी मूर्खतायें करता है -ऐसी मूर्खतायें करता है जिनके बारे में बाद में सोचकर उसे खुद हैरानी होती है - वह ऐसी ही एक मूर्खता थी । मुझ पर गोली चलाने वाला देशपाण्डे की गोली से घायल हुआ था । देशपाण्डे के कथनानुसार उसके कंधे में गोली लगी थी । देशपाण्डे का ख्याल था कि घायल होने की वजह से गोली चलाने वाले को वह ढूंढ निकालेगा लेकिन वास्तव में देशपाण्डे उसे ढूंढ नहीं पाया ।”
“और बहुत देर हो चुकी होने की वजह से आपने फिर पुलिस में रिपोर्ट नहीं की ?”
“हां ।” - लाला मंगत राम खेदपूर्ण स्वर में बोला ।
सुनील चुप रहा । मन ही मन वह सोच रहा था कि अगर एक पढा-लिखा समझदार आदमी ऐसी मूर्खता कर सकता था तो एक अनपढ-गंवार आदमी तो जो न करे वही कम था ।
“उसके बाद मेरी हत्या का कोई प्रयत्न नहीं किया गया” - लाला मंगत राम फिर बोला - “बाद में मैंने देशपाण्डे को भी अपनी सेवाओं से मुक्त कर दिया । लेकिन अब निशा की हत्या से मुझे लगता है कि मेरे दुश्मन ने मेरी हत्या करने का तरीका ही बदला है, अपना नापाक इरादा नहीं छोड़ा है ।”
“मतलब ?”
“मेरे दुश्मन को शायद निशा की खबर लग गई और उसे मेरे और निशा के रिश्ते की भी खबर लग गई । शायद मेरे दुश्मन ने यह महसूस किया कि मेरी हत्या करने से ज्यादा आसान तरीका यह था कि वह निशा की हत्या कर दे और उसकी हत्या के इलजाम में मुझे फंसा दे । इसी लाइन पर काम करते हुए मेरे दुश्मन ने किसी प्रकार मेरी मेज की दराज में से मेरी रिवाल्वर चुराई और किसी सुनहरे मौके की प्रतीक्षा करने लगा । उस रोज सुबह-सवेरे मैं निशा से मिलने गया । मेरे फ्लैट से निकलने के बाद वह वहां गया और उसने निशा को गोली मार दी । मेरा दुर्भाग्य कि लोगों ने उस रोज मुझे तो निशा के फ्लैट से निकलते देखा लेकिन हत्यारे को न किसी न वहां घुसते देखा और न निकलते देखा ।”
“आई सी ।”
“और, बरखुरदार, देख लेना, देर-सवेर मेरी रिवाल्वर भी पुलिस को बड़े ड्रामैटिक ढंग से कहीं से मिल जाएगी । बैलेस्टिक एक्सपर्ट निर्विवाद रूप से यह सिद्ध कर देगा कि निशा की हत्या उसी रिवाल्वर से चली गोली से हुई है और फिर शायद पुलिस मेरा उतना लिहाज करना जरूरी नहीं समझेगी जितना कि वह अब कर रही है ।”
“और उस ब्लैकमेल की ओर संकेत करने वाली अपने नाम निशा द्वारा लिखी चिट्ठी के बारे में आपने क्या कहना है जो पुलिस ने निशा के फ्लैट से बरामद की है ?”
“बेटा” - लाला मंगत राम बेहद चिन्तित स्वर में बोला - “वो चिट्ठी ही तो मेरे लिये सबसे ज्यादा चिन्ता का विषय बनी हुई है । मैंने पुलिस से उस चिट्ठी के विषय में कोई बात नहीं की है, इसलिए कोई बात नहीं की है क्योंकि मेरे लिए उस चिट्ठी की कोई सफाई देना मुमकिन नहीं है । वैसे दोबारा पूछे जाने पर सब मैं पुलिस को यह कहानी सुनाऊंगा जो मैं इस समय तुम्हें सुना रहा हूं तो मैं चिट्ठी का यही स्पष्टीकरण दूंगा कि वह चिट्ठी भी मुझे निशा की हत्या के इलजाम में फंसाने की दिशा में मेरे दुश्मन की चाल है ।”
“लेकिन पुलिस कहती है कि हैंडराइटिंग निशा की है ।”
“फोर्ज किया गया है । किसी ने निशा की हैंडराइटिंग की नकल की है । ऐसा हो सकता है । क्या लोग चैकों पर किसी दूसरे के हस्ताक्षर फोर्ज करके बैंक से हजारों-लाखों रुपया नहीं निकाल लेते ?”
“आल राइट । यह स्पष्टीकरण तो आप पुलिस को देंगे लेकिन हकीकत क्या है ?”
एकाएक लाला मंगत राम गैस निकले गुब्बारे की तरह पिचक गया । वह हारे हुए स्वर में बोला - “वास्तव में वह चिट्ठी निशा द्वारा ही लिखी गई थी । निशा वाकई मुझे ब्लैकमेल कर रही थी ।”
सुनील बेहद सतर्क हो गया । हालात बड़ा चमत्कारिक मोड़ लेने जा रहे थे । सीधे लाला मंगत राम के मुंह से एक अप्रत्याशित रहस्योद्घाटन होने जा रहा था ।
“समझ में नहीं आता, दोस्त” - एकाएक लाला मंगत राम का स्वर उदासी में डूब गया - “कि जमाना किस ओर जा रहा है । यानी कि शराफत और ईमानदारी तो कहीं रह ही नहीं गई है । तुम जिस पर विश्वास करो, वही धोखा दे जाता है । आजकल अगर कोई तुम्हारे गले मिलता है तो यह मत समझो कि वह मुहब्बत जता रहा है । हकीकत में वह आपकी पीठ में कोई ऐसी जगह टटोल रहा होता है जहां कि छुरा आसानी से घोंपा जा सकता है । एक जमाना था कि आदमी जो बात जुबान से कह देता था उससे फिरता नहीं था, चाहे उसकी जान ही क्यों न चली जाये । और आजकल ! आजकल आदमी जुबान देता है दूसरे के मन में झूठी सुरक्षा की भावना भरने के लिए ताकि दूसरा आपका विश्वास करने लगे और आप इतमीनान से उसको धोखा दे सकें । एक जमाना था जब आपका कोई विश्वासपात्र आदमी आपको धोखा दे जाता था तो ऐसा लगता था जैसे कयामत आ गई हो, जैसे की बेहद असम्भावित और अकल्पनीय बात हो गई हो । और आजकल धोखा देता ही विश्वासपात्र आदमी है । और किसी से धोखा खायेंगे आप ? हरगिज नहीं । मैं आपसे कोई धन्धे की बात करता हूं जिसमें मेरा तो एक प्रतिशत फायदा है और आपका पचास प्रतिशत फायदा है और ऐसा फायदा कोई दूसरा आदमी आपको पहुंचा भी नहीं सकता तो उसूलन आप को क्या करना चाहिए ? आपको अपने मुकद्दर पर नाज करना चाहिए, मेरा और खुदा का शुक्रगुजार होना चाहिए और मेरे साथ पूरी शराफत और ईमानदारी के साथ पेश आना चाहिए । लेकिन आज के जमाने में ऐसा आदमी बेवकूफ बनाने के लिए एकदम तैयारशुदा शिकार माना जाता है । आप उसका अहसानमन्द होने की जगह कोशिश करते हैं कि उसका तो बेड़ा गर्क हो जाए और आपका घर भर जाये ।”
लाला मंगत राम जैसे आदमी का शराफत और ईमानदारी की दुहाई देना सुनील को बड़ा विचित्र लग रहा था ।
“आप निशा की बात करने जा रहे थे ।” - सुनील ने बड़े शिष्ट भाव से उसे टोका ।
“मैं उस हरजाई औरत की ही फितरत बयान कर रहा हूं” - लाला मंगत राम इस बार तनिक क्रोधित स्वर में बोला - “वह क्या थी और मैंने उसे क्या बना दिया था ! मैंने उसे क्या नहीं दिया ! फ्लैट, कार, हर तरह की सुख-सुविधा, ढेरों रुपया-पैसा । छः महीने में मैंने उसे इतना कुछ दिया जितना वह अपनी जिन्दगी में नहीं कमा सकती थी । एक महीने में कितना रुपया कमा सकती है एक माडल गर्ल ? एक हजार रुपये ! पन्दरह सौ रुपये ! दो हजार रुपये ! उसकी एक महीने की कमाई जितना तो उस फ्लैट का किराया है जिसमें कि वह रहती थी । जितना मैंने निशा के लिये किया उससे एक बटा दस के लिए उससे ज्यादा खूबसूरत और ज्यादा नौजवान लड़कियां मेरे पीछे फिरती हैं । मेरे एक इशारे पर दर्जनों लड़कियां मुझ पर अपना सर्वस्व निछावर कर सकती हैं । लेकिन मैं वह आदमी नहीं जो किसी की एडवन्टेज लूं, किसी के साथ खामखाह ज्यादती करूं । मैं एक बिजनेसमैन हूं । जिस चीज की मुझे जरूरत होती है, मैं उसका सौदा करता हूं । मैं कोई चीज मुफ्त हासिल करने की कोशिश नहीं करता । मैंने निशा के साथ एक सौदा किया - एक ऐसा सौदा जिसमें मेरा फायदा एक प्रतिशत था और निशा का फायदा पचास प्रतिशत था । और इसमें कोई जोर-जबरदस्ती वाली बात नहीं थी । अगर वह मेरी रखैल बनी थी तो शत-प्रतिशत अपनी मर्जी से बनी थी । बल्कि वह तो इस सारे सिलसिले के लिए इतनी इच्छुक थी कि पूरी बात सुन चुकने से पहले ही उसने इतनी तेजी और इतनी व्यग्रता से हामी भरी थी जैसे उसे डर हो कि अगर उसके हामी भरने में एक सैकेण्ड की भी देर हो गई तो कहीं मेरा इरादा न बदल जाये । मैंने उस एक ईमानदार लड़की समझा और उसके साथ पूरी ईमानदारी से पेश आया लेकिन उसने मुझे सरासर धोखा दिया । मैं समझता था कि अब मैं ही उसकी जिन्दगी में एक अकेला आदमी रह गया हूं लेकिन वह तो शुरू से ही मेरी पीठ पीछे एक दूसरे आदमी से आशनाई कर रही थी ।”
“दूसरा आदमी ?”
“हां । दूसरा आदमी । उसका यार ! नौजवान ! खूबसूरत ! लेकिन भूखा ! भिखारी ! ईजीराइडर ! पैरासाइट ! अपार्चुनिस्ट ।”
“कौन था वह ?”
