बत्तीस दिन

विजय बेदी ने पांच हजार की गड्डी में लगे नोटों को फुरेरी दी और कोरियाई वैन के पास पहुंचकर ठिठका। चेहरे पर सोच और आंखों के सामने प्रिया का खूबसूरत चेहरा नाच रहा था कि आखिर वो चाहती क्या है उससे, उसे अपना ड्राइवर बनाकर ?

"कोरियाई वैन की स्टेयरिंग सीट पर मौजूद रागिनी चमक भरी निगाहों से बेदी को देख रही थी। बेदी ने सोच भरी निगाहों से रागिनी को देखा। दोनों की आंखें मिलीं।

"दोस्त।" रागिनी मुस्कराकर, पैने स्वर में कह उठी--- "काम हो गया लगता है ?"

"हां।'' बेदी ने नोटों की गड्डी उसकी आंखों के सामने की--- "हो गया।"

"क्या हुआ ?"

"जैसा कि मैंने सोचा था, जैसा करना था, वैसा ही किया।" बेदी गहरी सांस लेकर बोला--- "मैं उसके आगे गिड़गिड़ाया। कहा कि मैं भूखा मर रहा हूं। मेरी नौकरी छूट गई है। कहीं नौकरी नहीं मिल रही। पेट नहीं भर पा रहा। मैंने उससे काम मांगा। जोर मारा। बहुत कहने पर वो मुझे ड्राइवर की नौकरी देने को राजी हो गई।"

रागिनी का चेहरा खुशी से भर उठा।

"खूब। अब मुझे पूरा विश्वास हो गया कि तुम उससे मेरे नब्बे करोड़ हासिल करने में कामयाब हो जाओगे। ड्राइवर के तौर पर तुम उसके बंगले पर ही रहोगे और वो नब्बे करोड़ बंगले में ही कहीं पर उसने छिपा रखे हैं।" रागिनी एक-एक शब्द पर जोर देकर कह उठी--- "उसे शक तो नहीं हुआ कि तुम्हारा मेरे साथ कोई सम्बंध है ? वास्ता है ? लेन-देन है।"

"शक कैसे होगा ?"

"विजय।" रागिनी कड़वे स्वर में कह उठी--- "वो हरामजादी सोच भी नहीं सकती कि मैंने अपना नब्बे करोड़ लेने के लिए तुम्हें उसके पीछे लगाया है। आओ भीतर बैठो। होटल चलते हैं।"

बेदी वैन के भीतर बैठ गया। रागिनी ने वैन आगे बढ़ा दी।

प्रिया की कार कोरियाई वैन से काफी दूर खड़ी थी और ड्राइविंग सीट पर बैठी प्रिया आंखें सिकोड़े बेदी को कोरियाई वैन के पास खड़ा देख रही थी। प्रिया कोरियाई वैन को पहचान चुकी थी और इतनी दूर से, वैन में मौजूद रागिनी को भी स्पष्ट पहचाना था।

बेदी के भीतर बैठने के पश्चात कोरियाई वैन जब आगे बढ़ी तो प्रिया होंठ सिकोड़ बड़बड़ा उठी, "गॉड इज ग्रेट ! आलवेज ग्रेट।" चेहरे पर मुस्कान से भरे जहरीले भाव नाच उठे और कार आगे बढ़ा दी।

"ये नोटों की गड्डी ?" वैन आगे बढ़ाते हुए रागिनी ने पूछा।

"ड्राइवर की दो वर्दियां सिलवाने के लिए। उसका कहना है कि उसके यहां नौकर काली वर्दी पहनते हैं।" बेदी ने कहा--- "शाम तक दो काली पैंट-कमीजें और कैप खरीदनी है।"

"खरीद लेंगे।" रागिनी मुस्कराई--- "कब से नौकरी शुरू कर रहे हो उस कुतिया के यहां ?"

"कल। कल वो मुझे उसी शॉपिंग सेंटर में मिलेगी।" बेदी ने हाथ में पकड़ी नोटों की गड्डी को जेब में डाला--- "अगर अभी कहीं से वर्दी के लिए रेडीमेड कपड़े ले लें तो...।"

"नहीं दोस्त। अभी सीधे होटल।" रागिनी ने खुशी भरी निगाहों से बेदी को देखा--- "होटल में लंच लेंगे। उसके बाद अपनी योजना कामयाब होने की खुशी में जश्न मनाएंगे और शाम को दूसरे काम।"

"जश्न वो कैसे?" बेदी ने उसे देखा।

“चिपक कर। बैड पर। चूहे-बिल्ली का खेल-खेलकर। एक-दूसरे को पेट भरकर खाएंगे। हम दोनों के लिए इससे बढ़िया जश्न और क्या हो सकता है।" कहकर रागिनी हौले से हंसी--- "याद रखना विजय। उस कमीनी से नब्बे करोड़ रुपया हर हाल में वसूल करना है।"

और बेदी, वो तो सोच रहा था कि नब्बे करोड़ में से सिर्फ बारह लाख उसे मिल जाएं। ताकि दिमाग में फंसी गोली निकलवाकर अपनी जिन्दगी बचा सके।

■■■

प्रिया ने बंगले के पोर्च में कार रोकी और प्रवेशद्वार की तरफ बढ़ गई। चेहरे पर हमेशा की तरह शांत भाव हाव-भाव में लापरवाही । खूबसूरत हॉल में प्रवेश किया ही था कि नौकरानी नजर आई।

"मालकिन।" वो जल्दी से कह उठी--- "मालिक आपको पूछ रहे थे और अब लंच के लिए टेबल पर गए हैं।"

प्रिया पल भर के लिए ठिठकी फिर सिर हिलाकर दूसरी तरफ नजर आ रहे दरवाजे की तरफ बढ़ गई। चेहरे पर नफरत के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे। लेकिन जब उसने दरवाजे के भीतर कदम रखा तो चेहरे पर शांत-मीठे भाव नजर आने लगे।

यह बहुत ही खूबसूरत डायनिंग रूम था। अंडाकार का पॉलिश किया टेबल, कारपेट के ऊपर मौजूद था और वो इतना बड़ा था कि करीब बीस व्यक्ति उसके पास मौजूद कुर्सियों पर बैठकर खाना खा सकते थे। टेबल पर ढेर सारे खूबसूरत विदेशी बर्तनों में खाने का सामान मौजूद था। खाने की खुश्बू से वो कमरा महक रहा था। उन बर्तनों में कम से कम दस आदमियों के खा सकने लायक खाना मौजूद था।

एक कुर्सी पर दिनेश ओबराय मौजूद था और खाना शुरू करने की तैयारी कर रहा था कि न सुनाई देने वाली आहट महसूस करके उसने फौरन अपना सूखा चेहरा घुमाया और धंसी आंखें प्रिया पर जा टिकीं। गालों पर हल्का-सा कसाव आ गया।

प्रिया खुलकर मुस्कराई।

"हैलो डार्लिंग।" वो कुर्सी की तरफ बढ़ती हुई बोली।

"सुबह-सुबह कहां गई थीं तुम ?" ओबराय का स्वर तीले की नोक की तरह तीखा था।

"ज्वैर्ल्स शॉप पर ।" कुर्सी खींचकर प्रिया उसके सामने बैठती हुई बोली--- "नये डिजाइन का हीरे का सैट पसन्द करके आई हूं। दोपहर बाद ज्वैलर्स डिलीवर कर जाएगा।"

"तुम बहुत पैसे बरबाद करने लगी हो।" ओबराय का स्वर वैसा ही था ।

प्रिया ने हंसकर प्लेट अपनी तरफ सरकाई और लंच लेने की तैयारी करते हुए बोली।

"तुम कब से पैसों का हिसाब रखने लगे। कमी पड़ने लगी है क्या ?"

ओबराय उसे घूरता रहा।

"डार्लिंग खाना ठंडा हो रहा है।" प्रिया ने उसके सूखे चेहरे पर निगाह मारी।

ओबराय ने उखड़े अंदाज में लंच लेना शुरू किया।

"मैं तुम्हें वार्निंग दे चुका हूं कि मुझे अपना वारिस चाहिये।" ओबराय ने खाने पर निगाहें टिकाए सख्त स्वर में कहा--- "मुझे बच्चा चाहिए, जो मेरी बेहिसाब दौलत और मेरे नाम को, मेरे बाद जिन्दा रख सके।"

प्रिया ने ओबराय के छयालीस-सैंतालीस बरस वाले सूखे चेहरे पर निगाह मारी।

"इसके लिए मैंने तुम्हें छः महीने का वक्त दिया है।" ओबराय की आवाज कठोर थी--- "अगर तुम छः महीनों में मेरी दौलत और मेरे नाम के लिए बच्चा पैदा नहीं कर सकीं तो मैं तुमसे तलाक लेकर दूसरी शादी कर लूंगा। तब तुम अपनी सड़ी हुई बूढ़ी मां के पास जाना या फिर जो भी करना।"

बत्तीस वर्षीय प्रिया के होंठों पर मुस्कान नाच उठी।

"जल्दी लंच लो।" वो हंसी।

ओबराय की गर्दन घूमी और नजरें प्रिया पर जा ठहरीं।

"क्या मतलब ?" स्वर का भाव पहले जैसा ही था।

"लंच के बाद बेडरूम में चलते हैं। बच्चा पैदा करने के लिए बंद कमरे में कपड़े उतारना दोनों के लिए ही जरूरी है। सिर्फ मेरे कपड़े उतारने से कुछ नहीं होगा। असल काम तो तुमने ही करना है।"

ओबराय ने होंठ भींचकर गर्दन घुमाई और लंच शुरू कर दिया। वो जानता था कि वो कभी भी बाप नहीं बन पाएगा। क्योंकि डॉक्टर के मुताबिक उसमें बच्चा पैदा करने की ताकत नहीं है।

"तुम कहते थे ना कि मैं ड्राइवर रख लूं।" लंच के दौरान एकाएक प्रिया कह उठी।

ओबराय के होंठ रुके। उसने प्रिया को देखा फिर पुनः खाना शुरू किया।

"तुम्हारा कहने का ढंग ऐसा है कि ड्राइवर रख लिया हो।" ओबराय का स्वर भिंचा हुआ था।

"हां। ठीक समझे।" प्रिया मुस्कराई।

ओबराय के दांत भिंचे दो पल के लिए, उसके बाद वो पुनः खाने लगा। चेहरे पर कठोरता की परत आ चिपकी थी। खाने के ढंग में भी कुछ उखड़ापन आ गया था।

"तुम्हें ड्राइवर खुद रखने की क्या जरूरत थी ?" शब्दों को चबाकर बोला ओबराय ।

"क्या फर्क पड़ता है डार्लिंग।" खाते-खाते प्रिया ने मीठी मुस्कान के साथ कहा--- "मुझे उस पर दया आ गई थी। वो पढ़ा-लिखा बेरोजगार है। उसकी नौकरी छूट गई है। मेरे सामने गिड़गिड़ाने लगा कि मैं उसे कोई काम दिला दूं कि उसका पेट भरता रहे और..."

