टेलीफोन की घन्टी की घनघनाहट से सुनील की नींद खुल गई । उसने नींद भरे नेत्रों से मेज पर रखी रेडियम डायल वाली टाइमपीस में समय देखा - सवा बाहर बजे थे ।
“आधी रात की किसे याद आ गया मैं ?” - सुनील बड़बड़ाया ।
घन्टी लगातार बजती जा रही थी लेकिन सुनील ने रिसीवर उठाने का प्रयत्न किया, इस आशा में कि शायद स्वयं ही बजनी बन्द हो जाए ।
लेकिन फोन करने वाला शायद इतनी जल्दी हिम्मत छोड़ जाने वाला नहीं था । घन्टी फिर भी बजती रही ।
अन्त में सुनील ने बैड स्विच दबाकर कमरे में प्रकाश किया और टेलीफोन की ओर हाथ बढा दिया ।
रिसीवर उठाने से पहले वह क्षण भर के लिए ठिठक गया ।
घन्टी सुनील के अनलिस्टिड टेलीफोन की बज रही थी । वह टेलीफोन था जिसका नम्बर प्रमिला और रमाकांत के अतिरिक्त किसी को भी मालूम नहीं था । और वह टेलीफोन तभी प्रयोग में लाया जाता था जब मामला बहुत गम्भीर हो ।
प्रमिला तो बगल के फ्लैट में सोई पड़ी थी इसलिए टेलीफोन अवश्य ही रमाकांत का था ।
किसी हद तक सुनील के नेत्रों से नींद उड़ गई । उसने झपटकर टेलीफोन का रिसीवर उठाकर कान से लगा लिया और कहा - “हल्लो !”
“मर गए थे क्या ?” - दूसरी तरफ से रमाकांत का भन्नाया हुआ स्वर सुनाई दिया ।
“अगर तुम यूं ही आधी रात को टेलीफोन करते रहे तो मर ही जाऊंगा ।” - सुनील बोला ।
“सुनील ।” - वह उसी स्वर में बोला - “फौरन यहां पहुंचो ।”
“यहां कहां ?”
“प्रीमियर बिल्डिंग में । सातवीं मंजिल पर । दीवान नाहरसिंह के फ्लैट पर ।”
“किस्सा क्या है ?” - सुनील ने पूछा ।
“किस्सा भी मालूम हो जाएगा ।” - रमाकांत चिल्लाया - “तुम हिलो तो सही वहां से ।”
“आ रहा हूं ।” - सुनील बोला और उसने रिसीवर रख दिया ।
सुनील ने कपड़े बदले, नीचे आकर गैराज में से मोटर साइकल निकाली और अगले ही क्षण वह प्रीमियर बिल्डिंग की ओर उड़ा जा रहा था ।
दीवान नाहरसिंह के विषय में उसने बहुत कुछ सुना था । वह लगभग पचपन वर्ष का लखपति आदमी था । प्रीमियर बिल्डिंग के नाम से जानी जाने वाली विशाल इमारत उसकी सम्पत्ति थी जिसके किराए पर चढी छः मंजिलों का उसे एक लाख रुपए से भी अधिक मासिक किराया मिलता था । छटी मंजिल से ऊपर के सारे फ्लैट उसने अपने रहने के लिए रखे हुए थे । छटी मंजिल के ऊपर दीवान नाहरसिंह के फ्लैटों में जाने के लिए केवल एक ही रास्ता था । वह थी एक लिफ्ट जिस तक केवल उसी आदमी की पहुंच हो सकती थी जिससे कि वह मिलना चाहता हो । उस सूरत में नाहरसिंह का कोई आदमी ऊपर से छटी मंजिल पर आता था और आगन्तुक को साथ ले जाता था ।
नाहरसिंह को पुराने जमाने की ऐतिहासिक महत्व की वस्तुएं जमा करने का शौक था । अपने उसे शौक की खतिर उसने सारे विश्व का भ्रमण किया था और लाखों रुपए खर्च करके अपने घर में दुर्लभ वस्तुओं का एक म्यूजियम सा बना डाला था । दुर्लभ वस्तुओं के संग्रहकर्ता के रूप में उसका नाम इस लाइन के लगभग सभी लोग जानते थे । अपने भ्रमण और अपने द्वारा संग्रहीत दुर्लभ वस्तुओं के विषय में उसने दो तीन पुस्तकें भी लिखी थीं जो उन विषयों पर प्रमाणिक मानी जाती थीं ।
लेकिन सुनील दीवान नाहरसिंह को किसी अन्य संदर्भ से जानता था । वह संदर्भ था पचपन वर्ष के दीवान नाहरसिंह की बाईस वर्ष का अनिद्य रूपवती पत्नी नीला । नीला रामकांत के यूथ क्लब में रेगुलर आने वालों में से थी और वहीं सुनील की नीला से एक दो औपचारिक मुलाकातें हुई थीं । नीला बेहद मिलनसार युवती थी इसलिए ऊंची सोसायटी के युवकों में खूब प्रसिद्ध थी ।
लेकिन रमाकांत आधी रात को उसे दीवान नाहरसिंह के निवास स्थान पर क्यों बुला रहा था, यह बात सुनील की समझ से परे थी ।
प्रीमियर बिल्डिंग के सामने सुनील ने मोटर साइकल खड़ी की और जल्दी से इमारत में घुस गया ।
लिफ्टमैन ने उसे छटी मन्जिल पर छोड़ दिया । लेकिन उसे आगे सातवीं मंजिल पर जाने वाली प्राइवेट लिफ्ट में सुनील को नहीं घुसने दिया गया ।
एक नौकर ने उसे वहीं रोक दिया ।
“मुझे दीवान साहब के यहां रमाकांत नाम के एक सज्जन ने बुलाया है ।” - सुनील उसे अपना विजिटिंग कार्ड देता हुआ बोला - “यह मेरा कार्ड ऊपर ले जाओ ।”
नौकर ने उसके मुंह पर द्वार बन्द कर दिया और लिफ्ट ऊपर ले गया ।
सुनील वहीं चहलकदमी करता रहा ।
लगभग पांच मिनट बाद जब लिफ्ट वापिस आई तो नौकर के साथ शानदार सूट पहने हुए एक व्यक्ति भी था ।
“एक्सक्यूज मी, मिस्टर सुनील ।” - वह सुनील से हाथ मिलाता हुआ बोला - “आपको प्रतीक्षा करनी पड़ा ।”
“नैवर माइन्ड ।” - सुनील उसके साथ लिफ्ट में प्रविष्ट होता हुआ बोला ।
“मेरा नाम रूपसिंह है ।” - वह बोला - “मैं दीवान साहब का पब्लिक रिलेशन मैन हूं ।”
“वैरी ग्लैड टू मीट यू, मिस्टर रूपसिंह ।” - सुनील औपचारिकतापूर्ण स्वर में बोला ।
उसी समय लिफ्ट रुक गई और द्वार खुल गया ।
सुनील रूपसिंह के साथ बाहर निकल आया ।
वह एक बड़ी टैरेस थी और वहां सम्भ्रान्त दिखाने वाले लोगों का जमघट लगा हुआ था । वातावरण में वार्तालापों का शोर मचा हुआ था । हर आदमी की जुबान कैंची की तरह चल रही थी । सुनील को वहां एक भी आदमी ऐसा दिखाई नहीं दिया जिसके होंठ बन्द हों । ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी दुर्घटना घट गई हो और हर आदमी उसे सबसे पहले अपने ढंग से बयान करना चाह रहा हो ।
उसी जमघट में दीवान नाहरसिंह भी खड़ा था । हर आदमी उसे कुछ कह रहा था लेकिन लगता था जैसे वह केवल गरदन ही हिला रहा था, बात किसी की भी न सुन रहा था ।
उसी समय रमाकांत सुनील के सामने आ खड़ा हुआ । उसके माथे पर पसीने की बूंदे चमक रही थीं और उसका मूड बेहद बिगड़ा हुआ था ।
“उल्लू का पट्ठा ।” - रमाकांत चेहरे से पसीना पोंछता हुआ दांत पीसकर बोला ।
“कौन ? मैं ?” - सुनील हैरान होकर बोला ।
“अबे, नहीं । वह साला दीवान नाहरसिंह का बच्चा ।”
“क्या हुआ ?”
“हुआ यह कि छोकरी के चक्कर में फंसकर मैं उल्लू बन गया हूं ।”
“अब कुछ बकोगे भी ?” - सुनील झुंझलाया ।
“तुम तो जानते ही हो, सुनील” - रमाकांत तनिक गम्भीर होकर बोला - “यह दीवान अपनी प्राचीन वस्तुओं के संग्रह की शान मारने के लिए गाहेबगाहे पार्टियां करता रहता है । ये पार्टियां बहुत शानदार होती हैं और इनमें इस नगर के बड़े-बड़े प्रतिष्ठित लोग आमन्त्रित होते हैं । दीवान ऐसी पाटियों में अपनी संग्रह में शामिल हुई नई वस्तुओं की नुमाइश करता है, लोग पार्टी का हक अदा करने के लिए दिवान की और उसकी ऊल-जलूल वस्तुओं की तारीफ करते हैं और यह शुतरमुर्ग का बच्चा झूठी तारीफ सुनकर खुश होता है । पिछले महीने ऐसी ही एक पार्टी में से एक, दीवान की नजरों में बेहद कीमती, महात्मा बुद्ध की मूर्ति बड़े रहस्यपूर्ण ढंग से चोरी हो गई थी । आज तक उस मूर्ति का पता नहीं चल पाया है । पिछली पार्टी में बुद्ध की उस मूर्ति को कई लोग तो देख भी नहीं पाए थे । दीवान के पास बुद्ध की हूबहू वैसी एक मूर्ति और थी । अन्य कई वस्तुओं के साथ वह बुद्ध की मूर्ति आज भी पार्टी में लोगों के देखने के लिए रखी गई थी और आज कोई उसे भी उड़ाकर ले गया ।”
“और किसी को पता नहीं लगा ? आखिर पार्टी में इतने लोग हैं...”
“सुनील” - रमाकांत उसकी बात काटकर बोला - “किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी । ऐसा लगता है जैसे मूर्ति जादू के जोर से गायब हो गई हो ।”
“लेकिन तुम इस तस्वीर में कहां फिट होते हो और वह छोकरी का कौन-सा चक्कर है ?”
“वह भी बता रहा हूं । पिछले महीने जो बुद्ध की मूर्ति चोरी हुई थी, उसके कारण दीवान हत्थे से उखड़ा हुआ था । इस बार वह अपनी दुर्लभ वस्तुओं की नुमाइश पुलिस के पहरे में करना चाहता था ताकि पिछली पार्टी जैसी अप्रिय घटना इस बार न घटती । लेकिन उसकी पत्नी नीला पुलिस के विरुद्ध थी । उसका कथन था कि पुलिस के पहरे का अर्थ था कि वो अपने सम्मानित अतिथियों पर सन्देह करते थे, कि उनमें से कोई चोरी जैसा हीन काम भी कर सकता था । लेकिन दीवान निगरानी जरूर चाहता था । पहली बुद्ध की मूर्ति चोरी हो जाने के कारण वह दूसरी को किसी सूरत में अरक्षित छोड़ने के लिए तैयार नहीं था । फिर नीला ने यह राय दी थी कि निगरानी जैसे मामलों में मैं बड़ा मास्टर था । और आज की पार्टी में दुर्लभ वस्तुओं की सुरक्षा का भार मैं ले लेता तो न केवल चोरी का खतरा समाप्त हो जाता बल्कि मेहमान भी अपमान का अनुभव नहीं करते कि उन्हें चोर समझा जा रहा था । क्योंकि, नीला के कथनानुसार, मेरे विषय में तो कोई सोच भी नहीं सकता था कि मैं मेजबान या मेहमान के स्थान पर कोई ऐसा आदमी भी हो सकता था जो यहां पर पुलिस की कमी को पूरा कर रहा था । नीला ने इतने आडम्बर भरे शब्दों में दीवान नाहरसिंह के सामने मेरी तारीफ की और इतने प्यार से मुझे यह कार्य स्वीकार कर लेने के लिए कहा कि मैं अकड़ में आ गया और मैंने दीवान साहब के माल की ‘चौकीदारी’ करना स्वीकार कर लिया । अगर मेरे दिमाग पर नीला का असर न हुआ होता तो मैं खुद तो क्या, यूथ क्लब के सबसे छोटे सदस्य को भी यह कार्य स्वीकार करने की अनुमति नहीं देता ।”
“अब पोजिशन क्या है ?”
“अब पोजिशन यह है कि यहां से बुद्ध की दूसरी मूर्ति और एक ब्लो गन चोरी चली गई है और दीवान इस चोरी की सारी जिम्मेदारी मुझ पर लाद रहा है । वह क्रोध में बिफर रहा है और सारा दोष मुझ पर लाद रहा है कि मैंने निगरानी में लापरवाही दिखाई और मेरी नाक के नीचे से उसके संग्रहालय की सबसे दुर्लभ वस्तुयें कोई उड़ाकर ले गया ।”
“यह ब्लो गन क्या बला है ?”
“ब्लो गन एक प्रकार का घातक हथियार है जिसे दीवान चीन से लाया था । यह लगभग तीन फुट लम्बी और एक इंच व्यास की बांस की खोखली नली होती है । लोहे की गर्म सलाखों की सहायता से इसके भीतर का छेद इतना हमवार कर दिया जाता है कि वह भीतर से शीशे की तरह मुलायम और चमकदार बन जाता है । इस बांस की नली के भीतर एक स्प्रिंग होता है जिसमें लगभग तीन इन्च लम्बा एक तीर अटका दिया जाता है । इस तीर की डंडी लकड़ी की होती है और आगे का नोकीला भाग लोहे का । लोहे की यह नोंक एक घातक विष में डूबी हुई होती है । बांस की नली की दूसरी ओर से यदि फूंक मारी जाए तो स्प्रिंग एकदम रिलीज हो जाता है और तीर निकलकर शत्रु के शरीर में घुस जाता है । किसी जमाने में चीन के पुराने कबीलों में यह हथियार रायफल जितना महत्व रखता । ब्लो गन में से निकला तीर रायफल की गोली जितना फासला तो तय नहीं कर सकता था लेकिन इसके तीन की नोक पर विष लगा होने के कारण यह गोली से भी अधिक घातक होता है । रायफल की गोली तो अगर पेट या हाथ पांव में कहीं लग जाए तो आदमी बच जाता है लेकिन ब्लो गन के तीर की नोक का भी शरीर में प्रवेश कर जाना जानलेवा सिद्ध हो सकता है ।”
“और बुद्ध की मूर्ति ?”
“वह लगभग चार इंच के ताम्बे के घन में से गढी गई मूर्ति थी जिसमें महात्मा बुद्ध को आलथी-पालथी मारे ध्यान मग्न दिखाया गया था । महात्मा बुद्ध के तेज की व्याख्या के रूप में उस मूर्ति के माथ में एक हीरा जड़ा हुआ था । दीवान के पास इन मूर्तियों का जोड़ा था । एक मूर्ति पिछले महीने चोरी हो गई थी और एक अब उड़ गई है ।”
उसी समय दीवान नाहरसिंह और नीला वहां पहुंचे ।
“मैं तुम्हीं को ढूंढता फिर रहा था ।” - दीवान रमाकान्त से बोला और उसने प्रश्नभरी दृष्टि से सुनील को देखा ।
“दीवान साहब, यह मेरा मित्र सुनील है ।” - रमाकांत जल्दी से बोला - “इसे मैंने यहां बुलाया है ।”
सुनील ने दीवान से हाथ मिलाया । नीला सुनील को शरारत भरी आंखों से घूर रही थी । ऐसा लगता था जैसे उस की दीवान की हानि में तनिक भी रुचि नहीं थी ।
दीवान ने यह जानने की इच्छा व्यक्त नहीं की कि सुनील कौन था और रमाकांत ने उसे यहां क्यों बुलाया था ।
“बरखुरदार ।” - दीवान नाहरसिंह सुनील से बोला - “मेरी पत्नी ने तुम्हारे दोस्त की जागरुकता की बहुत तारीफ की थी और मैंने भी इसकी योग्यता का भरोसा करके मामला पुलिस के हाथ में नहीं सौंपा था फिर भी नतीजा तुम्हारे सामने है । मेरी दो अमूल्य वस्तुयें गायब हो गई हैं ।”
“लेकिन डार्लिंग ।” - नीला शहदभरे स्वर में बोली - “इसमें रमाकांत का क्या दोष है ?”
“और किसका दोष है ?” - दीवान झल्लाकर बोला - “इस पार्टी में मैंने जितने आदमियों को बुलाया था, सबको मैंने अपने हस्ताक्षरयुक्त निमन्त्रण पत्र दिए थे और रमाकांत छटी मन्जिल पर मेरी प्राइवेट लिफ्ट के द्वार पर खड़ा था जो ऊपर आने का अकेला रास्ता है । चोर ऊपर आया, माल चुराकर चलता बना और इसे पता हीं नहीं लगा ।”
“मैंने किसी ऐसे आदमी को भीतर नहीं आने दिया था जिसके पास आपका कार्ड नहीं था ।” - रमाकांत उखड़े स्वर से बोला ।
“लेकिन बरखुरदार” - दीवान व्यंग्यपूर्ण स्वर से बोला - “तुम्हें यह भी तो ख्याल रखना चाहिए था कि कहीं एक ही कार्ड पर दो आदमी प्रवेश न पा गए हों । तुम्हें क्या पता तुमने किन्हीं मिस्टर एक्स को कितनी बार ऊपर जाने दिया था । क्या पता किसी मेहमान ने ऊपर जाने का बाद अपना कार्ड व्यक्ति किसी विशेष के लिए नीचे वापस भिजवा दिया हो और वही कार्ड दिखाकर कोई चोर ऊपर आ गया हो ।”
“हुआ होगा ऐसा ।” - रमाकांत जलकर बोला - “मैं कोई शरलाक होम्ज नहीं हूं ।”
“लेकिन नीला तो यह सिद्ध करने की चेष्टा कर रही थी जैसे तुम शरलाक होम्ज से भी दो कदम आगे हो ।”
क्षण भर के लिए कोई नहीं बोला ।
सुनील ने प्रश्नसूचक दृष्टि से रमाकांत की ओर देखा ।
“एक ही कार्ड दिखाकर दीवान साहब के कहे तरीके से दो आदमी भीतर ऊपर पहुंच गए हों, यह मैं मानता हूं लेकिन इस बात का मैं दावा करता हूं कि कोई आदमी तीन फुट लम्बी ब्लो गन लेकर मेरे सामने से नहीं गुजरा था ।”
“डार्लिंग ।” - नीला फिर बोली - “सच ही तो है । इतनी लम्बी चीज कोई जेब में डालकर तो ले जा नहीं सकता । मेरे ख्याल से तो ब्लो गन तुम्हीं ने इधर-उधर रखी दी होगी ।”
“और बुद्ध की मूर्ति ? उसे भी मैंने ही शीशे के केस को तोड़कर निकाल लिया होगा ?”
“लेकिन डार्लिंग ।” - नीला फिर बोली - “रमाकांत की जिम्मेदारी तो केवल यह थी कि वह छटी मन्जिल पर लिफ्ट के गेट की निगरानी करे ताकि कोई आदमी अनाधिकार प्रवेश न कर सके और कोई यहां से कोई चीज उठाकर भागने की चेष्टा न करे । अगर तुम चाहते थे कि यह तुम्हारे म्यूजियम की एक-एक चीज की निगरानी करता तो तुम्हें यह बात उससे पहले कहनी चाहिए थी ।”
“अगर उन्होंने मुझ यह बात पहले कही होती” - रमाकांत तनिक सा सहारा पाकर बोला - “तो मैं म्यूजियम की चीजों की निगरानी के लिए यूथ क्लब के तीन-चार आदमी और ले आता ।”
दीवान नाहरसिंह ने एक असहाय सी दृष्टि अपनी पत्नी पर डाली, फिर बाकी आदमियों की ओर देखा और फिर अपनी एड़ियों पर घूमा और लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ वहां से चला गया ।
पति के हटते ही नीला ने एक बार फिर शरारतभरी नजरों से सुनील को देखा ।
“बुद्ध की मूर्ति कितनी कीमती थी ?” - सुनील ने नीला से पूछा ।
“बहुत कीमती ।” - नीला बोली - “कई हजार रुपये की ।”
“और ब्लो गन ?”
“दो कौड़ी की ।” - नीला हंसकर बोली - “मुझे तो उस तीन फुटे बांस से नफरत थी, सुनील साहब । मैं तो कहती हूं अच्छा हुआ कोई ले गया उसे । ऐसी खतरनाक चीज थी वह । उसके तीर की नोक भी किसी की खाल में घुस जाए तो तत्काल मृत्यु हो जाती थी । मेरा तो जी चाहता है कि तुम्हारे अखबार में विज्ञापन दे दूं कि जिस आदमी ने वह ब्लो गन चुराई है, अगर वह उसे न लौटाये तो हजार रुपये इनाम ।”
सुनील हंस पड़ा ।
“आप क्यों उल्लू का नक्शा ताने खड़े हैं, मिस्टर रमाकांत ।” - नीला रमाकांत से बोली - “आप भी तो हंसिये । दीवान साहब की बातों का बुरा मत मानिए । यह उनका नहीं, उनकी उम्र का कसूर है । और फिर आपको मालूम होना चाहिए दीवान साहब ने अपने म्यूजियम की हर चीज का बीमा करवा रखा है । ब्लो गन और युद्ध की मूर्ति की चोरी आपकी नहीं, बीमा कम्पनी की सिर दर्द है जिन्हें उनके बदले में रुपया देना पड़ेगा ।”
रमाकांत चुप रहा ।
“मैं तुम लोगों को एक रहस्य की बात बताती हूं ।” - नीला सुनील और रमाकांत के और समीप आकर धीरे-से बोली - “दीवान साहब को उन वस्तुओं के चोरी चले जाने का इतना अफसोस नहीं है जितना इस बात का है कि उनकी इतनी सावधानी के बाद भी कोई उन्हें घिस्सा दे गया । इस बार उन्होंने चैलेंज-सा किया था कि कोई आदमी उनके फ्लैट में से एक सूई भी चुराकर नहीं ले जा सकता था । पहली बुद्ध की मूर्ति चोरी हो जाने पर उन्हें बहुत ताव आया था लेकिन इस बार उन्हें भरोसा था कि या तो चोरी होगी नहीं या फिर चोर पकड़ा जाएगा । रमाकांत का, या इसके स्थान पर पुलिस वाले होते तो उनका, गेट पर खड़े होकर लोगों के निमन्त्रण-पत्र चैक करना तो एक परदा था ताकि लिफ्ट में लगी एक्स-रे मशीन की ओर किसी का ध्यान न जाए । लोग यही समझें कि दीवान साहब ने केवल यही सावधानी बरती थी कि कार्ड चैक करने के लिए गेट पर एक आदमी खड़ा कर दिया था ।”
“एक्सरे मशीन क्या ?” - सुनील ने पूछा ।
“दीवान साहब की प्राईवेट लिफ्ट जितनी दिखाई देती है वास्तव वह उससे दुगनी बड़ी है । लिफ्ट को प्लाइवुड की पार्टीशन द्वारा दो भागों में विभक्त किया हुआ है । देखने वाले को केवल वही भाग दिखाई देता है, जहां वह ऊपर नीचे जाने के लिए आकर खड़ा होता है । सब यही समझते हैं कि लिफ्ट प्लाइवुड की पार्टीशन तक ही है, जबकि लिफ्ट का उतना ही बड़ा कम्पार्टमेन्ट पार्टीशन के पीछे भी है । दीवान साहब ने पिछले भाग में एक ऐसी एक्स-रे मशीन लगाई हुई है जिसकी सहाता से उस मशीन का आपरेटर लिफ्ट के सामने के भाग में खड़े लोगों के शरीर की हड्डियां तक देख सकता है, आपकी जेब में बड़ी या शरीर में छुपाई चीजों की तो बात ही क्या ? आज लिफ्ट के पिछले भाग में बैठा हुआ एक आपरेटर उस एक्सरे मशीन की सहायता से हर मेहमान पर नजर रख रहा था । उसका दावा है कि कोई भी आदमी बुद्ध की मूर्ति या ब्लो गन लेकर वहां से बाहर नहीं निकला है । इतना होने के बावजूद दोनों चीजें गायब हैं जबकि नीचे जाने का वही एक रास्ता है ।”
“फिर तो दो ही बातें हो सकती हैं ।” - सुनील बोला ।
“क्या ?” - नीला और रमाकांत ने एक साथ पूछा ।
“या तो ब्लो गन और बुद्ध की मूर्ति यहीं इसी मन्जिल पर कहीं छुपा दी गई है या फिर किसी ने दोनों छत पर से नीचे गली में फेंक दी हैं ।”
“यह भी तो हो सकता है कि इन्श्योरेन्स का रुपया हासिल करने के लिए दीवान साहब ने स्वयं ही वे चीजें कहीं छुपा दी हों ।” - रमाकांत बोला ।
“नानसेंस ।” - नीला बोली - “दीवान साहब के पास लाखों रुपया है । अगर वे इन्श्योरेन्स के कुछ हजार रुपये पर मरते होते तो वे ये चीजें खरीदते ही क्यों ? इन दो चीजों को प्राप्त करने पर उनका कई हजार रुपया खर्च हुआ है ।”
उसी समय रूपसिंह वहां आया और नीला से बोला - “दीवान साहब बुला रहे हैं ।”
“एक्सक्यूज मी, जन्टलमैन ।” - नीला सुनील और रमाकांत की ओर मुस्कुराहटें बिखेरती हुई बोली और रूपसिंह के साथ लम्बे डग भरती हुई वहां से चली गई ।
“मेहमानों के विषय में कुछ बताओ ।” - सुनील रमाकांत की ओर मुड़कर बोला ।
“यहां सत्तर आदमी आमन्त्रित हैं और अभी तक सभी के सभी यहां मौजूद हैं । मैंने बड़ी सावधानी से एक-एक का निमंत्रण-पत्र देखा था और तभी उन्हें ऊपर आने दिया था । दीवान के कथनानुसार ये सत्तर महानुभाव इज्जत के आधारस्तम्भ हैं और इन्हीं इज्जत के आधारस्तम्भों में से किसी एक स्तम्भ ने यह गोलमाल कर दिया है ।”
“कोई आमंत्रित व्यक्ति पार्टी छोड़कर गया भी है क्या ?”
“नहीं । सत्तर के सत्तर यहां मौजूद हैं ।”
“कोई ऐसा व्यक्ति है जो कि पार्टी के दौरान तो यहां था लेकिन अब नहीं है ?”
“नहीं ।” - रमाकांत बोला ।
“और...”
“सुनील ।” - एकाएक रमाकांत उसकी बात काटकर बोला - “एक आदमी है जो पार्टी शुरू होने के एक घन्टे बाद ही चला गया था ।”
“कौन ?”
“फोटोग्राफर सुदेश कुमार । वह दीवान साहब का फोटोग्राफर है । उनकी हर पार्टी पर मौजूद होता है ।”
“जल्दी क्यों चला गया ?”
“लंगड़ा है । बैसाखियां लेकर चलता है । जब दिवान साहब ने कहा कि उन्हें और तस्वीरों की जरूरत नहीं थी तो वह वापिस चला गया ।”
“कितनी तस्वीरें खींची थीं उसने ?”
“सैंकड़ों । आरम्भ में उसने दीवान और नीला की सारे मेहमानों के साथ एक ग्रुप फोटो ली थी । उसके बाद वह अपने छोटे कैमरे से पार्टी के हर क्षण की फोटो खींचता फिरता रहा था ।”
“ग्रुप फोटो भी उसने उसी छोटे कैमरे से ली थी ?”
“नहीं । उसके लिए तो वह एक बड़ा-सा डिब्बे जैसा कैमरा लाया था जिसमें फिल्म के स्थान पर आठ गुणा दस इंच की नैगेटिव प्लेट इस्तमाल की जाती है ।”
“अब यहां और कितनी देर ठहरने का इरादा है ?”
“बस, दीवान साहब को तलाश करते हैं और देखते हैं वे क्या कहते हैं ?”
लेकिन दीवान नाहरसिंह को तलाश करने की जरूरत नहीं पड़ी । वह स्वयं ही वहां चला आया ।
“मिस्टर ।” - वह रमाकांत से बोला - “मैंने अपने फ्लैटों का एक-एक कोना छनवा डाला है । यह बात निश्चित समझो कि ब्लो गन और बुद्ध की मूर्ति यहां छिपाई हुई नहीं है ।”
रमाकांत चुप रहा ।
“और जहां तक दोनों चीजों को नीचे गली में फेंक देने का सवाल है, वह भी असम्भव है । नीचे गली में मजदूर वगैरह सोये रहते हैं । अगर ऊपर से कुछ फेंका गया होता तो वह किसी न किसी के शरीर से जरूर टकराता । नीचे एक पुलिस के सिपाही का पहरा भी है । खूब पूछताछ करवा ली गई है । निश्चय ही कुछ नहीं फेंका गया है ।”
और उसने अपनी प्रश्नसूचक दृष्टि रमाकांत के चेहरे पर गड़ा दी ।
“अब आप चाहते क्या हैं ?” - रमाकांत तिक्त स्वर में बोला ।
“देखो, बरखुरदार ।” - पहले की तरह अब दीवान के स्वर में शुष्कता नहीं थी - “मैं चाहता हूं कि तुम अपनी ओर से पूरी ईमानदारी से मेरी चीजों की चोरी का सुराग पाने की कोशिश करो । अगर तुम उन्हें तलाश कर लो तो ठीक है वर्ना मेरी किस्मत । मैं कुछ मामलों में जरा झक्की आदमी हूं । मैं पुलिस को रिपोर्ट नहीं करूंगा । क्योंकि पुलिस वाले मुझसे यह अवश्य पूछेंगे कि जब मुझे चोरी की आशंका थी तो मैंने पहले रिपोर्ट क्यों नहीं की ! इसके उत्तर में मैं यह नहीं कहना चाहता कि मैंने स्वयं को पुलिस से ज्यादा होशियार समझा था और लिफ्ट में एक्सरे मशीन लगवाकर चोर को खुद पकड़ने का इरादा किया था । अब यह पता नहीं लग रहा है कि चोरी कैसे हुई है । अगर चोरी का तरीका पता लगा जाएगा तो चोर का पता लग जाएगा । समझे ?”
