सोमवार : इक्कीस दिसम्बर
मुम्बई राजनगर
इरफान होटल सी-व्यू की चौथी मंजिल पर स्थित ‘राजा साहब’ के आफिस में पहुँचा।
वहाँ विमल के साथ शोहाब पहले से मौजूद था।
इरफान सकपकाया।
“मेरे को नहीं मालूम था”—वो बोला—“इधर कोई कान्फ्रेंस चल रयेला है।”
“कोई कान्फ्रेंस नहीं चल रही”—विमल बोला—“ऐसे ही गप्पें मार रहे हैं।”
“भाई का फातिहा पढ़ रहे हैं।”—शोहाब बोला।
“आ, बैठ।”—विमल बोला।
इरफान शोहाब के बाजू में एक विजिटर्स चेयर पर जा बैठा।
“ ‘भाई’ अब ‘कम्पनी’ जैसी बीती बात हो गया है।”—शोहाब बोला।
“क्या वाकेई?”—इरफान संजीदगी से बोला।
उसके संजीदा लहजे को दोनों श्रोताओं ने नोट किया।
“कोई खास बात कहना चाहता है?”—विमल बोला।
“कहने तो नहीं आया था लेकिन अब मुद्दा उठ खड़ा हुआ है तो कहता हूँ।”
“कह।”
“बाप, ये बात पक्की करके खाली तेरे को मालूम है कि ‘भाई’ खल्लास हो चुका है क्योंकि मई के महीने के आखिर में विंस्टन प्वायंट के उसके ठीये पर खुद तूने उसे खल्लास किया था। उस रात विंस्टन प्वायंट पर मौजूद ‘भाई’ के खास आदमियों के अलावा और उनके बीच हमारे भेदिये जेकब परदेसी के अलावा बाकी सबके लिए ये बात सुनी सुनायी है कि ‘भाई’ खल्लास हो चुका है। उधर एक कत्ल हुआ लेकिन कोई खबर न निकली, कोई एफआईआर न हुई, कोई पुलिस वाला उधर मौकायवारदात पर जा कर झाँका तक नहीं। इतना टेम हो गया उस वाकये को लेकिन अन्डरवर्ल्ड में उस बाबत खुसर-पुसर के अलावा कुछ भी नहीं। और खुसर-पुसर भी कैसी? कोई बोलता है ‘भाई’ सोहल के हाथों खल्लास, कोई बोलता है दुबई में सेफ बैठेला है तो कोई बोलता है कराची में सेफ बैठेला है।”
“मैं तो पहले ही बोला था कि...”
“मेरे को मालूम तू क्या बोला था। तू यहीच बोला था कि ‘भाई’ का खास इनायत दफेदार उसकी, एक इश्तिहारी मुजरिम की, विंस्टन प्वायंट पर अक्सर मौजूदगी की खबर पुलिस को लगने देना... शोहाब, क्या नहीं कर सकता था?”
“अफोर्ड नहीं कर सकता था।”—पढ़ा लिखा शोहाब बोला।
“वहीच।”
“करता तो एक खतरनाक मुजरिम की हिन्दोस्तान में मौजूदगी की बाबत चुप रहने की एवज में, उसे विंस्टन प्वायंट पर पनाह देने की एवज में, दफेदार समेत वहाँ मौजूद तमाम के तमाम लोग गिरफ्तार होते।”
“बरोबर।”
“मैंने तो कहा ही था”—विमल बोला—“कि अगर दफेदार को अक्ल होगी तो वो ‘भाई’ के कत्ल की, और यूँ हिन्दोस्तान में उसकी मौजूदगी की, पुलिस को भनक नहीं लगने देगा। वो लाश को चुपचाप कहीं दफना देगा और जाहिर करेगा कि ‘भाई’ एकाएक दुबई चला गया, कराची चला गया, अपने हालिया बाप रीकियो फिगुएरा के पास काठमाण्डू या हांगकांग चला गया, कहीं भी चला गया।”
“बरोबर बोला, बाप”—इरफान बोला—“सब वैसीच बोला जैसे कोई दाना, दूरन्देश भीड़ू बोलता है पण एक बात बरोबर न बोला।”
“कौन-सी बात?”
“तेरे को जान पड़ता था कि दफेदार झाग बन के बैठ जायेगा पण वो नहीं बैठेला है।”
“लगता तो नहीं ऐसा!”
“खाली लगता नहीं है।”
“तेरा मतलब है ये तूफान से पहले की शान्ति है?”
“हाँ। मेरा भेजा यहीच बोलता है कि दफेदार कोई बड़ा खेल खेलने की फिराक में है।”
“भाई की जगह लेने की फिराक में है?”
“वो तो खैर अभी दूर का सपना है लेकिन ‘भाई’ के खौफ को इधर के अन्डरवर्ल्ड में जिन्दा रख के अपना कोई शीराजा बटोरने की फिराक में बरोबर है।”
“कैसे करेगा वो ये काम?”
“फिगुएरा से शै पा कर करेगा।”—शोहाब बोला—“और किसी को उसने बोला हो या न बोला हो, फिगुएरा को जरूर बोला होगा कि ‘भाई’ का कत्ल हो गया था। फिगुएरा को अपना हेरोइन का कारोबार चालू रखने के लिए इधर अपना कोई खास हमेशा चाहिये। दिल्ली के दादाओं की बिरादरी तुमने जहन्नुमरसीद कर दी—भोगीलाल, झामनानी और ब्रजवासी को तुमने मार डाला, पवित्तरसिंह तुम्हारी वजह से मारा गया—इधर तुमने ‘भाई’ की लाश गिरा दी, ऐसे माहौल में दफेदार फिगुएरा को अपने काम का आदमी मालूम पड़ सकता है और वो उस पर अपनी उम्मीदें टिका सकता है।”
“उसे बिना परखे?”—विमल बोला—“बिना आजमाये?”
“परखेगा। आजमायेगा। क्या पता हालिया खामोशी में परखने की, आजमाने की ही तैयारियाँ चल रही हों!”
“तैयारियाँ! कैसी तैयारियाँ?”
“दो ही तैयारियाँ मुमकिन हैं, दो ही काम हैं जो दफेदार का रुतबा बुलन्द कर सकते हैं और फिगुएरा को मुतमईन कर सकते हैं कि दफेदार उसके काम का आदमी है।”
“कौन-से दो काम?”
“एक इस घड़ी खूब फलते फूलते इस होटल को मरघट बनाना और दूसरा तुम्हारी लाश गिराना।”
“दोनों आसान काम हैं! दफेदार यूँ”—विमल ने चुटकी बजाई—“कर लेगा! नो प्राब्लम!”
“आसान काम तो नहीं हैं! आसान होते—खास तौर से तुम्हारी लाश गिराने का काम—तो इस काम को उससे पहले करने वालों का क्या तोड़ा था?”
“बरोबर बोला।”—इरफान बोला—“जो काम ‘कम्पनी’ के बड़े-बड़े तीरन्दाज न कर सके, ‘भाई’ न कर सका, वो दफेदार कर लेगा?”
“क्या पता चलता है?”—विमल दार्शनिक भाव से बोला।
“अरे, वो भुँगा! वो तिनका...”
“तिनका कबहू न निन्दिये, पाँव तले जो सोय; कबहूँ उड़ी आँखों परै, पीर घनेरी होय।”
“क्या बोला, बाप?”
“दुश्मन को कमजोर नहीं समझना चाहिये।”—शोहाब बोला—“ये बोला, बाप।”
“ओह! पण मेरे को नहीं लगता वो कुछ कर सकेगा।”
“फिर भी खबरदार रहने में क्या वान्दा है?”
“कोई वान्दा नहीं, पण...”
“वो है कहाँ?”—विमल ने पूछा।
“मालूम नहीं।”
“हैदर को जब हमने रिहा कर दिया था तो वो उसके पास पहुँचा था या नहीं पहुँचा था?”
“पहुँचा था लेकिन अब वो भी गायब है।”
“और उसका भाई जेकब परदेसी उर्फ सफदर?”
“वो तो ‘भाई’ के कत्ल के फौरन बाद इधर हाजिरी भरने आया था और तेरी ही सलाह पर, कि कुछ अरसे के लिए दफेदार की नजरों से दूर कहीं गायब हो जाये, गायब हो गया था। नतीजतन तभी से गायब है।”
“इसीलिये बच गया। दफेदार से ये हकीकत छुपी रहने वाली नहीं थी कि वो ‘भाई’ के कत्ल के षड्यन्त्र में शरीक था। कत्ल के फौरन बाद विंस्टन प्वायंट से भाग खड़ा होने की जो मूर्खता उसने की थी, उसकी वजह से दफेदार का कहर उस पर टूट के रहना था।”
“आज भी टूट सकता है। दफेदार ‘भाई’ की जगह लेने में कामयाब हो गया तो वो उसे पाताल से भी खोद निकालेगा।”
“उससे पहले दफेदार को हम खोद निकालें तो कैसा रहे?”
“ये आइडिया मेरे भेजे में है, बाप।”
“हम उसके कोई चाल चलने के इन्तजार में हैं।”—शोहाब धीरे से बोला—“वो कोई चाल चलेगा तो कोई हिलडुल होगी, कोई हिलडुल होगी तो हमें उसका कोई अता-पता मालूम पड़ेगा।”
“फिर देखेंगे उसको।”—इरफान बोला।
“पिछले कुछ अरसे में”—विमल बोला—“नाहक हमारी जो ताकत बन गयी है, तुम उसको नजरअन्दाज कर रहे हो।”
“ताकत!”
“जो कभी ‘कम्पनी’ की थी। क्यों, शोहाब?”
“कभी”—सहमति में सिर हिलाता शोहाब बोला—“जो काम ‘कम्पनी’ के लिए उसके भेदिये करते थे वो अब सोहल के लिए उसके मुरीद करते हैं।”
“मैं समझ गया”—इरफान बोला—“मैं अक्खी मुम्बई में फैलाता हूँ कि सोहल को दफेदार माँगता है।”
“गुड!”—विमल बोला—“और सीता बनवास कब तक चलेगा?”
“क्या बोला, बाप?”
“मैं नीलम से कब मिल पाऊँगा? सूरज से कब मिल पाऊँगा?”
“अभी नहीं, बाप, अभी नहीं। अभी जैसा चल रहा है, चलने दे। अल्लाह के करम से तेरी बेगम कोल्हापुर में मेरी बहन के घर में महफूज है और सूरज विखरोली में कोमल के पास, उसकी मरहूम बहन का गोद लिया बेटा बना, महफूज है। खुदा के वास्ते थोड़ा अरसा और ऐसीच चलने दे।”
“नीलम चलने देगी?”
“दे ही रही है। वर्ना क्या उसे यहाँ का रास्ता नहीं आता?”
“ठीक।”
“और बाप, तू भूल रहा है कि जिस रास्ते पर तेरी बेगम चली थी, वो उसने खुद चुना था।”
“दुरुस्त।”
आज मेरा फर्ज और मेरी गैरत का तकाजा मुझे तुम्हारी दुनिया से बहुत दूर निकल जाने के लिए प्रेरित कर रहा है। तुम विषम परिस्थितियों से जूझने में माहिर हो इसलिये उम्मीद है कि तुम माँ बेटे की जुदाई का कोई सदमा महसूस करोगे तो उसे झेल लोगे। अगर औरत अपने मर्द के पाँव की बेड़ियाँ बन जाये तो औरत का यही धर्म बनता है कि वो उन बेड़ियों को काट डाले। मैं अपना धर्म निभा रही हूँ और तुम्हें छोड़ के जा रही हूँ। अब तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं कि दुश्मन फिर मुझे—या सूरज को या दोनों को—तुम पर वार करने का, तुम्हारा सिर झुका देखने का जरिया बना सकते थे। तुम्हारे पैरों की बेड़ियाँ मैंने खुद काट दीं। अब तुम अपनी जिन्दगी की सब से बड़ी फिक्र से आजाद हो। अब सिर्फ अपनी फिक्र करना और अपना सिर वैसे ही शान से ऊँचा रखना जैसे कि आज तक रखा। दशमेश पिता दो जहाँ का मालिक मेहर करेगा और वाहे गुरु के खालसा की गर्दन कभी नहीं झुकने देगा।
वाहे गुरु! जीऊ जन्त सभि सरण तुम्हारी, सरब चिंत तुध पासे। जो तुध भावे सोई चंगा इक नानक की अरदासे।
“किधर खो गया, बाप!”
“क्या?”—विमल हड़बड़ाया।
“किधर खो गया?”—इरफान बोला।
“किधर भी नहीं। तू बोल, तू कैसे आया था?”
“बोलता है। वो क्या है कि दो भीड़ू काफी टेम से तेरे को ढूँढ़ रयेला है।”
“मेरे को?”
“राबिन हुड, सखी हातिम, दीनबन्धु, दीनानाथ, गरीबों का हमदर्द, दोस्तों का दोस्त, दुश्मनों का दुश्मन, भूखे के मुँह में रोटी का निवाला देने वाला, नंगे के तन पर कपड़ा डालने वाला, अँधे की आँख, लँगड़े की लाठी, बेसहारे का सहारा, अनाथ का नाथ, कद्रदान, मेहरबान, गरीबनवाज...”
“एण्ड वाट नाट।”—शोहाब बोला।
“... सोहल को।”
“बस कर, यार।”—विमल बोला।
“बाप, जो लोगबाग बोलता है, वहीच बोला।”
“उन दो जनों की बात कर। क्यों ढूँढ़ते हैं वो मेरे को?”
“मिलना चाहते हैं।”
“क्यों?”
“खाली तेरे को बोलेंगे।”
“जानकारी में कैसे आये?”
“चैम्बूर पहुँचे न!”
“जहाँ बस”—शोहाब बोला—“जहाँगीरी घण्टा लटकाने की कसर है।”
चैम्बूर के उन के उस ठीये का इतना प्रचार हो गया था, कि जरूरतमन्दों को गरीबनवाज सोहल वहाँ हर घड़ी मिलता था, कि नये-नये लोग, दूर-दूर से अपनी जरूरतों की कहानियाँ लेकर वहाँ पहुँचने लगे थे। चर्च में नंस के लिए क्वार्टर बनने हैं, पादरी को डोनेशन चाहिये। मिशन के स्कूल में बच्चों को वर्दियाँ और दोपहर का खाना मुहैया कराना है, प्रिंसीपल साहब को दान चाहिये। इमाम साहब को गरीबों को हज कराने के लिए रकम चाहिये। डिस्पैन्सरी की फ्री ओपीडी पर बीमारों का हुजूम बढ़ता ही जा रहा है, डॉक्टर साहब को दवाओं के लिए कंट्रीब्यूशन चाहिये। यतीमखाने की छत गिर गयी है या गिरने वाली है, चन्दा चाहिये। विधवा आश्रम को कम्बल चाहियें, मन्दिर में भगवान की मूर्ति स्थापित होनी है, महन्त जी को पैसे चाहियें, ग्रंथी को गुरुद्वारे के लंगर के लिए...
करोड़ों लोगों का मुल्क! करोड़ों लोगों की जरूरतें!
कौन पूरी कर सकता था?
चौबीस घण्टे तीन सौ पैंसठ दिन होते रह सकने वाले काम को कौन अंजाम दे सकता था?
नतीजतन सर्वसम्मति से ये फैसला हुआ था कि गर्जमन्द बन कर आये लोगों की स्क्रीनिंग की जाये और जो जेनुइन केस दिखाई दें उन्हीं को खातिर में लाया जाये।
यूँ लोगों की बेतहाशा आमद काबू में आ गयी थी लेकिन इरफान और उसके खासुलखास मतकरी, परचुरे, पिचड़ और बुझेकर का काम बढ़ गया था। जो जेनुइन केस होते थे उन्हें जो माली इमदाद दी जानी होती थी, उसे वो ही दे देते थे लेकिन फिर भी कोई न कोई ऐसा अकीदतमन्द निकल ही आता था जो कि हासिल इमदाद सोहल से ही कबूल करने की जिद करता था।
बकौल शोहाब ये प्रचार सिरे से ही गलत और खतरनाक था कि सोहल—हमेशा नहीं तो कभी-कभार—चैम्बूर के उस मकान में पाया जाता था जो कभी तुका का घर होता था।
“जरूरत क्या है उनकी?”—विमल बोला।
“कोई नहीं।”—इरफान ने जवाब दिया।
“क्या!”
“न उन्होंने कोई जरूरत जाहिर की और न लगता था कि वो जरूरतमन्द थे; खासतौर से वो जो कि बाहर से आया था।”
“तो मिलना क्यों चाहते हैं?”
“आटोग्राफ लेना चाहते होंगे!”—शोहाब बोला—“अपने आइडियल के साथ, हीरो के साथ फोटो खिंचवाना चाहते होंगे!”
“नानसेन्स!”
शोहाब हँसा।
“तूने जवाब नहीं दिया।”—विमल इरफान से सम्बोधित हुआ—“जब गरजमन्द नहीं हैं तो मिलना क्यों चाहते हैं?”
“बोला न, तेरे को बोलेंगे।”
“तू मिला उनसे?”
“हाँ। जब वो चैम्बूर में रिसैप्शन पर बैठने वाले हमारे भीड़ू से राजी न हुए तो मेरे को मिलना पड़ा।”
“तू क्या बोला उन से?”
“वही जो नवां भीड़ू लोग से बोला जाता है। उन को मुगालता लगा था, उधर कोई सोहल नहीं पाया जाता था। उधर किसी सोहल को कोई नहीं जानता था।”
“फिर?”
“उन्होंने कान से मक्खी उड़ाई और सोहल से मुलाकात की जिद पर अड़े रहे।”
“दोनों इकट्ठे थे?”
“नहीं।”
“एक दूसरे से वाकिफ थे?”
“नहीं।”
“लेकिन आये इकट्ठे थे?”
“नहीं। अलग-अलग दिन, अलग-अलग वक्त पर आये थे। लेकिन दोनों की माँग एक ही थी। सोहल से मिलना था। हर हाल में मिलना था।”
“कुछ मालूम किया होता उन के बारे में! कोई पता निकाला होता!”
“किया न! निकाला न!”
“अच्छा, निकाला?”
“बरोबर। एक तो लोकल भीड़ू है, जीतसिंह नाम है, तालातोड़ है, तारदेव के सुपर सैल्फ-सर्विस करके स्टोर की डकैती में गिरफ्तार था, बड़ी मुश्किल से जमानत पर छूटेला था कि तारदेव थाने के एसएचओ इंस्पेक्टर गोविलकर का कत्ल हो गया था जिसके लिए पहले तो उसी को जिम्मेदार ठहराया गया था लेकिन फिर पता नहीं क्या हुआ था कि इलाके के डीसीपी—प्रधान नाम है—ने ही उसे बरी कर दिया था।”
“नोन बैड करेक्टर है।”—शोहाब ने जोड़ा—“अन्डरवर्ल्ड में बतौर वाल्टबस्टर खूब मशहूर है। कुछ अरसा हुआ हेनस रोड के एक जौहरी की दुकान लुटी थी, कहते हैं तब जौहरी की तिजोरी इसी शख्स ने खोली थी।”
“धारावी में”—इरफान बोला—“काला किला के इलाके में हाल में तीन खून हुए थे। कत्ल हुई दो लाशें वहाँ के एक गोदाम में पड़ेली थीं और एक बाई बाहर सड़क पर खड़ी मारुति वैन में ठुकी पड़ी थी; बाप, अन्डरवर्ल्ड में बहुत चर्चा है कि वो तीनों खून भी इस जीतसिंह करके भीड़ू ने ही किये थे।”
“अभी भी जमानत पर बाहर है।”—शोहाब बोला।
“फिर तो काफी गुणी आदमी हुआ!”—विमल बोला।
“हुआ तो।”—इरफान बोला।
“और ऐसा शख्स मेरे से मिलना माँगता है?”
