भूमिका

एडोल्फ हिटलर बारह वर्ष तक जर्मनी का शासक रहा। उसके शासनकाल की परिणति द्वितीय विश्‍व युद्ध में हुई, जिसमें लाखों लोग मारे गए। यही कारण है कि आज तक के इतिहास में उसकी गणना सबसे घृणित, दुष्ट व्यक्तियों में की जाती है।

उसे शुरू से ही कला में बहुत दिलचस्पी थी और वह एक वास्तुकार बनने के ख्वाब देखा करता था। युवा एडोल्फ हिटलर ने इस तरह अनेक वर्ष वियना में बिताए। सोलह साल की उम्र में स्कूल छोड़ने के बाद उसने स्थानीय लोगों और पर्यटकों को चित्रित पोस्टकार्ड बेचकर अपना गुजारा किया। अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने में उसे अपने पिता से कोई मदद नहीं मिली और जब उसके पास पैसे नहीं रहे, उसने बेघर लोगों की तरह रहना शुरू कर दिया। कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि अनाथ आश्रम में रहने के दौरान उसे बहुत हद तक सामी जाति के विरुद्ध पक्षपात का सामना करना पड़ा, क्योंकि शहर में यहूदी समुदाय के लोगों की बहुतायत थी। इससे उसे अपनी विचारधारा बनाने में मदद मिली।

हिटलर सन् 1913 में म्यूनिख, जर्मनी गया और वहाँ की कला एवं वास्तुशिल्प ने उसे मोहित कर दिया। तथापि अपनी सौंदर्य विषयक क्षुधा को तुष्ट करने के साथ ही उसने प्रथम विश्‍व युद्ध में बवेरियन सेना में नौकरी की और लुडविग तृतीय के अधीन फ्रांस तथा बेल्जियम में सेवा की। दुश्मन की गोलाबारी में घायल होने पर उसे एक बैज प्रदान किया गया।

एक जर्मन देशभक्त होने के बावजूद हिटलर को कोई सरकारी पद नहीं मिल सका, क्योंकि उसके पास वहाँ की पूर्ण नागरिकता नहीं थी। प्रथम विश्‍व युद्ध के बाद भी वह सेना में ही रहा और तरक्की करते हुए उसने पुलिस जासूस का दर्जा हासिल कर लिया। जहाँ उसे प्रचार एवं ‘राष्ट्रीय सोच’ की एक योजना के अंतर्गत छोटे-छोटे राजनीतिक गुटों को यह समझाने का काम सौंपा गया कि जर्मनी को यहूदियों के कारण लड़ाई का मुँह देखना पड़ा।

शनै:-शनै: एडोल्फ हिटलर एक अच्छा वक्ता बन गया। उसका भाषण सुनने के बाद लोग पागलों की तरह उसका पीछा करने लगे और वह जो कुछ कहता, उस पर विश्‍वास कर लेते। हिटलर कुछ ही समय बाद नव-नामित नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी का नेता बन गया और साम्यवाद, पूँजीवाद तथा यहूदियों जैसे वर्गों के खिलाफ उसके भाषणों को हर स्तर पर राष्ट्रीय समर्थन प्राप्त हुआ।

हिटलर ने अपने अल्पकालिक कारावास के दौरान अपनी आत्मकथा ‘मैन कैंफ’ लिखवाई, जिसमें उसने बताया है कि जब वह कलाकार के रूप में प्रगति कर रहा था तो उसे किन-किन परेशानियों से जूझना पड़ा। उसकी कला का किस तरह गलत अर्थ लगाया गया और कैसे उसकी राजनीतिक धारणाओं ने रूप लिया। इसके प्रकाशन से हिटलर को लाखों की कमाई हुई और दूसरे विश्‍व युद्ध तक तो जर्मनी में इसका पढ़ना लाजिमी हो गया।

संयुक्त राज्य अमेरिका और विश्‍व के अन्य भागों में आई महामंदी के कारण जर्मनी भी आर्थिक कठिनाइयों के घेरे में आ गया। हिटलर ने निम्‍न और मध्य वर्गों के बीच की दूरी को मिटाकर उन्हें एक ही स्तर पर लाने में पर्याप्त सफलता पाई, क्योंकि उसे आशा थी कि ऐसा करके वह जर्मनी को उसका पिछला गौरव वापस दिला सकेगा। उसकी पार्टी ने उसे एक पद सौंप दिया, जिससे कि उसे जर्मन नागरिकता मिल जाए; फिर उसने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा। हिटलर को चांसलर (शासनाध्यक्ष) के रूप में शपथ दिलाई गई और उसकी नाज़ी पार्टी ने बहुत से सरकारी कार्यालयों पर तत्काल कब्जा जमा लिया। अंतत: अनेक पार्टियों की पूरी मदद से हिटलर ने तानाशाह की गद्दी प्राप्त कर ली। उसने सेना को अपने नियंत्रण में ले लिया, जिस पर पहले किसी का अधिकार नहीं था।

हिटलर ने जर्मनी की आधारभूत सुविधाओं में सुधार किया और विभिन्न वर्गों के रहन-सहन के स्तर को बेहतर बनाया। उसने अन्य यूरोपीय देशों को अपने अधीन करने और उसकी प्रगति के मार्ग में आनेवाली किसी भी बाधा, विशेषकर यहूदियों, को नेस्तनाबूद करने का अभियान छेड़ दिया। हिटलर ने जब पोलैंड पर हमला किया, किसी भी दूसरे देश ने उसे रोकने के लिए कोई खास कोशिश नहीं की। फ्रांस ने युद्ध की घोषणा तब की, जब हिटलर नीदरलैंड पर आक्रमण कर चुका था। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और फ्रांस को शिकस्त खाने में जरा भी देर नहीं लगी। हिटलर ने फिर जापान का साथ देते हुए अमेरिका पर हमले की घोषणा कर दी और इस तरह दूसरे विश्‍व युद्ध के लिए जमीन तैयार हो गई।

वर्ष 1939 और 1945 के बीच, हिटलर की हार होने तक, उसने और हेनरिच हिम्लर ने मिलकर 1 करोड़ 10 लाख लोगों को जान से मरवा दिया, जिनमें 60 लाख से अधिक यहूदी थे। इसे ‘सर्वनाश’ कहा गया है। रूस, ब्रिटेन और अमेरिका के म्यूनिख पर कब्जा कर लेने पर ही युद्ध समाप्त हुआ। जब विजयी फौज के सिपाही हिटलर के बंकर से कुछ सौ मीटर के फासले पर थे, हिटलर ने अपनी नई पत्नी इवा ब्रॉन और अपने पालतू कुत्ते ब्लांडी सहित खुद को मार डाला।

नाज़ी तानाशाह एडोल्फ हिटलर के बारे में यह पुस्तक पढ़ने योग्य है। इक्कीसवीं सदी के इस बहुचर्चित व्यक्तित्व के बहुत से जाने-पहचाने पहलुओं और अनेक अज्ञात रहस्यों पर इस पुस्तक में प्रकाश डाला गया है, क्योंकि लोगों में अभी तक उसके बारे में जानने की जिज्ञासा है। 

—राजीव तिवारी