"वो....।" ओबराय की धंसी आंखें प्रिया के खूबसूरत चेहरे पर आ टिकीं--- "तुम्हारे सामने ही क्यों गिड़गिड़ाया। वहां और भी औरतें होंगी और भी मर्द होंगे।"

"मेरे सामने न गिड़गिड़ाता तो किसी दूसरे को कहता और फिर यही सवाल पैदा होता कि वो उसके सामने ही क्यों गिड़गिड़ाया, मेरे सामने क्यों नहीं।" प्रिया हौले से हंसी--- "ये बेकार की बात है डार्लिंग। मैंने उस पर तरस खाकर, ड्राइवर की नौकरी दे दी। अब वो मेरी कार चलाया करेगा।"

ओबराय ने सख्त निगाहों से उसे देखा।

"मेरी कार क्यों नहीं।"

प्रिया मुस्कराई।

"तुम उसे अपना ड्राइवर बना लेना। मेरा क्या जाता है।"

"मेरी कम्पनियों में पचासों ड्राइवर हैं। भरोसे के हैं। मैंने कितनी बार कहा कि कम्पनी से ड्राइवर...।"

"डार्लिंग। सच पूछो तो ड्राइवर रखने की मेरी इच्छा ही नहीं है। तुम्हारे बार-बार कहने और उसके भूखे पेट की वजह से मैंने उसे ड्राइवर रखा है। तुम कहो तो उसे मना कर देती हूं। मुझे कोई एतराज नहीं।" प्रिया ने लापरवाही से कहा और खाने में व्यस्त हो गई।

"कौन है वो ?"

"मैं नहीं जानती। कल आएगा। पूछ लेना।"

"उसका नाम-पता...।"

"वो भी पूछ लेना। नाम बताया था उसने। ध्यान नहीं रहा।" प्रिया ने खाते हुए कहा--- "तुम खुद ही उसका इंटरव्यू ले लेना। न पसन्द आए तो चलता कर देना।" स्वर में लापरवाही थी।

"उम्र कितनी है उसकी ?"

"खास ध्यान नहीं दिया। छब्बीस-सत्ताईस होगी या इसके ही आसपास।"

ओबराय ने फिर कुछ नहीं कहा--पूछा। खाने में व्यस्त हो गया।

■■■

शाम छः बजे तक बेदी मार्किट जाकर अपने साइज की दो वर्दियां खरीद लाया था और काले रंग की कैप भी मिल गई थी। इस सारे काम के दौरान चेहरे पर और मस्तिष्क पर सोच के भाव ही रहे कि प्रिया आखिर उससे चाहती क्या है? वो समझ नहीं पा रहा था। लंच के बाद रागिनी और बेदी ने तबीयत के साथ अपने ही अंदाज में जश्न मनाया था और मौके-बे-मौके पर रागिनी उसको पक्का करती रही कि प्रिया से नब्बे करोड़ वापस लेकर ही रहना है।

बेदी जब वर्दियों के लिफाफे थामे होटल के कमरे में पहुंचा तो रागिनी मुस्कराकर कह उठी।

"नई नौकरी की बधाई हो।" साथ ही वो हंसी।

बेदी ने उसे देखा। कहा कुछ नहीं। आगे बढ़कर लिफाफे टेबल पर रख दिए।

“विजय।” रागिनी दरवाजा बंद करते हुए बोली--- "तुम कुछ सोच में हो। पहले भी मैंने ये महसूस किया है।"

बेदी ने रागिनी पर निगाह मारी फिर कुर्सी पर बैठ गया।

रागिनी दरवाजा बंद करके पास आई और उसके सामने कुर्सी पर बैठ गई।

"बोलो।"

"क्या ?" बेदी ने सिगरेट सुलगाई।

"जब से तुम प्रिया से मिले हो, उसके बाद सोच में कुछ चुप-चुप से हो।" रागिनी की निगाह उस पर थी।

"हां।" बेदी ने कश लेकर हौले से सिर हिलाया--- "तुम्हारा ख्याल ठीक है।"

"उसकी खूबसूरती तो कहीं तुम्हारे सिर पर नहीं चढ़ गई ?" रागिनी होंठ सिकोड़कर मुस्कराई।

"अभी तक तो ऐसा कुछ नहीं है।" बेदी ने रागिनी की आंखों में देखा— ''वैसे इसमें कोई शक भी नहीं कि प्रिया जैसी खूबसूरती, लाखों में से एक में ही मिलती है।"

"सीधे हो जाओ विजय।" रागिनी ने गम्भीर स्वर में कहा--- "ये मत भूलना कि तुम्हारे दिमाग के ठीक बीचो-बीच फंसी गोली कभी भी तुम्हारी जान ले सकती है और तुम लम्बी जिन्दगी जीना चाहते हो। इसके लिए तुम्हें फौरन बारह लाख की जरूरत है कि दिमाग के बीचोबीच फंसी गोली को निकलवा सको। मौत से बच सको। जिन्दगी रही तो, दुनिया में खूबसूरती की कमी नहीं रहेगी और उन बारह लाख को पाने के लिए तुम्हें प्रिया से नब्बे करोड़ वसूलने हैं, जो मेरे हैं और वो कमीनी दबाकर बैठ गई है।"

बेदी, रागिनी को देखता रहा।

"वैसे...।" रागिनी का स्वर पहले जैसा ही था--- "वो मेरे से ज्यादा खूबसूरत है क्या ?"

"मेरे लिए, मेरी निगाहों में तुम दोनों बदसूरत हो।" बेदी कह उठा।

"क्या मतलब ?"

"मेरे लिए सिर्फ एक ही चीज खूबसूरत है और वो है, मेरी जिन्दगी।" बेदी एक-एक शब्द चबाकर कह उठा--- "मुझे सिर्फ अपनी जिन्दगी बचानी है।"

"और जिन्दगी बचाने के लिए प्रिया नाम की चुड़ैल से नब्बे करोड़ वापस पाना है।" रागिनी ने उसकी आंखों में झांका--- "यही मैं कहना चाहती हूं कि खूबसूरती के फेर में पड़कर कहीं तुम...।"

"बेकार की बातें छोड़ो।"

रागिनी कई पलों तक बेदी को देखती रही। फिर बोली।

"तो बताओ दोस्त। प्रिया से मिलने के बाद तुम किन सोचों में हो । "

"रागिनी।" बेदी ने कश लेकर, गहरी सांस ली--- "मैं उस औरत को ठीक से समझ नहीं पाया।"

"क्या मतलब ?" रागिनी के माथे पर बल पड़े--- "पांच मिनट की मुलाकात में, तुम उसे भला समझ भी क्या सकते हो। मेरे ख्याल में तुम अपनी बात को ठीक तरह से कह नहीं पा रहे विजय। तुम...।"

"वो मुझे आम औरतों की तरह नहीं लगी।" बेदी बोला--- "कुछ है उसमें, जो अभी मेरी समझ में नहीं आ रहा।"

रागिनी ने बेहद शांत भाव में सिर हिलाया।

"मेरा अपना ख्याल है कि प्रिया खतरनाक औरत है।" रागिनी शब्दों को चबाकर कह उठी--- "मैं उस रात को कभी नहीं भूल सकती, जब उसने मेरी बांह पकड़ कर मुझे वैन से बाहर उछाल दिया और मेरी कोरियाई वैन ले भागी। उसके एक थप्पड़ ने मिनट भर के लिए मेरे होश गंवा दिए थे और...।"

"ये बात नहीं है।" बेदी ने रागिनी को देखा।

"तो-तो क्या बात है ?"

"वो मुझे बतौर ड्राइवर रख रही है लेकिन उसकी बातों से स्पष्ट जाहिर है कि उसे किसी और काम के लिए मेरी जरूरत है। ये बात, अस्पष्ट तौर पर उसने मेरे से कही भी। यूं समझो कि मुझे नौकरी देने की ये शर्त थी उसकी।"

रागिनी मुस्कराई।

"अपने सूखे-सड़े आदमी से बेजार हो गई होगी। तुम्हारे साथ बैड पर खेल-खेलना चाहती होगी। क्या फर्क...।"

"प्लीज रागिनी। मैं गम्भीर हूं। मजाक मत करो।" बेदी ने उखड़े स्वर में कहा--- "उसके दिमाग में कोई और बात है। कोई दूसरा काम है। जिसकी वजह से उसने मुझे ड्राइवर की नौकरी दी।"

"तुम बेकार की बातों में पड़ते जा रहे हो।"

"वो कैसे ?"

"तुम वहां सिर्फ नब्बे करोड़ की खातिर जा रहे हो। ड्राइवर की नौकरी या फिर कोई और काम करने नहीं। तुमने देखना है, ढूंढ़ना है कि नब्बे करोड़ कहां रखे हैं, कहां छिपाए हैं उसने और फिर उन्हें किसी तरह वहां से बाहर लाना है। इस बीच वो जो कहती रहे, तुम हां-हां करते रहो। अपना काम करते हुए वक्त टपाते रहो। उसका आदमी गला-सड़ा है। ऐसे में तुम अपने व्यक्तित्व के दम पर, आसानी से उसे संभाल सकते हो। ज्यादा देर का मामला नहीं रहेगा ये । मुझे विश्वास है कि तुम सब काम ठीक से कर लोगे। मैं सामने नहीं आ सकती। क्योंकि वो मेरे से वैन छीनकर भागी थी। मुझे पहचानती है वो। बहुत मजबूरी हुई तो तभी मैं सामने आऊंगी। लेकिन इस बात का खास ध्यान रखना कि उसका पति दिनेश ओबराय, खतरनाक किस्म का, जिन्दगी से उखड़ा हुआ इन्सान है। उसके सामने जरा संभलकर रहना। बाकी सब बातें भूल जाओ।"

बेदी की निगाह रागिनी पर टिक चुकी थी।

"मैं जानती हूं तुममें हौसला है, हिम्मत है और...।"

"मेरे में कोई हौसला-हिम्मत नहीं है।" बेदी ने गहरी सांस ली--- "अपनी जिन्दगी बचाने के लिए, ये सब करने की हिम्मत मुझमें जाने कहां से आ गई। वक्त ने जाने क्यों मुझे अपने चक्रव्यूह में फंसा लिया है। वरना मैं तो मामूली सी नौकरी करने वाला इन्सान था।"

"फिर बेकार की बातें करने लगे।" रागिनी मुस्कराई--- "सिर्फ इतना ध्यान रखो कि तुम वहां नब्बे करोड़ लेने जा रहे हो, जो कि मेरा है और अब उसमें से पैंतालीस करोड़, यानी की आधे के हिस्सेदार तुम बन चुके हो और...।"

"वहां मैं अकेला होऊंगा।" बेदी ने एकाएक कहा--- "मुझे किसी की सहायता की जरूरत पड़ सकती है। मैं नहीं जानता कैसी सहायता, लेकिन किसी और की जरूरत पड़ सकती है।"

रागिनी कई पलों तक सोच भरी निगाहों से उसे देखती रही।

"विजय, मैं पहले ही कह चुकी हूं कि मेरे सामने आने से खेल खराब हो जाएगा। प्रिया मुझे देख चुकी है। जब मैं उसकी कार देकर, अपनी वैन वहां से लाई तो उसके आदमी दिनेश ओबराय से मुलाकात हुई। यूं समझो कि सीधे-सीधे सामने आकर मैं तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकती और किसी दूसरे को नब्बे करोड़ जैसे मामले में लाया नहीं जा सकता। वो तो हमारी गर्दन ही काटकर सारे करोड़ ले भागेगा।"

बेदी ने रागिनी की आंखों में झांका।

"मेरा दोस्त है। वो इस मामले में मेरे काम आ सकता है।" बेदी कह उठा।

"जब करोड़ों रुपया सामने हो तो कोई दोस्त नहीं होता। सब...।"

"उनके बारे में ऐसा मत कहो।" बेदी ने स्पष्ट स्वर में टोका--- "वापस उसी शहर में फोन करो। नम्बर मैं तुम्हें दे देता हूं इस नम्बर पर उदयवीर मिलेगा। ये गैराज का फोन नम्बर है। उसे इस होटल का पता दे देना। बोलना मैंने बुलाया है। अगर वो व्यस्त हो तो शुक्रा को भेज दे।"

रागिनी व्याकुल-सी नजर आई।

"करोड़ों के मामले में किसी और को मत डालो विजय। वरना...।"

"तुम मुझ पर भरोसा करती हो ?" बेदी ने गम्भीर स्वर में पूछा।

"क्यों नहीं। अपने से भी ज्यादा भरोसा है तुम पर।"

"तो फिर मेरे इन दोनों दोस्तों पर भी ऐसा ही भरोसा करो। मेरी बात आजमा कर देख लो। मेरे लिए वो, वो भी कर देंगे, जो कभी नहीं करना चाहेंगे।" बेदी दृढ़ स्वर में कह उठा।

रागिनी असहमति भरे भाव से बेदी को देखती रही, बोली कुछ नहीं।

"मैं फोन करके आता हूं उदयवीर को।" बेदी ने एकाएक कहा और उठकर बाहर निकल गया।

सोचों में डूबी रागिनी चुपचाप कुर्सी पर बैठी रही। होंठ भिंच से गए थे।

दस मिनट बाद ही बेदी लौट आया।

"गैराज पर कोई फोन नहीं उठा रहा। शाम के आठ बजने वाले हैं। बंद करके चला गया होगा। काम नहीं होगा।"

रागिनी की निगाह बेदी के चेहरे पर टिक चुकी थी।

"कल तो मुझे प्रिया ओबराय का ड्राइवर बनकर, उस बंगले पर चले जाना है।" बेदी ने पुनः कहा--- "मैं तुम्हें उदयवीर का फोन नम्बर दे देता हूं। मेरी तरफ से मैसेज देकर, उन्हें बुला लेना।"

“दोस्त।" रागिनी गम्भीर थी--- "अपने दोस्तों को बुलाकर तुम कहीं धोखा तो नहीं खा रहे ?"

