मेरे सपनों के सौदागर

बादलों की भयानक गड़गड़ाहट उस काली रात से न जाने क्या कह रही थी। बहुत गुस्सा था उस गर्जन में। इस गरज चमक से डरी सहमी मनचली पवन कहीं दुबक गई थी और चाँद भी न जाने किस घूँघट में जा छिपा था। बारिश की बूंदों में तीरों सी गति थी और तीरों सी ही चुभन भी। रह-रहकर बिजली कभी इस पेड़ तो कभी उस पेड़ को अपनी बाँहों में भरकर खो जाती थी। कभी-कभी जब बिजली अपने पूरे जोश में कड़कती थी, तो एक विचित्र से चित्र का बस अनुमान भर लगता था।

एक सुनसान खेत था, जिसकी सीमाएं चारों दिशाओं के अन्तिम छोर पर खड़े कुछ पेड़ों तक फैली हुई थी। कुछ झाड़-झंकार ज़मीन पर यहाँ-वहाँ सिर झुकाए खड़े थे। दूर-दूर तक कोई घर नहीं दिख रहा था। कच्चे रास्तों पर कितने ही छोटे नाले उभर आये थे। मूसलाधार बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदों के ज़मीन पर गिरने के अलावा दूसरी कोई आवाज़ ही नहीं थी।

उस अँधेरी, सहमी और सुनसान रात में लड़खड़ाती, सम्हलती, फिसलती और पूरी तरह से भीगी हुई, यह कहाँ चली जा रही थी मैं? बीच-बीच में पत्थरों के नुकीले काँटे मुझसे यह ख़ामोश सवाल कर रहे थे कि कौन सा अनजाना दुःख है तुझे? क्या मक़सद है, जो यूँ बेसुध, मतवाली सी चली जा रही है? लेकिन क्या सचमुच ही मैं बेसुध बही जा रही थी? नहीं। वो देखो। बहुत दूर कुछ नारंगी सा दमक रहा है। जैसे कोई गेंदे का फूल अपने ही ताप से दहक रहा हो। मुझे वहीं तक जाना था।

बिजली बीच-बीच में उजाला कर राह दिखा देती थी। यह नाले, मुझे बहाकर वहाँ पहुँचा देने की मंशा से, एक दूसरे में जुड़कर बड़े होते जा रहे थे। थके-हारे तन-मन से ही सही मैं आख़िर इस रोशनी तक पहुँच ही गई। यह एक हवन कुंड की रोशनी थी। बहुत पुराना सा एक मन्दिर मेरे सामने था। तीन पथरीली सीढ़ियाँ और पत्थरों से बनी तीन दीवारें। लेकिन कोई दरवाज़ा नहीं था। निचली सीढ़ी से ही दिखाई दे रहे थे मंदिर में बैठे विशाल महाकाल और बीच में भभकता हवन कुंड। मेरे पैरों में सीढ़ियाँ चढ़ने की ताक़त नहीं बची थी, इसलिये भगवान से अपनी इस कमज़ोरी के लिये माफ़ी मांगकर, मैं वहीं सबसे पहली सीढ़ी पर बम बोलका धीमा जयकारा करके निढाल बैठ गई।

अचानक तभी प्यार में सने अल्फ़ाज़ मेरे कानों में ऐसे धीमे से पड़े, जैसे कोई बिल्कुल मेरे पास ही खड़ा हो- दुखी ना हो, यह तुम्हारा हमेशा ख़याल रखेगा। हमेशा।उस स्नेह से भीगी आवाज़ ने बियाबान में मेरे अकेलेपन के घेरे को तोड़ दिया। भला इस बियाबान में स्नेह-दान देने वाला दूसरा पथिक कौन! मैंने चौंक कर देखा कि मेरे आस-पास तो कोई भी नहीं था! फिर यह आवाज़? क्या कोई देवदूत? देवदूत होते हैं?

मेरा अचम्भा फटी आँखें लिये महाकाल को घूर रहा था। तभी मैंने देखा कि मेरे सामने एक जोड़ी हथेलियाँ प्रकट हो गयीं थीं। मेरे दोनों हाथ सामने की उन हथेलियों में सौंप कर वह अनदेखा देवदूत शायद लौट गया था। मैं बुत बनी खड़ी थी। उन हथेलियों ने मेरे हाथों को अपनी कोमल पकड़ में यों थाम रखा था, मानो कह रहीं हों- योगक्षेमं वहाम्यहम्।मैंने ग़ौर से देखने की कोशिश की, क्या सचमुच ही मेरे सामने बस हथेलियाँ ही हैं या एक और यात्री? या एक और देवदूत?

देखा तो, धीरे-धीरे उन हथेलियों की दूसरी तरफ़ से बाँहों का विस्तार शुरू हुआ और वो हथेलियाँ कंधों से लेकर जूतों तक किसी लड़के के डील-डौल में ढल गई! मुझे उस कद काठी और उसके कपड़ों से एक अनुमान सा लगा और मैं सिहर उठी। ऑफ़ वाइट शर्ट! नहीं। यह वो नहीं हो सकता।

वो मुझ पर यूँ प्यार नहीं लुटा सकता! उसे यह हक़ मैंने कभी नहीं दिया। मुझे अपनी बड़ी-से-बड़ी परेशानी में तक उसकी मदद नागवार है। मैं उसे बर्दाश्त ही नहीं कर सकती। मंदिर में उसका इतने प्यार और अधिकार से मेरी ज़िम्मेदारी संभालने चले आना! और वो भी हमेशा के लिए? जैसे मेरी शादी हो रही हो उससे। उफ़्फ़! मैंने घूमकर महाकाल की तरफ़ देखा- भगवन! पलाश? वो कोचिंग वाला लड़का! यह कैसी मदद है?’