“दीवान साहब” - रमाकांत बोला - “मैं...”
“रमाकांत पूरी कोशिश करेगा, दीवान साहब ।” - सुनील रमाकांत की बात काटकर बोला । साथ ही उसने धीरे से रमाकांत का पैर दबा दिया ।
“मैं पूरी कोशिश करूंगा ।” - रमाकांत धीरे से बोला ।
“दैट्स दी स्पीरिट ।” - दीवान उसका कन्धा दबाकर बोला - “थैंक्स । थैक्स टु बोथ आफ यू ।”
दोनों ने दीवान से हाथ मिलाया और लिफ्ट के द्वारा इमारत से बाहर निकल आए ।
“तुम तो कार लाए हो न ?” - सुनील ने अपनी मोटर साइकल के समीप पहुंचकर उसे स्टार्ट करते हुए रमाकांत से पूछा ।
“हां ।” - रमाकांत बोला - “लेकिन तुमने मेरा पांव क्यों दबाया था ?”
“रमाकांत प्यारे ।” - सुनील मोटर साइकल पर बैठता हुआ बोला - “कल तुम्हें दीवान साहब की ब्लो गन और बुद्ध की मूर्ति दोनों मिल जायेंगी ।”
बात समाप्त होते ही उसने एक्सीलेटर दबा दिया और मोटर साइकल सुनसान सड़क पर फर्राटे भरने लगी ।
रमाकांत मुंह बाये फुटपाथ पर खड़ा दृष्टि से ओझल होती हुई मोटर साइकल की बैक लाइट को देखता रहा ।
उसने घड़ी देखी । तीन बजने वाले थे ।
***
सुनील ने एक नजर फोटोग्राफर सुदेश कुमार के स्टूडियो के बाहर लगे कलात्मक बोर्ड पर डाली और फिर द्वार ठेलकर भीतर घुस गया । अभी प्रातः के आठ ही बजे थे । दुकानें खुलने का समय अभी नहीं हुआ था लेकिन सुनील के बताया गया था कि फोटोग्राफर अपने स्टूडियो में होता था ।
स्टूडियो में सुनील को फोटोग्राफर दिखाई नहीं दिया । स्टूडियो की सामने की दीवार में दो बन्द द्वार दिखाई दे रहे थे जिनमें स एक पर लिखा था - डार्क रूम ।
“कोई है ?” - सुनील जोर से बोला ।
“कौन है ?” - डार्क रूम से आवाज आई ।
“जरा बाहर आइए ।” - सुनील बोला - “आपसे कुछ बातें करनी हैं ।”
कुछ क्षण शान्ति रही और फिर दुबारा वही स्वर सुनाई दिया - “आप थोड़ी देर बैठिए । मैं कुछ नैगेटिव डवैलप करके आता हूं । अभी दस मिनट में हाजिर होता हूं ।”
“ओके ।” - सुनील बोला ।
सुनील ने अपनी दृष्टि स्टूडियो में दौड़ानी आरम्भ कर दी । एक ओर काउन्टर था और उसके पीछे की दीवार की पूरी लम्बाई-चौड़ाई में फोटोग्राफर की कला के चुने हुए नमूने लगे हुए थे । उसके सामने की दीवार पर शो विन्डो थी जिसमें फोटोग्राफी की फिल्में, छोटे-बड़े कैमरे, एल्बम और फ्रेम वगैरह रखे हुए थे । उसी दीवार के साथ लगा हुआ एक लम्बा सोफा था जिसके कोने में एक तिपाई थी और उस तिपाई पर काले कपड़े में लिपटा हुआ बड़ा-सा बक्सानुमा कैमरा था जो केवल ग्रुप फोटो खींचने के ही काम आता है ।
सुनील उस कैमरे की ओर बढा ।
उसने कैमरे पर से काला कपड़ा हटाया और उसके पिछले भाग ढक्कन खोलकर भीतर झांका ।
कैमरे में रुई की तहों में लिपटी हुई बुद्ध की मूर्ति रखी हुई थी । कैमरे के भीतर की काली चारदीवारी के अन्धकार में भी बुद्ध के माथे पर जड़ा हुआ हीरा जगमगा रहा था ।
सुनील ने कैमरे में से मूर्ति निकालकर अपने कोट की भीतर की जेब में रख ली । उसने कैमरे को यथापूर्व बन्द किया, उस पार काला कपड़ा लपेटा और वापिस आकर चुपचाप सोफे पर बैठ गया ।
उसने जेब से लक्की स्ट्राइक का एक सिगरेट निकाला और उसे सुलगाकर लम्बे-लम्बे कश लेने लगा ।
उसी समय फोटोग्राफर बैसाखियां ठकठकाता हुआ डार्क रूम से निकला ।
सुनील ने देखा, वह लगभग तीस वर्ष का युवक था । उसकी दाईं टांग वैसे तो पांव तक पूरी थी लेकिन हड्डियों में कोई विकार होने के कारण वह दूसरी टांग से कम से कम चार इन्च छोटी थी । उसके चेहरे से चालाकी और मक्कारी टपकती थी और ऐसा लगता था जैसे वह एक टांग से लंगड़ा होने की तनिक भी परवाह नहीं करता था ।
वह सुनील के साथ सोफे पर आकर बैठ गया । उसने बैसाखियां सोफे के सहारे टिका दीं और चेहरे पर व्यावसायिक मुस्कराहट लाकर बोला - “फरमाइए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ? वैसे मैं ग्राहकों का काम दस बजे से शुरू करता हूं ।”
“मैं ग्राहक नहीं हूं ।” - सुनील बोला ।
“तो फिर ?” - उसके माथे पर बल पड़ गए ।
“आपको मालूम है कल रात दीवान साहब की पार्टी के दौरान उनकी कुछ चीजें चोरी हो गई थीं !”
“हां । एक बुद्ध की मूर्ति और एक ब्लो गन ।”
“आपको कैसे मालूम ? आप तो बहुत पहले वहां से चले आए थे ।”
“हां, मैं तो वहां से साढे दस बजे ही आ गया था लेकिन आ सुबह जब मैंने दीवान साहब को यह पूछने के लिए टेलीफोन किया कि पार्टी में लिए गए चित्रों के कितने-कितने प्रिंट निकालने थे तो तब दीवान साहब ने स्वयं मुझे बताया था ।”
“आपको मालूम है चोर कौन है ?”
“वाह, साहब ।” - फोटोग्राफर हड़बड़ाकर बोला - “मुझे कैसे मालूम हो सकता है ? लेकिन आप कौन हैं ? आप यह सब पूछने वाले कौन होते हैं ?”
और उसकी सन्दिग्ध दृष्टि सुनील के चेहरे पर जम गई ।
“मेरा नाम सुनील है । फिलहाल मैं आपको इतना बता सकता हूं कि मैं आपसे जो भी पूछ रहा हूं, दीवान साहब की दिलचस्पी की खातिर पूछ रहा हूं । अब यब आप पर निर्भर करता है कि आप मुझे या मेरे माध्यम से दीवान साहब को सहयोग देना चाहते हैं या नहीं ।”
फोटोग्राफर चुप रहा ।
“यह कैमरा” - सुनील ने उसे कैमरे की ओर, जिसमें से उसने बुद्ध की मूर्ति निकाली थी, संकेत करते हुए पूछा - “कल रात आप पार्टी में लेकर गए थे ?”
“हां ।” - वह बोला - “ग्रुप फोटो मैं हमेशा इसी कैमरे से लेता हूं । इस कैमरे में फिल्म के स्थान पर आठ गुणा दस इन्च की नैगेटिव प्लेट इस्तेमाल की जाती है इसलिए यह डिटेल अच्छी देता है और अक्सर तस्वीर को एलार्ज करने की जरूरत नहीं पड़ती ।”
“इस कैमरे से कितनी तस्वीरें ली थीं आपने ?”
“केवल दो । पार्टी के आरम्भ में लगभग नौ बजे । उसके बाद दोनों नैगेटिव प्लेट मैंने अपने बैग में रख ली थीं और कैमरे को एक कोने में रख दिया था ।”
सुनील एक क्षण चुप रहा । उसने सिगरेट का बचा हुआ टुकड़ा ऐश ट्रे में डाल दिया और फिर सहज स्वर में पूछा - “बैसाखियों के कारण आपको अपने काम में दिक्कत तो काफी महसूस होती होगी ?”
“कोई दिक्कत महसूस नहीं होती, साहब ।” - फोटोग्राफर भावहीन स्वर में बोला - “बचपन से ही बैसाखियों के सहारे चल रहा हूं । ये तो मेरे शरीर का ही एक अंग हो गई हैं । अब तो मुझे यह याद भी नहीं रहता कि मैं लंगड़ा हूं ।”
“मेरा मतलब है, चिकने फर्श पर तो लकड़ी के फिसल जाने का बड़ा खतरा रहता होगा ?”
“नहीं । यह देखिए ।” - फोटोग्राफर दोनों बैसाखियां उठाकर उनका नीचे का हिस्सा सुनील को दिखाता हुआ बोला - “इसके तले में रबड़ की वाशर सी लगी हुई है । इनके कारण बैसाखियां फिसल नहीं पातीं ।”
सुनील ने दोनों बैसाखियां अपने हाथ में ले लीं । उसे एक बैसाखी दूसरी से वजन में कुछ भारी लगी । सुनील उस बैसाखी के जमीन की ओर वाले सिर पर लगी रबड़ की वाशर को उमेठने की चेष्टा करने लगा ।
“यह हटेगी नहीं ।” - फोटोग्राफर बोला - “यह लड़की के साथ कील से जड़ी होती है ।”
“कील दिखाई नहीं दे रही ।” - सुनील बोला ।
“देखूं ।”
सुनील ने बैसाखी का वह भाग फोटोग्राफर की ओर कर दिया ।
वह कुछ क्षण उसे देखता रहा और फिर बोला - “दरअसल ये बैसाखियां मैंने केवल दस दिन पहले खरीदी हैं । उससे पहली वाली बैसाखियों में तो ये रबड़ कील से लगी हुई थीं । इसमें पता नहीं कैसे लगाई हैं ये ।”
सुनील ने बैसाखी का वह भाग अपनी ओर किया और रबड़ को झटका देकर बाहर की ओर खींचा । रबड़ इन्जेक्शन की शीशी के ढक्कन की तरह उखड़कर उसके हाथ में आ गई और बैसाखी की लकड़ी में से एक बांस की नकली सी बाहर की ओर सरकने लगी ।
सुनील ने उसे पकड़कर बैसाखी में से बाहर खींच लिया । वह तीन फुट लम्बी बांस की नली थी जो भीतर से खोखली थी ।
“यह क्या है ?” - सुनील बोला ।
“यह तो शायद...” - फिर फोटोग्राफर उत्तेजित हो उठा - “अरे ! यह तो... हे भगवान... यह तो ब्लो गन है ।”
“दीवान साहब की ब्लो गन ।” - सुनील शांति से बोला ।
“लेकिन यह मेरी बैसाखी में कैसे आई ?”
“यही तो मैं जानना चाहता हूं ।”
“मुझे क्या मालूम ?” - वह हड़बड़ाया ।
“मतलब यह कि आपने इसे खुद अपनी बैसाखी में नहीं रखा ?”
“सवाल ही नहीं पैदा होता । मैं क्या इस सड़ी सी चीज को चाटुंगा !”
“और आपको यह भी मालूम नहीं था कि आपकी बैसाखियां अन्दर से खोखली हैं ?”
“नहीं । भगवान की कसम, नहीं ।”
सुनील कुछ क्षण चुप रहा । फिर उसने रबड़ की वाशर वापिस बैसाखी में लगाकर बैसाखी फोटोग्राफर के सामने रख दी और ब्लो गन लेकर उठ खड़ा हुआ ।
“ओके ।” - वह बोला - “थैंक्यू फार दि कोआपरेशन ।”
और वह चलने का उपक्रम करने लगा ।
“ठहरो ।” - फोटोग्राफर अपनी बैसाखियों को अपनी बगल में दबाने की चेष्टा करता हुआ उठ खड़ा हुआ और तीव्र स्वर से बोला - “ब्लो गन को कहां ले जा रहे हो ?”
“इसे दीवान साहब को लौटाने जा रहा हूं ।” - सुनील सहज स्वर से बोला ।
“मैं इसे दीवान साहब के पास खुद पहुंचा दूंगा ।” - वह बोला ।
“अगर यह काम मैं कर दूं तो क्या हर्ज है ?”
“हर्ज है ।” - वह क्रुद्ध स्वर में बोला - “ब्लो गन वापिस दो मुझे ।”
“फोटोग्राफर साहब ।” - सुनील व्यंगभरे स्वर में बोला - “अगर मैं यह ब्लो गन तुम्हें दूंगा तो साथ में एक काम और करूंगा ।”
“क्या ?”
“मैं अभी पुलिस को फोन कर दूंगा कि दीवान साहब की ब्लो गन फोटोग्राफर सुदेश कुमार ने चुराई है और वह अभी भी उसके पास है ।”
फोटोग्राफर के चेहरे परेशानी के लक्षण परिलक्षित होने लगे ।
“अब क्या इरादा है ?” - सुनील बोला - “यह ब्लो गन दीवान साहब को मैं लौटाऊं या तुम लौटाओगे ?”
“तुम हो कौन ?” - कुछ क्षण बाद वह बोला ।
“मैंने तुम्हें बताया तो था । मैं सुनील हूं ।”
“सुनील तो ही । वास्तव में तुम क्या हो ?”
“वास्तव में क्या हूं ? वास्तव में मैं क्या तुम्हें अब्राहम लिंकन दिखाई दे रहा हूं ?” - सुनील उपहासपूर्ण स्वर में बोला ।
फोटोग्राफर ने एक बार खा जाने वाली नजरों से सुनील को देखा और फिर हताशा का प्रदर्शन करता हुआ चुप हो गया ।
“तुमने ब्लो गन क्यों चुराई थी ?”
“मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूं, ब्लो गन मैंने नहीं चुराई । मैं इस वाहियात चीज का अचार डालता क्या ? मुझे तो यह भी नहीं मालूम ता कि मेरी बैसाखियां बीच में से खोखली हैं ।”
“तो फिर ब्लो गन तुम्हारी बैसाखी में कैसे पहुंची ?”
“मुझे नहीं मालूम ।”
“कल रात पार्टी के दौरान क्या तुमने कभी बैसाखियों को अपने से अलग किया था ?”
“हां ।” - वह कुछ क्षण सोचता हुआ बोला - “डिनर के समय मेरे कुर्सी पर बैठ जाने के बाद वेटर बैसाखियां ले गया था क्योंकि डिनर टेबल पर रखी बैसाखियां बहुत भद्दी लगती थीं । डिनर समाप्त होने पर वेटर ने बैसाखियां मुझे वापिस ला दी थीं ।”
“बैसाखियां कितनी देर तुमसे अलग रही थीं ?”
“लगभग पौन घण्टा ।”
“डिनर के समय तस्वीरें नहीं खींची गई थीं क्या ?”
“खींची गई थीं ।”
“तुम तो डिनर टैबल पर बैठे हुए थे । तो फिर...”
“मेरे साथ एक असिस्टेंट था । डिनर के समय की तस्वीरें उसने ली थीं ।”
कई क्षण शान्ति रही ।
“तो फिर यह ब्लो गन मैं ले जाऊं न ?” - सुनील ने पूछा ।
“ले जाओ ।” - फोटोग्राफर कठिन स्वर में बोला ।
“थैंक्यू ।”
“डोंट मेंशन... सुनील साहब, अपनी तीस साल की जिन्दगी में आज मैं पहली बार अपने-आपको परले सिरे का बेवकूफ महसूस कर रहा हूं ।”
“तो फिर क्या हुआ ? तजुर्बा यूं ही बढता है । अब अगली बार ख्याल रखना ।”
और सुनील ब्लो गन को विजय के झंडे की तरह उठाये हुए बाहर निकल आया ।
***
यूथ क्लब में उल्लू बोल रहे थे ।
रिसेप्शन के काउन्टर के पीछे उस समय यूथ क्लब की सुन्दर रिसेप्शनिस्ट के स्थान पर एक वेटर बैठा था ।
सुनील को देखकर वह उठ खड़ा हुआ । वह सुनील को पहचानता था ।
“सलाम सा’ब ।” - वह बोला ।
“रमाकांत कहां है ?”
“साब तो अपने कमरे में हैं । अभी सो रहे हैं ।”
सुनील ब्लो गन को छड़ी की तरह हाथ में लिए पहली मंजिल पर स्थित रमाकांत के कमरे में पहुंच गया ।
उसने रमाकांत को झंझोड़ कर जगाया ।
“सोने दो न, यार ।” - रमाकांत झुंझलाहटभरे स्वर में बोला - “तुम कहां आ मरे सुबह-सुबह नींद हराम करने ।”
“अबे, यह सुबह है !” - सुनील चिल्लाया - “साढे दस बज रहे हैं ।”
“तो फिर क्या हुआ ? रात साढे तीन बजे बिस्तर में पहुंचा था ।”
“मैं तुम्हारे लिए एक उपहार लाया हूं । उसे देख लो फिर चाहे सारा दिन सोना ।”
“उपहार को मेज पर रख दो और तुम दफा हो जाओ ।”
“अबे कम्बख्त, एक बार आंखें तो खोल ।”
रमाकांत ने आंखें खोलीं और तिक्ततापूर्ण ढंग से सुनील की ओर देखा । ब्लो गन पर दृष्टि पड़ते ही उसके नेत्र फैल गए ।
“ब्लो गन !” - वह चिल्लाया ।
“अभी इसे भी देखो ।” - और सुनील ने बुद्ध की मूर्ति निकाल कर उसके सामने रख दी ।
“बुद्ध की मूर्ति !” - वह और जोर से चिल्लाया - “व्हाट दि हैल !”
उसके नेत्रों से नींद उड़ गई । वह उछलकर बिस्तर पर बैठ गया ।
सुनील ने ब्लो गन को पलंग के साथ टिकाया और द्वार की ओर बढता हुआ बोला - “मैं चला ।”
“अबे ओ सुनील के बच्चे ।” - रमाकांत चिल्लाया - “कम बैक हेयर ।”
सुनील रुक गया ।
“यहां आकर बैठो ।” - रमाकांत पलंग के पास रखी कुर्सी की ओर संकेत करता हुआ बोला ।
सुनील आकर कुर्सी पर बैठ गया ।
“चाय पिओगे या कॉफी ?” - रमाकांत ने प्यार से पूछा ।
“इस समय तो तुम्हारा खून पीने की इच्छा हो रही है, प्यारेलाल ।” - सुनील बोला ।
“वह भी हाजिर है, मालको, यह तो बताओ ये चीजें तुम्हें कहां से मिलीं ?”
“बता दूं ?”
“प्लीज ।”
“तो फिर सारा किस्सा शुरू से सुनो ।” - सुनील गम्भीर स्वर में बोला - “रमाकांत, अगर दीवान नाहरसिंह के कथनानुसार ब्लो गन और मुर्ति उसके घर में छुपी हुई नहीं थी और न ही ये चीजें छत पर से चीजे फेंकी गई थीं तो इसका अर्थ यह हुआ कि वे चीजें लिफ्ट के रास्ते ही इमारत से बाहर ले जाई गई थीं लेकिन लिफ्ट के द्वार पर तुम खड़े थे । तुम्हारी नजरों से बुद्ध की मूर्ति तो छुप सकती थी लेकिन तीन फुट लम्बी ब्लो गन नहीं छुप सकती थी । इसका सीधा अर्थ था कि ब्लो गन किसी ऐसी चीज में छुपा कर ले जाई गई थी जिसकी ओर तुम्हारा ध्यान नहीं गया था । ऐसी चीज जिसमें तीन फुट लम्बी ब्लो गन छुप सके, लंगड़े फोटोग्राफर की बैसाखियों के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकती थी । वह बैसाखियां ठकठकाता हुआ तुम्हारी नाक के नीचे से निकल गया और तुम्हें खबर तक नहीं हुई ।”
“इसका अर्थ यह हुआ कि ब्लो गन फोटोग्राफर ने चुराई थी ।” - रमाकांत पलकें झपकता हुआ बोला ।
“जरूरी नहीं है । शायद किसी को मालूम था कि फोटोग्राफर की बैसाखियां बीच में खोखली थीं । डिनर के समय बसाखियां फोटोग्राफर के पास नहीं थीं । उस समय शायद किसी ने ब्लो गन उसमें रख दी हो । बाद में फोटोग्राफर से ब्लो गन हथिया लेना कठिन काम नहीं था ।”
“लेकिन ऐसा कौन कर सकता है ?”
“तुम्हें क्या जरूरत है यह जानने की ! तुम्हारी जिम्मेदारी तो खोई हुई चीजें वापिस आने तक की थी सो खत्म हुई ।”
“और बुद्ध की मूर्ति किसके पास मिली तुम्हें ?”
“वह भी फोटोग्राफर के पास से ।”
“शट अप ।” - रमाकांत अविश्वासपूर्ण स्वर में बोला ।
“विश्वास करो ।”
“मूर्ति कैसे ले गया वह ? लिफ्ट में तो एक्सरे मशीन लगी हुई थी । अगर फोटोग्राफर लिफ्ट में मूर्ति लेकर घुसा होता तो आपरेटर को वह फौरन दिखाई दे जानी चाहिए थी । लेकिन मूर्ति दिखाई नहीं दी । इसका मतलब है कि कोई मूर्ति लेकर लिफ्ट में नहीं घुसा ।”
“इसका मतलब यह नहीं हुआ कि उस समय एक्स-रे मशीन बन्द कर दी गई हो ?”
“यह कैसे हो सकता है ?”
“यही हुआ है, रमाकांत ।” - सुनील बोला - “एक्सरे कैमरे की फिल्म का सत्यानाश कर देती है । अगर फोटोग्राफर के लिफ्ट में से गुजरते समय भी एक्सरे मशीन चालू रखी जाती तो सारी फिल्में धुंधला जाती और पार्टी की एक भी तस्वीर सलामत नहीं रह पाती । इसलिए दीवान साहब ने एक्सरे मशीन के आपरेटर से जरूर कहा होगा कि जब फोटोग्राफर लिफ्ट में से गुजरे तो मशीन बन्द कर दी जाए ।”
“मूर्ति कहां थी ?”
“फोटोग्राफर के बड़े बॉक्स कैमरे में ।”
“अगर ब्लो गन नहीं तो मूर्ति तो फोटोग्राफर ने चुराई होगी ?” - रमाकांत बोला ।
“रमाकांत, मेरे ख्याल से तो फोटोग्राफर को यह भी मालूम नहीं था कि मूर्ति उसके कैमरे में थी ।”
“वह कैसे ?”
“बुद्ध की मूर्ति रुई में लपेटकर कैमरे में रखी गई थी । कोई फोटोग्राफर रुई जैसी चीज कैमरे के अन्दर नहीं डालेगा । रुई का जारा सा फाइबर भी कैमरे के लेंस से चिपका रह जाए तो तस्वीर खराब हो जाती है । अगर मूर्ति फोटोग्राफर ने कैमरे में रखी होती तो मुझे वह रूमाल या किसी और कपड़े में लिपटी हुई मिलती ।”
“फोटोग्राफर ने मूर्ति के विषय में क्या कहा ?”
“उसे मालूम ही नहीं है कि मैं कैमरे में से मूर्ति निकाल लाया हूं । और अगर कहीं मुझे बैसाखियां बाहर पड़ी मिल जातीं और मैंने ब्लो गन भी यूं ही चोरी से निकाल लानी थी ।”
रमाकांत अपलक सुनील को देख रहा था ।
“अब सन्तुष्ट हो ?” - सुनील उठता हुआ बोला ।
“सुनो ।” - रमाकांत व्यग्र स्वर में बोला ।
“अब क्या है ?”
“यार, एक काम करो न ।” - उसके स्वर में याचना का पुट था ।
“क्या ?”
“ये चीजें तुम्हीं दीवान साहब को वापिस दे आओ ।”
“तुम्हें क्या तकलीफ है ?”
“यार, वह मेरे से पहले ही भुना बैठा है । वह मुझे खामखाह शर्मिन्दा करेगा कि इतनी छोटी सी बात मेरे दिमाग में क्यों नहीं आई !”
“तो फिर क्या हुआ ? तुम क्या उसके बाप के नौकर हो ?”
“फिर भी यार, यह मेहरबानी करो मुझ पर । मैं उसके सामने नहीं पड़ना चाहता ।”
“मर्जी तुम्हारी ।” - सुनील ने दोनों चीजें उठा लीं ।
“और आज से मेरे बाप की भी तौबा अगर मैं किसी औरत के चक्कर में पड़कर फूंक में आऊं ।”
“तो फिर यूं करो । यूथ क्लब में औरतों का आना बन्द कर दो ।”
“असम्भव । प्यारयो, मैंने यह तो नहीं कहा कि मैं औरतों के चक्कर में नहीं पडूंगा । मैंने यह कहा है कि मैं उनके चक्कर में पड़कर फूंक में नहीं आऊंगा ।”
और रमाकांत फिर बिस्तर में घुस गया ।
***
प्रीमियर बिल्डिंग की छटी मंजिल तक सुनील बड़ी सरलता से पहुंच गया ।
छटी मंजिल पर दीवान नाहरसिंह की प्राइवेट लिफ्ट के सामने स्टूल पर एक लड़का बैठा था । लिफ्ट बन्द थी ।
“दीवान साहब हैं ?” - सुनील ने लड़के से पूछा ।
“हैं । लेकिन इस समय किसी से मिल नहीं सकते ।”
“मुझे उनसे बहुत महत्वपूर्ण काम है ।”
“कितना भी महत्वपूर्ण काम क्यों न हो, साहब । आप दीवान साहब से नहीं मिल सकते । चाहे आप ये सन्देश ही क्यों न लाए हों कि प्रीमियर बिल्डिंग में आग लग गई है ।”
“यह गन देख रहे हो ?” - सुनील उसे ब्लो गन दिखाता हुआ बोला - “यह मैं दीवान साहब के लिए लाया था ।”
“इसे आप उनकी मिसेज को दे दीजिए । इसी मंजिल के एक फ्लैट को उन्होंने अपना स्टूडियो बनाया हुआ है । उन्हें पेंटिंग का शौक है ।”
“कहां हैं उनका स्टूडियो ?”
“इस गलियारे में सीधे चले जाइए ।” - लड़का एक लम्बे गलियारे की ओर संकेत करता हुआ बोला - “आखिर में वह दायीं ओर का द्वार खटखटा दीजिए ।”
सुनील ने लड़के के बताये हुए द्वार के सामने पहुंचकर द्वार खटखटा दिया ।
द्वार नीला ने खोला । उसने एक लम्बा सा चोगा पहना हुआ था जिस पर कई रंगों के पेंट के धब्बे लगे हुए थे । उसके हाथ में एक रंग में डूबा हुआ ब्रुश थमा हुआ था ।
“हल्लो ।” - वह मुस्कराई ।
“हल्लो ।” - सुनील बोला ।
उसी समय नीला की दृष्टि सुनील के हाथ में थमी ब्लो गन पर पड़ी । उसके चेहरे से मुस्कराहट उड़ गई और उसका स्थान एक गहरी हैरानी ने ले लिया ।
“ब्लो गन !” - वह हैरानीभरे स्वर में बोली ।
“ब्लो गन ।” - सुनील बोला - “और साथ में...”
“भीतर आओ न ।”
सुनील ने भीतर आकर देखा कि वह एक गोल कमरा था जिसके सामने वाले सारे भाग में बड़ी-बड़ी शीशे की खिड़कियां थीं और उन पर झीने रेशमी पर्दे पड़े हुए थे । बीच से कुछ हटकर एक इजेल रखा था जिस पर एक कैनवस टंगा हुआ था । कमरे में लगभग एक दर्जन हाथ की बनी तस्वीरें लगी हुई थीं । कमरे के बीच मे लगभग एक फुट ऊंचा प्लेटफार्म था जिस पर एक लड़की बैठी हुई थी । उसके बालों से उसका आधा चेहरा ढका हुआ था ।
उसके शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं था ।
सुनील ने उस ओर से दृष्टि फिरा ली ।
लड़की सुनील को देखकर चिहुंकी और फिर एकदम उठकर एक कुर्सी पर पड़े गाउन की ओर लपकी । उसने जल्दी से अपने शरीर के गाउन में लपेट लिया । उसका चेहरा शर्म से लाल हो उठा था ।
“ओह, आई एस सॉरी ।” - नीला शरारत भरे स्वर में बोली - “मुझे तुम्हारा ख्याल ही नहीं रहा था, एंजिला ।”
“डोंट माईन्ड नाओ ।” - एंजिला नाराजगीभरे स्वर में बोली ।
“सुनील ।” - नीला परिचय कराती हुई बोली - “यह एंजिला है । मेरी मित्र है । अपने अवकाश के समय में यह मेरे लिए मॉडल बनना स्वीकार कर लेती है । और एंजिला, ये सुनील है । यूथ क्लब में इससे अक्सर मुलाकात हो जाती है । मैं तो समझी थी कि यह मुझसे मिलने आया है लेकिन इसके हाथ में पकड़ी ब्लो गन देखकर लगता है कि इसे दीवान साहब की तलाश है ।”
“प्लीज्ड टु मीट यू ।” - एंजिला सुनील से हाथ मिलाती हुई बोली ।
“मी टु ।” - सुनील बोला और उस समय उसने पहली बार गौर से एंजिला का चेहरा देखा ।
सूरत उसे बहुत जानी-पहचानी लगी ।
एकाएक उसे ख्याल आ गया कि उसने वह सूरत पहले कहां देखी थी । फोटोग्राफर सुदेश कुमार के स्टूडियो में एंजिला की बहुत सी तस्वीरें लगी हुई थीं ।
एक विचार बिजली की तरह उसके दिमाग में कौंध गया ।
“ब्लो गन के अलावा तुम किसी और भी चीज का जिक्र करने वाले थे ।” - नीला बोली ।
“नहीं तो ।” - सुनील ने कहा ।
“मैं समझी थी कि तुम...”
