इंस्पेक्टर शाहिद खान होटल के सामने टैक्सी का दरवाजा खोलकर जल्दी से उतरा। उसके शरीर पर वर्दी थी और दोनों बांहों में नन्हें से बच्चे को संभाल रखा था। उतरकर वो भागने वाले अंदाज में सामने की तरफ भागा। उसकी वर्दी की वजह से टैक्सी ड्राईवर चाहकर भी उसे किराये के लिये नहीं कह सका।
वहां का माहौल भी कुछ ऐसा ही हुआ पड़ा था कि देखते ही बनता।
शहर का नामी-गिरामी सैवन स्टार होटल में भीतर और बाहर पुलिस की ही वर्दियां नजर आ रही थीं। हर तरफ पुलिस वाले। पुलिस सायरनों की आवाजें। पुलिस कारों ने वहां की हर जगह पर कब्जा कर रखा था। वो जगह इस वक्त किसी पुलिस छावनी से कम नहीं, लग रही थी।
शाहिद खान के होंठ भिंचे हुए थे। चेहरा सख्त था। माथे पर गुस्से की वजह से बल नजर आ रहे थे। दोनों हाथों से बच्चा थामें वो पुलिस वालों के बीच में से, होटल की इमारत की तरफ बढ़ा। मात्र डेढ़ घंटा पहले वो भी यहां था और यहां के जानलेवा हालातों से बाखूबी दो-चार हुआ था। पहले तो किसी ने उसे पहचाना नहीं, जब पहचाना तो पुलिस वाले उसकी तरफ दौड़े।
“शाहिद खान।”
“इंस्पेक्टर शाहिद खान।”
“शाहिद साहब, जिन्हें देवराज चौहान जैसा डकैती मास्टर अपनी आड़ बनाकर तीस अरब के जेवरातों के साथ निकल भागा था। बच्चे के साथ वापस आ गया-सुनो।”
शाहिद खान जल्दी से होटल के कम्पाउण्ड में जा पहुंचा। उधर ही प्रदर्शनी वाले हॉल का प्रवेश द्वार था। शाहिद खान पुलिस वालों से घिरता जा रहा था।
तभी एक ए०सी०पी०, इंस्पेक्टर शाहिद खान के करीब पहुंचा।
“तुम-तुम वापस आ गये शाहिद खान।” ए०सी०पी० के स्वर में खुशी और राहत के भाव थे।
“सर।” शाहिद खान अपने ऑफिसर के सामने अलर्ट हुआ- “इस बच्चे के मां-बाप कहां हैं?”
“उधर-वो कमरा इस वक्त पुलिस वालों का कंट्रोल रूम बना हुआ है। वो वहां…”
इंस्पेक्टर शाहिद खान ने पूरी तरह सुना ही नहीं और उधर तेजी से बढ़ गया।
“इंस्पेक्टर शाहिद खान।” पीछे से ए०सी०पी० ने पुकारा।
“आया सर।” शाहिद खान ने बिना पीछे देखे कहा और उस कमरे के दरवाजे पर पहुंचा। दरवाजा खुला था और बाहर दो कांस्टेबल मौजूद थे। उसे देखते ही दोनों ने सैल्यूट मारा।
बच्चे को संभाले शाहिद खान भीतर प्रवेश कर गया। वो कमरा इस वक्त किसी पुलिस स्टेशन के कमरे से अलग नहीं लग रहा था। दो वायरलैस सैट चालू थे। हर कोई व्यस्त नजर आ रहा था। भागा-दौड़ी का आलम था। एक तरफ दो पुलिस कमिश्नर और एक इंस्पेक्टर इन्हीं हालातों के बारे में बातचीत कर रहे थे। एक इंस्पेक्टर कोने में खड़ा मोबाइल फोन पर बात कर रहा था। जब इंस्पेक्टर शाहिद खान ने भीतर प्रवेश किया, तब तीन पुलिस वाले तेजी से बाहर निकलते जा रहे थे कि एकाएक ठिठक गये उसे देखकर। चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे।
“सर आप?” एक के होंठों से निकला।
“इतनी जल्दी वापस आ गये। देवराज चौहान...।”
“इस बच्चे के मां बाप कहां हैं?” इंस्पेक्टर शाहिद खान के होंठों से कठोर स्वर निकला।
“वो-उधर...” तीसरे ने इशारा किया।
इंस्पेक्टर शाहिद खान ने उधर देखा।
कमरे के कोने में पड़े सोफा चेयर पर बच्चे के मां-बाप बैठे थे। देखते ही शाहिद खान ने पहचान लिया था। उस औरत ने भी उसे देख लिया था। वो उठी और पागलों की तरह चीखते हुए उसकी तरफ दौड़ी।
“बच्चा-मेरा बच्चा।” पास पहुंचते ही उसने झपटकर शाहिद खान के हाथों से बच्चे को लिया और अपने सीने से लगा लिया। रो रही थी वो। फफक रही थी। बच्चा वापस मिलने की खुशी का वो रोकर इजहार कर रही थी। और करती भी क्या, इस वक्त।
औरत के चीखने की आवाज सुनकर वहां मौजूद सब पुलिस वालों का ध्यान उधर हुआ तो उन्हें मालूम हुआ कि इंस्पेक्टर शाहिद खान वापस आ गया है।
उस औरत का आदमी भी पास आ पहुंचा था। उसकी आंखों में आंसू थे। शाहिद खान को देखते हुए उसने कांपते हाथ जोड़े। कुछ कहने को हुआ शाहिद खान से। इंस्पेक्टर शाहिद खान ने उसके जुड़े दोनों हाथों को अपने हाथ में दबाया और गहरी सांस लेकर गम्भीर स्वर में कह उठा।
“कुछ भी कहना मत।”
“भैया।” औरत रोते-फफकते कह उठी- “मुझे...मुझे तो विश्वास ही नहीं आ रहा कि मेरा बच्चा।”
“बहन।” इंस्पेक्टर शाहिद खान की आंखों में पानी चमका- “मैंने तेरे को विश्वास दिलाया था कि बच्चे को कुछ नहीं होगा। देख ले। वापस ले आया। कुछ नहीं हुआ। जा अब पुलिस को अपना काम करना है।”
तभी दोनों पुलिस कमिश्नर उनके पास आये।
“इंस्पेक्टर शाहिद खान।” एक पुलिस कमिश्नर ने व्यग्रता से कहा- “हमें खुशी है कि तुम इतनी जल्दी लौट आये और सलामत हो। क्या हुआ वो दोनों तुम्हें कहां ले गये और...”
“मेरे पीछे तो सब ठीक रहा।” इंस्पेक्टर शाहिद खान कह उठा- “वो दोनों बारूद मैन जो...।”
“एक ने खुद को विस्फोट से उड़ा लिया।” दूसरे कमिश्नर ने गम्भीर स्वर में कहा- “लेकिन दूसरे को जिन्दा पकड़ लिया गया है। उसे फौरन पुलिस कस्टडी में, हैडक्वार्टर भेज दिया गया।”
“किसी पुलिस वालों या निर्दोष नागरिक की जान तो नहीं गई?” शाहिद खान का स्वर कठोर था।
“बारूद मैन पर, एक कांस्टेबल ने काबू पाने के लिये छलांग लगा दी थी, लेकिन वो उस विस्फोट में ही उड़ गया। उसका शरीर ज़रा-ज़रा चीथड़ों में बंटकर बिखर गया। होटल की पार्किं में जगह-जगह खून के निशान बिखरे पड़े हैं। शहीद हो गया वो। उसकी लाश के टुकड़े इकट्ठे करना भी शायद सम्भव नहीं हो...।”
इंस्पेक्टर शाहिद खान पलटकर बाहर की तरफ भागा।
“शाहिद खान-।” पीछे से पुलिस कमिश्नर ने पुकारा।
शाहिद खान दरवाजे तक पहुंच चुका था।
“इंस्पेक्टर शाहिद खान।” दूसरे पुलिस कमिश्नर ने आदेश भरे लहजे में पुकारा।
शाहिद खान नहीं रुका।
निकल गया वो बाहर।
दौड़ते-दौड़ते वो पुलिस वालों को पार करके, गैलरी से होते हुए होटल से बाहर निकला और साईड में मौजूद विशाल पार्किंग में पहुंचकर ठिठक गया।
मात्र डेढ़ घंटा पहले की घटना थी। परन्तु धुंआ अब भी उठ रहा था। एक कार के जले टुकड़े हर तरफ बिखरे पड़े थे।
कार का बचा ढांचा, जल कर इस कदर बिगड़ गया था कि पहचानना कठिन हो रहा था कि वो कभी कार रही होगी। आस-पास की कारों पर भी जलने के और खून के छींटे पड़े नजर आ रहे थे। ये मंजर देखकर शाहिद खान अंदाज लगा सकता था कि जब विस्फोट हुआ होगा तो कैसा हुआ होगा। देखने वालों के मन में कितनी दहशत आ ठहरी होगी। भिंचे दांत और कठोर निगाहों से इंस्पेक्टर शाहिद खान हर तरफ देखे जा रहा था।
तभी दोनों पुलिस कमिश्नर उसके पास आ पहुंचे।
“शाहिद खान।” एक कमिश्नर ने कठोर स्वर में कहा- “तुम हमारे पुकारने पर भी नहीं रुके।”
शाहिद खान पलटा और दोनों पुलिस कमिश्नरों को देखकर गम्भीर स्वर में बोला।
“सर! मैं देखना चाहता था और अनुमान लगाना चाहता था कि यहां क्या हुआ होगा।”
“देख लिया-अनुमान लगा लिया तो हम सवाल पूछें तुमसे। देवराज चौहान के आदमी, अरबों के जेवरातों के साथ तुम्हें और उस बच्चे को अपनी हिफाजत के लिये साथ ले गये थे। तुम वापस कैसे आये। कहां छोड़ा उन्हें तुम्हें। कौन थे वो। उन्हें पहचाना क्या। उनके बारे में कुछ जान पाये या....।”
“सर।” इंस्पेक्टर शाहिद खान ने गम्भीर स्वर में टोका- “सिर्फ एक सवाल, फिर मैं आपके बिना सवालों के ही सारे जवाब दे दूंगा।”
“क्या?”
“इंस्पेक्टर वानखेड़े साहब की कोई खबर?”