मैं हड़बड़ा कर नींद से उठ बैठी। घड़ी सुबह के साढ़े तीन बजा रही थी। कूलर चल रहा था, लेकिन मैं पसीने में तरबतर हाँफ रही थी। जुलाई में इतनी सुबह तो इतनी गरमी नहीं होती! मेरा दिल पलाश नाम की कील पर टंगा दर्द से कराह रहा था। यह कैसे मुमकिनऔर सपने का समय भी तो देखो; ब्रह्म मुहूर्त में! ब्रह्म मुहूर्त में देखे सपने तो सच होते हैं। क्या यह सपना सच हो सकता है? नहीं, यह अनहोनी है। यह सपना सच नहीं हो सकता। कभी नहीं। गहरी नींद से जबरन झकझोर कर उठाया हो जैसे किसी ने मुझे, मेरे सिर में वैसा दर्द हो रहा था और मैं ख़ुद में बड़बड़ा रही थी- मैं उस लड़के को सपने में तक नहीं झेल सकती। कैसा तो है वो? कल सुबह ही तो...

एक गिलास पानी पीकर, मैं बिस्तर के एक कोने में सिकुड़कर बैठी सुबह होने का इंतज़ार करते हुए सोच रही थी- क्या सपनों का सच से सचमुच ही कोई लेना-देना होता है? ओह हाँ! एक बार मैं गणित के एक सवाल में दो दिन से उलझी थी और वो सोल्व ही नहीं हो रहा था। फिर मैंने सपने में देखा कि मुझसे वो सवाल सोल्व हो गया। अगली सुबह वो सचमुच सोल्व हो गया था मुझसे। ओह! तो क्या यह सपना भी सच हो जायेगा?’ एक सिहरन दौड़ रही थी- नहीं भगवान, प्लीज़। उसके साथ तो बिल्कुल ही नहीं।

मेरा नाम करेगा रोशन

मैं बहुत ज़्यादा घबरा गयी थी उस सपने से। घबराने का कारण मेरा यह मानना था कि सपने मात्र सपने नहीं होते, बल्कि यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस की एनकोडेड चिट्ठियाँ होते हैं। उनके कुछ गहरे मायने होते हैं। कुछ मक़सद होता है। इस सोच के बावजूद मैं सपने को ख़ारिज करने के लिये वजहें तलाश रही थी- पलाश से तो मैं दोस्ती तक न करूँ।

प्यार और जीवन भर के लिये हाथ थामना तो बड़ी दूर की बात है।'

क्या मैंने उसे समझने में गलती कर दी? चलो, मान लिया कि वो बुरा नहीं है और मुझसे ही भूल हुई, लेकिन मेरे सपनों और मेरी ज़िंदगी में उसका दख़ल क्यूँ हो?  क्यूँ ज़रूरी है कि मैं उसके बारे में अपनी राय बदलूँ? मैं उससे कभी दोस्ती ही नहीं करूँगी तो बात कैसे आगे बढ़ेगी। यह सपना देर सवेर भूल ही जाऊँगी मैं। मेरे मन में सपनों को लेकर अगले दिन भर अनेक ख़याल तूफ़ान मचाते रहे। किसी से पहली मुलाक़ात बड़ी कड़वी रही हो और वो उसी रात सपने में हमसफ़र की तरह आ जाए, तो हैरानी बिल्कुल जायज़ ही है।

यह अजीबोग़रीब सपना मेरी इस प्रेमकहानी का बड़ा रोचक हिस्सा है। यह सपना जब मैंने देखा था, तब मुझे M.C.A. एंट्रेंस की तैयारी के लिये कोचिंग में जाते हुए महीना भर ही हुआ था। सपने में पलाश की कोमल पकड़ मानो कह रही हो- योगक्षेमं वहाम्यहम्।' मतलब, मैं तुम्हारा हर तरह से ख़याल रखूँगा। जीवन के साथ भी, जीवन के बाद भी।

नहीं, पलाश L.I.C.एजेंट नहीं है। पलाश तो मेरी इस प्रेम कहानी का नायक है। मैं हूँ हर्षा, इस नाज़ुक सी प्रेम कहानी की नायिका। इस सपने ने मुझे ढूँढा था साल 2000 में। तब मैं B.Sc. की पढ़ाई पूरी कर चुकी लखनऊ की नज़ाकत और नफ़ासत से भरपूर उन्नीस साल की एक नवयौवना थी।