"नहीं।" बेदी के होंठ भिंच गए। फिर वो मुस्करा भी पड़ा।

"विजय।" रागिनी का स्वर पहले जैसा था--- "ये करोड़ों का मामला है। नब्बे करोड़ और इतनी दौलत किसी का भी ईमान बिगाड़ सकती है। सोच लो। अच्छी तरह सोच लो, उन्हें बुलाने से पहले...।"

"बेकार की बातें मत करो।" बेदी ने लापरवाही से कहा-- "मेरा दिमाग खराब होता है। हर किसी का ईमान दौलत नहीं होती। कल मैंने अपना काम शुरू करना है। अच्छी बात तो यही होगी कि डिनर लेकर लाइट ऑफ करें और दोपहर के जश्न में जो कमी रह गई हो तो वो अब पूरी कर लेते हैं।"

रागिनी ने गहरी सांस ली।

"मुझे तब बहुत अफसोस होगा, जब तुम्हारे दोस्त करोड़ों के लिए हमारा गला काटेंगे।"

बेदी मुस्करा पड़ा। जवाब में उसने कुछ भी कहने की जरूरत नहीं समझी। वो आगे बढ़ा और रूम सर्विस को इन्टरकॉम पर डिनर का आर्डर दे दिया।

"उदयवीर का नम्बर नोट कर लो।" बेदी ने कहा।

रागिनी ने कागज पर नम्बर नोट किया और बोली ।

"दूसरे का क्या नाम है ?"

"शुक्रा।"

"ये दोनों करते क्या हैं ?" रागिनी की नजरें बेदी पर थीं।

"एक का गैराज है और दूसरा, शुक्रा मोटर ड्राइविंग कॉलेज में। लोगों को कारें चलानी सिखाया करता था लेकिन मेरे चक्कर में नौकरी गंवा बैठा, अब उदयवीर ही उसका खर्चा-पानी उठा रहा है।"

"खूब।" रागिनी ने तीखे स्वर में कहा--- "तुम्हें ऐसे दोस्त पर पूरा भरोसा है, जो कुछ नहीं करता और खर्चे पानी के लिए भी दूसरे पर निर्भर है। वो करोड़ों की खबर पाकर अपने ईमान के पांवों पर सलामत खड़ा रहेगा।"

बेदी ने रागिनी की आंखों में झांका।

"मेरी नौकरी भी छूट चुकी है। मैंने ही छोड़ी थी नौकरी।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा--- "पास में पैसे न होने की वजह से मेरा खर्चा भी उदयवीर ही उठा रहा था कि तुमसे मुलाकात हो गई और तुमने मुझ जैसे अनजान पर विश्वास करके मुझे करोड़ों के मामले में ले लिया। क्या तुम्हें लग रहा है कि मैं तुम्हें धोखा दूंगा।"

एकाएक रागिनी मुस्करा पड़ी।

"ठीक है दोस्त। मुझे तुम पर और तुम्हारी हर बात पर विश्वास है।" रागिनी ने शोख स्वर में कहा--- "अब ये भी बता दो कि तुम्हारा दोस्त जब आए तो उसे मामले की कितनी जानकारी देनी है।"

"दोनों में से जो भी आए, उसे सब कुछ बता सकती हो। उनका ईमान, खराब न होने की गारण्टी मेरी रही।"

"और अगर मुझ पर उनका ईमान खराब हो गया तो ?" रागिनी हंसी ।

“ये कोशिश अवश्य करना।" बेदी मुस्कराया--- "ताकि तुम्हें उनके ईमान की मजबूती का एहसास हो सके।"

"क्यों, वो मर्द नहीं हैं क्या ?"

"इम्तिहान मर्दों का लिया जाता है, तभी तो कह रहा हूं कि कोशिश....।"

"छोड़ों इन बातों को।" रागिनी गम्भीर होते हुए कह उठी--- "विजय, कल से तुम जिन हालातों में कदम रखने जा रहे हो, वो सब आसान नहीं होगा। नब्बे करोड़ को वापस पाना आसान भी बहुत है और कठिन भी। प्रिया जैसी कुतिया तुम पर किसी तरह का शक भी कर सकती... ।"

"मैं आने वाले हर तरह के हालातों पर गौर कर रहा हूं और आगे भी सतर्क रहूंगा।" बेदी गम्भीर हो गया--- "चूंकि बारह लाख मुझे हर हाल में चाहिए और मेरे पास जिन्दगी के सिर्फ बत्तीस दिन बचे हैं और बारह लाख पाने की ये मेरी आखिरी कोशिश है, ऐसे में मैं कुछ भी कर गुजरने से पीछे नहीं हटूंगा। अब सिर्फ नब्बे करोड़ ही नहीं, मेरी जिन्दगी और मौत का भी सवाल है रागिनी ।"

पाठको, उपन्यास पढ़ने में मजा तो अवश्य आएगा, परन्तु ज्यादा मजा लेने के लिए आपको पूर्व प्रकाशित उपन्यास "छत्तीस दिन" पढ़ना पड़ेगा। जो कि चंद लाइनों में कुछ ऐसी कहानी लिए हुए था। कि कुछ लोग "नब्बे करोड़" की सरकारी दौलत लेकर वैन में भाग रहे होते हैं कि पुलिस द्वारा मार गिराये जाते हैं, परन्तु वो नब्बे करोड़ वैन से गायब हो जाते हैं। इसके बाद वो नब्बे करोड़ रफ्तार पकड़ते हैं और जो भी नब्बे करोड़ पर कब्जा जमाता है वो किसी न किसी वजह से मारा जाता है। दौलत की दौड़ जारी रहती है। मनोरंजन से भरे ढेरों हादसे वो "नब्बे करोड़" की दौलत पैदा करती है। आखिरकार वो "नब्बे करोड़" रागिनी जैसी हसीन युवती के हाथ लगते हैं परन्तु इन्तहाई खूबसूरत प्रिया, इत्तफाक से उसकी कोरियाई वैन छीनकर ले जाती है। तभी रागिनी की मुलाकात बेदी साहब से होती है, जो बारह लाख पाने के लिए मरा जा रहा है। रागिनी उसे बारह लाख देने का वायदा करती है और उसे साथ लेकर प्रिया के पास जाती है कि उससे "नब्बे करोड़" के नोटों से भरी कोरियाई वैन वापस ले सके। मौके पर बेदी साहब के पांव में चोट आ जाती है। प्रिया अकेले ही रागिनी के पास जाती है उसे वैन मिल जाती है। परंतु बाद में देखती है कि वैन में पड़े थैलों में नोटों की गड्डियां न होकर अखबारें और ईंट-पत्थर भरे हैं। रागिनी पागल हो उठती है "नब्बे करोड़" पाने के लिए। बेदी उसे समझा कर ठण्डा करता है और फिर दोनों नब्बे करोड़ पाने की तरकीब सोचते हैं और सोच-समझकर बेदी किसी तरह प्रिया के यहां, प्रिया के ड्राइवर की नौकरी पा लेता है। यहां तक आपने पढ़ा, पूर्व प्रकाशित अनिल मोहन का उपन्यास "छत्तीस दिन" में और अब आगे पढ़ते हैं "नब्बे करोड़" में।

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इकत्तीस दिन

अगले दिन सुबह दस बजे ही बेदी उस शॉपिंग सेंटर के पॉर्किंग में पहुंच गया था, जहां कल प्रिया ओबराय उसे मिली थी और आज आने को कह गई थी। बेदी जानता था कि प्रिया के आने में एक-डेढ़ घंटा बाकी है, फिर भी वो वक्त से पहले आ गया था। बेदी के शरीर पर काले रंग की पैंट और वैसी ही कमीज थी। नए काले जूते थे। कैप हाथ में पकड़ी हुई थी। सुबह ही शेव की थी, ऐसे में काले कपड़ों में उसका चेहरा बहुत आकर्षक लग रहा था। बेदी ने दूर खड़ी कोरियाई वैन पर निगाह मारी फिर दुकानों की तरफ देखा, शॉपिंग सेंटर के, गली जैसे बरामदे में एक पिलर के पास रागिनी खड़ी थी। बेदी ने कैप को बगल में दबाया और सिगरेट सुलगाकर, कैप पुनः हाथ में पकड़ ली।

ज्यों-ज्यों वक्त गुजरा जा रहा था, उसके सामने ही दुकानें खुल रही थीं। सुबह के इस वक्त शॉपिंग सेंटर के पार्किंग में बिलकुल शांति थी।

बेदी, प्रिया ओबराय का इन्तजार करता रहा ।

सिगरेट पर सिगरेट फूंकता रहा। ग्यारह बज गए। साढ़े ग्यारह बज गए।

बेदी के दिलो-दिमाग में बेचैनी घर करने लगी। वो आएगी कि नहीं? कहीं उसे भूल तो नहीं गई? नहीं, भूलेगी कैसे, वर्दियां सिलवाने के लिए, कल उसे पांच हजार की गड्डी देकर गई थी। तो फिर आई क्यों नहीं। अब तक तो उसे आ जाना चाहिए। इकत्तीस दिन तो बचे हैं, उसकी जिन्दगी के। इन्हीं दिनों के बीच उसे बारह लाख का इन्तजाम करके, डॉक्टर वधावन से, दिमागों के हिस्सों के बीच फंसी गोली को बाहर निकलवाना है। अगर वो नहीं आई तो पैसे का इन्तजाम कैसे करेगा ?