“प्रेमकुमार नाम का एक नौजवान था वह । पता नहीं निशा की पहले से ही उसके साथ आशनाई थी या उसने बाद में यार पाला था । मेरी गैरहाजिरी में वह निशा के फ्लैट पर भी जाता था और निशा भी उसके घर जाती थी । मैंने एक बार निशा को कहा कि मैं एक हफ्ते के लिए बम्बई जा रहा हूं लेकिन वास्तव में मैं गया नहीं । मैंने प्रेमकुमार को खुद निशा के फ्लैट में पकड़ा । निशा ने आंसू बहाकर और दुनिया भर की कसमें खाकर कहा कि उसका प्रेमकुमार के साथ अब कोई सम्बन्ध नहीं था ।”
“यानी कि पहले था ?”
“हां और यह कि वह केवल उससे मिलने आया था और भविष्य में मिलने भी नहीं आया करेगा । लेकिन निशा झूठ बोल रही थी, हकीकत पर परदा डालने के लिए ड्रामा कर रही थी । प्रेमकुमार निशा का यार था, पक्का यार था और मौजूदा यार था । वह रौनक बाजार के स्टार होटल नामक एक घटिया से होटल में रहता था । मैं एक बार उससे वहां मिलने गया । मैंने उसे धमकी दी कि अगर वह दोबारा निशा के पास भी फटका तो मैं उसकी वो गत बनवाऊंगा कि उसकी आत्मा त्राहि-त्राहि कर उठेगी । लेकिन उसके मन में जवानी का जोश था, नौजवान मुहब्बत की उमंग थी । उसने मेरी बात को मजाक समझा ।”
“लेकिन वास्तव में आप गम्भीर थे ?”
“एकदम । पैसे के दम पर मुझे काम करवाना आता है, मिस्टर । मैंने उसकी वो पिटाई करवाई कि दस दिन तक तो वह अस्पताल में पड़ा रहा । अस्पताल से निकलने के बाद उसने निशा से सम्पर्क रखना तो दूर, शंकर रोड या उसके आसपास फटकने की भी हिम्मत न की ।”
“वह कब की बात है ?”
“कोई पांच महीने पहले की ।”
“अब प्रेमकुमार कहां है ?”
“होगा कहीं । मुझे खबर नहीं लेकिन अब कम से कम स्टार होटल में नहीं है । उसे तो इस ख्याल से भी दहशत होगी कि कहीं मुझे उसकी दोबारा खबर न लग जाये ।”
“निशा को पता था कि आपने प्रेमकुमार की पिटाई करवाई थी ?”
“होगा । मैंने परवाह नहीं की दोबारा ।”
“निशा आपको ब्लैकमेल किस आधार पर कर रही थी ?”
“आधार कम से कम वह नहीं था जो कि दुनिया सोचती है । वह एक पढी-लिखी, समझदार और ऊंची सोसायटी में स्थापित हो चुकी लड़की थी, कोई कोठे से उठाई हुई वेश्या नहीं । यह बात जाहिर करने में कि वह मेरी रखैल थी उसकी भी बदनामी थी । और फिर इस बात से मैं बड़ी आसानी से मुकर सकता था कि वह मेरी रखैल थी । मैं निशा के अपने दोस्त की बेटी होने वाली कहानी फिर दोहरा सकता था और कह सकता था कि जो कुछ मैंने निःस्वार्थ भाव से उसके लिए किया है, उसके लिए मेरा अहसानमन्द होने की बजाय अपने साथ मेर एक गन्दे रिश्ते की दुहाई देकर वह मुझे ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रही थी ।”
“तो फिर वास्तविक वजह क्या थी ?”
लाला मंगत राम एकाएक बेहद चुप हो गया । उसके चेहरे पर हिचकिचाहट के गहन भाव उभर आये ।
“तुम अखबार के रिपोर्टर हो” - कई क्षण चुप रहने के बाद लाला मंगत राम बोला - “जो कुछ मैं तुम्हें बताने जा रहा हूं, उसका तुम कोई गलत इस्तेमाल तो नहीं करोगे ?”
“नहीं । कोई गलत इस्तेमाल नहीं करूंगा मैं ।” - सुनील गलत शब्द पर विशेष जोर देता हुआ बोला -उसने गलत इस्तेमाल से इन्कार किया था, इस्तेमाल से नहीं ।
“क्या मैं तुम पर पूरा भरोसा कर सकता हूं ?”
“वह तो आप कर ही रहे हैं वर्ना मैं आपके सामने यहां न बैठा होता । फिर भी कोई शक आपके दिमाग में है तो आप उन लोगों से बात कर लीजिए जिन्होंने मेरा नाम आपको सुझाया है ।”
“जरूरत नहीं । मुझे तुम पर भरोसा है ।”
सुनील चुप रहा ।
“बरखुरदार, हर आदमी गलती करता है । भारी से भारी गलती करता है लेकिन अगर उसकी गलती पकड़ी न जाये तो वह उसे आसानी से भुला देता है और आगे के लिए सावधान हो जाता है । इसी प्रकार हर आदमी इतनी गंदी और घिनौनी हरकतें करता है जो अगर प्रकट हो जायें तो वह डूब मरने की सोचने लगे लेकिन अक्सर ऐसी गंदी हरकतें पकड़ी नहीं जाती इसलिए वह इज्जत और सम्मान का पुतला बना रहता है । जिस स्टेज पर मैं आज हूं उसमें ऐसे आदमी, जिन्होंने मुझसे बिजनेस हासिल करना होता है या कोई भी फायदा उठाना होता है, अपनी सगी बेटियों को बढावा देते हैं कि वे लालाजी की दिलजोई करें ताकि लाला जी खुश रहें अच्छे मूड में रहें और उनके फायदे के बारे में ज्यादा जल्दी और ज्यादा संजीदगी से सोचें । लेकिन यही बात जब जाहिर हो जाये कि लालाजी फलां आदमी को बेटी से अवैध सम्बन्ध रखते हैं यानी कि अगर ऐसे किसी रिश्ते का ढोल पिट जाये तो लालाजी पर तो थू-थू होगी ही, लड़की का बाप भी ऐसा रुख अख्तियार कर लेगा जैसे उसे किसी बात की खबर ही न थी और उसके साथ अनजाने में इतना बड़ा जुलम हो गया था ।”
“आप कहना क्या चाहते हैं ?”
“मैं यह कहना चाहता हूं कि सैक्स के मामले में हर पैसे वाला आदमी गन्द घोलता है । लेकिन क्योंकि ऐसी बातें जाहिर नहीं होती इसलिए उसके उजलेपन में फर्क नहीं आता लेकिन अगर जाहिर हो जायें या जाहिर हो जाने का खतरा पैदा हो जाये तो आदमी कितना भी रईस और साधन-सम्पन्न क्यों न हो, उसकी ऐसी-तैसी हो जाती है जैसे कि इस समय मेरी हुई है ।”
“मैं आपकी बात अभी भी नहीं समझा हूं ।”
लाला मंगत राम ने एक गहरी सांस ली । लगता था बात को जुबान से निकालने में वह बहुत असुविधा का अनुभव कर रहा था । उसका मुख्य बात पर आने से पहले इतनी बड़ी भूमिका बनाना भी यह जाहिर कर रहा था कि वह सुनील के सामने अपनी जिन्दगी का बहुत ही घिनौना पहलू उजागर करने जा रहा था ।
सुनील धैर्यपूर्ण मुद्रा बनाये चुपचाप बैठा रहा ।
“आल राइट” - अन्त में लाला मंगतराम निर्णायक स्वर में बोला - “एक रोज निशा ने मुझे बताया कि वह तीन ऐसी लड़कियों को जानती थी जो जवान और खूबसूरत तो थीं ही, सैक्स के मामले में पुरुष की संतुष्टि करने में भी उन्हें महारत हासिल थी । वह ऐसी-ऐसी हरकतें करती थीं कि पुरुष पनाह मांगने लगता था, पागल हो जाता था । पुरुष की यौनतुष्टि को उन्होंने आर्ट बना डाला था । और यह कि अगर मैं चाहूं तो यह उन तीनों लड़कियों को फ्लैट पर बुला सकती थी । निशा की बातों ने मुझे इतना उत्सुक बना दिया कि मैंने हामी भर दी... मैं जानता हूं तुम मन ही मन मुझसे नफरत कर रहे होगे लेकिन बरखुरदार, हर आदमी भीतर से नंगा होता है । मैं...”
“आई अण्डरस्टैण्ड ।” - सुनील ने उसे टोका ।
“बहरहाल वह तीन लड़कियां निशा ने फ्लैट पर बुलाई, वे मेरे साथ हमबिस्तर हुई और मुझे पता नहीं लगा कि बिस्तर पर होने वाली, जुबान पर जिक्र भी न लाया जाने लायक, उन हरकतों की कब तस्वीरें खिंचती रहीं ।”
“तस्वीरें किसने खींची ?”
“प्रत्यक्षतः किसी ने भी नहीं । एक आटोमैटिक कैमरा कहीं छुपाकर लगा दिया गया था । उसके कंट्रोल का कुछ इस ढंग से इन्तजाम किया गया था कि निशा बिना कैमरे के पास जाये ही तस्वीरें खींच सकती थी ।”
“आई सी । निशा बिस्तर में आप लोगों के साथ शामिल नहीं थी ?”
“नहीं ।”
“आपको यह बात अजीब नहीं लगी ?”
“नहीं लगी । उस वक्त तो मेरी आंखों पर परदा पड़ा हुआ था । तब अगर मुझे निशा के व्यवहार पर थोड़ा-सा भी सन्देह हो जाता तो शायद ब्लैकमेल की नौबत ही नहीं आती । अगर निशा भी तस्वीरों में शामिल हो जाती तो फिर वह मुझे ब्लैकमेल कैसे कर सकती थी ?”
“फिर ?”
“फिर क्या ? मैं उस दिन ब्लैकमेल के फंदे में आ गया ? मैंने उन तीन लड़कियों को पांच-पांच सौ रुपये देकर विदा किया । उसके बाद वे लड़कियां तो गायब हो गई लेकिन मेरी उन तीनों के साथ फ्लैट में हुई घिनौनी हरकतों की तस्वीरें खिंच गई और फिर उन तस्वीरों के दम पर निशा ने मुझे ब्लैकमेल करना आरम्भ कर दिया ।”
“कमाल है ।”
“कमाल तो है ही । उस लड़की के लिए मैंने इतनी सुख-सुविधायें जुटाई लेकिन शायद वह जरूरत से ज्यादा लालची थी और उसे वह सब काफी नहीं लग रहा था जो कि उसे सहज ही प्राप्त हो रहा था ।”
“आपके ख्याल से आपको ब्लैकमेल करने के लिए वे तस्वीरें तैयार करना निशा का अपना आइडिया था ?”
“क्या मतलब ?”
“क्या एक लड़की इतनी लम्बी-चौड़ी स्कीम सोच सकती है और अगर सोच सकती है तो क्या वह उसे कार्यरूप में परिणत कर सकती है ?”
“तुम कहना क्या चाहते हो ?”
“मैं यह कहना चाहता हूं कि शायद निशा का कोई सहयोगी था जिसने सारी स्कीम तैयार की थी और निशा को उस पर काम करने को उकसाया था ।”
“कौन ?”