“नहीं ।” - सुनील बात काटक बोला - “रमाकांत दूसरी चीज अभी तलाश कर रहा है ।”
“ओह !” - नीला बोली ।
“मिस एंजिला ।” - सुनील एंजिला से सम्बोधित हुआ - “मॉडलिंग आपका धंधा है ?”
“नहीं ।” - नीला बोली - “एंजिला नगर की फर्स्ट क्लास हेयर ड्रेसर है । मॉडलिंग यह सिर्फ मेरे लिए करती है ।”
“हेयर ड्रेसर !” - सुनील उसके बालों की ओर देखता हुआ बोला - “खुद तो ये बड़े लम्बे बाल रखती हैं ।”
“नकली हैं ।” - एंजिला बोली - “नीला के लिए पोज करने के लिए लगाए थे ।”
और उसने बालों का विग उतारकर एक कुर्सी पर रख दिया । नीचे से उसके शानदार कटे हुए बाल निकल आए ।
“मैं यह ब्लो गन दीवान साहब को देना चाहता था ।” - सुनील नीला से बोला ।
“आज सम्भव नहीं ।”
“क्यों ?”
“दीवान साहब आजकल एक पुस्तक लिख रहे हैं । वे नहीं चाहते कि एक-दो दिन तक कोई उन्हें डिस्टर्ब करे । उन्होंने ऊपर की मन्जिल के दो कमरे विशेष रूप से इसी काम के लिए रखे हुए हैं । वहीं उन्होंने डिब्बा बन्द आने वाला कुछ खाने-पीने का सामान भी रखा हुआ है । कभी-कभी तो बेचारे चार-चार दिन तक उन्हीं कमरों में बन्द रहते हैं । ब्लो गन मिल जाने की सूचना भी उन तक तब तक पहुंचाना असम्भव है जब कि वे स्वयं वहां से बाहर न निकलें ।”
“तो फिर दीवान साहब तक यह सूचना पहुंचाने का कोई साधन नहीं है कि चोरी गई ब्लो गन मिल गई है ।”
नीला कुछ क्षण सोचती रही फिर उसने अलमारी में से एक टार्च निकाली और बोली - “मेरे साथ आओ ।”
नीला सुनील को बाथरूम मे ले गई । उसने द्वार भीतर से बन्द कर दिया । उसने बाथरूम की खिड़की खोल दी और सुनील को समीप आने का संकेत किया ।
खिड़की इतनी छोटी थी कि सुनील को बाहर झांकने के लिए उससे सटकर खड़ा होना पड़ा ।
“वह सामने बड़ी-सी खिड़की देख रहे हो ?” - नीला लगभग पच्चीस फुट दूर बाथरूम की खिड़की के लैवल से कम से कम पन्द्रह फुट ऊंची एक बड़ी-सी खुली खिड़की की ओर संकेत करती हुई बोली - “वह दीवान साहब के उन दो कमरों में से एक की खिड़की है जिनका मैंने अभी जिक्र किया था । वह दीवान साहब के लिखने के कमरे की खिड़की है, कभी-कभी जब वे टहल रहे हों तो वे यहां से दिखाई दे जाते हैं । अगर वे मुझे खिड़की में से दिखाई दे गए तो मैं इस टार्च की सहायता से उनका ध्यान आकृष्ट करने की चेष्टा करूंगी लेकिन परिणाम के जिम्मेदार तुम होगे । दीवान साहब बहुत जल्दी भड़क जाते हैं ।”
“इससे आसान तरीका यह नहीं कि तुम ऊपर जाकर उनके कमरे का द्वार खटखटा दो ।”
“वे दोहरे दरवाजे हैं और दोनों कमरे साउन्डप्रूफ हैं । द्वार की खटखटाहट सुनाई नहीं देगी ।”
“उन कमरों में टेलीफोन नहीं हैं ?”
“नहीं ।”
“लेकिन यह किला-सा बनाकर रहने की जरूरत क्या है ?”
“बुढापे की झक है । वे समझते हैं कि इस ढंग से उनका मस्तिष्क अधिक काम करता है ।”
खिड़की से बाहर झांकने के लिए नीला सुनील के साथ और सट गई ।
“अगर दीवान साहब हमें इस हालत में देख लें ।” - सुनील परेशान स्वर में बोला - “तो...”
“पागल मत बनो । आखिर इस छोटे से बाथरूम की छोटी-सी खिड़की में से इस ढंग से खड़े हुए बिना दो आदमी बाहर कैसे झांक सकते हैं ?”
“फिर भी ।”
“फिर भी की क्या तुम्हें मेरे से ज्यादा फिक्र है ?”
सुनील चुप हो गया । वह नीला के शरीर के हर अंग का दबाव अपने शरीर पर अनुभव कर रहा था ।
नीला ने टार्च का प्रकाश दीवान साहब के कमरे की खिड़की पर डाला । कमरे की सामने वाली दीवार चमक उठी । नीला ने प्रकाश बन्द कर दिया और प्रतीक्षा करने लगी ।
खिड़की पर कोई दिखाई नहीं दिया ।
“शायद दीवान साहब दूसरे कमरे में हैं ।” - नीला बोली ।
वह अब भी पहले की तरह सुनील से सटी हुई थी ।
“तुम्हारे कोट की ऊपर की जेब में क्या है ?” - एकाएक वह बोली ।
“फाउन्टेन पैन ।”
“निकालो उसे । मुझे चुभ रहा है ।”
सुनील ने पैन निकालकर कोट की साइड पॉकेट में डाल लिया ।
“एक बार फिर कोशिश करती हूं ।” - वह बोली और उसने टार्च का प्रकाश फिर सामने वाली खिड़की पर डाला ।
खिड़की पर दीवान साहब दिखाई नहीं दिए ।
एकाएक नीला ने टार्च बन्द कर दी और खिड़की पर से हट गई ।
“कोई लाभ नहीं ।” - वह बोली - “शायद वे दूसरे कमरे में ही हैं । और फिर मुझे भी अपनी इस हरकत से डर लगने लगा है । वे बहुत नाराज होंगे ।”
सुनील कुछ नहीं बोला ।
“सुनील ।” - नीला एक बार फिर सुनील के साथ आ लगी - “तुम बुद्ध की मूर्ति के बारे में कुछ कहने वाले थे ?”
“नहीं तो ।” - सुनील बोला ।
“वाकई तुम्हें अभी तक मूर्ति नहीं मिली ?”
“नहीं ।”
“सच कह रहे हो ?” - वह उसके नेत्रों में झांकती हुई बोली ।
“शत-प्रतिशत ।”
नीला कुछ क्षण आशान्वित नेत्रों से सुनील का चेहरा देखती रही जो स्वयं उसके चेहरे से केवल चार इन्च दूर था । वह कुछ क्षण प्रतीक्षा करती रही और फिर एक गहरी सांस लेकर अलग हो गई ।
“आज मैं अपनी भारी हार महसूस कर रही हूं ।”
“किस मामले में ?”
“मैं समझती थी कि पुरुष मेरे लिए लालायित रहते हैं । वे मेरे समीप्य को पाकर पागल हो उठते हैं लेकिन तुम...”
और उसने एक झटके से बाथरूम का द्वार खोल दिया ।
“तुम ब्लो गन छोड़ जाओ, सुनील ।” - वह बाहर आकर एकदम बदले स्वर में बोली - “मैं दीवान साहब को बता दूंगी कि बन्द की मूर्ति की तलाश अभी जारी है ।”
“ओके ।” - सुनील बोला ।
“एण्ड थैंक्स फार दि विजिट ।” - नीला ब्रुश और रंगों में उलझती बर्फ से ठन्डे स्वर से बोली ।
“आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई, मिस एंजिला ।” - सुनील द्वार की ओर बढता हुआ बोला - “आशा है फिर मुलाकात होगी ।”
“ओह, श्योर ।” - एंजिला बोली - “बाई ।”
नीला ने कहरभरे नेत्रों से पहले एंजिला को और फिर सुनील की ओर देखा ।
सुनील चुपचाप बाहर निकल आया ।
***
अगले दिन सुबह साढे नौ बजे सुनील ‘ब्लास्ट’ के दफ्तर के अपने केबिन में बैठा हुआ था ।
एकाएक उसने डायरेक्ट्री उठाई, उसमें दीवान नाहरसिंह का नम्बर देखा और फिर रिसीवर उठा लिया ।
“यस ।” - रिसेप्शनिस्ट रेणु का मधुर स्वर सुनाई दिया ।
“रेणु, जरा यह नम्बर देना ।” - सुनील उसे दीवान का नम्बर बताता हुआ बोला ।
“स्पीक आन, सोनू ।” - कुछ क्षण बाद रेणु का स्वर सुनाई दिया - “दीवान साहब नहीं है । कोई रूपसिंह बोल रहा है ।”
“हल्लो ।” - साथ ही रूपसिंह का स्वर सुनाई दिया - “रूपसिंह हेयर ।”
“मिस्टर रूपसिंह, मैं सुनील बोल रहा हूं ।”
“फरमाइए ।”
“मैंने यह बताने के लिए फोन किया है कि रमाकांत ने ब्लो गन तलाश कर ली है और मैं...”
“क्या ?” - रूपसिंह अविश्वासपूर्ण स्वर में चिल्लाया ।
“ब्लो गन रमाकांत ने तलाश कर ली है ।” - सुनील ने दोहराया - “और मैं उसे नीला के स्टूडियों में छोड़ आया हूं ।”
“लेकिन तुम्हें तो ब्लो गन दीवान साहब को लौटानी चाहिए थी ।”
“दीवान साहब मिल नहीं रहे थे इसलिए मैं वह नीला को दे आया था । आपको पता नहीं लगा अभी तक ?”
“नहीं । मेरी नीला से मुलाकात नहीं हुई ।”
“और अब मेरे पास बुद्ध की मूर्ति है, वह किसे दूं ?”
“तुम्हारे पास क्या है ?”
“बुद्ध की मूर्ति ।” - सुनील जोर से बोला - “क्या बात है मिस्टर रूपसिंह, आपको ठीक सुनाई नहीं दे रहा है क्या ?”
“सुनाई तो ठीक दे रहा है लेकिन जो सुनाई दे रहा है उस पर विश्वास नहीं हो रहा है । इतनी जल्दी तुमने दोनों चीजें तलाश कर लीं ?”
“मैंने नहीं, रमाकान्त ने ।”
“फिर भी कमाल है ।”
“अब तुम मुझे यह बताओ कि मैं यह मूर्ति किसे दूं ?”
“सुनील, तुम मूर्ति यहां ले आओ । अभी दस बजे दीवान साहब अपने एकान्तवास में से निकलने वाले हैं । तुम तब ही उन्हें मूर्ति दे देना और ब्लो गन के विषय में भी बता देना ।”
“नीला ने तुम्हें ब्लो गन के विषय में कुछ नहीं बताया ?”
“नहीं, तुम कितनी देर में पहुंचोगे यहां ?”
“आधे घण्टे में ।”
“ओके ।”
सुनील ने टेलीफोन रख दिया और केबिन से बाहर निकल आया ।
“रेणु ।” - रिसेप्शन के सामने आकर वह बोला - “मैं एक काम से प्रीमियर बिल्डिंग जा रहा हूं । मलिक साहब पूछें तो बता देना ।”
“ओके ।”
सुनील बाहर निकल आया और अपनी मोटर साइकल द्वारा प्रीमियर बिल्डिंग पहुंच गया ।
इस बार छटी मन्जिल के बाद दीवान साहब के फ्लैटों में जाने में उसे परेशानी नहीं हुई ।
“आपका नाम सुनील है !” - लिफ्ट बॉय ने उससे पूछा ।
“हां ।”
“तशरीफ लाइये । रूपसिंह जी आपको ऊपर ले आने के लिए कह गए हैं ।”
लड़के ने उसे एक ड्राईंगरूम में छोड़ दिया ।
उसी समय रूपसिंह वहां आया ।
“वैल, वैल, वैल ।” - वह दूर से हाथ बढाता हुआ लपका - “सुनील, यू आर वन्डरफुल । रमाकांत इज वन्डरफुल । आप लोगों ने तो कमाल कर दिया ।”
सुनील ने उससे हाथ मिलाया ।
“आओ, दीवान साहब के कमरों में चलें ।” - रूपसिंह बोला - “उन्होंने अभी तक द्वार खोल दिए होंगे ।”
“बेहतर ।”
रूपसिंह उसे कई गलियारों में से घुमाता हुआ एक कमरे में ले गया ।
“अभी तक द्वार नहीं खुला ।” - रूपसिंह एक द्वार की ओर देखता हुआ बोला - “ग्यारह बज गए हैं जबकि दीवान साहब ने मुझे कहा था कि वे दस बजे बाहर निकल आयेंगे ।”
सुनील चुप रहा ।
रूपसिंह कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा । फिर वह उस दीवार के पास पहुंचा जिसे उसने दीवान साहब के प्राइवेट कमरों का प्रवेश द्वार बताया था । उसने द्वार की चौखट पर एक स्थान पर उंगली रख दी । भीतर कहीं घन्टी बजने की बड़ी धीमी आवाज सुनाई दी ।
कई क्षण प्रतीक्षा करते रहने के बाद भी द्वार नहीं खुला ।
“कमाल है !” - रूपसिंह उलझनपूर्ण स्वर में बोला - “ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ ।”
उसी समय एक पारदर्शी गाउन में लिपटी हुई नीला वहां प्रकट हुई ।
“हल्लो ।” - वह सुनील को देखकर विचित्र भाव से बोली ।
“हल्लो ! गुड मोर्निंग ।”
“क्या हो रहा है, रूपसिंह ?” - उसने अधिकारपूर्ण स्वर में रूपसिंह से पूछा ।
“दीवान साहब ने कहा था कि वे दस बजे बाहर आ जायेंगे । ग्यारह से भी अधिक समय हो गया और अभी तक उन्होंने द्वार नहीं खोला है ।”
“तुम्हें कहा था उन्होंने कि दस बजे वे बाहर निकलेंगे ?”
“जी हां ।”
“कब ?”
“कल शाम को उन्होंने थोड़ी देर के लिए द्वार खोला था । तब ही उन्होंने मुझे यह बताया था । उस समय आप नीचे स्टूडियो में थीं ।”
रूपसिंह ने फिर घन्टी बजाई ।
कोई उत्तर नहीं मिला ।
सुनील ने देखा कि घन्टी का बटन दिखाई नहीं दे रहा था ।
“बटन कहां है ?” - सुनील ने पूछा ।
“यही तो कमाल है ।” - रूपसिंह बोला - “तुम खोज कर दिखाओ ।”
“इस बार घन्टी बजाओ ?” - सुनील बोला ।
“अभी लो । अंगूठे पर नजर रखना ।”
रूपसिंह कुछ क्षण अपना अंगूठा द्वार की चौखट पर फिराता रहा फिर एकाएक उसने एक स्थान को अंगूठे से दबा दिया ।
भीतर से फिर हल्की-सी घन्टी की आवाज सुनाई दी ।
“मैं समझ गया ।” - सुनील बोला ।
“तो फिर बजाकर दिखाओ ।” - रूपसिंह ने चैलेंज-सा दिया ।
सुनील द्वार के सामने आ खड़ा हुआ और अपना अंगूठा चौखट पर फिराने लगा लेकिन साथ ही वह अपने जूते की ठोकर को ठीक उसी पोजीशन में ले आया जिसमें पहले रूपसिंह का जूता था । सुनील ने अंगूठे से चौखट दबाने का बहाना-सा किया । लेकिन साथ ही उसने पांव की ठोकर पर भी दबाव दिया ।
घन्टी बज गई ।
“सुनील साहब ।” - रूपसिंह प्रशंसात्मक दृष्टि से उसकी ओर देखता हुआ बोला - “आप वाकई उस्ताद हैं ।”
“लेकिन भीतर से कोई उत्तर क्यों नहीं मिल रहा है ?” - नीला चिन्तित स्वर में बोली ।
“कहीं दीवान साहब बीमार न हो गए हों ।” - रूपसिंह बोला - “आपके पास इस द्वार की इमरजेन्सी के समय प्रयोग में लाने के लिए एक चाबी है न ! उसे लाइए, खोलकर देखते हैं ।”
“न-न ।” - नीला बोली - “दीवान साहब बहुत नाराज होंगे ।”
“लेकिन आप यह भी तो सोचिए कि शायद उन्हें भीतर कुछ हो गया हो । आखिर वह चाबी है किसलिए ! आप लाइए तो सही ।”
“मैं इतना हौसला नहीं कर सकती ।” - सुनील बोली ।
“अगर दीवान साहब को कुछ हो गया तो उसकी जिम्मेदारी आप पर होगी ।”
नीला सोचती रही ।
“लाइए, कहां है वह चाबी !”
“मेरी ड्रेसिंग टेबल की दराज में ।”
“तो ले के आइए उसे ।”
नीला चाबी ले आई ।
“मिस्टर सुनील ।” - वह चाबी रूपसिंह को देती हुई बोली - “आप गवाह हैं । मैं द्वार खोलने के हक में नहीं हूं । रूपसिंह के भारी अनुरोध पर ही मैं इसे चाबी दे रही हूं ।”
लेकिन रूपसिंह ने यह सब नहीं सुना । उसने झपट कर द्वार खोल‍ दिया और भीतर घुस गया ।
सुनील और नीला भी भीतर घुस गए ।
भीतर कमरे के द्वार पर एकाएक रूपसिंह ठिठक कर खड़ा हो गया । उसके चेहरे की रंगत बदलने लगी ।
सुनील लपक कर रूपसिंह की बगल में पहुंचा ।
फर्श पर पीठ के बल दीवान नाहरसिंह का मृत शरीर पड़ा था । उसकी छाती में गले से कुछ ही नीचे एक छोटा-सा तीर गड़ा हुआ था । वैसा ही एक तीर खिड़की के सामने वाली दीवार में बनी अलमारी की चौखट में छत से जरा ही नीचे गड़ा हुआ था ।
“हे भगवान !” - रूपसिंह के मुंह से निकला ।
“ये तो ब्लोगन से निकला हुआ तीर है ।” - नीला घबराए स्वर में बोली ।
“ऐसा ही एक तीर अलमारी में भी गड़ा हुआ है ।” - सुनील अलमारी की ओर संकेत करता हुआ बोला ।
नीला आगे बढी और उसने अलमारी में गड़े तीर को निकालने के लिए हाथ बढ़ा दिया ।
“हाथ मत लगाना उसे ।” - सुनील चेतावनीपूर्ण स्वर में चिल्लाया ।
नीला एकदम मुड़ी और क्रोधपूर्ण दृष्टि से सुनील को घूरती हुई बोली - “जानते हो तुम किसके घर में खड़े हो और किसे हुक्म दे रहे हो ?”
“जहन्नुम में जाओ तुम और तुम्हारा घर । मैं तुम्हें अक्ल की बात बता रहा हूं अगर वह तुम्हारे भेजे में घुसती हो तो । जिस कोण से यह तीर अलमारी की चौखट में घुसा है उससे यह जाना जा सकता है कि यह इस खिड़की में से होता हुआ निचली मंजिल में तुम्हारे स्टूडियो के बाथरूम की खिड़की में से यहां आया है । अगर तुमने यह तीर अलमारी में से खींच लिया तो पुलिस वाले यही समझेंगे कि तुमने जानबूझ कर एक सबूत नष्ट कर दिया ताकि उन्हें मालूम न हो सके कि ब्लो गन में से यह तीर तुम्हारे स्टूडियों के बाथरूम की खिड़की में से छोड़ा गया था । तुम्हारे इस एक्शन से यही प्रकट होगा कि तुम्हें अपने पति की मृत्यु से अधिक इस तीर की चिन्ता थी । ब्राइटआइज, कुछ घुसा भेजे में ?”
नीला ने खा जाने वाली दृष्टि से सुनील को देखा लेकिन मुंह से एक शब्द नहीं बोली ।
“तुम जरूरत से ज्यादा अथारिटी दिखा रहे हो ।” - रूपसिंह बोला ।
“हां, क्योंकि मैं इन मामलों की तुमसे अधिक जानकारी रखता हूं । अकलमन्दी इसमें ही है, मिस्टर रूपसिंह, कि आप लोग फौरन यहां से बाहर निकल जायें, इस द्वार को ताला लगा दें और फौरन पुलिस को फोन कर दें ।”
“और अगर हम तुम्हारा आदेश न मानें तो ?”
“तो फिर पुलिस की तफ्तीश के दौरान मैं उन्हें यह बताने से नहीं चूकूंगा कि आप लोग जानबूझ कर दीवान साहब की हत्या की रिपोर्ट करने में देर करते रहे थे क्योंकि आप यहां पुलिस के पहुंचने से पहले कोई गड़बड़ करना चाहते थे । पुलिस वाले प्रौढ दीवान साहब की जवान बीवी और उनके जवान सैक्रेट्री की सांठ-गांठ को अच्छी निगाहों से नहीं देखेंगे । और फिर खबरें अखबारों में छपने के निगाहों से नहीं देखेंगे । और फिर ऐसी खबरें अखबारों में छपने के बाद बड़ी चटपटी लगती हैं । कहो तो ‘ब्लास्ट’ में नमूना पेश कर दूं ?”
रूपसिंह के चेहरे पर घबराहट के साथ-साथ आतंक के भाव दिखाई देने लगे । वह अपने दोनों हाथों से नीला और सुनील को धकेलता हुआ बाहर ले आया । उसने जल्दी से द्वार को ताला लगाया और टेलीफोन की ओर लपका ।
***
इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल, कैमरामैन, फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट, पुलिस के डाक्टर और कुछ सिपाहियों की भीड़ के साथ आया था ।
“तुम !” - वह सुनील पर दृष्टि पड़ते ही बोला - “तुम यहां क्या कर रहे हो ?”
“इन्स्पेक्टर साहब ।” - सुनील लापरवाही से बोला - “यह कोई ऐसी जगह है जहां प्रवेश निषेध है ?”
“जब लाश मिली थी तब भी तुम यहां थे ?” - प्रभूदयाल ने संदिग्ध स्वर में पूछा ।
“दुर्भाग्य से, हां ।”
“कोई गड़बड़ तो नहीं की तो तुमने यहां ?”
“कैसी गड़बड़ ?”
“कोई छेड़छाड़ ! सबूत नष्ट करने की कोई उल्टी-सीधी हरकत ! अपने लोगों की खातिर बला अपने सर ले लेने का पुराना स्टंट !”
“यहां मेरे लोग कौन से हैं ?” - सुनील उखड़े स्वर में बोला ।
“तुम इन लोगों में से किसी के लिए काम नहीं कर रहे हो ?” - प्रभूदयाल नीला और रूपसिंह की ओर हाथ लहराकर बोला ।
“नहीं ।”
“शुक्र है ।”
“इसमें शुक्र की क्या बात हैं ?”
“नहीं तो अभी यह सिद्ध करने की कोशिश करते कि इनमें से किसी के हत्यारा होने से अधिक सम्भावना तो इस बात की है कि हत्या प्रभूदयाल ने की हो ।”
सुनील चुप रहा ।
प्रभूदयाल ने सुनील की ओर से दृष्टि फिरा ली ।
उसने अलमारी की लकड़ी में धंसे तीर को देखा, उनके कोण का हिसाब लगाया, फिर कमरे की खुली खिड़की की ओर देखा, फिर पच्चीस फुट दूर स्थित नीला के स्टूडियो को परखा और अन्त में एक सिपाही से बोला - “पता लगाने की कोशिश करो, उस सामने वाले फ्लैट में कौन रहता है ?”
“वह फ्लैट मेरे अधिकार में है ।” - नीला जल्दी से बोली ।
“जब आप रहती यहां हैं तो नीचे एक फ्लैट लेने का क्या मतलब है ?”
“वहां मेरा स्टूडियो है । मुझे पेंटिंग का शौक है । मैं तनहाई में काम करना पसन्द करती हूं ।”
“तुम इन लोगों से कब से सम्बन्धित हो ?” - प्रभूदयाल ने सुनील से पूछा ।
“लगभग तीन दिन से ।”
“किस सिलसिले में ?”
“कोई विशेष सिलसिला नहीं । रमाकांत इन लोगों से सम्बन्धित था । वह मुझे भी अपने साथ ले आया था ।”
“लाश सबसे पहले किसने देखी थी ?”
“हम तीनों ने ।”
“एक साथ ?”
“हां ।”
“आपको हत्या का पता इतनी देर से कैसे लगा ? लाश देख कर तो मालूम होता है कि हत्या हुए काफी देर हो चुकी है ।”
उत्तर में रूपासिंह ने सारी स्थिति बयान कर दी ।
“इस घर में सभी तनहाईपसन्द हैं ?” - प्रभूदयाल ने व्यंग्यपूर्ण स्वर में पूछा ।
किसी ने उत्तर नहीं दिया ।
“तुम लोग कमरे में कहां तक घुसे थे ?” - प्रभूदयाल ने सुनील से पूछा ।
“केवल द्वार तक ।”
“उससे आगे कोई नहीं आया था ?”
“नहीं ।” - सुनील एक विचित्र दृष्टि नीला पर डालता हुआ बोला ।
नीला हड़बड़ाकर दूसरी ओर देखने लगी ।
“किसी ने किसी चीज को हाथ तो नहीं लगाया ?”
“नहीं ।”
“ठीक है ।” - प्रभूदयाल बातचीत समाप्त करता हुआ बोला - “आप लोग किसी और कमरे में जाकर बैठिए । तफ्तीश के बाद मैं आप लोगों से और सवाल पूछना चाहूंगा ।”
नीला और रूपसिंह ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
“और आप भी इन लोगों के साथ ठहरेंगे, रिपोर्टर साहब ।” - प्रभूदयाल सुनील से बोला ।
“जो आज्ञा, माईबाप ।” - सुनील नाटकीय स्वर में बोला और रूपसिंह और नीला के साथ दीवान साहब के कमरों से दूर एक अन्य कमरे में आ गया ।
“नीला ।” - सुनील ने पूछा - “कल जो ब्लो गन मैं तुम्हें देकर गया था, वह कहां है ?”
“मेरे स्टूडियो में । ठीक वहीं जहां तुम उसे छोड़कर गए थे ।”
और वह एकदम द्वार की ओर बढी ।
“कहां जा रहीं हो ?” - सुनील ने तेज स्वर में पूछा ।
“नीचे । ब्लो गन लेने । शायद इन्स्पेक्टर को उसमें कोई दिलचस्पी हो ।”
“अगर इन्स्पेक्टर को उसमें दिलचस्पी होगी तो वह खुद वहां चला जाएगा । केस से सम्बन्धित किसी चीज को हाथ लगाने की मूर्खता नहीं करनी चाहिए तुम्हें ।”
“लेकिन ब्लो गन का केस से क्या सम्बन्ध है ?”
“तुम्हें कोई सम्बन्ध दिखाई नहीं देता ?” - सुनील उसे घूरता हुआ बोला ।
नीला कसमसाई और चुप हो गई ।
कई क्षण तक कोई नहीं बोला ।
“मैं तो सोई उठकर सीधी इधर आ गई थी ।” - नीला अंगड़ाई लेती हुई बोली - “मुझे तो भूख लगी है । मैं कॉफी बनाकर पीने जा रही हूं ।”
“आप क्यों तकलीफ करती हैं ?” - रूपसिंह बोला - “मैं काफी बनाकर दूंगा आपको ।”
“सुनील ।” - वह सुनील की ओर घूमकर मुस्कराया - “मैं जरा इनकी कॉफी का इन्तजाम करने जा रहा हूं । अभी पांच मिनट में वापस आ जाते है हम ।”
“मैं भी साथ चलता हूं ।” - सुनील उठता हुआ बोला - “कॉफी मैं भी अच्छी बना लेता हूं ।”
रूपसिंह के चेहरे पर निराशा के भाव छा गए ।
वे तीनों एक छोटी-सी किचन में आ गए ।
रूपसिंह ने मिल्कपाट में दूध देखा और फिर नीला से बोला - “दूध तो खराब है ।”
“फिर ?” - नीला बोली - “मैं तो ब्लैक कॉफी पिऊंगी नहीं ।”
“मैं नीचे जाकर दूध ले आता हूं ।” - रूपसिंह बोला - “लेकिन शायद मेरा बाहर जाना ठीक न होगा । सुनील साहब, आप ही जरा तकलीफ कीजिए न ! मिल्क डिपो नीचे प्रीमियर बिल्डिंग की बगल में ही है ।”
“मैं तकलीफ करने का आदी नहीं हूं ।” - सुनील शुष्क स्वर से बोला ।
सुनील ने मिल्कपाट उठाकर देखा और फिर रूपसिंह से बोला - “क्या खराबी है इस दूध में ?”
“मुझे खराब लगा था ।” - रूपसिंह मरे स्वर में बोला ।
“शायद तुम्हें अच्छे-खराब दूध की पहचान नहीं है ।” - सुनील व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला ।
“शायद ।”
उसी समय प्रभूदयाल किचन में आ घुसा ।
“आप लोगों यहां कर रहे हैं ?” - प्रभूदयाल ने पूछा ।
“नीला और रूपसिंह कॉफी पीना चाहते थे ।” - सुनील बोला - “लेकिन मेरा अपना ख्याल यह है कि ये लोग एकांत में कुछ बातें करना चाहते थे जिन के लिये मेरे कारण इन्हें मौका नहीं मिल पाया ।”
नीला और रूपसिंह के चेहरे का रंग बदलने लगा ।
प्रभूदयाल ने संदिग्ध दृष्टि से दोनों को घूरा ।
“यह... यह...” - रूपसिंह एकदम बोल पड़ा - “यह हम पर झूठा इल्जाम लगा रहे हैं ।”
“सुनील ।” - साथ ही नीला दांत पीसकर बोली - “यू...”