“टलना नहीं माँगता। जिद नहीं छोड़ता। सुनता हैइच नहीं कि उधर चैम्बूर में सोहल नहीं पाया जाता।”
“कैसे सुने! लोकल है, एक तरह से हमारी बिरादरी का है, कहने भर से कैसे मान जायेगा कि वहाँ सोहल नहीं पाया जाता!”
“बरोबर बोला, बाप।”
“मुश्ताकेमुलाकात दूसरे साहब कौन हैं?”
“दूसरे भीड़ू का नाम विकास गुप्ता है। राजनगर से खास तेरे से मुलाकात करने का तमन्नाई बना आया बताता है अपने आपको। खूबसूरत नौजवान लड़का है। सूरत से बोले तो किसी भले घर का रौशन चिराग जान पड़ता है। पण...”
इरफान जानबूझ कर खामोश हो गया।
“वो भी तालातोड़ है? कातिल है? जमानत पर बाहर है?”
“नहीं।”
“तो क्या है?”
“आर्टिस्ट है। कलाकार है। फनकार है।”
“क्या फन है उसका?”
“ठग है।”
“क्या!”
“मैं जानकारी निकाला, पक्की करके मालूम पड़ा कि पेशेवर ठग है...”
“कॉनमैन।”—शोहाब बोला।
“धोखाधड़ी ही उसकी रोजी रोटी का जरिया है।”
“ठगी को कलाकारिता बताता है?”—विमल बोला।
“टॉप क्लास, बाप, टाॅप क्लास।”—इरफान बोला—“बस यहीच एक काम है जिसमें बोले तो उसकी महारत है।”
“कभी फँसा नहीं?”
“कई बार। कई बार पकड़ा गया बताते हैं पण कभी सजा नहीं हुई।”
“उसके खिलाफ”—शोहाब बोला—“कभी कोई केस अदालत में खड़ा न हो पाया, हमेशा लैक आफ ईवीडेंस में छूट गया।”
“अब किस फिराक में है? अपनी ठगी का शिकार मुझे बनाना चाहता है?”
“तेरे को बोलेगा न!”
“सन्दिग्ध चरित्र के लोग फरियादी बन कर चैम्बूर पहुँचते ही रहते हैं लेकिन ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ कि किसी ने अपने को खुद अपनी जुबानी तालातोड़ बताया हो, कॉनमैन बताया हो और वो किसी इमदाद का तलबगार न हो!”
“बाप, मैं खुद हैरान।”
“मिले बिना टलने वाले भी नहीं!”
“तालातोड़ में छोटेपन का अहसास है, अहसासेकमतरी का मारा है, शायद टल जाये, ठग नहीं टलने वाला।”
“तो तुम लोगों की क्या राय है, मुझे मिलना चाहिये?”
“अब न टलने वाले से मिलना कबूल करेगा तो दूसरे से भी मिल लेना।”
“अरे, कोई पुलिस का भेदिया तो नहीं? कोई दुश्मन की चाल का मोहरा तो नहीं?”
“नहीं। मैं पक्की पड़ताल किया।”
“ठीक है, मिलता हूँ। इन्तजाम कर।”
“अभी, बाप।”
आखिरकार जगमोहन के पास वो गुड न्यूज पहुँची जिस का उसे अरसे से इन्तजार था और जो दो दिन और न पहुँचती तो किसी काम की न होती।
न्यूज का जरिया टेलीफोन काल थी जो कि सुनामपुर से आयी थी।
सुनामपुर समुद्र तट पर बसा दूर दराज का शहर था।
फोन करने वाले का नाम दिलीप चौधरी था।
“मैंने कोड ब्रेक कर लिया है।”—उसने बताया।
“आखिरकार।”—जगमोहन बोला।
“हाँ, आखिरकार। तीन महीने लगे।”
“आजमा लिया?”
“हाँ।”
“सच में आजमा लिया, इसलिये कह रहे हो या तुम्हारी कारीगरी का अभिमान कहलवा रहा है?”
“सच में आजमा लिया।”
“बढ़िया। और डुप्लीकेट गाड़ी की बाबत क्या कहते हो?”
“वो मामूली काम है। दो दिन में हो जायेगा। गाड़ी तो है ही, खाली उसके एक्सटीरियर को ऐसी शक्ल देनी है कि वो एक निगाह में बैंक की गाड़ी लगे।”
“आगे?”
“आगे तुम बोलो।”
“मैं ही बोलूँगा। राजनगर पहुँचो।”
“कहाँ?”
“वहीं जहाँ पिछली मुलाकात हुई थी।”
“कब?”
“जब तुम पहुँच सको।”
“मैं तो आज ही पहुँच सकता हूँ। एक्सप्रेस ट्रेन से पाँच घण्टे तो लगते हैं।”
“ठीक है। शाम सात बजे।”
“पहुँच जाऊँगा।”
जगमोहन ने सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया और सोचने लगा।
जो काम वो सुनामपुर में करने जा रहे थे, उसमें मेजर रोल खुद उसका था और जो आनन-फानन बड़ा इन्तजाम उसने करके दिखाना था वो हाथ आयी आइटम को रातोंरात राजनगर पहुँचाना था जहाँ कि आइटम का तुरत-फुरत ग्राहक मौजूद था। उस काम की रूपरेखा उसके जेहन में तैयार थी।
सुनामपुर टाउनशिप से छ: किलोमीटर बाहर एक उजड़ा हुआ पायर था जो कि एक मुद्दत से इस्तेमाल में नहीं था। सस्ती लेबर और सस्ती लकड़ी की वजह से कभी उधर फर्नीचर का इतना काम होता था कि वो शहर ही फर्नीचर टाउन कहलाता था। फिर एक भीषण आग की सूरत में कुदरत की ऐसी मार उस इलाके पर पड़ी कि जंगल के जंगल जल कर खाक हो गये, सस्ती लेबर मुहैया कराने वाले परिवार हजारों की तादाद में वहाँ से पलायन कर गये और फर्नीचर का धँधा खत्म हो गया। शहर तो धीरे-धीरे फिर बस गया लेकिन धँधा फिर न खड़ा हो सका और वो पायर फिर आबाद न हो सका जहाँ से स्टीमरों पर लदकर फर्नीचर राजनगर की बन्दरगाह पर पहुँचता था।
वो पायर अब उन के काम आने वाला था।
उसने चौबीस की रात को आठ बजे एक स्टीमर उस उजड़े पायर पर मुहैया कराना था और सुबह होने से पहले उसे राजनगर के एक वैसे ही बियावान समुद्र तट पर पहुँचाना था।
पचास करोड़ का माल जिस के पैंतीस करोड़ इस हाथ ले उस हाथ दे के अन्दाज से हासिल होते।
“ये दुनिया एक खेला”—उसके मुँह से निकला—“जिसके किरदार बदलते रहते हैं, खेला नहीं रुकता। चलता रहता है। चलता रहता है।”
दौलतमन्द बनने की चाह में जिस शुरुआती क्राइम में उसने विमल के साथ शिरकत की थी, वो तो अब उसकी गुनाहों से पिरोई जिन्दगी में बहुत पीछे रह गया था लेकिन अपनी उसके बाद की कई कामयाबियों के बाद आज भी उसे इस बात का मलाल था कि अमरीकी डिप्लोमैट सिडनी फोस्टर के अपहरण को पूरी कामयाबी से अंजाम दे चुकने के बावजूद पल्ले कुछ नहीं पड़ा था। दो साथी—पोपली और महेन्द्र नाथ—मारे गये थे, विमल एक करिश्माई तरीके से मरने से बाल बाल बचा था और खुद वो एक बार फिर बेयारोमददगार अकेला रह गया था। छाती में धँसे सूये की वजह से हुई सर्जरी के बाद विमल को नीलम अपने साथ चण्डीगढ़ ले गयी थी और पीछे वो हाथ में विमल के दिये बत्तीस हजार रुपये लेकर सोचता ही रह गया था कि कहाँ जाऊँ, किधर का रुख करूँ, कहाँ पनाह पाऊँ?
फरार अपराधी तो वो तब भी था—पटना से चार खून करके भागा हुआ था—इसलिये प्लास्टिक सर्जरी से नया चेहरा हासिल करने का तमन्नाई था जिसके लिए प्लास्टिक सर्जन डाक्टर अर्ल स्लेटर की मोटी फीस भरना उसके बस का नहीं था। ऐसा ही बेबस शख्स डाक्टर स्लेटर के क्लीनिक में उसे विमल मिल गया था और फिर दो नाउम्मीद, नामुराद लोगों को मुराद हासिल करने का जरिया सिडनी फोस्टर के अपहरण और उससे हासिल होने वाली फिरौती में दिखाई दिया था।
पटना में वो एक ट्रांसपोर्ट कम्पनी में कैशियर की नौकरी करता था। एक दिन वो कम्पनी में बैठा कैश गिन रहा था तो किसी ने आ कर उसे बताया कि उस की बीवी का एक्सीडेंट हो गया था। दौड़ा-दौड़ा घटनास्थल पर पहुँचा तो उसे मालूम हुआ कि उस की बीवी और उसका सात साल का लड़का दोनों परलोक सिधार चुके थे। बीवी लड़के को स्कूल से लेकर एक रिक्शा पर सवार घर वापिस लौट रही थी कि एक ट्रक ने रिक्शा को अपनी चपेट में ले लिया था। अपनी बीवी और बच्चे को उसने मांस के लोथड़ों की शक्ल में सारे बाजार में बिखरे देखा था।
ट्रक ड्राइवर एक्सीडेंट के बाद भाग नहीं सका था। उस का ट्रक दुर्घटनास्थल से थोड़ा ही आगे जाकर बिजली के एक खम्बे से टकरा गया था और फिर वहाँ से हिल नहीं सका था। बीवी, बच्चे के भीषण अंजाम से उसका दिमाग हिला हुआ था, ट्रक के किसी भाग से उखड़ी एक लोहे की छड़ उसके हाथ में आ गयी थी जिससे उसने ट्रक ड्राइवर का सिर तरबूज की तरह खोल दिया था और वैसे ही क्लीनर को भी ठौर मार डाला था। उसी क्षण एक सिपाही और हवलदार वहाँ पहुँचे, उन्होंने उसे गिरफ्तार करने की कोशिश की तो उसने उन दोनों का भी ट्रक ड्राइवर और क्लीनर जैसा हाल कर डाला था। आखिरकार छ: लाशों को रौंदता वो उसी ट्रक पर सवार होकर मौकायवारदात से फरार हुआ था जो खम्बे से टकराने के बाद उसके ड्राइवर से स्टार्ट होकर नहीं दे रहा था।
उसकी भटकन राजनगर में जाकर खत्म हुई जहाँ इत्तफाक से ही वो मोटर मैकेनिक के धन्धे में पड़ा।
राजनगर में वो जो ऑटो रिपेयर शाप चलाता था, सूरत तब्दील हो जाने के बाद—ताकि बतौर कातिल उसे कोई पहचान न पाता—वो उसी में तरक्की के ख्वाब देखता था। जो बड़ी छलाँग उसने लगायी, उस में बावजूद कामयाबी के हाथ भले ही कुछ न आया लेकिन उस बड़ी छलाँग के बाद फुदकते रहना उसे अपने बस का न लगा। नतीजा ये हुआ कि अपहरण और फिरौती के—वन टाइम, वन फर्स्ट एण्ड लास्ट टाइम—गुनाह की जो कालिख चेहरे पर पुती, वो कभी न धुल सकी। नया चेहरा भी विडम्बना बन गया जो कि डॉक्टर स्लेटर की फीस की रकम हासिल होने का मोहताज था लेकिन वो रकम—उससे कहीं ज्यादा दौलत—हासिल हो जाने के बावजूद नया चेहरा उसे न हासिल हो सका क्योंकि उस जुस्तजू में जब वो वापिस सोनपुर पहुँचा तो उसे मालूम हुआ कि डॉक्टर स्लेटर का कत्ल हो चुका था और उस वजह से उसका क्लीनिक उजड़ चुका था। नया चेहरा तो उसे हासिल न हुआ लेकिन उसकी खोटी तकदीर ने उसका इतना साथ जरूर दिया कि उसे पटना से फरार हुए ढाई साल से ऊपर हो गये थे, अभी तक एक बार भी उसकी शिनाख्त और गिरफ्तारी का मौका नहीं आया था।
न ही अब तक अंजाम दी अपनी वारदातों में उसके पकड़े जाने की नौबत आयी थी।
इसी वजह से उसमें इतनी दिलेरी थी कि पिछले दो साल से वो राजनगर के करीबी कस्बे खैरगढ़ में बसा हुआ था और बेहिचक, बेझिझक राजनगर अक्सर आता जाता था।
जैसे कि अपनी तकदीर को ललकारने, उससे पंजा लड़ाने।
ये भी भाग्य की विडम्बना थी कि अपने पहले गुनाह का फल चखने का मौका उसे मिल गया होता तो आगे गुनाह करने की नौबत ही न आती। जब कामयाबी की गारण्टी थी तो तब तो वो एक छलावे की तरह हाथ से निकल गयी और अब कभी कामयाबी की गारण्टी नहीं होती थी—वो जो करता था रिस्क लेकर करता था—तो भी कामयाब होता था।
इसीलिए उसका दिल गवाही दे रहा था कि उस बार भी वो नाकाम नहीं रहने वाला था।
इसीलिये पिछले दस दिनों से अपने चेहरे पर वो फ्रेंच कट दाढ़ी मूँछ यूँ तैयार कर रहा था कि किसी की उस पर नजर न पड़ती। इन दिनों में खैरगढ़ में कहीं देखा जाने से उसने खास परहेज किया था। फिर भी कहीं जाना पड़ता था तो वो मुँह अँधेरे गले में यूँ मफलर लपेट कर जाता था कि उसकी नाक के नीचे तक उसका चेहरा मफलर में छुप जाता था। दिसम्बर की सर्दी में उसकी वो हरकत किसी देखने वाले को स्वाभाविक जान पड़ती थी। आइन्दा अभियान के समापन के बाद जब वो दाढ़ी मूँछ साफ कर देता तो किसी को सूझता तक नहीं कि बीच में उसने यूँ अपनी शक्ल में कोई तब्दीली पैदा कर ली थी।
विमल ने आँख भर कर उस शख्स को देखा जिसका नाम विकास गुप्ता था।
वो लगभग तीस साल का लम्बा ऊँचा कद्दावर नौजवान था और इरफान ने जब उसको खूबसूरत कहा था तो उसकी पर्सनैलिटी को कम कर के आँका था। वस्तुत: वो फिल्म अभिनेताओं जैसा खूबसूरत था। वो ब्राउन कलर का बहुत हाई क्लास सूट पहने था और हल्के ब्राउन कलर की कमीज के साथ सूट जैसी टाई लगाये था। उसके चेहरे पर ऐसे बुद्धिमत्ता के भाव थे कि किसी मल्टीनैशनल कॉर्पोरेशन का टॉप एग्जीक्युटिव जान पड़ता था।
विमल किसी भी लिहाज से उसकी कल्पना एक कॉनमैन के तौर पर न कर सका।
उसके साथ एक खूबसूरत नौजवान लड़की थी जो कि उम्र में उस से तीन चार साल कम जान पड़ती थी। उसके बाल बड़े आधुनिक, स्टाइलिश ढंग से कटे हुए थे और उसने चेहरे पर बड़ा सलीके का मेकअप लगाया हुआ था। वो फिरोजी रंग की शिफॉन की साड़ी पहने थी और वैसा ही लो-कट स्लीवलैस ब्लाउज पहने थी।
दिसम्बर के महीने में वो परिधान मुम्बई में ही चल सकता था।
“तो आप”—विमल बोला—“विकास गुप्ता हैं और कलाकार हैं?”
“जी हाँ।”—उत्तर मिला।
“ठगी को आप अपना कोई ऐब, कोई नुक्स, कोई खामी, कोई कमतरी नहीं मानते?”
“जी नहीं।”
“अपने कारोबार से सन्तुष्ट हैं?”
“कुछ अरसा पहले तक था, अब नहीं हूँ।”
“अब क्या हुआ?”
“वजह अभी आप खुद ही समझ जायेंगे।”
“हूँ। मैडम की तारीफ?”
“ये शबनम है, मेरी फ्रेंड है।”—वो एक क्षण ठिठका और फिर बोला—“हमपेशा।”
विमल की भवें उठीं।
“इसीलिये फ्रेंड है।”—उसका मतलब समझ कर वो बोला—“दांत काटी रोटी है।”
“आई सी। तो आप सोहल से मिलने के ख्वाहिशमन्द हैं?”
“था। अब तो ख्वाहिश पूरी हो गयी।”
इरफान और शोहाब उस घड़ी विमल के आजू बाजू बैठे हुए थे।
“हम में से कौन सोहल है?”—विमल बोला।
“आप मजाक कर रहे हैं।”
“अच्छा!”
“मैं आपका फैन और एडमायरर हूँ, सिर्फ आपसे मिलने के वन प्वायंट प्रोग्राम के तहत मैं हजार किलोमीटर के फासले से यहाँ आया हूँ, अगर मैं आपको नहीं पहचान सकता तो लानत है मेरे आपका फैन और एडमायरर होने पर।”
“वैरी वैल सैड।”
“गुस्ताखी से कहूँ तो मैं उसी तालाब की एक बहुत छोटी मछली हूँ जिसके आप बडे मगरमच्छ हैं; ‘कम्पनी’ के खातमे के बाद, ‘भाई’ के खातमे के बाद, जिसके आप सब से बड़े मगरमच्छ हैं।”
“‘भाई’, के खातमे की भी खबर है?”
“जी हाँ। उसके अन्डर में चलने वाला एक जमूरा इस बात को झुठलाता है लेकिन मुझे मालूम है कि ‘भाई’ खत्म है।”
“कैसे मालूम है?”
“मई में सारे अन्डरवर्ल्ड में, आप की रहमत के जेरेसाया पलने वाले एक खास तबके में, आम चर्चा थी कि ‘भाई’ रावण था और आप राजा रामचन्द्र थे। ‘भाई’ खत्म न हो गया होता तो क्या मई से अब तक राजा रामचन्द्र हाथ पर हाथ धर कर बैठे होते?”
“काफी समझदार आदमी हो।”
“मैं आपकी परछाईं भी नहीं हूँ।”
“एक इश्तिहारी मुजरिम के, जो कि पकड़ा जाते ही फाँसी पर चढ़ा दिया जायेगा, फैन एण्ड एडमायरर क्योंकर बन गये?”
“आपके परोपकारी किरदार से मुतासिर हो कर बना। कौन नहीं जानता कि आज मुल्क में कितने विधवाश्रम, कितने यतीमखाने, कितने दवाखाने, कितने लंगर उस माली इमदाद के सदके चल रहे हैं जो आप मुहैया कराते हैं। कौन नहीं जानता कि कितने नंगों के जिस्म पर कपड़ा आप की वजह से है, कितने भूखों के पेट में निवाला आप की वजह से है। कितने बच्चों को गलियों की धूल फाँकने की जगह, भीख माँगने की जगह, स्कूल जाना नसीब है। कितनी विधवा माइयों को आप भगवान का रूप नहीं, भगवान दिखाई देते हैं। कितने अपाहिज कहते हैं कि जब वो भगवान की चरणरज के अभिलाषी होंगे तो वो महालक्ष्मी मन्दिर का नहीं, चैम्बूर का रुख करेंगे। कितने मजलूम इंसाफ की गुहार लगाने कोर्ट कचहरी नहीं पहुँचते, चैम्बूर पहुँचते हैं। कितने...”