“प्रेमकुमार । आपके कथनानुसार वह निशा का यार था । आपने उसको इतना पिटवाया था कि वह दस दिन अस्पताल में पड़ा रहा था । इस सारी घटना के बारे में उसने निशा को जरूर बताया होगा । फिर शायद दोनों ने मिलकर आपसे बदला लेने के लिए ही यह स्कीम तैयार की थी ।”
“हो सकता है ।” - लाला मंगत राम ने स्वीकार किया ।
“फिर ?”
“तीन दिन बाद निशा यहां आई और मेरे सेक्रेटरी के पास एक लिफाफा छोड़ गई । लिफाफे में मेरी उन तीन लड़कियों के साथ पांच गंदी तस्वीरें थीं ।”
“साथ में कोई चिट्ठी ?”
“कुछ भी नहीं ।”
“फिर ?”
“मैं क्रोध में उफनता हुआ निशा के पास पहुंचा । मैं बात की डिटेल में नहीं जाना चाहता । उस रोज उन तस्वीरों और उनके निगेटिवों के बदले में निशा ने मुझसे पचास हजार रुपये की मांग की थी जो कि मैंने उसे दिये ।”
“आपने उससे पूछा नहीं कि उसने ऐसा क्यों किया ?”
“बहुत कुछ पूछा । बहुत कुछ सुना । खूब लानत-मलामत हुई । इसीलिए तो बात की डिटेल बताने की जगह मैं तुम्हें उसका नतीजा बता रहा हूं ।”
“जाहिर है कि आपने उससे सम्बन्धविच्छेद तो कर ही लिया होगा ?”
“बिल्कुल । जो कुछ मैं उसे दे चुका था, वह तो मैं उससे वापिस ले नहीं सकता था । आगे के लिए मैंने सारा सिलसिला छोड़ दिया । लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई । जिस रोज उसकी लाश पाई गई थी, उससे पिछली रात को फिर मेरे पास एक लिफाफा पहुंचा था जिसमें पांच और तस्वीरें थीं जो कि पहली पांच तस्वीरों से भिन्न थीं । मैं क्रोध में आग-बबूला होता हुआ अगली सुबह उसके फ्लैट पर पहुंचा । निशा बाथरूम में थी । वहां पहुंचकर मेरे मन में ख्याल आया कि मैं क्यों न निशा के फ्लैट की तलाशी लूं । मैंने बाथरूम का दरवाजा धीरे से बाहर से बन्द कर दिया और फ्लैट की तलाशी लेनी आरम्भ कर दी । उसके बैडरूम में तकिये के नीचे उसकी चाबियों का गुच्छा मिला । उस गुच्छे की एक चाबी बैडरूम की दीवार में फिट एक छोटी-सी सेफ की थी । मैंने सेफ खोली । उसमें से मुझे बीस निगेटिव और कितने ही प्रिन्ट और मिलें । जाहिर था कि निशा का मुझे काफी अरसे तक किस्तों में ब्लैकमेल करने का इरादा था । मैंने निगेटिव और प्रिन्ट अपनी जेब में डाले, सेफ को दोबारा ताला लगाया, चाबियां वापिस यथास्थान रखीं और जाकर बाथरूम का दरवाजा बाहर से खोल दिया ।”
“यानी कि निशा को खबर ही नहीं हुई कि आपने क्या किया था ?”
“जाहिर है । मेरा काम हो गया था इसलिये मैं निशा के निकलने तक रुका भी नहीं । मैंने उसे आवाज देकर कहा कि मैं दोबारा वापिस आऊंगा और वहां से चला गया । मेरे जाने के थाड़ी देर बाद ही किसी समय निशा की हत्या हो गई ।”
“अगर आपने निशा की हत्या नहीं की तो आपके ख्याल से हत्या किसने की है ?”
“मैं पहले ही कह चुका हूं कि निशा की हत्या मुझे फंसाने के लिये मेरे उन दुश्मनों ने की है जो पहले दो बार मेरी हत्या का प्रयत्न कर चुके हैं । मेरे ख्याल से निशा के मुझे ब्लैकमेल करने के प्रयत्न का और उसकी हत्या का आपस में कोई रिश्ता नहीं है ।”
“एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही, लालाजी ।”
“क्या ?”
“निशा ने आपको धोखे में रखकर प्रेमकुमार से दोस्ती रखने की कोशिश की तो वह बात आपको इस हद तक नागवार गुजरी कि आपने उसकी अच्छी-खासी मरम्मत करवा दी, लेकिन जब निशा ने आपको ब्लैकमेल करने की कोशिश की तो आपने उसे इतने सस्ते में कैसे छोड़ दिया ? आपने उसकी भी कोई बुरी गत क्यों नहीं बनवाई ?”
“क्योंकि मैं अंजाम से डरता था । प्रेमकुमार की पिटाई होने से मेरा कुछ बिगड़ने वाला नहीं था । लेकिन निशा के साथ सख्ती से पेश आने से तस्वीरें प्रक्ट हो जाने का खतरा था जो कि मैं हरगिज नहीं चाहता था ।”
“यानी कि तस्वीरें आपके हाथ में वैसे ही आई जैसे आप ने बताया है । आपने निशा को शूट करने के बाद सेफ से तस्वीरें नहीं निकालीं ?”
“सवाल ही नहीं पैदा होता । मुझे क्या ख्वाब आना था कि निगेटिव और तस्वीरें सेफ में होंगी और सेफ की चाबी इतनी सहूलियत से मेरे हाथ में लग जायेगी ? मान लो मैं निशा की हत्या कर देता और तस्वीर फ्लैट में से न निकलतीं तो फिर मेरा क्या हाल होता ?”
“आप मुझसे क्या मदद चाहते हैं ?”
“मैं चाहता हूं तुम निशा के हत्यारे का पता लगाओ । वर्तमान स्थिति में मेरे यह कह देने भर से, कि मैं हत्यारा नहीं हूं, काम नहीं चलेगा । देर-सवेर पुलिस मुझे गिरफ्तार करके मुझ पर केस जरूर चलायेगी । मैं चाहता हूं ऐसी नौबत आने से पहले तुम हत्यारे को ढूंढ निकालो । काम जल्दी हो, इसलिये मैंने अपने प्राइवेट डिटेक्टिव दोस्त देशपाण्डे को भी दिल्ली से बुला लिया है । मुझे पूरा विश्वास है तुम दोनों मिलकर काम करोगे तो हत्यारे को जरूर खोज निकालोगे ।”
“मुझे किसी के साथ काम करने की आदत नहीं ।”
“देशपाण्डे बहुत अच्छा आदमी है । मुझे विश्वास है तुम्हें उससे मिलकर खुशी होगी ।”
“वह ट्रेन्ड डिटेक्टिव है । वह खुद आपका काम नहीं कर सकता ?”
“शायद कर सकता हो लेकिन मेर पास वक्त कम है और फिर एक दिमाग से दो दिमाग हमेशा ही बेहतर होते हैं ।”
“आपको पूरा विश्वास है कि” - सुनील ने बात बदली - “जो निगेटिव और तस्वीरें आप निशा के फ्लैट से निकालकर लाये हैं, उनके अलावा किसी और के पास कोई निगेटिव या तस्वीर नहीं है ?”
“और किसके पास ?”
“प्रेमकुमार के पास ! आपके साथ तस्वीरों में चित्रित तीन लड़कियों के पास ! अगर वे तीन लड़कियां अपनी इज्जत-बेइज्जती का ख्याल न करें तो वे भी तो आपको ब्लैकमेल कर सकती हैं ?”
“प्रेमकुमार का तो मुझे ख्याल नहीं आया था लेकिन लड़कियों के बारे में मैंने सोचा था । देशपाण्डे ने उन्हें बहुत तलाश करने की कोशिश की थी लेकिन कामयाब नहीं हो सका था ।”
“मैं वे तस्वीरें देखना चाहता हूं ।”
“जरूरत नहीं” - लाला मंगतराम तीव्र विरोधपूर्ण स्वर में बोला - “उन तस्वीरों का निशा की हत्या से कोई रिश्ता नहीं है ।”
“मुझे भरोसा नहीं । रिश्ता हो सकता है । शायद निशा के सहयोगी ने इसलिये निशा की हत्या कर दी हो कि उसने हाथ से तस्वीरें क्यों निकल जाने दीं ।”
“लेकिन निशा की हत्या तो मेरी रिवाल्वर से हुई है ।”
“आपको कैसे मालूम ? अभी आपकी रिवाल्वर बरामद कहां हुई है ? आपकी रिवाल्वर गायब है, निशा गोली की शिकार हुई है इसलिये आप कूद कर इस नतीजे पर पहुंच गये कि गोली आपकी रिवाल्वर से चलाई गई है । निशा की मौत के बारे में आपने पहले से ही एक निश्चित थ्योरी बनाई हुई है कि उसकी हत्या आपको फंसाने के लिये की गई है जो कि कतई जरूरी नहीं ।”
“तुम ठीक कह रहे हो ।”
“तो फिर तस्वीरें दिखाइये ।”
लाला मंगत राम फिर हिचकिचाया ।
सुनील स्थिर बैठा रहा ।
अन्त में लाला मंगत राम के मुंह से एक गहरी सांस निकली और उसने चाबी लगाकर मेज का एक दराज खोला उसने एक लिफाफा निकालकर सुनील के सामने फेंक दिया और अपनी रिवाल्वर चेयर को इस प्रकार घुमाया कि उसकी सुनील की ओर पीठ हो गई ।
सुनील ने लिफाफा खोला ।
तस्वीरें वाकई बहुत भयंकर थी । तस्वीरों में चित्रित लाला मंगल राम और तीन नौजवान लड़कियां जो शैतानी हरकतें कर रही थीं, वह कल्पना से परे की चीज थी ।
सुनील के मुंह से सीटी निकल गई ।
“मेरे बच्चे हैं ।” - लाला मंगत राम बिना सुनील की ओर मुंह घुमाये बोला - “बच्चों के आगे बच्चे हैं । क्या मेरी स्थिति का आदमी यह बर्दाश्त कर सकता है कि किसी भी गैरआदमी की इन पर निगाह पड़े ?”
“शुक्र मनाइये कि इसमें से कोई तस्वीरें पुलिस के हाथ नहीं पड़ गई हैं । तब आप सात जन्म पुलिस को यह विश्वास नहीं दिला पाते कि इन तस्वीरों की खातिर आपने निशा की हत्या नहीं की ।”
“मैं समझता हूं ।”
“एक बात और गारण्टी के साथ कही जा सकती है कि आपका जो दुश्मन आपकी हत्या के प्रयत्न कर रहा है, वही ब्लैकमेलर नहीं है ।”
“कैसे ?”
“जाहिर है । ब्लैकमेलर के लिए तो आप सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की हैसियत रखते हैं । वह आपकी हत्या कर देगा तो उसे सोने का अंडा कहां से हासिल होगा ?”
“तुम ठीक कह रहे हो ।”
“प्रेमकुमार की पिटाई आपने किससे करवाई थी ?”
“उस घटना का मौजूदा सिलसिले से क्या रिश्ता है ?”