“वानखेड़े की...नहीं...वानखेड़े की कोई खबर नहीं। क्यों क्या बात है?” पुलिस कमिश्नर साहब के होंठों से निकला।
इंस्पेक्टर शाहिद खान के होंठ भिंच गये। फिर कठिनता से होंठ खोले और कह उठा।
“वानखेड़े साहब की जान खतरे में है सर। देवराज चौहान ने साबित कर दिया कि दौलत पाने के लिये वो हर बुरी हद पार कर सकता है।”
पाठकों उपन्यास और कहानी का पूरा मजा लेने के लिये आप दुर्गा पॉकेट बुक्स में देवराज चौहान सीरीज का पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘डकैती तेरे नाम की’ पढ़ें तो, इस कहानी को पढ़ने का मजा तिगना हो जायेगा। मजा खराब न हो और ये कहानी आप बिना किसी रुकावट के पढ़ सकें, इसके लिये पूर्व प्रकाशित ‘डकैती तेरे नाम की’ की अहम घटनाओं को आपके सामने रखा जा रहा है ताकि इस उपन्यास का भी आप पूरा मजा ले सकें।
‘डकैती तेरे नाम की’ में आपने पढ़ा कि शहर का जाना-माना ज्वैलर्स रनवीर भण्डारी कर्जे के नीचे दबा हुआ है और वो जानता है कि अगले दो महीनों में वो फुटपाथ पर आ जायेगा। तभी ज्वैलर्स संघ की तरफ से विदेशों की तर्ज पर हीरे-जेवरातों की प्रदर्शनी लगाने की तैयारी शुरू की जाती है कि देश-विदेश की मशहूर मॉडल्स सात सितारा होटल में, जेवरातों को पहनकर वहां आने वाले अमीरों को सात दिन तक दिखायेगी और उसके बाद होटल के उसी हॉल में उन जेवरातों को बेचने के लिये रखा जायेगा। जिनकी कुल कीमत पच्चीस-तीस अरब है। रनवीर भण्डारी मजबूरी में फंसा उन अरबों की जेवरातों की डकैती करने का फैसला करता है और इसके लिये किसी तरह देवराज चौहान से सम्बन्ध बनाता है। सब कुछ पसन्द आने पर देवराज चौहान, अरबों की डकैती के लिये योजना बनाना शुरू कर देता है। रनवीर भण्डारी का खास आदमी प्रवेश गोदरा सारा मामला जानता है।
उसकी गर्ल फ्रेंड जो कि देश की मशहूर मॉडल है और स्मैक लेने की आदत रखती है, रूपा ईरानी, वो ज्वैलर्स संघ की तरफ से होने वाली जेवरातों की प्रदर्शनी के लिये बुक हो चुकी है। ऊंटी में उसने बहुत बड़ी जगह ले रखी है। उसका कहना है कि वो उससे शादी करेगी जो उस जमीन पर महल जैसा बंगला बनाकर देगा। परन्तु वो आदमी उसकी पसन्द का भी होना चाहिये। जबकि वो दिल ही दिल में प्रवेश गोदरा को पसन्द करती है। रूपा ईरानी बेहद खूबसूरत है। प्रवेश गोदरा भी उसे पसंद करता है। शादी करने में कोई एतराज नहीं रखता, परन्तु उसको स्मैक लेने की आदत की वजह से, प्रवेश गोदरा कम से कम उससे शादी की इच्छा नहीं रखता। वैसे हर तरह के उनमें सम्बन्ध कायम हैं। उधर प्रवेश गोदरा की सत्ताईस बरस की बहन देवी गोदरा विनोद खुराना नाम के, तीस बरस के ऐसे युवक के बच्चे की मां बनने वाली है जो कालगर्ल्स के धंधे से जुड़ा हुआ है।
यूं वो शरीफ है। परन्तु काम-धंधा न होने की वजह से, उसे ये काम करना पड़ रहा है। घर से उसे निकाल दिया गया है। देवी गोदरा अपने भाई प्रवेश गोदरा से कहती है कि वो विनोद खुराना के बच्चे की मां बनने वाली है। उनसे शादी करना चाहती है।
परन्तु विनोद खुराना की असलियत जान कर प्रवेश गोदरा सख्ती से मना कर देता है कि उस घटिया शख्स से उसकी शादी नहीं होने देगा। जबकि देवी गोदरा का ये फैसला पक्का है कि वो विनोद खुराना से ही शादी करेगी। इधर प्रवेश गोदरा रनवीर भण्डारी से मिलता रहता है और सब जानता है कि देवराज चौहान अरबों की डकैती की तैयारी में है। प्रवेश गोदरा अपने दोस्त कमल शर्मा के साथ मिलकर देवराज चौहान को ब्लैकमेल करने की चेष्टा करता है और बड़ी रकम की डिमांड रखता है कि अगर उसे रकम नहीं दी तो होने वाली डकैती की पोल वो पहले ही खोल देगा। ऐसे मौके पर देवराज चौहान समझदारी से काम लेता है और प्रवेश गोदरा को एक करोड़ देकर कहता है कि डकैती में उसका साथ दे। डकैती कामयाब होने पर उसे दस अरब की दौलत दी जायेगी। इस बात की गारण्टी जगमोहन देता है। इस तरह प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा डकैती करने के लिए उनके साथ आ मिलते हैं। तब सोहनलाल, देवराज चौहान को बताता है कि प्रवेश गोदरा की गर्लफ्रेंड रूपा ईरानी, जेवरातों की प्रदर्शनी में बतौर मॉडल काम कर रही है। देवराज चौहान वहां की सिक्योरिटी के बारे में मालूम करता है। सिक्योरिटी सख्त है। उधर प्रवेश गोदरा, अपनी गर्ल फ्रेंड रूपा ईरानी को बताता है कि वो देवराज चौहान के साथ मिलकर डकैती करने जा रहा है। उसके बाद उसके पास दौलत ही दौलत होगी। रूपा ईरानी उसे ये काम करने से मना करती है। परन्तु वो नहीं मानता। देवराज चौहान के लिये करोड़ रुपया, प्रवेश गोदरा अपनी बहन देवी गोदरा को संभालने को कहकर, देवराज चौहान के पास चला जाता है डकैती के लिये। देवी गोदरा, फोन पर होने वाली बातें और कमल शर्मा से होने वाली बातें सुनकर जान जाती है कि उसका भाई डकैती करने के फेर में है। जब गोदरा उसे ये कहकर जाता है कि वो पन्द्रह दिन बाद लौटेगा तो देवी गोदरा समझ जाती है कि वो देवराज चौहान के पास डकैती करने जा रहा है। उसके जाते ही वो फोन करके अपने प्रेमी विनोद खुराना को बुलाती है और दो टूक उसे फैसला लेने को कहती है कि वो अपने बुरे धंधे को छोड़कर, आज ही उससे शादी करके, इस शहर से निकल चले। जैसे-तैसे थोड़ा बहुत कमाकर अपना गुजारा कर लेंगे। विनोद खुराना, देवी गोदरा से सच्चा प्यार करता है वो फौरन देवी गोदरा की बात मानकर मन्दिर में जाकर उससे शादी करता है। वापस आकर देवी उसे करोड़ रुपये के बारे में बताती है, जो उसका भाई वहां छोड़ गया था। विनोद खुराना दौलत को चैक करता है और बताता है कि नोट नकली हैं यानि कि करोड़ में से सिर्फ चौंतीस लाख के जेवरात ही असली थे। नई जिन्दगी शुरू करने के लिये ये रकम बहुत थी। वो चौंतीस लाख के जेवरों के साथ उसी दिन मुम्बई छोड़ देते हैं। उधर डकैती की तैयारी में देवराज चौहान, जगमोहन, सोहनलाल, प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा के साथ होटल में ठहरता है। डकैती के लिये चूंकि हथियार उस होटल के हॉल में पहुंचाने थे। वहां मॉडल के रूप में मौजूद रूपा ईरानी इस काम को आसानी से कर सकती है। इसके लिये प्रवेश गोदरा रूपा ईरानी को तैयार करता है कि हॉल के बाथरूम के फ्लश टैंकों में रिवॉल्वरों को पहुंचा दे। रूपा ईरानी कठिनता से इस बात को मानती है कि इस काम के बाद वो कोई बुरा काम नहीं करेगा और खुद रूपा ईरानी स्मैक लेना छोड़ देगी और दोनों शादी कर लेंगे। ये बात तय होने के बाद वो उसे दिल से अपना पति मान लेती है और वायदे के अनुसार आठवें दिन जब अरबों के जेवरातों को, हॉल में बेचने के लिये शीशे के छोटे-छोटे शो केसों में रखा जाता है तो उस दिन पांच रिवॉल्वरों और नकाबों को वो हॉल के बाथरूम के फ्लश टैंक में पहुंचा देती है। वहां की सिक्योरिटी खार के नौवें रास्ते पर स्थित प्लेटो सुरक्षा कम्पनी के हवाले होती है, जिसका मालिक विवेक बंसल है। वो पुलिस के साथ मिलकर अरबों के हीरे जेवरातों को सुरक्षा दे रहा होता है कि वानखेड़े उसे फोन करके कहता है कि दौलत बहुत बड़ी है देवराज चौहान इतनी बड़ी दौलत में दिलचस्पी ले सकता है। डकैती कर सकता है ये बात देवराज चौहान तक पहुंच जाती है। वानखेड़े के इस मामले में आने की वजह से देवराज चौहान सतर्क हो जाता है। आगे हालातों का ज्यादा खुलासा न करके हम उनमें डकैती कर आते हैं कि जब देवराज चौहान, जगमोहन, सोहनलाल, प्रवेश गोदरा और कमल, होटल के हॉल में डकैती करने वाले होते हैं कि तभी डकैती किए जाने की घोषणा हो जाती है। देवराज चौहान देखता है कि डकैती करने वाले उनकी ही तरह पांच हैं। पांचों के चेहरों पर वो ही नकाब हैं, जो उसने रिवॉल्वरों के ऊपर लपेट कर रूपा ईरानी को, टैंक में रखने को दिए थे। उनके हाथ में रिवॉल्वरें भी वही हैं, जो डकैती में उन्होंने इस्तेमाल में लानी थी। देवराज चौहान हक्का-बक्का रह जाता है, क्योंकि ठीक उसी की योजना की तर्ज पर उसकी आंखों के सामने डकैती हो जाती है और वो कुछ नहीं कर पाता। यानि कि उसकी योजना उसके हथियार उसके नकाब और अरबों की दौलत दूसरे ले जा रहे हैं। स्पष्ट है कि कहीं गड़बड़ हुई और उसकी योजना का फायदा किन्हीं दूसरे लोगों ने उठा लिया। किसी ने गद्दारी की है या गलती से योजना किसी को पता चल गयी? अरबों के जेवरात वो लोग देवराज चौहान की आंखों के सामने, लेकर निकल जाते हैं। अब हम, थोड़ा सा उस तरफ आते हैं, जो लोग देवराज चौहान की डकैती पर सफलता से डकैती कर गये हैं। वो पांच हैं और समझने में आसानी हो, इसलिये उनके नामों का जिक्र हम पहले ही कर देते हैं। भोपाल सिंह! विकास नारंग। अभिनव कालरा। राजेश गुलाटी त्रिखा।