“देनहार कोऊ और है, भेजत सो दिन रैन; लोग भरम हम पर धरें, पाते नीचे नैन।”
“ये आपका बड़प्पन है...”
“नहीं, भाई, नहीं। ताकत कहीं और है, साधन कहीं और हैं, जिसको आर्गेनाइज करने का, चैनेलाइज करने का जरिया मैं हूँ। बजातेखुद मेरी कोई हस्ती नहीं, कोई औकात नहीं। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।”
“आप अकेले नहीं हैं, अकेले होते तो मैं ही यहाँ न होता।”
विमल ने सकपका कर उसकी तरफ देखा।
“मतलब?”—फिर बोला।
“साधनों का घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, मैं घड़े में एक बूँद टपकाने का तमन्नाई बन कर आया हूँ।”
“राजा रामचन्द्र ने”—शबनम दबे स्वर में बोली—“लंका पर चढ़ाई करने के लिए जब समुद्र में पुल बाँधा था तो एक गिलहरी ने भी अपने नन्हें पंजों से समुद्र में मिट्टी डाल कर उस काम में मदद की थी। विकास जो करना चाहता है, वो गिलहरी के किये से बढ़ कर नहीं हो सकता। और ये तो वैसी शाबाशी का भी तलबगार नहीं जैसी राजा रामचन्द्र से गिलहरी को मिली थी।”
विमल की भवें उठीं।
“कहते हैं गिलहरी की पीठ पर जो तीन लकीरें होती हैं वो राजा रामचन्द्र के उसकी पीठ पर शाबाशीभरा हाथ फेरने से बनी थीं।”
“हूँ। मैडम, मैं अभी भी नहीं समझा कि जनाब करना क्या चाहते हैं?”
“विकास आप के गरीब गुरबा की मदद के महान संकल्प में अपने तुच्छ योगदान के तौर पर आपको एक रकम सौंपना चाहता है।”
“कैसी रकम?”
“छ: करोड़ रुपया।”
“क्या!”
इरफान और शोहाब भी हैरान हुए बिना न रह सके।
“सर”—विकास गुप्ता बोला—“आपने अभी पूछा था कि क्या मैं अपने कारोबार से सन्तुष्ट हूँ तो मेरा जवाब था कि नहीं। वजह वो रकम ही है जो मैं आप के परोपकार के पावन घट को समर्पित करना चाहता हूँ।”
“लेकिन अपनी गाढ़े पसीने की कमाई...”
“न कमाई, न गाढ़े पसीने की।”
“प्लीज एक्सप्लेन।”
विकास ने शबनम की तरफ देखा।
“इसके मामा इसके लिए एक वसीयत कर गये थे”—शबनम बोली—“जिस के तहत इसे छ: करोड़ रुपये मिले हैं लेकिन उस हासिल से ये कतई खुश नहीं।”
“क्यों भला?”
“इतनी बड़ी रकम का मालिक होना इसके लाइफ स्टाइल से मैच नहीं करता। ये कलाकार है और कलाकारिता कला प्रदर्शन में है...”
“ठगी में?”
“आप कुछ भी समझें लेकिन हाँ। उस रकम की प्राप्ति ने इसे नाकारा बना दिया है, ये अब कुछ करने की जरूरत ही महसूस नहीं करता। बिजली की कौन्ध जैसा तीखा इसका दिमाग कुन्द होता जा रहा है। इसको सुख चैन सकून तभी हासिल हो सकता है जब कि छ: करोड़ कीलों की तरह इसके रोम-रोम में चुभता वो छ: करोड़ रुपया इसे अपने मोहपाश से मुक्त करे।”
“कमाल है! लेकिन इसका मतलब तो ये हुआ कि तुम्हें”—विमल विकास से सम्बोधित हुआ—“जनहित नहीं, निजहित यहाँ लाया है। तुम उस रकम से पीछा छुड़ाना चाहते हो और पीछा छुड़ाने के लिए तुमने ये जगह चुनी।”
“यही समझ लीजिये।”—विकास बोला।
“माॅडेस्टी दिखा रहा है।”—शोहाब धीरे से बोला—“क्रेडिट नहीं लेना चाहता, शाबाशी नहीं चाहता इसलिये ऐसा कह रहा है।”
विमल ने सहमति में सिर हिलाया।
“अगर ये रकम”—फिर बोला—“तुमने अपनी कॉनमैनशिप का करिश्मा दिखा कर किसी से झटकी होती तो भी इस की बाबत तुम्हारा यही रवैया होता?”
“आप मुझे कनफ्यूज कर रहे हैं।”
“फिर भी?”
“मैं इतना पहुँचा हुआ कॉनमैन नहीं हूँ।”
“अगर होते तो?”
“तो क्या पता क्या होता! भविष्य किसी के अपने हाथ में तो नहीं होता!”
“ठीक।”
“सर”—विकास व्यग्र भाव से बोला—“मैं बहुत सोच समझ कर इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि उस रकम का मुकाम यहाँ है। वो वाइट, फुल्ली एकाउण्टिड फार रकम है जिसका ये ड्राफ्ट”—उसने जेब से एक लिफाफा निकाल कर विमल के सामने रखा—“आपकी नजर है। आप इसे कबूल फरमायें ताकि मेरा मन चैन पाये। और नहीं तो यही सोच कर कबूल फरमायें कि जो भेजा ‘उसी’ ने भेजा जो ‘भेजत सो दिन रैन’।”
“अरे मेरे भाई, मेरे जज्बाती भाई, छ: करोड़ रुपया बहुत बड़ी रकम होती है, आम हालात में इसे कमाने में एक नहीं कई जिन्दगियाँ गुजर जाती हैं। हाथ आयी दौलत को छोड़ना दानिशमन्दी नहीं होती। और फिर पहले घर में चिराग जलाया जाता है, फिर मस्जिद की फिक्र की जाती है।”
“गुस्ताखी माफ, सर, आप ऐसा करते हैं? पहले घर में चिराग जलाते हैं, फिर मस्जिद की फिक्र करते हैं?”
विमल हकबकाया, उसने बारी-बारी अपने जोड़ीदारों का मुँह देखा।
दोनों ने अनभिज्ञता से कन्धे उचकाये।
“मिस्टर विकास गुप्ता”—विमल फिर मेहमान से सम्बोधित हुआ—“हमारी कौम पाँच हजार साल से भूखी है, कोई एक आदमी पाँच हजार साल की भूख नहीं मिटा सकता।”
“तो आप अपने इस अभियान से किनारा कर रहे हैं? अपनी परोपकारी, सर्वहितअभिलाषी छवि को तिलांजलि दे रहे हैं?”
“नहीं, लेकिन...”
“सर, आई रैस्ट माई केस।”
“तुम समझते नहीं हो। जो पैसा यहाँ जनहित में खर्च किया जाता है, वो मैंने नहीं कमाया, वो हराम की कमाई है, स्मगलिंग, ब्लैकमेलिंग, ड्रग ट्रैफिकिंग की कमाई है, गुण्डे बदमाशों से छीना पैसा है जो मैं चाहता हूँ किसी सद्कार्य में लगे। सब का भला नहीं हो सकता तो कुछ का भला तो हो इसलिये...”
“सब का भला करने के लिए भगवान बैठा है, कुछ का भला करने की जिम्मेदारी उसने आप को सौंपी है। जो शख्स खुदा का काम कर रहा है, उसके हाथ मजबूत करना सब का फर्ज है। मेरा भी। और मैं अपना फर्ज निभा रहा हूँ।”
“अरे, तुम कैसे ठग हो!”
“वैसा ठग हूँ जो ठगों के ठग को ठगता है।”
“तुम क्यों नहीं समझते हो? अरे, लोगबाग गरीबगुरबा की खिदमत के अपने बुलन्द इरादों के कसीदे पढ़ने यहाँ आते हैं, आकर झूठ बोलते हैं, फरेब करते हैं, झोपड़पट्टे के बच्चों पर, यतीमों पर, बीमारों पर पैसा खर्चने के लिए बड़ी-बड़ी रकमें यहाँ से ले जाते हैं और सब पैसा खुद हड़प जाते हैं। स्कूल का हैडमास्टर स्कूल की बेहतरी के लिए पैसा ले कर गया और सब बेटी की शादी पर खर्च कर दिया। सोशल वर्कर एक औरत धारावी के स्लम के सुधार के लिए पैसा लेकर गयी, सब फैंसी फ्लैट पर और उसकी फर्निशिंग पर खर्च कर दिया। डाक्टर खैराती हस्पताल में मुफ्त दवायें बाँटने के लिए पैसा ले कर गया, लेकिन असल में हिल स्टेशन पर माशूक के साथ रंगरेलियाँ मनाने पहुँच गया। एक महन्त जी...”
“सर, सब नैगेटिव मिसाल ही हैं, पाजिटिव कोई नहीं?”
विमल के जेहन पर मलाड के विधवा आश्रम के संस्थापक दिवंगत बैकुण्ठराव अचरेकर का अक्स उभरा।
“ऐसा तो नहीं है।”—वो धीरे से बोला—“एक ऐसे शख्स की नीयत पर मैंने शक किया था तो उसने आश्रम की विधवा माईयों के लिए खर्चे गये एक-एक पैसे का हिसाब दिया था और बाकी बची रकम मेरे मुँह पर मारी थी। एक पादरी था जो अपनी तनख्वाह भी अपने खस्ताहाल चर्च पर खर्च कर देता था और इमदाद के लिए तभी यहाँ आया था जब कि चर्च को बिल्कुल ही खण्डहर बन जाने से रोकना उसके लिए कतई नामुमकिन हो गया था। एक और सज्जन कोढ़ियों की पनाहगाह के लिए चार साल में लौटा देने का वादा करके चालीस लाख रुपये ले गये थे लेकिन असल में सारी रकम दो महीने में ही लौटा गये थे। किसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थान ने उन के अभियान के लिए उन्हें सम्मानित किया था और एक बड़ा कैश अवार्ड दिया था जो कि सारा का सारा उन्होंने अपने प्रोजेक्ट पर खर्च कर दिया था। ऐसी कई मिसालें हैं।”
“यानी कि सब अच्छे नहीं तो सब बुरे भी नहीं होते?”
“वो तो है। हम नहीं चंगे, बुरा न कोए।”
“फिर तो मैं सही राह पर हूँ।”
“तौबा! अरे, मैं तुम्हें क्या समझा रहा हूँ और तुम क्या समझ रहे हो?”
“सर, इसकी रिक्वेस्ट मान लीजिये।”—शबनम बोली—“ये सोच के मान लीजिये कि अपनी बात मनवाये बिना ये नार्मल इंसान नहीं बन सकता।”
“कमाल है!”
“ये बहुत कुत्ती चीज है...”
“क्या!”
“...अपनी बात मनवाये बिना यहाँ से नहीं टलने वाला। टलने वाला होता तो तब टला होता जब आप तक पहुँच बनाने की अपनी दिनोंदिन कोशिशों में ये कामयाब नहीं हो पा रहा था।”
“ठीक है, भाई।”—विमल गहरी साँस लेता बोला—“सर्वजनहिताय मैं तुम्हारी पेशकश कबूल करता हूँ।”
“थैंक्यू, सर।”—दोनों हाथ जोड़ता विकास बोला—“थैंक्यू वैरी मच। लिफाफे पर एक मोबाइल नम्बर दर्ज है, कभी इस अकिंचन की जरूरत महसूस करें तो घण्टी कीजियेगा या एसएमएस कीजियेगा, सिर के बल दौड़ा चला आऊँगा।”
“देखेंगे। मुम्बई पहली बार आये हो?”
“जी हाँ।”
“फिर तो घूमने फिरने का इरादा होगा?”
“है तो सही।”
“तुम चाहो तो होटल सी-व्यू में हमारे मेहमान बन कर रह सकते हो।”
“जरूरत नहीं, सर। हम पहले ही बान्द्रा के एक होटल में चैक इन कर चुके हैं।”
“थैंक्यू आल दि सेम, सर।”—शबनम बोली।
“मर्जी तुम्हारी।”
“थैंक्यू सर।”
दोनों वहाँ से रुखसत हुए।
“क्या जादू कर देता है, बाप!”—पीछे इरफान बोला—“जो मिलता है, मुरीद बन जाता है।”
“बिना मिले मुरीद बन जाता है।”—शोहाब बोला—“पहले मुरीद बनता है, फिर मिलता है।”
“सब खुदाबन्द करीम का करम है”—विमल बोला—“वाहे गुरु की किरपा है, प्रभू की माया है।”
“वो तो बरोबर है।”—इरफान बोला।
“अब दूसरे जमूरे की बोल।”
“उससे भी आज ही मिलेगा?”
“अब जब यहाँ आये हैं तो...”
“ठीक है। मैं इन्तजाम करता हूँ।”
इरफान उठा और बाहर को बढ़ चला।
पीछे विमल ने अपना पाइप सुलगा लिया।
मुलाकात की निर्धारित जगह राजनगर में बन्दरगाह के इलाके में स्थित सी-गार्डन नाम का एक सैकण्ड क्लास बार था जिस में जगमोहन की वजह से सिमरन नाम की एक लड़की—जो कि उसकी खास थी—फिफ्टी पर्सेंट की पार्टनर थी। सी-गार्डन का दूसरा पार्टनर धीरज परमार था जोकि बाखूबी जानता था कि उस की बराबर की पार्टनर ने जो पैसा उस बार में लगाया था, वो उसे अपने मेहरबान, कद्रदान जगमोहन से हासिल हुआ था।
पाँच बजे जगमोहन वहाँ पहुँचा।
और धीरज परमार से मिला।
“जिन आइटमों की जरूरत की बाबत मैंने तुम से बोला था”—जगमोहन बोला—“अब उन के इस्तेमाल का वक्त आ गया है।”
“आये।”—धीरज परमार बोला—“खुशी से आये। क्या प्राब्लम है?”
“यही पूछ रहा हूँ। क्या प्राब्लम है?”
“कोई प्राब्लम नहीं। चाहो तो आज ही रात को ले जाना।”
“ले कर मैंने नहीं जाना है, तुमने सब सामान कहीं पहुँचाना है।”
“कहाँ?”—परमार तनिक सशंक भाव से बोला।
“सुनामपुर।”
“लो! मैंने समझा कहीं इंगलैंड अमेरिका का नाम लेने वाले थे।”
“वहाँ शहर से बाहर एक डेयरी फार्म है जिसे सरस्वती नाम की एक विधवा और उसका बेटा चलाते हैं। सरस्वती दिलीप चौधरी की बहन है। सामान सुनामपुर के उस डेयरी फार्म पर दिलीप चौधरी को मार्फत सरस्वती यादव भेजना है।”
“मार्फत भेजना है? चौधरी वहाँ नहीं रहता?”
“नहीं, वो इकबालपुर में रहता है। लेकिन बहन की खातिर सुनामपुर आता जाता रहता है।”
“आई सी।”
“सामान पैक्ड और सील्ड वहाँ पहुँचाना है। दिलीप चौधरी वहाँ हुआ तो खुद रिसीव कर लेगा, न हुआ तो बोलना है उसी ने भिजवाया है और उसे वो खुद आ के खोलेगा। ठीक?”
“ठीक।”
“अभी मैं जा रहा हूँ। सात बजे तक लौट के आऊँगा।”
“मालिक हो। जब मर्जी आना।”
“पूरी बात सुनो। सात बजे दिलीप चौधरी भी यहाँ पहुँचने वाला है। मेरा कहना ये है कि अगर वो मेरे से पहले पहुँच जाये तो उसे पिछवाड़े के उस कमरे में बिठाना है जहाँ दिन में तुम्हारे दो क्लर्क बैठते हैं।”
“अकेला आयेगा?”
“मेरे खयाल से उस की भतीजी साथ होगी जो कि पिछली बार भी साथ थी। मुग्धा नाम है। मुग्धा चौधरी।”
“भतीजी को हमेशा साथ ले के क्यों फिरता है?”
“हमेशा नहीं। इस बार इसलिये क्यों कि जो होने वाला है, उसमें उसकी बराबर की शिरकत है।”
“फिर तो दिलेर लड़की हुई!”
“हुई।”
“ठीक है। तुम्हारी हिदायत के मुताबिक मैं उन्हें रिसीव करूँगा।”
“सात बजे मुलाकात होगी।”
“वैलकम।”
एक टैक्सी पर सवार हो कर वो उस पायर की ओर रवाना हुआ जहाँ जलपरी नाम का वो स्टीमर खड़ा था जिसका कैप्टन-मालिक इब्राहीम शेख नाम का एक व्यक्ति था। उसे मालूम था कि इब्राहीम शेख खुद स्मगलर नहीं था लेकिन मोटी फीस की एवज में स्मगलिंग का माल खुला ढोता था। जगमोहन उसे ये इशारा पहले ही दे चुका था कि आइन्दा दिनों में उसे उसकी किसी कारोबारी खिदमत की जरूरत पड़ सकती थी।
वो जानता था कि हमेशा की तरह एक आदमी उसके पीछे लगा हुआ था और वो ये भी जानता था कि वो खैरगढ़ चौकी के इंचार्ज सब-इन्स्पेक्टर भगवती सिंह डोभाल का आदमी था—दारोगा का आदमी था इसलिये पुलिसिया था—लेकिन वो उसके प्रति कोई खास चिन्तित नहीं था क्योंकि एक तो उस के खैरगढ़ के बाहर कदम रखते ही उसका उसके पीछे लग जाना अब एक रूटीन बन चुका था और दूसरे, वो पीछे लग कर उसके गन्तव्य स्थल तक ही पहुँच सकता था, उसके सिर पर नहीं आन खड़ा हो सकता था। सी-गार्डन तक वो उसके पीछे पहुँचा था लेकिन उसके पास ये जानने का कोई जरिया नहीं था कि भीतर वो क्या करता रहा था। ऐसे ही उसके पीछे लगकर वो पायर तक पहुँच सकता था लेकिन ‘जलपरी’ पर कदम रखने की उसकी मजाल नहीं हो सकती थी। आइन्दा उसके पीछे लगा वो उसके लिंक रोड पर स्थित फ्लैट तक भी पहुँच सकता था जहाँ कि उस रात उसका टिकने का इरादा था लेकिन फ्लैट में घुसकर उसके सिरहाने नहीं आन खड़ा हो सकता था।
वो जानता था कि सब-इन्स्पेक्टर डोभाल का अपना आदमी उसकी निगरानी पर लगाने के पीछे उसका असल मकसद ये था कि जगमोहन कहीं खिसक न जाये जब कि हकीकतन फिलहाल उसका खिसकने का कोई इरादा नहीं था।
टैक्सी ने उसे उसकी मंजिल तक पहुँचाया।
ये तसदीक करने के लिए कि डोभाल का आदमी उसके पीछे लगा वहाँ पहुँचा था या नहीं, पीछे मुड़ कर देखे बिना पायर पर चलता वो उस स्थान पर पहुँचा जहाँ पानी में ‘जलपरी’ लंगर डाले था। पायर से स्टीमर तक पहुँचने के लिए बीच में एक फट्टों का टेम्पररी पुल बना हुआ था जिस पर चलते उसने उसके डैक पर कदम रखा तो एक भारी भरकम दढ़ियल आदमी दीवार की तरह उसके सामने आ खड़ा हुआ।
“कहाँ घुसे चले आ रहे हो?”—वो कर्कश स्वर में बोला।
“जहाँ मैं तुझे दिखाई दे रहा हूँ।”—जगमोहन सहज भाव से बोला—“अपने बाप को जा के बोल मोहन बाबू मिलने आया है।”
लोगों को अपना परिचय वो इसी नाम से देता था।
मोहन बाबू पासवान।
दढ़ियल ने संदिग्ध भाव से उसे देखा।
“खड़ा खड़ा मर गया क्या?”