“बस बस ।” - प्रभूदयाल हाथ उठाकर बोला - “सुनील को गोली मारिये । आप मुझसे बात कीजिए । आप दीवान साहब की पत्नी हैं न ?”
“थीं ।” - सुनील बोला ।
“यू शटअप ।” - प्रभूदयाल चिल्लाया और नीला से बोला - “आप मेरी बात का जवाब दीजिये ।”
“हां ।”
“दीवान साहब से आपकी शादी हुए कितने वर्ष हो गए हैं ?”
“तीन वर्ष ।”
“दीवान साहब और आपकी आयु में कम से कम पैंतीस वर्ष का अन्तर तो होगा ही ?”
“आपसे मतलब ?”
“बहस मत कीजिए । मेरी बात का जवाब दीजिए ।”
नीला चुप रही ।
“आपने इतने बूढे आदमी से शादी क्यों की ? उसके रुपए-पैंसों के लालच में ?”
“आप मेरे निजी मामलों में दखल देने वाले कौन होते हैं ?” - नीला क्रोधित होकर चिल्लाई ।
“आपके पति की हत्या आपका निजी मामला नहीं है, नीला देवी जी ।” - प्रभूदयाल कठोर स्वर में बोला - “दीवान साहब की मृत्यू से सबसे अधिक लाभ आपको पहुंचता है । मैं जानता हूं उनकी कोई औलाद नहीं है । ऐसी सूरत में उनकी लाखों की सम्पत्त‍ि की अकेली स्वामिनी आप हैं । इन परिस्‍थितियों में आप पर सन्देह करने का अच्छा खासा आधार पैदा हो जाता है । आप मेरे प्रश्नों का ठीक से उत्तर न देकर मेरे सन्देह को और मजबूत कर रही हैं ।”
“आप कहना क्या चाहते हैं ?” - नीला तेज स्वर में बोली - “दीवान साहब की हत्या मैंने की है ?”
“सम्भावना तो है ही ।”
नीला ने कहरभरी दृष्टि से प्रभूदयाल को देखा लेकिन प्रभूदयाल के चेहरे की कठोरता में तनिक भी अन्तर नहीं आया । नीला बेबस होकर चुप हो गई ।
“तुम स्पष्ट शब्दों में नीला पर दीवान साहब की हत्या का इल्जाम लगा रहे हो, इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल साहब ।” - सुनील ऊंच स्वर में बोला ।
“मैं क्या कर रहा हूं, मैं खूब जानता हूं ।” - प्रभूदयाल चिल्लाया - “लेकिन तुम अपनी चोंच बन्द रखो ।”
“मेरी चोंच बन्द है ।”
“तुम यहां आए किस सिलसिले में हो ?”
सुनील चुप रहा ।
“मैंने तुमसे कुछ पूछा है ?”
“मैंने सुन लिया है ।”
“तो जवाब क्यों नहीं देते हो ?”
“तुम ही ने तो कहा था कि मैं अपनी चोंच बन्द रखूं ।”
“मुझे सिखाने की कोशिश मत करो ।” - प्रभूदयाल फिर गर्ज पड़ा - “जो मैं पूछ रहा हूं, उसका जवाब दो ।”
“मैं दीवान का कुछ सामान लौटाने आया था ।”
“कैसा सामान ?”
“सुनील एक बुद्ध की मूर्ति लौटाने आया था जो पिछले दिनों दीवान साहब की पार्टी में से चोरी हो गई थी ।” - रूपसिंह ने बताया ।
“वह मूर्ति कहां है ?” - प्रभूदयाल ने सुनील से पूछा ।
“उस मूर्ति का इस हत्या से कोई सम्बन्ध नहीं है ।”
“किस चीज का हत्या से सम्बन्ध है, यह जानना मेरा काम है । मूर्ति निकालो ।”
“मेरे पास नहीं है ।” - सुनील साफ झूठ बोला ।
“तो फिर कहां है वह ?”
“मेरे फ्लैट पर । लेकिन मैं वह मूर्ति किसी सूरत में नहीं दूंगा । वह दीवान साहब का माल था । उनकी मृत्यु के बाद नीला उसकी हकदार है ।”
“एक ब्लो गन भी चोरी गई थी ।” - रूपसिंह बीच में बोला ।
प्रभूदयाल एकदम सतर्क हो उठा । वह क्षण भर के लिए मूर्ति को भूल गया ।
“ब्लो गन !” - वह बोला ।
“हां ।” - रूपसिंह ने उत्तर दिया ।
“जिस तीर से दीवान साहब की हत्या हुई है, वह ब्लो गन में ही रखकर चलाया जाता है न ?”
“जी हां ।”
“ब्लो गन का क्या किस्सा है ?”
“वह ब्लो गन भी सुनील ही लाया था ।”
“हे भगवान !” - प्रभूदयाल सुनील की ओर देखकर बोला - “इस केस में तो एक-एक कदम पर तुम्हारी टांग अड़ी मालूम होती है ।”
“बदकिस्मती है मेरी ।” - सुनील बोला ।
“वह ब्लो गन कहां है ?”
“मैंने वह नीला को दे दी थी । इस समय वह नीला के स्टूडियों में होनी चाहिए ।”
“सुनील वह ब्लो गन आपके पास छोड़ गया था ?” - प्रभूदयाल ने नीला से पूछा ।
“जी हां ।”
“आपको मालूम है, आपके स्टूडियो में एक खिड़की है जो दीवान साहब के कमरे की खिड़की के सामने पड़ती है ?”
“जी हां । वह बाथरूम की खिड़की है ।”
“अब आप अच्छी तरह सोच-समझकर यह बताइए कि सुनील के स्टूडियो में ब्लो गन लाने के बाद से क्या आपने उस बाथरूम की खिड़की को खोला था ?”
“जी हां, खोला था । उस सुनील मेरे साथ था ।”
“अच्छा !” - प्रभूदयाल सुनील की ओर देखता हुआ बोला । - “आप दोनों क्या कर रहे थे वहां ?”
“यह उस खिड़की में से दीवन साहब का ध्यान आ‍कर्ष‍ित करना चाहती थी ।” - सुनील बोला ।
“यू शटअप ।” - प्रभूदयाल फिर नाराज हो उठा - “मैंने यह सवाल नीला से पूछा था ।”
“मेरा जवाब भी वही है जो सुनील ने दिया है ।” - नीला बोली - “दीवान साहब के कमरे की खिड़की उस बाथरूम की खिड़की से दिखाई देती है । मैंने टार्च की सहायता से दीवान साहब को संकेत देने की चेष्टा की थी लेकिन सफल नहीं हो सकी थी ।”
“मैं आपका स्टूडियो देखना चाहता हूं ।”
“चलिए मैं दिखाए देती हूं ।”
“नहीं । आप मुझे चाबी दे दीजिए । मैं खुद देख लू्ंगा ।”
“बेहतर यही है कि नीला भी साथ जाए ।” - सुनील बोला ।
“देखो, सुनील ।” - प्रभूदयाल सुनील की ओर घूमकर बोला - “मैं एक हत्या के केस की तफ्तीश कर रहा हूं । अगर तुम यूं ही मेरे मामले में टांग अड़ाते हरे तो मैं सबसे पहले सन्देह के आधार पर तुम्हें धर लूगा और फिर पुलिस सुपरिटेन्डेन्ट रामसिंह की सिफारिश भी तुम्हारे काम नहीं आ पाएगी ।”
“मैंने कौन-सी टांग अड़ा दी है तुम्हारे मामले में ? मैं तो तुम्हें एक समझदारी की बात बता रहा हूं जो तुम्हारे दिमाग में घुस नहीं रही । अगर स्टूडियो की मालकिन की मौजूदगी के बिना तुम वहां से कोई चीज बरामद करते हो और बाद में स्टूडियो की मालकिन यह कह देती है कि उसकी जानकारी में ऐसी कोई चीज उसके स्टूडियो में नहीं थी । और शायद पुलिस वालों ने ही उसे फंसाने के लिए यह चाल खेली थी तो क्या तुम यह दावा कर सकोगे कि वह झूठ बोल रही है ।”
प्रभूदयाल कुछ क्षण कसमसाया, फिर बोला - “लेकिन मैं किसी को यहां अकेला नहीं छोड़ना चाहता ।”
“तो फिर इन्हें भी स्टूडियो में साथ ले चलो ।” - सुनील बोला ।
“ठीक है । तुम सब लोग नीचे चलो ।”
नीला सबको अपने स्टूडियो में ले आई ।
नीला ने चाबी निकालकर स्टूडियो का द्वार खोल और बाकी लोगों के लिए रास्ता छोड़कर एक ओर हट गई । सबसे अन्त में वह स्वयं भीतर घुसी ।
“आप लोग यहां एक कोने में बैठ जाइए और किसी चीज को हाथ मत लगाइए ।” - प्रभूदयाल बोला ।
नीला, सुनील और रूपसिंह एक कोने में रखे सोफे पर बैठ गए ।
सुनील ने देखा ब्लो गन वहीं पड़ी थी जहां वह उसे रखकर गया था । प्रभूदयाल ने रूमाल की सहायता से बड़ी सावधानी से ब्लो गन को उठाया ताकि उंगलियों के निशान नष्ट न हो जाएं ।
“यही वह ब्लो गन है जो तुम लाए थे ?” - उसने सुनील से पूछा ।
सुनील ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
“बाथरूम का द्वार कौन-सा है ?” - उसने नीला से पूछा ।
नीला ने बाथरूम के द्वार की ओर संकेत कर दिया ।
प्रभूदयाल ब्लो गन हाथ में लिए बाथरूम में घुस गया लेकिन उसने द्वार बन्द नहीं किया ।
प्रभूदयाल के बाथरूम में जाते ही नीला एकदम सुनील के पास सरक आई और धीमे स्वर में उससे बोली - “सुनील, तुम मेरी कुछ मदद करो ।”
“कैसी मदद ?” - सुनील हैरान होकर बोला ।
“मुझे लग रहा है यह इन्स्पेक्टर दीवान साहब के खून के इल्जाम में मुझे ही फांसेगा ।”
“यह कैसे सोच लिया तुमने ?”
“हर बात इसी ओर संकेत करती है । दीवान साहब की मृत्यु ब्लो गन में से निकले तीर से हुई है । ब्लो गन मेरे स्टूडियो में पाई गई है और दीवान साहब के कमरे की अलमारी में धंसे तीर को देखकर लगता भी यही है कि ब्लो गन मेरे स्टूडियो में से ही चलाई गई है ।”
“लेकिन मैं इससे तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूं ?” - सुनील बोला - “अगर तुम यह समझती हो कि तुम्हें बेकसूर फांसा जा रहा हे तो तुम किसी वकील की सहायता लो ।”
नीला ने नकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया ।
“क्यों ?” - सुनील ने बाथरूम की ओर झांकते हुए पूछा जहां प्रभूदयाल खिड़की के पास खड़ा ब्लो गन को बाहर की ओर तान रहा था ।
“जब तक ये लोग मुझे गिरफ्तार नहीं कर लेते तब तक मेरा वकील के पास जाना सन्देह का विषय बन सकता है । साधारणतया लोगों की धारणा यह होती है की वकीलों की सलाह की जरूरत उन्हें होती है जिन्होंने वाकई अपराध किया होता है ।”
“यह तो कोई बात नहीं हुई ।”
“लेकिन मेरी नजर में यह बहुत महत्वपूर्ण बात है आखिर तुम मेरी सहायता क्यों नहीं करते ? रमाकांत तुम्हें अद्वितीय प्रतिभा का आदमी कहता है । क्या तुम यह पता नहीं लगा सकते कि दीवान साहब की हत्या किसने की है ? अगर तुम वास्तविक हत्यारे का पता लगा लो तब भी तो मैं निरपराध सिद्ध हो सकती हूं ।”
“तुमने दीवान साहब की हत्या नहीं की है न ?”
“भगवान की कसम, नहीं ।”
“तो फिर तुम पहले से ही क्यों इतना घबरा रही हो ? जब प्रभूदयाल तुम पर इल्जाम लगाएगा या तुम गिरफ्तार हो जाओगी तब देखा जाएगा ।”
“लेकिन मैं एडवांस में ही अपनी सुरक्षा का इन्तजाम कर लेना चाहती हूं ।”
सुनील कुछ क्षण सोचता रहा और फिर बोला - “देखो नीला, हत्या किसने की है, यह तो मुझे मालूम नहीं लेकिन हत्या तुमने नहीं की यह मैं अभी सिद्ध कर सकता हूं ।”
“कैसे ?”
“समय आने दो । बताऊंगा । और अब चुप हो जाओ । इन्स्पेक्टर वापिस आ रहा है ।”
प्रभूदयाल वापिस आकर उन लोगों के सामने एक स्टूल पर बैठ गया । कुछ क्षण बाद वह नीला से बोला - “कल आप यहां स्टूडियो में कितने बजे आई थी ?”
“लगभग साढे तीन बजे ।”
“आप यहां अकेली थीं ?”
“नहीं । मेरी मॉडल एंजिला मुझसे पहले ही यहां मौजूद थी ।”
“वह आपसे पहले यहां कैसे पहुंची है ?”
“मैंने उसे स्टूडियो की एक चाबी दी हुई है ताकि अगर कभी मुझे पहुंचने में देर हो जाए तो उसे गलियारे में ही न खड़ा रहना पड़े ।”
“आपको मालूम है आपसे कितनी देर पहले आपकी मॉडल यहां पहुंची थी ? केवल कुछ मिनट पहले । उसने बताया था मुझे ।”
“तुम ब्लो गन लेकर यहां कितने बजे आये थे ?” - प्रभूदयाल ने सुनील से पूछा ।
“लगभग पौने पांच बजे ।” - सुनील ने बताया ।
“और वापिस कितने बजे चले गए थे ?”
“लगभग सवा पांच बजे ।”
“दीवान साहब आखिरी बार जीवित कब देखे गये थे ?”
“इन्स्पेक्टर साहब ।” - उत्तर रूपसिंह ने दिया - “मुझे समय ठीक से याद नहीं है । लेकिन शाम के चार और साढे पांच के बीच के किसी समय में दीवान साहब ने मुझसे बात की थी । उस समय वे थोड़ी देर के लिए अपने एकांतवास से बाहर निकले थे ।”
“क्यों ?”
“कोई विशेष कारण रहा हो तो वह तो मुझे मालूम नहीं है लेकिन इतना याद है कि उन्होंने किसी को टेलीफोन किया था । किर उन्होंने मुझे यह कहा था कि मैं अगले दिन दस बजे यहां मौजूद रहू ।”
“आप यहीं रहते हैं ?”
“नहीं ।”
“कल शाम आप प्रीमियर बिल्डिंग में कब तक मौजूद थे ?”
“जहां तक मुझे याद है पौने छ: बजे तक । पौने छ: बजे मैंने अपने एक मित्र के साथ एक फिल्म का ईवनिंग शो देखने जाना था । वह मुझे प्रीमियर बिल्डिंग के नीचे फुटपाथ पर मिलने वाला था ।”
“आप अपने मित्र के साथ कब तक रहे ?”
“राम के साढे दस बजे तक ।”
“आप यह सिद्ध कर सकते हैं कि आप पौने छ: बजेसे साढे दस बजे तक किसी मित्र के साथ फिल्म देख रहे थे ?”
“जी हां, कर सकता हूं ।”
“कल शाम को यहां, दीवान साहब से मिलने या किसी और काम से, कोई और भी आया था ?”
“सुदेश कुमार आया था ।” - रूपसिंह ने बताया ।
“वह कौन है ?”
“फोटोग्राफर है । दीवान साहब की सारी पार्टियों की तस्वीरें वही खींचता था ।”
“उसकी दीवान साहब से मुलाकात हुई थी ?”
“हुई थी ।”
“किस समय ?”
“उसी समय जब दीवान साहब थोड़ी देर के लिए बाहर निकले थे । मेरा मतलब है चार और पांच बजे के बीच के किसी समय ।”
“क्या बातें हुई थीं ?”
“सुदेश कुमार बहुत गर्म हो रहा था । उसने एकदम आकर दीवान साहब की बांह पकड़ ली थी । उसने कहा था - दीवान साहब, क्या आप मुझे फंसवाने की कोशिश कर रहे हैं ? आखिर मेरी बैसाखी में ब्लो गन रखने का क्या अर्थ था । फोटोग्राफर कह रहा था दीवान साहब ने जानबूझ कर ब्लो गन चोरी करवाई है ताकि उसके बदले में इन्श्योरेन्स का रुपया हासिल कर सकें ।”
“फिर दीवान साह‍ब ने क्या कहा था ?”
“दीवान साहब बेहद नाराज हुए थे । उन्होंने अपनी बांह से फोटोग्राफर का हाथ बुरी बुरी तरह झटक दिया था और उसकी बद्तमीजी पर उसे काफी खरी खोटी सुनाई थीं । उन्होंने कहा था कि अगर उसने फिर कभी इस तरह का व्यवहार किया तो वे उसे प्रीमियर बिल्डिंग की सबसे ऊपर की मन्जिल से नीचे फिंकवा देंगे ।”
“फोटोग्राफर पर इसकी क्या प्रतिक्रिया हुई थी ?”
“वह क्रोध में उफनता हुआ यहां से चला गया था ।”
“वह तुमसे पहले इमारत से बाहर निकल गया था ?”
“नहीं । जिस समय मैं नीचे जा रहा था उस समय मैंने उसे बड़ी क्रोधित अवस्था में छटी मंजिल पर घूमते देखा था ।”
“तुम पौने छ: बजे बाहर गये थे ?”
“एक आध मिनट का फर्क होगा । लेकिन मेरे जाने से पहले दीवान साहब अपने कमरे में जा चुके थे और द्वार बन्द कर चुके थे ।”
प्रभूदयाल नीला की ओर घूमा - “सुनील कहता है कि वह यहां से लगभग सवा पांच बजे चला गया था । उसके जाने के और कितनी देर बाद तक आप स्टूडियो में रही थीं ?”
“लगभग आधा घन्टा ।”
“उसके बाद ?”
“उसके बाद एंजिला वापिस चली गई थी । मैं स्टूडियो का ताला लगाकर ऊपर आ गई थी ।”
“उस समय ऊपर कौन था ?”
“नौकरों के और मेरे अतिरिक्त तो कोई भी नहीं था । दीवान साहब अपने प्राइवेट कमरों में बंद थे ।”
“सुबह दीवान साहब के कमरे का द्वार कैसे खोला गया था ? दीवान साहब तो भीतर से ताला लगा लिया करते थे न ?”
“मेरे पास उनके द्वार की एक चाबी थी लेकिन वह केवल इमरजेन्सी में ही इस्तेमाल में लाने के लिए थी । आज सुबह जब दीवान साहब अपने निर्धारित समय पर बाहर नहीं निकले तो रूपसिंह की सलाह पर उसी चाबी से द्वार खोला गया था ।”
“वह चाबी कहां रखी रहती है ?”
“मेरे बैडरूम में ड्रेसिंग टेबल की दराज में ।”
“आपके अतिरिक्त कोई और भी जानता है कि आप चाबी वहां रखती है ?”
“मैं और मेरे पति के अतिरिक्त किसी और को यह बात मालूम नहीं थी ।”
“आप कल शाम ऊपर जाने के बाद क्या करती रहीं ?”
“मैं पहले मैगजीन पढती रही, फिर मैंने खाना खाया, उसके पश्चात कुछ देर रेडियो सुना और फिर सो गई ।”
“उतने समय में दीवान साहब बाहर नहीं निकले ?”
“नहीं ।”
“मिस्टर रूपसिंह ने बताया है कि कल शाम को उन्होंने ऊपर से आने के बाद फोटोग्राफर को इस मन्जिल पर घूमते देखा था । क्या वह आपसे मिला था ?”
“नहीं तो ।”
“उसने आपके लिए भी कभी फोटोग्राफरी का कोई काम किया है ?”
“बहुत काम किया है । मेरी बनाई तस्वीरें मैगजीनों में छपती हैं । उनकी ट्रांसपेरेन्सी सुदेश कुमार ही बनाता है ।”
“आप अपनी तस्वीरें उसके स्टूडियो में लेकर जाती हैं या वह यहां आता है ?”
“वही यहां आता है ।”
“क्या आपने उसे भी स्टूडियो की कोई चाबी दे रखी है ?”
नीला ने उत्तर नहीं दिया ।
“फोटोग्राफर के पास स्टूडियो की चाबी है ?”
“आजकल है ।” - नीला धीरे-से बोली - “पिछले तीन-चार दिनों से वह रोज मेरी तस्वीरों के फोटोग्राफर लेने के लिए आ रहा है । वह मेरी अनुपस्थ‍िति में भी काम कर सके इसलिए मैंने उसे एक चाबी दे रखी है ।”
“कल उसके पास स्टूडियो की चाबी थी ?”
“थी ।”
“क्या कल वह यहां आने वाला था ?”
“जी हां ।”
“कोई विशेष समय निर्धारित था उसके आने का ?”
“नहीं । लेकिन मैंने उसे यह जरूर कहा था कि आने से पहले मुझे फोन कर ले । अगर मैं स्टूडियो में मौजूद होऊं तो वह न आए ।”
“क्यों ?”
“कल मैं न्यूड पेन्ट कर रही थी । मेरी मॉडल एंजिल बिना परिधान के मेरे लिए पोज कर रही थी । ऐेसे समय में किसी पुरुष का आगमन अच्छा नहीं लगता था । इसलिए मैंने उसे कहा था कि वह तभी आए जब मैं वहां न होऊं ।”
“अगर वह आपकी अनुपस्थ‍िति में आने वाला था तब तो आपको यह भी मालूम होगा कि वह यहां आया था या नहीं ?”
“मुझे मालूम नहीं है ।”
प्रभूदयाल कुछ क्षण चुप रहा और फिर बोला - “यह बात तो निश्चित ही है कि ब्लो गन यहां से चलाई गई थी और वह मौजूद भी यहां थी । यहां घुसने की सबसे अधिक सुविधा उन लोगों को है जिनके पास चाबियां हैं । उनमें से एक” - वह नीला की ओर संकेत करता हुआ बोला - “आप हैं । दूसरी आपकी मॉडल एंजिला है और तीसरी चाबी फोटोग्राफर सुदेश कुमार के पास है ।”
कोई कुछ नहीं बोला ।
“तुम्हारे पास इस स्टूडियो की कोई चाबी है, सुनील ?” - प्रभूदयाल ने सुनील से पूछा ।
“मेरे पास मास्टर की है ।” - सुनील ने जवाब दिया ।
लेकिन प्रभूदयाल ने उत्तर सुनने के लिए तो प्रश्न किया ही नहीं था ।
“और आपके पास ?” - उसने रूपसिंह से पूछा ।
“है ।” - रूपसिंह धीरे से बोला ।
“क्या !” - प्रभूदयाल एकदम चौंक कर बोला - “आपके पास भी यहां की चाबी है ?”
“जी हां ।”
“आपने पहले क्यों नहीं बताया ?”
“आपने पहले मुझसे पूछा ही कहां था ?”
“खैर, अब बताइए । आपके पास स्टूडियो की चाबी क्यों है ?”
“रूपसिंह को एक चाबी मैंने दी हुई है ।” - नीला जल्दी से बोली ।
“क्यों ?”
“कई बार मैं किसी मॉडल को यहां भेज देती हूं लेकिन उसे चाबी देने का अवसर नहीं मिलता । ऐसी सूरत में मैं मॉडल से कह देती हू कि वह यहां आकर रूपसिंह से चाबी ले ले । फिर मैं रूपसिंह को फोन पर बता देती हूं कि कोई उससे चाबी लेने आ रहा है ।”
“आपके पास क्या पचास-सेठ चाबियां हैं इस स्टूडियो की ?” - प्रभूदयाल ने उखड़कर नीला से पूछा ।
“नहीं तो ।” - नीला ने बड़ी सरलता से उत्तर दिया ।
“एक बार फिर सोच लीजिए कि आपने और किस-किस को चाबियां बांटी हुई हैं ।”
“मेरी जानकारी में और किसी के पास यहां की चाबी नहीं है ।”
“खैर ।” - प्रभूदयाल उठता हुआ बोल - “फिलहाल मैंने आप लोगों से और कुछ नहीं पूछना है लेकिन इतनी प्रार्थना है कि यदि आपकी जानकारी में कोई ऐसी बात आए जो इस केस से सम्बन्धित हो तो मुझे बताना मत भूलियेगा ।”
नीला और रूपसिंह उठ खड़े हुए ।
“सहयोग के लिए धन्यवाद ।” - प्रभूदयाल बोला ।
“आप भी जाइए ।” - वह सुनील को बैठा देखकर जलकर बोला ।
“अच्छा !” - सुनील आश्वर्य का प्रदर्शन करता हुआ उठ खड़ा हुआ - “मैं तो समझा था कि तुम मुझसे तनहाई में सवाल पूछोगे ।”
“टेक दि हैल आउट आफ हेयर ।” - प्रभूदयाल आपे से बाहर होकर चिल्लाया ।
सुनील चेहरे पर विचित्र-सी मुस्कान लिए स्ट‍ूडियो से बाहर निकल आया ।
नीला और रूपसिंह अभी गलियारे के सिरे तक ही पहुंचे थे ।
“नीला ।” - सुनील ने आवाज दी और उनकी ओर लपका । दोनों रुक गए ।
“नीला ।” - सुनील समीप आकर बोला - “क्या उस रात की पार्टी में एंजिला भी आमन्त्रित थी ?”
“हां । क्यों ?”
“वैसे ही पूछा था ।” - वह बोला - “कोई विशेष बात नहीं थी । ओके । गुड डे ।”
***
फोटोग्राफर सुदेश कुमार अपने स्टूडियो में काउन्टर के पीछे बैठा हुआ था ।
सुनील को देखते ही उसके चेहरे पर कठोरता के भाव छा गए ।
“अब क्या है ?” - वह बोला ।
“तो तुम अभी भूले नहीं मुझे ?” - सुनील काउन्टर के सामने रखे स्टूल पर बैठता हुआ बोला ।
“तुम जो ब्लो गन ले गए थे यहां से, वह दीवान साहब को लौटाई क्यों नहीं तुमने ?”
“तुम्हें कैसे मालूम है मैंने ब्लो गन नहीं लौटाई उन्हें ?”
“कल शाम को मेरी दीवान साहब से बात हुई थी । अगर उन्हें ब्लो गन मिलती तो उन्होंने जरूर जिक्र किया होता । इस साली ब्लो गन के चक्कर में तो इतनी तौहीन हुई कि जी चाहता था कि दीवान साहब का खून कर दूं ।”
“किया तो नहीं तुमने ?”
“क्या ?”
“खून ।”
“दिमाग तो खराब नहीं है तुम्हारा ।”
सुनील कुछ क्षण चुप रहा और फिर फोटोग्राफर के चेहरे पर अपनी दृष्टि जमाता हुआ बोला - “ब्लो गन मैं कल नीला के स्टूडियो में छोड़ आया था ।”
फोटोग्राफर के चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई ।
“तुम्हारे पास नीला के स्टूडियो की चाबी है न ?”
“है तो क्या हुआ ?”
“और कल शाम को तुम उसके स्टूडियो में गए भी थे ?”
“मुझे काम था वहां ।”
“तुमने वहां ब्लो गन रखी देखी थी ?”
“नहीं ।”
“झूठ मत बोलो, सूदेश कुमार ।” - सुनील कठोर स्वर से बोला - “ब्लो गन स्टूडियो के एकदम बीच में ऐसे स्थान पर रखी हुई थी जहां स्टूडियो में घुसते ही उस पर नजर न पड़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता था ।”
“मुझे ब्लो गन वहां दिखाई दी थी या नहीं दी थी इससे तुम्हें क्या मतलब ? तुम कौन होते हो ऐसे सवाल पूछने वाले ?”
“फोटोग्राफर साहब ।” - सुनील व्यंग्यभरे स्वर से बोला - “मैं तुमसे वही सवाल पूछ रहा हूं जो कुछ ही देर बाद एक पुलिस इन्स्पेक्टर पूछने वाला है । इ‍सलिए बेहतर यही है कि तुम अभी से इन सवालों के जवाब तैयार कर लो । पुलिस के सामने तुमने ऐसे उल्टे-सीधे जवाब दिए जैसे कि तुम मुझे दे रहे हो तो वे सीधे अन्दर ही कर देंगे तुम्हें ।”
“लेकिन पुलिस का क्या दखल है इसमें ?”
“पुलिस का दखल यह है इसमें कि दीवान साहब की हत्या हो गई है ।”
“क्या ?” - सुदेश हैरानी से चिल्ला पड़ा ।
“उनकी हत्या से कुछ देर पहले तुम्हारा दीवान साहब से अच्छा खासा झगड़ा हुआ था । दीवान साहब ने तुम्हारी खूब तौहीन की थी और कहा था कि अगर फिर अभी तुम उनमे बद्तमीजी से पेश आए तो वे तुम्हें सातवीं मंजिल से नीचे फिंकवा देंगे । उसके बाद तुम क्रोध में बिफरे हुए छटी मंजिल पर घूमते हुए देखे गए थे । छटी मंजिल पर नीला का फ्लैट है । उस फ्लैट की चाबी तुम्हारे पास है । उसी फ्लैट में ब्लो गन रखी हुई थी और ब्लो गन में से निकले हुए तीर से दीवान साहब की हत्या हुई है । यह दो जमा दो चार जैसा सीधा सवाल है । हर बात इसी और संकेत करती है कि हत्या तुमने की है । अगर तुम मुझे अब भी यह समझाने की कोशिश करो कि दो जमा दो चार नहीं चार सौ बीस होते हैं तो तुम्हारी मर्जी मैं चला ।”
और सुनील उठ खड़ा हुआ ।
“अरे, अरे ! अरे सुनो तो ।” - सुदेश अपनी बैसाखियों से उलझता हुआ उठ खड़ा हुआ और सुनील का हाथ थामकर बोला ।
“अब क्या है ?” - सुनील विरक्त‍िभरे स्वर में बोला ।
“जरा बैठो तो, यार ।”
सुनील फिर बैठे गया ।
फोटोग्राफर भी अपनी सीट पर बैठ गया । वह कई क्षण कुछ सोचता रहा और फिर धीरे से बोला - “सुनील साहब विश्वास करो, मैंने हत्या नहीं की ।”
“मेरे विश्वास करने से क्या होता है ? बात तो तब है जब तुम्हारी बात का विश्वास पुलिस कर सके ।”
“लेकिन मैं सच कह रहा हूं ।”
“तुम कल पौने छ: बजे छटी मंजिल पर थे ?”