वहां से त्रिखा और राजेश गुलाटी मास्टर बैग में अरबों के हीरे-जेवरात ठूंसे एक वैन में निकले थे और सुरक्षा के नाते उन्होंने अपने साथ वानखेड़े के असिस्टैंट इंस्पेक्टर शाहिद खान को ले लिया था। उनके आदेश पर शाहिद खान ने छोटे से बच्चे को गोद में ले लिया, ताकि इंस्पेक्टर शाहिद खान को बच्चे की सुरक्षा की चिन्ता रहे और उन पर हाथ डालने जैसी हरकत न करें और पुलिस भी उनका पीछा न करे। ऐसा ही हुआ। जब विश्वास हो गया कि पुलिस पीछे नहीं है तो शाहिद खान को बच्चे सहित नीचे उतार दिया और उसके बाद आगे जाकर रास्ते में खड़ी अन्य कार जो कि योजना के मुताबिक, पहले से ही खड़ी कर रखी थी, उसमें हीरे-जेवरातों का भरा थैला रखा, वैन वहीं छोड़कर उन कार को लेकर आगे बढ़ गये कि पुलिस उन्हें वैन के दम पर ढूंढे तो उन तक न पहुंच सके। राजेश गुलाटी की नियत पहले से ही खराब थी अरबों के जेवरातों को लेकर, वो त्रिखा के सामने प्रस्ताव रखता है कि वो दोनों सारे माल को लेकर खिसक जाते हैं। माल आधा-आधा कर लेंगे। परन्तु त्रिखा उसकी बे-ईमानी वाली बात को नहीं मानता। ऐसे में राजेश गुलाटी के सामने दो बातें पैदा हो जाती हैं। एक तो ये कि त्रिखा ये बात दूसरों से न कह दे। दूसरे ये कि त्रिखा मरता है तो उनका हिस्सा भी अन्य चारों में बंट जायेगा। राजेश गुलाटी, त्रिखा को कार में ही चाकू से मार देता है। भीड़ भरी सड़क पर लाश फैंकने का खतरा मोल नहीं लेता। लाश कार में ही रहती है और वो जानता है कि अरबों के जेवरातों को वो अकेले नहीं संभाल सकता। गड़बड़ हो जायेगी। पुलिस के हाथ पड़ जायेगा। ऐसे में वो योजना के ही मुताबिक वहां पहुंचता है, जहां कि उसे और त्रिखा के जेवरातों के साथ पहुंचना था। वहां बाकी के तीनों पहले से ही पहुंच चुके हैं। उन्हें बताता है वो, कि त्रिखा के मन में बेईमानी आ गयी थी। वो, उसे जेवरातों के साथ भागने को कह रहा था। उसकी नहीं मानने पर त्रिखा ने चाकू निकाल लिया। जैसे-तैसे करके उसने त्रिखा से अपना और जेवरातों का बचाव करके, त्रिखा को मार दिया। लाश कार में ही, अरबों के जेवरातों के साथ पड़ी है। उसकी बात सुनकर सब चौंकते हैं। शायद उन्हें राजेश गुलाटी की बात पर यकीन नहीं। उनमें भोपाल सिंह, जो कि उस वक्त उन चारों का बड़ा है, वो इस बारे में ज्यादा न सोचकर कहता है जेवरातों का थैला भीतर लाने के बाद कार और त्रिखा की लाश को कहीं दूर छोड़ दिया जाये। क्योंकि कार भी चोरी की थी। इस वजह से नया खतरा पैदा हो सकता है। तभी वहां मौजूद फोन की बेल बजती है। भोपाल सिंह फोन पर बात करता है। दूसरी तरफ ऐसा अन्जान व्यक्ति है, जिसे उनमें से कोई नहीं जानता और वो ही उनका बड़ा है। उसने ही इन पांच को इकट्ठा किया था। डकैती की सारी योजना समझाई थी। बताया था कि उस हॉल के बाथरूम में, किस फ्लश टैंक में रिवॉल्वरें और नकाबें भी हैं। यानि कि वो पांचों सिर्फ मोहरे थे। त्रिखा तो मर चुका था। सारी योजना उसी व्यक्ति की थी, जिसका फोन आया और भोपाल सिंह ने बात की। भोपाल सिंह ने उस रहस्यमय इन्सान को त्रिखा के मरने के बारे में बताया तो जवाब में उसने कहा कि वो सब जानता है। उसकी नजर हर तरफ है। इतनी बड़ी दौलत तुम लोगों के पास छोड़कर मैं आंखें मूंदकर नहीं बैठ सकता। उनमें तय था कि काम हो जाने के बाद, दो-दो अरब की दौलत सबको देगा और बाकी की दौलत उसकी। किसी को क्या एतराज हो सकता था। दो अरब कम नहीं थे उनके लिये। उसने कहा कि अभी कुछ दिन खामोशी के साथ सब यहीं रहो। पुलिस की भाग-दौड़ थम लेने दो। फोन करने वाले, उन्हें डकैती की योजना बताने वाले रहस्यमय इन्सान के बारे में कोई नहीं जानता था कि वो कौन है। उनकी बातों से अभिनव कालरा को पता चलता है कि जिन जेवरातों की डकैती की है, वो पच्चीस-तीस अरब के जेवरात हैं तो वो कहता है कि उनके हिस्से के दो अरब कम हैं। परन्तु भोपाल सिंह उसकी बात का विरोध करके कहता है कि दो अरब उनके लिये ठीक हैं। ज्यादा दौलत पर उसी का हक बनता है, जिसने डकैती की राह दिखाई। उन्हें हथियार और नकाबों के अलावा, डकैती की योजना दी। वरना वो तो दुकान भी लूटने के काबिल नहीं हैं। बहरहाल वे लोग बाहर खड़ी कार को, त्रिखा की लाश के साथ दूर छोड़ कर आने की तैयारी में लग जाते हैं। उधर देवराज चौहान और बाकी सब भारी तौर पर परेशान हैं कि उनके सामान पर, उनकी योजना पर, उनके ही नाम पर डकैती कौन कर गया। जो भी कर गया, उसे उनकी योजना के ज़र्रे-ज़र्रे का पता था। कौन है वो-क्या उनके बीच का कोई है या बाहर का?
प्रिय पाठकों, दुर्गा पॉकेट बुक्स में पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘डकैती तेरे नाम की’ में आपने ये सब पढ़ी। बहुत ही कम शब्दों में ‘डकैती तेरे नाम की’ का हाल बताया गया है। सच मे उस उपन्यास का पूरा मजा लेना है तो डकैती तेरे नाम की’ की अवश्य पढ़ें। पूरी कहानी का मजा तिगना हो जायेगा। अब इन सनसनी खेज घटनाओं को आगे बढ़ाते हुए पढ़ते हैं, दूसरा एवं अन्तिम भाग ‘यारी दौलत से’ जो कि इस समय आपके हाथों में है। जिसे पढ़ने की शुरूआत आप कर भी चुके हैं।
आगे...।
दोनों पुलिस कमिश्नर की नजरें इंस्पेक्टर शाहिद खान के चेहरे पर जा टिकी।
“वानखेड़े की जान खतरे में है?” एक कमिश्नर की आंखें सिकुड़ी- “ये क्या कह रहे...”
“मैं बताता हूं सर!” शाहिद खान व्याकुल स्वर में बोला- “तीन दिन पहले ऑफिस में मेरी मौजूदगी में, वानखेड़े साहब को किसी का फोन आया। फोन करने वाला इसी होटल में होने वाली अरबों के जेवरातों की नीलामी और देवराज चौहान के बारे में कुछ बताना चाहता था। इसके बदले वो कुछ पैसा मांग रहा था। शायद एडवांस के तौर पर उसने हजार रुपया मांगा था। वानखेड़े साहब ने पैसे देने की हामी भरी और उससे मिलने चले गये।”
“अकेले?”
“यस सर।”
“कहां?”
“मैं नहीं जानता। वानखेड़े साहब से मैंने पूछा तो उन्होंने यही कहा कि आकर सारा मामला बताता हूं। मैं उनका इन्तजार करता रहा। लेकिन वे नहीं लौटे। उनके इन्तजार में उस रात मैं घर भी नहीं गया। क्योंकि उन्हें आ जाना चाहिये था या कम से कम मुझे फोन करना चाहिये था। वो जानते थे कि मैं उनकी वापसी की राह देख रहा हूं। रात भर जब वो नहीं लौटे तो मैंने सोचा उन्हें खास ‘टिप’ मिली होगी देवराज चौहान के बारे में अरबों रुपयों की नीलामी होने वाले जेवरातों के बारे में और तुरन्त ही इस काम में लग गये होंगे। ऐसे में मैंने किसी को उनके बारे में खबर नहीं दी कि ये बातें खुल जाने पर कहीं वानखेड़े साहब का काम खराब न हो जाये।”
“फिर?”
“फिर दो दिन बीत जाने पर भी वो नहीं लौटे।
जेवरातों की नीलामी का वक्त आ गया तो मैं होटल के नीलामी हॉल में आ पहुंचा। ये सोचकर कि शायद वानखेड़े साहब, व्यस्त काम से वहां न आ गये हो। उधर मैंने पूछताछ की वानखेड़े साहब के बारे में, लेकिन किसी ने उन्हें नहीं देखा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वानखेड़े साहब कहां चले गये कि तभी डकैती हो गयी। देवराज चौहान पच्चीस-तीस अरब के जेवरात सब के सामने ले उड़ा। उसके साथी किसी न किसी को अपनी सुरक्षा के लिये साथ ले गये। वो दोनों मुझे और एक बच्चे को साथ ले गये कि मैं बच्चे की वजह से उन्हें रास्ते में रोकने की चेष्टा न कर सकू। अरबों के जेवरातों से भरा मास्टर बैग उन्हीं के पास था। उन्होंने सब ठीक पाकर मुझे चैम्बूर में उतार दिया।
तो मैं सीधा यहां पहुंचा।” इंस्पेक्टर शाहिद खान का चेहरा कठोर हो गया था।
“वानखेड़े कहां हो सकता है?” कमिश्नर साहब की निगाह अभी भी इंस्पेक्टर शाहिद खान पर थी।
“मालूम नहीं सर। मुझे तो गड़बड़ लग रही है।” शाहिद खान के होंठों से निकला- “मेरे ख्याल में वानखेड़े साहब को इस बात की खबर पहले ही लग चुकी थी कि होटल में अरबों के जेवरातों पर देवराज चौहान हाथ मारेगा। देवराज चौहान को वानखेड़े साहब खतरा लगने लगे तो उस शाम फोन करके वानखेड़े साहब को धोखे से बुला लिया। या तो देवराज चौहान ने वानखेड़े साहब की जान ले ली है या फिर उन्हें कैद कर रखा है।
दूसरे कमिश्नर साहब ने सिग्रेट सुलगाई और आस-पास फैले पुलिस वालों को देखते हुए बोले।
“तुम्हारे पास बातें ही हैं या सबूत भी है?”
“सबूत? क्या अब भी सबूत की जरूरत है?”