उसका एक-एक दिन, दिन का एक-एक घंटा कीमती है। बेदी ने होंठ भींचे उस तरफ निगाह मारी, जहां रागिनी थी। रागिनी उसे दिखी। जो कि बरामदे के पिलर की आड़ में मौजूद थी। थोड़ी-थोड़ी नजर आ रही थी।

बेदी की बेचैन नजरें प्रिया ओबराय का चेहरा देखने के लिए हर तरफ घूम रही थी। एक तरफ रखा छोटा-सा लिफाफा उठा लिया था, जिसमें दूसरी वर्दी मौजूद थी। बेदी को लग रहा था, जैसे ये सब कोशिश बेकार गई। प्रिया ओबराय के बंगले पर पहुंचने की। वहां मौजूद नब्बे करोड़ को तलाश करने की।

और जब दोपहर का एक बजा तो उसकी हिम्मत पूरी तरह जवाब दे गई।

बेदी ने भारी मन से लम्बी सांस ली और फैसला किया कि आज ही के दिन में उसे कोई दूसरी योजना बनानी है जिसके दम पर वो...।

सोचें रुक गईं बेदी की। बढ़ते ख्यालों को जैसे हवा अपने साथ बहाकर ले गई। सारी परेशानी, चिन्ता जैसे जादू के जोर पर गायब हो गई। राहत भरी कुछ ज्यादा ही लम्बी सांस निकली उसके होंठों से ।

कल वाली ही कार थी और वो ही चला रही थी।

बेदी के देखते-ही-देखते कार ने पॉर्किंग में प्रवेश किया और रुक गई। प्रिया ओबराय से उसकी निगाह मिली तो वो जल्दी उस तरफ बढ़ा। चेहरा सामान्य और मुस्कराता लग रहा था।

प्रिया की पैनी निगाह उस पर ही थी।

पास पहुंचकर वो ठिठका और सलाम वाले ढंग में थोड़ा-सा झुका।

"गॉड इज ग्रेट।" प्रिया ओबराय के होंठों से निकला---  बहुत जंच रहे हो तुम।"

"वो-वो।" बेदी से कुछ कहते न बना--- "थै-थैंक्स मैडम।" प्रिया ओबराय कार का दरवाजा खोलकर बाहर आ खड़ी हुई।

बेदी की नजरें न चाहते हुए भी उस पर जा टिकीं।

वो कमीज-सलवार पहने थी। एकदम टाइट। कमीज के गले का कट इतना नीचे था कि आधे से ज्यादा छातियां बिना किसी कोशिश के नजर आ रहीं थीं, जो कि जानदार थी। उभारों की गोलाई देखते ही बनती थी। दुपट्टा गले से लिपटा पीछे को सरका हुआ था। उसके लम्बे बाल, चौड़ी चुटिया के रूप में कूल्हों तक जा रहे थे। कूल्हों से कमीज ऐसी टाइट थी कि वे बहुत ज्यादा ध्यान खींच रहे थे और चेहरे की खूबसूरती, चमक-नैन-नक्श, उनका तो कहना ही क्या। इसमें कोई शक नहीं कि बेदी उसकी खूबसूरती के जर्रे-जर्रे का कायल हो चुका था। वो जब भी सामने आती तो कुछ पलों के लिए दुनिया भूल जाता था।

प्रिया ओबराय का चेहरा शांत था। लेकिन आंखों में मुस्कान थी। बेदी की निगाहों को वह पहचान चुकी थी और ये भी जानती थी कि बेदी का कोई कसूर नहीं, वो है ही ऐसी कि सामने वाला होश गंवा बैठे।

"कैप डालो।"

प्रिया ओबराय की आवाज उसके कानों में पडी तो हड़बड़ा कर होश में आया। उसने जल्दी से कैप सिर पर रखी और सकपकाकर, इधर-उधर देखने लगा।

"तुम्हारा कोई कसूर नहीं, कोई चीज देखने वाली हो तो उसे अवश्य देखना चाहिए।" प्रिया ओबराय बोली--- "लेकिन आसपास किसी के होने पर तुम कभी भी मेरे चेहरे से नीचे देखने की कोशिश नहीं करोगे।"

बेदी सहमति भरे ढंग से सिर हिलाकर रह गया।

"चलो।" प्रिया ने कहा और कार के पीछे वाली सीट पर जा बैठी।

बेदी ने ड्राइविंग सीट संभाली और छिपी निगाहों से उस तरफ देखा, जिधर पिलर के पीछे रागिनी खड़ी थी। वो नजर आई। पिलर की ओट से इधर ही देख रही थी।

बेदी ने कार आगे बढ़ाई और मोड़ते हुए, सड़क पर ले आया।

"किस तरफ चलना है ?"

"दायें, सीधा चलते रहो। मैं रास्ता बताती जाऊंगी। तुम जानते हो मुझे या मेरे बंगले को ?"

"नहीं, नो मैडम।"

"मैडम नहीं मालकिन ।"

"जी। मैं आपके बारे में कुछ नहीं जानता मालकिन।" बेदी ने संभलकर कहा ।

ये जवाब सुनकर प्रिया ओबराय के चेहरे पर कोई नया भाव नहीं आया।

"अकेले में तुम मुझे प्रिया कहकर भी बुला सकते हो। मुझे कोई एतराज नहीं।" वो बोली।

"जी।"

"कार की रफ्तार कम रखो।" प्रिया ओबराय पुनः बोली--- "तो कल, मैंने तुम्हें जो शर्तें बताई थीं, सब याद हैं ?"

"हां।"

"उन शर्तों को दोहराओ।" प्रिया ओबराय खिड़की से बाहर देखने लगी।

कार ड्राइव करता बेदी शांत स्वर में कह उठा।

"आपने मुझे ड्राइवर की नौकरी पर रखा है। लेकिन आप मुझसे कोई भी काम ले सकती हैं। आपकी कोई भी बात मेरे से बाहर नहीं जाएगी। मुझे आपकी हर बात माननी है।"

"तुमने भी अपनी तरफ से कुछ वायदा किया था मेरे से ?" पीछे बैठी प्रिया ने उसे देखा।

"जी हां। मैं आपके लिए जान तक की बाजी लगाने में पीछे नहीं हटूंगा।" बेदी के होंठों से निकला।

"गुड ! तुम्हारी यही बात सुनकर तो मैंने तुम्हें अपने साथ रखने का फैसला किया। नाम क्या है तुम्हारा? भूल गई।"

"बेदी, विजय बेदी।"

"हूं। विजय।" प्रिया ओबराय ने सिर हिलाया--- "मेरी तरफ से तो तुम्हें नौकरी मिल गई है। लेकिन इस नौकरी को पक्का करने के लिए अभी तुम्हें मेहनत करनी पड़ेगी और उस मेहनत में तुम्हें सफल होना है।"

"मैं समझा नहीं।"

"मेरा पति, दिनेश ओबराय।" कहते हुए प्रिया ओबराय की आवाज में हल्की-सी सख्ती आ गई थी--- "अगर उसने तुम्हे पसन्द न किया तो तुम्हें ये नौकरी नहीं मिल सकेगी। वो तुम्हारा इन्टरव्यू लेगा। क्या पूछेगा। क्या बोलेगा। मैं नहीं जानती, लेकिन तुमने हर हाल में उसकी तसल्ली करानी है।"

"ओह!" बेदी के होंठों से गहरी सांस निकली।

"विजय।" प्रिया ओबराय गम्भीर थी।

"हां।"

"मैं तुम्हें अपने पति दिनेश ओबराय के बारे में कुछ खास बातें बता देना चाहती हूं।" स्वर में सख्ती आ गई।

"कैसी खास बातें ?"

"वो, दिनेश ओबराय, जो कि मेरा पति है। जिससे कुछ ही देर में तुम्हारी मुलाकात होने वाली है। वो थोड़ा-सा हरामजादा है। थोड़ा-सा कमीना है। थोड़ा-सा कुत्ता है। निहायत ही घटिया इन्सान है। शक-वहम का मारा हुआ है। अपने आप में हर समय कुढ़ता रहता है। उसका बस चले तो हर रोज दस आदमियों को गोली मारकर, नाश्ता किया करे। वो हर किसी को अपने हुक्म का गुलाम बना देखना चाहता है। जो उसके इशारों पर नहीं चलता, उसे वो कभी भी पसन्द नहीं करता। इसके साथ ही बेहिसाब दौलत है उसके पास। तेज दिमाग है। कभी वो कुछ भी नहीं हुआ करता था और आज वो अपने दिमाग की वजह से राजा बना हुआ है।"

प्रिया ओबराय खामोश हुई।

बेदी कुछ नहीं बोला।

उसने पुनः कहा।

"ऐसे इन्सान को तुमने कैसे संभालना है। इसके लिए खुद को पहले से ही तैयार कर लो। उसके नीचे पचासों ड्राइवर काम करते. हैं। मेरे लिए वो अपनी किसी कम्पनी से ड्राइवर मंगवा देता। लेकिन मैंने इन्कार कर दिया। ऐसे में वो नहीं पसन्द करेगा कि मैं बाहर से किसी को ड्राइवर बनाकर लाऊं। बंगले पर वो वैसे भी ज्यादा लोगों को पसन्द नहीं करता। दो दरबानों के अलावा बंगले में एक नौकर-नौकरानी है जो खाना-सफाई का काम करते हैं और दोनों मियां-बीवी हैं।"

बेदी के होंठ भिंच गए।

"मेरी सब बातें समझ रहे हो।"

"हां और मुझे नहीं लगता कि आपका पति मुझे नौकरी पर रखेगा।" बेदी ने सिर हिलाया।

"न रखने की भी कोई वजह होनी चाहिए और वो वजह पैदा हो इस बात का मौका तुमने उसे नहीं देना है।" वो दांत भींचकर बोली।

होंठ भींचे, सोचों में डूबा बेदी, धीमी रफ्तार से कार चला रहा था।

"क्या सोचने लगे ?" प्रिया ओबराय ने कुछ तीखे स्वर में कहा।

"मैं सोच रहा हूं कि जिसने कोई वजह पैदा करनी हो तो वो कर लेता है।" बेदी ने होंठ भींचे कहा।

पीछे से वो कुछ आगे सरकी और अपना खूबसूरत हाथ उसके कंधे पर रखा।

"विजय।" उसके स्वर में कूट-कूट कर मिठास भरी हुई थी--- "तुम्हें पूरी कोशिश करनी है कि वो कोई वजह पैदा न कर सके।"

बेदी को उसके हाथ की उंगलियां कंधे में धंसती-सी महसूस हुई। बेदी समझ नहीं पाया कि वो इस कदर अपनापन दिखाकर, उसे मजबूत करने की कोशिश क्यों कर रही है। जाहिर है कि वो मरी जा रही है कि वो किसी तरह उसका ड्राइवर बनकर, नौकरी पा ले। उसका पति दिनेश ओबराय उसे नौकरी देने की हामी भर दे। बेदी का ये विश्वास और भी पक्का होने लगा कि ये उससे कोई खास काम निकलवाना चाहती है। कोई बात है, जिसकी वजह से ये हसीन शह उसे नौकरी देने पर आमादा है कि वो जब दिनेश ओबराय के सामने जाए तो अपनी हिम्मत हौसला कायम रखे। जो वो पूछे, सही जवाब देकर, उसकी तसल्ली कराकर, किसी तरह नौकरी पा ले ।

प्यार से उसका कंधा थपथपाकर, वो पुनः पीछे होकर बैठ गई।

"क्या बात है विजय।" वो पहले वाले स्वर में कह उठी--- "दिनेश ओबराय के सामने जाने की हिम्मत छोड़ बैठे ?"

"मेरी हिम्मत अपनी जगह कायम है।" बेदी की आवाज में पक्कापन था— “क्योंकि मुझे नौकरी की सख्त जरूरत है। मेरे पास कोई काम नहीं है। पेट भरने के लिए दो रोटी तक का इन्तजाम नहीं कर पा रहा हूं। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि आपके पति को ऐसा कोई मौका न दूं कि वो मुझे नौकरी पर रखने से इन्कार कर दे।"

■■■

कार पोर्च में जा रुकी। इंजन बंद करके बेदी फौरन नीचे उतरा और पीछे वाला दरवाजा खोलकर अदब से थोड़ा-सा झुककर खड़ा हो गया। प्रिया ओबराय बाहर निकली। अब दुपट्टा ठीक ढंग से छातियों पर ले रखा था।

"तुम यहीं रहो।" प्रिया ओबराय का लहजा सामान्य था--- "मैं किसी को भेजती हूं वो तुम्हें तुम्हारे मालिक के पास ले जाएगा।" कहने के साथ ही सामने नजर आ रहे मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ती चली गई।

बेदी ने कार का दरवाजा बंद किया और वहीं खड़ा रहा। दिल सामान्य गति से कुछ ज्यादा ही तेजी से बज रहा था, ये सोचकर कि दिनेश ओबराय जैसे गुणी व्यक्ति से जल्दी ही उसका सामना होने वाला है।

दो मिनट ही बीते होंगे कि पैंतीस वर्षीय नौकरानी जैसी औरत बाहर आई। ये जुदा बात थी कि वो साफ-सुथरे और अच्छे कपड़े पहने हुए थी। बेदी के पास पहुंचती हुई बोली।

"तुम हो विजय नाम के ड्राइवर ?"