“हां, था ।”
“उसके बाद तुम कहां गए थे ?”
“लगभग पन्द्रह मिनट मैं वहीं घूमता रहा था । मुझे नीला के स्टूडियो में कुछ तस्वीरें खींचनी थीं लेकिन दीवान साहब से हुई तकरार के कारण मेरा मूड नहीं बन रहा था । छ: बजे मैं स्टूडियो में गया था लेकिन तस्वीरें खींचे बिना ही वापिस आ गया था ।”
“पौने छ: बजे से छ: बजे तक तुम गलियारे में ही खड़े रहे ?”
“हां ।”
“उस समय किसी ने तुम्हें वहां खड़े देखा ?”
“नहीं । ऑफिसों की छुट्टी हो चुकी थी । वह गलियारा खाली पड़ा था ।”
“मतलब यह है कि तुम कोई एलीबाई पेश नहीं कर सकते कि तुम वाकई उस समय के बीच गलियारे में टहलते रहे थे और फिर कुछ ही क्षण स्टूडियो में ठहरकर वापिस चले गए थे ?”
“नहीं ।” - वह कठिन स्वर से बोला ।
“पौने छ: बजे के बाद तुमने प्रीमियर बिल्डिंग में या उसके आसपास कहीं रूपसिंह को देखा था ?”
“नहीं ।”
“तुम तो मारे जाओग, खलीफा ।” - सुनील बोला और उसने जेब में से बुद्ध की मूर्ति निकालकर काउंटर पर रख दी ।
“लेकिन मैंने किया...” - उसी क्षण उसकी दृष्टि बुद्ध की मूर्ति पर पड़ गई । वह बोला - “यह... यह क्या है ?”
“तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है ?”
“यह तो दीवान साहब की चोरी गई बुद्ध की मूर्ति है ।” - वह हड़बड़ाए स्वर में बोला - “तुम्हारे पास कहां से आई ?”
“जहां यह थी ।”
“कहां थी ?”
सुनील ने उस बॉक्स कैमरे की ओर संकेत कर दिया जो अब भी उसी कोने में रख था और जिसमें से उसने बुद्ध की मूर्ति निकाली थी ।
“क्या मतलब ?”
“यह मूर्ति रुई में लिफ्टी उस कैमरे में रखी थी ।”
“पागल हुए हो ?” - फोटोग्राफर अविश्वासपूर्ण स्वर में बोला ।
“इसमें पागल होने की कौन-सी बात है ?”
“यह मूर्ति मेरे कैमरे में कैसे हो सकती है ?”
“क्योंकि यही इसके लिए सबसे फिट जगह थी । और प्यारेलाल मुझे यह भी मालूम है कि मूर्ति इस कैमरे में किसने रखी थी ?”
“तुम कहोगे कि मूर्ति मेंने कैमरे में रखी थी ।” - वह थूक निगलता हुआ बोला ।
“अगर तुमने रखी होती तो जरूर कहता ।” - सुनील बोला - “तुम एंजिला को जानते हो ?”
“कौन मंजिला ?”
“जो नीला के लिए मॉडल का काम करती है ।”
“नहीं ।”
“सोच-समझकर झूठ बोलो, गुलेगुलजार ।” - सुनील फोटोग्राफर की पीठ के पीछे वाली दीवार की ओर संकेत करता हुआ बोला - “तुम्हारी पीठ पीछे एंजिला की कम से कम एक दर्जन तस्वीरें लगी हुई हैं ।”
“अच्छा, मैं जानता हूं एंजिला को । फिर ?”
“तुमने पहले झूठ क्यों बोल था ?”
“गलती हो गई ।”
“वह तुम्हारे स्टूडियो में अक्सर आती रहती है न ?”
“हां ।”
“वह तुम्हें कभी लिफ्ट भी देती है ?”
“हां ।”
“जब उसे कैमरे में बुद्ध की मूर्ति नहीं मिली थी तो उसने क्या कहा था ?”
“एंजिला ने !” - फोटोग्राफर फिर चिल्ला पड़ा ।
“हां । और बार-बार चिल्लाओ मत ।”
“तुम्हारा मतलब है कि एंजिला ने मूर्ति चुराकर मेरे कैमरे में रखी थी ?”
“हां ।”
“मैं नहीं मानता ।”
“तुम तो बहुत कुछ नहीं मानते । कल वह यहां किस समय आई थी ?”
“नीला के स्टूडियो में जाने के कुछ देर पहले ।”
“फिर उसने कोई न कोई बहाना बनाया होगा जिससे वह यहां कैमरे के पास अकेली रह गई होगी ।”
“उसे बहाना बनाने की जरूरत हीं नहीं थी । जिस समय वह यहां आई थी उस समय मैं भीतर डार्करूम में था । वह कुछ क्षण मेरे पास भीतर डार्करूम में खड़ी रही थी फिर वहां के अन्धेरे से बोर होकर बाहर चली गई थी ।”
“फिर उसने कैमरा टटोला होगा !” - सुनील बोला - “उसे उसमें बुद्ध की मूर्ति मिली नहीं होगी ! उसके बाद जब तुम बाहर निकले थे तो तुम्हें उसके व्यवहार में कोई अन्तर दिखाई दिया था ?”
“जब वह आई थी तो बड़ा मीठा बोल रही थी ।” - फोटोग्राफर सोचता हुआ बोला - “लेकिन बाद में वह एकदम उखड़ी हुई लग रही थी ।”
“उसने तुमसे इस कैमरे के विषय में कोई प्रश्न किया था ?”
“हां । उसने पूछा था कि क्या मैंने दीवान साहब की पार्टी के बाद इस कैमरे को फिर से इस्तेमाल किया था ।”
“फिर ?”
“मैंने कहा था नहीं, मैंने उसे छुआ भी नहीं था ।”
“खैर ।” - सुनील उठ खड़ा हुआ - “मैं केवल तुम्हें यह बताने आया था कि तुम अच्छी-खासी गड़बड़ में फंसने वाले हो । प्रभूदयाल बड़ा सख्त पुलिस ऑफिसर है । यह बात जानते ही, कि चोरी गई दोनों चीजें तुम्हारे स्टूडियो से बरामद हुई है, वह हत्थे से उखड़ जाएगा । इसलिए तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा यही है कि तुम अभी से अपना डिफेन्स तैयार करना शुरू कर दो । इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल किसी भी समय तुम्हें चैक करने के लिए यहां आ सकता है ।”
फोटोग्राफर मुंह बाए उसे देखता रहा ।
“और अपनी सहेली एंजिला को भी सावधान कर देना । उसने बुद्ध की मूर्ति चुराई थी ।”
सुनील ने मूर्ति उठाकर अपनी जेब में रखी और फोटोग्राफर की ओर बिना दूसरी दृष्टि डाले बाहर निकल आया ।
***
सुनील यूथ क्लब वापिस लौट आया ।
यूथ क्लब में रौनक तो अभी नहीं थी लेकिन एक रंगीन शाम की तैयारियां आरम्भ हो गई थीं । मेजें सजाई जा रही थीं । बेयरे बड़ी फुर्ती से इधर-उधर घूम रहे थे । काउन्टर पर सुन्दर रिसेप्शनिस्ट बैठी हुई थी ।
“गुड आफ्टरनून, मिस्टर सुनील ।” - वह सुनील को देखकर मुस्कराती हुई बोली - “आज तो बड़ी जल्दी आ गए आप ?”
“मैं मनोरंजन के लिए नहीं आया हूं ।” - सुनील बोला - “रमाकांत कहां है ?”
“आफिस में ।”
सुनील रिसेप्शन के बगल में बने रमाकांत के आफिस में घुस गया ।
रमाकात अपनी आबनूस की भारी मेज के पीछे रिवाल्विंग चेयर पर बैठा हुआ था । उसने अपने दोनों पांव मेज पर रखे हुए थे । सारा कमरा चारमीनार के धुयें से महका हुआ था ।
“जब इतनी सिगरेट पीनी हों तो कोई खिड़की दरवाजा तो खोल लिया करो ।” - सुनील उसके सामने एक कुर्सी पर ढेर होता हुआ बोला ।
“क्या फर्क पड़ता है ?” - रमाकांत बोला - “दीवान साहब का सामान वापिस कर आए ?”
“दीवान साहब तो भगवान को प्यारे हो गए ।”
“क्या ?” - रमाकांत एकदम मेज पर से पांव हटाकर सीधा बैठता हुआ बोला - “कैसे ?”
“किसी ने हत्या कर दी उनकी ?”
“किसने ?”
“मालूम नहीं । हमारा पुराना यार प्रभूदयाल तफ्तीश कर रहा है ।”
“और ब्लो गन और बुद्ध की मूर्ति का क्या हुआ ?”
“ब्लो गन मैं उसकी बीवी को दे आया था और बुद्ध की मूर्ति अभी मेरे पास है ।”
“वह भी उसी के सिर पर पटक आते, छुट्टी होती ।”
“अब छुट्टी नहीं होती । अब तो मजा आ रहा है इस केस में । जिन्दगी में पहली बार तो प्रभूदयाल को घिसने का मौका मिल रहा है ।”
“कहीं वह उलटा तुम्हें ही न घिस दे ।”
“मर गए घिसने वाले ।”
“कॉफी पियोगे ?” - रमाकांत ने क्षण भर बाद पूछा ।
“कॉफी ?” - सुनील चिल्लाया - “मैंने सुबह से खाना नहीं खाया है ।”
“इस वक्त खाना तो शायद ही हो ।” - रमाकांत बोला - “आमलेट, स्लाइस, हमबर्गर वगैरह खा लो ।”
“वही मंगाओ ।”
उसके बाद आधे घन्टे तक सुनील की पेट पूजा होती रही ।
फिर वेटर ने प्लेटें हटाईं और रमाकांत और सुनील को काफी सर्व कर दी । सुनील ने लक्की स्ट्राइक का सिगरेट सुलगाया और कॉफी की चुस्कियां लेने लगा ।
उतने अरसे में रमाकांत चारमीनार फूंकता रहा ।
उसी समय रमाकांत के फोन की घन्टी घनघना उठी ।
“हल्लो ।” - रमाकांत रिसीवर उठाकर बोला ।
वह कुछ क्षण दूसरी ओर से आने वाली आवाज सुनता रहा, एक बार उसने सुनील की ओर देखा और फिर फोन मे बोला - “ओके । आस्क हर टु होल्ड दि लाइन ।”
“तुम्हारा फोन है ।” - वह सुनील की ओर रिसीवर बढाता हुआ बोला ।
“कौन है ?” - सुनील ने रिसीवर लेते हुए पूछा ।
“कोई लड़की है । नाम नहीं बताया उसने ।”
“हल्लो ।” - सुनील फोन में बोला ।
“मिस्टर सुनील देयर ?” - दूसरी ओर से आवाज आई ।
“यस ।”
“मैं एंजिला बोल रही हूं ।” - उत्तर मिला - “मैं आपको बहुत जगह ट्राई कर चुकी हूं । आपके आफिस से पता लगा कि आप यहां हो सकते हैं ।”
“फरमाइए ।”
“आए मुझे फौरन कहीं मिल सकते हैं ?”
“किस विषय में ?”
“यह मैं बाद में बताऊंगी । फिलहाल आप इतना जान लीजिए कि इसमें मेरी, आपकी और नीला तीनों की दिलचस्पी है ।”
सुनील ने पहली बार अनुभव किया एंजिला के स्वर में अच्छा-खासा भय का पुट था ।
“आप यहां आ सकती हैं ?”
“यहां कहां ? मुझे तो केवल टेलीफोन नम्बर बताया गया था ।”
“यूथ क्लब में । आप जानती हैं ?”
“जानती हूं । लेकिन क्या वहां बात सम्भव होगी ?”
“क्यों नहीं । तो फिर आ रही हैं आप ?”
“फौरन ।”
और सम्बन्ध विच्छेद हो गया ।
“तुम फूटो यहां से ।” - सुनील रिसीवर रखकर रमाकांत से बोला ।
“क्यों ?”
“एक छोकरी आ रही है । वह मुझसे तनहाई में बात करना चाहती है ।”
“मोतियावालयो, हमने भी बहुत छोकरियां से कई बार तनहाई में बातें की हैं लेकिन हमने किसी या को फूटने के लिए नहीं कहा था ।”
“यह इश्क का चक्कर नहीं है ।”
“तो फिर ?”
“जो छोकरी यहां आ रही है, वह दीवान साहब की हत्या के सम्बन्ध में कुद बातें करना चाहती है ।”
“तो फिर आ जाने दो उसे । मैं कॉफी तो पी लूं । उसकेक आते ही चला जाऊंगा । आखिर हम भी तो देखें कि यह केस का चक्कर है या” - रमाकांत आंख कारकर बोला - “इश्क का ।”
“लानत है तुम पर ।” - सुनील होंठ सिकोड़कर बोला ।
रमाकांत चुपचाप कॉफी पीने लगा ।
लगभग बीस मिनट बाद एंजिला वहां प्रविष्ठ हुई । रमाकांत चुपचाप उठा और बाहर निकल गया ।
एंजिला रमाकांत को कमरे से बाहर जाता देखती रही । द्वार बन्द होते ही वह सुनील की बगल में रखी कुर्सी पर बैठ गई ।
“मैं आपसे बुद्ध की मूर्ति के विषय में बात करना चाहती हूं ।” - वह बोली ।
“क्या ?”
“वह मैंने चुराई थी ।”
“अच्छा !” - सुनील भावहीन स्वर में बोला ।
“आप मेरी बात गौर से नहीं सुन रहे हैं ।”
“आपको यह सन्देह कैसे हुआ ? आपने यही तो कहा है कि आपने बुद्ध की मूर्ति चुराई है ।”
“शायद विश्वास नहीं किया इस बात पर ।”
“मैंने एकदम विश्वास कर लिया है ।”
“लेकिन आप चौंके नहीं । आपने तो यह खबर यूं सुन ली जैसे मैंने आपको यह बताया हो कि एक रुपये में सौ नये पैसे होते हैं ।”
“आप क्या प्रतिक्रिया चाहती हैं ?” - सुनील विरक्त‍ि का प्रदशर्न करता हुआ बोला - “कि मूर्ति आपने चुराई है, यह बात सुनते ही मैं जमीन पर लोट जाता और यूं जाहिर करता कि जैसे मुझे हिस्टीरिया का दौरा पड़ गया हो ! आपने बुद्ध की मूर्ति चुराई है । आपने यह बात इसलिए मुझे बताई है क्योंकि आप जानती है कि मैं यह बात पहले ही जान चुका हूं । और यह भी जान चुका हूं कि मूर्ति चुराने के लिए कौन-सा तरीका इस्तेमाल किया गया था ।”
“यह सच नहीं है, मिस्टर सुनील ।” - एंजिला धीरे से बोली ।
“अभी पिछले एक-डेढ घन्टे के बीच में फोटोग्राफर सुदेश कुमार आपसे नहीं मिला था ?” - सुनील उसके चेहरे पर दृष्टि गड़ाता हुआ बोला ।
“मिला था ।”
“और उसाने आपको यह नहीं बताया कि मैं जान गया हूं कि मूर्ति आपने चुराई थी ?”
एंजिला ने नेत्र झुक गए ।
“आपने मूर्ति क्यों चुराई थी ?”
“मुझे दीवान साहब ने कहा था ।” - वह धीरे से बोली ।
“क्या ?” - सुनील हैरान होकर बोला - “दीवान साहब ने आपसे यह कहा था कि आप मूर्ति चुराकर ले जायें ?”
“जी हां । और उन्होंने ही मुझे यह तरकीब भी बताई थी । उन्होंने ही मुझे कहा था कि मैं म्यूजियम में से शीशे का शो केस तोड़कर मूर्ति निकाल लाऊं और उसे चुपचाप सुदेश कुमार के बाक्स कैमरे में रख दूं क्योंकि वह कैमरा दोबारा इस्तेमाल नहीं होने वाला था । मैंने ऐसा किया भी लेकिन जब मैं सुदेश कुमार के स्टूडियो में मूर्ति लेने गई तो वहां नहीं थी । आप सारी बात पहले ही समझ गये थे इसलिए मेरे पहुंचने से पहले ही मूर्ति वहां से निकाल लाये थे ।”
“पहली मूर्ति भी आपने चुराई थी ?”
“नहीं ।”
“वह किसने चुराई थी ?”
“मुझे नहीं मालूम 1”
“दीवान साहब ने आपसे मूर्ति चुराने के लिए क्यों कहा था ?”
“मुझे नहीं मालूम ।”
“और आपने जानने की कोशिश भी नहीं की ?”
“की थी । लेकिन उन्होंने बताया नहीं ।”
“क्या मैं इस असम्भव कहानी पर विश्वास कर लूं ?”
एंजिला चुप रही ।
“मिस एंजिला, आप झूठ बोल रही हैं । दीवान साहब आपको मूर्ति चुराने के लिए कहें, यह बात एकदम असम्भव है । भला वे ऐसी कोई बात क्यों कहेंगे तुमसे ! हकीकत यह है कि मूर्ति आपने चुराई है और किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए चुराई है । लेकिन अब जब आपकी चोरी खुल गई है और आप जानती हैं कि इस चोरी के इलजाम में आप जेल जा सकती हैं तो आप यह झूठी कहानी गढ लाई हैं क्योंकि आप जानती हैं दीवान साहब मर चुके हैं इसलिए वह यह बताने नहीं आ सकते कि आप झूठ बोल रही हैं ।”
एंजिला चूप रही ।
“आप मुझे यह विश्वास क्यों दिलाना चाहती हैं कि चोरी आपनी दीवार साहब के संकेत पर की थी ?”
“क्योंकि आप ही मेरी कुछ सहायता कर सकते हैं ।”
“मैं आपको चोरी के इलजाम से कैसे बचा सकता हूं जब कि अब सुदेश कुमार भी जानता है कि चोरी आपने की है ।”
“अगर आप नीला को यह कहने लिए राजी कर लें कि दीवान साहब ने उसकी मौजूदगी में मुझे मूर्ति चुराने के लिए कहा था तो मैं बच सकती हूं ।”
“मुझे क्या जरूरत पड़ी है कि मैं ऐसी कोई बात कहूं ?”
“आपको नीला की खातिर यह कहना चाहिए ।”
“नीला की खातिर या आपकी खातिर ?”
“नीला की खातिर ।”
“क्या मतलब ?”
“मैं एक ऐसी बात जानती हूं जो नीला को फांसी के तख्ते पर पहुंचा सकती है ।”
“क्या ?”
“मैंने नीला को बाथरूम की खिड़की में से दीवान साहब की खिड़की की ओर ब्लो गन से निशाना साधते देखा था ।” - एंजिला एक-एक शब्द पर जोर देती हुई बोली ।
“क्या ?” - सुनील हैरान होकर बोला ।
“जी हां ।” - एंजिला बोली - “नीला ब्लो गन लेकर बाथरूम में गई थी ।”
“आपके सामने ही ?”
“नहीं । मैं उस समय ड्रेसिंगरूम में कपड़े बदल रही थी । मैंने नीला को बाथरूम में ब्लो गन ले जाते देखा था । मैंने ड्रेसिंगरूम की खिड़की में से नीला को दीवान साहब की खिड़की की ओर निशाना साधते देखा था ।”
“ड्रेसिंगरूम की खिड़की से बाथरूम की खिड़की दिखाई देती है ?” - सुनील ने सन्दिग्ध स्वर में पूछा ।
“खिड़की दिखाई नहीं देती । लेकिन उस खिड़की में से बाहर निकला हुआ ब्लो गन का अगला सिरा दिखाई देता था । नीला निशाना साधने के लिए ब्लो गन को ऊपर नीचे मूव कर रही थी ।”
“तुम्हें क्या पता नीला निशान साध रही थी ?”
“क्योंकि बाथरूम में नीला के अतिरिक्त और कोई नहीं था ।”
“पुलिस तुम्हारा बयान ले चुकी है ?”
“हां ।”
“तुमने यह बात पुलिस को बताई है ?”
“नहीं ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि इसी बात के दम पर मैं नीला से सौदा करना चाहती हूं । नीला के विरुद्ध पहले ही बहुत से सबूत हैं, यह आखिरी बात तो उसके बचाव की रही-सही उम्मीद भी समाप्त कर देगी ।”
“लेकिन अगर अब तुम पुलिस को यह बात बताओगी तो वे तुमसे यह नहीं पूछेंगे कि तुमने पहले यह बात क्यों नहीं बताई ?”
“मैं कह दूंगी कि मैं बताना भूल गई थी ।”
सुनील ने नया सिगरेट सुलगा लिया ।
“तो फिर क्या जवाब है आपका ?”
“किस विषय में ?”
“अगर मैं नीला के विषय में अपना मुंह बन्द रखूं तो क्या आप नीला को इस बात के लिए तैयार कर सकते हैं कि वह पूछे जाने पर यह कह दे कि मैंने बुद्ध की मूर्ति दीवान साहब के निर्देश पर चुराई थी और दीवान साहब ने मुझे यह निर्देश नीला के सामने दिया था ?”
“नहीं ।”
“क्यों ?” - एंजिला के माथे पर बल पड़ गये ।
“क्योंकि मैं ब्लैकमेलिंग पसन्द नहीं करता ।”
“आप जानते हैं नीला का परिणाम क्या होगा ?”
“जानता हूं ।”
“उसे फांसी हो जायेगी ।”
“हो जाये ।”
“उसकी सुरक्षा में आपकी तनिक भी दिलचस्पी नहीं है ?”
“मेरी क्या दिलचस्पी होगी ? मेरी क्या चाची लगती है वह ? अगर उसने अपराध किया है तो उसे सजा तो होनी ही चाहिए । मैं क्या कोई फिल्मी हीरो हूं जो बिना जानबूझ उसकी खातिर अपनी जान बखेड़े में डाल दूंगा ?”
एंजिला के चेहरे पर गहरी निराशा के भाव उभर आये ।
“मुझे आपसे ऐसी आशा नहीं थी ।” - वह रुआंसे स्वर में बोली ।
“मुझे भी आपसे ऐसी आशा नहीं थी ।” - सुनील ने भावहीन स्वर में उत्तर दिया ।
“क्या मतलब ?”
“कि आप मुझे इतनी लचर कहानी से बहलाने की कोशिश करेंगी । आपने मूर्ति क्यों चराई इसका असली कारण तो आपने बताया ही नहीं ।”
“वही असली कारण है जो मैंने बताया है ।”
“तो फिर मेरा भी वही उत्तर है जो मैं आपको पहले दे चुका हूं ।”
“आप पुलिस में यह रिपोर्ट करेंगे कि मूर्ति मैंने चुराई है ?”
“मैं क्या करूंगा या क्या नहीं करूंगा, यह मेरे सोचने की बात है ।”
एंजिला चुपचाप बैठी रही । कुछ क्षण बाद वह उठी और फिर बिना सुनील की तरफ दृष्टिपात किये एड़ियां ठकठकाते बाहर निकल गयी ।
सुनील चुपचाप बैठा सिगरेट के कश लेता रहा । उसने आखिरी कश लेकर सिगरेट को ऐश ट्रे में डाला और उठ खड़ा हुआ ।
उसी समय रमाकांत कमरे में घुसा ।
“हो गई तनहाई में बातचीत ?” - उसने पूछा ।
“हो गई ।” - सुनील ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया ।
“तुम्हारी छोकरी तो बड़ी उखड़ कर गई मालूम होती है ।”
“रमाकांत ।” - सुनील उसकी बात की ओर ध्यान दिये बिन बोला - “फालतू बातें छोड़ो तुम । एक काम करवाओ ।”
“क्या ?”
“लंगड़े फोटोग्राफर सुदेश कुमार को तो देखा ही होगा तुमने ?”
“हां पार्टी में देखा था ।”
“जिन बैसाखियों के सहारे वह आजकल चल रहा है, वे उसने केवल दस-बारह दिन पहले ही बनवाई हैं । दोनों बैसाखियों के बीच के डंडे भीतर से खोखले हैं लेकिन फोटोग्राफर को तब तक यह बात मालूम नहीं थी जब तक कि मैंने एक बैसाखी में से उसे ब्लो गन नहीं निकाल कर दिखाई थी । लेकिन जिसने बैसाखियों में ब्लो गन रखी थी उसे अवश्य ही यह मालूम था कि वे भीतर से खोखली थीं । जब बैसाखी के मालिक को यह बात मालूम नहीं थी तो किसी तीसरे आदमी को कैसे पता लगी ?”
“प्यारयो, कहना क्या चाहते हो ?”
“मैं कहना चाहता हूं कि किसी ने बैसाखियां बनाने बाले को विशेष रूप से रिश्वत देकर तैयार किया था कि वह फोटोग्राफर की बैसाखियां भीतर से खोखली बना दे । ऐसा आदमी फोटोग्राफर को जानता-पहचानता जरूर होना चाहिए वर्ना उसे यह कैसे पता लग सकता था कि फोटोग्राफर नई बैसाखियां बनवाने वाला था और पार्टी की रात को वह दीवान साहब के यहां मौजूद भी होगा ।”
“ऐसे तो बहुत आदमी हो सकते हैं । सुदेश कुमार दीवान साहब का पक्का फोटाग्राफर है । दीवान साहब की पार्टियों में उससे कई लोग कई बार मिल चुके होंगे ।”
“इसीलिए तो मैं चाहता हूं कि तुम यह पता लगाने की चेष्टा करो कि बैसाखियां बनाने वाले ने किसके कहने पर फोटोग्राफर की बैसाखियां खोखली बनाई थीं ।”
“बड़ा लम्बा आर्डर दे रहे हो, मालको ।”
“कैसे ?”
“अगर फोटोग्राफर ने हमें यह न बताया कि उसने बैसाखियां कहां से बनवाई हैं तो हमें नगर के एक-एक बैसाखियां बनाने वाले को चैक करना पड़ेगा और उसके बाद भी गारन्टी नहीं होगी कि हमने हर डीलर कवर कर लिया था ।”
“तुम बड़े डीलरों से शुरू हो जाओ । सुदेश कुमार अच्छा खासा रुपया कमा रहा है । किसी राह चलते बढई से तो बैसाखियां बनवाई नहीं होंगी उसने ।”
“मैं कोशिश करूंगा ।”
“कोशिश नहीं, यह काम होना ही चाहिए ।”
“अच्छा, बाबा ।”
सुनील यूथ क्लब से बाहर निकल आया ।
***
सुनील प्रीमियर बिल्डिंग की मंजिल पर पहुंचा ।
“दीवान साहब की मिसेज ऊपर हैं ?” - उसने सातवीं मंजिल तक ले लाने वाली दीवान साहब की प्राइवेट लिफ्ट के सामने बैठे लड़के से पूछा ।
“नहीं, वे अपने स्टूडियो में हैं, साहब ।” - लड़का बोला ।
सुनील ने स्टूडियो के सामने जाकर द्वार खटखटा दिया । नीला ने द्वार खोला । वह एक बेहद भड़कदार परिधान पहने हुए थी ।
“हल्लो ।” - वह मीठे स्वर में बोली ।
“तुम्हारी शादी परसों है ?” - सुनील उसके पहनावे पर एक गहरी दृष्टि डालता हुआ बोला ।
“पागल हुए हो क्या ?”
“तुम्हारे कपड़ों से के तो यही लगता है । मेम साहब, तुम्हें सुनने में कैसा भी लगे लेकिन हकीकत यही है कि तुम दीवान नाहरसिंह की विधवा हो । तुम्हारे पति को मरे अभी तीन दिन भी नहीं हुए हैं । लोग तुम्हें दुख और विषाद की साक्षात प्रतिमा बना देखने की आशा करते हैं जबकि तुम्हारे रंग-ढंग से ऐसा मालूम हो रहा है जैसे तुम उसकी मौत पर खुशियां मना रही हो ।”
“मुझे दीवान साहब की मौत का कतई दुख नहीं है और झूठा गम दिखाने की मुझे आदत नहीं है । जानते हो मरने से पहले दीवान साहब ने क्या किया था ?”
सुनील ने प्रश्नसूचक दृष्टि से उसकी ओर देखा ।
“रूपसिंह ने कहा था कि कल शाम को जब वे थोड़ी देर के लिए बाहर निकले थे तो उन्होंने किसी को फोन किया था ।” - नीला सुनील के लिये रास्ता छोड़कर एक तरफ हटती हुई बोली - “जानते हो वह फोन किसे किया था उन्होंने ?”
“किसे ?” - सुनील एक सोफे पर बैठता हुआ बोला ।
नीला ने द्वार बन्द किया और उसके सामने आ बैठी ।
“अपने वकील को ।” - वह बोला - “उन्होंने उसे कहा था कि अगली सुबह होते ही वह अदालत में मुझसे दीवान साहब के तलाक की अर्जी दे दे ।”
“फिर आगली सुबह क्या हुआ था ?”
“अगली सुबह हुई ही नहीं उनके लिये ।” - नीला विषभरे स्वर में बोली - “अगली सुबह होने से पहले ही वे ऊपर पहुंच गए ।”
“दीवान साहब तलाक क्यों लेना चाहते थे तुमसे ?”