अपने बारे में आपको थोड़ा सा और बताती हूँ। मेरे परिवार में हम चार भाई बहन हैं और मैं हूँ सबकी "बड़ी दीदी"। मेरे मम्मी पापा प्रवासी हैं, जो पहाड़ से लखनऊ आये थे और मैं तब उनकी गोद में खेलने वाली दो साल की छोटी बच्ची थी। बहुत लम्बे संघर्ष के बाद, पापा को लखनऊ में मिली नौकरी के सिलसिले में हम पहाड़ से लखनऊ आये थे। पापा ने लखनऊ आकर सरकारी नौकरी के साथ ही ज़मीन की प्लॉटिंग का भी काम शुरू किया, जिससे वो अपना एक घर ख़रीद सकें। शुरुआती दिनों में हमें तो पापा इतवार को ही दिखते थे और वो भी कुछ देर के लिये ही। पापा ने जो चुनौती उठा ली थी, उसमें उन्होंने ख़ुद को पूरी तरह खपा दिया था। मेरे पापा ने मेरे दादा जी से बेहतर आर्थिक स्तर और प्रसिद्धि पाकर, मेरे दादा जी का मान-सम्मान बढ़ा दिया था और अपने सपूत होने का डंका बजा दिया था। इतना ही नहीं, पहाड़ में कई बच्चों को पढ़ाई के लिये आर्थिक मदद दी पापा ने और कई रिश्तेदारों को लखनऊ बुलाकर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिये हर तरह से उनकी मदद की।

यह रिश्तेदार हमारे साथ हमारे ही घर में रहते थे। इस वजह से जहाँ एक तरफ़ हम बच्चों के रिश्तेदारों के साथ आपसी रिश्तों में बहुत स्नेह और आदर था, तो दूसरी तरफ़ उनके ज़रिये हम बच्चों का पढ़ाई-लिखाई में अव्वल होने का सब समाचार नियमित ही पहाड़ पहुँच जाता था। सब कहते थे- 'अफ़सर बनेंगे उनके बच्चे।' तो अब विकास की परम्परा को यहाँ से अगले पायदान पर ले जाने की ज़िम्मेदारी मुझ पर थी। यह ज़िम्मेदारी किस तरह निभाई जाये इसी सोच-विचार में दिन रात गुज़र रहे थे। गर्मियों के चट्टान जैसे दिन थे, जो कूलर की नम और ठण्डी हवा से काटे जाते थे। रातें रेडियो पर कुछ गाने सुनते हुए बीतती थी और शामें... शाम मेरा सबसे पसंदीदा वक़्त हुआ करता था।

दिल की ज़ुबां, रे!

सूरज के ढल जाने के बावजूद हवा में ज़रा भी ठंडक का एहसास नहीं था। और हो भी कैसे? लखनऊ में जून का महीना तो होता ही है छक भर गरमी का। कुछ परिंदों की टोली अपने नीड़ों को लौट रही थी। मैं अपनी छत की रेलिंग पर लदी हुई यह आसमान टकटकी लगाए ताक रही थी। काश! मैं भी पंछी होती, उड़ सकती। कैसी दिखती होगी यह दुनिया इतनी ऊपर से? क्या सोचती होगी चिड़िया?

आसमान में रंगों की बदलती छटा, सुन्दर बादलों का टहलना, पंछियों का उड़ना और फिर मेरी नज़रों का आसमान में निकलने वाले सबसे पहले तारे को ढूँढने के लिये इधर से उधर दौड़ना- वो दिखा, पहला तारा। पहला होना कितना ख़ास होता है ना? पहले तारे के बाद जब और तारे दिखते हैं तो वो बस गिनती ही रह जाते हैं। दो तारे, तीन, चार, पाँच और देखते-ही-देखते आसमान में ढ़ेरों तारों का टिमटिमाना और चंद्र-कुसुम का खिल जाना- आहा! कितनी ख़ूबसूरती और संगीत है इसमें। जब पूरा आसमान ऐसे सितारों वाला आँचल बन जाता है, तब सप्तऋषि तारामंडलऔर ध्रुव ताराइनकी खोज में मन रम जाता था मेरा।

उन दिनों लड़कियाँ दिन में ही घर के बाहर जा सकती थीं। शाम होते ही उनकी सुरक्षा के मद्देनज़र बाहर निकलने पर पाबन्दी थी। लेकिन फ़िलहाल दिन पर, प्रचंड लू और प्रखर धूप ने अपने पहरे लगा रक्खे थे, तो दिन में भी बाहर जाना मुमकिन नहीं था। पूरा दिन घर के अंदर रहकर शाम को मुझे बाहरी दुनिया से यह मिलनोत्सव बहुत प्यारा लगता था। स्वभाव से अंतर्मुखी होने के कारण कोई मित्र मंडली नहीं थी मेरी। कुछ गिने-चुने दोस्त ही थे, लेकिन उनसे इस समय मिला नहीं जा सकता था।

बारहवीं तक पढ़ाई में अच्छी रहने के बावजूद मैं इंजीनियरिंग एंट्रेंस की परीक्षा पास नहीं कर पायी। इसका व्यक्तिगत दुःख नहीं था मुझे, लेकिन पापा की उदासी देखती थी तो मन डूबने लगता था। तीन साल हो चुके थे उस बात को, मगर पापा का ज़ख्म अब तक भी हरा ही था। उनको ऐसे मायूस देखकर लगता था कि बेटी होने का फ़र्ज पूरा नहीं कर सकी मैं। उन दिनों अक्सर ही अकेले में सोचा करती थी- क्या कोई राह बची है मेरे लिये, जिस पर चलकर मुझे एक मौका और मिल जाये पापा को ख़ुश करने का। उनके सपने पूरे करने का। एक दिन मेरी एक दोस्त का फ़ोन आया था और वो M.C.A. कोर्स के बारे में बता रही थी। पापा से इस बारे में बात करूँ क्या?