“शायद कोई रिश्ता निकल आये ।”
“उस आदमी का नाम रणधीर है । वह धर्मपेर की 1472 नम्बर इमारत में रहता है और उस इलाके का मशहूर दादा है ।”
“आप उसे कैसे जानते हैं ?”
“बस, जानता हूं । कभी-कभी ऐसे लोगों की जानकारी बड़ी फायदेमन्द साबित होती है ।”
“रणधीर काम क्या करता है ?”
“दादागिरी करता है । इसे तुम कोई छोटा काम मानते हो ?”
“तस्वीरों में जो तीन लड़कियां आपके साथ हैं, उनके नाम क्या हैं ?”
“सोना, नैन्सी और कंचन ।”
“कौन-कौन हैं ?”
बड़े अनिच्छापूर्ण ढंग से लाला मंगत राम ने कुर्सी घुमाई ।
सुनील ने एक साफ-सी तस्वीर उसके सामने कर दी ।
“यह सोना है, यह नैन्सी है” - लाला मंगत राम एक-एक सूरत की ओर संकेत करता हुआ बोला - “यह कंचन है ।”
“देशपाण्ड इनके बारे में कुछ पता नहीं लगा पाया ?”
“देशपाण्डे को इनकी हवा भी नहीं मिली । वह हर सम्भावित स्थान पर इनके बारे में पूछताछ कर चुका है । मुझे तो शक है कि कहीं ये राजनगर से बाहर से न बुलाई गई हों ।”
“मैं इनमें से एक तस्वीर चाहता हूं ।”
“हरगिज नहीं ।”
“लेकिन यह जरूरी है ।”
“कितना भी जरूरी क्यों न हो । यह नहीं होगा ।”
“आपको मुझ पर भरोसा नहीं ?”
“बहस मत करो । मैं तो ये तस्वीरें तुम्हें दिखाना भी नहीं चाहता था । तुम्हारी जिद की वजह से ही मैंने इन्हें दिखाया है लेकिन दूंगा मैं हरगिज नहीं ।”
“अच्छा, ऐसा कीजिये, एक कैंची लेकर किसी एक निगेटिव में से आप अपनी सूरत काटकर अलग कर दीजिये और बचा हुआ निगेटिव मुझे दे दीजिये । इसमें तो आपको एतराज नहीं ?”
लाला मंगत राम के होंठ सिकुड़ गये ।
“मेरी दिलचस्पी लड़कियों की सूरत में है, आपकी सूरत में नहीं ।”
“ठीक है ।”
लाला मंगत राम ने एक निगेटिव में से अपनी सूरत काट दी । बचा हुआ निगेटिव उसने सुनील के हवाले कर दिया ।
“और मेरी राय मानिये” - सुनील बोला - “इन निगेटिवों को और तस्वीरों को फौरन नष्ट कर दीजिये । यह रखने लायक चीज नहीं ।”
“कर दूंगा ।”
सुनील ने निगेटिव और तस्वीरें फिर लिफाफे में डाली और लिफाफा वापिस लाला मंगत राम को सांप दिया ।
लाल मंगत राम ने लिफाफा पहले दराज में रखकर उसमें ताला लगा दिया । उसने एक अन्य दराज से एक मोटी चैक बुक निकाली । उसने कलमदान में से कलम उठाया और उसके चैक लिखने में सिद्धहस्त हाथों ने मशीन गन की तेजी से चैक पर एक रकम भरी और अपने हस्ताक्षर घसीट दिये । एक झटके से उशने चैक को चैक बुक में से फाड़ा और उसे यूं मेज पर सुनील के सामने उछाल दिया जिसे वह किसी फकीर की झोली में दस पैसे का सिक्का डाल रहा हो ।
सुनील ने देखा वह पांच हजार रुपये का चैक था ।
लाला मंगत राम ने चैक लिखकर सलीके से सुनील के हाथ में दिया होता तो शायद वह चैक हरगिज स्वीकार नहीं करता । उस रकम को उस स्थति में स्वीकार करने की न कोई वजह थी और न जरूरत और न ही ऐसी रकम को स्वीकार करना सुनील के चरित्र से मेल खाता था ।
लेकिन तब सुनील ने भावहीन ढंग से चैक को उठाया, उसे बीच से मोड़कर तह किया और बिना धन्यवाद के एक शब्द भी कहे चैक जेब में रख दिया ।
“यह पहली किस्त है, आखिरी नहीं ।” - लाला मंगत राम बोला ।
“मुझे भी यही उम्मीद है ।” - सुनील सरल स्वर में बोला ।
लाला मंगत राम कसमसाया और चुप हो गया ।
“अब मैं एक अनिवार्य शर्त आपके सामने रखना चाहता हूं ।”
“क्या ?” - लाला मंगत राम सशंक स्वर में बोला ।
“आप इस केस से सम्बन्धित किसी भी प्रकार का कोई भी वक्तव्य ‘ब्लास्ट’ से पहले किसी अन्य अखबार को नहीं देंगे ।”
“मैं कोई वक्तव्य दूंगा ही नहीं ।”
“अगर दें तो आप यह बात ध्यान में रखेंगें ।”
“आल राइट ।”
उसी क्षण मेज पर रखे चार टेलीफोनों में से एक में हल्का-सा बजर बजा ।
लाला मंगत राम ने उस टेलीफोन का रिसीवर उठाकर कान से लगा लिया । उसने एक क्षण दूसरी ओर की आवाज सुनील और बोला - “भेजो ।”
“देशपाण्डे आ रहा है ।” - लाला मंगत राम रिसीवर क्रेडिल पर रखता हुआ बोला ।
उसी क्षण देशपाण्डे ने भीतर कदम रखा ।
वह एक लगभग चालीस साल का विशालकाय आदमी था । उसके भारी चेहरे पर चेचक के गहरे दाग थे जिसकी वजह से उसके चेहरे में एक विचित्र प्रकार की कठोरता का समावेश हो गया था । उसके जबड़े मजबूत थे, आंखें तीखी थीं और बालों में कनपटियों के पास सफेदी झलक रही थी, उसके कोट के बटन बन्द थे लेकिन सुनील की तजुर्बेकार निगाहों से शोल्डर होल्स्टर में रिवाल्वर की मौजूदगी छुपी न रही ।
लाला मंगत राम ने दोनों का परिचय करवाया ।
देशपाण्डे के होंठ एक कनपटी से दूसरी कनपटी तक मुस्कराहट की सूरत में फैल गये । उसने बड़ी गर्मजोशी से सुनील से हाथ मिलाया ।
“बहुत तारीफ सुनी है, साहब, आपकी ।” - देशपाण्डे बोला ।
सुनील मुस्कराया । चेहरे की विचित्र-सी कठोरता के बावजूद भी देशपाण्डे बहुत मिलनसार आदमी लग रहा था ।
“मैं तो खुदा का शुक्रगुजार हूं कि आपका अखबार दिल्ली से नहीं निकलता और मेरी एस डिटेक्टिव एजेन्सी राजनगर में नहीं है वर्ना मेरा बिजनेस चौपट करने के लिए तो आप अकेले ही काफी थे ।”
और उसने जोर से अट्टहास किया ।
“लालाजी” - देशपाण्डे लाला मंगत राम से सम्बोधित हुआ - “आपने एकदम सही आदमी चुना है । अब कोई वजह ही नहीं है कि आपका काम न हो ।”
“लेकिन जल्दी । मैं जल्दी कोई नतीजा देखना चाहता हूं ।” - लाला मंगत राम बोला ।
“अब तो देर की कोई वजह ही नहीं रह गई । क्यों सुनील साहब ?”
सुनील मुस्कराया ।
“मैं इजाजत चाहता हूं ।” - वह उठता हुआ बोला ।
“मैं भी आपके साथ चलता हूं ।” - देशपाण्डे बोला - “मैं तो यहां आपसे मुलाकात की खातिर ही आया था । आइये चलते हैं । लालाजी, मैं आपसे फिर मिलूंगा ।”
सुनील और देशपाण्डे लाल मंगत राम का अभिवादन करके उसके आफिस से बाहर निकल आये ।
“आप ठहरे कहां हैं ?” - बाहर आकर सुनील ने देशपाण्डे से पूछा ।
“फिलहाल तो मैं मंगत राम इन्डस्ट्रीज के गैस्टहाउस में ठहरा हुआ हूं ।” - देशपाण्डे बोला - “लेकिन फौरन वहां से शिफ्ट करना चाहता हूं । बड़ी गैरमुनासिब जगह है । मुझे सूट नहीं करती । अपने घर के आसपास कोई अच्छा-सा होटल बताइये, साहब, ताकि मेल-मुलाकात में कोई दिक्कत न हो ।”
“जहां मैं रहता हूं, उस इलाके में तो अच्छा-बुरा कैसा भी कोई होटल नहीं है ।”
“ओह !” - देशपाण्डे निराश स्वर में बोला - “और आपका दौलतखाना है कहां ?”
“बैंक स्ट्रीट में एक छोटा-सा फ्लैट है मेरे पास ।”
“अगर बेतकल्लुफी के लिए माफ करें तो एक सवाल पूछूं ?”
“दो पूछिये ।”
“क्या आपके छोटे से फ्लैट में मुझ जैसे बड़े से आदमी की समाई हो सकती है ?”
“बिल्कुल हो सकती है, साहब । जब चाहें तशरीफ ले आइये ।”
“जब हमने इकट्ठे काम करना है तो यह जरूरी है कि हम वक्ती तौर पर इकट्ठे रहें । अगर आप अपने फ्लैट में मुझे शरण देने में कोई असुविधा का अनुभव करते हों तो ऐसा कीजिये कि कुछ दिनों के लिए आप भी अपने फ्लैट से किनारा कीजिये और मेरे साथ चलकर किसी होटल में रहिये ।”
“उसकी जरूरत नहीं । आप बखुशी मेरे फ्लैट में तशरीफ ला सकते हैं ।”
“थैंक्यू । थैंक्यू वेरी मच । तो फिर मैं गैस्टहाउस से अपना तामझाम उठा लाऊं ?”
“शौक से ।”
“आप मुझे कहां मिलेंगे ?”
“आप कितने देर में वापस आयेंगे ?”
“एक घण्टा लग जाएगा ।”
“ठीक है । आप फ्लैट पर आ जाइये । बैंक स्ट्रीट की तीन नम्बर इमारत की दूसरी मंजिल पर मेरा फ्लैट है ।”
“आलराइट । मैं एक घण्टे बाद हाजिर हो जाऊंगा ।”
देशपाण्डे सुनील से अलग हो गया ।
सुनील अपनी साढे सात हार्स पावर के शक्तिशाली इंजल वाली मोटरसाइकिल पर सवार हुआ और ‘ब्लास्ट’ के आफिस में पहुंचा ।
आफिस में उसने अर्जुन को पकड़ा ।
अर्जुन ‘ब्लास्ट’ का रिपोर्टर था, सिद्धहस्त फोटोग्राफर था और सुनील का चमचा था ।
“गुरु अर्जुनदेव जी” - सुनील उसके सामने लाला मंगत राम से लिया तीन चौथाई निगेटिव रखता हुआ बोला - “इस निगेटिव में तीन नंगी मेमसाहबों का अक्स दिखाई दे रहा है । मुझे इन तीनों की अलग-अलग तस्वीरें चाहिये लेकिन सिर्फ चेहरों की । जिस्म की नहीं । समझे ?”