“उन्हें मेरे चरित्र पर शक था । जरा गौर करो, सुनील । अपनी पत्नी के चरित्र पर सन्देह था पचपन वर्ष के उस बूढे को जिसने अपनी बेटी की उम्र की लड़की से तो शादी की और जिसने इस उम्र में भी कम से कम आधी दर्जन रखैल पाल रखी थीं । ऐसा बूढा अपनी बीवी से आशा रखता था कि वह सती-साध्वी हो ।”
“लेकिन तुमने ऐसे आदमी से शादी की क्यों ? यह तुम्हारी भी तो गलती है ।”
“मैं कब कहती हूं मेरी गलती नहीं है ! उसी गलती की तो आज सजा भुगत रही हूं । सुनील साहब, मैं बहुत गरीब खानदान की लड़की हूं लेकिन तड़क-भड़क भरी जिन्दगी में मेरी शुरू से ही बहुत दिलचस्पी थी । मैं एक आर्ट डीलर की दुकान पर सेल्सगर्ल थी । दीवान साहब वहां अक्सर आया करते थे । सच पूछो तो मैंने ही दीवान साहब को फांसा था और इस बात के लिए तैयार किया था कि वे मुझसे शादी कर लें । मैंने सुना था कि दीवान साहब हार्ट के मरीज थे और अगले तीन या चार साल में कभी टें बोल जाएंगे । दीवान साहब का कोई सगा-सम्बन्धी तो था नहीं । मैंने सोचा था कि अगर लाखों की सम्पत्ति मुझे मिलेगी । लेकिन शादी के बाद मुझे पता लगा कि दीवान साहब तो उस उम्र में भी रेस के घोड़े की तरह मजबूत थे । मरना तो दूर की बात, उतने सालों में उनका एक स्क्रू तक ढीला नहीं हुआ । मुझे तो धन का लालच दगा दे गया था । दीवान साहब इतने शक्की थे कि मैं किसी से हंस कर बात कर लेती थी तो मुझे खा जाने को दौड़ते थे । रुपए-पैसों के मामले में मुझे कोई विशेष स्वतन्त्रता नहीं थी । कई बार तो उन्होंने मुझे एक-एक पैसे के लिए तरसाया था । खुद तो वे अपने कमरों में बन्द होकर बैठ जाते थे और मुझसे आशा करते थे कि मेरे तेहरे पर मुस्कान न आए । मैं क्लब में न जाऊं क्योंकि वहां मेरे बहुत से यार होंगे । मैं बीच पर न जाऊं क्योंकि वहां लोग मेरे शरीर के कटाव देखेंगे । और न जाने क्या-क्या । मैं कहती हूं सुनील साहब, अगर दीवान साहब छ: महीने और जीवित रह जाते तो न सिर्फ उन्होंने वैसे ही मुझे अपने जीवन में से दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकना था बल्कि उन्होंने मेरी हालत बाजारू औरतों से भी गई बीती कर देनी थी ।”
अन्तिम शब्द कहते-कहते नीला का सुन्दर चेहरा क्रोध से तमतमा उठा था ।
“यह तलाक वाली बात तुम्हें कैसे मालूम हुई ?”
“मुझे वकील ने बताया था ।”
“पुलिस को भी यह बात मालूम हो गई है ?”
“हां ।”
“फिर भी तुम जरा-सा भी बहाना बनाने की जरूरत नहीं समझतीं कि दीवान साहब की मौत से तुम्हें बहुत दुख हुआ है ? नीला, अभी तक तो तुम्हारे विरुद्ध केवल सबूत ही मिले थे कि तुमने हत्या की है लेकिन अब तो उद्देश्य भी प्रकट हो गया है ।”
“क्या उद्देश्य प्रकट हो गया है ?”
“दीवान साहब तुम्हारे पर चरित्रहीनता का इल्जाम लगा कर तुम्हें तलाक देना चाहते थे इसलिए क्रोधित होकर या अच्छी खासी स्कीम बनाकर तुमने उनकी हत्या कर दी ।”
“मैं क्या कर सकती हूं उसमें ? अगर मेरी तकदीर ही खोटी है तो मैं क्या करूं ?”
“तुम्हारी मॉडल एंजिला ने एक नई बात बताई है ।”
“क्या ?”
“वह कहती है कि जिस समय वह ड्रेसिंगरूम में थी, उस समय तम ब्लो गन लेकर बाथरूम में गई थीं और द्वार बन्द कर लिया था । फिर उसने बाथरूम की खिड़की में से ब्लो गन का अगला भाग बाहर निकला हुआ देखा था ।”
“वह झूठ बोलती है ।”
“क्या झूठ बोलती है ।”
“ड्रेसिमंरूम की खिड़की से बाथरूम की खिड़की दिखाई नहीं देती ।”
“यह तो वह भी जानती है लेकिन उसने कहा था कि उसने खिड़की नहीं, खिड़की में से बाहर को निकली हुई ब्लो गन देखी थी । ...यहां ब्लो गन जैसी लम्बी-सी कोई चीज है ?”
“एक छड़ी है !”
“तुम बाथरूम में जाकर छड़ी को जरा खिड़की से बाहर निकालो । मैं ड्रेसिंगरूम की खिड़की में जाकर देखता हूं कि छड़ी दिखाई देती हैं या नहीं ।
“अच्छा ।” - नीला ने कहा ।
नीला छड़ी लेकर बाथरूम में घुस गई । सुनील ड्रेसिंगरूम में आ गया और खिड़की के पास आकर खड़ा हो गया । खिड़की में ग्रिल लगी थी इसलिए उसमें से झुककर बाहर नहीं झांका जा सकता था ।
उसी समय बाथरूम की खिड़की से बाहर छड़ी का अगला भाग सरकता दिखाई दिया।
सुनील बाहर आ गया ।
“छड़ी दिखाई दी थी ?” - नीला ने उतावली से पूछा ।
“कम से कम दस इंच ।” - सुनील ने उत्तर दिया ।
नीला ने होंठ काट लिए ।
“तुमने कल खिड़की खोलकर ब्लो गन को बाहर निकाला था ?”
“हां ।” - इस बार नीला झूठ न बोल सकी - “तुम्हारे जाने के बाद मैंने एक बार फिर दीवान साहब का ध्यान आकृट करने की चेष्टा की थी । उस समय दीवान साहब मुझे अपनी खिड़की के सामने खड़े दिखाई दिए थे । उनकी पीठ मेरी ओर थी और वे किसी से बातें कर रहे थे ।”
“किससे ?”
“मैं देख न सकी ।”
“फिर ?”
“मैंने बाथरूम की खिड़की खोली और दीवान साहब को आवाज दी । उन्होंने मेरी आवाज सुनी नहीं । मैं बाहर जाकर ब्लो गन ले आई । मैंने ब्लो गन को बाहर निकालकर जोर से हिलाना आरम्भ कर दिया और दीवान साहब को फिर आवाज दी । लेकिन उन्होंने सुनी नहीं । फिर दीवान साहब खिड़की में से हट गए । मैंने भी बाथरूम की खिड़की बन्द कर दी और वापस स्टूडियो में आकर ब्लो गन यथा स्थान रख दी ।”
“उस समय एंजिला कहां थी ?”
“ड्रेसिंगरूम में ।”
“तुमने दीवान साहब का ध्यान टार्च की सहायता से आकृष्ट करने की चेष्टा क्यों नहीं की जैसा कि तुमने मेरी मौजूदगी में किया था ?”
“उस समय मुझे टार्च का ख्याल ही नहीं आया था ।”
“सच कह रही हो ?”
“मेरा विश्वास करो, सुनील ।”
“एंजिला और दीवान साहब के कैसे सम्बन्ध थे ?”
“किसी जमाने में एंजिला दीवान साहब की नम्बर वन मिस्ट्रेस थी ।”
“बाद में क्या हो गया था ?”
“बाद में जब मैं आ गई तो दीवान साहब ने उसकी परवाह करनी छोड़ दी थी ।”
“एंजिला पर इसकी क्या प्रतिक्रिया हुई थी ?”
“कुछ भी नहीं । सुनील साहब, एंजिला राजनगर की गिनी-चुनी सुन्दर लड़कियों में से है । वह दीवान साहब जैसे बूढे की क्या परवाह करती भला ? उसकी दीवान साहब में नहीं, उनके धन में दिलचस्पी थी । उस धन के बदले में उसने अपने जीवन की केवल कुछ घड़ियां दांव पर लगाई थीं जबकि मैंने सारा जीवन ही दांव पर लगा दिया था ।”
“मेरे जाने के बाद क्या तुम एंजिला को स्टुडियो में छोड़कर बाहर गई थीं ?”
“मैं लगभग दस मिनट के लिए ऊपर गई थी ।”
“उस समय ब्लो गन स्टूडियो में ही थी ?”
“हां ।”
“और जब तुम वापिस आई थीं, तब भी क्या वह वहीं पड़ी थी जहां तुम उसे छोड़कर गई थीं ।”
“हां ।”
“क्या एंजिला दीवान साहब की हत्या कर सकती है ?”
“मैं क्या कह सकती हूं इस विषय में ?”
“रुपए-पैसे के मामले में एंजिला की स्थिति कैसी है ?”
“मुझे विशेष नहीं मालूम । लेकिन इतना जरूर सुना है कि वह उतना कमाती नहीं जितना खर्च करती है । उसकी आमदनी का कोई और साधन अवश्य है जो कि वह किसी को बताती नहीं है । पिछले दिनों उसने मेरे से पांच हजार रुपए का एक चैक एंडोर्स करवाया था ।”
“चैक किसके नाम था ?”
“एंजिला के ही नाम था ।”
“और दिया किसने था ?”
“चैक पर कृष्णलाल के हस्ताक्षर थे ।”
“तुम उसे जानती हो ?”
“वह एक आर्ट डीलर है । मैं दीवान साहब के साथ उसकी दुकान पर एक-दो बार गई हूं ।”
“एंजिला उसे कैसे जानती है ?”
“यह तो मुझे मालूम नहीं लेकिन पिछले दिनों मैंने दो तीन बार उसे कृष्णलाल के साथ देखा था ।”
“वह कैसा आदमी है ?”
“दादा है । कई गुण्डे पाल रखे हैं उसने । मुझे तो उसकी सूरत से डर लगता है ।”
“वह रहता कहां है ?”
“छत्तीस, सर्नबी रोड पर उसका घर है ।”
सुनील ने पता नोट कर लिया ।
“अब तुम दो काम और करो ।” - सुनील बोला ।
“क्या ?”
“एक तो यह अपना राजसी परिधान उतारो और सीधे-सादे वस्त्र पहनो । तुम्हें यह प्रकट करना है कि दीवान साहब की मृत्यु से तुम्हें भारी सदमा पहुंचा है और तुम्हारा बस चलता तो तुम भी उनके साथ ही मर जाना पसन्द करतीं ।”
“तो अभी कौन-सी देर हो गई है दीवान साहब को मरे ! मैं अभी खिड़की में से छलांग लगा देती हूं ।”
“मजाक मत करो ।”
“अच्छा । और दूसरा काम क्या है ?”
“एक कागज दो ।”
“नीला ने एक पेड़ उसके सामने रख दिया ।
सुनील ने लिखा :
मैं सुनील कुमार चक्रवती को अधिकार देती हूं कि अगर वह मेरे पति दीवान नाहरसिंह के जीवन काल में चोरी गई बुद्ध की प्रतिमा को खोज निकाले तो वह तब तक उसे अपने पास रख सकता है जब तक कि मैं वह मूर्ति उससे वापस न लेना चाहूं ।
“इस पर अपने हस्ताक्षर कर दो ।” - सुनील बोला ।
“क्या मुझे ऐसे अथारिटी लैटर पर साइन करने का अधिकार है ?” - नीला उसे पढकर बोली ।
“क्यों नहीं ? दीवान साहब की मृत्यु के बाद तुम ही तो उनकी चल और अचल सम्पत्ति की स्वामिनी हो ।” - सुनील बोला ।
नीला चुपचाप हस्ताक्षर करने लगी ।
“तारीख मत डालना ।” - सुनील बोला ।
***
हर्नबी रोड पर अधिकतर कोठियां अमीर लोगों की थीं । सुनील ने जिस समय अपनी मोटर साइकल छत्तीस नम्बर के सामने रोकी, उस समय रात के दस बजने को थे । कोठी में सन्नाटा था । बाहर के एक कमरे में से प्रकाश का हल्का-सा आभास मिल रहा था ।
सुनील ने मोटर साइकल स्टैंड पर खड़ी की, वो कोठी का फाटक ठेलकर अन्दर घुस गया और लान के बीच में बने बजरी के चौड़े रास्ते से होता हुआ इमारत की ओर बढा ।
घन्टी बजने से पहले एकाएक उसे एक खयाल आया । अगर एंजिला कृष्णलाल से सम्बन्धित थी और जैसा कि उसका ख्याल था, वह चोरी का माल कृष्णलाल को दिया करती थी, तो बुद्ध की मूर्ति, जो अब भी उसकी जेब में रखी थी, भीतर ले जाना ठीक नहीं था ।
सुनील ने जेब से बुद्ध की मूर्ति निकाली और राहदारी की बगल में रखे एक बड़े से गमले में इस ढंग से डाल दी कि हीरे की चमक न दिखाई दे ।
फिर उसने घन्टी के बटन पर उंगली रख दी । द्वार लगभग पचास वर्ष के दुबले-पतले आदमी ने खोला ।
“मैं कृष्णलाल से मिलना चाहता हूं ।” - सुनील बोला ।
“फरमाइए, मैं ही कृष्णलाल हूं ।” - उस आदमी ने उत्तर दिया ।
“मेरा नाम सुनील है । मैं प्रेस रिपोर्टर हूं । आपसे कुछ बातें करना चाहता हूं ।”
“भीतर आ जाइए ।” - कृष्णलाल एक ओर को हटता हुआ बोला ।
कृष्णलाल उसे एक बड़े ऐश्वर्यपूर्ण ढंग से सजे हुए ड्राइंगरूम में ले आया ।
“तशरीफ रखिए ।” - वह बोला ।
सुनील बैठ गया ।
“फरमाइए ।” - वह सुनील के सामने वाले सोफे पर बैठता हुआ बोला ।
“आप ‘ब्लास्ट’ पढते हैं ?” - सुनील ने पूछा ।
“आप विशेष रूप से ‘ब्लास्ट’ के विषय में ही क्यों पूछ रहे हैं ?”
“क्योंकि दीवान नाहरसिंह की हत्या की प्रमाणिक खबरें केवल ‘ब्लास्ट’ में ही छपी हैं और इस अखबार में इस केस से सम्बन्धित कुछ ऐसी खबरें छपी हैं जो किसी और अखबार में नहीं छपीं ।”
“मैं ‘ब्लास्ट’ नहीं पढता हूं लेकिन दीवान साहब की हत्या के विषय में मैंने पढा है ।” - कृष्णलाल बोला ।
“दीवान नाहरसिंह के पास दो बड़ी कीमती महात्मा बुद्ध की मूर्तियां थीं । उनमें से एक उनकी मृत्यु के लगभग एक मास पहले चोरी हो गई थी और दूसरी को चोरी गए अभी बहत्तर घन्टे भी नहीं हुए हैं ।”
कृष्णलाल कुछ नहीं बोला ।
“मुझे मालूम है मूर्तियां किसने चुराई थी ?”
कृष्णलाल के चेहरे पर सुनील की बात की तनिक भी प्रतिक्रिया नहीं हुई । वह पत्थर की तरह भावहीन चेहरा लिए बैठा रहा ।
“कुछ ही देर बाद चोर को पुलिस भी जान जायेगी ।” - सुनील बोला ।
“कितनी देर बाद ?” - कृष्णलाल ने धीरे से पूछा ।
“शायद कुछ ही मिनटों बाद ।”
कृष्णलाल चुप रहा ।
“एंजिला” - सुनील अन्धेरे में तीर छोड़ता हुआ बोला - “खूबसूरत है, चालाक भी है लेकिन तजुर्बेकार नहीं है । पुलिस के सुयोग्य अधिकारियों की क्रासक्वेश्चनिंग के आगे वह अधिक देर तक टिक नहीं पाएगी । वह खुद तो डूबेगी साथ में आपको डुबोयेगी ।”
कृष्णलाल फिर भी कुछ नहीं बोला ।
“पुलिस किसी भी क्षण यहा पहुंच सकती है ।” - सुनील जाल को तनिक कसता हुआ बोला ।
“आप मुझसे क्या चाहते हैं ?”
“रुपया ।”
“मैं भला रुपया क्यों दूंगा आपको ?”
“आप रुपया अपनी जेब से नहीं देंगे बल्कि उस रुपये में से हिस्सा देंगे जो सहज ही आपको मिल सकता है ।”
“कैसे ?”
“दीवान साहब ने बुद्ध की मूर्ति का बीमा करवाया हुआ था । अगर वह मूर्ति एक न्यायोचित समय तक नहीं मिलती है तो बीमा कम्पनी को हरजाने के तौर पर बहुत मोटी रकम देनी पड़ेगी । बीमा कम्पनी ने उस मूर्ति का सुराग देने वाले के लिए दस हजार रुपये का इनाम घोषित किया हुआ है । उस मूर्ति के बदले में आपने एंजिला को पांच हजार रुपए दिए हैं । अगर वह मूर्ति आपसे पुलिस बरामद कर लेती है तो न केवल आपके पांच हजार रुपये डूबेंगे बल्कि आप पर चोरी का माल रखने का इल्जाम लगेगा और यह भी सम्भव है कि पुलिस आपको ही चोर समझे ।”
सुनील क्षण भर के लिए रुका और फिर बोला - “इस समय दीवान साहब की सम्पत्ति की मालिक उनकी पत्नी नीला है । नीला ने मुझे अपने प्रतिनिधि के रूप में दीवान साहब की खोई हुई मूर्ति को पुन: प्राप्ति का अधिकार दिया है । आपके पास जो मूर्ति है अगर वह आप मुझे दे दें तो मैं आपकी खातिर यह झूठ बोल सकता हूं कि ज्यों ही आपको यह मालूम हुआ था कि वह मूर्ति चोरी की थी और किसी ने आपको चोरी का माल बेचकर ठग लिया था, आप मूर्ति को मेरे पास ले आए थे । इस प्रकार आप न केवल चोरी का माल रखने के इल्जाम से बच जायेंगे बल्कि बीमा कम्पनी के दस हजार रुपये के इनाम के भी अधिकारी होंगे ।”
“बदले में आप क्या चाहेंगे ?” - कृष्णलाल ने पूछा ।
“दो हजार रुपये । नगद । अभी ।”
“और अगर इस समय नगद रुपया न हो मेरे पास ?”
“मेरा ख्याल है आपके पास रुपया है और अगर आप चाहें...”
“एक्सक्यूज मी ।” - एकाएक कृष्णलाल उठता हुआ बोला - “टेलीफोन ।”
कृष्णलाल पिछले कमरे में चला गया और उसने द्वार भीतर से बन्द कर लिया । उसके रिसीवर उठाने का स्वर सुनाई दिया और फिर कुछ क्षण ‘हल्लो-हल्लो’ का स्वर सुनाई देता रहा । उसके बाद आवाज आनी बन्द हो गई । कभी-कभी कृष्णलाल जोर से बोल पड़ता था तो एक आध टूटा-फूटा शब्द सुनील को सुनाई दे जाता था लेकिन सुनील यह न जान सका कि कृष्णलाल किस विषय में बात कर रहा था ।
एक बात सुनील के दिमाग में बुरी तरह खटक रही थी । उसे टेलीफोन की घन्टी सुनाई नहीं दी थी लेकिन कृष्णलाल यूं उठकर भीतर गया था जैसे उसे घन्टी सुनाई दी हो और वह काल रिसीव करने भीतर जा रहा हो ।
उसी समय कृष्णलाल वापिस लौट आया ।
“इस बात की क्या गारन्टी हे कि आप मेरे साथ ईमानदारी से पेश आयेंगे ?” - कृष्णलाल अपने स्थान पर बैठता हुआ बोला ।
“मैं अभी आपके सामने नीला को फोन कर देता हूं ।” - सुनील बोला - “मैं उसे यह बताऊंगा कि शाम को छ: बजे मिस्टर कृष्णलाल मुझे बुद्ध की मूर्ति दे गए थे । मैं कहूंगा कि वह मूर्ति धोखे में आपको बेची गई थी लेकिन ज्यों ही आपको यह पता लगा था कि वह दीवान साहब की चोरी हुई मूर्ति थी आपने वह मूर्ति ईमानदारी से मुझे सौंप दी थी ।”
“इससे क्या होगा ?”
“इससे यह होगा कि नीला इस बात की गवाह हो जाएगी कि आप पुलिस के हस्तक्षेप से पहले ही मूर्ति उसके असली स्वामी को दे चुके थे ।”
कृष्णलाल ने अपनी घड़ी देखी ।
“अधिक समय नहीं है ।” - सुनील बोला ।
“बहुत समय है ।” - कृष्णलाल ने लापरवाही से उत्तर दिया ।
सुनील उसका मुंह देखता रहा ।
“जैसा मैं कहता हूं वैसा लिखिए ।” - एकाएक कृष्णलाल उसकी ओर कागज और पैन सरकाता हुआ बोला - “लिखिये... मैं स्वीकार करता हूं कि आज दो बजे मुझे मिस्टर कृष्णलाल ने टेलीफोन किया था । मिस्टर कृष्णलाल ने मुझे बताया था कि उनके पास एक बुद्ध की मूर्ति है जो उन्हें आज के अखबार पढकर मालूम हुआ है कि वह दीवान नाहरसिंह के संग्रहालय से चुराई गई थी । मिस्टर कृष्णलाल अनजाने में चोरी का माल खरीद बैठे थे । मैं मिस्टर कृष्णलाल के घर गया जहां उन्होंने वह बुद्ध की मूर्ति मुझे सौंप दी । मिस्टर कृष्णलाल ने वह मूर्ति मुझे दीवान नाहरसिंह की विधवा पत्नी का प्रतिनिधि समझकर दी है । साथ ही मिस्टर कृष्णलाल ने मुझे यह भी कहा है कि उन्होंने यह मूर्ति पांच हजार रुपये देकर खरीदी है । वे रुपये उन्हें वापिस मिलने चाहिए । इन रुपयों के अतिरिक्त उन्हें किसी और रुपये-पैसे की अदायगी में कोई दिलचस्पी नहीं । नीचे अपने हस्ताक्षर कर दीजिए और तारीख डाल दीजिए । दैट्स आल ।”
“लेकिन आपको तो बीमा कम्पनी से दस हजार रुपये मिल सकते हैं ।” - सुनील लिखना समाप्त करके बोला ।
“फिलहाल मुझे अपनी गरदन बचाने की चिन्ता है ।” - कृष्णलाल ने उत्तर दिया ।
“और मेरे दो हजार रुपयों का क्या होगा ?”
“वह मैं देता हूं आपको ।”
कृष्णलाल उठा और दूसरे कमरे में घुस गया ।
जब वह वापिस लौटा तो उसके हाथ में ठीक वैसी ही बुद्ध की मूर्ति थी जैसी सुनील बाहर लान में रखे गमले में रखकर आया था ।
उसने मूर्ति और कुछ नोट सुनील के सामने रख दिए ।
“नोट गिन लीजिए ।” - वह बोला - “पूरे दो हजार हैं ।”
सुनील ने नोट और मूर्ति अपनी जेब में रखी और उठ खड़ा हुआ ।
“चलिए आपको गेट तक छोड़ आऊं ।”
सुनील उसके साथ इमारत से बाहर निकल आया । लान में बनी राहदारी से होते हुए वे सड़क पर आ गए ।
कृष्णलाल ने सुनील से हाथ मिलाया और वापिस कम्पाउन्ड में घुस गया । लौटती बार वह कम्पाउन्ड का लोहे का फाटक बन्द करना नहीं भूला ।
सुनील ने जो मूर्ति गमले में रखी थी, वह भीतर ही रह गई थी ।
सुनील कुछ क्षण वहीं खड़ा सोचता रहा, फिर उसने सिर को एक हल्का-सा झटका दिया और मोटर साइकल स्टार्ट कर दी ।
सड़क सुनसान पड़ी थी । कभी कभार उसकी बगल में से एकाध कार गुजर जाती थी ।
एक स्टेशन वैगन सुनील की मोटर साइकल जितनी ही गति से उसके पीछे आ रही थी । सुनील ने दो-तीन बार उसे पास दिया लेकिन स्टेशन वैगन के ड्राइवर ने गाड़ी आगे निकाल ले जाने का उपक्रम नहीं किया ।
सुनील ने मोटर साइकल की स्पीड तेज कर दी ।
स्टेशन वैगन की स्पीड भी तेज हो गई ।
सुनील संदिग्ध हो उठा ।
उसने मोटर साइकल की स्पीड और तेज कर दी ।
स्टेशन वैगन की रफ्तार भी बढ गई ।
सुनील चिन्तित हो उठा । वह एक सीधी सड़क थी जो नगर के बाहर बसी नई कालीनियों को नगर के भीतरी भाग से मिलाती थी । आसपास कोई साइड रोड भी नहीं थी ।
सुनील ने पूरी रफ्तार से मोटर साइकल भगानी आरम्भ कर दी ।
स्टेशन वैगन अब भी उसके पीछे थी ।
सुनील को सामने पक्की सड़क से समकोण पर मिलती हुई एक कच्ची सड़क दिखाई दी । उसने एकदम ब्रेक लगाई और मोटर साइकल उस कच्ची सड़क पर डाल दी ।
सुनील ने मुड़कर देखा, स्टेशन वैगन भी कच्चे रास्ते पर मुड़ गई थी ।
उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आई ।
कच्ची सड़क पर वह मोटर साइकल की स्पीड भी नहीं बढा पा रहा था । आगे गड्ढा आ जाता था तो वह मोटर साइकल की सीट से फुट भर उछल जाता था ।
स्टेशन वैगन उसके समीप होती जा रही थी ।
सुनील ने सड़क के आसपास देखा । किसी ओर मोड़ काट जाने की सम्भावना नहीं थी । दोनों ओर बरसात का पानी भरा था और सड़क पानी के धरातल से तीन चार फुट ऊंची थी ।
स्टेशन वैगन उससे कुछ ही दूरी पर रह गई थी ।
एकाएक सुनील ने पूरी रफ्तार से भागती हुई मोटर साइकल को जोर से ब्रेक लगा दी । स्टेशन वैगन के ड्राइवर को शायद इस बात की आशा नहीं थी । स्टेशन वैगन सर्र से उसकी बगल में से गुजर गई ।
सुनील ने एकदम मोटर साइकल मोड़ी और वापस पक्की सड़क की ओर भगा दी ।
तब तक स्टेशन वैगन भी बैक हो चुकी थी लेकिन इस बार सुनील में और स्टेशन वैगन में बहुत फासला था ।
पक्की सड़क पर आकर उसने मोटर साइकल बैंक स्ट्रीट की ओर भगा दी ।
पीछे स्टेशन वैगन दिखाई नहीं दे रही थी ।
सुनील की जान में जान आई ।
वह शान्ति से मोटर साइकल चलाने लगा ।
एकाएक उसे मोटर साइकल रोक देनी पड़ी । आगे रेलवे क्रासिंग था और फाटक बन्द था ।
शायद गाड़ी आने वाली थी ।
सुनील ने मोटर साइकल एक ओर रोक दी और फाटक खुलने की प्रतीक्षा करने लगा ।
उसी समय तूफान की गति से वही स्टेशन वैगन आकर फाटक के सामने रुक गई ।
तीन आदमी उसमें से कूद कर बाहर निकले ।
एक के हाथ में छोटी-सी रिवाल्वर चमक रही थी ।
रिवाल्वर की नाल सुनील की ओर थी ।
“बहुत चक्कर दिया, बेटा ।” - रिवाल्वर वाला बोला ।
“कौन हो तुम ?” - सुनील ने निरर्थक सा प्रश्न पूछा ।
“यह रिवाल्वर देख रहे हो ?” - वह उसके सामने रिवाल्वर हिलाता हुआ बोला - “यह तुम्हारे सारे सवालों का सबसे फिट जवाब हैं ।”
सुनील चुप रहा । उसने देखा उन तीनों में से एक आदमी उसके पीछे आ खड़ा हुआ था ।
“इन्जन और हैड लाइट बन्द कर दो ।” - रिवाल्वर वाला बोला ।
सुनील ने वैसा किया ।
“मोटर साइकल से नीचे उतरकर इसे स्टैण्ड पर खड़ी कर दो ।”
आज्ञापालन करने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा नहीं था ।
सुनील ने देखा फाटक का चौकीदार रेलवे लाइन से परे दूसरे फाटक के पास खड़ा था । वह उस ओर नहीं देख रहा था ।
“चाहते क्या हो तुम ?” - सुनील ने रिवाल्वर वाले से पूछा ।
“छेदी, साहब को बताना जरा हम क्या चाहते हैं !” - रिवाल्वर वाला बोला ।
उसका वाक्य समाप्त होते ही सुनील के सिर पर किसी भारी चीज की चोट पड़ी । उसके मुंह से आवाज भी न निकली, वह एक बार लहराया और फर्श पर ढेर हो गया ।
***
जिस समय सुनील को होश आया उस समय एक थानेदार और दो सिपाही उसके सामने खड़े स्थिर नेत्रों से उसे घूर रहे थे । पास ही फ्लाइंग स्कवायड की जीप खड़ी थी ।
सुनील ने धुंधलाई-सी आंखों से घड़ी देखी । साढे ग्यारह बज गए थे । उसका सिर बुरी तरह दुख रहा था । उसने सिर में जहां चोट लगी थी उसने उस जगह पर हाथ लगाकर देखा तो पाया बालों में खून की पपड़ियां जमी हुई थीं ।
उसने अपनी जेबें टटोलनी शुरू की । उसके अपने रुपए व कृष्णलाल के दिए दो हजार रुपए गायब थे । बुद्ध की मूर्ति भी गायब थी । बाकी चीजें जेबों में सही-सलामत मौजूद थी ।
“उठ सकते हो ?” - थानेदार ने उससे पूछा ।
“हां ।” - सुनील ने कहा और लड़खड़ाता हुआ उठ खड़ा हुआ ।
एक सिपाही ने उसे सहारा दिया ।
“कौन हो तुम ?”
“मेरा नाम सुनील है, मैं ब्लास्ट का रिपोर्टर हूं ।” - सुनील बोला ।
“क्या हुआ था ?”