एक बार और मुझ पर भरोसा कर लें और M.C.A. एंट्रेंस की कोचिंग करवा दें। इंजीनियर तो नहीं बन सकी, लेकिन सॉफ्टवेयर इंजीनियर तो अब भी बन सकती हूँ। लेकिन पापा जिस तरह मुझसे मायूस हैं, मेरी तो हिम्मत ही नहीं होती उनसे बात करने की। पापा तो अब यही कहने लगे हैं कि रट-रट कर दसवीं और बारहवीं में U.P.Board से छात्रवृति पा ली मैंने। शायद यह सच भी हो? शायद मैं वाक़ई रट्टू तोता ही हूँ। पता नहीं इस बार भी मुझसे कुछ होगा या नहीं।

किसी और से कहने की हिम्मत नहीं होती थी, तो अपने आप से ही तर्क-वितर्क में उलझी रहती थी। मुझे लगता था कि जब तक मन की बात मन में है उस बात का एक ही मतलब है, लेकिन सुनने वाले के कानों तक पहुँचते ही बात बहुअर्थी हो जाती है। जितने सुनने वाले लोग उतने ही मतलब हो जाते हैं, कही हुई एक बात के। “समझे जिसे जो समझना हो, मेरी बला से” वाली उदासीनता मुझमें नहीं थी, तो अपनी बात को इतने लोगों को समझाने का ख़याल ही थका देता था मुझे। लोगों की बातें सुनना अच्छा लगता था मुझे और उनकी हिम्मत पर मन-ही-मन दाद भी देती थी कि कितना बोल लेते हैं कुछ लोग। मेरे मन के राग-खटराग बस मुझे ही पता थे।

पापा कभी गुस्से में यहाँ तक कह देते थे- इसे किसी के जीने-मरने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। यह अपनी ही धुन में रहती है।’  यह सुनकर मेरा मन बहुत रोने का करता और बताने की ललक होती- ऐसा नहीं है, पापा। मुझे महसूस होती है आपकी तकलीफ़, आपका गुस्सा, आपकी ख़ुशी और बाकी सब कुछ भी।’  लेकिन क्या करूँ कि मेरे चेहरे पर तब भी एक शान्त सागर ही लहराता था और उसकी गहराई में कितने ज्वार उठ रहे हैं, इसका कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता था। पता नहीं कौन सी अदृश्य दीवार थी जो मेरे और दूसरों के बीच हमेशा खड़ी हो जाती थी।

उस शाम टहलते हुए मैं हिम्मत जुटा रही थी कि आज पापा से M.C.A. वाली बात करनी ही होगी क्योंकि समय हाथ से छूटा जा रहा था। टहलते हुए मैं कभी छत पर लगे टीवी के एंटीने को देखने लगती थी तो कभी मेरी नज़र पड़ोस की छतों तक घूम आती थी। बस यूँ ही ख़ुद से बातें करते हुए शामें बीतती थीं मेरी। उस रात मैंने हिम्मत की और रात के खाने से पहले पापा से बात की। पापा ने ठन्डे मिज़ाज में हाँ कर दी। ऐसा लगा कि मेरा मन रखने के लिये उन्होंने कोचिंग के लिये हाँ कर दी। इसके बावजूद मैं बहुत ख़ुश थी कि मुझे दूसरा मौका दे दिया पापा ने। अगली ही सुबह मैंने M.C.A. की तैयारी के लिए सरोज वर्मा कोचिंग क्लासज्वाइन कर ली।

ज़िन्दगी आ रहा हूँ मैं

सरकाय लो खटिया, हम्मा हम्मा, चोली के पीछे क्या है और ऐसे ही कई गीत उस दौर में धूम मचा रहे थे। लड़कों की मनचली जवानी बिल्कुल चूल्हे पर चढ़े दूध जैसी उबाल खाती थी। उबलते दूध का एक विशेष गुण होता है, जब तक आप उसकी निगरानी करें वो इत्मीनान से पतीले की सीमाओं में पड़ा रहता है। जैसे ही आप पलटे, वो उफनता हुआ सारी मर्यादाओं को तोड़कर बह निकलता है। मतलब सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।

उस दौर में लड़कियाँ, ख़ासकर लखनऊ जैसे रूढ़िवादी शहर की, घर के बाहर अमूमन हर लड़के से खौफ़ खाती थी। कब किसी का दिल उसकी तरफ़ फिसल आये और मना करने की सज़ा भुगतनी पड़ जाए। ऐसे ख़तरनाक माहौल में लड़कियाँ सफर सुरक्षित ढ़ंग से कर सकें, इसके लिए बसों में बाड़े बने होते थे। लोहे की जाली से बस दो हिस्सों में बंटी होती थी। लड़के बस के पिछले दरवाज़े से चढ़ते और उतरते थे। इस जाली से आगे का चालीस प्रतिशत हिस्सा लड़कियों, ड्राइवर और बोनट के लिए आरक्षित होता था। लड़कियाँ बस के अगले दरवाज़े से चढ़ती और उतरती थीं। यह मेरी कोचिंग का पहला दिन था और मुझे इसी सुरक्षित साधन का सदुपयोग करते हुए कोचिंग जाना था।