“साफ कहो।”
“सर! आपके सामने डकैती हो गयी। मैं बता ही चुका हूं कि वानखेड़े साहब को इस बारे में पहले से ही खबर थी। डकैती का हॉल देख लीजिये। बिल्कुल देवराज चौहान स्टाईल में डकैती हुई है दौलत को हासिल करते वक़्त वो किसी की जान नहीं लेता यहाँ भी किसी की जान नहीं गयी और पच्चीस-तीस अरब की दौलत ले गया । बाहर अगर बारूद मैन ने खुद को बम से उड़ा लिया तो, उस हादसे को हम, गलती ही कहेंगे क्योंकि हमारे ही कांस्टेबल ने उनके पास जाकर उस पर काबू पाने की चेष्टा की थी। ऐसे में उसने खुद को उड़ा लिया। सर हम पुलिस वाले हैं। हमें सबूत इकट्ठे करने होते हैं। पैदा नहीं करने होते। हमारे पास, खास तौर से मेरे पास सबूत हैं कि वानखेड़े साहब को पहले से ही खबर थी कि देवराज चौहान इन अरबों के जेवरातों पर हाथ मार सकता है और उसने मार दिया। वानखेड़े साहब इसी मामले पर काम कर रहे थे और गायब हो गये। आप भी अदालत की तरह सबूत मांगने लगे तो, हम काम कैसे कर पायेंगे। अपराधियों तक कैसे पहुंचेंगे। जब तक हमें काम करने की दिशा नहीं मिलेगी, हम कुछ नहीं कर सकेंगे। इस वक्त तो यही सबूत है कि मैं कह रहा हूँ कि वानखेड़े साहब को इन सब बातों की खबर थी परन्तु वो बीते तीन दिन से लापता हो गये। अगर वो इस काम के सिलसिले में भागदौड़ कर रहे थे तो डकैती के वक्त उन्हें हीरे-जेवरातों के पास होना चाहिये था।”
कमिश्नर साहब, इंस्पेक्टर शाहिद खान को देखने लगे।
“सॉरी सर, अगर मैं ज्यादा बोल गया...”
“नहीं। तुमने ठीक कहा है।” कमिश्नर साहब ने गम्भीर स्वर में कहा- “मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास है।”
तभी दूसरे कमिश्नर साहब बोले।
“वो दोनों डकैत पच्चीस-तीस अरबों के जेवरातों के साथ, तुम्हें और बच्चे को आड़ बनाकर ले गये थे। कुछ देर तुम उनके साथ रहे। क्या उनके बारे में कुछ जान पाये?”
“नहीं सर।”
“उनके मुंह से कुछ नाम-पता निकला हो कि।”
“नहीं। दोनों सतर्क रहे। अपने चेहरे उन्होंने ढांप रखे थे। मेरे पास बच्चा था। मैं कुछ भी करने के काबिल नहीं था। वरना तो उस मासूम बच्चे की जान पहले जाती।” शाहिद खान के दांत भिंच गये।
“सब डकैतों ने चेहरों पर नकाब ओढ़ रखे थे। उनमें देवराज चौहान कौन था?”
“सर जो माईक थामे, सब को धमका रहा था उसने कहा तो था कि देवराज उन चारों में है, जो हीरे-जेवरात को बड़ी-सी चादर में इकट्ठा कर रहे हैं। परन्तु सारा मामला उस माईक वाले ने ही संभाल रखा था। वो ही सबसे बाद में वहां से गया था। मेरे ख्याल में देवराज चौहान ने उसे आगे कर रखा था।”
कुछ खामोशी के बाद कमिश्नर साहब गम्भीर स्वर में कह उठे।
“कुछ ऐसी बातें भी हैं, जो अभी तक हमारी समझ से बाहर हैं।”
“क्या?” दूसरे कमिश्नर ने उसे देखा।
“जिस-जिस ने भी, हॉल के भीतर प्रवेश किया, उसकी दो जगह चैकिंग की गयी। हॉल के अन्दर पहुंचते तक दो बार तलाशी ली गयी। तलाशी लेने वाले पुलिस वाले भी थे और विवेक बंसल की सिक्योरिटी सुरक्षा वाले भी। ऐसे में देवराज चौहान और उनके साथी रिवॉल्वरें और नकाब कैसे भीतर ले गये?”
कमिश्नर साहब की बात पर चुप्पी सी छा गयी।
“मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि तलाशी लेने वालों ने लापरवाही नहीं बरती। लापरवाही की होती तो एक-दो के साथ होती। तीसरा चौथा या पांचवां तो हथियार भीतर ले जाने में कामयाब नहीं होता। ये भी नहीं माना जा सकता कि तलाशी लेने वालों को उन्होंने अपने साथ मिला रखा था। क्योंकि वो एक नहीं कई थे और दो अलग-अलग जगहों पर तैनात थे। उनमें पुलिस वाले भी थे और विवेक बंसल की सुरक्षा कम्पनी वाले आदमी भी थे। यानि कि पांच रिवॉल्वरें-पांच नकाब हॉल के भीतर पहुंचे तो कैसे पहुंचे। उनका भीतर पहुंच जाना कोई मामूली बात नहीं। सच बात तो ये है कि उन्हीं रिवॉल्वरों के दम पर डकैती को कामयाबी मिल सकी। हम लोगों का सबसे ज्यादा कमजोर प्वाईंट ये रहा कि वो रिवॉल्वरें हॉल के भीतर, देवराज चौहान और उसके साथियों के पास थी।”
“सर- “ शाहिद खान के होंठों से निकला- “ये भी तो हो सकता है कि रिवॉल्वरें और नकाब पहले से ही भीतर हों।”
दोनों कमिश्नरों की नजरें मिलीं।
“पहले से भीतर?”
“हां! वो पहले से ही भीतर हो सकती हैं। देवराज चौहान के लिए मामूली काम है कि के द्वारा पहले ही रिवाल्वरें और नकाबों को भीतर रख दिया जाना। वो इस काम के लिए मुंह मांगी दौलत दे सकता है। आखिर तीस अरब की डकैती की तैयारी में था वो। किसी को भी पैसा लेकर इस काम के लिये तैयार कर सकता है। रिवॉल्वरें और नकाबें पहले से ही भीतर हों और वक्त आने पर उन्होंने उसे हासिल किया और डकैती को अंजाम दे दिया।”
“ये हो सकता है।” एक कमिश्नर ने कहा।
“यस-ये सम्भव है। सम्भव ही नहीं, ऐसा ही हुआ होगा।”
दूसरे कमिश्नर ने पक्के अंदाज में सिर हिलाया।
वो तीनों एक-दूसरे को देखते रहे।
“इस तरह देवराज चौहान का कामयाब हो जाना बहुत बुरा हुआ।” कमिश्नर साहब ने गम्भीर और सख्त स्वर में कहा- “सैकड़ों लोगों और पुलिस वालों के सामने देवराज चौहान अरबों की डकैती कर गया। सब देखते रहे। वो निकल गया। कोई कुछ न कर सका। शर्म की बात है हमारे लिये। ऐसा नहीं होना चाहिये था। पीठ पीछे कोई कुछ भी कर ले। लेकिन आंखों के सामने...।”
“सर।” इंस्पेक्टर शाहिद खान बोला- “डकैतों को पकड़ने के लिये क्या किया है?”
“हर तरफ रेड अलर्ट कर दिया गया है। तुम्हें लेकर जिस वैन पर वे भागे थे, उस वैन का रंग और नम्बर पूरी मुम्बई में फ्लैश कर दिया गया है, लेकिन वो वैन तो शायद उन्होंने कब की छोड़ दी होगी। शहर में हर जगह नाके बंदी कर दी गयी है। वाहनों की तलाशी हो रही है। हर वो काम हो रहा है, जो इस वक्त होना चाहिये।”
“लगता नहीं कि देवराज चौहान हाथ आयेगा।” दूसरे पुलिस कमिश्नर ने कहा- “वो नया मुजरिम नहीं है कि कोई भूल कर बैठेगा। शातिर है। डकैती बाद में डालता है और बचने के रास्ते पहले निकाल लेता है। लेकिन इस बार वो बचेगा नहीं। हम पूरी कोशिश करेंगे कि वे जेवरातों के साथ हमारे हाथ लग जाये।”
“आज तक तो ऐसा हुआ नहीं।” दूसरे कमिश्नर ने गहरी सांस ली।
“सर।” शाहिद खान ने कहा- “एक को जिन्दा पकड़ा है, जो पीठ पर बारूद के थैले बांधे बाहर मौजूद पुलिस वालों को बेबस किए हुए थे। उससे कोई काम की बात मालूम हो सकती... ।”
“उसे पुलिस हैडक्वार्टर ले जाकर पूछताछ की जा रही है।”
“सर, उस पूछताछ में मैं शामिल होना चाहता हूं। मेरे ख्याल में अगर वानखेड़े साहब सही-सलामत हैं और सामने आ जाते हैं तो इस डकैती के केस में कई बातें मालूम हो सकती हैं। उसे मालूम होगा कि... ।”
“हमें कोई एतराज नहीं। हैडक्वार्टर जाकर उससे पूछताछ कर लो।”
“थैंक्यू सर।” शाहिर खान ने कहा और तेजी से पलटकर, एक तरफ बढ़ गया।
☐☐☐
वो पैंतालिस और पचास की उम्र के करीब का व्यक्ति था। यूं तो वो खाते-पीते घर का लग रहा था, परन्तु इस वक्त उसकी हालत बहुत बुरी थी। एक कमरे में उसे कुर्सी पर बिठा रखा था और वहां पांच पुलिस वाले मौजूद थे। उसके बाल बिखरे थे। चेहरा उतरा हुआ था। उसके गालों की लाली बता रही थी कि वो कई चांटे खा चुका है। होंठों के कोनों में, मुंह से निकला जरा सा खून भी लगा हुआ था। इस वक्त उसकी आंखों में पानी चमक रहा था।
तभी एक पुलिस वाला दांत पीसते हुए कह उठा।
“ये हरामजादा घिसा हुआ है। ऐसे कुछ नहीं बतायेगा। डण्डे का इस्तेमाल करना पड़ेगा।”
दूसरा पुलिस वाला उसके पास पहुंचा और कंधा थपथपाकर प्यार से बोला।
“देखो। हम तुमसे बहुत ही नर्मी से पूछ रहे हैं कि सब कुछ हमें बता दो। तुम्हारा मुंह खुलते ही बहुत मामूली सी सजा होगी तुम्हें। शायद वो भी न हो। सरकारी गवाह बन जाओगे तुम।
हम तुम्हारा पूरा ध्यान रखेंगे कि सजा तुम्हें हो ही नहीं और।”
“मैं...वो हांफते से स्वर में बोला- मैं कुछ नहीं जानता। जो जानता था। बता दिया। मैं...।”
उसी पल पुलिस वाले ने जोरदार चूंसा उसके गाल पर मारा।
वो चीखकर कुर्सी से नीचे गिरने को हुआ कि पुलिस वाले ने उसे संभाल भी लिया और प्यार से ही बोला- “तुम नहीं जानते कि तुम्हारी क्या हालत हम कर देंगे। गिरना चाहोगे तो गिरने नहीं देंगे। मरना चाहोगे तो मरने नहीं देंगे। भूखे पेट नहीं रखेंगे। सौ ग्राम दूध अवश्य पिला देंगे कि तुममें जिन्दा रहने की शक्ति बची रहे। टांगें तुम्हारी सलामत रहेगी। परन्तु ऐसी हालत कर देंगे कि चल न पाओ। जुबान तुम्हारी मुंह में रहेगी। परन्तु हिलने-बोलने के लायक हम नहीं छोड़ेंगे। ऐसा ही करते हैं हम उसके साथ, जो हमें सहयोग न दे। ये देवराज चौहान का मामला है। हर हॉल में हमने अपने काम को पूरा करना है। ऊपर से हमें यही ऑर्डर है। हमसे रियायत की उम्मीद मत करना। पुलिस वाले सिर्फ उनके लिये बुरे होते हैं, जो कानून तोड़ते हैं और बाद में छाती भी ठोकते हैं। जैसे कि तुम मुंह बंद रखकर छाती ठोक रहे हो। ऐसे में हम कैसे और क्यों सहेंगे तुम्हारी हरकतों को।”
वो बुझी-बुझी निगाहों से पुलिस वालों को देखने लगा।
“तुम लोग ही हमें सख्ती करने पर मजबूर करते हो और तुम जैसे लोग ही पूछताछ के दौरान अपनी जान गंवा बैठते हैं। हम भी क्या करें। कई बार ज्यादा सख्ती हो जाती है।” वो पुलिस वाला उसी तरह प्यार से बोल रहा था- “अभी तो हम तुम्हारे से प्यार से पूछताछ कर रहे हैं। सख्ती दिखाई ही कहां है। हमें जल्दी है। ताजी-ताजी डकैती हुई है और तुम कुछ भी बता नहीं रहे। अपराधी हमसे दूर हो जायेंगे। ये बात हमसे सहन नहीं हो सकेगी। बोलो-सब कुछ बता दो-जो-जो भी तुम जानते हो।”
उसने गहरी-गहरी सांसें ली और रो देने वाले अंदाज में उसे देखा।
“जो जानता था। बता दिया, मैं... ।”
तभी दूसरा पुलिस वाला कठोर स्वर में कह उठा।
“इसे दूसरे कमरे में ले चलो। ये शराफत से मानने वाला...।”
तभी बंद दरवाजे पर थपथपाहट पड़ी।
एक पुलिस वाला कुर्सी से उठा और आगे बढ़कर दरवाजा खोला।
बाहर शाहिद खान खड़ा था। उसे देखते ही पुलिस वाला कह उठा।
“ओह इंस्पेक्टर साहब आप। वापस आ गये।” वो पीछे हटा- “आपको तो देवराज चौहान के साथी अपने साथ ले गये...।”
“हां।” शाहिद खान भीतर प्रवेश करते हुए गम्भीर स्वर में बोला- “अभी मेरे से कुछ मत पूछो।” भीतर आते ही उसकी निगाह कुसी पर बैठे व्यक्ति पर जा टिकी- “ये है वो बारूद मैन?”