अर्जुन ने निगेटिव को सिरे से पकड़कर रोशनी की ओर उठाया और उसे गौर से देखता हुआ बोला - “लेकिन गुरुजी, चेहरों से ज्यादा खूबसूरत तो जिस्म हैं ।”
“शटअप !”
“या फिर अगर आपकी इजाजत हो तो मैं ऐसा कर लूं कि मैं चेहरों के प्रिन्ट भी बना लूं और जिस्मों के भी । चेहरे आप रख लेना, जिस्म मैं रख लूंगा ।”
सुनील ने उसे घूरकर देखा ।
“ओके । ओके” - अर्जुन सकपकाकर बोला - “लेकिन कम से कम इतना तो बता दो कि ये हैं कौन ?”
“यही जानने के लिए तो मैं चेहरों के प्रिन्ट बनवा रहा हूं ।”
“यानी कि आपको भी नहीं मालूम ?”
“नहीं ।”
“लेकिन गुरुजी, जब मालूम हो जाए तो कम से कम एक से मेरी दोस्ती जरूर करवा देना ।”
“मैं तीनों से करवा दूंगा ।”
“ओह, थैंक्यू गुरुजी, खुदा आपको जुड़वां बीवियां दे ।”
“गधे, जुड़वा बच्चे कहा जाता है ।”
“मालूम है । वह उनको कहा जाता है जिनकी बीवी हो । आपकी बीवी कहां है ?”
“प्रिन्ट बनने में कितनी देर लगेगी ?”
“लगभग दो घण्टे ।”
“आलराइट । मैं दो घण्टे बाद आऊंगा ।”
सुनील ‘ब्लास्ट’ की इमारत से बाहर निकल आया और फिर मोटरसाइकिल पर सवार हो गया ।
वह बैंक स्ट्रीट की ओर उड़ चला ।
***
सुनील के फ्लैट पर पहुंचने के लगभग पांच मिनट बाद देशपाण्डे भी वहां पहुंच गया । सामान के नाम पर वह एक ब्रीफकेस और एक चमड़े की अटैची लाया था ।
देशपाण्डे ने फ्लैट देखा फिर सुनील को देखा और फिर निहायत संजीदगी से पूछा - “दोस्त, कोई असुविधा तो नहीं होगी ?”
“कोई असुविधा नहीं होगी” - सुनील सहज स्वर से बोला - “अगर असुविधा होती तो मैं आपको यहां बुलाता ही क्यों ?”
“आपने कहां बुलाया है ! वह तो मैं ही गले पड़ गया आपके । और आपकी शराफत है कि आपने मुझे गले पड़ जाने दिया ।”
“ऐसी कोई बात नहीं है, देशपाण्डे साहब । मुझे वाकई आपके यहां रहने से कोई एतराज या दिक्कत नहीं है । अगर मुझे कोई दिक्कत होती तो मैं बड़े आराम से आपको टाल सकता था । इसलिए तकल्लुफ छोड़िए और शौक से यहां रहिए ।”
“ओह, थैंक्यू आल ओवर अगेन ।”
सुनील ने एक सिगरेट सुलगा लिया और अपना लक्की स्ट्राइक का पैकेट देशपाण्डे की ओर बढा दिया ।
“नो, थैंक्स” - देशपाण्डे बोला - “मैं सिगरेट नहीं पीता ।”
“बड़ा अच्छा करते हैं ।”
“इसमें कोई तारीफ की बात नहीं है, साहब, क्योंकि मैं सिगरेट पीने से कहीं ज्यादा बुरे काम करता हूं ।”
सुनील मुस्कराया ।
“आपका टेलीविजन शानदार है” - देशपाण्डे ड्राइंगरूम के एक कोने में पड़े टेलीविजन की ओर आकर्षित हुआ - “बाहर का मालूम होता है ?”
“जी हां, मैं इसे जर्मनी से लाया था ।”
“यानी कि आप फारेन भी हो आये हैं ?”
“जी हां । कई बार । कई जगह ।”
“खुशकिस्मत हो साहब ।”
सुनील ने सिगरेट का एक लम्ब कश लगाया ।
“आगे क्या प्रोग्राम है ?” - देशपाण्डे ने पूछा ।
“सबसे पहला और जरूरी काम तो है प्रेमकुमार की तलाश ।” - सुनील गम्भीर स्वर से बोला ।
“आपको निशा की हत्या में उसका हाथ होने की सम्भावना दिखाई देती है ?”
“अभी इस स्टेज पर कुछ नहीं कहा जा सकता । उसका हत्या में हाथ हो सकता है । उसका ब्लैकमेल में हाथ हो सकता है । उसका दोनों में हाथ हो सकता है और यह भी हो सकता है कि उसका सारे सिलसिले से कोई वास्ता ही न हो । सम्भावना तो इस बात की भी बड़ी प्रबल है कि रणधीर द्वारा हुई पिटाई से हस्पताल पहुंचने और ठीक होकर वहां से निकलने के बाद वह इस हद तक डर गया हो कि शहर ही छोड़कर चला गया हो । निशा से तो वह दोबारा मिला नहीं । अगर मिला होता तो लाला मंगत राम को उसकी जरूर खबर हो जाती ।”
“जरूरी नहीं है ।”
“पहली बार भी तो खबर हो ही गई थी ।”
“शायद पिटने के बाद वह सावधान हो गया हो ।”
“लाल मंगत राम ने प्रेमकुमार का जैसा चरित्र बयान किया हे उसके आधार पर मुझे यह सम्भव नहीं लगता कि उसने निशा के फ्लैट में कदम रखने का दोबारा हौसला किया हो ।”
“फिर उसे निशा की हत्या का ख्याल कैसे आया जब कि दोनों एक-दूसरे से मुहब्बत भी करते थे ?”
“मुझे नहीं पता उन दोनों में कैसी मुहब्बत थी । यानी कि मुहब्बत में दोनों में से किसी की या दोनों की गर्ज थी या सच्ची मुहब्बत थी । अगर लाला मंगत राम की थ्योरी पर विश्वास किया जाये तो यह सम्भव हो सकता है कि प्रेमकुमार ने लाला को फंसाने के लिए निशा की हत्या की हो ।”
“फिर तो यह भी मुमकिन है कि लाला की हत्या के दोनों प्रयत्नों के पीछे प्रेमकुमार का हाथ हो ।”
“बिल्कुल मुमकिन है ।”
“प्रेमकुमार को तलाश कैसे करेंगे आप ?”
“दो साधन हैं । एक तो रणधीर और दूसरे शायद स्टार होटल से कुछ मालूम हो सके जहां कि गायब होने से पहले प्रेमकुमार रहता था ।”
“पहले कहां चलने का ख्याल है ?”
“पहले रणधीर को टटोलते हैं ।”
“अभी चलें ?”
“बिल्कुल ।”
दोनों फ्लैट से बाहर निकल आये ।
इमारत से बाहर निकलकर सुनील अपनी मोटरसाइकिल की ओर बढा ।
“मैं कार लाया हूं ।” - देशपाण्डे बोला ।
“कार !” - सुनील बोला - “आप दिल्ली से कार पर आए हैं ?”
“नहीं साहब । दिल्ली से तो हवाई जहाज पर ही आया था । कार मैंने लाला मंगत राम से हासिल की है । लाला को तो कोई फर्क पड़ा नहीं, मेरी मूवमेंट आसान हो गई ।”
दोनों कार में सवार हुए ।
देशपाण्डे ने कार ड्राइव करनी आरम्भ की ।
“रास्ता बताते जाइयेगा ।” - वह बोला ।
सुनील ने सहमतिसूचक ढंग से सिर हिलाया ।
कार विभिन्न सड़कों से होती हुई धर्मपुरे की ओर बढ चली ।
रास्ते में ‘ब्लास्ट’ के आफिस के सामने सुनील ने कार रुकवाई । वह भीतर जाकर अर्जुन से तस्वीरें ले आया । अर्जुन ने सोना, नैन्सी और कंचन नाम की उन तीन नंगी मेमसाहबों के चेहरों के पोस्टकार्ड साइज के बड़े साफ-सुथरे प्रिन्ट बनाये थे ।
सुनील ने ये प्रिन्ट देशपाण्डे को भी दिखाये ।
“आपने इन लड़कियों को तलाश करने का कौन-सा तरीका अपनाया था ?” - सुनील ने पूछा ।
“सुनील साहब” - देशपाण्डे खेदपूर्ण स्वर में बोला - “मैंने तो सिर्फ पूछताछ से ही इन्हें तलाश करने की कोशिश की थी क्योंकि लाला ने गन्दी तस्वीरें मुझे तो दिखाई नहीं थीं और न ही मैंने जिद की थी । मैंने तो नाइट क्लबों में, ऐसे रेस्टोरेन्टों में, जहां कैबरे डांस होते हैं, ऐसे होटलों में जहां विदेशी पर्यटकों को बिस्तर गर्म करने के लिए हाई क्लास वेश्यायें सप्लाई की जाती हैं, डांस स्कूलों में, ऐसे स्थानों में जहां ढंके-छुपे ढंग से चकले चलाये जाते हैं, पूछताछ ही की थी लेकिन कहीं भी कोई किसी सोना, नैन्सी या कंचन नाम की लड़की को नहीं जानता था । मैं शत-प्रतिशत तो नहीं लेकिन पिच्चानवे प्रतिशत गारन्टी जरूर करता हूं कि इस नाम की कोई ऐसी लड़की राजनगर में नहीं है जो पांच सौ रुपए के लिए किसी रईस आदमी का बिस्तर गर्म करने का काम करती हो । मैंने बड़े विस्तृत ढंग से, बड़ी तरतीब से, इन लड़कियों की तलाश जारी की थी लेकिन किसी भी स्थान का कोई वेटर, कोई चपरासी, कोई नौकर, कोई दलाल इन नामों की लड़कियों को नहीं जानता था । मुझे ऐसी किन्हीं लड़कियों की हवा तक नहीं मिली जो, बकौल लाल मंगत राम, पुरुष की यौन तुष्टि को आर्ट समझती हों, जिन्हें सैक्स के मामले में पुरुष की सन्तुष्टि करने में महारत हासिल हो और जो बिस्तर पर ऐसी हरकतें करती हों कि पुरुष पागल हो जाता हो । शहर में ऐसा ग्रुप छुपा नहीं रह सकता, मिस्टर, और फिर मैंने तो भुस के ढेर में से सुई तलाश करने जैसी मेहनत और ईमानदारी से उन्हें तलाश करने की कोशिश की थी ।”
सुनील चुप रहा ।
धर्मपुर में पहुंचकर सुनील ने देशपाण्डे को एक स्थान पर कार रोकने को कहा और फिर वे कार से उतरकर पैदल आगे बढे ।
1472 नम्बर इमारत बीच बाजार में थी । उस इमारत के नीचे दुकानें थीं और ऊपर की दो मंजिलों में परिवार रहते थे । पूछने पर मालूम हुआ कि रणधीर तीसरी मंजिल पर रहता था ।
वे दुकानों की बगल से गुजरती हुई पतली-सी सीढियों से होते हुए ऊपर पहुंचे ।
संयोगवश तीसरी मंजिल पर एक ही पोर्शन था ।
और रणधीर भीतर मौजूद था ।
दरवाजा खुला ।
एक लम्बा-चौड़ा, हट्टा-कट्टा और सूरत से ही बदमाश लगने वाला आदमी दरवाजे पर प्रकट हुआ । उसने प्रश्नसूचक नेत्रों से दोनों को देखा ।
“फरमाइये ।” - वह खरखराती हुई आवाज से बोला ।
“हमें रणधीर से मिलना है ।” - सुनील बोला ।
“क्यों ?”