“नहीं।”
“तो हिलता क्यों नहीं?”
“बहुत कड़क बोलता है, बाप!”
जगमोहन ने असहाय भाव से कन्धे उचकाये।
“पीछे आओ।”
लम्बाई में वो कोई तीन सौ फुट का स्टीमर था जिस के व्हील हाउस में—जो कि फैंसी याट्स पर कैप्टंस केबिन कहलाता था—उसने उसे पहुँचाया जहाँ कि नेवी के अफसरों जैसी सफेद पोशाक और पीक कैप पहने इब्राहीम शेख मौजूद था।
उसने प्रश्नसूचक नेत्रों से जगमोहन को देखा।
“मोहन बाबू।”—जगमोहन बोला—“फोन पर बात हुई थी।”
“पासवान?”
“वही।”
“खुशामदीद! खुशामदीद! बैठो।”
“ऐसे ही ठीक है। मैंने सिर्फ दो मिनट रुकना है।”
“काम की बात करने आये हो न?”
“हाँ।”
“दो मिनट में हो जायेगी?”
“अगर चाहोगे तो...”
“मैं क्यों नहीं चाहूँगा? मैं तो...”
जगमोन ने दढ़ियल की तरफ देखा जो कि दरवाजे के करीब ठिठका खड़ा था।
“असलम!”—शेख अप्रसन्न भाव से बोला—“अभी इधर ही है?”
अपने पीछे दरवाजा बन्द करता दढ़ियल—असलम—वहाँ से रुखसत हो गया।
“तुम्हारे क्रियु का आदमी है?”—जगमोहन ने पूछा।
“हाँ।”
“ऐसे और कितने हैं?”
“तीन। कुल जमा चार। असलम, अख्तर, जाकिर, अयूब।”
“मैंने नाम नहीं पूछे। क्रियु की बाबत तफसील में जाने की जरूरत नहीं।”
“सोचा, शायद हो।”
“गलत सोचा। मेरे लिये तुम्हें जानना काफी है।”—उसने जेब से हजार के नोटों की एक गड्डी निकाल कर उसके सामने मेज पर फेंकी—“ये लाख रुपये पेशगी। चार लाख रुपया काम मुकम्मल हो जाने पर। चौबीस की रात को आठ बजे तुमने सुनामपुर से छ: किलोमीटर बाहर के उस उजड़े पायर पर एडवांस में मौजूद होना है जहाँ से कभी फर्नीचर और टिम्बर ढोया जाता था।”
“मैं उस जगह से वाकिफ हूँ।”
“बढ़िया।”
“वहाँ से पहुँचना कहाँ होगा?”
“यहीं। लेकिन यहाँ बन्दरगाह पर या आसपास कहीं नहीं। तट से पचास किलोमीटर नीचे कैसाना नाम की एक जगह पर, जिसे मैंने”—जगमोहन ने उसे एक तह किया हुआ कागज सौंपा—“इस नक्शे में मार्क कर दिया है।”
“ढोना क्या है?”
“माल। सामान। कार्गो।”
“उसकी किस्म की मुझे खबर होनी चाहिये क्योंकि मैं ड्रग्स नहीं ढोता; चोरी, स्मगलिंग का माल नहीं ढोता।”
“हा हा हा।”
“यार, तू बात का मकसद समझ।”
“एक बन्द ट्रक पहुँचेगा जिसे कि एक पायर से दूसरे पायर तक रातों रात ढोना है। इस से ज्यादा तुम्हारा कुछ जानना मैं जरूरी नहीं समझता। फिर भी तुम्हारी जिद है तो...”
उसने मेज पर पड़ी नोटों की गड्डी की तरफ हाथ बढ़ाया।
लेकिन शेख ने गड्डी पहले अपने कब्जे में कर ली।
“गुड।”—जगमोहन बोला—“अभी जाता हूँ, शुक्रवार मुलाकात होगी।”
“बराबर होगी, बिरादर। खाकसार तुम्हारा और तुम्हारे ट्रक का इन्तजार करता मिलेगा।”
“शुक्रिया।”
जगमोहन वहाँ से रुखसत हो गया।
जगमोहन के निगाहों से ओझल होते ही इब्राहीम शेख ने असलम को तलब किया।
“लाख रुपये पेशगी दे गया।”—शेख गम्भीरता से बोला—“चार लाख बाद में देगा। मोटे माल का मामला जान पड़ता है। मेरे से उजरत की बाबत सवाल तक न किया। खुद ही सब फैसला कर लिया।”
“किधर से मालूम किया होगा कि हम लोग कैसे चार्ज करते हैं!”
“फिर भी! मेरे से पूछता तो मैं तो आधे में हाँ बोल देता।”
“वो तो है!”
“बोला, बन्द ट्रक ढोना है। ट्रक में क्या है, नहीं बताता। मियाँ, मेरे को तो करोड़ों के माल की सूँघ लग रही है।”
“ऐसा?”—असलम के नेत्र फैले।
“हाँ। मेरे को एक नक्शा दिया उसने इधर के कोस्टल एरिया का जिस पर उसका एक कांटैक्ट नम्बर दर्ज है। इत्तफाक से वो नम्बर मेरा पहचाना हुआ है।”
“अच्छा! किधर का है?”
“बन्दरगाह के इलाके के एक बार का है। तू इधर सँभाल, मैं वहाँ जाता हूँ और कोई ताक झाँक करता हूँ। शायद कुछ पल्ले पड़े।”
“बढ़िया।”
इरफान वापस लौटा।
अकेला।
विमल ने प्रश्नसूचक नेत्रों से उसकी तरफ देखा।
“दूसरे भीड़ू के पहुँचने में अभी थोड़ा टेम लगेगा।”—इरफान बोला—“अभी एक केस मेरी सिफारिश पर देख।”
“केस?”
“बूढ़ी औरत है। बहुत हलकान है, बहुत पशेमान है...”
“जो चाहती है, दे उसे।”
“इमदाद नहीं चाहती। फिरयाद करना चाहती है।”
“किस बाबत?”
“बोलेगी न!”
“अभी बोला नहीं?”
“कुछ बोला, कुछ और बोलेगी।”
“शोहाब!”
“यस, बॉस।”
“तू तो बोलता था अभी इधर जहाँगीरी घण्टा लटकाने में कसर है! घण्टा तो बराबर है इधर। अभी बजा और अपने इरफान ने बराबर सुना।”
शोहाब हँसा।
“नाम क्या है उसका?”—विमल इरफान से बोला।
“मिसेज मैग्नारो।”—इरफान बोला।
“क्रिश्चियन है?”
“गोवानी है।”
“किधर से आयी?”
“काला घोड़ा से।”
“जो फोर्ट के इलाके में है?”
“हाँ।”
“बुला।”
“अभी।”
मिसेज मैग्नारो के वहाँ पहुँचने से पहले विमल ने पाइप बुझाकर जेब में रख लिया।
मिसेज मैग्नारो साठ के पेटे में पहुँची अधपके बालों वाली महिला थी जो कि एक टखनों तक आने वाली स्कर्ट और ब्लाउज पहने थी और तनिक झुक के चलती थी। उसका जिस्म दोहरा था और चेहरे पर एक कठिन जिन्दगी के अपनी कहानी आप कहने वाले निशान थे। अपने बाल उसने ढीले ढाले जूड़े की सूरत में गर्दन के पीछे बाँधे हुए थे। आँखों पर वो बाइफोकल्स लगाये थी जिसके ऊपरी भाग में से उसने पहले विमल की तरफ, फिर शोहाब की तरफ और फिर वापिस विमल की तरफ देखा।
“आइये, मैडम।”—विमल आदरपूर्ण स्वर में बोला—“प्लीज सिट डाउन।”
“बैठता है।”—वो तनिक हाँफती-सी बोली—“बैठता है। थैंक्यू।”
“आपका नाम मिसेज मैग्नारो है, आप काला घोड़ा से आयी हैं?”
“यस।”
“फरमाइये, क्या चाहती हैं?”
“मेरे को चैरिटी नहीं माँगता।”
“मेरा वो मतलब नहीं था...”
“मैं वार विडो। मेरे को हसबैंड का पेंशन मिलता। सन का पेंशन मिलता।”
“जी? बेटे का भी?”
“कारगिल में शहीद हुआ। कारगिल के टेम नाइंटी नाइन में ट्वेंटी नाइन इयर्स का था। मई में बार्डर पर एनेमी से फाइट करता जान से गया, येहीच दिनों में क्रिसमस पर शादी बनाने वाला था पण...”
वो फफक कर रो पड़ी।
“धीरज रखिये, मैडम।”—विमल द्रवित भाव से बोला—“धीरज रखिये। प्लीज कण्ट्रोल युअरसैल्फ।”
“उसका फादर, मेरा हसबैंड, सेवेंटी वन में, बंगलादेश लिब्रेशन वार में ढाका में लाइफ खोया, तब अपना फ्रेडो वन ईयर का था और मैं ट्वेंटी फोर इयर का था। मैं दो साल में विडो हो गया, मेरा सन एक साल में आर्फन हो गया। पण वान्दा नहीं, गाड आलमाइटी जैसा डेस्टिनी बनाया वैसा ही तो होना सकता! नो?”
सदा नगारा कूच का, बाजत आठों धाम।
“यस।”—विमल बोला।
“सेवेंटी से मैं काला घोड़ा का एक बिल्डिंग में फोर्थ फ्लोर पर टू रूम फ्लैट में रहता। पहले हसबैंड गया, पीछू सन गया, अभी उधर अकेला रहता। अभी मैं फिफ्टी एट इयर्स का है, मेरे को बोथ लैग्ज में गठिया है, चलना डिफीकल्ट, सीढ़ियाँ चढ़ना तो बहुत ही डिफीकल्ट। बिल्डिंग में लिफ्ट, इस वास्ते वान्दा नहीं।”
“आई सी।”
“पर फोर मंथ्स से लिफ्ट आउट आफ आर्डर। लैंडलार्ड रिपेयर नहीं कराता। बोलता है बहुत खर्चा। नहीं करना सकता। अभी मेरे को प्राब्लम। मैं फोर्थ फ्लोर तक सीढ़ियाँ नहीं चढ़ना सकता। मैं उसको अपना गठिया का प्राब्लम बोलता है तो वो र्यूडली बिहेव करता है, गाली देता है।”
“गाली देता है?”—विमल हाहाकारी लहजे से बोला—“आपको!”
“ऐसा कि आदमी लोग का सुनना डिफीकल्ट। मैं तो औरत।”
“आप की मंजिल पर और भी तो फ्लैट होंगे?”
“तीन और हैं न!”
“वो लोग लिफ्ट की शिकायत नहीं करते?”
“दो फ्लैट खाली। टू मंथस बैक खाली हुआ। तीसरे में एक यंग कपल जो अभी लास्ट मंथ मूव इन किया। उन को सीढी चढ़ने में प्राब्लम नक्को। लोअर फ्लोर्स के अदर टेनेंट्स को प्राब्लम नक्को। अभी उधर खाली मेरे को प्राब्लम।”
“वो कितना किराया भरते हैं?”
“ट्वेल्व थाउजेंड।”
“और आप?”
“टू थाउजेंड।”
“किरायेनामा है?”
“क्या बोला?”
“किरायेनामा। रैंट डीड। टेनेंसी एग्रीमेंट।”
“ओह, दैट! है न!”
“उसमें एस्केलेशन क्लाज है? किराये में सालाना बढ़ोत्तरी की कोई शर्त दर्ज है?”
“नो। ऐसा कुछ नहीं है।”
“आपने किरायेनामे की बाबत उसको बोला?”
“बोला।”
“जवाब में वो क्या बोला?”
“जो बोला, वो रिपीट करना डिफीकल्ट। फिर भी ब्रीफ में बोले तो बोला, शोव इट।”
“हूँ।”
विमल ने शोहाब की तरफ देखा।
“खाली कराना माँगता है।”—शोहाब धीरे से बोला।
“इसलिये जानबूझ कर तंग करता है!”
“और तो कोई वजह दिखाई नहीं देती!”
“हूँ।”—विमल फिर महिला की तरफ आकर्षित हुआ—“आप यहाँ कैसे पहुँची?”
“लोकल से आया न!”—वो बोली।
“वापिस टैक्सी पर जाइयेगा।”
“पण कैसे अफोर्ड करना सकता?”
“इस बार तो करना सकता।”—विमल ने पाँच सौ का एक नोट उसकी तरफ बढ़ाया—“आगे जीसस प्रोवाइड करेगा।”
“मैं थैंक्यू बोलता है पण चैरिटी नहीं माँगता।”
“ये चैरिटी नहीं है। सन मामा को कैब फेयर देगा तो वो चैरिटी कैसे होगा?”
“तुम मेरे को मामा बोला?”
“बोला न! बाई हार्ट बोला।”
“फिर लेता है।”—उसने झिझकते हुए नोट थाम लिया—“पर मेरा... वो प्राब्लम...”
“बड़ी हद दो दिन इन्तजार कीजिये, लिफ्ट चालू हो जायेगी।”
“ऐसा?”
“हाँ।”
“बहुत पक्की करके बोलता है?”
“हाँ, बहुत पक्की कर के बोलता है।”
“नहीं होयेंगा तो?”
“तो समझियेगा कि मैं गुड सन नहीं।”
“बाइबल पढ़ता है?”
“पढ़ता है।”
“तभी ऐसा बोलता है।”—वो उठ खड़ी हुई—“अभी जाता है।”
“जरूर। लेकिन लैंडलार्ड का नाम बता के जाइये, काला घोड़ा का पता बता के जाइये।”
दोनों की बाबत उसने बोला जो कि शोहाब ने नोट कर लिया।
“अब जाइये।”—विमल बोला।
“गॉड ब्लैस यू, माई सन।”
वो चली गयी।
इब्राहीम शेख ने बार में कदम रखा तो उसे ग्राहकों से और उनके शोर शराबे से भरपूर पाया। उसकी निगाह कुछ क्षण पैन होती हुई एक सिरे से दूसरे सिरे तक घूमी, फिर वो वहाँ से बाहर निकला और वापिस सड़क पर आ गया।
बार की इमारत के बाजू में एक संकरी, नीमअन्धेरी गली थी जिसमें से गुजरता वो पिछवाड़े में पहुँचा। इमारत के पिछवाड़े में एक चारदीवारी थी जिसके आगे तरह तरह के कबाड़ से भरा एक अहाता था। चारदीवारी में एक लोहे का दरवाजा था जिसे उसने धक्का दिया तो वो खुल गया। हिचकिचाते हुए उसने भीतर कदम रखा।
आगे इमारत में एक बन्द दरवाजा था जिसके ऊपर एक बीमार-सा बल्ब जल रहा था। उसके आजू बाजू खिड़कियाँ थीं जिन में से बायीं ओर की, दरवाजे के करीब की, एक खिड़की में रोशनी थी।
दबे पाँव वो आगे बढ़ा और उस खिड़की पर पहुँचा।
खिड़की पर पर्दा पड़ा हुआ था लेकिन वो उसे पूरी तरह से नहीं ढंके था। पर्दे में एक जगह यूँ झिरी बनी हुई थी कि उसमें से भीतर झाँका जा सकता था। सावधानी से उसने झिरी में आँख लगायी तो भीतर चार जनों को मौजूद पाया जिन में से एक उम्रदराज शख्स को और एक नौजवान लड़की को वो नहीं पहचानता था, बाकी दो में से एक बार का मालिक धीरज परमार था जिसे वो जानता पहचानता था और दूसरा मोहन बाबू पासवान था। वो लोग गम्भीरता से बातें कर रहे थे जिन की आवाज कभी कभार बाहर पहुँचती थी लेकिन बन्द खिड़की के मोटे शीशों की वजह से जिसे बाहर सुना-समझा जाना मुमकिन नहीं था।
वो खिड़की पर से हटा और दरवाजे पर पहुँचा। उसने दरवाजे को धक्का दिया तो वो खुल गया। निशब्द उसने भीतर कदम रखा और अपने पीछे दरवाजा बन्द किया। उसने आगे निगाह दौड़ाई।
गलियारा काफी लम्बा था और बार के फ्रंट तक पहुँचता जान पड़ता था। रोशनी वहाँ भी कोई खास नहीं थी क्योंकि वहाँ परले सिरे पर छत से लटका खाली एक बल्ब जल रहा था।
तभी बायीं ओर का एक दरवाजा खुला और तीखी रोशनी की आयत गलियारे के फर्श पर पड़ी।
वो जल्दी से बाहर निकला और दरवाजे की ओट में हो गया। उसने दरवाजे को हौले से यूँ बन्द किया कि वो चौखट से पूरी तरह से न मिल पाता और उसमें और चौखट में एक झिरी रह जाती।
उसने झिरी में आँख लगा ली।
रौशन दरवाजे से धीरज परमार बाहर निकला और गलियारे में ही एक करीबी दरवाजा खोल कर उसके पीछे गायब हो गया।
एक मिनट बाद फ्लश का पानी चलने की गड़गड़ की आवाज हुई जिस से स्थापित हुआ कि वो टायलेट था। और कुछ क्षण बाद परमार वहाँ से बाहर निकला और वापिस रौशन दरवाजे वाले कमरे में पहुँच गया। उसके पीछे दरवाजा यूँ बन्द हुआ कि रौशनी की आयत एक लकीर में बदल गयी।
शेख ने फिर गलियारे में पाँव डाला, वो दबे पाँव उस दरवाजे पर पहुँचा और कान लगाकर सुनने लगा।
“चौधरी साहब”—मोहन बाबू कह रहा था—“परमार यहाँ इसलिये मौजूद है क्यों कि पचास के माल के हाथ के हाथ पैंतीस अदा करने वाला ग्राहक इसने ढुँढ़वाया है।”
पचास! पैंतीस! लाख तो नहीं हो सकते थे। पैंतीस कमाने के लिए पाँच कौन खर्च करता था। करोड़! यानी कि उसे करोड़ों के माल की सूँघ ठीक लगी थी।
लेकिन माल क्या था?
शायद आगे पता चले।
“मुझे कोई एतराज नहीं।”—चौधरी के नाम से पुकारा गया शख्स कह रहा था—“जो तुम्हारा यार वो मेरा यार।”
“गुड।”
“वैसे है कौन वो?”
“बताओ, भई।”
“नाम मनकोटिया है।”—परमार बोला—“बड़ा व्यापारी है। दिल्ली और मुम्बई से भी आपरेट करता है। फिलहाल इस से ज्यादा कुछ बताना ठीक न होगा।”
“क्यों?”
“मनकोटिया ऐसा चाहता है।”
“हूँ।”
“अब अपने कारनामे की बाबत बताओ।”—मोहन बाबू बोला।
“ये वो इलैक्ट्रॉनिक गैजेट है जो मैंने तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद तैयार किया है। इस से मैंने उन का सिक्योरिटी सिस्टम पूरी तरह से ब्रेक कर लिया है। वक्त आने पर ये लाल बटन मैं तीन बार दबाऊँगा तो सारे इलैक्ट्रॉनिक डोर लॉक निशब्द रिलीज हो जायेंगे और वायरलैस रेडियो सिस्टम जाम हो जायेगा। इसके सौ फुट के रेंज में तब कहीं कोई मोबाइल फोन भी होगा तो वो सिग्नल नहीं पकड़ेगा इसलिये काम नहीं करेगा। मैं इसे आजमा के देख चुका हूँ। वक्त आने पर इसके सही काम करने की गारण्टी मेरी है।”
“क्रियु का क्या होगा?”