“हां।”
“कुछ बताया इसने कि...।” शाहिद खान ने पूछना चाहा।
“कुछ नहीं। बहका रहा है हमें। सच बात के लिये मुंह नहीं खोल रहा। पक्का है।” पुलिस वाले ने कठोर स्वर में कहा- “अभी तक तो हम शराफत से बात कर रहे थे, लेकिन अब दूसरे ढंग से बात कर... ।”
“मैं बात करता हूं।”
“कोई फायदा नहीं।” दूसरे ने कहा- “हम बहुत कोशिश कर चुके हैं।”
“मुझे भी कोशिश कर लेने दो।” शाहिद खान ने कहा और कुर्सी खींचकर, उसके पास ही बैठ गया।
वो भय भरी नजरों से शाहिद खान को देखने लगा।
शाहिद खान मुस्कराया जेब से सिग्रेट का पैकिट निकालता हुआ बोला।
“तुम्हारे बच्चे हैं?”
उसने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए सहमति से सिर हिला दिया।
“उनसे डरते हो?”
“न-नहीं।” उसके होंठों से सूखा-खरखराता स्वर निकला।
“तो फिर मेरे से भी मत डरो। कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा मैं तुमसे सिर्फ बात करूंगा। डरते वो लोग हैं, जो झूठ बोलते हैं और तुम तो जो कहोगे, सच कहोगे। जैसे तुम हो। वैसे हम हैं।
फर्क सिर्फ इतना है कि हमारे जिस्म पर कानून की वर्दी है और हमारी नौकरी का हिस्सा है कि शहर में सुख-शान्ति बनाये रखें।” शाहिद खान के चेहरे पर मुस्कान थी।
वो अभी भी डरे अंदाज में शाहिद खान को देखे जा रहा था।
“सिग्रेट पीते हो?”
उसने उसके हाथ में दबे पैकिट को देखा फिर सिर हिलाया।
शाहिद खान ने एक सिग्रेट सुलगाकर उसे दी और दूसरी खुद सुलगा ली।
पांचों पुलिस वाले शान्ति से उन्हें देखे जा रहे थे।
वो एक के बाद घबराये अंदाज में कश लेने लगा कि कहीं उससे सिग्रेट न छीन ली जाये।
“आराम से कश लो। सिग्रेट तुम्हें और भी मिल जायेगी।” शाहिद खान ने कश लेकर कहा- “कुछ और लोगे?”
कश लेता हुआ वो चुप सा रहा।
शाहिद खान ने पास खड़े पुलिस वाले से कहा।
“दो कॉफी। एक मेरे लिये और एक इनके लिये। साथ में स्नैक्स भी ले आना। मेरे पास एक ही रहे। बाकी सब यहां से बाहर चले जायें। ये अपराधी नहीं है, जिसे हम घेरे बैठे हैं। जाओ, और कॉफी-स्नैक्स जल्दी लेकर आना।”
एक के बाद एक चार पुलिस वाले बाहर निकल गये।
पांचवां कुर्सी पर जा बैठा था।
उस व्यक्ति की सिग्रेट खत्म होने को आने लगी।
“क्या नाम है तुम्हारा?” शाहिद खान ने दोस्ताने भाव में पूछा।
“जीवन-जीवनलाल।”
शाहिद खान ने एक और सिग्रेट निकालकर उसे दी।
“तुम्हारी सिग्रेट खत्म हो रही है। इसे भी सुलगा लेना।”
उसने फौरन दूसरी सिग्रेट भी थाम ली।
शाहिद खान उठा और कुर्सी पर बैठे पुलिस वाले के पास पहुंचकर धीमे स्वर में बोला।
“क्या कहता है ये?”
“नाम जीवनलाल बताता है। कहता है बैंक में काम करता है, लेकिन इसके आगे कुछ नहीं बता रहा।”
“जिस बैंक में काम करता है, वहां से मालूम किया कि उसका कहना सही है।”
“अभी तो मालूम नहीं किया।”
“तो किया क्या है? जितना इसने बताया है, कम से कम उन बातों की तो तस्दीक करते।” शाहिद खान धीमे-सख्त स्वर में कह उठा- “बैंक में काम करने वाला, इस उम्र का व्यक्ति डकैती जैसे काम में तभी हिस्सा लेगा, जब मजबूर हो।”
उसने शाहिद खान को देखा। कहा कुछ नहीं।
“तुम्हें तो देवराज चौहान के साथी साथ ले गये....।” उसने पूछना चाहा।
“वो बातें बाद में।” शाहिद खान ने कहा और कमरे में टहलने लगा।
जीवनलाल कश लेते हुए रह-रहकर शाहिद खान को देख लेता था। उसके चेहरे पर छाये डर के भाव पहले से कम हो गये थे। वो घबराहट में अवश्य था, परन्तु पहले से कम था।
कुछ देर बाद एक पुलिस वाला ट्रे में कॉफी के प्याले और स्नैक्स रखे भीतर आया और ट्रे को छोटे से टेबल पर रखकर शाहिद खान को देखा।
“तुम दरवाजा बंद करके बाहर खड़े हो जाओ। जरूरत होने पर तुम्हें बुलाया जायेगा।” शाहिद खान बोला।
वो बाहर निकल गया। दरवाजा बाहर से ही बंद कर लिया।
“जीवनलाल। उठो और कॉफी लो। स्नैक्स लो। एक कप मुझे भी दे दो।” शाहिद खान मुस्करा पड़ा था।
जीवनलाल ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। उलझन भरी निगाहों से शाहिद खान को देखा। फिर हिचकते हुए उठा और आगे बढ़कर ट्रे में से कॉफी का प्याला उठाकर शाहिद खान को दिया।
“थैंक्स।” शाहिद खान ने प्याला थामा। तुम भी ले लो। स्नैक्स भी।”
वो पलटकर टेबल पर पड़ी ट्रे के पास पहुंचा स्नैक्स खाने के दौरान कॉफी भी पीने लगा।
एक-एक पल कीमती था। परन्तु शाहिद खान सब्र के साथ काम ले रहा था वो जानता था कि कुछ भी पूछने से पहले जीवनलाल के मन से डर निकालना जरूरी था। तभी वो बता पायेगा।
दस मिनट बीत गये। जीवनलाल फारिग हुआ।
पहले से अब बेहतर हालत थी उसकी।
“अब कैसे महसूस कर रहे हो?” शाहिद खान उसके पास पहुंचा।
“ठ-ठीक।”
“तुम तो शरीफ आदमी लगते हो।” शाहिद खान ने उसका कंधा थपथपाया- “डकैती जैसे काम में कैसे फंस गये।”
“म-मैंने कोई डकैती नहीं की।” वो जल्दी से बोला।
“मालूम है मुझे, लेकिन डकैती में देवराज चौहान का साथ तो दिया।”
“मैं नहीं जानता देवराज चौहान को। मैं किसी को नहीं जानता।”
“मुझे तुम्हारे एक-एक शब्द पर विश्वास है।” शाहिद खान ने कहा- “बैठो। बैठकर बात करते हैं।”
वो फौरन कुर्सी पर जा बैठा।
शाहिद खान ने भी कुर्सी खींची। उसके पास बैठा। फिर उस पुलिस वाले से बोला।
“हम जो बाते करें, वो नोट करो।”
पुलिस वाला फौरन उठा और डायरी-पैन लेकर पास खड़ा हो गया।
शाहिद खान ने सिग्रेट और माचिस उसे थमाई। जीवनलाल ने सिग्रेट सुलगा ली।
“अब तुम कैसा महसूस कर रहे हो?” शाहिद खान ने पूछा।
“पहले से ठीक हूं।”
“नाम क्या है तुम्हारा?”
“जीवनलाल।”
“रहते कहां हो?”
उसने बताया।
“परिवार में कौन-कौन है?”
