रात्रि के लगभग आठ बजे थे ।
सुनील अपने फ्लैट में प्रविष्ट हुआ ही था कि टेलीफोन की घंटी घनघना उठी । उसने बड़ी अनिच्छा से फोन उठाया और बोला - “हैलो, सुनील स्पीकिंग ।”
और दूसरी ओर से गालियों का तूफान फट पड़ा । लगभग एक दर्जन शैतान की आंत जैसी लम्बी और सोनी लिस्टन के घूंसे जैसी वजनी गालियां जब सुनील के कान में पड़ चुकी तो बन्दर की स्वाभाविक आवाज सुनाई दी - “तुम जिन्दा हो ।”
“हां प्यारे ।” - सुनील मीठे स्वर से बोला - “ऊपर वाले की कृपा है ।”
“सच-सच बता दो ।” - बन्दर का जला भुना स्वर सुनाई दिया - “कहीं मैं तुम्हारी आत्मा से तो बात नहीं कर रहा हूं । अगर मर चुके हो तो फूल भिजवा दूं ।”
“नहीं बरखुरदार ।” - सुनील बोला - “स्वयं सुनील कुमार चक्रवर्ती ही तुमसे सम्बोधित है ।”
क्षण भर शान्ति रही ।
“तुम्हें मेरा तार मिला था ?” - फिर बन्दर का स्वर सुनाई दिया ।
“हां, सुबह आफिस जाने से पहले ही मिल गया था ।”
“फिर भी अभी तक तुम घर ही बैठे हो ?”
“देखो बेटा बात यह है...”
“बात-वात कुछ नहीं । तुम तैयार रहना, मैं दस मिनट में तुम्हे लेने आ रहा हूं ।”
और दूसरी ओर से रिसीवर को क्रेडिल पर पटके जाने की ध्वनि सुनाई दी ।
सुनील ने भी मुंह बिगाड़ कर रिसीवर अपने स्थान पर रख दिया ।
बन्दर मैडिकल कालेज का विद्यार्थी था । उसका वास्तविक नाम तो जुगल किशोर था लेकिन वह कालेज में भी अपनी मित्र मंडली में बन्दर के नाम से प्रसिद्ध था । वह बेहद दुबला-पतला तीखे नाक नक्श वाला सुन्दर युवक था, आंखें इतनी कमजोर थीं कि बिना चश्मे के उसे दो फुट पर स्थित वस्तु भी धुंधली दिखाई देती थी और चेहरे पर जो चश्मा वह लगाता था उसके शीशे और फ्रेम दोनों इतने मोटे थे कि हैरानी होती थी कि उसकी नाजुक सी नाक इतना बोझ सम्भाल कैसे पाती थी । केवल करोड़पति बाप की सिफारिश के कारण ही उसे मैडिकल कालेज में प्रवेश मिल पाया था ।
आज प्रातः सुनील को बन्दर का तार मिला था जिसमें उसे शाम को आठ बजे मैरीना बीच पर होने वाली पार्टी में शामिल होने के लिये निमन्त्रित किया गया था । क्योंकि बन्दर ने यह निमन्त्रण तार द्वारा भेजा था इसलिये सुनील फौरन समझ गया था कि बन्दर फिर किसी पर आशिक हो गया था । ऐसे अवसरों पर वह टेलीफोन का सहारा नहीं लेता था, न ही वह पत्र लिखता था बल्कि सदा तार देकर बुलाया करता था । बन्दर का तार आना ही इस बात का प्रर्याप्त प्रमाण होता था कि वह फिर किसी के इश्क में फंस गया था । बन्दर की इस विशेषता का सुनील भी कायल था कि बन्दर लड़कियों से मित्रता गांठने में अपना सानी नहीं रखता था । कितनी भी नकचढी लड़की क्यों न हो बन्दर किसी न किसी प्रकार उसे अपनी पटड़ी पर ले ही आता था ।
सुनील बन्दर की ऐसी पार्टियों से बेहद कतराता था क्योंकि वहां सिवाय मूर्खता भरी बातों और लड़कियों की चीख पुकार के कुछ होता नहीं था और यही कारण था कि जब उसे मैरीना बीच पर होना चाहिये था, वह अपने फ्लैट में बैठा था ।
एक बार तो उसका जी चाहा कि वह बन्दर के आने से पहले ही फ्लैट से खिसक जाये लेकिन फिर उसने यह विचार त्याग दिया । ऐसे अवसरों पर बन्दर उसे कहीं न कहीं से खोद ही निकालता था और फिर भी यदि सुनील नहीं मिलता था तो वह पार्टी ही किसी ऐसे दिन के लिये स्थगित कर देता था जब सुनील उसे मिल सकता हो ।
उसी समय बगोले की तरह बन्दर उसे फ्लैट में प्रविष्ट हुआ । सुनील को यह देखकर बड़ी हैरानी हुई कि बन्दर की आंखों पर चश्मा नहीं था ।
“अभी तैयार नहीं हुए ।” - वह एक अलमारी को सम्बोधित करता हुआ बोला ।
“भई मैं तो इधर बैठा हूं ।” - सुनील ने आवाज लगाई । ऐनक के बिना तो बन्दर खुद को भी अच्छी तरह नहीं देख पाता था, उसे क्या खाक तलाश करता ?