"हां।" बेदी ने सिर हिलाया।

"आओ। मालिक से मिल लो। मालकिन ने कहा था कि तुम्हें मालिक से मिलवा दूं।" कहते हुए वो मुड़ी।

बेदी ने सिर पर पड़ी कैप ठीक की और कदम आगे बढ़ाया।

“मेरा नाम सुमित्रा है। मैं अपने पति दयाल के साथ बंगले में खाना बनाना और सफाई का काम करती हूं।" आगे बढ़ती हुई बोली--- "हमारे अलावा नौकरों में दो दरबान हैं, उन्हें देख ही लिया होगा।"

“हां।" साथ चलते हुए बेदी ने सिर हिलाया--- "तुम्हारे मालिक किस तरह के इन्सान हैं। "

"सख्त किस्म के इन्सान हैं।" सुमित्रा का स्वर धीमा हो गया--- "उनके सामने ज्यादा मत बोलना।"

"ठीक है।"

दोनों भीतर प्रवेश कर गए।

"तुम यहीं ठहरो, मैं मालिक को खबर करती हूं।" कहने के साथ ही वो सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई।

बेदी वहीं खड़ा रहकर, विशाल हॉल की खूबसूरती देखने लगा।

चौथे मिनट ही सुमित्रा लौटी।

"मालिक तुम्हें स्टडी रूम में ही बुला रहे हैं, चलो।"

बेदी उसके साथ हो गया। वहां की हर चीज को, रास्ते को वो ध्यान से देख रहा था। इस बात का एहसास उसे फौरन ही हो गया था कि यहां पैसे की कोई कमी नहीं।

"सुमित्रा उसे पहली मंजिल पर स्थित एक बंद दरवाजे के पास, ले जाकर ठिठकी।

"भीतर जाओ। ये स्टडी रूम का दरवाजा है।" सुमित्रा बोली।

"तुम ?'' बेदी ने उसे देखा।

"जब तक तुम मालिक के पास रहोगे, मैं बाहर ही खड़ी रहूंगी। ये मालिक का हुक्म है। तुम्हें ही भीतर जाना है। मालिक को ज्यादा भीड़भाड़ पसन्द नहीं है।" सुमित्रा ने कहा।

बेदी ने सुमित्रा पर निगाह मारी फिर दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गया।

दरवाजा छोड़ते ही वो बंद होता चला गया।

बेदी ठिठका। उसकी नजरें वहां घूमने लगीं। ये स्टडी रूम था। लकड़ी की खूबसूरत अलमारियां और शैल्फों पर कई तरह की किताबें लगी हुई थीं। आम साइज का कमरा था। फर्श पर कीमती कारपेट बिछा रखा था। हर चीज से दौलत की महक आ रही थी।

कमरे के बीचोबीच लकड़ी की गोल टेबल मौजूद थी, जिसके गिर्द चार कुर्सियां मौजूद थी और एक कुर्सी पर मौजूद दिनेश ओबराय पैनी निगाहों से उसे देख रहा था।

उसे देखते ही बेदी फौरन संभला और थोड़ा-सा झुककर धीमे स्वर में कह उठा।

"नमस्कार मालिक।" बेदी ने अपनी आवाज को गुलामों की तरह बना लिया था।

उसे देखते हुए, ओबराय ने सिगार सुलगाया फिर उंगली से  अपनी नाक को रगड़ा।

"तुम हो ड्राइवर।" आवाज में तीखे भाव थे।

"जी मालिक।" बेदी ने उसी स्वर में कहा।

"मुझे तो तुम मालिक लगते हो शक्लों-सूरत से।" आवाज में वही भाव थे--- "कब से जानते हो प्रिया को ?"

"प्रिया ? मैं तो किसी प्रिया को नहीं जानता मालिक।" बेदी ने उसी ढंग से फौरन सामान्य स्वर में कहा।

दिनेश ओबराय आंखें सिकोड़े उसे घूरता रहा।

बेदी चेहरे पर भोलेपन के भाव समेटे, नजरें नीची किए खड़ा रहा। कई पल खामोशी में बीत गये।

ओबराय ने सिगार का कश लिया।

"मैं तुम्हारी मालकिन की बात कर रहा हूं।" "दिनेश ओबराय का स्वर चुभता-सा हो गया।

"ओह!" बेदी उसी अंदाज में कह उठा--- "मैं आपकी बात समझा नहीं था मालिक। मालकिन से मैं कल ही शॉपिंग सेंटर में मिला था। दो दिन से कुछ खाया नहीं था। मैंने खाना मांगा। कुछ काम मांगा। मालकिन दिल की बहुत नर्म हैं। मुझे ड्राइवर की नौकरी दे दी। वरना मेरे पास तो कोई काम भी नहीं।"

"पढ़े-लिखे नजर आते हो ?" ओबराय की पैनी-तीखी नजरें उस पर थी।

"हां मालिक।" बेदी ने मासूमों की तरह सिर हिलाकर कहा--- "पढ़ा-लिखा हूं। दिल्ली में चिटफंड की कम्पनी में नौकरी करता था। एक बार कम्पनी का पैसा लेकर बैंक में जमा कराने जा रहा था कि रास्ते में कुछ लोगों ने रुपया लूट लिया। जो भी हुआ मुझे नौकरी गंवानी पड़ी। उसके बाद कहीं भी ठीक से नौकरी नहीं मिली। नौकरी की ही तलाश में इस शहर में आ गया। यहां भी किस्मत ने साथ नहीं दिया और भूखों मरने की नौबत आ गई। तब...।"

"पढ़-लिखकर ड्राइवर की नौकरी करने की बात कुछ जंची नहीं।" एकाएक ओबराय का स्वर सामान्य हो गया।

"मालिक। बात तो आपकी ठीक है।" बेदी का स्वर और भी मासूम हो गया— “जब भूखों मरने की नौबत आ जाए तो सब करना पड़ता है।"

"तुम्हारी पढ़ाई की काबलियत के हिसाब से मैं तुम्हें अपनी किसी कम्पनी में नौकरी दे सकता हूं।"

बेदी तुरंत चेहरे पर खुशी के भाव ले आया। निगाहें सीधी करके ओबराय को देखा।

"ये तो और भी अच्छी बात है मालिक। अब अपनी कम्पनी में...।"

"और कौन-कौन है तुम्हारे घर में ?" ओबराय कह उठा।

"जी, कोई नहीं। मां-बाप थे। वे अब नहीं रहे। अकेला हूँ । कोई ख्वाइश भी नहीं है।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा--- "पेट भरता रहे। इतना ही बहुत है मेरे लिए।"

ओबराय की नजरें उसके चेहरे पर टिकी रहीं।

बेदी हाथ बांधे शांत मासूम-सा खड़ा रहा।

"मुझे जानते हो ?"

"हाँ मालिक। आप मालकिन के पति हैं।"

"इसके अलावा मेरे बारे में और क्या जानते हो। मेरा नाम तो सुन रखा होगा ?" ओबराय ने अपनी नुकीली नाक पर उंगली फेरी।

"मैंने तो आपका नाम नहीं सुना।" बेदी अपने चेहरे पर हल्की-सी घबराहट ले आया--- "मुझसे कोई गलती हो गई मालिक ?"

ओबराय के सूखे-पतले होंठ सिकुड़े। फिर सिगार का कश लेकर बोला।

"नौकरानी बाहर खड़ी है। उसे बुलाओ।"

बेदी फौरन सुमित्रा को बुला लाया।

"ये हमारा नया ड्राइवर है।" ओबराय सपाट स्वर में बोला--- "इसे सर्वेन्ट क्वार्टर दिखा दो ।"

"जी।" सुमित्रा ने कहा फिर बेदी को देखा--- "आओ।"

"धन्यवाद, मालिक। धन्यवाद मैं...।"

ओबराय ने इशारा किया।

सुमित्रा, बेदी को बाहर ले गई। दरवाजा बंद हो गया।

ओबराय के दांत भिंच गए। नजरें बंद दरवाजे पर टिकी रहीं।

"हरामजादी ने पूरी तरह सिखा-पढ़ाकर, इसे मेरे पास भेजा है।" दांत भींचे बड़बड़ा उठा, ओबराय ।

■■■

बंगले के पिछवाड़े, पीछे वाली दीवार के साथ सर्वेन्ट क्वार्टर बने थे। सर्वेन्ट क्वार्टर के रूप में वे कतार में बने चार, एक कमरे के सैट थे और वैसे ही चार वन रूम सैट, ठीक उनके ऊपर बने थे। ऊपर जाने के लिए नीचे, खुले से ही सीढ़ियां शुरू हो जाती थीं। नई हुई सफेदी में वे सर्वेन्ट क्वार्टर चमक रहे थे।

सुमित्रा, बेदी को लेकर वहां पहुंची!

"ये है सर्वेन्ट क्वार्टर।" सुमित्रा बोली--- "मैं और दयाल इस वाले क्वार्टर में रहते हैं। वो दोनों दरबान उन कोनों वालों में रहते हैं मतलब कि नीचे का एक और ऊपर के चारों क्वार्टर खाली हैं। पसन्द कर ले, कोई भी।"

बेदी ने ऊपर जाती सीढ़ियों और ऊपर के क्वार्टरों को देखा।

"मैं ऊपर वाले क्वार्टर में रहूंगा।"

"आ ऊपर...।"

दोनों सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंचे।

बेदी ने कोने वाला क्वार्टर पसन्द किया। वहां सीढ़ियां कुछ दूर थीं। सीढ़ियां जब ऊपर समाप्त होती तो चार फीट की गैलरी, चारों क्वार्टरों के दरवाजे के सामने थी। कोने वाले क्वार्टर में एक खिड़की साइड की तरफ खुलती थी। यानी कि उसमें हवा-रोशनी दूसरों की अपेक्षा ज्यादा बेहतर थी।

क्वार्टर क्या, शानदार कमरा था।

डबल बैड, उस पर बिछी बढ़िया चादर और उसके साथ के तकिये। कमरे में छोटे से टेबल के अलावा दो कुर्सियां। खिड़कियों पर पर्दे लटक रहे थे। अटैच बाथरूम था। छत पर पंखा था। कोने में छोटा-सा फ्रिज रखा हुआ था। टी.वी. था, जरूरत की हर चीज वहां मौजूद थी।

दिनेश ओबराय ने अपनी हैसियत के मुताबिक ही नौकरों का ध्यान रखा था।

"ये तो रहने की बहुत अच्छी जगह है।" बेदी के होंठों से निकला।

"हां, यहां नौकरों को किसी तरह की कोई कमी नहीं।" सुमित्रा बोली--- "और नौकरों को काम भी पूरा करना पड़ता है।"

बेदी सिर हिलाकर रह गया।

"विजय नाम है तेरा ?" सुमित्रा उसके पास आ गई थी।

"हां।" बेदी ने उसे देखा।

"तू तो बहुत खूबसूरत है।" सुमित्रा के स्वर में प्यार था--- "मुझे बहुत अच्छा लगा तू...।"

जवाब में बेदी मुस्कराया।

"वो दयाल। मेरा पति वो तो मुझे जरा भी पसन्द नहीं। रात होते ही थका-हारा सो जाता है और मुझे नींद नहीं आती।”

बेदी मुस्कराता हुआ उसे देख रहा था।

"तेरा ब्याह हो गया ?"