“पत्नी और तीन बच्चे हैं।” कहते हुए उसका स्वर हल्का सा कांपा- “बेटी छोटी है। सातवी में पढ़ती है। लड़का नौंवी में और बड़ा-बड़ा लड़का बारहवीं में पढ़ता है। उसके-उसके फाईनल पेपर आने वाले हैं।”
“बच्चों का जिक्र आते ही तुम घबरा क्यों गये।”
जीवनलाल ने होंठ भींच लिए। कहा कुछ नहीं। शाहिद खान की पैनी निगाह, जीवनलाल पर थी।
“बैंक की इज्जत वाली नौकरी करते हो। परिवार पालने के लिये पर्याप्त पैसा मिलता है हर महीने। किसी चीज की कमी है क्या?”
“न-नहीं।”
“तो देवराज चौहान के साथ कैसे मिल गये।”
“मैं किसी देवराज चौहान को नहीं जानता।”
“अच्छी बात है। बारूद का थैला कंधे पर लटकाये, उस होटल के दरवाजे के बाहर, कम्पाऊण्ड में, मुंह में टेप लगाये क्यों घूम रहे थे। हाथ में तुमने, रिमोट थाम रखा था कि, पीठ पर लाद रखे बारूद में विस्फोट कर सको। वो सब क्या था। तुम तो उस वक्त पूरी तरह आत्महत्या करने की तैयारी में थे।”
उसने होंठ भींच लिए। शाहिद खान को देखता रहा।
“जवाब दो। वो सब क्या था। तब तुम क्या कर रहे थे?”
“तब मैं अपने बेटे को बचा रहा था। बेटे को बचाने के लिये मुझसे जो कहा गया, मैं वो कर रहा था।” जीवनलाल के स्वर में कम्पन उभरा- “उनका कहना मैं नहीं मानता तो, वो मेरे बेटे की जान ले लेते।”
इंस्पेक्टर शाहिद खान की आंखें सिकुड़ी। माथे पर बल पड़े।
“मैं तुम्हारी बात नहीं समझा। स्पष्ट कहों कि क्या बात है?”
जीवनलाल चुप-सा शाहिद खान को देखता रहा।
“क्या हुआ?”
“पुलिस वाले हो तुम लोग। कानून को देखोगे। ये नहीं देखोगे कि करने वाले ने किस मजबूरी में गलत काम...।”
“गलत मत कहो। कानून ये भी देखता है कि गलत काम किस मजबूरी में किया गया। जल्लाद नहीं है कानून। कानून के सीने में भी दिल है। तभी तो वो गुनाहगारों को सजा देता है कि उन्होंने बे-गुनाहों को क्यों तकलीफ दी। कानून की देवी की आंखों में पट्टी अवश्य बंधी है, लेकिन कानून अंधा नहीं है। अंधे वो हैं, जो कानून को अंधा समझते हैं। तुम बोलो-कहो जो भी सच बात है। अगर तुम हमदर्दी के लायक हो तो कानून तुम्हारे साथ है। सब कुछ बता दो।”
जीवनलाल शाहिद खान को देखता रहा। मिनट भर वहां चुप्पी रही। फिर धीमे स्वर में बोला।
“देवराज चौहान ने मेरे बड़े बेटे का अपहरण कर लिया है।”
शाहिद खान के होंठ भिंच गये।
“देवराज चौहान ने?”
“हां-तुमने अभी कुछ देर पहले ये ही नाम लिया था।”
जीवन लाल का स्वर कांपा- “वो अपने को माना हुआ डकैती मास्टर कहता है। मैंने देवराज चौहान के बारे में पता किया तो मालूम हुआ वो सच कह रहा है।”
“तो-फिर?”
“मेरा बेटा अभी भी उसकी कैद में है। उसने वायदा तो किया था कि इस काम के बाद वो मेरे बेटे को आजाद कर देगा।
मालूम नहीं उसने मेरे बेटे को छोड़ा है या नहीं।” कहते उसकी आंखों में आंसू आ गये।
“क्या कहा उसने करने को?”
“उसका एक आदमी वो ही थैला दे गया था। देवराज चौहान ने कहा कि वो थैला पीठ पर बांधकर ठीक इतने बजे होटल में मैं उस जगह पहुंच जाऊं। पुलिस से घबराना नहीं है मुझे। कुछ देर के लिए पुलिस को मजबूर करना है। पुलिस में डर पैदा करने के लिये मुंह पर टेप लगा लेनी है। मेरी ही तरह का वहां एक आदमी और भी होगा। उस जगह के भीतर डकैती होगी। तुम लोगों ने ये कहकर पुलिस को उलझाए रखना है कि थैलों में बारूद है। ये मानकर पुलिस पास नहीं आयेगी। कागज पर लिखकर ये सब बातें, कागज पुलिस के हवाले कर देना। मैंने ऐसा ही किया। देवराज चौहान ने भी कहा कि अगर ये कोरी धमकी काम न करे और पुलिस वाले हाथ डालने की हिम्मत दिखाने की कोशिश करें तो मैं रिमोट का बटन दबा दूं। पीठ पर लदे थैले में बारूद नहीं है। बल्कि जहरीली गैस के छोटे-छोटे सिलेंडर हैं। बटन दबाते ही थैले में से तीव्र गैसें निकलेंगी और जो भी गैस की जद में आयेगा। बेहोश हो जायेगा। मुझे एक गोली दी गयी कि बटन दबाने से पहले मैं वो गोली खां लूं तो गैस मुझ पर असर नहीं करेगी। परन्तु वो गोली मुझे बेवकूफ बनाने के लिये दी गयी। मेरा जैसा दूसरा बारूद मैन विस्फोट से मरा तो तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि देवराज चौहान के लिये और अपने बेटे को बचाने के लिये मैं मौत का खेल-खेल रहा हूँ। ये ठीक है कि मैं अपने बेटे को बचाना चाहता हूं लेकिन तब मैं खुद नहीं जानता था कि इसकी कीमत कितनी बड़ी अदा करनी पड़ेगी। रिमोट का बटन दबाते ही मैं मारा जाऊंगा और पास के लोग भी विस्फोट में अपनी जान गंवा बैठेंगे। कितनी जानों का नुकसान होगा और बदले में बचेगा, एक इन्सान यानि कि मेरा बेटा।” कहकर खामोश हो गया जीवनलाल।
पास खड़ा पुलिस वाला तेजी से डायरी पर उसके लिखे शब्द उतारे जा रहा था।
उसकी बात सुनते हुए शाहिद खान का चेहरा गम्भीर भी था और कठोर भी। एक-एक नजरें सामने बैठे जीवनलाल पर थी। जिसका चेहरा निचुड़ा-सा लग रहा था।
“मेरे साथ वाला दूसरा आदमी विस्फोट से उड़ा तो तब समझा मैं कि पीठ पर गैसों जैसा कुछ नहीं, बल्कि सच में बारूद भरा पड़ा है। उस विस्फोट को देखते ही मैं हक्का-बक्का रह गया। तब मेरी जरा सी हिम्मत नहीं थी कि मैं विस्फोट कर सकूँ।
इससे पहले कि मैं वहां भाग पाता या हाथ ऊपरे खड़े कर पाता, एक पुलिस वाले ने मुझ पर काबू पा लिया।”
खड़ा पुलिस वाला लिखे जा रहा था उसके कहे शब्द।
भिंचे होंठ। कठोर चेहरा शाहिद खान का।
“देवराज चौहान तुमसे पहली बार कब मिला?”
“मिला? मैंने कब कहा मिला है?” जीवनलाल के होंठों से निकला।
“तुमने कहा तो था कि देवराज चौहान ने तुमसे बात की। तुमने कहा कि...”
“हां। बात की, लेकिन वो बात तो फोन पर हुई थी।”
शाहिद खान, जीवनलाल को देखता रह गया।
“फोन पर?”
“हां। तो तुमसे मिला कौन, बारूद का थैला देने के लिये?”
“उसका आदमी आया था। उसने दिया।”
“और बेटे के बारे में कहा कि, तुम्हारे इस काम को करते ही वो उसे छोड़ देगा।”
“हां। अगर मैंने उसकी बात नहीं मानी तो उसके टुकड़े कर देगा। क्या करता-बेटे की जान की खातिर काम करना पड़ा। लेकिन मुझे यही कहा गया कि थैले में बेहोशी के सिलेंडर हैं। जरूरत पड़ने पर रिमोट का बटन दबाऊंगा तो, गैसे निकलकर आसपास के आदमियों को बेहोश कर देगी, लेकिन वहां मौजूद पुलिस वालों से यही कहना है बैग में बारूद है। देवराज चौहान ने फोन पर सब समझा दिया था, मुझे क्या-क्या करना है।”
शाहिद खान सोच भरी निगाहों से उसे देखे जा रहा था।
पुलिस वाला पास खड़ा जीवनलाल के शब्द नोट किए जा रहा था।
“चाय पिओगे?” एकाएक शाहिद खान ने पूछा।
“नहीं।” जीवनलाल ने इन्कार से सिर हिलाया।
“और वो दूसरा बारूद मैन?”
“उसके बारे में मैं खास नहीं जानता। तय जगह पर वो मिला। देवराज चौहान का आदमी ही कार चला रहा था। रास्ते में से उसे लिया। कार में भी हम दोनों ने पीठ पर थैले बांधे। उसके मेरे बीच जरा-सी बात हुई थी। उसका चेहरा बता रहा था कि वो भी मेरी तरह फंसा पड़ा है। उसने अपना नाम सुजीत कुमार बताया। पूछने पर ही उसने बताया कि चूना भट्ठी में रहता है। इससे ज्यादा बात नहीं हो सकी। कार चलाने वाले ने मना कर दिया कि हम बातें न करें।”
शाहिद खान कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और पास खड़े पुलिस वाले से बोला।
“सब कुछ नोट किया-लिखा?”