वो सफ़र भी एक मज़ेदार क़िस्सा है-  मैं बस में चढ़ी और ढूंढकर अपेक्षाकृत खुली जगह पर खड़ी हो गयी। अगले ही स्टॉप पर एक बेहद तंदुरुस्त आंटी चढ़ीं और मेरे ठीक आगे खड़ी हो गयीं। जैसे ही बस आगे बढ़ने को हुई, वैसे ही वो आंटी असंतुलित होकर पीछे की ओर लदने लगीं। यह देखकर मेरा मन दहल उठा। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं पाँच फ़ुट की, हल्की-फुल्की, एक अदना सी कौरव सिपाही थी और वह भीमकाय घटोत्कच मुझ पर ही गिरने वाला था। पहली बार मुझे कौरव सैनिक का भयाक्रान्त चेहरा, उसकी दर्द भरी चीख और उसके स्टीकर में बदल जाने के दृश्य को याद करके उस पर करुणा जाग रही थी- 'बेचारा! बेकुसूर!'

मैंने यथाशीघ्र सरकते हुए जहाँ भीड़ ज्यादा थी, उधर का रुख़ किया और सोचा- जान है तो जहान है।जब भी ब्रेक लगता या बस चलना शुरू होती, वो आंटी भरपूर मोमेंटम के साथ झूलती थी। अरे! वो इतने इत्मीनान से मुस्कुराते हुए बस की रॉड पकड़कर झूल रहीं थीं, जैसे उन्हें सब पता था। ज्यादा-से-ज्यादा क्या होगा? यही ना कि बस में ही किसी सवारी पर गिरेंगी, कोई बस के बाहर थोड़े ना निकल जायेंगी। उनको मन्दिर के घंटे की तरह आगे-पीछे दोलन करते देखकर मेरा दिल दहशत से भरा जाता था। मेरी आँखें उनसे हटने को तैयार ही नहीं थी। मैंने ग़ौर किया कि उनके कन्धे पर एक भारी सा पर्स भी था। उनकी साड़ी और लुक्स से लग रहा था कि वो ऑफ़िस जा रही थी। मैंने सोचा- इन्हें तो ऑटो या टेम्पो से जाना चाहिए, आराम से बैठकर। बताओ, कोचिंग का पहला ही दिन और यह सब? न जाने क्या संकेत दे रहे थे प्रभु? ख़ैर, वो आंटी सचिवालय स्टॉप पर उतर पड़ीं और मुझे अभय दान मिला।

आगे जवाहर भवन और फिर तमसो मा ज्योतिर्गमयका उद्घोष करती शक्ति भवन की बिल्डिंग आई। यह बिल्डिंग देखकर मुझे हमेशा बहुत हर्ष होता है क्योंकि यह मेरे पापा का ऑफ़िस था। उसे नज़र भर देखने के बाद मैंने रास्ते पर ध्यान देना शुरू किया क्योंकि मेरा स्टॉप आने ही वाला था। और लो, आ गया। उतरते ही दाहिनी तरफ़ छोटा सा हनुमान मन्दिर था। मैंने हाथ जोड़कर नमन किया और आगे बढ़ी नवल किशोर रोड पर। थोड़ी दूर पर दाहिनी तरफ़ मशहूर राम आसरे का मिष्टान भण्डारऔर बायीं तरफ़ बुक्स एंड बुक्स स्टोर”, जहाँ सभी प्रतियोगिताओं की सभी पुस्तकें मिलती थीं। फिर लीला फ़िल्म थियेटर से दाहिनी तरफ़ मुड़कर, लगभग 250 मीटर के बाद, वो परिसर था जिसकी दूसरी मंज़िल पर मशहूर सरोज वर्मा कोचिंग क्लासमें मुझे जाना था।

सीढ़ियाँ चढ़ते हुए एक रोमांच था और एक शोर भी अपनी तरफ़ ध्यान खींच रहा था। बहुत सारे लोगों के भुनभुनाने का शोर। सीढ़ियाँ जैसे-जैसे दूसरी मंज़िल की तरफ़ पहुँच रहीं थीं, वैसे-वैसे यह भुनभुनाहट का शोर कानों को बुरा लगने लगा था। ऐसा लगा कुछ बहुत ही अव्यवस्थित सा था। अब मेरे सामने एक रिसेप्शन था, जिसके बुलेटिन बोर्ड पर पिछले दो सालों के उन धुरंधरों की फोटो लगी थी, जिन्होंने इस कोचिंग का नाम रोशन किया था। रिसेप्शन का दूसरा दरवाज़ा एक कमरे में खुलता था। यह शोर वहीं से आ रहा था। मैं आगे बढ़ी, तो देखा साठ छात्रों की क्षमता वाले कमरे में लगभग 130 छात्र थे। हर बेंच में छः छात्र और आख़िरी वाला छात्र ऐसे लटका हुआ जैसे टेम्पो या ऑटो में जबरन बिठाई गयी आख़िरी सवारी होती है।