“यह तो हम उसी को बतायेंगे ।”
“मेरा नाम रणधीर है ।”
“भीतर चलिए, आपसे जरा बात करनी है ।”
रणधीर एक क्षण हिचकिचाया और फिर दरवाजे से हट गया ।
वे दोनों भीतर प्रविष्ट हुए ।
वह एक बड़ा-सा बैठकनुमा कमरा था, और यह देखकर उन्हें बड़ी हैरानी हुई कि बड़े करीने से सजा हुआ था ।
रणधीर एक सोफे पर बैठ गया । उसने अपने सामने पड़े एक अन्य सोफे पर उन्हें बैठने का संकेत किया ।
दोनों बैठ गए । एक बार दोनों की निगाहें मिलीं, फिर सुनील ने गला साफ किया और बोला - “मेरा नाम सुनील है, मैं ‘ब्लास्ट’ का रिपोर्टर हूं ।
रणधीर ने प्रश्नसूचक नेत्रों से देशपाण्डे की ओर देखा ।
“ये मेरे दोस्त हैं, मिस्टर देशपाण्डे ।” - सुनील बोला ।
“यहां कैसे आये आप लोग ?” - रणधीर बोला ।
“हमें लाला मंगत राम ने तुम्हारे बारे में बताया था ।”
“कौन लाला मंगत राम ?”
“तुम लाला मंगत राम को नहीं जानते ?”
“मतलब की बात करो” - रणधीर तनिक चिड़चिड़े स्वर में बोला - “मुझे पहेलियां मत बुझाओ ।”
एक क्षण के लिए सुनील और देशपाण्डे की निगाहें मिली देशपाण्डे के नेत्र कठोर हो उठे । सुनील ने उसे शान्त रहने का संकेत किया और फिर रणधीर की ओर आकर्षित हुआ - “लाला मंगत राम को तो नगर का बच्चा-बच्चा जानता है । वह वैसे ही बहुत प्रसिद्ध आदमी है । शंकर राड के मनोहर मैंशन में हुई निशा नामक लड़की की हत्या के बद से तो बच्चे-बच्चे की जुबान पर उनका नाम आ गया है ।”
“मैंने लाला मंगत राम के बारे में अखबार में पढा है लेकिन मेरा उससे क्या वास्ता ?”
“तुम उसके लिए काम कर चुके हो ।”
“कैसा काम ?”
“कुछ अरसा पहले लाला मंगत राम के निर्देश पर तुमने प्रेमकुमार नाम के एक नौजवान को इस बुरी तरह पीटा था कि वह दस दिन अस्पताल में पड़ा रहा था ।”
रणधीर के नेत्र सिकुड़ गये ।
“यह बात तुम्हें लाला ने बताई है ?” - वह बोला ।
“और कौन बतायेगा ?”
“तुम्हारा प्रेम कुमार से क्या वास्ता है ?”
“मुझे उसकी तलाश है । मुझे लाला ने बताया है कि पहले वह रौनक बाजार के स्टार होटल में रहता था लेकिन तुम्हारे द्वारा पीटे जाने के बाद जब वह अस्पताल से निकला था तो उसने स्टार होटल से अपना बोरिया-बिस्तर उठा लिया था और फिर पता नहीं कहां चला गया था । मैं तुम्हारे पास इस उम्मीद में आया हूं कि शायद तुम्हें प्रेमकुमार का वर्तमान पता मालूम हो ।”
“तुम्हें प्रेमकुमार की तलाश क्यों है ?”
“क्योंकि प्रेमकुमार मेरा भाई है” - एकाएक देशपाण्डे बोल पड़ा - “जब से तुमने उसे पीटा है मुझे उसकी खबर नहीं मिली है । मुझे अभी मालूम हुआ है कि तुमने मेरे भाई को पीट-पीटकर हास्पीटल केस बना दिया था । अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम मुझे उसका पता बता दो वर्ना मैं तुम्हारी हड्डी-पसली अलग कर दूंगा ।”
सुनील हैरानी से देशपाण्डे का मुंह देखने लगा । देशपाण्डे के कठोर चेहरे पर क्रोध के वास्तविक भाव परिलक्षित हो रहे थे ।
रणधीर के चेहरे पर ऐसे भाव आये जैसे उसे अपने कानों पर विश्वास न हुआ हो ।
“क्या कहा तुमने ?” - वह कहर-भरी आवाज में बोला ।
“मैंने कहा है” - देशपाण्डे दांत भींचकर बोला - “कि मुझे मेरे भाई का पता बता दो वर्ना मैं तुम्हारी..”
“हरामजादे, तेरी यह मजाल !” - रणधीर चाबी लगे खिलौने की तरह अपने स्थान से उछला और देशपाण्डे पर झपटा । लेकिन तब तक देशपाण्डे भी अपने पैरों पर खड़ा हो चुका था और उसके शोल्डर होल्स्टर में रखी रिवाल्वर निकलकर उसके दांये हाथ में पहुंच चुकी थी ।
रणधीर ठिठक गया । उसकी विचलित निगाहें अपनी ओर तनी रिवाल्वर पर टिक गई ।
सब कुछ पलक झपकते ही हो गया था । सुनील भी उठ खड़ा हुआ था और हक्का-बक्का-सा कभी रणधीर और कभी देशपाण्डे की ओर देख रहा था ।
“देशपाण्डे !” - एकाएक वह तीव्र स्वर में बोला ।
“तुम चुप रहो” - देशपाण्डे डपटकर बोला - “मुझे इस आदमी से निपटने दो ।”
“मैं तुम्हारी चमड़ी उधेड़कर रख दूंगा ।” - रणधीर सांप की तरह फुफकारा ।
“मैं तुम्हें इस काबिल छोड़ूंगा तब न” - देशपाण्डे बोला - “प्रेमकुमार का पता बताओ वर्ना...”
“वर्ना क्या करोगे ?”
“मैं तुम्हें भूनकर रख दूंगा ।”
“ऐसी-तैसी में घुस गया तुम्हारा प्रेमकुमार और साथ में तुम भी घुस जाओ वहीं । हरामजादे, तेरी यह हिम्मत ? रणधीर के घर में घुसकर उसे रिवाल्वर दिखाता है !”
“मैं कहता हूं बात मत बढाओ, रणधीर !” - और देशपाण्डे की उंगली रिवाल्वर के घोड़े पर कस गई ।
“बात तो बढ चुकी । तूम मुझे रिवाल्वर दिखाता है ? मैं तेरा पुर्जा-पुर्जा उड़ा दूंगा । अगर अपने बाप की औलाद है तो चला गोली ! चला गोली, सूअर के बच्चे ।”
और रणधीर सीना तानकर उसके सामने खड़ा हो गया देशपाण्डे की रिवाल्वर ने आग उगली । गोली सनसनाती हुई रणधीर के दायें कंधे से फुट परे से गुजर गई और सोफे की पीठ में धंस गई ।
सुनील सन्नाटे में आ गया । सुनील की समझ में नहीं आ रहा था कि देशपाण्डे का दिमाग खराब हो गया था या उसके काम करने का तरीका था ही ऐसा भूकम्पकारी ।
फायर का रणधीर पर तनिक भी प्रभाव नहीं हुआ । उसने एक जोर का अट्टहास किया और फिर यूं दृढ कदमों से देशपाण्डे की ओर बढा जैसे वह रिवाल्वर उसके हाथ से छीन लेने का इरादा रखता हो ।
देशपाण्डे दो कदम पीछे हट गया और चिल्लाकर बोला - “रुक जाओ वर्ना शूट कर दूंगा ।”
“अबे तू क्या शूट करेगा ? तेरी शूटिंग का नमूना तो देख लिया मैंने ।”
देशपाण्डे ने व्याकुल नेत्रों से सुनील की ओर देखा ।
“रणधीर !” - सुनील व्यग्र स्वर में बोला - “जरा मेरी बात सुनो । प्लीज !”
“अबे, तेरी क्या बात सुनूं, छोकरे ! तू भी तो इसी का साथी है ।”
“मैं इसका साथी हूं इसीलिए मैं इसके कृत्य से शर्मिन्दा हूं और जो कुछ हुआ उसके लिए मैं तुमसे माफी मांगता हूं ।”
रणधीर ठिठक गया ।
“देशपाण्डे !” - सुनील कठोर स्वर में बोला - “रिवाल्वर जेब में रखो ।”
देशपाण्डे ने एक बार आशंकित नेत्रों से रणधीर की ओर देखा और फिर झिझकते हुए रिवाल्वर वापिस अपने शोल्डर होल्स्टर में रख ली ।
“मैं अपने दोस्त की नादानी के लिये फिर से माफी मांगता हूं” - सुनील बोला - “तुम बैठो ।”
रणधीर बैठ गया । देशपाण्डे को उसने यूं नजरअन्दाज कर दिया जैसे वह वहां था ही नहीं ।
“हम दोनों लाला मंगत राम के लिये काम कर रहे हैं” - सुनील नम्र स्वर में बोला - “मैं लाला मंगत राम के हित के लिये तुमसे मदद की प्रार्थना करता हूं ।”
“तुम मुझसे मदद मांगने आए हो या मेरी आंख में डंडा करने आये हो ?” - रणधीर क्रोधित किन्तु सुसंयत स्वर में बोला ।
“देशपाण्डे से गलती हो गई । वह तुम्हें कोई और आदमी समझा था ।” - सुनील ने दशपाण्डे की ओर देखा ।
“आई एम सॉरी !” - देशपाण्डे पराजित स्वर में बोला ।
“प्रेमकुमार की तलाश क्यों है तुम्हें ?” - रणधीर सुनील की ओर घूमा ।
“अखबार में तुमने यह तो पढा ही होगा कि निशा नाम की एक लड़की की हत्या हो गई है । यह वही निशा है जो लाला मंगत राम की रखैल है और लाला के कहने पर जिसके प्रेमकुमार नाम के एक यार की तुमने ठुकाई की थी । निशा की हत्या का इल्जाम लाला पर आ रहा है लेकिन लाला अपने आपको निर्दोष बताता है । हम दोनों को लाला की निर्दोषता प्रमाणित करने का काम सौंपा गया है । मुझे सन्देह है कि शायद निशा की हत्या प्रेमकुमार ने लाला को फंसाने के लिये की हो । अपने इसी सन्देह की पुष्टि करने के लिए मैं प्रेमकुमार की तलाश कर रहा हूं ।”
रणधीर चुप रहा ।
“लाला मंगत राम से तुम्हारा सम्पर्क तो रहा ही है । शायद आगे भी रहेगा । तुम यह समझो कि तुम हमारी नहीं, लाला की मदद कर रहे हो ।”
“लेकिन मैं लाला की मदद भी क्यों करूं ?”