“हां”
“सुनो। अब तुम लोगों ने क्या-क्या काम करने हैं। सबसे पहले तो इसने जो कहा है, उन बातों की छानबीन...।”
“मैं समझ गया सर।”
“उसके बाद चूना भट्ठी में रहने वाले सुजीत कुमार के घर को तलाश करो। दो पुलिस पार्टियां तैयार करो। दोनों काम एक साथ होने चाहिये। वो सुजीत कुमार जिसने विस्फोट से खुद को उड़ा लिया, उसके घर को ढूंढा जा सकता है। पता किया जा सकता है कि वो कहां रहता है। उसकी तस्वीर इसे दिखाकर तस्दीक की जा सकती है कि, तस्वीर वाला वो ही सुजीत कुमार था कि दूसरा था।”
“मैं तस्वीर देखते ही उसे पहचान लूंगा।” जीवनलाल फौरन बोला।
“तुम देवराज चौहान के उस आदमी को भी पहचान सकते हो जो तुम्हें और सुजीत कुमार को कार में बिठाकर होटल तक छोड़ गया।”
“क्यों नहीं, वो तो यमराज से कम नहीं लग रहा था।”
जीवनलाल के दांत भिच गये थे।
शाहिद खान ने पास खड़े पुलिस वाले को देखा।
“जो काम तुम्हें कहे हैं, वो फौरन करो। इस काम के लिये दो पुलिस पार्टियां तैयार करके ये काम जल्दी से...।”
“ठीक-मैं...।”
तभी शाहिद खान के मोबाइल की बैल बजी।
शाहिद खान मोबाइल फोन जेब से निकालता हुआ बोला। “इस बार देवराज चौहान को छोड़ना नहीं है।” शाहिद खान का चेहरा धधक-सा उठा था- “मुझे सबसे बड़ी परेशानी तो ये है कि वानखेड़े साहब की कोई खबर नहीं है।” फोन निकालकर उसने कान से लगाया- “हैलो।”
“शाहिद खान।” कमिश्नर साहब की आवाज कानों में पड़ी।
“सर।”
“अभी-अभी खबर मिली है कि वैन, जिसमें अरबों के जेवरात और तुम्हें लेकर देवराज चौहान के साथी भागे थे, वो वैन चैम्बूर के पास एक इलाके में खड़ी मिली है। अगर तुम आना चाहो तो...।”
“यस सर! मैं अभी वहीं पहुंच रहा हूं। जहां वैन खड़ी है वो प्वाईंट बताईये सर।”
शाहिद खान ने बात करके, मोबाइल जेब में डालते हुए
शाहिद खान के पास खड़े पुलिस वाले से कहा।
“दो पुलिस पार्टियां तैयार करो और तुम्हें जो कहा है वो करो। हरीअप।” कहने के साथ ही शाहिद खान दरवाजे की तरफ बढ़ चला।
“इंस्पेक्टर खान।”
शाहिद खान ठिठका। पलटकर उसे देखा।
“बाहर प्रेस वाले हैं। टी०वी० न्यूज़ चैनल वाले हैं। वो जीवनलाल से मिलना चाहते...।”
“अभी नहीं। प्रेस वालों को जीवनलाल से दूर रखो। हम नहीं चाहते कि जीवनलाल के होंठों से ऐसी कोई बात प्रेस वालों के सामने निकले, जिसकी जानकारी हमें न हो। पहले इससे हम अच्छी तरह पूछताछ कर ले। मैं जा रहा हूँ। तुम अपने काम में व्यस्त हो जाओ और जीवनलाल के पास दो समझदार पुलिस वाले बिठा दो। जो इससे बातें करते रहे। बातों-बातों में कोई नई जानकारी मिल सकती है। नई बात सामने आ सकती है।”
“ठीक है।”
“शाम तक बहुत कुछ इसके मुंह से बाहर आ जायेगा। उसके बाद दस मिनट के लिये इसे प्रेस वालों से मिलवा देना।”
“मैंने प्रेस वालों से मिलकर क्या करना...” जीवनलाल ने कहना चाहा।
“ये हमारी ड्यूटी का हिस्सा है।” पुलिस वाला बोला- “तुम हमारे कामों के चक्कर में न पड़ो।”
शाहिद खान बाहर निकल गया।
☐☐☐
वो ही वैन थी।
वैन को देखते ही इंस्पेक्टर शाहिद खान के होंठ भिंच गये।
हर तरफ पुलिस वाले ही फैले हुए नजर आ रहे थे। वैन को इस तरह घेर रखा था कि कोई बिना इजाजत पास न आ सके। लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। भीड़ को पुलिस वाले दूर रख रहे थे। हर कोई जानना चाहता था कि मामला क्या है।
शाहिद खान वैन के पास पहुंचा। पास ही कमिश्नर साहब थे।
वैन के दरवाजे और डिग्गी वाला बड़ा दरवाजा भी खुला पड़ा था।
“सर! फिंगर प्रिंट उठवा लिए?”
“हां। सब काम हो चुका है। अब इस वैन को हैडक्वार्टर ले जाना बाकी है। यही वैन थी वो।”
“यस सर-।” इंस्पेक्टर शाहिद खान वैन के पास पहुंचा और भीतर नजर मारने लगा।
कुछ पलों बाद वो पीछे हटा और कमिश्नर साहब को देखा।
“सर। देवराज चौहान के साथी यहां से कहां गये?”
“इस बात की खबर नहीं मिल पाई।” कमिश्नर साहब ने गम्भीर स्वर में कहा।
“सर। जब उन लोगों ने वैन रोकी होगी तो यहां कोई नहीं होगा। सामान्य, भरी सड़क होगी। वैन को रुकते देखा होगा किसी ने। बड़ी चादर में अरबों के जेवरातों की बड़ी सी गठरी थी। उसे लेकर, सिर पर रखकर वो नहीं जा सकते। पक्का, यहां उनकी कोई कार, उसमें उनका साथी भी हो तो बड़ी बात नहीं। गठरी को उसमें रखकर गये होंगे।”
“तुम ठीक कह रहे हो।” दूसरे कमिश्नर ने करीब पहुंचकर कहा- “लेकिन हमें कोई गवाह नहीं मिला, जिसने ये सब देखा।
“एक नहीं-ऐसे कई गवाह होंगे। दो चार ने तो उन्हें देखा ही होगा।” कहने के साथ ही शाहिद खान वहां से हटा और पुलिस वालों की भीड़, लोगों की भीड़ को पार करके पीछे की तरफ निकला। वहां दुकानें थी।
शाहिद खान की निगाह हर तरफ फिरने लगी। चेहरे पर परेशानी थी। सख्ती थी। उसकी घूमती निगाह पेड़ के नीचे बैठे चाय वाले पर जा टिकी। चालीस वर्ष का एक आदमी चाय बना रहा था। चार आदमी पास खड़े थे। दो बैंचों पर बैठे थे। पांच कदम दूर छोकरा, चाय के गिलास धो रहा था।
शाहिद खान ने गर्दन घुमाकर उधर देखा, जहां वो वैन थी।
चाय वाले से वैन ज्यादा दूर नहीं थी और वहां से स्पष्ट नजर आ रही थी। शाहिद खान चाय वाले के पास जा पहुंचा। चाय वाले ने उसे देखा। मुस्करा कर बोला।
“सलाम साब।”
शाहिद खान ने सिर हिलाया।
“चाय बनाना।”
“अभी लो साहब जी।”
शाहिद खान धीरे-धीरे आगे बढ़ा। बेहद करीब आ गया, चाय वाले के।
“यहां से तो वो वैन पास ही है। साफ नजर आती है।”
“जी।” चाय बनाने में व्यस्त उसने सिर हिलाया।
“जब यहां वैन रुकी होगी तो, तुमने देखा होगा कि उसमें से कौन उतरा और...।”
“हमने कहां देखा साब जी। कभी चाय बनाने में लगे रहते हैं तो कभी दुकानों पर चाय देने में।”
“मैंने देखा था उन्हें साहब जी।” बर्तन धोता छोकरा कह उठा।
शाहिद खान ने फौरन गिलास धोते छोकरे को देखा।
“चुप कर।” चाय वाला तीखे स्वर में बोला- “अपना काम कर।”
शाहिद खान ने चाय वाले को घूरा।
“साब जी।” चाय वाला सकपकाकर बोला- “बच्चा है। इसे क्या पता कि...।”
“तुम्हें तो पता है कि पुलिस वालों का डण्डा कैसे घूमता है। तुम तो बच्चे नहीं हो।” शाहिद खान का स्वर कठोर हो गया- “जानते हुए भी पुलिस को सच न बताना जुर्म है। ये बात भी तुम्हें पता होगी।”
“साब जी। पुलिस का चक्कर बुरा होता।”
“चिन्ता मत करो। न तो इसे हमारे पास आना पड़ेगा। न ही इसे हम कोई परेशानी होने देंगे।” शाहिद खान ने कहा और गिलास धोते छोकरे के पास जा पहुंचा। छोकरा खड़ा हो गया- “बेटे, तुमने वैन वालों को जो देखा। वो सब कुछ बता दो कि उन्होंने क्या किया। उनके पास क्या था वो कितने थे?”
“साब जी।” छोकरा कह उठा- “मैं तब,सड़क पार दुकानों में चाय देने जा रहा था। गिलासों से भरा छिक्का मेरे हाथ में था।
जब वहां पहुंचा तो तभी वो वैन रुकी थी मेरे पास। उनके चेहरों पर नकाब जैसी चीजें देखकर मैं हैरान हुआ। लेकिन मेरे देखते ही देखते उन्होंने चेहरे से नकाबें उतारी और बाहर निकले। फिर पीछे वाला दरवाजा खोला तो सफेद चादर की बड़ी-सी गठरी निकालकर दोनों ने उठाई और पास ही खड़ी सफेद रंग की मारूति में वो गठरी ठूंसी। बड़ी गठरी थी। भीतर आ नहीं रही थी। जर्बदस्ती करके आ गयी। वो कार में बैठे और कार चलाकर चले गये। वैन वैसे ही खड़ी रही। दरवाजे खुले रहे।”
“वो दो ही थे?”
“हां”
“वो देखते में कैसे लगते थे?”
छोकरे ने उन दोनों का हुलिया बताया।
वो दोनों वो ही थे, जो उसे जेवरातों के साथ कवर करके ले गये थे।
“जिस कार में वे लोग गये, वो खाली थी या पहले से उसमें भी कोई बैठा था?” शाहिद खान पूछा।
“खाली थी। उसमें कोई नहीं बैठा था! मैं तो पास ही खड़ा सब कुछ देख रहा था। मेरे पर तो उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया।”
“वो बातें कर रहे थे?” शाहिद खान की निगाह छोकरे । चेहरे पर थी।
सोचे में डूबे छोकरे ने सिर हिलाया।
“हां बातें कर रहे थे।”
“क्या?”
“ये तो मेरे को पता नहीं।”
“सुना नहीं कि वो क्या बातें कर रहे थे?”
“मेरा ध्यान उसकी बातों पर नहीं, उनकी हरकतों पर था
वो भी इसलिये कि मैंने उनके चेहरों पर पड़ी नकाबों को देखा। तभी तो उनके लिये मेरे मन में उत्सुकता हुई कि वो कौन है। क्या कर रहे हैं।”
शाहिद खान कुछ पूछने लगा कि उसी पल एक पुलिस वाला पास पहुंचा।
“सर कमिश्नर साहब बुला रहे हैं। मैसेज आया है कोई।”
शाहिद खान ने सिर हिलाया और छोकरे का कंधा थपथपाया।
“मैं आता हूँ। तुम अपना काम करो।”
“जी साब जी।” छोकरे ने सिर हिलाया।
शाहिद खान, उस पुलिस वाले के साथ भीड़ की तरफ बढ़ गया।
☐☐☐
वो भीड़-भाड़ वाला इलाका था।
शापिंग सैंटर की पार्किंग थी वो। यहां वो सफेद कार खड़ी थी। कार पर आने वाले ने पार्किंग में कार रोकी। पार्किंग अटेंडेंट ने बताया कि उसने पास आकर कार की स्टेयरिंग सीट पर बैठे व्यक्ति को पार्किंग की स्लिप दी और चला गया। वो जल्दी में था दो अन्य कारें उसी वक्त आई थी। वो उनकी तरफ बढ़ गया था। एक बार भी कार के भीतर झांककर नहीं देखा कि भीतर क्या है और क्या नहीं। जबकि आगे वाले फुटबोर्ड पर सिर नीचे वो लाश उकडू-सी पड़ी थी। उस वक्त अटेंडेंट उसे देख भी लेता तो यही सोचता कि वो व्यक्ति नीचे झुका फुट बोर्ड पर गिरी किसी चीज को तलाश रहा है। उसके पहने कपड़ों से फौरन इस नतीजे पर पहुंचा गया कि कुछ घंटे पहले हुई अरबों की डकैती में, ये शामिल था। फिंगर प्रिंट वाले और पुलिस फोटोग्राफर अपना काम करने लगे।
“इतनी जल्दी डकैतों में से एक की लाश मिलना यही इशारा करता है कि उनमें आपस में झगड़ा या किसी वजह से रंजिश पैदा हो गयी है। तभी इसकी जान ली गयी।” पुलिस कमिश्नर ने दूर खड़े होकर, लाश को देखते हुए गम्भीर स्वर में कहा।
शाहिद खान के होंठ भिंचे हुए थे। सोच के भाव चेहरे पर।
दूसरे पुलिस कमिश्नर ने शाहिद खान को देखा।
“तुम कुछ खास सोच रहे हो क्या?”