“टाइम शिड्यूल यूँ सैट किया गया है कि क्रियु तब कहीं और ही होगा। फिर भी वहीं होगा तो उन लोगों को मैं हैंडल करूँगा।”
“खत्म कर दोगे?”
“जरूरत पड़ी तो। लेकिन मुझे यकीन है जरूरत नहीं पड़ेगी।”
“ठीक।”
“इस स्कीम की खूबी ये है कि वारदात के बाद तलाश के मामले में उन की मुकम्मल तवज्जो खुश्की पर होगी। वक्त रहते किसी को नहीं सूझेगा कि ट्रक समुद्र पर पहुँचा हुआ था। और जब तक सूझेगा तब तक सब कहानी खत्म हो चुकी होगी।”
“इसी बात पर चियर्स हो जाये।”
“मैं इन्तजाम करता हूँ।”
शेख ने झिरी में आँख लगायी तो परमार को अपने स्थान से उठ कर दरवाजे की ओर बढ़ता पाया।
वो तत्काल दरवाजे पर से हटा और बाहर को लपका।
यार्ड में वो एक कूड़े के कनस्तर से टकरा गया।
स्तब्ध वातावरण ने टीन खड़कने की आवाज इतने जोर से गूँजी कि भीतर भी सुनी गयी।
“ये कैसी आवाज थी?”—चौधरी सशंक भाव से बोला।
“देखता हूँ।”—परमार बोला।
“मैं देखता हूँ।”—उछल कर खड़ा होता जगमोहन बोला।
बगूले की तरह वो वहाँ से बाहर निकला और बैकयार्ड की ओर लपका जहाँ से कि वो जानता था कि वो आवाज आयी थी। उसने देखा कि यार्ड की बाउण्ड्री वाल का दरवाजा खुला था। वो लपक कर उस दरवाजे पर पहुँचा, उसने बाहर झाँका तो गली के सिरे पर उसे मेन रोड की ओर लपकते एक साये की पीठ दिखाई दी।
उसने साये के पीछे दौड़ने की कोशिश न की, वो वापिस लौटा।
परमार और चौधरी उसे गलियारे के दहाने के दरवाजे पर मिले।
“कोई था?”—वो बोला।
“हाँ।”—जगमोहन वितृष्णापूर्ण भाव से बोला—“और मुझे मालूम है कि कौन था।”
“सूरत देखी?”
“सूरत नहीं देखी, फिर भी मुझे यकीन है कि वो इब्राहीम शेख था।”
“स्टीमर वाला?”
“वही।”
“यहाँ पहुँच गया? जासूसी करने?”
“ऐसा ही जान पड़ता है।”
“अब क्या होगा?”—चौधरी बोला।
“कुछ नहीं होगा।”—जगमोहन बोला—“वो एक खुराफाती शख्स था जिसने अपनी खुराफात की। बाज आता तो अच्छा होता। नहीं बाज आया तो भी हमें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।”
“उसने कोई पंगा किया तो?”
“वो पंगा करना अफोर्ड नहीं कर सकता। आखिर अभी उसने चार लाख रुपये और कमाने हैं।”
“पचास करोड़ कमाने के ख्वाब देखने लगा तो?”
“तो वो भी खत्म होगा और उसके ख्वाब भी खत्म होंगे।”
“आया क्यों? और उसे ये कैसे मालूम था कि कहाँ जाना था?”
जगमोहन कुछ क्षण सोचता रहा।
“मालूम करता हूँ।”—फिर बोला।
“मालूम करते हो?”—चौधरी सकपकाया।
“मैं उसके स्टीमर पर फिर जाता हूँ।”
“मैं साथ चलता हूँ।”—परमार बोला।
“जरूरत नहीं।”
पूर्ववत् एक टैक्सी पर सवार हो कर वो इब्राहीम शेख के स्टीमर वाले पायर के लिए रवाना हुआ।
आधे रास्ते में बूँदाबाँदी होने लगी।
उसके पायर पर पहुँचने तक वो तेज हो गयी।
जो कि अच्छी बात थी।
बारिश की वजह से ‘जलपरी’ के डैक पर कोई नहीं था।
उसने चुपचाप डैक पर कदम रखा। व्हील हाउस में रोशनी थी, वो खामोशी से उसकी सीढ़ियाँ चढ़ गया और अधखुले दरवाजे की ओट में ठिठक कर खड़ा हो गया। भीतर से आती आवाजों से लग रहा था कि वहाँ कई जने मौजूद थे जो कि कैप्टन और उसका क्रियु ही हो सकते थे।
“पचास करोड़!”—उसे दढ़ियल असलम की हैरानीभरी आवाज सुनाई दी—“बराबर सुना, बॉस?”
“अबे, मैं क्या बहरा हूँ?”—उसे इब्राहीम शेख की आवाज सुनायी दी।
“फिर तो, अल्लाह कसम, तुम्हारी सूँघ कमाल की है। पहले ही करोड़ों का बोल बोल दिया था।”
“अब सवाल ये है कि आइटम क्या होगी जो कि पचास की है और पैंतीस में बिकने वाली है।”
“हेरोइन!”
“पागल हुआ है! पचास करोड़ की हेरोइन मतलब पचास साठ किलो। इतना वजन क्या ट्रक में ढोना पड़ता है? बगल में दबा के ले जाया जा सकने वाला माल कोई स्टीमर में ढोता है?”
“सोना!”
“पचास करोड़ के सोने का मतलब है सैंकड़ों किलो। इतने सोने का उस छोटे से शहर में क्या काम?”
“वो किसी दूर दराज की बड़ी जगह से वहाँ लाया जाने वाला होगा?”
“तो ढुलाई उस बड़ी जगह से सीधे राजनगर क्यों नहीं?”
“अरे, असलम भाई”—कोई और बोला—“हमें आम खाने से मतलब है या पेड़ गिनने से!”
“बराबर बोला, अयूब।”—शेख की आवाज आयी—“लाख टके की बात ये है कि पचास करोड़ का माल—भले ही वो सोना हो या कोई और शै—हमारे स्टीमर पर होगा।”
“बॉस, क्या पक्की कर भी लिया कि माल कब्जाना है?”
“अभी कच्ची पक्की कुछ नहीं है। नेक ख्वाहिशात से ही नेक काम नहीं हो जाते, मियाँ। चौबीस की रात को जैसे हालात सामने आयेंगे उन के मुताबिक कोई हमें माफिक आने वाला कदम हम उठा सके तो ठीक है वर्ना समझ लेंगे माल ढोया, मजूरी कमाई।”
“ठीक।”
“दूसरी बात। हम कल सुबह सवेरे पौ फटने से पहले यहाँ से निकल रहे हैं।”
“कहाँ के लिए?”
“सुनामपुर के लिए और कहाँ के लिए!”
“सुनामपुर कल ही?”
“हाँ। जैसे यहाँ सूँघ ली वैसे एडवांस में पहुँच कर वहाँ सूँघ लेंगे। जैसे सूँघ में यहाँ कुछ पल्ले पड़ा, हो सकता है वहाँ भी कुछ पल्ले पड़े।”
“मसलन क्या?”
“मसलन ये कि वहाँ ऐसी कौन-सी जगह हो सकती है जहाँ सैंकड़ों किलो सोना मौजूद है या कहीं से पहुँचने वाला है!”
“ठीक।”
“अब तुम लोग चलो यहाँ से। सुबह पाँच बजे फिर मुलाकात होगी।”
तत्काल जगमोहन केबिन की पिछली दीवार की तरफ सरक गया।
सीढ़ियों पर से नीचे उतरते कदमों की आवाज आने लगी।
कुछ क्षण बाद सन्नाटा छा गया।
इब्राहीम शेख व्हील हाउस में ऑफिस टेबल के पीछे बैठा था। मेज पर उसने एक नक्शा फैलाया हुआ था जिस में वो राजनगर से लेकर सुनामपुर तक का कोस्टल एरिया स्टडी कर रहा था।
एकाएक हवा का एक झोंका वहाँ दाखिल हुआ जिस से नक्शा तनिक फड़फड़ाया।
शेख ने नक्शे पर से सिर उठाया तो सामने चौखट पर जगमोहन को खड़ा पाया।
“मोहन बाबू!”—उसके मुँह से निकला।
“तो ये इरादे हैं तुम्हारे और तुम्हारी कटलरी के!”
“तुमने... तुमने सब सुना?”
“तभी तो तुम्हारी जात औकात समझ में आयी।”
“हूँ।”—शेख बोला, उसका हाथ धीरे से मेज के दराज के हैंडल पर पड़ा, वो हौले हौले दराज को बाहर खींचने लगा।
जगमोहन ने जेब से गन निकाल कर हाथ में ले ली और अपलक उसकी तरफ देखा।
शेख का हाथ ठिठक गया, फिर वो वापिस मेज पर दिखाई दिया।
“गुड!”—जगमोहन सहज भाव से बोला।
“क्या चाहते हो?”
“हमको उन से वफा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफा क्या है।”
“मतलब की बात करो।”
“वो ही की है। सब्र न हुआ! मेरे पीछे ‘सी गार्डन’ पहुँच गये! जी तो चाहता है फोड़ दूँ लेकिन अभी अपना लाख रुपया वापिस ले कर ही तसल्ली करता हूँ।”
“माथा फिरा है! चील के घौंसले से मांस वापिस मिलता है। तू तो...”
जगमोहन ने फायर किया।
शेख के बायें कान की लौ उड़ गयी, गोली पीछे लकड़ी की दीवार में धँस गयी। उसके मुँह से एक घुटी हुई चीख निकली।
उसने अपना कान थाम लिया और उसमें से बहता लहू बटोरने लगा।
“इसे कहते हैं बोहनी करना।”—जगमोहन बोला—“आगे तू कुछ करता है या मैं ही करूँ?”
शेख ने खाली हाथ से दराज खोला और नोटों की गड्डी निकाल कर मेज पर डाली। उसी हाथ से उसने जेब से रूमाल बरामद किया और उसे अपने कान पर लपेटा।
“ये क्या हरकत की तुमने?”—वो कराहता-सा बोला।
“मैंने नहीं की। तुमने कराई।”
“फिर भी?”
“क्या फिर भी? हुआ क्या है? जरा-सा कान का खतना ही तो हुआ है! इतने से कुछ होता है?”
वो खामोश रहा।
“जाता हूँ। जुम्मेराती को मुलाकात होगी।”
उसके चेहरे पर हैरानी के भाव आये।
“होगी न?”
“तुम्हारा मतलब है”—वो बोला—“डील अभी भी कायम है?”
“हाँ। मजबूरी है। अब नये सिरे से किसी और से डील करने लायक वक्त नहीं है।”
“ओह! यानी कि मेरे मोहताज हो?”
“तू पागल है। ऐसा मोहताज कोई किसी का नहीं होता। तू मुझे हूल देगा तो मैं तेरे और तेरे क्रियु को शूट करूँगा, लाशें समन्दर में फेंकूँगा और स्टीमर अपने कब्जे में कर लूँगा।”
“हंह! चलायेगा कौन?”
“कोई तो चलायेगा लेकिन उसे देखने के लिए तू जिन्दा नहीं होगा।”
“मेरा यूँ जान से जाने का कोई इरादा नहीं।”
“अब की अक्ल की बात!”
“मुझे तुम्हारी बाबत सस्पेंस था जिसे मैंने दूर करने की कोशिश की थी, और मैंने कुछ नहीं किया।”
“अच्छा!”
“फिर भी मैं अपनी हरकत के लिए शर्मिन्दा हूँ।”
“गुड।”
“ख्वाब हर कोई देखता है, मैंने भी देखा इसलिये...”
“परवाह नहीं।”
“मैं जुम्मेराती को तयशुदा टाइम से पहले सुनामपुर में पायर पर पहुँचा मिलूँगा।”
“ये ही गड्डी तुम्हें वहाँ मिल जायेगी। बाकी की ऐसी चार, जैसे पहले बोला था, काम हो जाने के बाद।”
“ठीक है।”
“जाता हूँ।”
“शब्बाखैर।”
“पीछे से गोली चलाने का इरादा हो तो...”
“मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं।”
“... अंजाम सोच लेना। मैं अकेला नहीं हूँ।”
“अरे, बिरादर, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं।”
“गुड।”
वो केबिन से निकला और सीढ़ियाँ उतरकर नीचे डैक पर पहुँचा।
तब तक बारिश थमकर हल्की बूँदाबाँदी में तब्दील हो चुकी थी और डैक पर अपने एक जोड़ीदार के साथ मौजूद असलम डैक और पायर के बीच का टैम्परेरी पुल खोल रहा था।
“अभी रुको।”—जगमोहन बोला—“मेरे को पायर पर जाने दो।”
असलम सीधा हुआ, उसने घूमकर पीछे देखा।
“तुम!”—वो भौंचक्का-सा बोला—“तुम कहाँ से टपके?”
जगमोहन हँसा।
“आसमान से आया फरिश्ता...”—वो बोला।
“ऊपर से नीचे आ रहे हो! नीचे से ऊपर कब गये?”
“नहीं गया। आसमान से उतरा। बोला न! अब बाजू हट।”
“कोई गड़बड़ है। तुम यूँ नहीं जा सकते।”
जगमोहन के हाथ में गन फिर प्रकट हुई।
“कौन कहता है?”—वो बोला।
“कोई नहीं।”—दूसरा आदमी जल्दी से बोला—“जाओ, बिरादर।”
“शुक्रिया।”
विमल ने झिझकते सकुचाते जीतसिंह का मुआयना किया जो कि उसके सामने खड़ा बार-बार पहलू बदल रहा था और उससे निगाह मिलाने की ताब नहीं ला पा रहा था।
वो सताइस-अट्ठाइस साल का दुबला-पतला, मामूली शक्ल सूरत वाला नौजवान था जिसके सिर पर घने बाल थे और बालों जैसी घनी भवें थीं। उसकी सूरत पर संजीदगी थी और आँखों में अजीब-सी वीरानगी थी।
“बैठो।”—विमल बोला।
वो तनिक हड़बड़ाया लेकिन उसने बैठने का उपक्रम न किया।
“अरे, सुना नहीं, बड़ा बाप क्या बोला?”—इरफान सख्ती से बोला।
झिझकता-सा वो एक विजिटर्स चेयर पर यूँ बैठा जैसे उस पर पूरा भार डालने पर कोई कील चुभ सकता हो या वो टूट सकती हो। उसका जिस्म चाबी लगे उस खिलौने जैसा लग रहा था जो बटन दबाते ही उछलकर खड़ा हो सकता था।
“तो”—विमल बोला—“जीतसिंह नाम है तुम्हारा?”
“जी हाँ।”
“तालातोड़ हो?”
“जी हाँ।”—फिर व्यग्र भाव से बोला—“आकरे मुझे जानता है।”
“आकरे?”
“जो सुना है कि आजकल आपके साथ है।”
“तुम उसे कैसे जानते हो?”
“मेरा शार्गिद है। कैसा भी ताला खोल लेने से ताल्लुक रखती तमाम बारीकियाँ उसे मैंने सिखाई हैं।”
“तुमने सिखाई हैं? वो तो उम्र में तुम्हारे से बड़ा है।”
“फिर भी मेरा शार्गिद है।”
“लिहाजा खास हुनरमन्द हो?”
वो खामोश रहा।
“सूरत पर फटकार क्यों बरस रही है?”
उसने उत्तर न दिया।
“इश्क में खता खायी।”—इरफान बोला—“ऐश्वर्या राय जैसी बाई के इश्क में गिरफ्तार था, धोखा दे गयी, इसे छोड़कर एक बड़े-बड़े बच्चों के बाप बूढ़े खंडूस से शादी कर ली। खुदकुशी की कोशिश की तो कामयाब न हो सका। मैं ठीक बोला?”
जीतसिंह ने हौले से सहमति में सिर हिलाया।
“औरत और बस के पीछे नहीं भागना चाहिये, मेरे भाई”—विमल बोला—“एक निकल जाये तो दूसरी आ जाती है।”
“अब मेरी ऐसी कोई ख्वाहिश बाकी नहीं।”—जीतसिंह बोला।
“ये तुम्हारे दिमाग का नहीं, दिल का फैसला है। टूटे दिल की आवाज है। वक्त बड़े-बड़े गम भुला देता है। और इंसान के बच्चे को अतीत की तरफ नहीं, भविष्य की तरफ मुँह करके चलना चाहिये। विषम परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाना इंसान का काम है और उसी के बस का होता है। परिस्थितियों के अनुकूल बनना, बने रहना, पशु की प्रवृत्ति होती है। एक औरत के आगे दुनिया खत्म नहीं होती, मेरे भाई...”
विमल एकाएक खामोश हो गया। उसके जेहन पर दिवंगत तुकाराम का अक्स उभरा। एकाएक ही उसे अहसास हुआ था कि उस घड़ी ऐन वही बातें वो अपने सामने बैठे नौजवान को कह रहा था जो कभी तुकाराम ने उसे तब कहीं थी जब वो नीलम को बखिया के हाथों मर चुकी जान कर उसके वियोग में पी पी के जान देने पर तुला था।
कितना आसान था दूसरे को उपदेश देना! लेकिन जो तन लागे सो तन जाने।
“अभी”—इरफान बोला—“समझ में आया बड़ा बाप क्या बोला?”
जीतसिंह ने सहमति में सिर हिलाया।
“जमानत पर छूटेला है?”
“हाँ।”
“बेगुनाह फँसा?”
“नहीं।”
“तारदेव के सुपर स्टोर पर डकैती सच में डाली? बाद में जो कई खून हुए, वो सच में किये?”
“हाँ।”
“क्यों? बड़ा मवाली बनना चाहता है, इसलिये ताकत बताई?”
“नहीं।”
“तो?”
“हालात ने करवाया।”
“कौन से हालात ने करवाया? जो उस औरत की मुहब्बत से ताल्लुक रखते थे जिस पर टोटल फिदा था?”
“हाँ।”
“दौलत से दिल जीतना चाहता था?”
“हाँ।”
“कामयाब हुआ?”
“नहीं।”
“फिर क्या किया?”
“दौलत फूँक दी। साथ में खुद को फूँकने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहा।”
“अभी क्या इरादा है?”
“मेरे साथ फुँकने से जो रकम बच गयी, उसे इधर छोड़ के जाने का इरादा है और आइन्दा उस में इजाफा करने का, करते रहने का, इरादा है।”
“यानी कि वो हरकतें जारी रखने का इरादा है जिसकी वजह से जमानती है?”
“हाँ।”
“तो ये क्यों नहीं कहता कि खुदकुशी का नया तरीका तलाश कर लिया?”
वो खामोश रहा।
“अक्खा ईडियट! अबे घोंचू, जान है तो जहान है।”
“मेरे को जान की परवाह नहीं...”
“साले, मगज में जाला...”
“... इसलिये बॉस के साथ काम करना चाहता हूँ।”
“क्या?”
“मैं बॉस के गैंग में शामिल होना चाहता हूँ।”
“माथा फिरेला है? इधर कौन-सा गैंग है! अबे, खजूर, इधर खैरात बँटती है...”
“साहब जी”—वो व्यग्र भाव से विमल से सम्बोधित हुआ—“मैं आपकी खातिर...”
“इधर वो खातिर नहीं माँगता”—शोहाब बोला—“जो तू कर सकता है। फिर भी माँगता है तो जिसे तू अपना शार्गिद बोला, वो है न इधर!”