“क्योंकि तुमने पहले भी लाला की मदद की थी ।”
“नावां लेकर, मुफ्त में नहीं ।”
“नावां इस बार भी मिल सकता है ।”
रणधीर ने एक निगाह सोफे की पीठ पर उस स्थान पर डाली जहां गोली घुस जाने की वजह से रैक्सीन में छेद हो गया था । वह कुछ क्षण चुप रहा और निर्णयात्मक स्वर से बोला - “पांच सौ रुपये ।”
“मंजूर ।” - सुनील बोला । उसने देशपाण्डे की ओर देखा ।
देशपाण्डे ने चुपचाप सौ-सौ के पांच नोट निकालकर मेज पर रखी ऐस ट्रे के नीचे दबा दिये ।
“प्रेमकुमार” - रणधीर बोला - “एक छोकरियों जैसा खूबसूरत लड़का है जिसने अपनी सारी जिन्दगी में पैसे वाली औरतें फंसाने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम नहीं किया । उसमें इतना बड़ा काम करने की न अक्ल है और न हौसला कि वह इस तरीके से निशा का खून कर दे कि हत्या का इल्जाम लाला मंगत राम पर आये । अस्पताल से निकलने के बाद निशा के पास फटकना तो दूर, वह तो शायद राजनगर से ही भाग गया था ।”
“लेकिन अब तो वह राजनगर में ही है न ?” - सुनील ने व्यग्र स्वर में पूछा ।
“होना तो चाहिए । लगभग एक सप्ताह पहले मैंने उसे शहर में देखा था ।”
“अब कहां है वह ?”
“यह तो मुझे मालूम नहीं ।”
“मतलब ?” - सुनील हैरानी से बोला - “मैं समझा था कि पांच सौ रुपये के बदले में तुम हमें प्रेमकुमार का पता बता रहे हो ।”
“पता नहीं मालूम मुझे ।” - रणधीर शान्ति से बोला - “क्योंकि मेरा उससे ऐसा कोई वास्ता नहीं है जिसकी वजह से मैं उसका पता मालूम करके रखूं ।”
“तो फिर ?”
“मैं तुम्हें प्रेमकुमार तक पहुंचने का रास्ता बता सकता हूं ।”
“वही बताओ ।”
“हैमिल्टन रोड के ब्राइंट होटल के 62 नम्बर कमरे में एक ऐंग्लो इन्डियन लड़की रहती है । नाम है मेबल गारलैंड आजकल प्रेमकुमार उसके चक्कर में है ।”
“वह मेबल के साथ होगा ?”
“शायद हो । शायद न हो ।”
“तुम्हें यह बात कैसे मालूम ?”
“बस, है मालूम ।” - रणधीर लापरवाही से बोला - “तुम्हें आम खाने से मतलब है या पेड़ गिनने से ?”
सुनील चुप रहा ।
“लेकिन एक बात का खास ख्याल रखना । मेबल को यह खबर न होने पाये कि उसके बारे में तुम्हें मैंने बताया था ।”
“मैं ख्याल रखूंगा । तुम मेबल को जानते हो ?”
“बहुत अच्छी तरह ।”
और रणधीर के चेहरे पर एक कुत्सित मुस्कराहट उभरी ।
“मेबल कामकाजी लड़की है ?”
“हां, काम करती है । अच्छा पैसा कमाती है ।”
“कहां काम करती है वह ?”
“अपने बिस्तर में ।”
और रणधीर ने एक जोर का अट्टहास किया ।
“अगर मेबल के माध्यम से प्रेमकुमार से सम्बन्ध स्थापित न हो सके तो तुम उसको तलाश करने का कोई और तरीका सुझा सकते हो ?”
“पहले वह रौनक बाजार के स्टार होटल में रहता था । शायद राजनगर वापिस आने पर वह दोबारा वहीं ठहरा हो ।”
“और कुछ ?”
“और कुछ क्या ?”
सुनील चुप रहा । कई क्षण वह विचारपूर्ण मुद्रा बनाये चुपचाप बैठा रहा । अन्त में वह अपने स्थान से उठ खड़ा हुआ ।
“अच्छा, रणधीर जी” - वह रणधीर की ओर अपना हाथ बढाता हुआ बोला - “बहुत-बहुत मेहरबानी ।”
रणधीर ने सुनील से हाथ मिलाया । उसने एक खा जाने वाली निगाह देशपाण्डे पर डाली और बोला - “और अपने इस दोस्त को समझा लेना । मैंने आज इसे तुम्हारी वजह से छोड़ दिया है वर्ना मैं इसकी रिवाल्वर वाली बांह कन्धे से उखाड़कर उसी बांह से इसकी धुनाई करता ।”
देशपाण्डे बुरी तरह तिलमिलाया लेकिन मुह से कुछ नहीं बोला ।
“मैं इसे समझा दूंगा ।”
सुनील और देशपाण्डे वहां से बाहर निकल आये । सीढियां उतरकर वे बाजार में पहुंचे । बिना एक भी शब्द बोले दोनों उस स्थान पर पहुंचे जहां देशपाण्डे की अपनी कार खड़ी थी । दोनों कार में बैठ गये ।
सुनील ने लक्की स्ट्राइक का एक सिगरेट सुलगाया और गम्भीर स्वर में बोला - “एक बात अर्ज करना चाहता हूं देशपाण्डे साहब, बुरा मत मानियेगा ।”
“क्या ?” - देशपाण्डे सशंक स्वर में बोला ।
“आपकी और हमारी नहीं निभने की । मुझे आपके काम करने के तरीके से इत्तफाक नहीं ।”
“यार, वह तो पासा उलटा पड़ गया” - देशपाण्डे लापरवाही से बोला - “वर्ना काम जल्दी होता, धौंस से होता और बिना पांच सौ रुपये दिये होता ।”
“अगर ऐसा भी हो गया होता तो भी मेरी आपके काम करने के तरीके के बारे में यही राय रहती और मैं गैरकानूनी और गुण्डागर्दी के तरीके पसन्द नहीं करता, भले ही वे किसी गुण्डे पर ही इस्तेमाल किये जा रहे हों ।”
देशपाण्डे ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला और फिर कुछ सोचकर चुप हो गया ।
“आपने समझा था कि आप अपने आपको प्रेमकुमार का भाई बतायेंगे और उस पर रिवाल्वर तान देंगे तो वह डर जायेगा और जो कुछ हम उससे जानना चाहते हैं, वह फौरन उगल देगा । लेकिन आप यह भूल गये कि रणधीर एक पेशेवर दादा है । वह असली धमकी और गीदड़ भभकियों में फर्क पहचान सकता है । इतनी अक्ल तो वह भी अपने भेजे में रखता है कि दिन-दहाड़े भरे बाजार में आप उसे शूट करने का हौसला नहीं कर सकते । इसीलिए आपकी रिवाल्वर की तनिक भी परवाह किये बिना जब वह आप पर चढ दौड़ा तो आप बगलें झांकने लगे ।”
“देखो दोस्त, बात बनी नहीं, इसलिए तुम मेरे तरीके में नुक्स निकाल रहे हो लेकिन यह तरीका मैंने बहुत बार इस्तेमाल किया है और अक्सर कामयाबी हासिल की है ।”
“मैं पहले ही कह चुका हूं कि अगर आपके तरीके से बात बन भी जाती तो भी मैं आपके तरीके का अनुमोदन नहीं करता ।”
“ओके । ओके । आई एम सॉरी आलरेडी ।”
देशपाण्डे के स्वर में चिड़चिड़ापन स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा था । लग रहा था जैसे उसे अपनी गलती गलती नहीं लग रही थी, वह गलती मानने के मूड में कतई नहीं था और न उसे सुनील को ज्यादा टोकाटाकी पसन्द आ रही थी लेकिन वह केवल बात को टालने की खातिर सॉरी कह रहा था ।
“मैं अभी आया ।” - सुनील बोला और देशपाण्डे के कुछ बोलने से पहले ही कार का दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया । सड़क से पार एक छोटा-सा रेस्टोरेन्ट था जिसमें पब्लिक टेलीफोन के अस्तित्व की सूचना देने वाला डाक-तार विभाग का नीला बोर्ड टंगा हुआ था ।
सुनील सीधा रेस्टोरेन्ट में घुस गया ।
उसने अपनी जेब से दस-दस पैसे के तीन सिक्के निकाले और लाला मंगत राम का प्राइवेट नम्बर डायल कर दिया ।
सम्पर्क स्थापित होते ही उसने लाला को रणधीर के निवास स्थान पर घटी सारी घटना कह सुनाई ।
लाला ने सारी घटना को तनिक भी गम्भीरता से नहीं लिया । प्रत्युत्तर में वह बड़े इत्मीनान से बोला - “देशपाण्डे बड़ा फास्ट वर्कर है ।”
“होगा” - सुनील चिढकर बोला - “लेकिन मुझे उसका फास्ट वर्क पसन्द नहीं । अगर मुझसे कोई नतीजा हासिल करना चाहते हैं तो आप बरायमेहरबानी मुझे स्वतन्त्र रूप से काम करने दीजिए । मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूं कि मैं किसी अजनबी के साथ मिलकर काम करने का आदी नहीं । मैं नहीं चाहता कि उसके दादागिरी के तरीकों से मैं किसी बखेड़े में फंस जाऊं ।”
“अरे, ऐसा कुछ नहीं होगा ।” - लाला मंगत राम सांत्वनापूर्ण स्वर में बोला ।
“और मुझे लग रहा है कि ऐसा कुछ न कुछ जरूर होगा ।”
“मैं उसे समझा दूंगा ।”
“लेकिन...”