मैंने बचपन के स्कूल से लेकर इस कोचिंग के बीच चार स्कूल बदले थे, लेकिन कभी भी किसी नये स्कूल में कोई पुराना दोस्त नहीं टकराया था। जो दोस्त स्कूल बदलने पर बिछड़ते, वो न जाने किस दुनिया में खो जाते थे। मुझे लगता था- लखनऊ बहुत बड़ा-सा भूलभुलैया है, जहाँ एक बार बिछड़े तो दोबारा मिलना? नामुमकिन।लेकिन देखा तो दो सहेलियाँ कार्मल कॉन्वेंट की और छः सहेलियाँ आईटी कॉलेज की वहाँ बैठीं थीं। मैं उन्हें देखकर बहुत ख़ुश हुई और पहली बार लगा- मेरे शहर में किसी को ढूँढना इतना भी मुश्किल नहीं है।कोचिंग में केवल लखनऊ के ही छात्र छात्राएँ नहीं थे, कोई बाराबंकी, कोई गोरखपुर, कोई रायबरेली, कोई बरेली, कोई सीतापुर तो कोई हल्द्वानी से था। मन खुश हो रहा था कि कितनी मशहूर और बड़ी कोचिंग में आ गई। पहले ही दिन उपलब्धि का एहसास- आहा!

उनसे पहली मुलाक़ात

धीरे-धीरे कोचिंग में अच्छे नंबर लाने वाले और कक्षा में जवाब देने वाले एक दूसरे को पहचानने लगे और उनके गुट भी बनना शुरू हो गए। कोचिंग का लगभग एक महीना पूरा होने को था। एक दिन एक सहपाठी आशीष मेरे पास एक बहुत टेढ़ा सा सवाल लेकर आया। मैंने कुछ देर उलझने के बाद सवाल को हल कर दिया और इस तरह हमारी दोस्ती हो गयी। मेरे साथ हमेशा मेरी दोस्त स्नेहा रहती थी और आशीष के साथ उसके दो दोस्त रहते थे। ऐसा लगता था कि शायद अब हम पाँच लोग एक ही गुट हो जायेंगे। आशीष मेहनती था और साथ ही साहित्य में दिलचस्पी रखने वाला भी। बात-बात पर शेर सुना देना या कविता सुना देना उसके लिये बायें हाथ का खेल था। विज्ञान और गणित जैसे रूखे सूखे विषय पढ़ने वाला साहित्यिक रस की बातें भी कर लेता है! वो कविताएं भी लिखता था। मैं उससे बहुत प्रभावित रहती थी कि कैसा हरफनमौला है!

एक दिन क्लास के बाद आशीष और मैं एक सवाल हल कर रहे थे कि उसके दोस्त पंकज ने बीच में अपना कोई सवाल रख दिया। इसके पहले कि आशीष या मैं कुछ कहते, पलाश ने पंकज की कॉपी हमारी टेबल से खींच ली। पलाश, आशीष के गुट का तीसरा लड़का था। उस दिन पहली बार पलाश को ठीक से देखा मैंने।

ऑफ़ वाइट रंग की शर्ट पहने एक दुबला-पतला, ख़ुशी का पुलिंदा, चशमिश लड़का जिसकी आँखों में भरपूर चंचलता थी। एक हैरान और उड़ती हुई नज़र उस पर डाल कर मैंने अपना सिर अपनी कॉपी पर वापस झुका लिया। पलाश पंकज के कंधे पर अपने हाथ रखकर बोला- तुम इधर आओ यार। कहाँ डिस्टर्ब कर रहे हो? आओ, हम कोशिश करते हैं।फिर उसने ज़रूर आशीष और मेरी तरफ़ मुस्कुराकर देखा होगा, ऐसा मुझे लगा। पलाश पंकज के साथ पिछली सीट पर बैठकर सवाल हल करने लगा। मेरे मन में कुछ खटक गया था। उसका अंदाज़-ए-बयां और उसकी शरारत भरी मुस्कान का अंदाज़ा खंजर की तरह मेरे दिल में उतर गया था। उसकी शैतान आँखें उसके सामने से हट जाने के बाद भी जैसे सामने ही थीं। मन उखड़ गया और अजीब सी नफ़रत जगी दिल में। कोचिंग से लौटते समय मैंने अपनी दोस्त स्नेहा से कहा- पलाश कैसा बदतमीज़ लड़का है? दिमाग में पढ़ाई नहीं घुसती, लेकिन गोबर भरपूर घुसा हुआ है। मुझे ऐसी लड़की समझता है वो? मैं यहाँ यह सब करने आई हूँ?’ स्नेहा ने बात को रफ़ा दफ़ा करने की कोशिश की- अरे! जैसे तुम सोच रही हो, शायद उसका वैसा मतलब नहीं रहा होगा। मस्त रहने वाला लड़का है वो।

लेकिन मैं कहाँ सुनने वाली थी! मैं बचपन से गर्ल्स स्कूल में ही पढ़ी थी और बातूनी नहीं थी तो आस-पड़ोस में भी किसी लड़के से दोस्ती नहीं थी। सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर मेरे साथ हुई बदतमीजी के आधार पर मेरे लिए हर दूसरा लड़का सड़क छाप मजनू ही था। इसलिये पलाश को भी मैंने उसी फीते से नाप डाला।