"नहीं।"

सुमित्रा ने दोनों हाथों से प्यार से उसकी बांह पकड़ ली। उसकी छातियां बेदी की बांह से रगड़ खाने लगी। वो बांह पर दबाव डालने लगी।

"फिर तो तू यहां अकेला रहेगा।" अब उसकी आवाज में अजीब-सा नशा आ बसा था।

बेदी ने उसी मुस्कान के साथ सहमति में सिर हिलाया। उसका दिमाग तेजी से चल रहा था कि जिस काम के लिए वो यहां आया है, उसमें ये सुमित्रा उसकी सहायता कर सकती है। उसके काम आ सकती है।

"मैं तेरे को कैसी लगी विजय ?" सुमित्रा अपना चेहरा उसके करीब ले आई थी।

"अच्छी, अच्छी लगी।" बेदी जैसे इन हालातों के लिए खुद को तैयार कर रहा था।

"सच!" प्यार में डूबे स्वर में कहते हुए वो बेदी से कुछ चिपक-सी गई थी। सांसों में कुछ तेजी आ गई।

बेदी ने उसकी आंखों में झांका। फिर नीचे देखा। उसने कमीज-सलवार पहन रखा था। जिससे कि उसका शरीर पूरी तरह ढका हुआ था, परन्तु ढके शरीर में भी दम-खम पूरा नजर आ रहा था।

"देखता क्या है, पकड़ ले ना।" कहते हुए सुमित्रा ने उसकी छाती पर सिर रख दिया।

बेदी ने कमर में बांहें डाली और उसे अपने साथ भींच लिया।

"आह!" सुमित्रा के होंठों से सिसकारी निकली--- "सुन मैं रात को आऊंगी, जब दयाल सो जाएगा।"

"जल्दी मत कर सुमित्रा ।" बेदी प्यार से बोला--- "मेरी नई-नई नौकरी है अभी कुछ दिन ठहर जा।"

"कुछ दिन में तो मैं अपने आप में ही जल जाऊंगी। मैं..."

तभी उनके कानों में कदमों की आहट पड़ी।

सुमित्रा छिटक कर अलग हो गई। अपने बिगड़े चेहरे पर काबू पाया और कह उठी।

"ये है तुम्हारा क्वार्टर। जब काम खत्म हो जाए तो...।"

तभी चालीस वर्षीय एक व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया। उसने कमीज-पायजामा पहन रखा था और साधारण-सी शक्लो-सूरत वाला व्यक्ति था। उसे देखते ही सुमित्रा कह उठी।

'दयाल, ये विजय है। मालकिन का ड्राइवर और ये मेरे पति दयाल हैं। मालिक ने कहा कि इसे क्वार्टर दिखा दूं । तू यहां कैसे आया। मैं तो आ ही रही थी।"

"काम बहुत पड़ा है।" विजय को देखते हुए दयाल ने शांत स्वर में कहा।

"चल, मैंने तो पहले ही कहा है कि मैं तो आ ही रही थी।" कहने के बाद सुमित्रा ने विजय से कहा--- "लंच का वक्त हो चुका है। तुम्हें खाना किचन से लाना पड़ेगा। लेकिन यहां के रास्तों के बारे में तुम्हें नहीं मालूम, इसलिए मैं या दयाल अब तो तुम्हें खाना यहीं दे जाएंगे और शाम तक सारे रास्ते दिखा देंगे। लंच के बाद मैं तुम्हें गैराज दिखा दूंगी। वहां से गाड़ियों को निकालकर धो-धुलाई करके, ऐसे चमका देना कि मालिक-मालकिन खुश हो जाएं। काम ठीक नहीं किया तो तुम्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा।"

"मैं किसी को शिकायत का मौका नहीं दूंगा।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा।

"इसे मालिक के बारे में बता दिया है।" दयाल ने धीमे स्वर में कहा।

"थोड़ा-सा बताया है। बाकी भी बता दूंगी कि मालिक, नौकरों को अपने काम में लगा ही देखना पसन्द करते हैं। फालतू बात करना-सुनना उन्हें पसन्द नहीं। उनके सामने कभी जुबान मत चलाना।"

बेदी ने सहमति में सिर हिलाया।

"मालिक उसी नौकर को पसन्द करते हैं, जो उनका इशारा समझे। उनके सामने सिर झुकाये और मालकिन अपने काम से मतलब रखती है। उनके कमरे से बाहर क्या हो रहा है। इस बात की वो परवाह नहीं करती।"

बेदी ने पुनः हौले से सिर हिलाया।

"एक बात और...।" सुमित्रा, दयाल पर निगाह मारकर कह उठी--- "मालिक-मालकिन में जरा भी नहीं पटती। कई बार तो मालिक हमारे सामने ही मालकिन को पीट चुके हैं। मालिक के सामने कभी भी मालकिन की तारीफ मत करना।"

"बस कर सब अभी बताएगी क्या।" दयाल कह उठा--- "काम बहुत पड़ा है।"

"चल-चल।" फिर वो बेदी से बोली--- "मैं फिर आऊंगी। काम खत्म करके। बाकी की बातें बताने।"

दयाल और सुमित्रा चले गए।

बेदी को मन ही मन तसल्ली थी कि उसने नौकरी पा ली। वो बंगले में पहुंच गया और अब जल्दी ही बंगले में छिपा रखे नब्बे करोड़ तलाश करके, उन्हें हासिल करने की कोशिश करेगा। आगे बढ़कर उसने फ्रिज खोला तो भीतर पानी की एक-दो बोतलें नजर आई, बाकी का फ्रिज पूरी तरह खाली था।

बेदी ने ठंडे पानी की बोतल निकाल ली। चेहरे पर सोच के भाव उभरे हुए थे।

■■■

ओबराय ने सिगार ऐश-ट्रे में डाला और कमरे से बाहर जाने के लिए उठा कि तभी दरवाजा खोलकर प्रिया ने भीतर कदम रखा।

ओबराय की निगाह उस पर जा टिकी।

प्रिया ने छोटी-सी स्कर्ट और ब्रा के साइज का टॉप डाल रखा था। अगर वो बिना कपड़ों के होती तो उस पर नजरें इस कदर न टिकती, जितनी कि अब टिक रही थी। कयामत ढा रही थी वो। उसके टॉप में से पूरी की पूरी छातियां बाहर हुई पड़ी थी और पारदर्शी स्कर्ट उसके शरीर के आकर्षण को और बढ़ा रही थी। उसकी लम्बाई, लम्बे बाल और कपड़ों का ये कायदा-कानून, नाभी के आसपास का नजारा, अच्छे-भले इन्सान की खोपड़ी खराब कर देने के लिए काफी था।

ओबराय की चमक पूर्ण नजरें उसे सिर से पांव तक देखे जा रही थी।

प्रिया के होंठों पर कातिल मुस्कान उभरी।

“कोशिश नहीं करोगे?" प्रिया की आवाज में मस्ती थी।

"किस बात की ?" ओबराय का स्वर कठोर था। नजरें प्रिया के चेहरे पर जा टिकीं ।

"अपना वारिस पैदा करने की।" दिलकश अंदाज में मुस्कराई प्रिया।

"तुम आजकल, बहुत ज्यादा मेरे पास आ रही हो।" ओबराय की आवाज में चुभन आ गई थी।

"हां। क्योंकि मैं तुम्हारा वारिस पैदा करना चाहती हूं। ना पैदा करने की स्थिति में तुम मुझे तलाक दे दोगे। दूसरी शादी कर लोगे। छ: महीने का वक्त दिया है तुमने मुझे। और मैं चाहती हूं कि इन छः महीनों में तुम्हें खबर दूं कि तुम बाप बनने वाले हो।" प्यार भरे स्वर में कहते हुए प्रिया मस्तानी चाल से आगे बढ़ी और खूबसूरत बैड पर जा लेटी ।

ओबराय की निगाहें पुन: उसके जिस्म पर फिरने लगीं।

"तुम जिसे ड्राइवर बनाकर लाई हो, वो मुझे पसन्द आया।" नजरें उसके बदन पर दौड़ रही थीं।

"बनाकर नहीं लाई। ड्राइवर लाई हूं। आओ, कब तक खड़े, इस तरह देखते रहोगे।"

"एक ही बात है। वैसे वो ड्राइवर न होकर किसी अच्छे खानदान का लगता है।"

"होगा। मैंने उसके बारे में पूछताछ नहीं की।" प्रिया ने लापरवाही से कहा।

"उसने मेरी हर बात का जवाब इस तरह दिया जैसे पूरी तरह रिहर्सल करके आया हो।"

"समझदार होगा वो और हर तरह के लोगों से उसका वास्ता पड़ चुका होगा। आओ दिनेश। क्यों देर लगा..."

ओबराय अपनी कमीज के बटन खोलने लगा।

"रहने दो। कपड़े मैं उतारूंगी। कम आन..."

ओबराय आगे बढ़ा। बैड के पास पहुंचकर स्लीपर उतारे और बैड पर लेटते हुए प्रिया के ऊपर छाता चला गया। उसकी हरकतें शुरू हो गई। जबकि प्रिया के चेहरे पर नफरत के भाव आ गए।

"बहुत खूबसूरत है तुम्हारा ड्राइवर। कब से जानती हो उसे।" अपने काम में व्यस्त ओबराय कह उठा।

"कल पहली बार मिली थी। बेकार की बातें मत करो। जो काम कर रहे हो। उसकी तरफ ध्यान दो। तुम्हारी बातों से लग रहा है कि तुमने उसे नौकरी पर रख लिया है।" प्रिया के हाथ उसकी पीठ पर फिर रहे थे।

"हां। उसे रहने के लिए सर्वेन्ट क्वार्टर दे दिया है।" ओबराय का स्वर शांत था।

"जल्दी करो दिनेश।" प्रिया की उंगलियां उसके कपड़ों को खोलने लगी--- "मुझे मां बना दो। मैं तुम्हारा वारिस..."