“देखो बरखुरदार, मैं पहले ही कह चुका हूं कि एक की जगह दो दिमाग लगेंगे तो सारा बखेड़ा जल्दी खत्म होगा । जैसी हरकत उसने रणधीर के घर में की है, वैसी वह दोबारा नहीं करेगा । मैं उसे समझा दूंगा । और अगर वह ऐसी कोई हरकत दोबारा करेगा तो मुझसे पूछकर करेगा । तुम उसे मेरे पास भेज दो । मैं उसे समझा दूंगा ।”
“मैं सन्तुष्ट नहीं हूं ।”
“तुम उसे मेरे पास भेजो तो सही । विश्वास जानो वही होगा जो तुम कहोगे । देशपाण्डे से ज्यादा उम्मीदें मुझे तुमसे हैं । अगर ऐसा न हो तो देशपाण्डे को मदद के लिए बुला चुकने के बाद मैं तुमसे भी सम्पर्क स्थापित न करता ।”
“अच्छी बात है ।”
सुनील ने रिसीवर को कायन बाक्स के ऊपर रख दिया ।
वह तेज कदमों से वापस देशपाण्डे के पास लौटा ।
“लाला तुमसे बात करना चाहता है ।” - सुनील बोला - “वह लाइन पर है ।”
देशपाण्डे कार से निकला और रेस्टोरेन्ट में घुस गया ।
थोड़ी देर बाद वह वापिस आया और कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ गया ।
“मुझे लाला ने बुलाया है ।” - वह बोला ।
“ठीक है ।” - सुनील बोला - “तुम मुझे बैंक स्ट्रीट ड्राप करते जाना ।”
“तुमने यह नहीं पूछा कि लाला ने मुझे क्यों बुलाया है ?”
“होगी कोई वजह ।”
“लाला से तुम्हारी क्या बात हुई थी ?”
“कोई खास बात नहीं हुई । मैंने उसे केवल अब तक के काम की रिपोर्ट दी थी ।”
“क्या यह जरूरी था ?”
सुनील ने एक नया सिगरेट सुलगा लिया ।
“गुरु, कहीं मेरा पत्ता काटने की फिराक में तो नहीं हो ?”
“अब तुम चौथी जमात के बच्चे के स्टैण्डर्ड की बात कर रहे हो ।”
देशपाण्डे चुप रहा ।
बैंक स्ट्रीट पहुंचने तक उनमें कोई बात नहीं हुई ।
“यह चाबी रख लो ।” - सुनील कार से उतरने से पहले बोला - “मेरे से पहले फ्लैट में पहुंच जाओ तो जरूरत पड़ेगी ।”
“और तुम ?”
“मेरे पास डुप्लीकेट है ।”
“ओके । थैंक्यू ।”
देशपाण्डे ने गाड़ी आगे बढा दी ।
सुनील ने अपनी मोटरसाइकिल निकाली और उस पर सवार होकर सीधा ब्राइट होटल पहुंचा ।
रिसैप्शन से उसे मालूम हुआ कि मेबल गारलैण्ड उस समय होटल में मौजूद नहीं थी ।
वह स्टार होटल पहुंचा ।
स्टार होटल रौनक बाजार के भीड़ भरे इलाके में स्थित एक मामूली-सा होटल था । रिसैप्शन के पीछे एक अपने सफेद कपड़ों से ज्यादा सफेद दाढी वाले वृद्ध सरदार बैठे थे ।
“नम्स्ते जी ।” - सुनील अपने चेहरे पर एक गोल्डन जुबली मुस्कराहट लाता हुआ बोला ।
“ससरीकाल जी ।” - वृद्ध मीठे स्वर में बोले - “जी आयां नू ।”
“मुझे प्रेमकुमार से मिलना है ।”
“कौन परेमकुमार ?”
“आपका पक्का ग्राहक है । वह लगभग तीस साल का खूबसूरत नौजवान है ।”
“अच्छा, ओ परेमकुमार । ओ तो अब यहां नहीं रहता । कई मीन्ने (महीने) पहले रहता था ।”
“अब कहां रहता है वह ?”
“की पता बउजी ! मेरी ओर से तो अच्छा ही होयआ । मैं तां उस जैसे लड़के को होटल में रखकर राजी ही नहीं था लेकिन मेरे लड़के कहते हैं कि भाया जी, कम्पीटीशन बड़ा है । ग्राहक मोड़न दा जमाना नहीं । जान्दा-जान्दा सठ रुपए मार गया परेमकुमार दा बच्चा ।”
“मेरे चार सौ रुपये ले गया है, सरदार जी” - सुनील सरासर झूठ बोलता हुआ बोला - “इसीलिये तो मैं उसे ढूंढता फिर रहा हूं ।”
“वो बन्दा ही गलत था जी ।” - वृद्ध बड़ी हमदर्दी से बोले, उन्होंने सिर्फ साठ रुपए खोए थे । चार सौ रुपए खोने वाला आदमी निश्चय ही उनकी हमदर्दी का हकदार था ।
“लेकिन मैं उसे छोड़ूंगा नहीं” - सुनील कृत्रिम क्रोध का प्रदर्शन करता हुआ बोला - “मैं तो साले को पाताल में से खोज निकालूंगा । मैंने उससे चार सौ के आठ सौ न निकलवाये तो मेरा नाम प्यारेलाल नहीं ।”
“प्यारेलाल जी, अगर परेमकुमार हथ आ जाए तो सठ रुपये हमारे भी निकलवा देना ।”
“क्यों नहीं, क्यों नहीं । आपके होटल में तो वह कई महीने रहा है ।”
“हां जी ।”
“एकाएक छोड़ क्यों गया ?”
“हादसा हो गया ओदे नाल ।”
“कैसा हादसा ?”
“किसी ने ओदे कमरे में जाकर उसकी ओ पिटाई कीती, ओ कुटाई कीती कि रहे रब दा नां ।”
“लेकिन होटल में ऐसा हो कैसे गया ?”
“बस हो गया, जी । कोई चुपचाप आया । चुपचाप ओदे कमरे में गया । ओनूं कुट-कुटकर अधमरा कर दित्ता ने खिसक गया । बाद में परेमकुमार बड़ी मुश्किल नाल अपने कमरे से बाहर निकलया । ओने नाल दा दरवाजा खटखटाया ते बेहोश हो गया । ओनूं फौरन हस्पताल पहुंचाया गया ।”
“बाद में उसने बताया कि उसकी पिटाई किसने की थी ?”
“साफ झूठ बोल गया, कंजरदा । कहन लगा कि ओ बरान्डे में खड़ा था दो आदमी उस ते टुट पड़े ते मार-पीट के ओदा बटुआ छीन के लै गये । बाउ जी ! तुसी आप सोचो, अगर सौरे नूं बरान्डे च मार पड़ी तो क्या किसी होर कमरे वाले ने वाज न सुनी होती ? ओदी कुटाई तो, बाउ जी, ओदे कमरे में हुई । सौरा किसी की मां-बहन के चक्कर में होगा, लोग कुट गये ।”
“लड़कियां बहुत आती थीं उसके कमरे में ?”
“आती ही रहती थीं । मैं तो बहुत एतराज करदा था लेकिन मेरे लड़के कहते थे कि सानू की ! पक्का गाहक है । जो करता है अपने कमरे में करता है न । लेकिन एक बार तो पुलिस आ गई थी ।”
“अच्छा !”
“जी हां । काफी पहले की गल्ल है । परेमकुमार कोई कुड़ी ले आया । कुड़ी क्या थी, बिल्कुल हिप्पनी थी । ओने सिर तों पैर तक एक लम्बा गाउन पहना होया था । सिर के बाल साईं बाबा की तरह बिखरे हुए थे । चम्म दुध वरगा चिट्टा था । ऐन कड़क जवान बीबी थी लेकिन अक्खां ऐसी थीं जैसे सुल्फा पीके आई होवे ।”
“आजकल लड़कियां चरस के दम लगाती हैं ।”
“चरस होई, सुल्फा होया या कोई विलायती नाम होया गल्ल तो एक ही है ।”
“जी हां, जी हां । फिर ?”
“बाद में कमरे में परेमकुमार का कुड़ी से पता नहीं क्या झगड़ा होया कि कुड़ी चीखें मारने लगी । रात के दो बजे दा टाइम था । बगल दे मकान वालों ने पुलिस को फोन कर दित्ता । पुलिस आई । ओहना ने आकर कुड़ी नूं चुप कराया तां दोनों न हिरासत में ले लित्ता । मैं बड़ी मुश्किल नाल मामला रफा-दफा कराया । बाद में मैंने हजार गालां अपने लड़कों को दीं तो दस हजार गालां परेमकुमार को दीं और कुड़ी को टैक्सी ते उसके घर भेजा ।”
“लड़की का क्या नाम था ?”
“मारिया ।”
“विलायती थी ?”
“नाम और चमड़ी तो विलायती मेमों जैसी ही थी ।”
“मारिया का पता क्या है ?”
“मुझे की मलूम जी ।”
“लेकिन आपने उसे टैक्सी पर घर भेजा था ?”
“मैंने ओनूं टैक्सी के विच बिठा दित्ता था । मैनूं नहीं पता ओ कहां गई ? तुसी मेम का पता क्यों पुछ रहे हो, बाउ जी ?”
“क्योंकि उससे प्रेमकुमार का पता मिलने की उम्मीद हो सकती है ।”
“अच्छा । लेकिन मुझे बीबी दा पता नहीं पता ।”
“ओह !”
“लेकिन मैं कुड़ी को पुलिस वालों से गल्लां करते सुना था । मैंने कुछ ऐसा सुना था कि ओ पैरामाउन्ट क्लब विच कोई डानस-वानस करदी है ।”
सुनील कुछ क्षण चुप रहा ।
“वैसे परेम बाउ सी करामाती” - वृद्ध कह रहे थे - “बल्ले, बल्ले, कैसी-कैसी सोहनियां बीवियां उससे मिलने आया करती थीं । एक कुड़ी तां नई चुमचम करदी स्टैण्डर्ड कार पर आया करती थी । कई बार तो मैं सोचया करदा था कि ऐसी सोहनियां बीवियां दा यार किसी बढिया होटल में जाके क्यों नहीं रहता ।”
“आपको शक्ल-सूरत के अलावा प्रेमकुमार में कोई और ऐसा गुण दिखाई दिया था जो किसी लड़की को प्रभावित कर सकता हो ?”
“ना जी, वाह गुरू दा ना लबो ।”
“आपको मारिया की सूरत याद है ?”
“उस हिप्पीन की जिस करके होटल च पुलिस आ गई थी ?”
“हां ।”
“याद है जी ।”
सुनील ने अपनी जेब से सोना, नैन्सी और कंचन की तस्वीर निकालकर वृद्ध के सामने रख दीं ।
“आप इनमें से किसी तस्वीर को पहचानते हैं ?” - सुनील आशापूर्ण स्वर में बोला ।
वृद्ध ने बारी-बारी तीनों तस्वीरें देखी और फिर एक तस्वीर उठाकर सुनील के सामने करते हुए बोले - “ए मारिया दी फोटो है ।”
सुनील ने देखा वह तस्वीर उस लड़की की थी जिसका नाम लाला मंगत राम ने सोना बताया था ।
“बाउ जी, आप दे पास मारिया दी फोटो कित्थों आई ?” - वृद्ध ने पूछा ।
“बस जुटा ली कहीं से” - सुनील तस्वीर जेब में रखता हुआ बोला - “बहुत-बहुत मेहरबानी सरदार जी ।”
“बाउ जी, हमारे सठ रुपयों का भी ख्याल रखना ।”
“जरूर, जरूर !”
“नमस्ते !”
“ससरी काल, काका ।”
सुनील होटल से बाहर निकल आया ।