क्यूँ किया मैंने ऐसा? और वो भी केवल अंदाज़े भर से! मेरी नज़रें झुकी थी इसलिए वो कुटिल मुस्कान उसके चेहरे पर आई ही थी, यह भी यक़ीनी तौर पर नहीं कह सकती मैं। ख़ैर

घर पहुँचकर मैंने पानी पिया और कूलर के सामने बैठ गई। कुछ देर बाद मेरा मूड बहाल हुआ और मेरा ध्यान गया कूलर की हवा में लहराते अपने कत्थई दुपट्टे पर। उस दिन मैंने बादामी रंग का अनारकली कुर्ता, नीचे कत्थई रंग की चूड़ीदार पैजामी पहनी थी और साथ में कत्थई रंग का दुपट्टा लिया था। अमीनाबाद की कितनी ही दुकानें छानने के बाद मिला था इस शेड का आरामदायक कपड़ा। और फिर दर्जी को कितनी हिदायतें दी थी कि अच्छा सा सिलना। पीछे से ज़िप वाला अनारकली कुर्ता और पैजामी की चूड़ियाँ बिल्कुल भी ढीली-ढाली नहीं होनी चाहिये। वैसे बिल्कुल मन मुताबिक़ काम हो जाए, दर्जियों से यह उम्मीद यदा-कदा ही पूरी होती है। यह सूट उसी यदा-कदा का परचम था। यह मुझ पर खूब अच्छा लगता था। मेरा फ़ेवरेट सूटसोचते हुए मुस्कान आ गई और तभी पीछे से मेरी बहन ने शिक़ायती अंदाज़ में कहा- अब हट भी जाओ सामने से।

मैं घर में भी बहुत देर वो सूट पहने रही और फिर खा-पीकर ही कपड़े बदले। दिन के दो बज गये थे, जब हम चारों भाई-बहन और मम्मी कुछ देर की झपकी लेने के लिये लेट गये। उठकर, लगभग चार बजे तक सभी अपने कामों में लग गये। मैं अपनी किताब लेकर पढ़ाई में लग गई। सुबह घर में मंदिर का दिया मम्मी जलाती थीं और शाम को यह ज़िम्मेदारी हम चारों भाई बहन की होती थी। शाम का यह समय मुझे बड़ा अच्छा लगता था क्योंकि गाने के शौक को पूरा करने का यही एक समय होता था। हम पहले आरतियाँ गाते, फिर स्कूल में सीखे भजन: हे प्रभु दर्शन दो”, “जिनके हृदय श्री राम बसेंऐसे ही गाते हुए पूजा में लगभग एक घण्टा तो बिता ही लेते थे हम चारों। पूजा के बाद, छत पर ख़ुद से बात करती हुई घूमी, टहली और फिर खाना खाकर पढ़ने बैठ गई। रात के लगभग ग्यारह बजे मैं सोने चली गयी और आधी रात में सपने से अपनी जान बचाकर उठी।

तू काहे ना धीर धरे

यह वही झकझोर देने वाला सपना था, जिसका ज़िक्र मैंने पहले किया। एक तो मुझे पलाश से सख़्त नफ़रत थी और दूसरा लव मैरिज के ख़याल से ही मेरी जान आधी हुई जा रही थी। पलाश तो क्या मुझे किसी भी लड़के से "प्यार-व्यार का लफड़ा" नहीं चाहिए था। मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं जब लगभग बारह साल की थी, तब हमारे मोहल्ले में एक दीदी ने "लव मैरिज" की थी और उन्हें उनके घरवालों ने त्याग दिया था। उनके पापा सबसे कहते थे- 'पता होता, वो ऐसी निकलेगी, तो बचपन में ही मार डालते उसको।' वो दीदी उसके बाद कभी भी अपने मम्मी-पापा और भाई-बहन से नहीं मिल पायीं। मेरे घर में भी उस किस्से का जिक्र हुआ तो मेरे पापा ने कहा- 'पाल पोसकर, अपना खून पसीना एक करके औलाद को पालो और वो ऐसे नाक कटा दे, इससे तो बेऔलाद होना अच्छा है।'

उस घटना से मुझे पता चल गया था कि लव मैरिज कितना बड़ा पाप है। यह लव मैरिज का फ़ैसला प्रेमियों और उनके परिवारवालों पर कितना बुरा गुज़रता है!

मैंने पक्का फ़ैसला कर लिया था कि मैं अपने मम्मी-पापा को ऐसा दुःख कभी नहीं दूँगी और ना ही मैं ख़ुद अपने परिवार से हमेशा के लिये कट जाने का दर्द सह सकती थी। फिर सपने में भी ऐसा क्यूँ देखा मैंनेऔर कोई विरोध क्यूँ नहीं किया मैंने, सपने में? क्यूँ पलाश के हाथों को झटक नहीं दिया मैंने? इस सपने ने मुझे यह मानने पर तो मजबूर कर दिया था कि प्यार करने वाले बुरे और पापी नहीं होते हैं। प्यार अपने हर रूप में पूजा सा पवित्र और समर्पित होता है। लेकिन समाज और मेरे पापा को तो ऐसा नहीं लगता और शायद कभी लगेगा भी नहीं।