“मैं कुछ भी... कुछ भी कर सकता है। बॉस, आप हुक्म करके देखिये। मैं जान दे सकता हूँ, जान ले सकता हूँ।”
“हूँ।”—विमल ने गम्भीरता से हुँकार भरी।
“साहबजी, मैं पहाड़ी आदमी हूँ इसलिये ज्यादा जज्बाती हूँ। मैं सालों से मुम्बई में हूँ मैंने यहाँ रहकर यहाँ के तौर-तरीके सीखे, यहाँ की बद्कारियाँ सीखीं, वो तमाम लानतें सीखीं जो कोई ऐसे बड़े शहर में—जोकि इन्डिया की क्राइम कैपीटल कहलाता है—ही सीख सकता है लेकिन मन से इधर का कभी न बन सका। मैंने एक औरत से धोखा खाया तो जिन्दगी से बेजार हो उठा, मरना चाहा तो मर न सका। मेरा सारा जिस्म जला हुआ है लेकिन जिस्म से ज्यादा फफोले दिल पर हैं। ऐसे में मैंने आप से प्रेरणा पायी, आप से मुझे जीने का मकसद हासिल हुआ। अब आप क्यों वो मकसद मेरे से छीनना चाहते हैं?”
“तुम कोई रकम यहाँ छोड़ना चाहते हो?”
“जी हाँ। लेकिन मामूली। चिड़िया के चुग्गे जैसी। लेकिन वो पहला कदम है। सयाने कहते हैं, साहब जी, कि बड़े से बड़ा सफर पहले कदम से ही शुरू होता है। मैं आप से हाथ जोड़कर फरियाद करता हूँ कि आप वो पहला कदम मुझे उठाने दें।”
विमल ने अपने साथियों की तरफ देखा।
शोहाब से सहमति में सिर हिलाया।
“क्या है चिड़िया का चुग्गा?”—इरफान बोला।
“पैंतीस लाख रुपया।”
“ये पैसा”—विमल बोला—“तुम्हारे बेहतर काम आ सकता है।”
“नहीं आ सकता, साहब जी।”—जीतसिंह व्यग्र भाव से बोला—“आना होता तो आ चुका होता।”
“रोजी रोटी कैसे चलेगी?”
“वैसे ही जैसे आज तक चली।”
“ताले तोड़ कर?”
“अब झूठ कैसे बोलूँ, साहब जी! और तो मुझे कुछ आता नहीं!”
“कितनी उम्र है तुम्हारी?”
“अट्ठाइस साल।”
“चाहो तो अभी भी बहुत कुछ सीख सकते हो।”
“सीख सकता हूँ। सीख रहा हूँ। सीख चुका हूँ।”
“क्या सीख चुके हो?”
“आपका खिदमतगार बनना।”
“गैर का हुक्का भरते अपनी चिलम ठण्डी कर बैठोगे।”
“वान्दा नहीं, साहब जी।”
“गाँठ की रकम गँवाने में वान्दा ही है। पेट भरना मुहाल हो जायेगा।”
“नहीं होगा, साहब जी। जिसने पेट लगाया है, वो निवाला जरूर देगा।”
“किताबी बातें हैं। बातों से पेट नहीं भरता।”
“नहीं भरेगा तो समझियेगा कि याचकों में एक याचक और बढ़ गया।”
“काफी तैयारी कर के आया है।”—शोहाब धीरे से बोला।
“तू तोता तो नहीं?”—इरफान आँखें निकालता बोला।
“क्या बोला, बाप?”
“किसी का सिखाया पढ़ाया तो इधर नहीं पहुँचा हुआ?”
“अरे, नहीं, बाप। मेरे को कौन सिखाये पढ़ायेगा?”
“‘भाई’।”
“वो अब किधर रखा है? वो तो नप चुका!”
“कैसे मालूम?”
“हर कोई बोलता है। अण्डरवर्ल्ड में किसी से भी पूछ के देखो, बोलेगा ‘भाई’ खल्लास।”
“दफेदार!”—शोहाब बोला।
“फरार। दुबई भाग गया।”
“रहता किधर है?”
“चिंचपोकली।”
“उधर भी सबको यही बोल के रखा, चोर है, तालातोड़ है?”
“नहीं। मैं तालाजोड़ भी तो हूँ!”
“मतलब?”
“क्राफोर्ड मार्केट में एक तालों की दुकान है, उधर मेरा अड्डा है, उधर मैं तालों की मरम्मत का काम करने के लिए रेगुलर बैठता हूँ।”
“अभी किधर से आया?”
“चिंचपोकली से।”
“जायेगा किधर?”
“चिंचपोकली।”
“क्राफोर्ड मार्केट नहीं?”
“उधर का काम मैं मुकम्मल करके आया।”
“तू दफेदार को...”
“खत्म करो।”—विमल बोला।
शोहाब खामोश हो गया।
“जीतसिंह, महापुरुषों ने कहा है कि तुच्छ से तुच्छ वस्तु का दान भी प्रशंसनीय है। पैंतीस लाख रुपये की रकम को तो कैसे भी तुच्छ वस्तु नहीं कहा जा सकता। सर्वजनहिताय हम ये रकम सहर्ष कबूल करते हैं।”
“धन्यवाद, साहब जी।”—खुशी से दमकता जीतसिंह उछलकर खड़ा हुआ—“मैं जा के आता हूँ।”
“कहाँ से?”—इरफान सशंक भाव से बोला।
“बाहर टैक्सी से।”
“ओह! टैक्सी से। ले के आ।”
जीतसिंह बाहर को लपका और उलटे पाँव कार्डबोर्ड के एक बक्से के साथ लौटा। उसने बक्से को मेज पर रखकर खोला।
विमल ने तनिक उचक कर बक्से में भीतर झाँका और फिर बोला—“ओके, जीतसिंह, हम तुम्हारा ये अनुदान तुम्हारे और हमारे दोनों के लिए प्रभू की आज्ञा मानकर कबूल करते हैं।”
“थैंक्यू, साहब जी।”
“वो कहते हैं न कि साहूकार के लिए दिन भला, चोर के लिए रात भली, पर जो प्रभू की आज्ञा मानता है, उसके लिए दिन रात दोनों भले।”
“लाख रुपये की बात कही, साहब जी।”
“तो आज से हम फ्रेटरनिटी ब्रदर हुए।”
“जी, साहब जी!”
“बिरादरी भाई।”
“साहब जी, ये कहकर आपने जो मेरा आदर किया है, जो मेरा मान बढ़ाया है, उसे मैं ताजिन्दगी याद रखूँगा।”
खुशी खुशी वो वहाँ से रुखसत हुआ।
“तुम तो पारस पत्थर हो”—पीछे शोहाब बोला—“जो छूता है, सोना बन जाता है।”
“गलत।”—विमल बोला—“बिल्कुल गलत। देखा नहीं वो किस मंसूबे के साथ यहाँ से रुखसत हुआ था? इस मंसूबे के साथ रुखसत हुआ कि आइन्दा इस रकम में इजाफा करेगा, करता रहेगा। अब ये बताने की जरूरत है कि वो ऐसा कैसे करेगा?”
शोहाब खामोश रहा।
“मैं पारस पत्थर नहीं हूँ, मैं न किसी को सोना बना सकता हूँ न किसी के लिए अच्छा सबक बन सकता हूँ। मैं कुछ हूँ तो कोयला हूँ जो दहकता है तो जलाता है, बुझता है तो राख बनकर उड़ता है और मुँह सिर काला करता है।”
शोहाब ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर होंठ भींच लिये।
“मैं निरगुणिआरे को गुणु नाहीं, आपे तरसु पइयोई।”
“बाप, मैं एक बार तेरे को पहले भी बोला”—इरफान बोला—“तू इलैक्शन लड़। अपनी हस्ती मिटाकर अपने आपको पेश करने का तेरा इस्टाइल सबको फ्लैट कर देगा। फिर सब तेरे को ही वोट देंगे। लोगबाग साले लाख कोशिश करके इलैक्शन जीतते हैं, तू ऐसीच जीत जायेगा।”
“बस कर, बस कर।”
इरफान हँसता हुआ खामोश हो गया।
जगमोहन वापस ‘सी-गार्डन’ के पिछले कमरे में पहुँचा।
उस बार वहाँ सिर्फ चाचा भतीजी मौजूद वे।
जगमोहन ने तमाम वाकया बयान किया।
“कमाल है!”—दिलीप चौधरी बोला—“ऐसे आदमी पर तुम्हें अभी भी एतबार है?”
“मजबूरी है।”
“तुमने उस पर गोली चलायी”—मुग्धा चौधरी बोली—“उसका कान उड़ा दिया, ये बात वो भूल जायेगा?”
“कान सलामत है। जरा-सी लौ उड़ाई। नक्का झाड़ा। उँगली के नाखून की तरह।”
“फिर भी!”
“नहीं भूलेगा तो क्या करेगा?”
“कोई पंगा डालने की कोशिश करेगा।”
“समझदार होगा तो नहीं करेगा।”
मुग्धा ने अपने चाचा की तरफ देखा।
“बद्अक्ल होगा तब तो करेगा न?”—चौधरी बोला।
“हम सावधान रहेंगे। गाफिल नहीं होंगे तो वो हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।”
“आयेगा सही?”
“आयेगा। जो लाख रुपया मैंने उसे एडवांस दिया था, वो मैं वापस छीन लाया हूँ। अब वो पाँच लाख का तलबगार है। रकम की तलब उसे लायेगी।”
“न लायी तो?”
“तो बुरा होगा। प्राब्लम होगी।”
खामोशी छा गयी।
चौधरी साफ चिन्तित दिखाई दे रहा था।
“चिन्ता छोड़ो।”—जगमोहन आश्वासनपूर्ण स्वर में बोला—“चिन्ता करने से कुछ नहीं बनता बिगड़ता। चिन्ता ताकी कीजिये, जो अनहोनी होय। अनहोनी कोई नहीं होने वाली? या होने वाली है?”
चौधरी ने उत्तर न दिया।
“मुझे अपनी गाड़ी के बारे में कुछ और बताओ।”
“खास कुछ नहीं है बताने को।”—चौधरी बोला—“सिवाय इसके कि उसका साइज शक्ल वगैरह सब बैंक की बख्तरबन्द गाड़ी से मिलते हैं। एक विंड स्क्रीन नहीं मिलती, क्योंकि बख्तरबन्द गाड़ी की वो बुलेटप्रूफ है, और एक रंग नहीं मिलता। विंड स्क्रीन तब्दील हो जायेगी, रंग का काम भी वक्त रहते मुकम्मल हो जायेगा।”
“कौन करेगा?”
“दामोदर। मेरा भांजा।”
“कर लेगा?”
“बराबर। कोई कसर बाकी होगी तो जाकर मैं पूरी करूँगा।”
“वो गाड़ी तुम्हारे पास क्यों है?”
“मवेशी ढोने के काम आती है। नये खरीद कर लाते हैं या मण्डी में पुरानों को बेचने ले जाते हैं तो उसी के बन्द बक्से में ढोते हैं। कल शाम के बाद फासले से देखे जाने पर वो बैंक की बख्तरबन्द गाड़ी ही लगेगी।”
“हूँ।”
“वारदात के वक्त तुम्हारी ही वजह से मौकायवारदात पर एक हैलीकॉप्टर मौजूद होगा जिस को इस्तेमाल में लाना उन्हें जरूर सूझेगा। मेरा भांजा हमारी गाड़ी को नेशनल हाइवे पर छोड़ आयेगा जिस की वजह से उन लोगों का फोकस रोड रूट पर ही बना रहेगा।”
“वो गाड़ी ट्रेस नहीं की जा सकती?”
“की जा सकती है। वो सच में ही बिगड़ी खड़ी होगी और उसमें मवेशी बन्द होंगे। भांजा बोलेगा कि वो मकैनिक की तलाश में निकला हुआ था।”
“वो देखने में बैंक की गाड़ी जैसी होगी?”
“देखने में वो सदा से बैंक की गाड़ी जैसी है।”
“विंड स्क्रीन क्यों बदली?”
“टूट गयी थी। कई गवाह होंगे इस बात के।”
“नया रंग क्यों किया?”
“क्यों कि पुराना बिगड़ गया था। विंड स्क्रीन बदली तो रंग का भी नया कोट डाल दिया।”
“खुद?”
“भांजा मोटर मकैनिक रह चुका है, सब काम जानता है।”
“तुम्हारे पास हर बात का जवाब है—भांजे के पास भी जाहिर है कि होगा—फिर भी सख्त पूछताछ होगी।”
“हो। भांजा नहीं हिलने वाला।”
“हैलीकॉप्टर के जरिये जब एयर सर्वेलाँस होगी तो उन्हें असली गाड़ी नहीं दिखाई देगी?”
“नहीं दिखाई देगी। दो वजह से नहीं दिखाई देगी। एक तो असली गाड़ी गायब है, ये बात फौरन आम नहीं होने वाली। दूसरे जिस उजाड़ पायर पर हमने पहुँचना है, उस का शहर से निकलने के बाद का सारा रास्ता पेड़ों से ढंका है, गाड़ी हैडलाइट्स बन्द करके चलाई जायेगी तो वो ऊपर हैलीकॉप्टर से नहीं दिखाई देने वाली।”
“हूँ।”
“फिर”—मुग्धा बोली—“एस्केप रूट के मामले में पुलिस वाले भटके हुए भी तो होंगे!”
“सुना?”
जगमोहन खामोश रहा।
“हमारा अलग गाड़ी से जाना क्यों जरूरी है?”
“क्योंकि हमारे बैंक से और फिर पुलिस से निजात पाने के वक्त अलग-अलग होंगे।”
“हम इकट्ठे होने का इन्तजार कर सकते हैं, फिर तीनों बख्तरबन्द गाड़ी पर सवार हो सकते हैं।”
“हो सकते हैं लेकिन बेहतर तरीका ये ही है कि मैं बख्तरबन्द गाड़ी को पहले निकाल ले जाऊँ। यूँ पुलिस वालों की मुकम्मल तवज्जो अभी बैंक की तरफ ही होगी कि गाड़ी खिसकाई भी जा चुकी होगी।”
“उस पर तगड़ा पहरा हुआ तो?”
“तो तमाम पहरेदारों का खून मेरे सिर होगा।”
“हमारी उम्मीद के खिलाफ अगर गाड़ी का क्रियु गाड़ी के भीतर ही हुआ तो?”
“तो उन का भी खून मेरे सिर होगा। मैं अपनी इस इजाद से”—उसने जेब से निकालकर बड़े कैलकुलेटर के साइज का वो आला दिखाया जो वो पहले भी पेश कर चुका था—“गाड़ी की सैंट्रल लाकिंग खोलूँगा और भीतर नर्व गैस का एक ग्रेनेड उछाल दूँगा। वो चारों के चारों या लम्बी नींद के हवाले हो जायेंगे या हमेशा के लिए सो जायेंगे।”
“कमाल है! ऐसे खूँखार मिजाज के तुम लगते तो नहीं हो!”
“तुम लगते हो?”
जगमोहन हँसा।
एक बेमानी हँसी।
“बख्तरबन्द गाड़ी में अपने अलावा”—चौधरी बोला—“किसी और की—खासतौर से मुग्धा की—मौजूदगी मैं किसी और वजह से भी नहीं चाहता।”
जगमोहन की भवें उठीं।
“भगवान न करे ऐसा हो लेकिन अगर हुआ तो उस गाड़ी के साथ पकड़े जाने की सजा गम्भीर होगी। जो मैं नहीं चाहता कि मेरे अलावा किसी और को भुगतनी पड़े, खासतौर से मेरी भतीजी को। ये मेरे बड़े भाई की—जोकि आज इस दुनिया में नहीं हैं—इकलौती निशानी है; इसकी सलामती का, इसकी हिफाजत का, पूरा जिम्मा मेरे सिर है इसीलिये बख्तरबन्द गाड़ी में इसकी मौजूदगी मुझे कबूल नहीं।”
“हूँ। इस बात की क्या गारण्टी है कि वक्त आने पर तुम्हारा ये आला काम करेगा?”
“मैं गारण्टी हूँ।”
“कैसे गारण्टी हो? इसे आजमाने का कोई मौका तो तुम्हें मिला नहीं, और जहाँ तक मैं समझता हूँ मिलने वाला भी नहीं!”
“ये एक साईंटिफिक इंस्ट्रूमेंट है जो साईंटिफिकली बनाया गया है। मैंने इसे बैंक की गाड़ी पर नहीं आजमाया लेकिन ऐन बैंक की गाड़ी जैसी सैण्ट्रल लाकिंग पर बाकायदा आजमाया है और इसका काम पूरी तरह से तसल्लीबख्श पाया है।”
“लिहाजा ये पर्फेक्ट आला है, ये सब कुछ कर सकता है?”
चौधरी हिचकिचाया।
“लगता है”—जगमोहन उसे घूरता हुआ बोला—“कोई फच्चर है।”
“है तो सही लेकिन वो हमारे लिये कोई प्राब्लम नहीं खड़ी करेगा।”
“क्या है?”
“ये बख्तरबन्द गाड़ी की सैण्ट्रल लाकिंग खोल सकता है, उसे वापस बन्द नहीं कर सकता।”
“अच्छा!”
“हाँ। मुझे बहुत लेट मालूम हुआ था कि सैण्ट्रल लाकिंग सिस्टम के कम्प्यूटर कण्ट्रोल में लाकिंग की प्रोग्रामिंग जुदा थी, अनलाकिंग की प्रोग्रामिंग जुदा थी।”
“इससे फर्क क्या पड़ेगा?”
“प्रैक्टिकल फर्क कोई नहीं पड़ेगा। पहले ही बोला। बस, ये फर्क पड़ेगा कि गाड़ी के खुल जाने के बाद वो खुली ही रहेगी।”
“खुल तो जायेगी न?”
“गारण्टी से।”
“गाड़ी न खुली तो सब किया धरा मिट्टी हो जायेगा।”
“गाड़ी जरूर खुलेगी।”
“हूँ। अब तुम्हारा प्रोग्राम क्या है?”
“प्रोग्राम!”—वो सकपकाया।
“हाँ। तुम्हारा रात यहाँ ठहरने का भी इन्तजाम हो सकता है और तुम मेरे साथ खैरगढ़ मेरे घर भी चल सकते हो।”
“नहीं। हम वापस जायेंगे। दस बजे यहाँ से एक गाड़ी है हमारी तरफ की जिस में”—उसने अपनी कलाई घड़ी पर निगाह डाली—“अभी बहुत टाइम है।”
“ठीक है। मैं परसों शाम तक पहुँचूँगा।”—वो उठ खड़ा हुआ—“तब तक के लिए नमस्ते।”
इरफान बाहरले कमरे में रिसैप्शन पर बैठा रिसैप्शनिस्ट से बात कर रहा था जबकि हाथ में कार्डबोर्ड का एक बक्सा उठाये एक व्यक्ति वहाँ पहुँचा जो कि टैक्सी ड्राइवर की वर्दी पहने था।
विमल शोहाब के साथ तभी वहाँ से गया था, वो इमारत के पिछवाड़े से वहाँ से रुखसत हुआ था जो कि विमल की खामोशी से वहाँ आवाजाही का स्थापित जरिया था। इरफान बैंक से ताल्लुक रखते कुछ जरूरी काम निपटाने के लिए वहाँ रुक गया था। जो पैसा वहाँ जरूरतमन्दों को बाँटा जाता था, वो दो नम्बर का होता था लेकिन दिखावे के लिए तुकाराम चैरिटेबिल ट्रस्ट के नाम से एक बैंक अकाउंट चैम्बूर के एक राष्ट्रीयकृत बैंक से चलता था जिस के जरिये चैरिटी ड्राइव का तकरीबन फर्जी ब्यौरा रखा जाता था।
“क्या है?”—रिसैप्शनिस्ट बोला।
“अभी एक पैसेंजर मेरे को इधर ले के आया।”—टैक्सी ड्राइवर बोला—“वो इधर भीतर था तो मैं बाहर वेट करता था। वो वापस आ के टैक्सी में बैठा, मेरे को खार चलने को बोला पण कुर्ला से भी पहले उतर गया। वो चला गया तो मेरे को मालूम पड़ा कि अपना ये पेटी टैक्सी में छोड़ गया।”
“इधर काहे वास्ते आया?”