“मैं मोटर साइकल पर घर जा रहा था । फाटक बन्द होने के कारण मैं यहां रुक गया । यहां मुझे तीन गुण्डों ने घेर लिया और मेरा माल लूटकर और मुझे बेहोश छोड़कर भाग गए ।”
“तुम्हारी मोटर साइकल कहां है ?”
“शायद गुण्डे ले गए ।”
“लेकिन इतनी रात को तुम कहां से आ रहे थे ?” - थानेदार ने संदिग्ध स्वर में पूछा ।
“हर्नबी रोड से ।”
“वहां क्या करने गए थे ?”
“एक आदमी से मिलने ।”
“कौन आदमी ?”
“उसका नाम कृष्णलाल है, वह छत्तीस नम्बर में रहता है ।”
थानेदार कुछ क्षण सोचता रहा और फिर सिपाहियों से बोला - “साहब को गाड़ी में बिठाओ ।”
“क्यों ?” - सुनील ने पूछा ।
“हम कृष्णलाल के घर चल रहे हैं ।”
सब लोग जीप में बैठ गए । ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी ।
“छत्तीस, हर्नबी रोड के सामने रोकना ।” - थानेदार ने कहा ।
जीप कृष्णलाल के घर के सामने आकर रुकी ।
“आओ ।” - थानेदार उसे बांह से पकड़कर नीचे उतारता हुआ बोला । वे लोहे का फाटक ठेलकर भीतर घुस गए ।
थानेदार के कई बार घन्टी बजाने के बाद द्वार खुला ।
भीतर से आंखें मलता हुआ कृष्णलाल निकला ।
“तकलीफ के लिए माफी चाहता हूं, जनाब ।” - थानेदार बोला ।
“फरमाइए ?” - कृष्णलाल तल्ख स्वर में बोला ।
“ये साहब कहते हैं कि ये अभी डेढ-दो घन्टे पहले आपसे मिलने आए थे ।”
“मुझसे ?”
“जी हां ।”
“लेकिन यह असम्भव है । आज सारे दिन मुझसे कोई भी मिलने नहीं आया ।”
“जरा गौर से इनकी सूरत देखिए और फिर उत्तर दीजिए ।” - थानेदार सुनील को आगे करते हुए बोला ।
“थानेदार साहब ।” - कृष्णलाल रुष्ट स्वर में बोला - “मैंने आज से पहले अपनी जिन्दगी में इस आदमी की सूरत नहीं देखी ।”
थानेदार ने एक कठोर दृष्टि सुनील पर डाली और फिर कृष्णलाल से क्षमायाचना करता हुआ वापस घूम पड़ा ।
द्वार बन्द हो गया ।
“बरखुरदार” - थानेदार दांत पीसकर सुनील से बोला - “अब मैं तुम्हें झूठ बोलने का मजा चखाऊंगा ।”
“पागल हुए हो क्या ?” - सुनील जलकर बोला - “मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा ? वही झूठ बोल रहा था ।”
“अब चुप हो जाओ । बाकी राग पुलिस स्टेशन पर चलकर अलापना ।”
सुनील को फिर जीप में बिठा दिया गया ।
***
इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल ने एक बार मेज की दूसरी ओर बैठे सुनील को देखा और फिर बोला - “फिर पिटकर आ रहे हो ?”
“तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है ?” - सुनील ने पूछा ।
“लगता है राजनगर का हर आदमी तुम्हें फुटबाल समझता है । जो आता है वही तुम्हें एक किक जमा जाता है ।”
“या शायद पंचिंग बैग समझता हो !”
“यह भी संभव है । इस बार किसने हाथ सेके हैं तुम पर ?”
“किसी ने नहीं । इस बार तो मेरा ही जी चाहा था कि अपना सिर दीवार से टकरा दूं ।”
“और तुमने टकरा दिया ?”
“हां ।”
“सुनील, आखिर तुम्हारा अखबार न्यूज एजेंसियों से मिली खबरों पर निर्भर क्यों नहीं करता ?”
“क्योंकि हमारा अखबार डिजाइन की हुई खबरों में विश्वास नहीं रखता ।”
प्रभूदयाल कुछ क्षण चुप रहा और फिर बोला - “किस्सा क्या है ?”
“किस्सा तुम अपने उस थानेदार से पूछो जो मुझे यहां लाया है ।”
“उसे छोड़ो । वह तुम्हें पहचानता नहीं था वर्ना वह बड़े स्पेशल ढंग से तुम्हारे साथ पेश आता । कृष्णलाल से कैसे भिड़ गए तुम ?”
सुनील चुप रहा ।
“मैंने तुमसे कुछ पूछा है ।” - प्रभूदयाल कठोर स्वर से बोला ।
“मैंने सुन लिया है ।” - सुनील बोला - “गर्म होने की जरूरत नहीं है, इन्स्पेक्टर साहब । मैं कोई रिमान्ड में लिया हुआ पेशेवर मुजरिम नहीं हूं । तुम्हारे थानेदार साहब मुझे यहां ले आए हैं, इससे मैं अपराधी सिद्ध नहीं हो गया हूं । यह मेरी शराफत है कि मैं उसके साथ यहां चला आया ।”
“यह शराफत क्यों दिखाई तुमने ?”
“तुम्हारे दर्शन करने के लिए ।”
“मजाक मत करो ।” - प्रभूदयाल फिर उखड़ गया ।
“आज से पहले मैंने तुमसे कभी मजाक किया है ? प्रभू, मैं वाकई तुमसे मिलना चाहता था ।”
“क्यों ?”
“देखो ।” - सुनील प्रभूदयाल की ओर झुकता हुआ बोला - “राजनगर में तुम भी बरसों से रह रहे हो और मैं भी बरसों से रह रहा हूं । इतने अरसे में, तुम खुद गवाह हो, तुम हमेशा मुझे चोर समझते हो कि मैं कानून से खिलवाड़ करता हूं । लेकिन हर बार तुम्हें मुंह की खानी पड़ी है । हर ऐसे केस में, जिसमें मेरी दिलचस्पी होती है, तुम एक नियम की तरह मेरे विरुद्ध हो जाते हो ।”
“तुम कहना क्या चाहते हो ?”
“मैं कहना चाहता हूं कि क्यों न चेंज के लिए इस बार हम एक-दूसरे को सहयोग देकर देखें ?”
“कैसे ?”
“इस केस ने एकाएक ऐसा मोड़ ले लिया है कि पुलिस के हस्तक्षेप के बिना मैं इसे हल नहीं कर सकता ।”
“तुम दीवान नाहरसिंह की हत्या की बात कर रहे हो ?”
“हां ।”
“तुम्हें मालूम है, हत्यारा कौन है ?”
“हां । हां ।”
“कौन है ?”
“अभी नहीं बताऊंगा । लेकिन इतना वादा अभी कर सकता हूं कि इस केस को हल करने का सारा श्रेय तुम्हें मिलेगा ।”
“बदले में तुम क्या चाहोगे ?”
“दो बातें । एक तो तुम ‘ब्लास्ट’ के हित को ध्यान में रखोगे । मेरा मतलब है कि हत्या के प्रमाणिक समाचार सबसे पहले ‘ब्लास्ट’ में छपने चाहियें ।”
“और दूसरी बात ?”
“दूसरी बात यह है कि तुम एंजिला के लिए कुछ करो ।”
“उसके लिए क्या करूं ?”
“दीवान नाहरसिंह के यहां से बुद्ध की दोनों मूर्तियां एंजिला ने चुराई थीं ।”
“क्या !”
“मैं ठीक कह रहा हूं । वे मूर्तियां उसने कृष्णलाल के संकेत पर चुराई थीं । पहली मूर्ति के बदले उसने एंजिला को पांच हजार रुपए दिए थे । दूसरी मूर्ति वह चुराकर तो ले गई थी लेकिन वह कृष्णलाल के पास नहीं पहुंच सकी थी । उससे पहले ही मैंने उसे खोज निकाला था ।”
“अब पहली मूर्ति कहां है ?”
“कृष्णलाल के पास ।”
“और दूसरी ?”
“मेरे पास । मेरे फ्लैट में ।” - सुनील बड़ी सफाई से झूठ का ताना-बाना बुनता हुआ बोला ।
“मैं एंजिला के लिए क्या कर सकता हूं ?”
“एंजिला चोरी के इल्जाम में पकड़ी जाएगी । तुम उसे कृष्णलाल के विरुद्ध सरकारी गवाह के रूप में पेश कर सकते हो । प्रभूदयाल, कृष्णलाल चोरी के माल का सबसे बड़ा खरीदार है । एक बार उसके तुम्हारे हत्थे चढने की देर है, नगर में हुई पिचहत्तर प्रतिशत चोरियों का सुराग मिल जाएगा ।”
“वह हमारे हत्थे कैसे चढ सकता है ?”
“अगर उसके घर से बुद्ध की मूर्ति बरामद होती है तो क्या यह उसे धर लेने के लिए काफी नहीं है ?”
“काफी है ।” - प्रभूदयाल कुछ सोचता बोला - “लेकिन एंजिला में तुम्हारी क्या दिलचस्पी है ?”
“कुछ भी नहीं ।”
“तो फिर तुम उसे सरकारी गवाह बना लेने पर क्यों जोर दे रहे हो ?”
“मैं सोचता हूं एक बार पुलिस की गिरफ्त से बाल-बाल बच जाने के बाद शायद उसे अक्ल आ जाए । शायद वह ईमानदारी के जीवन का महत्व अनुभव करने लगे ।”
प्रभूदयाल कुछ नहीं बोला ।
“सौदा मंजूर है ?” - सुनील ने पूछा ।
“मंजूर है ।” - प्रभूदयाल उससे हाथ मिलाते हुए बोला ।
“जिन्दगी में पहली बार मुझसे हाथ मिला रहे हो !” - सुनील बोला ।
“हर काम की कोई न कोई पहली बार तो होती ही है ।” - प्रभूदयाल ने मुस्कराकर उत्तर दिया ।
“तुम्हें एंजिला के घर का पता मालूम है ?”
“मालूम है लेकिन उसका क्या होगा ?”
“उसे भी साथ ले लो । उसकी मौजूदगी में कृष्णलाल का क्रासक्वेश्चन करना ज्यादा फायदेमन्द होगा ।”
“ओके ।”
प्रभूदयाल ने जीप निकलवाई और सुनील और उस थानेदार के साथ, जो सुनील को पुलिस स्टेशन लाया था, एंजिला के घर की ओर चल दिया ।
सुनील ने घड़ी देखी । एक बजा था ।
ड्राइवर ने मेहता रोड पर स्थिर एक इमारत के सामने गाड़ी रोक दी ।
प्रभूदयाल सुनील के साथ सीढियां चढता हुआ दूसरी मंजिल पर पहुंचा । उसने एक द्वार खटखटा दिया ।
कोई उत्तर नहीं मिला ।
प्रभूदयाल ने फिर द्वार खटखटाया ।
कई क्षण प्रतीक्षा करने के बाद भीतर बत्ती जली और फिर एंजिला का नींद भरा स्वर सुनाई दिया - “कौन है ?”
“पुलिस !” - प्रभूदयाल ने उत्तर दिया ।
द्वार खुल गया । एंजिला ने बाहर झांका ।
“इन्स्पेक्टर साहब, आप ?” - एंजिला आश्चर्य से बोली ।
उसी समय उसकी दृष्टि सुनील पर पड़ी ।
“तो यह बात है ।” - वह बोली - “आप पुलिस को मेरे बारे में बताए बिना माने नहीं, मिस्टर सुनील !”
“आप मुझे गलत मत समझिए ।” - सुनील धीरे से बोला - “मैंने जो किया है आपके हित के लिए ही किया है । दीवान साहब की मूर्तियां आपने चुराई हैं यह बात, मैं बताता या न बताता, पुलिस से अधिक देर छुपी रहने वाली नहीं थी लेकिन इस बात के अब प्रकट हो जाने से आपका उतना अहित नहीं होगा जितना कि बाद में हो सकता था ।”
“मैं आपका मतलब नहीं समझी ।”
“मिस एंजिला ।” - इस बार प्रभूदयाल बोला - “यह बात खुल चुकी है कि आपने वे मूर्तियां कृष्णलाल के संकेत पर चुराई थीं । अगर आप कृष्णलाल के विरुद्ध हमारी सहायता करना स्वीकार कर लें तो मैं आपसे वादा करता हूं कि मैं आपको सरकारी गवाह बनाकर माफी दिलाने की कोशिश करूंगा ।”
एंजिला कुछ क्षण सोचती रही और फिर बोली - “मुझे क्या करना होगा ?”
“फिलहाल आप हमारे साथ चलिए ।”
“मैं कपड़े बदल आऊं ?”
“बेहतर ।”
सुनील और प्रभूदयाल सीढियों में खड़े प्रतीक्षा करते रहे ।
लगभग दस मिनट बाद एंजिला बाहर आ गई । उसने द्वार को बाहर से ताला लगा दिया ।
“आप अकेली रहती हैं ?” - सीढियां उतरते हुए सुनील ने पूछा ।
“नहीं, मेरी मां साथ रहती है । वह नींद की गोली खाकर सोती है । मैंने द्वार बन्द करने के लिए उसे जगाना उचित नहीं समझा इसलिए बाहर से ताला लगाकर आई हूं ।”
सुनील चुप हो गया ।
वे लोग जीप में आ बैठे । ड्राइवर ने जीप कृष्णलाल की कोठी के सामने लाकर खड़ी कर दी ।
प्रभूदयाल दयाल उतरा और लोहे का फाटक ठेलकर भीतर घुस गया ।
एंजिला और थानेदार उसके पीछे थे ।
सुनील सबसे पीछे था ।
कम्पाउन्ड में अन्धकार छाया हुआ था ।
प्रभूदयाल ने बरामदे में आकर घन्टी बजा दी ।
सुनील क्षण भर के लिए रास्ते में अटक गया । जब थानेदार और एंजिला उससे पांच-छ: कदम आगे पहुंच गए तो वह एकाएक लड़खड़ाया और बजरी के चौड़े रास्ते पर ढेर हो गया । उसका दायां हाथ उस गमले में पहुंचा जिसमें उसने बुद्ध की मूर्ति छुपाई थी और अगले ही क्षण मूर्ति उसकी जेब में थी ।
“क्या हुआ ?” - प्रभूदयाल ने उसे गिरा देखकर पूछा ।
“कुछ नहीं ।” - सुनील उठकर कपड़े झाड़ता हुआ बोला - “ठोकर लग गई थी ।”
“सम्भल कर चलो, भई । पहले जख्म की ड्रेसिंग से पहले ही दूसरा जख्म तैयार न कर लेना ।”
उसी समय कृष्णलाल ने द्वार खोल दिया ।
“मैं पुलिस इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल हूं ।” - प्रभूदयाल ने कहना आरम्भ किया - “मैं...”
“क्या मुसीबत है ?” - कृष्णलाल झल्लाकर बोला - “आप किसी को चैन से सोने भी नहीं दे सकते क्या ? यह वक्त है किसी शरीफ आदमी के घर का द्वार खटखटाने का ?” - फिर उसकी दृष्टि सुनील पर पड़ी - “मैं पहले ही कह चुका हूं, मैंने इस आदमी को जिन्दगी में कभी नहीं देखा है ।”
“और इनके बारे में क्या ख्याल है ?” - प्रभूदयाल एक ओर हटता हुआ बोला ताकि उसकी नजर एंजिला पर पड़ जाती ।
कृष्णलाल एंजिला पर नजर पड़ते ही क्षण भर के लिए अव्यवस्थित सा हो उठा और धीरे से बोला - “यह एंजिला है ।”
“शुक्र है, किसी को तो पहचाना आपने !” - प्रभूदयाल बोला ।
कृष्णलाल चुप रहा ।
“हमें भीतर आने के लिए नहीं कहेंगे ?” - प्रभूदयाल ने पूछा ।
“तशरीफ लाइये ।” - कृष्णलाल एक ओर हटता हुआ बोला ।
सब लोग ड्राइंगरूम में आकर बैठ गये । सुनील रेडियोग्राम की बगल में बाकी लोगों से हटकर सोफे के कोने में बैठ गया ।
“आप एंजिला को कितने अरसे से जानते हैं ?” - प्रभूदयाल ने बैठ जाने के बाद पूछा ।
“मैं तो एंजिला को बहुत थोड़े अरसे से जानता हूं, इन्स्पेक्टर साहब । मामूली सी जान पहचान ही समझिये ।”
“और उसी मामूली सी जान पहचान के बदले में आपने इन्हें पांच हजार रुपये का चैक दे दिया !” - सुनील ने पूछा ।
“यू कीप क्वाइट ।” - कृष्णलाल नाराज होकर बोला - “तुम्हें मुझसे सवाल करने का क्या हक है ?”
सुनील फिर नहीं बोला । वह तो केवल प्रभूदयाल को एक आइडिया देना चाहता था ।
“ये ही सवाल मैं आपसे पूछना चाहता हूं ।” - प्रभूदयाल बोला ।
“कौन कहता है मैंने इसे पांच हजार रुपए दिए हैं ?”
“एंजिला कहती है ।” - प्रभूदयाल अन्धेरे में तीर छोड़ता हुआ बोला ।
कृष्णलाल ने कठोर नजरों से एंजिला की ओर देखा ।
एंजिला ने दृष्टि झुका ली ।
“मैं उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हूं ।” - प्रभूदयाल बोला ।
“हां, मेरा ख्याल है मैंने इस लड़की को पांच हजार रुपये दिये थे । लेकिन किसी को रुपया देना अपराध है क्या ?”
“आपने यह रुपया एंजिला को कब दिया था ?”
“लगभग एक महीना पहले ।”
“रुपया देने से पहले आप इन्हें कितने अरसे से जानते थे ?”
“यही कोई पन्द्रह-बीस दिन से ।”
“और उसी पन्द्रह-बीस दिन की जानकारी के दम पर आपने इन्हें पांच हजार रुपए दे दिए ?”
कृष्णलाल चुप रहा ।
सुनील ने देखा उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं था ।
उसने धीरे से रेडियोग्राम का रिकार्ड रखने वाला दराज खोला और जेब में से बुद्ध की मूर्ति निकाल कर उसमें रख दी । उसने चुपचाप दराज बन्द कर दिया ।
“आपने किस खुशी में एंजिला को इतना रुपया दे दिया था ?”
“मुझे इससे कुछ आशायें थीं ।” - कृष्णलाल धीरे से बोला ।
“कैसी आशायें ?”
“जैसी एक मर्द को एक औरत से होती हैं ।”
एंजिला ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन प्रभूदयाल ने उसे हाथ उठाकर रोक दिया ।
“मिस्टर कृष्णलाल” - वह बोला - “आप इनके बाप की उम्र के हैं ?”
“तो फिर क्या हुआ ? इन्सान तो हूं मैं । मैंने इसे चलती फिरती पार्टी गर्ल समझा था । इसे हासिल करने के बदले में मुझे पांच हजार रुपये खले नहीं ।”
“आापको हासिल हुआ कुछ ?”
“क्यों नहीं । मुझे अपने रुपए का हक मिल गया और फिर...”
“शटअप, यू सन आफ ए बिच ।” - एकाएक एंजिला चिल्ला पड़ी - “शर्म नहीं आती तुम्हें ऐसी बकवास करते हुए ! अपने कुकर्मों पर परदा डालने के लिए तुम मेरी इज्जत पर कीचड़ उछाल रहे हो ! अगर मुझे अपने को बेचकर ही पैसा प्राप्त करना था तो क्या तुम ही एक आदमी बच गए थे राजनगर में । तुम... तुम... बूढे चूहे... तुम कहते हो कि तुमने मेरे बदले में पांच हजार रुपये दिये । झूठ । तुमने पांच हजार रुपये मुझे बुद्ध की पहली मूर्ति के बदले में दिए । और जब तक मैंने वह मूर्ति लाकर सौंप नहीं दी तुमने मुझे एक धेला नहीं दिया । और अब तुम अपनी गरदन बचाने के लिए मेरी इज्जत पर कीचड़ उछाल रहे हो ।”
“यह लड़की बिल्कुल झूठ बोल रही है ।” - कृष्णलाल जोर से बोला - “मैं किसी बुद्ध की मूर्ति के विषय में नहीं जानता ।”
“अगर हम यहां की तलाशी लेना चाहे तो तुम्हें कोई ऐतराज ?” - प्रभूदयाल ने पूछा ।
“किसलिए ?”
“बुद्ध की मूर्ति तलाश करने के लिए ।”
“लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूं यहां कोई बुद्ध की मूर्ति नहीं है ।”
“आपको तलाशी देने में कोई आपत्ति है ?”
“आपके पास सर्च वारन्ट है ?”
“सर्च वारन्ट तो नहीं है हमारे पास लेकिन यदि आप सहयोग नहीं देंगे तो मैं अधिक से अधिक एक घन्टे में सर्च वारन्ट हासिल कर लूंगा । लेकिन आपको एक क्षण के लिए भी नजरों से ओझल नहीं होने दूंगा ताकि आप कोई गड़बड़ न कर सकें । अगर आपने सर्च वारन्ट के लिए इसरार किया तो आपको पुलिस से किसी प्रकार की हमदर्दी की आशा छोड़ देनी होगी । उस सूरत में हम आपको अपराधी समझकर तलाशी लेंगे । आप सर्च वारन्ट की मांग करके यह जाहिर करते हैं कि आप तलाशी से डरते हैं कि कहीं कोई नाजायज चीज सामने न आ जाये । तलाशी तो हम लेंगे ही । आप सिर्फ इतना सोच लीजिए कि आप सर्च वारन्ट चाहेंगे या मित्रतापूर्ण ढंग से बिना सर्च वारन्ट के ही हमें तलाशी ले लेने देंगे ।”
“कीजिए, साहब, जो जी में आए कीजिए ।” - कृष्णलाल बोला ।
“सोहनसिंह ।” - प्रभूदयाल थानेदार से बोला - “मैं यहां देखता हूं । तुम बगल वाला कमरा देख लो । सरसरी तौर पर मेज के दराजों और अलमारियों वगैरह में नजर डाल लो ।”
“ओके ।” - थानेदार बोला ।
प्रभूदयाल ने ड्राइंगरूम में नजर फिरानी शुरू कर दी । एक दीवार में एक बड़ी-सी अलमारी थी जिसके शीशों में से भीतर किताबें रखी दिखाई दे रही थीं । इसके अतिरिक्त कोई अलमारी या दराजों वाली मेज कमरे में नहीं थी ।
“इनमें क्या है ?” - प्रभूदयाल रेडियोग्राम में बनी दो दराजों की ओर संकेत करता हुआ बोला ।
“रिकार्ड हैं । देख लीजिए ।” - कृष्णलाल ने उत्तर दिया ।
प्रभूदयाल ने दराज को बाहर खींच लिया ।
प्रभूदयाल और कृष्णलाल की नजर एक साथ बुद्ध की मूर्ति पर पड़ी ।
“यह... यह... यह ।” - कृष्णलाल एकदम मूर्ति की ओर झपटा ।
“पीछे हटो ।” - प्रभूदयाल गर्जा और उसने बुद्ध की मूर्ति उठा ली ।
“तुम तो कह रहे थे कि तुम किसी बुद्ध की मूर्ति के विषय में नहीं जानते !” - प्रभूदयाल उसे घूरता हुआ बोला ।
“यह धोखा है ।” - वह घबराए स्वर में चिल्लाया - “यह जाल है । मुझे फंसाया गया है ।”
“यह सब कुछ अदालत में बताना ।” - प्रभूदयाल बोला - “फिलहाल तुम पुलिस स्टेशन चल रहे हो । मैं तुम्हें चोरी का माल रखने के जुर्म में गिरफ्तार करता हूं ।”
कृष्णलाल के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं ।
“सोहनसिंह ।” - प्रभूदयाल थानेदार को आवाज देता हुआ बोला - “वापिस आ जाओ । मैं साहब को थाने ले जा रहा हूं । तुम यही रहो । मैं सर्च वारन्ट और कुछ और आदमी यहां भिजवाये देता हूं । अच्छी तरह से तलाशी लेना । मुझे यहां से चोरी की बहुत-सी चीजें मिलने की उम्मीद है ।”
थानेदार के अतिरिक्त सब बाहर निकल गये ।
बाहर आकर वे लोग जीप में फिर बैठ गए ।
“तुम्हें कहां छोड़ दूं ?” - प्रभूदयाल ने सुनील से पूछा ।
“मुझे साथ पुलिस स्टेशन नहीं ले चलोगे ?” - सुनील बोला ।
“नहीं ।”
“क्यों ?”
“मैं कृष्णलाल से तुम्हारी मौजूदगी में बात करना पसन्द नहीं करूंगा । पुलिस का मुजरिम से बात करने का अपना तरीका होता है जो आम लोगों में इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता । आमतौर पर हमारे उस तरीके को लोग पुलिस की धांधली की संज्ञा देते हैं । मैं नहीं चाहता कि पुलिस स्टेशन की चारदीवारी में होने वाली कुछ अप्रिय घटनायें अखबार वालों तक पहुंचें । और फिर मैं एंजिला से भी कुछ और बातें पूछना चाहता हूं ।”
“और हमारे समझौते का क्या हुआ ?”
“समझौता अपनी जगह कायम है लेकिन मैं सुबह तक उस विषय में कोई बात नहीं करना चाहता । वैसे मैं एक बात तुम्हें बता देना चाहता हूं । अगर कल तुमने हत्यारा कौन है, इस विषय में कोई बहुत ही युक्तिसंगत तर्क पेश न किया तो मैं नीला के नाम गिरफ्तारी वारन्ट इशू करवाने वाला हूं ।”
“तुम यह निश्चित जानो, प्रभू, नीला हत्यारी नहीं है ।”
“देखेंगे ।” - प्रभूदयाल लापरवाही से बोला - “तुम्हें कहां उतारें ?”
“मेहता रोड पर । यूथ क्लब के सामने ।”
***
जिस समय सुनील यूथ क्लब के भीतर घुसा, उस समय दो बज चुके थे ।
रमाकांत सो चुका था । सुनील ने उसे झिंझोड़ कर जगाया ।
“यूथ क्लब में आग लग गई है क्या ?” - रमाकांत जम्हाई लेता हुआ उठ बैठा और आंखें मलता हुआ बोला ।
“यह क्या सवाल हुआ ?” - सुनील हैरान होकर बोला ।
“जगा तो तुम मुझे यूं ही रहे हो जैसे मैं अगर एक मिनट में क्लब से बाहर न निकल गया तो यह इमारत मेरे सर पर आ गिरेगी ।”
“अब बकवास बन्द भी करोगे या नहीं ?”
“करता हूं । पहले एक बात और बताओ ?”
“क्या ?”
“तुम पुनर्जन्म में विश्वास करते हो ?”
“इससे क्या फर्क पउ़ता है ?”
“अगर विश्वास करते हो तो यकीन जानो पिछले जन्म में तुम जरूर उल्लू थे । इसीलिए तुम्हें अपने सारे काम रात को करने याद आते हैं । आखिर और लोगों की तरह तुम भी दिन में काम और रात में आराम क्यों नहीं करते ?”
“अब अपना ही राग अलापे जाओगे या मेरी भी कुछ सुनोगे ?”
“सुनाओ !”
“तुम्हें मैंने जो काम कहा था, वह हुआ ?”
“अभी कहां, भई ! तुम्हारे फोटोग्राफर ने तो बताया नहीं कि उसने अपनी बैसाखियां कहां से बनवाई हैं । मैंने चार आदमी लगा रखे हैं । वे इस धन्धे के हर आदमी को चैक कर रहे हैं । कल तक कुछ पता लगने की सम्भावना है । और कुछ ?”
“और यह कि मुझे तुम्हारी कार चाहिये ।”
“तुम्हारी मोटर साइकल कहां गई ?”
“फिर बताऊंगा । यह बड़ी लम्बी कहानी है ।”
“मर्जी तुम्हारी । चाबियां मेज के दराज में रखी हैं और गाड़ी कम्पाउण्ड में खड़ी है । और ?”