ओबराय ने अपने सूखे पतले होंठ, प्रिया के गुलाबी होंठों पर रख दिए।

■■■

लंच के बाद बेदी शाम पांच बजे तक गाड़ियां चमकाने में लगा रहा।

बंगले में दो गैराज थे। एक में एक विदेशी कार थी और दूसरे गैराज में विदेशी वैगन और विदेशी ही कार थी। वैगन जापानी थी और उसके भीतर, बैठने से लेकर, सोने और चाय-खाना बनाने तक का पूरा इन्तजाम था। लम्बे सफर के लिए वो वैगन बढ़िया थी। चलते-फिरते घर की तरह थी।

बेदी ने तीनों गाड़ियों को अन्दर-बाहर से साफ करके चमकाया। उनका तेल-पानी चैक किया। उदयवीर के गैराज की वजह से उसे पूरी तरह मालूम था कि गाडियों में क्या-क्या चैक किया जाता है।

शाम हो चुकी थी, उसे इसी काम में लगे।

जब वैगन का बोनट बंद करके पलटा तो ठिठक गया।

चंद कदमों के फासले पर दिनेश ओबराय खड़ा उसे देख रहा था। शरीर पर कीमती गाउन और वैसा ही पायजामा था। दाएं हाथ की उंगलियों में सिगार दबा था।

बेदी ने तुरन्त खुद को संभाला और जरा-सा झुककर बोला।

"गुड ईवनिंग सर।" आवाज में मिठास थी उसे देखने के पश्चात ओबराय ने सिगार का कश लेकर, वैन पर निगाह मारी।

"मैं तो तुम्हें नकली ड्राइवर समझ रहा था।" ओबराय के शांत स्वर में स्वभाविक कठोरता थी।

"मैं समझा नहीं मालिक।" बेदी का दिल धड़का।

"जिस तरह तुम वैन का ब्रेक आयल, इंजन आयल और बाकी चीजें चैक कर रहे थे। उससे तो लगता है तुम्हें गाड़ियों की जानकारी है।" ओबराय ने सीधे-सीधे उसके चेहरे को देखा।

"मालिक। एक ड्राइवर को गाड़ियों के इंजन के बारे में जितनी जानकारी होनी चाहिए। उतनी ही मुझे है।" बेदी ने स्वर को मासूम सा बना लिया--- "इतनी जानकारी होनी भी चाहिए कि मालिक लोगों को, परेशानी न उठानी पड़े जब रास्ते में थोड़ी सी खराबी की वजह से, गाड़ी बंद हो जाए।"

"बातें अच्छी कर लेते हो।" ओबराय का स्वर पहले जैसा ही था--- "तुमसे बातें करते हुए लगता है, जैसे मैं किसी सेल्समैन से बात कर रहा हूं। तुम्हारे लहजे से, कुछ ऐसा ही महसूस होता है।"

सेल्समैन ? बेदी सकपकाया। रायल सेफ कम्पनी का माना हुआ सेल्समैन ही तो था वो। सिर में, दोनों दिमागों के बीच गोली न फंसती तो, अभी भी वो किसी को सेफ बेचने के लिए पटा रहा होता ।

"मालिक। मैंने सेल्समैनी कभी नहीं की ?" बेदी ने उसी शांत मासूम स्वर में कहा।

ओबराय के पतले-भिंचे होंठों पर मुस्कान उभरी और गायब हो गई।

"मुझे किसी का भी अंदाज, रंग-ढंग पसन्द नहीं आता।" ओबराय ने सिगार का कश लिया--- "लेकिन तुम्हारा हर अंदाज मुझे पसन्द आ रहा है। मालूम नहीं क्यों। तुम बता सकते हो ?"

"मैं.. मैं क्या कह सकता हूं।" बेदी को समझ नहीं आया कि क्या कहे।

देखता रहा ओबराय बेदी को।

"ये वैन कैसी लगी?" ओबराय बोला।

"बहुत अच्छी है मालिक।" बेदी ने फौरन सिर हिलाया।

"इसे ड्राइव करने में तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं होगी ?" निगाहें बेदी पर ही थीं, ओबराय की।

"मैंने ऐसी वैन कभी चलाई नहीं, लेकिन मुझे विश्वास है कि मैं इसे बिना किसी परेशानी के चला लूंगा।"

"गुड।" ओबराय ने सिगार का कश लिया--- "अच्छे सेल्समैन की यही निशानी है कि वो किन्हीं भी हालातों में अपना विश्वास कायम रखता है। अपने शब्दों की ताकत पर उसे हमेशा यकीन रहता है।"

बेदी शांत भाव में खड़ा रहा।

ओबराय ने कुछ नहीं कहा। वो पलटा और धीरे-धार चलता हुआ वहां से चला गया।

बेदी ने गहरी सांस ली। जब तक ओबराय सामने रहा वो सामान्य बना रहा था। परन्तु उसके जाते ही, बेदी ने कुछ व्याकुलता महसूस की। दिल कुछ रफ्तार से धड़कने लगा। इतना तो बेदी ने महसूस कर लिया था कि दिनेश ओबराय की आंखों में धूल झोंकना आसान काम नहीं । वो इन्सान का चेहरा देखकर, दिल का हाल बता देने में माहिर है। वो यहां ड्राइवर है, परन्तु ओबराय बार-बार उसके सेल्समैन होने पर जोर दे रहा है। आखिर ओबराय ने उसमें ऐसा क्या देखा कि उसे, उसके सेल्समैन होने का शक हुआ ?

कुछ तो अवश्य ओबराय ने महसूस किया ही होगा ?

बेदी ने खुद को समझाया कि, वो ओबराय से संभल कर रहे।

उसके बाद बेदी ने दोनों कारों और वैगन को गैराजों में रखा छिपी निगाहों से वो प्रिया ओबराय की तलाश भी कर रहा था, लेकिन वो नजर नहीं आई। बेदी अपने क्वार्टर पर जाने की सोचकर बंगले के पिछवाड़े की तरफ पहुंचा कि तभी सुमित्रा दिखी जो अपने क्वार्टर से निकलकर, बंगले की तरफ जा रही थी। बेदी पर निगाह पड़ते ही वो मुस्कराई।

बेदी को भी मुस्कराना पड़ा।

"गाड़ियां साफ कर दी विजय ?" पास आते ही वो बोली।

"हां। चमका दी।"

"ठीक तरह काम करोगे तो नौकरी बनी रहेगी। आओ मैं तुम्हें किचन तक का रास्ता बता दूं।"

बेदी ने सिर हिलाया और सुमित्रा के साथ बंगले के पिछवाड़े नजर आ रहे दरवाजे की तरफ बढ़ गया। नौकरी पा लेने के पश्चात, बंगले में प्रवेश करने का ये उसका पहला मौका था।

बेदी ने किचन तक जाने का छोटा सा रास्ता देखा। वो रास्ता ऐसा था कि जैसे बंगले का हिस्सा कट जाता हो। बंगले के भीतर की तरफ जाने के लिए या तो बीच में पड़ने वाले मोड़ से मुड़ना पड़ता था या फिर किचन में प्रवेश करके, किचन के दूसरे दरवाजे से निकल कर, बंगले में जाया जा सकता था।

किचन कमरे जितना विशाल था और एक साथ दस आदमी वहां काम कर सकते थे।

"दयाल नहीं है ?" किचन में निगाहें दौड़ाते हुए बेदी ने पूछा।

"बाजार गया है सामान लाने। आने ही वाला होगा।” सुमित्रा मुस्कराई।

बेदी ने सिर हिलाया। सुमित्रा उसके पास आ गई। करीब से भी करीब ।

"मेरा दिल तुम पर आ गया है विजय। दयाल मुझे बोर करता है।" आवाज में अजीब से भाव थे।

"पागल मत बनो।" धीमे स्वर में कहते हुए बेदी पीछे हटा--- "यहां कोई भी आ सकता है। और मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि नई नौकरी है मेरी। इस नौकरी को मैं खोना नहीं चाहता। कुछ दिन मुझसे दूर रहो।"

"रात को आ जाती हूं। किसी को क्या पता...।"

"नहीं।" एकाएक बेदी के होंठों पर मुस्कान और शब्दों में सेल्समैनी वाले भाव आ गए--- "मेरी बात मानो सुमित्रा । कुछ दिन आराम से निकाल लो। उसके बाद तो वही होना है, जो तुम कहोगी।"

सुमित्रा ने गहरी सांस ली।

"ठीक है। जहां सूखा इतनी देर पड़ा रहा, वहां कुछ दिन और सही। घूंट लगाते हो क्या ?"

"क्या ?"

"घूंट-ह्विस्की ?"

"नहीं। मैं नहीं पीता।" बेदी ने शांत भाव में सिर हिलाया।

"मैंने तो इसलिए पूछा था कि अगर मन हो तो रात को दयाल के पास आ जाना। वो क्वार्टर में छिपकर घूंट भरता है। वैसे मालिक ने मना कर रखा है कि कोई भी पीने जैसा काम नहीं करेगा।" सुमित्रा ने लापरवाही से कहा।

"ये बातें बाद में करेंगे। गाड़ियां साफ करके पसीने से भर चुका हूं। क्वार्टर पर जाकर मैं नहाना चाहता हूं।"

"तुम आराम करो। मेरे होते हुए किसी बात की फिक्र मत करो। रात को मैं तुम्हें खाना दे जाऊंगी।" वो प्यार से बोली।

"पागलों वाली बातें मत करो। सब नौकर किचन में आकर अपना खाना ले जाते हैं तो मैं भी ऐसा ही करूंगा। वरना दूसरे सोचेंगे कि इन दोनों में खिचड़ी पक रही है कोई। दयाल भी शक कर सकता है।"

सुमित्रा ने फौरन समझने वाले ढंग में सिर हिलाया।

"ये तो मैंने सोचा ही नहीं था।" सुमित्रा कह उठी--- "तुम अपना खाना खुद ही ले जाना। मैं नहीं आऊंगी देने। मुफ्त में बदनाम होने का क्या फायदा। किसी को क्या पता कि कुछ हुआ नहीं है अभी।" कहकर वो दिलकश ढंग से मुस्कराई।

"मैं चलूं ।"

"याद है ना, कुछ दिन बाद हम..."

"पक्का याद है। नई नौकरी की मजबूरी न होती तो मैं अभी काम पूरा कर देता। " बेदी भी मुस्कराया।

“किचन में।"

"हां।"

"हाय दैया, मैं मर जाऊं।" सुमित्रा ने छाती पर हाथ रखकर आंखें फैलाते हुए गहरी सांस ली।

■■■

रात को आठ बजे बेदी किचन से अपना खाना ले आया था। खाने का थाल भरा पड़ा था और बढ़िया खाना था। दयाल की नजरें बचाकर, सुमित्रा ने बेदी के खाने में ढेर सारा मक्खन डाल दिया था। जब खाने का थाल लेकर क्वार्टरों के पास पहुंचा तो एक दरबान क्वार्टर के बाहर ही घास पर चादर बिछाए खाना खा रहा था। गन को उसने चार कदम दूर दीवार के साथ खड़ा कर रखा था।

उसने बेदी को आते देखा तो कह उठा।

"आ भई ड्राइवर । तू है मालकिन का ड्राइवर ।"

“हां।” बेदी के होंठों पर मुस्कान उभरी। ड्राइवर के तौर पर वो इस घर का नौकर बन चुका था। ऐसे में घर के सब नौकरों से यारी गांठना जरूरी था। बेदी खाने के थाल सहित उसकी बिछी चादर पर बैठता हुआ बोला--- "यहां तो सब कुछ बहुत अच्छा है भाई। रहने को बढ़िया जगह। बढ़िया खाना।"

"और हर काम वक्त पर करना।" खाते हुए वो मुस्कराया--- "सुमित्रा बता रही थी, विजय नाम है तेरा।"

'हां।" बेदी ने भी खाना शुरू कर दिया।

"मेरा नाम नन्दराम है। अभी बहादुर आएगा, खाना खाने जब मैं खाकर चला जाऊंगा। मेरी ड्यूटी रात को तीन बजे तक चलेगी, तब तक बहादुर नींद ले लेगा। तीन बजे वो आएगा और मैं नींद ले लूंगा। फिर सुबह दस बजे मैं ड्यूटी पर पहुंच जाऊंगा। तेरी ड्यूटी बढ़िया है, कार चलाई। साफ कर दी और आराम से बैठ गए।"

"तुम्हारी और बहादुर की ड्यूटी मालिक ने तय की है ?" खाना खाते विजय बोला ।

कमरे के भीतर जल रही लाइट में वहां सब कुछ स्पष्ट नजर आ रहा था।

"नहीं। मालिक हमारे काम में दखल नहीं देते। वो सिर्फ ये चाहते हैं कि हम दोनों में से कोई एक हर वक्त गेट पर मौजूद होना चाहिए। मैंने और बहादुर ने आपस में सारा प्रोग्राम तय कर रखा है। तू कौन गांव का है ?"

बेदी ने यूं ही जयपुर के पास के एक गांव का नाम लिया।

"देखने में तो तू साब लगता है।" खाना खाते हुए नन्दराम हंसा।

"हां।" बेदी शांत भाव में मुस्करा पड़ा--- "अब मैं क्या कहूं नन्दराम, भगवान ने मुझे पैदा ही ऐसा किया है।"

"तेरा बाप भी तेरी तरह ही था।"

"नहीं।"

"फिर तू इतना गोरा और खूबसूरत कैसे हो गया?"