“ऐसीच एक पेटी वो इधर छोड़ के गया। इस वास्ते मैं सोचा कि ये पेटी भी मैं इधर छोड़ के जायेंगा तो उसको पेटी वापस मिलने का चानस बरोबर।”
“क्या है इसमें?”—इरफान बोला।
“बोले तो, वो ये पेटी भी इधरीच छोड़ना माँगता था पण भूल गया।”
“कौन?”
“पैसेंजर।”
“कौन पैसेंजर?”
“जो इधर आया।”
“कौन इधर आया?”
“जो ऐसा एक पेटी इधर छोड़ के गया।”
“तू जानता नहीं पैसेंजर को?”
“कैसे जानेंगा, बाप?”
“किधर से बिठाया?”
“विखरोली से।”
“तेरे को बाहर वेट करने को बोला?”
“बरोबर।”
“वापस विखरोली की जगह खार जाना माँगता था?”
“हाँ।”
“पेटी में क्या है?”
“कैसे मालूम होयेंगा?”
“खोल के नहीं देखा?”
“नक्को।”
“काहे? ,,
“सीलबन्द है न!”
“खुली होती तो देखता?”
“नक्को।”
“ईमानदार टैक्सी डिरेवर है! पैसेंजर का माल टैक्सी में छूट जाये तो छेड़ाखानी तो करता ही नहीं, लौटाने की कोशिश करता है।”
“ऐसीच है। अभी”—उसने पेटी को रिसैप्शन काउण्टर पर रखा और बाहर को बढ़ता बोला—“सँभालो, बाप।”
“थाम्बा।”—इरफान कड़क कर बोला।
वो ठिठका।
“अभी क्या है?”—फिर बोला।
“पेटी उठा।”
“पण।”
“पेटी उठा।”
“पण, बाप...”
“तू साला ईमानदार टैक्सी डिरेवर। मैं तेरे को शाबाशी देना माँगता है, ईनाम देना माँगता है।”
“क-क्या?”
“ये पेटी तेरा, तेरा बाप का। जो इसमें से निकले वो तेरा, तेरा बाप का।”
“पर मैं पैसेंजर का माल कैसे ले सकता है?”
“पैसेंजर इधर का खास। उसको वान्दा नहीं।”
“पण, बाप...”
इरफान ने गन निकालकर हाथ में ले ली।
“इधर आ।”—वो हिंसक भाव से बोला।
“पण, बाप...”
“चौखट पर मरना चाहता है तो मेरे को वान्दा नहीं।”
“नहीं, नहीं।”
मन मन के कदम रखता वो इरफान के करीब पहुँचा।
इरफान ने उसके माथे से गन की नाल सटा दी।
“किसने भेजा? कौन बोला तेरे को इधर आने को? कौन पेटी दिया तेरे को? कौन वाच करता था कि कोई भीड़ू ऐसीच एक पेटी इधर ले कर पहुँचा था? कौन तेरे को सिखाया कि इस पेटी के साथ इधर पहुँच कर तेरे को क्या बोलने का था?”
टैक्सी ड्राइवर के रहे सहे होश भी उड़ गये।
“जवाब दे।”—नाल उसके माथे में गड़ाता इरफान बोला।
“मैं...मैं उसको...जा-जा-जानता नहीं।”
“मेरे को जानता है?”
“ह-हाँ।”
“फिर भी तेरी ये मजाल हुई?”
“क्या करेंगा, बाप! वो भी कड़क बोलता था। भाव खाता था।”
“और रोकड़ा चमकाता था?”
“ह-हाँ।”
“कितना दिया?”
“दो... दो बड़े वाला गाँधी।”
“बड़े वाला या सबसे बड़े वाला।”
“सबसे बड़े वाला।”
“क्या बोला?”
“यहीच जो मैं अभी बोला। पैसेंजर का पेटी टैक्सी में छूट गया। पैसेंजर इधर आयेला था इस वास्ते इधर लौटाना माँगता था।”
“ये भी वो ही बताया कि पैसेंजर विखरोली से बैठा, वापस खार जाना माँगता था पण कुर्ला उतर गया?”
“नक्को, बाप। वो मैं अपने भेजे से लगाया। मेरे को किधर मालूम था कि इतने सवाल होयेंगा! वो भीड़ू तो बोला मैं इधर पेटी देंगा, तुम रख लेंगा।”
“हूँ। तो तेरे को नहीं मालूम कि पेटी में क्या है?”
“हाँ।”
“तो इसे उठाने के नाम से पेंदे से हवा क्यों सरक रयेला है?”
“वो...वो...वो क्या है कि...”
“तू दफेदार का आदमी है?”
“न-नहीं।”
“दफेदार के किसी आदमी का आदमी है?”
“नहीं। नहीं।”
“मैं तेरी बात का यकीन किया। पेटी उठा और जिसका भी आदमी है, उसको लौटा के आ।”
“म-मैं...मैं...”
“हाँ, त-तू-तू। उठा।”
“ब-बाप, मैं...मैं...”
“वान्दा नहीं। मैं तेरा हैल्प करता है।”
“हैल्प! हैल्प करता है?”
“अभी। फड़के”—इरफान रिसैप्शनिस्ट से बोला—“इसके हाथ पीठ पीछे बाँध।”
“क-क्या?”
इरफान ने रिवाल्वर की नाल माथे से हटा कर उसके मुँह में घुसेड़ दी। फड़के भीतर कहीं जाकर रस्सी लेकर आया जिससे उसने टैक्सी ड्राइवर के हाथ पीठ पीछे बाँधे। इरफान ने उसके मुँह में रूमाल ठूँसा और उसे बाहर खड़ी टैक्सी की पैसेंजर सीट पर बिठाया, फड़के ड्राइविंग सीट पर बैठा और टैक्सी को इमारत से परे ले गया। वहाँ उसने ड्राइवर की टाँगें भी रस्सी से आपस में बाँधीं और फिर उसके जिस्म को सीट के साथ बाँधा। इरफान ने पेटी लाकर उसकी गोद में रख दी।
ड्राइवर फटी-फटी आँखों से सब नजारा करता रहा।
“दस मिनट।”—इरफान बोला—“दस मिनट तेरे को ऐसीच इधर बैठने का है। उतने में कुछ न हुआ तो तू हवा का माफिक आजाद।”
उसने खिड़कियों के खुले शीशे चढ़ाये और चारों दरवाजे मजबूती से बन्द कर दिये।
बम पाँच मिनट में फटा।
चिरकुट को इनायत दफेदार के सामने पेश किया गया।
इनायत दफेदार, जो कि छोटा अंजुम की मौत के बाद से ‘भाई’ का खास था।
चिरकुट, जो ‘भाई’ के गैंग का आदमी था, ‘भाई’ के कत्ल की रात को विंस्टन प्वायंट के बंगले पर बाहर सड़क के दहाने पर बने वाच बॉक्स में मौजूद था और जो उस रात ये सोच के मौकायवारदात से कूच करते डेविड परदेसी के साथ हो लिया था कि ‘ ‘भाई’ मर गया तो अब इधर क्या रखा है’।
“इधर मेरी तरफ देख।”—दफेदार कर्कश स्वर में बोला।
चिरकुट ने बड़ी मेहनत से सिर उठाया।
“भाई से गद्दारी की? पीठ दिखा के भाग गया?”
“बाप, मेरे को... मेरे को परदेसी ने बहकाया।”
“क्या बोला वो?”
“बोला कत्ल का मामला था। कातिल बाहर से आया था पण किसी को इस बात पर ऐतबार नहीं आने वाला था। उधर पुलिस आती तो यही समझती कि कातिल बंगले पर मौजूद लोगों में से कोई था। फिर वो सबको गिरफ्तार कर लेती।”
“सब को?”
“ऐसीच बोला, बाप। बहुत खौफ खा के बोलता है, बाप, वो तो बोला कि तुम्हेरे को भी गिरफ्तार कर लेती।”
“ऐसा बोला वो?”
“हाँ, बाप।”
“उस बंगले में किसी बाहरी आदमी का दाखिला नामुमकिन था। भीतर से किसी ने मदद की, तभी कोई कल के इरादे से वहाँ कदम रख पाया। अब मेरे को पक्का मालूम है कि ‘भाई’ से गद्दारी करने वाला वो भीड़ू कौन था!”
“कौन था?”
दफेदार ने एक झन्नाटेदार झांपड़ चिरकुट के चेहरे पर रसीद किया।
“साले, हलकट!”—दफेदार हिंसक भाव से बोला—“तेरे को नहीं मालूम?”
“परदेसी।”—कराहता-सा चिरकुट बोला।
“और कौन? बहुत बड़ा खेल खेल गया हरामजादा! फिर इसीलिये भाग गया क्योंकि उसे मालूम था कि उसकी करतूत पर से पर्दा उठके रहना था। साथ में तेरे को भी ले गया।”
“बाप, मैं उसकी बातों में आ गया। ‘भाई’ मर गया, ये खबर ही ऐसी थी कि मुझे लगा कि सब खत्म था।”
“कौन बोला ‘भाई’ मर गया?”
“बाप!”
“कौन बोला?”
“परदेसी बोला न! बोला माथे में गोली...”
“कन्धे में...कन्धे में लगी गर्दन के करीब।”
“तो...तो...”
“अभी दुबई में है और बिल्कुल ठीक हो चुका है। अभी लौटेगा तो सबको फाड़ के खा जायेगा।”
“बाप, खता हुई कि मैं परदेसी की बात का यकीन किया।”
“तेरी खता एक ही सूरत में माफ हो सकती है।”
“किस सूरत में, बाप?”
“परदेसी को ठोक। ठोक नहीं सकता तो उसका पता निकाल, फिर मैं ठोकेगा।”
“बाप, मैं कैसे...”
“यहीच एक तरीका है तेरी जानबख्शी का। जो बोला वो कर वर्ना ‘भाई’ का कहर अपने सारे कुनबे पर बरपा होने का इन्तजार कर।”
“नहीं, बाप, नहीं। ऐसा जुल्म न करना।”
“और परदेसी का माफिक गायब होना चाहे तो खुशी से हो जाना। कुनबे का क्या है, सब की मौत की खबर तो तू छापे में भी पढ़ लेगा।”
“नहीं। नहीं।”
“परदेसी को ठोक। या उस का पता निकाल। फिर तू भी सेफ और तेरा कुनबा भी सेफ।”
“मैं करता है, बाप।”
“निकल ले।”
फटकार बरसती सूरत के साथ भारी कदमों से चलता वो वहाँ से रुखसत हुआ।
तभी हैदर वहाँ पहुँचा।
दफेदार ने गौर से उसकी सूरत देखी।
“तेरी सूरत से लगता है”—वो बोला—“चैम्बूर में लोचा!”
“ऐसीच है, बाप।”—हैदर बोला—“पता नहीं उन लोगों को कैसे शक हो गया! जो बम इमारत में फटना था, वो बाहर टैक्सी में फटा।”
“खाली टैक्सी में?”
“खाली में किधर, बाप! उन लोगों ने टैक्सी डिरेवर के हाथ पाँव बाँध कर उसे टैक्सी में बिठाया और उसकी गोद में बम वाली पेटी रख दी।”
“उन्हें शक कैसे हुआ?”
“क्या मालूम, बाप! वो डिरेवर ही बता सकता था पण वो तो खल्लास।”
“वान्दा नहीं। वान्दा नहीं। अब हम को पक्की कर के मालूम है कि सोहल उधर आता है। अभी फिर कोशिश करेंगे।”
“ठीक।”
“मेरे को फिर भी अफसोस कि एक बढ़िया मौका हाथ से निकल गया।”
“पेटी की वजह से।”
“क्या बोला?”
“डुप्लीकेट पेटी का इन्तजाम करने में टेम लग गया। पेटी वाला भीड़ू उधर अपनी टैक्सी से उतर कर पेटी साथ लेकर जाता तो वान्दा नक्को पण वो खाली हाथ भीतर गया, थोड़ा टेम बाद लौट के आया, पेटी ले कर भीतर गया और उसके बाद बहुत थोड़ा टेम भीतर ठहरा। डुप्लीकेट पेटी का इन्तजाम उस बहुत थोड़े टेम में न हो सका। टेम ज्यास्ती लगना ही शायद उन लोगों के शक की वजह बना। हमारा डिरेवर हाथ के हाथ डुप्लीकेट पेटी के साथ पहुँच जाता तो...”
“तो कोई और पंगा पड़ जाता। जब कोई काम नहीं होना होता तो कुछ भी पंगा हो जाता है।”
“बरोबर बोला, बाप।”
“हमारा टेम खराब चल रहा था। अभी ठीक होगा तो सब ठीक हो जायेगा।”
“बढ़िया।”
“भाई के कत्ल की अफवाह ने हमें तोड़ दिया। लेकिन अब धीरे-धीरे हालात काबू में आ रहे हैं। मेरे को ‘भाई’ की पहले जैसी साख बना के रखने का है।”
“भाई की?”
“बरोबर। ‘भाई’ के बड़े नाम से ही ये काम होगा।”
“लेकिन ‘भाई’ तो...”
“जैसे अन्डरवर्ल्ड में ये अफवाह मजबूती पकड़ गयी है कि ‘भाई’ खल्लास, वैसीच मेरे को ये बात ठीक से बिठाने का है कि ‘भाई’ जिन्दा है और अभी दुबई में रैस्ट करता है। कोई दुबई जा के इस बात की तसदीक नहीं कर सकता क्योंकि ‘भाई’ को कोई नहीं जानता था। कोई साला उसका सूरत नहीं देखा, कोई साला नहीं जानता था कि ‘भाई’ किधर से आता था, किधर को जाता था। अभी मैं सब सैट करेगा।”
“पण, बाप...”
“क्या?”
“जानबख्शी करो तो बोलूँ?”
“बोल।”
“बाप, ‘भाई’ की साख तो उसके कत्ल की अफवाह से पहले ही बिगड़ गयेली थी। अन्डरवर्ल्ड में भीड़ू लोग फुसफुसाता था कि ‘भाई’ दिल्ली से दुम दबाकर भाग आया; पिट कर, नंगा होकर आया और ऐसा पिलपिला गया कि...”
“मालूम! सब मालूम! मैं सब सैट करेगा।”
“गुस्ताखी माफ, बाप। अगर कर सकते थे तो इतना टेम क्यों वेस्ट किया? पहले ही क्यों न किया?”
“क्यों कि पहले मेरे को बिग बॉस का विश्वास जीतने का था।”
“बिग बॉस?”
“रीकियो फिगुएरा। वो मेरी पीठ पर हाथ रखने में टेम लगाया। अभी वो मेरे को तीन महीने का टेम दिया है मेरा ताकत बनाने को और साबित कर के दिखाने को कि मैं ‘भाई’ की जगह लेने के काबिल है।”
“बाप, क्या करोगे?”
“पूछ, क्या नहीं करूँगा! अभी कल रात वो मेरे को खुद फोन करके ऐसा बोला, मैं आज से ही एक्शन में है। अभी मैं एक इस्ट्रेटजी बनायेला है, मैं कल से ही उस पर अमल शुरू करता है।”
“क्या करने का है, बाप?”
“मालूम पड़ेगा। कल मालूम पड़ेगा। कल मेरे को अपनी पहली चाल अन्डरवर्ल्ड के उन हरामी भीड़ूओं के मुँहों पर ताला जड़ने को चलने का है जो ‘भाई’ को खल्लास हो गया समझ कर समझते हैं कि कुछ भी भौंक सकते हैं।”
“बढ़िया।”—हैदर आश्वासनहीन स्वर में बोला।
शाम छ: बजे के करीब एक वर्दीधारी सब-इन्स्पेक्टर चैम्बूर में तुकाराम के घर वाली इमारत के सामने अपनी मोटरसाइकल पर से उतरा।
इरफान किसी की ऐसी ही आमद की प्रत्याशा में वहाँ मौजूद था।
सब-इन्स्पेक्टर अभी मोटरसाइकल को स्टैण्ड पर लगा रहा था कि गार्ड ने जाकर इरफान को खबर की।
इरफान रिसैप्शन पर से उठ कर भीतरी आफिस में जा बैठा।
गार्ड ने सब-इन्स्पेक्टर को वहाँ पहुँचाया।
“ये लोहकरे साहब है।”—गार्ड बोला—“आप से मिलना माँगता है।”
“खुशामदीद!”—इरफान जबरन मुस्कराता बोला।
सब-इन्स्पेक्टर बड़े दबंग भाव से एक कुर्सी पर बैठ गया और इरफान को घूरने लगा।
“क्या है?”—इरफान अविचलित स्वर में बोला।
“मैं तुम्हें पहचानता हूँ।”—सब-इन्स्पेक्टर रूखे स्वर में बोला।
“मैं नक्को।”
“क्या नक्को?”
“मैं नहीं पहचानता।”
“ये क्या जवाब हुआ?”
“तुम सरकारी आदमी हो, तुम्हारी मालूमात उम्दा हैं; मैं मामूली आदमी हूँ मेरी मालूमात मामूली हैं इसलिये मेरी मामूली मालूमात के दायरे में तुम नहीं आते हो, ये जवाब हुआ।”
“हूँ। दोपहरबाद इधर एक वारदात हुई थी?”
“हुई थी।”
“क्यों?”
“क्यों क्या मतलब?”
“ऐसी वारदात यहीं क्यों होती हैं?”
“मालूम करो।”
“पहले भी यहाँ ऐसे ही एक टैक्सी में बम फटा था जिसमें एक पादरी की जान गयी थी। अब फिर टैक्सी में बम फटा और टैक्सी का ड्राइवर जान से गया।”
“भीड़ू, मैंने बिजली के बारे में सुना था कि वो एक जगह दो बार नहीं गिरती, बम की बाबत ऐसा कुछ नहीं सुना मैं।”
“इधर क्या होता है?”
“क्या होता है क्या मतलब?”
“क्यों ऐसे लोग यहाँ आते हैं जो जब यहाँ से रुखसत होते हैं तो जान से जाते हैं?”
“बढ़िया। तुमने तो तमाम मामला ही रफा दफा कर दिया। चोर की माँ को ही थाम लिया। अब जाओ जा के इन्तजाम करो कि लोग इधर न आया करें; आयेंगे नहीं, तो जाहिर है कि जाती बार कुछ नहीं होगा। वो मुमकिन न हो तो बोलना टैक्सी में न आया करें। टैक्सी में ही आने की जिद करें तो बोलना टैक्सी को रोक के न रखा करें। वो भी मुमकिन न हो तो ये जरूर ही बोलना कि साथ में बम न लाया करें।”
“ये कौन-सी जुबान बोल रहे हो तुम मेरे से?”
“आसान। जो तुम्हारी समझ में आ सके।”
“यहाँ क्या होता है? मेरा मतलब है किस चीज का आफिस हे ये?”
“चैरिटेबल ट्रस्ट का। तुकाराम नाम का एक पैसे वाला भीड़ू इधर रहता था जो मर गया तो पब्लिक की खिदमत के लिए इधर ये ठीया बना गया।”
“तुम्हारा यहाँ क्या काम है?”
“मैं ट्रस्ट का अदना मुलाजिम हूँ और ट्रस्टी का भरोसे का आदमी हूँ।”
“तुम तो... तुम तो...”
“जुबान सँभाल के बोलना।”
“ट्रस्टी कौन है?”