लेकिन प्यार के लिये अपने परिवारवालों की वरीयता कम कैसे की जा सकती है? इसलिये समझदारी तो यही है कि जो करना है उसमें परिवार की सहमति ज़रूर हो। सबको सब कुछ नहीं मिल जाता। हर्षा प्यारे, अपने फ़ैसले पर क़ायम रहो और अपने फ़र्ज़ पूरे करो। इंजीनियरिंग के टाइम पर जो गोबर किया है, उसके उपले बनाने में मन लगाओ और ज्यादा गोबर करने की ज़रूरत नहीं है। हाथ कुछ नहीं आयेगा। सपने में जो भी हुआ हो, दरअसल वो लड़का नालायक है। भूल गयी कैसा तंज कसा था उसने? पढ़ाई के बारे में सोचो, बहुत हुआ यह नाटक। ख़ुद को झिड़क कर चुप कराने की भरपूर कोशिश की मैंने।

अगले दिन जब मैं कोचिंग गई, तो मुझे लगा जैसे मेरे दाहिने कान के ठीक ऊपर एक तीसरी आँख उग आई हो। दो आँखें सामने ब्लैक बोर्ड पर और तीसरी लगातार पलाश पर ही टिकी रही। ख़ुद से पूछ रही थी मैं- क्या सचमुच मुझे धोखा हुआ?’ पर बहुत देर बाद भी मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाई। आखिरकार उस उलझन और बेचैनी ने अपना हठ छोड़ मुझे आज़ादी दे दी। मैंने ख़ुद को समझा लिया कि सपने पर इतना ध्यान क्या देना।

एक दिन आशीष ने बताया- ‘M.C.A. की दूसरी कॉउन्सलिंग में मेरी कॉल आ गई है और सोचता हूँ प्राइवेट कॉलेज में दाखिला ले लूँ। एक साल और यहाँ बर्बाद क्या करना।वो आशीष की कोचिंग में आख़िरी क्लास थी। हम सबने उसे शुभकामनाओं के साथ अलविदा कहा। वो चला गया और कभी कोचिंग लौटकर नहीं आया। मेरी पंकज से कोई दोस्ती नहीं थी और पलाश से दूर रहने की मैंने ठान रखी थी। इस दौरान कभी मुझे शक़ होता था कि सपने वाली आवाज़ आशीष की तो नहीं थी? वो चला गया मुझे पलाश के साथ छोड़कर! फिर यह सोचकर बड़ा सुकून होता था कि मैंने पलाश से कन्नी ही काट ली है और अब वो सपना कभी सच नहीं होगा।

स्नेहा मुझे बार-बार कह रही थी- चल दोस्ती कर लेते हैं इनसे। पलाश बुरा नहीं है बल्कि बहुत मज़ेदार लड़का है। अच्छा चल, तू पंकज से दोस्ती कर ले। वो तो तेरी तरह पढ़ाकू है और सीरियस भी।मैं ऐसा बिलकुल भी नहीं चाहती थी लेकिन स्नेहा के लिये क्या इतना भी नहीं कर सकती मैं? स्नेहा, मेरी दोस्त। अपने परिवार को सीतापुर छोड़कर लखनऊ इस कोचिंग के लिये आई थी। वह बहुत ख़ुशमिजाज, ज़िंदादिल, हसोड़ और जीवन को सहजता से लेने वाली लड़की थी। कोई हाय-तौबा नहीं थी उसकी शख़्सियत में, एकदम नदी सा बहाव।मैंने देखा था कि उसकी और पलाश की खूब छनती थी। वो दोनों बस हँसते ही रहते थे। स्नेहा के लिये बड़ा नर्म कोना था मेरे दिल में- 'यह अकेली रहती है। कोचिंग के बाद यह कितनी उदास रहती होगी। ना परिवार, ना दोस्त। किसी से बात करने का मन होता होगा तो रो ही देती होगी।' अपनी दोस्त के लिये इतना तो करना ही चाहिये, सोचकर मैंने हाँ कर दी थी। मन-ही-मन तय कर लिया कि मैं पलाश से दूर ही रहूँगी। धीरे-धीरे मैं और पंकज दोस्त बन गये और पलाश स्नेहा भी हँसते खिलखिलाते सफ़र तय कर रहे थे।एक दिन मैंने सुना पलाश स्नेहा से कह रहा था- मुझे पढ़ाकू लड़कियाँ बिल्कुल नापसंद हैं। ऐसी लड़कियों के जीवन में पढ़ाई के अलावा कुछ नहीं होता। उनसे मुझे डर लगता है। हर सवाल पर हाथ खड़ा करके, पता नहीं, क्या पा लेती हैं वो?’ मुझे जानकर बड़ी तसल्ली हुई कि हम दोनों के बीच नापसन्दगी का एहसास दोनों तरफ़ से बराबर था। वैसे भी मैं कौन सा परी थी कि वो मेरे प्यार में गिर-गिर पड़े! मैं उससे बात भले नहीं करती थी, लेकिन यह तो मानने लगी थी कि वो अल्हड़ और मनमौजी क़िस्म का एक अच्छा लड़का है। मेरी पलाश से दोस्ती शायद कभी नहीं होती अगर वो दुर्घटना मेरे साथ न हुई होती।