“यस सर।” शाहिद खान ने उलझे स्वर में कहा- “सर, जब मुझे, सुरक्षा के नाते डकैत अपने साथ ले गये तो, उन दोनों में से एक ये भी था और साथ तीस अरब के जेवरातों से भरी गठरी भी थी। जबकि पार्किंग वाले का कहना है कि उसने ड्राईविंग सीट पर बैठे व्यक्ति को पार्किंग रसीद दी, तो उसके पास सफेद चादर की गठरी भी होनी चाहिये, जिसमें तीस अरब की कीमत के जेवरात थे। कार यहां छोड़ने वाला, अगर गठरी को निकालकर, उठाकर अपने साथ ले गया होगा तो अटैडेंट ने ऐसा होते अवश्य देखा होगा।”
दोनों पुलिस कमिश्नरों की नजरें मिलीं।
फिंगर प्रिट एक्सपर्ट और पुलिस फोटोग्राफर अपने काम में व्यस्त थे।
एक पुलिस कमिश्नर ने इशारे से कुछ दूर खड़े पुलिस वाले को बुलाकर कहा।
“पार्किंग अटेंडेंट को बुलाओ।”
“यस सर।” वो पुलिस वाला चला गया।
पांचवें मिनट ही अटेंडेंट वहां था।
“तुमने इस कार को यहां लाने वाले को पार्किंग स्लिप दी थी?” पुलिस कमिश्नर ने पूछा।
“जी-जी साब।”
तभी इंस्पेक्टर शाहिद खान कह उठा।
“सर। मैं इससे अलग से बात करता हूं।”
कमिश्नर साहब के सिर हिलाने पर शाहिद खान, पार्किंग अटेंडेंट को कुछ हटाकर ले गया।
“तुम घबरा क्यों रहे हो? शाहिद खान उसके चेहरे पर घबराहट देखकर बोला- “तुमने कोई गलती नहीं की, जो पुलिस से घबराओ। अपने पर काबू रखो। सामान्य बनाओ खुद को। पुलिस तो तुमसे सहायता चाहती है कि तुम उसके बारे में कुछ बताओ, जो कार और लाश छोड़ गया है।” शाहिद खान ने सामान्य स्वर में कहा।
“मैं-मैं उसके बारे में नहीं जानता। उसे पहले कभी नहीं देखा।”
“इस बात की तुम फिक्र मत करो। जो सवाल पूछूँ, सोच समझकर उसका जवाब देना।”
उसने हौले से सिर हिला दिया।
“शुरू से बताओ कि वो कैसे आया-क्या हुआ?”
“जैसे सब आकर पार्किंग में कार रोकते हैं, वैसे ही उसने कार रोकी। मैं, उसे पार्किंग स्लिप थमा कर दूसरी कारों की तरफ बढ़ गया। घंटे भर बाद बीड़ी पीने के लिये उसी कार की टेक लगाकर खड़ा हो गया साब। यूं ही कार के भीतर नजर पड़ी तो किसी को नीचे झुके पाया। मैं हैरान रह गया। क्योंकि मैंने वो कार खाली देखी थी। किसी को बैठे न देखा तो कोई नीचे कैसे झुक गया। मैं उसी को देखता रहा। कुछ पल बीत गये। तभी मुझे लगा कि गड़बड़ है। भीतर जो भी है। वो तो जरा भी हिल नहीं रहा था। मैंने शोर डाल दिया। लोग इकट्ठे हो गये। किसी ने पुलिस को फोन कर दिया। यही बात है साब जी।”
शाहिद खान ने आस-पास फैली भीड़ को देखते हुए सिग्रेट सुलगाई।
“कार लाने वाला बाहर निकला तो तुमने उसे देखा?”
“मैं तो दूसरी कारों में व्यस्त था, लेकिन उसे जाते देखा था।”
“उसके हाथ में क्या था?”
“हाथ में-हाथ में तो कुछ भी नहीं था।”
“याद करो। उसके हाथ में ब्रीफकेस होगा। सूटकेस होगा या फिर सफेद चादर की गठरी होगी।”
सुनते हुए वो इन्कार में सिर हिलाने लगा।
“नहीं साब जी। वो खाली हाथ था।”
“पक्का हो इस बात पर या शक है कि उसके हाथ में कुछ हो भी सकता है।” शाहिद खान बोला।
“पक्का हूँ साब जी। वो खाली हाथ था।”
“उसका चेहरा देखा था?”
“कुछ कुछ-जब पाकिंग स्लिप दी थी उसे।”
“देखने में कैसा था वो?”
“मैंने उसका चेहरा ही देखा था।”
“वो ही बताओ। चेहरा कैसा था उसका?”
“थोड़ा मोटा थोड़ा भारी। पैंतालीस के करीब का होगा। सांवला सा रंग। इतना ही देख पाया। इतना ही याद है।”
इंस्पेक्टर शाहिद खान की आंखें सिकुड़ गयी।
“पैंतालिस बरस के करीब का था वो?”
“हां।”
“गलत कह रहे हो। फिर सोचो। वो तीस-पैंतीस का होगा। खिला सा चेहरा।”
“ये कैसे हो सकता है। मैंने उसे देखा था। उसका चेहरा याद है मुझे।” पार्किंग अटेंडेंट ने तुरन्त उसकी बात काटी। उसकी आवाज के भावों से शाहिद खान को महसूस हो गया कि वो सच कह रहा है। डकैती करने वाले जो दो व्यक्ति उसे अपने साथ ले गये थे। एक तो सामने कार में मरा पड़ा था। दूसरे की कोई खबर नहीं थी और तीसरा लाश वाली कार को इस पार्किंग में छोड़ गया था। इससे स्पष्ट था कि वो दोनों इस सफेद कार में, अरबों के जेवारातें के साथ कहीं पहुंचे। वहां जेवरात उतारे गये। रास्ते में या वहां झगड़ा हुआ। इस, एक को मार दिया गया। उनका तीसरा, लाश और कार को यहां छोड़ गया।
तो क्या देवराज चौहान कार को यहां छोड़ गया?
“तुम उसे देखो तो पहचान लोगे जो कार को यहां छोड़ गया?”
“पहचान लूंगा साब।”
“मतलब कि जानते हो कि उसका नाक कैसा था। आंखें,
गाल, होंठ-ठोड़ी कैसी थी।” शाहिद खान गम्भीर स्वर में बोला- “तुम्हें आर्टिस्ट के पास बिठाया जाये और वो तुम्हारे कहने पर आंखें नाक-कान बनाता रहे तो बता दोगे कि वो ऐसी नाक-कान आंखों वाला था।”
“बिल्कुल बता दूंगा।”
शाहिद खान ने एक सब-इंस्पेक्टर को पास बुलाया।
“इसे हैडक्वार्टर में ले जाओ। पुलिस आर्टिस्ट सुखराम से इसे मिलवाओ। जो आदमी ये कार यहां पर छोड़ गया है। उसके चेहरे के बारे में ये बतायेगा। सुखराम से कहना कि जल्दी से जल्दी इसके बताये चेहरे को तैयार करना है।”
“राईट सर।” सब-इंस्पेक्टर बोला।
तभी पार्किंग अटेंडेंट कह उठा।
“मैं कहीं नहीं जाऊंगा। ठेकेदार मुझे नौकरी से निकाल देगा।”
“नहीं निकालेगा-कहां है ठेकेदार?”
“उधर है।”
शाहिद खान ने, सब-इंस्पेक्टर से कहा।
“इसके ठेकेदार को समझा देना कि ये पुलिस के काम से हैडक्वार्टर जा रहा है। इसे अगर नौकरी से निकाला तो यहां लाश मिलने के मामले में उसे लपेट लेंगे। ये सुनकर वो सीधा हो जायेगा।”
“समझ गया।” सब-इंस्पेक्टर ने कहा और पार्किंग अटेंडेंट को लेकर, दूसरी तरफ चला गया।
तभी शाहिद खान ने कमिश्नर साहब को पुलिस कार में मौजूद वायरलैस सैट में उलझे देखा तो उस तरफ बढ़ा। उसके पास पहुंचने तक कमिश्नर साहब की बातचीत पूरी हो चुकी थी।
“देवराज चौहान और उसके साथियों की कोई खबर नहीं, जबकि शहर में जगह-जगह नाकेबंदी है। तीस अरब के जेवरातों की कोई खबर नहीं।” उसे देखते ही कमिश्नर साहब झुंझलाते स्वर में कह उठे- “अपने आफिसर्स को-ऊपर और अखबार वालों को हम क्या जवाब देंगे।”
“वानखेड़े साहब की भी कोई खबर नहीं है। तीन दिन से वो गायब हैं।” शाहिद खान गम्भीर स्वर में बोला- “जबकि मेरे सामने वो डकैती की देवराज चौहान की पहले ही खबर पाकर निकले थे, किसी से मामला जानने के लिये।”
कुछ पलों कीचुप्पी के बाद कमिश्नर साहब कठोर स्वर में कह उठे।
“हमें रुकना नहीं है। देवराज चौहान और उसके साथियों को मौका नहीं देना है कि वो आराम से बैठ सके या मुम्बई से निकल सकें। हमें उन तक जल्दी से जल्दी पहंचना है। अगर एक के बारे में भी पता चल गया तो, उन तक पहुंचने का रास्ता मिल जायेगा।”
“मैं अपनी कोशिश नहीं छोडूंगा सर।” शाहिद खान दांत भींचे दृढ़ता भरे स्वर में कह उठा।
“डकैती के इस केस पर जो-जो भी लगा है, उनमें से मैं किसी को भी बैठने नहीं दूंगा। मुझे नतोजा चाहिये।”
“बहुत जल्दी नतीजा सामने आयेगा सर।”
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