“राजा गजेन्द्र सिंह।”
“उसे बुलाओ।”
“वो बड़ा आदमी है। जुहू के फाइव स्टार डीलक्स होटल सी-व्यू का मौजूदा मालिक है। ओरियण्टल होटल्स एण्ड रिजार्ट्स का डायरेक्टर है।”
“बुलाओ।”
“नौकरी से बेजार जान पड़ते हो?”
“क्या!”
“राजा साहब से तुम्हारा कमिश्नर मिलता है तो झुककर के पहले सलाम करता है।”
“मैं कुछ नहीं जानता...”
“अरे भीड़ू, तभी तो बढ़ बढ़ के बोल रहा है। कुछ जानता होता तो ऐसी फरमायश करने की तो दूर, तेरी यहाँ कदम रखने की मजाल न हुई होती।”
“ये एक बड़ी वारदात है...”
“जिसकी तफ्तीश तेरे से बड़ा अफसर करके जा चुका है। चैम्बूर थाने का थानेदार खुद आयेला था तफ्तीश के लिए। वो तफ्तीश कर गया, लाश चीर-फाड़ के महकमे को भिजवा गया, टैक्सी टो करवा के ले गया, अब तेरे को इधर क्या माँगता है?”
“हमें पता चला है कि टैक्सी ड्राइवर के हाथ पीठ पीछे बाँध कर, उसके मुँह में कपड़ा ठूँस कर उसको उसकी टैक्सी में बिठाया गया था और उस की गोद में बम रखा गया था।”
“बम रखा गया था?”
“एक कार्डबोर्ड का बक्सा रखा गया था जिसमें कि शर्तिया बम था।”
“कौन बोला ऐसा?”
“एक गवाह बोला।”
“वो गवाह ये भी बोला वो टैक्सी डिरेवर इधर आया था और इधर से ही निकला था?”
“हाँ।”
“कौन है वो गवाह? उसे बुलाओ और बोलो मेरे सामने ऐसा बोले।”
“मैं इस की जरूरत नहीं समझता।”
“मैं तेरी इधर हाजिरी की जरूरत नहीं समझता।”
“क्या!”
“तू थाने से आया है?”
“हाँ।”
“उस थाने से जिसके अन्डर में ये जगह आती है? चैम्बूर थाने से?”
वो तनिक हिचकिचाया और बोला—“हाँ।”
“मैं अभी चैम्बूर थाने में थानेदार को फोन लगाये और बोले कि उसके थाने का उसका मातहत सब-इन्स्पेक्टर लोहकरे तफ्तीश के लिए इधर आयेला है तो वो इस बात की तसदीक करेगा?”
वो बगलें झाँकने लगा।
“तेरे को कोई पंगा करने के लिए कोई इधर भेजा, जिसको ये खुशफहमी कि तू हुक्म देगा तो किसी को भी इधर तलब कर लेगा। अब जा के अपने उस बाप को बोल कि तेरी इधर पेश नहीं चली और बतौर रिश्वत जो नजराना हासिल हुआ है वो वापिस कर, अभी हासिल होना है तो उसका गम खा और ठण्डे ठण्डे निकल ले यहाँ से।”
उसने कुछ कहने के लिए मुँह खोला लेकिन इरफान ने उसे हाथ उठाकर रोक दिया।
“अभी चुप कर।”—वो बोल—“अभी और सुन। डीसीपी डिडोलकर को जानता था? तू अदना सब-इन्स्पेक्टर, महकमे के इतने बड़े साहब को जानता तो क्या होगा पण नाम जरूर सुना होगा। अन्डरवर्ल्ड के भाई लोगों के हाथों फुल बिका हुआ पुलिसिया था वो, मई के महीने में नटराज होटल के एक कमरे में कुत्ते की मौत मरा था, तू तो खाली सब-इन्स्पेक्टर है; जिस लाइन पर चल रहा है, उस पर तेरा क्या होगा रे कालिया?”
“मैं देख लूँगा।”—वो उछल कर खड़ा हुआ—“मैं तुम सब को देख लूँगा।”
“अभी मेरे को तो देख।”
“गिरफ्तार कर लूँगा।”
“अरे, कर न, भीड़ू। मैं चूँ भी नहीं करेंगा।”
“मैं फिर आऊँगा।”
“मैं फिर खुशामदीद बोलूँगा।”
वो दरवाजे की ओर बढ़ा।
“एक बात सुन के जा।”—पीछे से इरफान बोला।
वो ठिठका, घूमा।
“है तो असली पुलिसिया ही न?”
उसने चेहरे पर बड़े कठोर भाव आये।
“असली ही है। पण ये मेरे को पक्की तू कोई तफ्तीश करने नहीं आया, तू किसी की शह पर किसी खास मकसद से इधर आयेला है। मेरे को मालूम तू नहीं बतायेगा इसलिये मैं नहीं पूछेगा वो खास मकसद क्या है। ऐसीच तू उसका नाम भी नहीं बोलेगा जिसकी शह पर इधर आयेला है। भीड़ू, नाम मैं बोलता है, तू खाली हाँ न बोल उसकी बाबत।”
उसकी भवें उठीं।
“दफेदार ने भेजा तेरे को?”
“दफेदार!”
“इनायत दफेदार। जो दुबई के ‘भाई’ की जिन्दगी में उसका खास होता था। जो इधर उस का नुमायन्दा होता था। दफेदार बोला तेरे को इधर आने को? हाँ, तो कितना नजराना पेश किया? दस? बीस? तीस? पचास? एक पेटी? दो पेटी? तू दफेदार का पता बोल और इधर से दस पेटी ले के जा। अभी ले के इधर से जा। खाली पता बोल। बोलता है क्या?”
उसने जवाब न दिया, वो घूमा और वहाँ से रुखसत हो गया।
रात साढ़े आठ बजे विमल ने राजा गजेन्द्र सिंह के सैक्रेट्री कौल के बहुरूप में अपोलो पायर रोड पर स्थित याट क्लब में कदम रखा।
वो बहुरूप था : आँखों में प्लेन नीले रंग के कांटेक्ट लेंस और ऊपर से प्लेन ग्लासिज वाला तार के फ्रेम वाला चश्मा, नथुनों में फँसी प्लास्टिक की दो गोलियाँ जिनकी वजह से नाक पकौड़े जैसी फूली हुई, फ्रेंच कट दाढ़ी मूँछ, अधपके बालों वाला विग और सामने के, असली दांतों के ऊपर चढ़ाये हुए दो दांत नकली।
जिस्म पर वो काले रंग का उम्दा सूट पहने था और सफेद कमीज के साथ लाल टाई लगाये था।
वो रिसैप्शन पर पहुँचा।
“मैं होटल सी-व्यू से आया हूँ।”—वो बोला—“होटल के मौजूदा मालिक, एनआरआई फ्रॉम नैरोबी, लास्ट बीकन ऑफ रायल फैमिली आफ पटियाला, राजा गजेन्द्र सिंह का सैक्रेट्री हूँ। मेरे को शहजाद दादरवाला से मिलना है। मेरे को पता चला है कि वो शाम की इस घड़ी यहाँ होते हैं। अगर वो नहीं हैं तो मैं इन्तजार करना चाहता हूँ, हैं तो...”
“हैं। बार में हैं।”
“मैं उन को पहचानता नहीं हूँ...”
रिसैप्शनिस्ट ने अपने करीब खड़े एक युवक की तरफ देखा।
युवक ने तत्काल सहमति में सिर हिलाया और रिसैप्शन के पीछे से बाहर निकला।
विमल उसके साथ हो लिया।
युवक बार में पहुँचा और उसके आगे चलता एक कोने की एक मेज की तरफ बढ़ा जहाँ एक उम्रदराज शख्स तनहा बैठा ह्विस्की चुसक रहा था और सिगार के कश लगा रहा था।
“रुको।”—विमल व्यग्र भाव से बोला।
युवक ठिठका।
“वो सिगार पीते साहब शहजाद दादरवाला हैं?”
“जी हाँ।”
“मुझे टेबल तक पहुँचाने की जरूरत नहीं, आगे मैं उनसे खुद मिल लूँगा।”
“ठीक है।”
“यहाँ बार सर्विस तो सिर्फ मेम्बर्स के लिए होगी?”
“जी हाँ।”
“मैं तो मेम्बर नहीं हूँ लेकिन अगर मैं एक ड्रिंक हासिल करना चाहूँ तो...”
“आपके लिए कोई प्राब्लम नहीं, सर। आप इतने बड़े होटल के मालिक के सैक्रेट्री हैं।... मैं बारमैन को बोल देता हूँ।”
“थैंक्यू।”
युवक के पीछे पीछे वो बार पर पहुँचा। युवक बारमैन की तरफ झुक कर कुछ फुसफुसाया और फिर वहाँ से चला गया।
विमल एक ऊँचे बार स्टूल पर बैठ गया।
“क्या सर्व करूँ, सर?”—बारमैन आदर से बोला।
विमल ने पीछे ह्विस्कीज के डिस्प्ले पर निगाह दौड़ाई और फिर बोला—“मिस्टर दादरवाला कौन-सी ह्विस्की पीते हैं?”
“ब्लैक लेबल, सर।”
“नीट? ऑन रॉक्स? विद सोडा? ऑर वाटर?”
“विद सोडा।”
“आई विल हैव ए लार्ज ब्लैक लेबल विद सोडा।”
“यस, सर।”
“एण्ड पे इन कैश नाओ।”
“यस, सर।”
बारमैन ने जाम और बिल उसके सामने रखा।
तीन सौ साठ रुपये।
विमल ने चार सौ रुपये अदा किये और फिर जाम की तरफ हाथ बढ़ाने से पहले जेब से पाइप निकाल कर सुलगाया।
फिर उस की तीखी निगाह शहजाद दादरवाला पर केन्द्रित हुई।
रज्ज के कमीना माईंयवा।
उसने अपना जाम उठाया और स्टूल से उतर कर उसकी टेबल पर पहुँचा।
“मिस्टर दादरवाला?”—वो अदब से बोला।
उसने सिर उठाया।
“यस!”—वो अनमने भाव से बोला।
“मेरा नाम कौल है, मैं राजा गजेन्द्र सिंह का पर्सनल सैक्रेट्री हूँ।”
“वो कौन हुए?”
“आज की तारीख में राजा साहब के नाम से नावाकिफ तो कोई नहीं!”
वो खामोश रहा।
विमल ने एक आह भरी और फिर राजा साहब की महिमा का बखान किया।
“तो?”—वो बोला।
“उन के भेजे मैं आप की खिदमत में हाजिर हुआ हूँ और दो मिनट आप से बात करना चाहता हूँ।”
“यहाँ मैं रिलैक्स करने आता हूँ और अपने रिलैक्सेशन के मूड में डिस्टर्ब किया जाना पसन्द नहीं करता।”
“हर रूल की एक्सेप्शन होती है, जनाब। जरूरत पड़ने पर कभी कभार रूल्स को नजरअन्दाज करने में कोई हर्ज नहीं होता।”
“किस की जरूरत?”
“राजा साहब की। हो सकता है आप की भी हो।”
“हूँ। बैठो।”
“थैंक्यू, सर।”
“बोलो, क्या कहना चाहते हो?”
“सर, आप की काला घोड़ा के इलाके में एक इमारत है जिसके कई फ्लैट आपने किराये पर उठाये हुए हैं।”
“तो?”
“उन में आप की एक पुरानी किरायेदार मिसेज मैग्नारो हैं जो कि चौथी मंजिल के एक छोटे से फ्लैट में तनहा रहती हैं क्योंकि खाविंद और बेटा दोनों जंग में मारे गये। इस वक्त अट्ठावन साल की हैं और उन की आमदनी का इकलौता जरिया वो पेंशन है जो...”
“कम टु दि प्वायंट। कम टु दि प्वायंट।”
“आई एम कमिंग टु दैट।”
“कम सून। स्पेयर दि डिटेल्स। जो बातें मुझे मालूम हैं, उन को दोहराने से परहेज करो।”
“फिर तो आप को ये भी मालूम होगा कि उस बिल्डिंग की लिफ्ट चार महीने से खराब है!”
“मालूम है। और ये भी मालूम है कि लिफ्ट खराब होने की उस औरत के अलावा किसी को शिकायत नहीं है।”
“क्योंकि गठिया की सतायी सिर्फ वो है और इस उम्र में सब से ऊँची मंजिल पर सिर्फ वो रहती है।”
“उसे तकलीफ है तो वो वहाँ रहना छोड़ सकती है।”
“छोड़ के कहाँ जायेगी, जनाब?”
“इतनी बड़ी मुम्बई है, कहीं भी जाये। कहीं जा कर ग्राउन्ड फ्लोर पर रहे। प्राब्लम फिनिश।”
“जनाब, आपने इस बात की तरफ तवज्जो नहीं दी कि उसकी आमदनी का इकलौता जरिया उसके खाविन्द और बेटे की पेंशन है जिस के सदके वो इस महंगे शहर में दाल रोटी का जुगाड़ करना अफोर्ड कर ले तो गनीमत है।”
“ये मेरी प्राब्लम नहीं है, ये उसकी प्राब्लम है।”
“आपने बिल्कुल ठीक फरमाया लेकिन...”
“इतने सालों से वो साली बुढ़िया दो हजार रुपये किराये में रह रही है, कहीं किसी यतीमखाने में जा के मरे, कहीं किसी ओल्ड होम में जा के मरे।”
“आखिर तो मरेगी ही। आखिर तो हर किसी ने मरना होता है; उसने भी, मैंने भी”—विमल एक क्षण ठिठका और फिर बोला—“आपने भी।”
“क्या!”
“नथिंग पर्सनल, सर, ओनली हाईपोथेटिकल।”
“तुम्हारे राजा साहब का उससे क्या लेना देना है?”
“लेना देना इत्तफाक से बन गया। बन गया तो उसकी व्यथाकथा सुन कर राजा साहब पसीज गये।”
“दैट्स वैरी गुड। अब अपने पसीजे हुए राजा साहब को बोलो कि उसे होटल में रख लें।”
“वो ऐसा कर सकते हैं। उन्हें यकीनन कोई एतराज नहीं होगा क्योंकि वो पटियाले के शाही खानदान से हैं और उन का दिल दरिया है। लेकिन ऐसा इसलिये नहीं हो सकता क्यों कि आप की टेनेंट को, मिसेज मैग्नारो को, उस गैरतमन्द औरत को—जो एक बहादुर खाविंद की बीवी है और एक बहादुर बेटे की माँ है—चैरिटी कबूल नहीं।”
“बारह हजार रुपये किराये के फ्लैट में दो हजार रुपये में रहती है, ये भी तो एक तरह से चैरिटी है; लैंडलार्ड की चैरिटी जो कि उसे बराबर कबूल है।”
“गुस्ताखी माफ जनाब, आप की बात दुरुस्त नहीं है। किराया आप ने मुकरर्र किया था और किरायेनामे में किराये में सालाना बढ़ोत्तरी की कोई शर्त आपने दर्ज नहीं की थी...”
“मुझे नहीं पता सन सत्तर में मैंने क्या किया था?”
“सब तहरीर में है।”
“जहन्नुम में जाये तहरीर। वो औरत वहाँ नहीं रह सकती, चाहे वो तुम्हारे राजा साहब के पास हाजिरी लगाये, चाहे किसी महाराजा साहब के पास फरियाद ले के जाये। एण्ड दैट्स फाइनल।”
“सर!”
“यस। दैट इज फाइनल। मैं बुढ़िया का लिहाज कर रहा हूँ, मैं चाहूँ तो उसे जबरन निकाल बाहर कर सकता हूँ। फोर्ट के इलाके के थाने का एचएचओ मुझे दिन में छ: बार सलाम करता है। ऊपर एसीपी से जब मिलता हूँ कहता है, ‘जनाब, कोई खिदमत अर्ज फरमाइये’ और ऊपर उस डिस्ट्रिक्ट का डीसीपी मेरे साथ बैठ के ह्विस्की पीता है।”
“बस कीजिये, जनाब, ऐसे तो आप खुदा तक पहुँच जायेंगे।”
“तुम बस करो। बन्द करो बुढ़िया की हिमायत करना। उसकी मजबूरियों, दुश्वारियों का जितना मर्जी जज्बाती खाका तुम मेरे सामने खींचो, मैं...”
“मुझे आप से आपके ऐसे ही जवाब की उम्मीद थी।”
“फिर तो बात खत्म हुई!”
“नहीं, अभी नहीं हुई, अभी जरा-सी और बाकी है।”
“वो भी बोली।”
“अगर वो पूरा किराया भरे तो...”
“कैसे भरेगी?”
“वो आपकी प्राब्लम नहीं। आप जवाब दीजिये। अगर वो पूरा किराया भरे तो?”
“एकाध महीना पूरा किराया भरने से कुछ नहीं होने वाला।”
“अगर वो हमेशा पूरा किराया भरे तो?”
“तो?”
“जी हाँ। तो?”
“आई विल क्रॉस दैट ब्रिज वैन आई रीच इट।”
“यू हैव रीच्ड दि ब्रिज।”
“क्या मतलब है तुम्हारा?”
विमल ने जेब से निकाल कर उसके सामने पाँच सौ के नोटों की एक गड्डी रखी।
“दिस इज दि ब्रिज।”—वो बोला—“नाओ, प्लीज क्रॉस इट।”
वो सकपकाया।
“किराये का माहाना फर्क दस हजार रुपये का है। ये पचास हजार रुपये हैं जो कि आइन्दा मई तक के लिए काफी हैं। मई में मैं फिर हाजिर हो जाऊँगा।”
“तुम हाजिर हो जाओगे?”
“राजा साहब का हुक्म बजाने के लिए। नोट काबू में कीजिये।”
“कमाल है!”
“और ये ड्रिंक।”
विमल ने अपना अनछुआ गिलास उसके सामने रख दिया।
“आपका फेवरेट ब्रांड। जानी वाकर ब्लैक लेबल विद सोडा। कर्टसी राजा साहब।”—विमल उठ खड़ा हुआ—“घर जा कर दुआ कीजियेगा कि आप जीते रहें और पीते रहें। गुडनाइट, सर। स्वीट ड्रीम्स।”
दादरवाला भौंचक्का-सा उसका मुँह देखने लगा।
विमल जाने को घूमा, ठिठका, वापिस घूमा।
“एक बात का जिक्र करना मैं भूल गया।”—वो बोला—“बल्कि दो बातों का जिक्र मैं भूल गया।”
दादरवाला की भवें उठीं।
“आजकल कोलाबा में आपका बहुत बड़ा प्रोजक्ट चल रहा है। बहुत बड़े प्लाट पर कंस्ट्रक्शन जारी है, पाँच फ्लोर बन भी गये हैं, सुना है इमारत तेरह तक जायेगी।”
“ग्यारह तक।”
“वो भी कुछ कम नहीं।”
“बिल्कुल ठीक। मैं पुराना बिल्डर हूँ लेकिन मेरी लाइफ का वो सब से बड़ा प्रोजेक्ट है। मेरा सारा पैसा उसमें लगा हुआ है, काफी पैसा बैंक से लोन भी लिया है लेकिन अभी और लेना पड़ेगा।”
“राजा साहब की तरफ से अपने बिगैस्ट प्रोजेक्ट पर मुबारकबाद कबूल फरमाइये।”
“थैंक्यू। दूसरी बात?”
“हाँ, दूसरी बात। दूसरी बात मैं आपको ये बताना चाहता था कि राजा साहब फिलहाल रहते भी होटल सी-व्यू में ही हैं।”
“मुझे क्यों बता रहे हो?”
“शायद ये रकम”—विमल ने उसके सामने पड़ी नोटों की गड्डी की तरफ इशारा किया—“आप उन्हें लौटाना चाहें।”
अपने पीछे अवाक् दादरवाला को छोड़ कर विमल वहाँ से रुखसत हुआ।
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