“बस ।” - सुनील उठता हुआ बोला ।
‘बस’ सुनते ही रमाकांत फिर बिस्तर में दुबक गया ।
सुनील बाहर निकल गया ।
अगले ही क्षण वह रमाकांत की चमकदार ‘इम्पाला’ में वापिस हर्नबी रोड की ओर उड़ा जा रहा था ।
उसके दिमाग में कृष्णलाल से अपनी पहली मुलाकात की एक-एक डिटेल चलचित्र की तरह घूम गई ।
कृष्णलाल फोन रिसीव करने का बहाना करके भीतर के कमरे में चला गया था लेकिन सुनील ने टेलीफोन बजने की घन्टी की आवाज नहीं सुनी थी । इससे साफ जाहिर होता था कि कृष्णलाल ने उस समय फोन रिसीव नहीं किया था बल्कि अपने गुण्डों को फोन किया था कि वे उसकी कोठी से बाहर निकलते ही सुनील को धर लें । सुनील उस घटना के पांच मिनट बाद ही बाहर निकल आया था और बाहर निकलने के फौरन बाद ही गुण्डों की स्टेशन वैगन उसके पीछे लग गई थी जिसका सीधा अर्थ यह था कि वे गुण्डे कृष्णलाल की कोठी के आसपास ही कहीं रहते थे ।
हर्नबी रोड पर पहुंचकर सुनील ने कार कृष्णलाल की कोठी वाले ब्लाक में मोड़ दी ।
छत्तीस नम्बर के सामने से गुजरते समय उसने देखा, पुलिस की कार कोठी के कम्पाउण्ड में खड़ी थी और ड्राइंगरूम की बत्ती जल रही थी । शायद पुलिस वाले अभी गए नहीं थे ।
सुनील उसी प्रकार बाकी सड़कों में भी गाड़ी घुमाता रहा । कहीं वही स्टेशन वैगन दिखाई दे जाने की बहुत अधिक सम्भावना नहीं थी क्योंकि गाड़ी गैरेज में भी बन्द हो सकती थी ।
लेकिन शायद सुनील के नक्षत्र अच्छे थे । कृष्णलाल वाले ब्लाक से चार ब्लाक पीछे एक मकान के सामने वही स्टेशन वैगन खड़ी थी ।
सुनील ने उसकी बगल में अपनी गाड़ी रोक दी और बाहर निकल आया ।
उसने एक भरपूर दृष्टि उस मकान पर डाली जिसके सामने स्टेशन वैगन खड़ी थी । वह एक पुराने ढंग का मकान था जो हर्नबी रोड की आलीशान कोठियों के मुकाबले में खंडहर-सा लग रहा था ।
सुनील ने अपने हाथ पर रूमाल लपेटा और फिर स्टेशन वैगन के द्वार का हैंडल पकड़ कर घुमाया । द्वार का ताला नहीं लगा हुआ था, वह खुल गया ।
सुनील ने स्टेशन वैगन की पिछली और अगली सीटों पर झांक कर देखा । कहीं कुछ दिखाई नहीं दिया । फिर उसने अपने रूमाल से ढके हाथ से डैश बोर्ड पर बने एक छोटे से कम्पार्टमेंट का द्वार खींच लिया ।
फिर व्हिस्की की दो-तिहाई भरी बोतल रखी थी ।
सुनील ने बड़ी सावधानी से, ताकि उसकी उंगलियों के निशान बोतल पर न रह जायें और बोतल पर पहले से मौजूद उंगलियों के निशान नष्ट न हो जायें, बोतल को ढक्कन से पकड़कर उठा लिया ।
उसने बोतल को सावधानी से रूमाल में लपेटा और वापिस कार में आकर बैठ गया ।
उसने कार बैंक स्ट्रीट स्थित अपने फ्लैट की ओर चलानी आरम्भ कर दी ।
अपने फ्लैट के सामने आकर उसने कार रोकी । वह बोतल को सावधानी से अपने हाथ में थामे बाहर निकल आया ।
अपने फ्लैट में पहुंच कर उसने बोतल को रूमाल में से निकाल कर एक ओर लुढका दिया । उसके बाद उसने हर चीज की दुर्गति करनी शुरू कर दी । उसने वार्डरोब में हैंगरों पर टंगे सारे कपड़े उतार कर फर्श पर उछाल दिए । मेज के दराज निकाल कर उनका सारा सामान इधर-उधर उलट दिया और दराजों को सामने की दीवार पर दे मारा । उसके फर्श पर बिछले कालीन को बेतरतीबी से इकट्ठा करके एक ओर डाल दिया । तकियों को फाड़कर रूई सारे फ्लैट में फैला दी । पलंग पर बिछे बिस्तर को एक ओर पटक दिया और पलंग को उठाकर दीवार से लगा दिया । उसने ‘ब्लास्ट’ की पुरानी फाइलें निकाली कर उनका एक-एक कागज अलग-अलग कर दिया और सारे फ्लैट में फैला दिया ।
आधे घन्टे बाद फ्लैट की ऐसी हालत हो गई थी जैसे वहां हाथियों का झुंड घुस आया हो ।
सुनील ने एक सन्तुष्ट दृष्टि अपने फ्लैट की हालत पर डाली और फिर टेलीफोन का रिसीवर उठा लिया ।
उसने नीला का नम्बर डायल किया ।
लगभग पांच मिनट घन्टी बजते रहने के बाद किसी ने टेलीफोन उठाया ।
“हल्लो ।” - दूसरी ओर से नीला का झुंझलाया स्वर सुनाई दिया - “क्या मुसीबत है ?”
“नीला ।” - सुनील बोला - “मैं सुनील बोल रहा हूं । मैं अभी कुछ ही देर में प्रीमियर बिल्डिंग पहुंच रहा हूं । मुझे स्टूडियो में मिलना ।”
और उसने प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही रिसीवर क्रेडल पर पटक दिया । उसने उस छोटी-सी मेज को लात मारी जिस पर टेलीफोन रखे थे । दोनों टेलीफोन फर्श पर गिर गये ।
सुनील ने फ्लैट को ताला लगाया और इमारत से बाहर निकल आया ।
वह फिर कार में जा बैठा ।
प्रीमियर बिल्डिंग के सामने उसने कार रोक दी ।
वह छटी मंजिल पर स्थित नीला के स्टूडियो में पहुंच गया ।
नीला गाउन पहने सोफे पर बैठी हुई थी ।
“क्या बात थी ?” - नीला बोली । फिर एकदम उसकी नजर सुनील के चेहरे पर पड़ी जहां सिर से बहे खून की पपड़ियां जमी हुई थीं ।
“सुनील !” - वह आश्चर्यभरे स्वर में बोली - “तुम्हारे सिर को क्या हुआ ?”
“कुछ नहीं ।” - सुनील लापरवाही से बोला - “कुछ लोग इसे फुटबाल समझ बैठे थे । जब तक मैं उन्हें उनकी गलती बता पाता तब तक मेरी यह हालत बन चुकी थी ।”
“लेकिन तुम्हें ड्रेसिंग तो करवानी चाहिये थी !”
“देखा जायेगा ।” - वह बोला - “तुम्हारी घड़ी में कितने बजे हैं ?”
“तीन बजकर बाईस मिनट ।” - नीला अपनी कलाई पर बंधी नन्हीं-सी घड़ी पर दृष्टि डालती हुई बोली ।
“गलत ।”
“क्या मतलब ?”
“इस समय सवा दो बजे हैं ।”
“सुनील, मैंने अभी रात को रेडियो से घड़ी मिलाई थी । वाकई तीन बजकर बाईस मिनट हुए हैं ।”
“तुम्हारी घड़ी में जरूर कोई गड़बड़ है । सवा दो बजे हैं ।”
“मेरी घड़ी में कोई गड़बड़ नहीं है । आखिर तुम कहना क्या चाहते हो ?”
“मैं यह कहना चाहता हूं कि मैं सवा दो बजे यहां आया था ।”
“लेकिन तुम तो तीन बज कर...”
“मैं सवा दो बजे यहां आया था । समझी ?”
कुछ क्षण नीला चुप रही । फिर बात उसकी समझ में आ गई ।
“ओके ।” - वह बोली - “तुम सवा दो बजे यहां आए थे ।”
“और तभी से यहां इस स्टूडियो में हूं ।”
“यह भी ठीक लेकिन...”
उसी समय फोन की घन्टी घनघना उठी ।
नीला ने एक बेबस सी नजर फोन पर डाली और फिर उसने रिसीवर उठा लिया ।
“हल्लो !” - वह बोली - “जी हां, नीला बोल रही हूं... फरमाइए इन्स्पेक्टर साहब... क्या यह काम सुबह नहीं हो सकता... आपकी मर्जी । आप आ जाइए । मैं स्टूडियो में बैठी हूं ।... और ? ...और सुनील है । ...जरा होल्ड कीजिए ।”
नीला ने रिसीवर कान से हटा लिया और सुनील से बोली - “इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल बोल रहा है । वह बुद्ध की मूर्ति की शिनाख्त के लिए यहां आना चाहता है । कहता है उसका फौरन मुझसे मिलना बहुत जरूरी है और वह तुमसे बात करना चाहता है ।”
सुनील ने रिसीवर ले लिया और माउथपीस में बोला - “हल्लो, प्रभू ।”
“तुम वहां क्या कर रहे हो ?”
“झक मार रहा हूं ।”
“खैर, जो कुछ भी कर रहे हो तुम; सुनील, मैं तुमसे बहुत जरूरी बातें करना चाहता हूं । मैं वहां आ रहा हूं । मेरे पहुंचने से पहले खिसक मत जाना । मुझे लग रहा है, इस बार यारी दिखाकर घिस दिया तुमने मुझे ।”
दूसरी ओर से कनेक्शन कट गया ।
सुनील ने रिसीवर रख दिया ।
“प्रभूदयाल आ रहा है ।” - सुनील बोला - “बुद्ध की मूर्ति की शिनाख्त के अतिरिक्त तुम यह चेष्टा करना कि तुम उसके बाकी सवालों को टाल सको । और यह जरूर याद रखना कि मैं सवा दो बजे से यहां हूं वर्ना गड़बड़ जो जाएगी ।”
“ओके ।”
***
“सुनील ।” - प्रभूदयाल आते ही बोला - “तुमने मुझे भारी बखेड़े में फंसा दिया है ।”
“क्या हो गया ?”
“कृष्णलाल तूफान खड़ा कर रहा है । वह कहता है कि बुद्ध की मूर्ति तुमने सबकी नजरों से बचाकर रिकार्डों वाले दराज में रखी थी । सारी बातें दोबारा सोचने पर मुझे याद आ गया है कि तुम रेडियोग्राम के पास सोफे के कोने में बैठे हुए थे । और जहां तक मुझे ख्याल है मैंने दराज बन्द होने की आवाज भी सुनी थी । तुम उसकी कोठी के बाहर कम्पाउन्ड में एक बार लड़खड़ाकर गिरे थे । मुझे शक है कि वह हरकत तुमने जानबूझकर की थी । तुमने जरूर वहीं कहीं मूर्ति छुपाई थी और उसको उठाने के लिए ही तुमने वह कलाबाजी खाई थी । कृष्णलाल अभी भी हिरासत में है लेकिन उसने अपने वकील को फोन कर दिया है । अब वह हम पर फाल्स अरैस्ट और फ्रेम अप का मुकदमा दायर करने की धमकी दे रहा है । उस हरामजादे की मिनिस्टरी तक से जानकारी है । वह तो मेरा हुलिया बिगाड़कर रख देगा और यह सब बखेड़ा तुम्हारे कारण हुआ है ।”
“तो क्या तुम भी यह समझते हो कि उस मूर्ति के मामले में मैंने कृष्णलाल को फंसाया है ?”
“मैं क्या समझता हूं और क्या नहीं समझता, इसे गोली मारो । मैं सन्तुष्ट होना चाहता हूं कि तुमने मुझे कोई घिस्सा नहीं दिया है ।”
“तुम्हारी सन्तुष्टि कैसे होगी ?”
“तुमने खुद कहा था कि तुमने एक बुद्ध की मूर्ति तलाश कर ली है और एंजिला ने भी इस बात का पुष्टि की है । तुमने कहा था वह मूर्ति तुम्हारे फ्लैट पर है ।”
“मैं अब भी यह कहता हूं ।”
“वह अभी भी तुम्हारे फ्लैट पर है ?” - प्रभूदयाल ने पूछा ।
“बिल्कुल ।”
“तो तुम अभी मेरे साथ अपने फ्लैट पर चल रहे हो । अगर तुमने मुझे वह मूर्ति दिखा दी तो मैं उस कृष्णलाल के बच्चे से निपट लूंगा । लेकिन अगर फ्लैट में मूर्ति न निकली तो तुम्हारी खैर नहीं । कृष्णलाल तुम पर मानहानि का दावा करेगा और मैं तुम्हें जेल की चारदीवारी की सैर कराऊंगा ।”
“तुम उस चोर के बहकावे में आकर मुझे पर शक कर रहे हो ?”
“चोर कौन है, इस बात का फैसला तुम्हारे फ्लैट पर पहुंचने के बाद ही होगा ।”
“ओके । मुझे चलने में कोई एतराज नहीं है ।”
“और आप” - वह नीला को जेब से बुद्ध की मूर्ति निकालकर दिखाता हुआ बोला - “यह मूर्ति देखिए । क्या यह दीवान साहब की चोरी गई बुद्ध की मूर्ति है ?”
“जी हां ।” - नीला मूर्ति को कई क्षण देखकर बोली ।
“कौन-सी ? वह जो एक महीने पहले चोरी गई थी या वह जो दीवान साहब की हत्या के एक दिन पहले चोरी गई थी ।”
“यह कैसे बताया जा सकता है ?”
“क्यों ?”
“दोनों मूर्तियां हूबहू एक जैसी हैं ।”
प्रभूदयाल मूर्ति जेब में रखकर सुनील से बोला - “मैं फिर आऊंगा ।”
प्रभूदयाल नीचे आकर पुलिस जीप की ओर बढा ।
“मैं भी गाड़ी लाया हूं ।” - सुनील इम्पाला की ओर संकेत करता हुआ बोला ।
“तुम जीप साहब की गाड़ी के पीछे चलाना ।” - प्रभूदयाल ड्राइवर से बोला - “मैं साहब के साथ चलता हूं ।”
प्रभूदयाल सुनील के साथ इम्पाला में बैठ गया ।
सुनील ने गाड़ी बैंक स्ट्रीट में अपने फ्लैट के सामने खड़ी कर दी । उसी समय जीप भी इम्पाला के पीछे-पीछे आ खड़ी हुई ।
एक सिपाही जीप में से उतरकर प्रभूदयाल के साथ हो लिया ।
सुनील उन्हें अपने फ्लैट के सामने ले आया । उसने द्वार का ताला खोला और उसे धकेलकर एक ओर खड़ा हो गया ।
“तशरीफ लाइए ।” - वह प्रभूदयाल से बोला और उसने बत्ती जला दी ।
प्रभूदयाल सिपाही के साथ भीतर घुसा । एकएक वह ठिठककर खड़ा हो गया ।
“अरे !” - उसके मुंह से निकल पड़ा ।
“क्या हुआ ?” - सुनील अनजान बनता हुआ बोला ।
“लगता है किसी ने तुम्हारे फ्लैट की बुरी तरह तलाशी ली है ।”
“ओह !” - उसने भीतर झांका और फिर बोला - “ओह !”
फिर उसने बढकर एक अलमारी खोली उसके भीतर झांककर निराश स्वर में बोला - “गई ।”
“क्या ?”
“बुद्ध की मूर्ति ।”
प्रभूदयाल ने संदिग्ध नजरों से उसकी ओर देखा और बोला - “फिर घिस्सा देने की कोशिश तो नहीं कर रहे हो ?”
“इसमें तुम्हें घिस्सा दिखाई दे रहा है ?” - सुनील क्रोधित स्वर में बोला - “अन्धे को भी दिखाई दे सकता है कि कोई मेरी अनुपस्थिति में फ्लैट में घुसा और मूर्ति लेकर चलता बना ।”
“खैर ।” - प्रभूदयाल बोला - “तुम इधर-उधर हाथ मत लगाना, मैं फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट को फोन कर रहा हूं ।”
लगभग आधे घन्टे बाद फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट वहां आ गया ।
“वह मेरी नहीं है ।” - सुनील कोने में लुढकी पड़ी विस्की की बोतल की ओर संकेत करता हुआ बोला ।
“क्या तुम्हारा नहीं है ?” - प्रभूदयाल ने पूछा ।
“वह बोतल ।”
प्रभूदयाल एक्सपर्ट से बोला - “इस बोतल पर उंगलियों के निशान देखो ।”
एक्सपर्ट ने एक सफेद-सा पाउडर बोतल पर डाला और फिर उसे एक मुलायम ब्रुश से झाड़ दिया । बोतल पर उंगलियों के निशान उभर आए ।
“इनमें देखो, सुनील की उंगलियों के निशान हैं ?” - प्रभूदयाल ने पूछा ।
एक्सपर्ट ने एक गिलास पर सुनील की उंगलियों के निशान लिए । कई क्षण वह उन्हें बोतल के निशानों से मिलाता रहा फिर बोला - “नहीं हैं ।”
सुनील बोला - “मेरा ख्याल है, कि यह चोरी भी उन्हीं गुण्डों ने की है जिन्होंने मुझे पीटर मेरी मोटर साइकल छीनी थी ।”
“मैं बोतल पर मिली उंगलियों के निशान हैडक्वार्टर में रखे पेशेवर मुजरिमों की उंगलियों के रिकार्ड से मिलाकर देखना चाहता हूं ।” - प्रभूदयाल फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट से बोला - “तुम यह बोतल हैडक्वार्टर ले जाकर इस पर बने निशान रिकार्ड से मिलाकर देखो । रिपोर्ट मुझे फोन पर कर देना ।”
एक्सपर्ट बोतल लेकर चला गया ।
प्रभूदयाल एक कुर्सी पर ढेर हो गया और ऊंघने लगा ।
एक घन्टे बाद फोन की घन्टी जी । प्रभूदयाल कुछ क्षण फोन सुनता रहा और फिर उसे वापस रखकर उठ खड़ा हुआ ।
“सुनील ।” - वह बोला - “उस बोतल पर दो ऐसे चोरों की उंगलियों के निशान मिले हैं जो कई बार जेल की सैर कर चुके हैं । दोनों हर्नबी रोड पर चार सौ एक नम्बर में रहते हैं जो कृष्णलाल के मकान के आस-पास ही कहीं है । कृष्णलाल और उनमें सम्बन्ध निकल आने की काफी सम्भावना है । तुम मेरे साथ पुलिस स्टेशन चलो और चोरी की रिपोर्ट लिखा दो । उसके दम पर मैं उन लोगों के खिलाफ वारन्ट जारी करवा लूंगा ।”
“जैसा तुम चाहो ।” - सुनील उठता हुआ बोला ।
***
कोई साढे पांच बजे पुलिस के सिपाहियों से भरी हुई जीप चार सौ एक हर्नबी रोड पहुंची । सुनील ने देखा, स्टेशन वैगन अभी भी मकान के सामने खड़ी थी ।
प्रभूदयाल ने दो सिपाही मकान के पिछवाड़े भेजे और बाकी को साथ ले वह मुख्य द्वार को भड़भड़ाने लगा ।
“कौन है ?” - भीतर से आवाज आई ।
“पुलिस ।” - प्रभूदयाल बोला ।
“किसलिए ?”
“द्वार खोलो । हमारे पास तलाशी का वारन्ट है ।”
“लेकिन हमने किया क्या है ?” - भीतर से कोई बोला ।
“द्वार खोलो” - प्रभूदयाल चिल्लाया - “नहीं तो हम इसे तोड़ देंगे ।”
द्वार खुल गया । सामने पाजामा और बनियान पहने एक आदमी खड़ा था ।
“क्या बात है ?” - वह बोला ।
“सुनील ।” - प्रभूदयाल पाजामे वाले के चेहरे पर टार्च की रोशनी डालता हुआ बोला - “इसे देखा है पहले कभी ?”
“हां ।” - सुनील बोला - “यह उन तीनों में से एक है जिन्होंने मुझे पीटा था ।”
“यह साला झूठ बोल रहा है ।” - पाजामे वाला चिल्लाया ।
“बकवास मत करो ।” - प्रभूदयाल बोला - “भीतर और कौन है ?”
“कोई नहीं ।” - उत्तर मिला ।
उसी समय मकान के पिछवाड़े गये सिपाही दो आदमियों को गर्दन से पकड़े हुए आते दिखाई दिए ।
“इन्स्पेक्टर साहब” - समीप आकर एक सिपाही बोला - “ये पिछवाड़े से भागने की कोशिश कर रहे थे ।”
“इन्हें पहचानते हो, सुनील ?” - प्रभूदयाल ने पूछा ।
“बाकी के दो ये हैं ।” - सुनील ने उत्तर दिया ।
“साहब ।” - दूसरा सिपाही बोला - “इसकी कोट की जेब में से यह मूर्ति निकली है ।”
और उसने बुद्ध की मूर्ति इन्स्पेक्टर के सामने रख दी ।
पाजामे वाले ने मुड़कर एकदम भागने की कोशिश की ।
“खबरदार ।” - प्रभूदयाल चिल्लाया - “हिले भी तो गोली मार दूंगा । सबके हाथों में हथकड़ियां भर दो ।”
***
सुबह नौ बजे सुनील पुलिस स्टेशन पहुंचा । प्रभूदयाल उसे फौरन ही मिल गया ।
“तुम्हारी खातिर मैंने सारे प्रेस रिपोर्टरों को भगा दिया है ।” - वह बोला ।
“बड़ी मेहरबानी की मुझ पर ।” - सुनील बोला ।
“उन तीनों चोरों ने” - प्रभूदयाल ने बताया - “स्वीकार किया है कि वे कृष्णलाल के लिए काम करते थे । कृष्णलाल के घर की तलाशी में चोरी का बहुत सारा कीमती माल मिला है । कृष्णलाल अब धमकियां देने और हम पर बरसने के स्थान पर अपने बचाव के साधन सोच रहा है । एंजिला को सरकारी गवाह बनाना स्वीकार कर लिया गया है । हालांकि मुझे अब भी शक है कि मूर्तियों के मामले में तुमने कोई हेर-फेर की है लेकिन फिर भी मैंने अपना वादा पूरा किया है । अब अगर दीवान साहब की हत्या के मामले में तुम्हें कोई ऐसी बात मालूम है जो तफ्तीश के दौरान पुलिस की नजर में नहीं आ पाई तो तुम्हें चाहिए कि तुम उसे अपने तक ही सीमित न रखो ।”
“तुम्हारा अब भी यही ख्याल है कि हत्या नीला ने की है ?” - सुनील ने गम्भीर स्वर से पूछा ।
“शत प्रतिशत ।” - प्रभूदयाल बोला - “हर बात इसी ओर संकेत करती है । मैडिकल रिपोर्ट कहती है कि दीवान साहब की हत्या चार और छ: बजे के बीच हुई थी । उस समय नीला स्टूडियो में थी । अलमारी में गड़े तीर के ऐंगल से स्पष्ट है कि ब्लो गन स्टूडियो के बाथरूम की खिड़की में से चलाई गई थी । चार और छ: बजे के बीच में ब्लो गन नीला के कमरे में मौजूद थी और एक बात एंजिला ने अब बताई है कि उसने नीला को बाथरूम की खिड़की में से दीवान साहब की खिड़की की ओर ब्लो गन का निशाना साधते देखा था । क्या इतने सारे सबूत नीला को फांसी के तख्ते तक ले जाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं ?”
“नहीं हैं ।”
“क्यों ? क्या खराबी है इनमें ?”
“तुम यह कैसे दावा कर सकते हो कि ब्लो गन नीला के स्टूडियो में से चलाई गई थी ?”
“अलमारी में गड़े तीर का ऐंगल यही प्रकट करता है ।”
“तीर तो अलमारी में काफी गहरा धंसा हुआ मिला था न ?”
“हां, तीन इंच के तीर का लगभग आधा भाग लकड़ी में धंस गया था ।”
“फिर भी तुम यह दावा करते हो कि नीला ने वह तीर अपने स्टूडियो में से पच्चीस फूट दूर दीवान साहब के कमरे की ओर फूंककर फेंका था ।”
“क्या मतलब ?”
“क्या नीला के फेफड़ों में इतना दम है कि वह ब्लो गन में इतनी जोर से फूंक मार सके कि तीर पच्चीस फुट दूर सख्त लकड़ी में डेढ इंच घुस जाये ? इन्स्पेक्टर साहब, आप अच्छे-खासे मजबूत आदमी हैं । आप पच्चीस फुट तो क्या पांच फुट दूर खड़े होकर अपनी पूरी शक्ति से ब्लो गन को फूंकें तो भी आप तीर को लकड़ी में एक इंच गहरा भी नहीं धंसा पायेंगे ।”
“तुम कहना क्या चाहते हो ?” - प्रभूदयाल सोचता हुआ बोला ।
“मैं कहना चाहता हूं कि तीर ब्लो गन में रखकर चलाए ही नहीं गए हैं, क्योंकि पौने पांच बजे तक ब्लो गन मेरे पास थी और उसके बाद वह नीला के स्टूडियो में रखी गई थी और वहां से कम से कम किसी इन्सान के फेफड़े तो इतनी जोर से ब्लो गन में फूंक मार नहीं सकते कि तीर पच्चीस फुट दूर लकड़ी में डेढ इंच धंस जाता । दिक्कत यह है कि तुममें सब्र नहीं है । तुमने तीर देखे और फिर स्टूडियो में ब्लो गन देखी और कूद कर इस नतीजे पर पहुंच गये कि तीर ब्लो गन में से निकला था ।”
प्रभूदयाल बेसब्री से बोला - “फिर तीर कैसे चलाया गया था ।”
“मेरा ख्याल है कि किसी ने दस-ग्यारह इन्च की एक ऐसी नलकी में, जिसमें ब्लो गन का तीर फिट हो जाए, एक तगड़ा स्प्रिंग लगाकर उस नलकी में पिस्तौल के ट्रीगर जैसा खटका लगाया होगा और नलकी में दबाव वाली हवा भर दी होगी । फिर वह दीवान साहब के कमरे में उनके सामने पहुंचा होगा और उसने नलकी का खटका दबा दिया होगा । दबाव वाली हवा के प्रभाव से तीर गोली की तरह निकलकर दीवान साहब के शरीर में घुस गया होगा । दीवान साहब के मरने के बाद उस आदमी ने उस नलकी में एक और तीर फिट किया होगा और उसको उसने इस ढंग से अलमारी की लकड़ी पर छोड़ा होगा कि धंस जाने के बाद उसके ऐंगल से यह लगे कि वह नीला के स्टूडियो की ओर से आया था । तुम्हारी एक और गलती यह थी कि तुम यह समझते थे कि अलमारी में धंसा तीर पहले चलाया गया था और दीवान साहब के शरीर में धंसा मिला तीर बाद में । तुम यह कहना चाहते थे कि किसी ने स्टूडियो में से अपने कमरे की खिड़की में खड़े दीवान साहब पर तीर फूंका लेकिन निशाना खाली गया और तीर अलमारी में जा धंसा । फिर हत्यारे ने दूसरा तीर फूंका और वह दीवान साहब की छाती में धंस गया । प्रभूदयाल, जरा सोचो, अगर दीवान साहब की जगह तुम खिड़की में खड़े होते और किसी ने तुम पर तीर फूंका होता लेकिन वह तुम्हें लगने के स्थान पर पीछे की अलमारी में धंसा होता तो क्या तुम फिर भी खिड़की में ही खड़े रहते ? हकीकतन पहला तीर चलते ही जो पहला काम तुम करते, वह यह होता कि तुम खिड़की के पास से हट जाते ।”
प्रभूदयाल कई क्षण विचार करने के बाद एकदम बोला - “बाई गॉड, तुम ठीक कह रहे हो । लेकिन फिर हत्या किसने की ?”
“तुम क्राइम डिटैक्शन का पहला असूल भूल रहे हो ।” - सुनील बोला - “तुम उस आदमी को चैक करो जिसने दीवान साहब को आखिरी बार जिन्दा देखा था ।”
प्रभूदयाल एकदम अपनी सीट से उठा और द्वार की ओर लपकता हुआ बोला - “सुनील, मैं हत्यारे को पकड़ने जा रहा हूं । बाद में मैं तुम्हें फोन कर दूंगा ।”
***
सुनील शाम को चार बजे सोकर उठा । उसने प्रभूदयाल को फोन किया ।
“क्या हुआ ?” - प्रभूदयाल के लाइन पर आते ही उसने पूछा ।
“हत्यारा पकड़ा गया ।” - प्रभूदयाल बोला - “मैं तुम्हें कई बार फोन कर चुका है लेकिन तुम्हारा नम्बर बिजी मिलता था ।”
“मैं सोना चाहता था, इसलिए लाइन काट रखी थी ।” - सुनील बोला - “हत्यारा कौन था ?”
“वही जिसने आखिरी बार दीवान साहब को जिन्दा देखा था ।”
“रूपसिंह ?”
“हां । उसी ने फोटोग्राफर की बैसाखियां खोखली करवाई थी क्योंकि ब्लो गन चुराने का यही सबसे आसान तरीका था । हत्या के बाद ब्लो गन को वह नीला के स्टूडियो में ही रखना चाहता था ताकि शक उसी पर पड़ता लेकिन तुमने ब्लो गन को तलाश कर और उसे नीला को स्टूडियो में सौंपकर उसका काम और आसान कर दिया था । वह ब्लो गन नीला के स्टूडियो में छुपाने की जहमत से बच गया था । उसने हत्या उसी तरीके से की थी जैसा कि तुमने बताया था । अन्तर केवल इतना था कि उसने दबावदार हवा के स्थान पर दबावदार कार्बन डाई-ऑक्साइड गैस प्रयुक्त की थी । हमने उसके घर की तलाशी ली थी । उस बेवकूफ ने नलकी अभी तक सम्भालकर रखी हुई थी ।”
“उसने दीवान साहब की हत्या करने का कोई कारण बताया है ?” - सुनील ने पूछा ।
“हां ।” - प्रभूदयाल बोला - “उसने दीवान साहब का लगभग अस्सी हजार रुपया गबन किया हुआ था । वह नौकरी छोड़कर खिसक जाने की फिराक में था कि दीवान साहब को उसकी बेईमानी की जानकारी हो गई थी । उन्होंने कहा था कि अगर एक सप्ताह के भीतर उसने रुपया न लौटा दिया तो वे उसे गिरफ्तार करवा देंगे । उस एक सप्ताह में रूपसिंह ने रुपया तो नहीं लौटाया लेकिन दीवान साहब की हत्या करने की एक शानदार स्कीम सोचकर उसे कार्यरूप में परिणत जरूर कर डाला ।”
“आई सी ।”
“सुनील ।” - प्रभूदयाल बोला - “मैं तुम्हारी सहायता के लिए तुम्हारा धन्यवाद करना चाहता हूं । पर अब तो बता दो मूर्तियों के मामले में क्या चालाकी की तुमने ?”
उत्तर में सुनील ने रिसीवर क्रेडल पर पटक दिया ।
रिसीवर क्रेडल पर पर पहुंचने की देर थी की घन्टी फिर बज उठी ।
“यस !” - सुनील ने रिसीवर उठाकर बोला ।
“सुनील ।” - दूसरी ओर रमाकांत था - “हमने उस कारीगर को खोज निकाला है जिसने सुदेश कुमार की बैसाखियां बनाई थीं । और जानते हो कि उसको बैसाखियां किसने खोखली करवाई थीं ?”
“बताओ ।”
“रूपसिंह ने । उसने इस काम के लिए कारीगर को दो सौ रुपए दिए थे ।”
सुनील चुप रहा ।
“प्यारयो ।” - रमाकांत बोला - “तुम चौंके नहीं इस खबर पर ?”
“भाई, बुरी तरह चौंक गया हूं ।” - सुनील बोला - “हैरानी से मेरा दम निकला जा रहा है । तुमने वाकई बड़े मौके पर खबर दी है । थैंक्यू ।”
और सुनील ने रिसीवर रख दिया ।
समाप्त