"मालूम नहीं।" बेदी ने मासूमियत से कहा--- "लेकिन सुना है एक बार हमारे गांव में सप्ताह भर के लिए अंग्रेज आकर ठहरा था। उसके बाद कईयों के घर गोरे बच्चे पैदा हुए। ये उसी अंग्रेज के कदमों का असर होगा।

नन्दराम खुलकर हंसा।

"मान गए उस्ताद।" नन्दराम हंसी रोकते हुए बोला--- "मजाक तू बढ़िया कर लेता है।"

बेदी बातों के दौरान बराबर खाना खाने में व्यस्त था। नजरें छिपी-छिपी सी बंगले की तरफ भी घूम रही थीं। परन्तु प्रिया ओबराय उसे कहीं भी नजर नहीं आई।

"मालिक का ड्राइवर नहीं है कोई, क्या मालिक खुद कार ड्राइव करते हैं।" बेदी ने लापरवाही से पूछा।

"मालिक कम ही बाहर जाते हैं। महीने में सिर्फ दस दिन। जब जाना होता है तो पास वाली ब्रांच में फोन कर देते हैं और आधे घंटे में ड्राइवर हाजिर हो जाता है। मालिक को भला किस चीज की कमी। बहुत बड़े आदमी हैं।"

"सो तो है।"

रात के ग्यारह बज रहे । बेदी अपने क्वार्टर में मौजूद था। लाइट ऑफ कर रखी थी और नजरें बाहर बंगले पर थी। प्रिया ओबराय को तलाश कर रही थी। लेकिन वो नजर नहीं आई। बेदी उलझन में था कि, उसे यहां लाने के बाद वो नजर क्यों नहीं आई?

बहादुर से भी उसकी मुलाकात हो चुकी थी। वो खाना खाकर अपने क्वार्टर में नींद में डूब चुका था। रात तीन बजे उसने गेट पर दरबान की जगह लेनी थी। कुछ देर पहले ही दयाल और सुमित्रा अपने क्वार्टर में आ पहुंचे थे। कभी-कभार उनकी बातों की आवाजें आ जाती थीं ।

बेदी बारह बजे नींद लेने के लिए बैड पर जा पहुंचा। बैड पर लेटते ही मस्तिष्क में पुनः नब्बे करोड़ घूमने लगे कि, किस बहाने से वो बंगले में प्रवेश पाकर, उस दौलत को ढूंढे।

■■■

तीस दिन

"तीस दिन।" सुबह आंख खुलते बेदी गहरी सांस लेकर बड़बड़ा उठा— “मेरी जिन्दगी के आखिरी तीस दिन बचे हैं। सिर्फ एक महीना। और इस महीने के भीतर किसी भी दिन मेरी मौत अचानक हो सकती है। या फिर तीसवें दिन मर जाऊंगा। नहीं, मैं नहीं मरूंगा। मैं एक सौ छत्तीस साल जैसी लम्बी जिन्दगी जिऊंगा।"

बड़बड़ाहट के साथ बेदी बैड पर उठ बैठा। शरीर पर सिर्फ अण्डरवियर था। क्योंकि रात को पहनने के लिए फिलहाल उसके पास कोई कपड़े नहीं थे।

माथे पर उभर आई पसीने की बूंदों को बेदी ने साफ किया। उसे जल्दी से कुछ करना होगा। नब्बे करोड़ को तलाश करना होगा कि वो बंगले में कहां है। आज किसी न किसी बहाने बंगले में प्रवेश करना ही होगा। कोई रास्ता निकालना होगा, बंगले में जाने का।

होंठ भींचे बेदी बाथरूम में जाकर हाथ-मुंह धोया फिर वर्दी पहनकर दरवाजे से बाहर निकला तो, छोटी सी बालकनी के नीचे दयाल खड़ा नजर आया।

"दयाल चाय मिलेगी ?" बेदी ने कहा।

दयाल ने ऊपर देखा ।

"सुमित्रा किचन में है। उसे बोल दो। बना देगी।" दयाल बोला।

बेदी सीढ़ियां उतरकर, किचन की तरफ जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ा।

सुमित्रा किचन में ही थी और चाय गिलास में डाल रही थी।

"नींद कैसी आई विजय ?" सुमित्रा उसे देखकर मुस्कराई।

"बढ़िया।" विजय मुस्कराया--- "चाय मिलेगी।"

सुमित्रा ने किचन के खुले दरवाजे की तरफ देखा फिर धीमे से बोली।

"ये मालिक के लिए बनाई थी। तुम ले लो। मालिक को और बना देती हूं।" कहने के साथ ही उसने जल्दी से चाय का पानी पुनः गैस पर रख दिया।

बेदी ने चाय का गिलास उठाया और मुस्कराकर बोला।

"तुम मेरा कितना ध्यान रखती हो ?"

"और तुम्हें मेरा जरा भी ख्याल नहीं।" सुमित्रा मुंह बनाकर कह उठी।

"कुछ दिन रुक जाओ। मैं तुम्हारा इतना ध्यान रखूंगा कि तुम मेरे से तंग आ जाओगी।" बेदी हौले से हंसा ।

"सच।" सुमित्रा ने अपना हाथ छाती पर रखा--- "हाय दैया, मैं मर जाऊं।"

"सुमित्रा ।" चाय का घूंट लेते हुए बेदी ने कहा--- "मालकिन बाहर कब जाती है ?"

"मालूम नहीं। कभी रोज जाती है तो कभी पांच-पांच दिन बाहर नहीं निकलती। मजे से रहो तुम। मालकिन ने जब भी बाहर जाना होगा, तुम्हें खबर भिजवा देंगी। वैसे भी दस-ग्यारह से पहले तो वो बाहर जाती ही नहीं। अभी तो वे नींद से भी नहीं उठीं।" चाय बनाने में लगी, सुमित्रा ने कहा।

"इसका मतलब मुझे कई-कई दिन खाली बैठना पड़ सकता है। "

"हां। मजे से रहो।"

"इस तरह तो मैं बोर हो जाऊंगा। कुछ और काम है मेरे लिए।" बेदी ने चाय का घूंट भरा।

"और काम ?"

"हां, ताकि मैं खाली न रहूं। जैसे बंगले की थोड़ी-बहुत सफाई ही कर दूं।"

"ओह! अगर तुम सफाई करते हो तो मेरा और दयाल का काम भी हलका हो जाएगा। इस काम में मैं तुम्हारा साथ दे दूंगी। लेकिन ये काम तो तुम मालिक की इजाजत से ही कर सकते हो।"

"मालकिन की इजाजत से नहीं ?"

"नहीं। मालिक जो चाहते हैं, वही होता है। वैसे मालिक को  पसन्द नहीं कि कोई बाहरी आदमी बंगले में आए। अगर चाहो तो तुम इस बारे में मालिक से बात कर सकते हो।" सुमित्रा ने चाय को कप में डाला। फिर उसे ट्रे में रखा और ट्रे उठाते हुए बोली--- "मैं मालिक को चाय देने जा रही हूं।"

"तुम मेरे लिए इस बारे में मालिक से बात कर लेना कि...।" बेदी ने कहना चाहा।

"यहां किसी की सिफारिश लगाना मना है। मालिक चाहते हैं, सब अपने काम से मतलब रखें।" सुमित्रा ने शांत स्वर में कहा और ट्रे लिए बाहर निकलती चली गई।

नहा-धोकर बेदी ने ब्रेकफास्ट किया। वर्दी पहनकर क्वार्टर से बाहर निकला और नीचे उतर आया। सुमित्रा और दयाल के क्वार्टर का दरवाजा बाहर से बंद था। स्पष्ट था कि वो किचन या बंगले के कार्यों में व्यस्त होंगे।

बेदी ने बंगले की पहली मंजिल की खिड़कियों पर नजर मारी। प्रिया ओबराय नजर नहीं आई। बेदी आगे बढ़ गया। उसके पास कोई काम नहीं था। गैराज में पहुंचा और यूं ही वहां खड़ी कार से छेड़छाड़ करने लगा। स्टार्ट करके उसे गैराज से बाहर ले आया। इसी तरह वक्त बिताता रहा। मन ही मन वो उस वजह से बेचैन हो रहा था कि, वो बंगले में जाना चाहता था। नब्बे करोड़ तलाश करने का मौका नहीं मिल रहा था उसे और उसकी जिन्दगी के ज्यादा से ज्यादा तीस दिन ही बाकी बचे थे।

यूं ही इधर-उधर टहल कर वक्त बिताता रहा। एक बार तो गेट पर ड्यूटी दे रहे नन्दराम के पास भी फेरा लगा आया था। परन्तु दस मिनट बाद ही नन्दराम ने बेदी से कहा था।

"विजय भाई, मालिक पसन्द नहीं करते कि काम के दौरान नौकर बातचीत करें। वो चाहते हैं कि काम के वक्त सिर्फ काम की तरफ ही ध्यान दिया जाए। मालिक को अच्छा नहीं लगेगा कि हमें इस तरह बातें करते देखकर।"

बेदी, नन्दराम के पास से हट गया था।

तब करीब बारह बज रहे थे, जब उसने दिनेश ओबराय को टहलने वाले अंदाज में बंगले के मुख्य द्वार से बाहर निकलते देखा। आज दूसरा गाउन-पायजामा पहन रखा था। उंगलियों में  सिगार फंसा था। वो बाहर निकलते ही सीधा लॉन में पहुंचा और झूले पर बैठकर धीमे-धीमे उसे हिलाने लगा। आसमान पर बादल के काले टुकड़े मंडरा रहे थे। इस कारण धूप न के बराबर थी। मौसम अच्छा लग रहा था।

बेदी ने खुद को पक्का किया और आगे बढ़ते हुए, ओबराय के पास जा पहुंचा।

"गुड नून मालिक।" बेदी ने दोनों हाथ आगे की तरफ बांधे और थोड़ा सा झुका ।

सिगार का कश लेते हुए ओबराय की निगाह उस पर जा टिकी।

"मालिक। अगर ड्राइवर के तौर पर मेरे लिए कोई काम न हो तो, कोई और काम बता दें। मेरा वक्त कट जाएगा।"

"कैसा काम ?" ओबराय के पतले-भिंचे होंठ हिले ।

"जो भी आप हुक्म करें।" बेदी का स्वर वैसा ही था।

"गाड़ियां साफ कर लो।" ओबराय के लहजे में लापरवाही थी।

"साफ है मालिक।"

"मेरे पास कोई काम नहीं है।" ओबराय की नजरें उसके चेहरे पर थीं— “दयाल या सुमित्रा में पूछ लो, अगर उनके पास तुम्हारे लायक कोई काम हो तो...।"

"जो हुक्म मालिक।" बेदी बोला--- "मैं कुछ देर के लिए बाजार जाकर, रात को पहनने के लिए कपड़े लाना चाहता हूं।"

"मेरे पुराने कपड़े शायद हों, रात को पहनने वाले। अगर तुम चाहो तो वो पहन सकते हो।"

बेदी अपने चेहरे पर खुशी के भाव ले आया।

"इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है मालिक कि मुझे आपके कपड़े पहनने को मिल जाएं।"

उसे देखते हुए ओबराय की निगाहों में एकाएक चुभन आ गई।

"दयाल तुम्हें कपड़े दे जाएगा।"

"जी मालिक। मैं दयाल और सुमित्रा से काम के बारे में पूछ लूं कि...।"

बेदी की बात पूरी होने से पहले ही ओबराय ने सिर हिला दिया।

बेदी पलटा और मुख्य द्वार की तरफ बढ़ गया।

ओबराय की चुभन भरी निगाह बेदी की पीठ पर टिकी रही और बेदी भी उसकी नजरों की चुभन को अपनी पीठ पर महसूस करते हुए सोच रहा था कि ओबराय पर कैसे अपना विश्वास जमाए ?

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