“खैर जहां भी हो, तैयार हो जाओ ।” - वह बोला और एक कुर्सी पर बैठने की चेष्टा में फर्श पर कलाबाजी खा गया । सुनील ने उसे पकड़ कर एक कुर्सी पर बैठाया ।
“तुम्हारा चश्मा कहां गया ?” - सुनील ने पूछा ।
“तुम फौरन तैयार हो जाओ ।” - बन्दर बात बदलता हुआ बोला - “बाकी लोग नीचे कार में तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं ।”
सुनील समझ गया बन्दर चश्मे के विषय में बात नहीं करना चाहता था ।
“आखिर मामला क्या है ?” - उसने पूछा ।
“एक लड़की है ।” - बन्दर बोला ।
“वह तो होगी ही, नहीं तो तुम्हारी मनहूस शक्ल यहां कैसे दिखाई देती ?”
“मैं उस पर आशिक हो गया हूं ।” - वह फिर बोला ।
“कब से ?”
“पिछले सोमवार से । एक ज्योतिषी ने बताया था कि आशिक होने के लिये सोमवार बड़ा अच्छा दिन होता है ।”
“लेकिन यह दुर्घटना घटी कैसे ?”
“होना क्या था ? मैं आशिक होने लायक लड़की की तलाश में घूम रहा था कि मुझे गीता दिखाई दे गई । मैं फौरन ही उसकी दांई आंख पर मर मिटा और फिर यारी पक्की हो गई ।”
“और तुम्हारे चश्मे को क्या हुआ ?”
“वह कहती है कि मैं चश्मे के बिना अधिक सुन्दर लगता हूं ।”
“तो इसका अर्थ यह हुआ कि कुसूर तुम्हारे चश्मे का है ।”
“नहीं, कुसूर उसकी सुन्दरता का और सर्दियों के मौसम का है ।”
“बेटा बन्दर ।” - सुनील बुजुर्गों की तरह बोला - “अपने इस ढांचे को दुर्घटनाओं से बचाये रखना चाहते हो तो चश्मा लगा लो ।”
“यह नहीं हो सकता सुनील, चश्मे तो आते जाते रहते हैं लेकिन सर्दियों का मौसम बहुत देर से आता है ।” - वह भावुक स्वर में बोला - “और सुन्दर लड़की तो इन्सान के जीवन में बहुत ही देर से आती है ।”
सुनील ने अधिक बात करना बेकार समझ कर बन्दर की बांह पकड़ी और फ्लैट से बाहर निकल आया ।
“प्रमिला को भी बुला लो ।” - बन्दर बोला -
“वह फ्लैट में नहीं है ।” - सुनील ताला लगाता हुआ बोला - “उसकी आज नाइट ड्यूटी है, चलो ।”
बन्दर अपनी उसी खटारा सी कार पर आया था जो सारे शहर में मशहूर थी । हार्न को छोड़कर कार के हर हिस्से में से आवाज निकलती थी । स्पीडोमीटर कई सालों से बेकार हो चुका था । कार की स्पीड जानने का तरीका यह होता था पन्द्रह मील प्रति घंटा पर दाहिना मडगार्ड हिलता था, बीस मील पर दांया-बांया दोनों मडगार्ड हिलते थे, पच्चीस मील पर फुटबोर्ड थरथराने लगता था, तीस मील पर कार की छत हिलती थी और इन्जन का एक-एक पुर्जा खड़खड़ा जाता था । तीस मील से अधिक तेज वह कार चलती ही नहीं थी ।
बन्दर शहर के करोड़पति सेठ का इकलौता लड़का था, बढिया से बढिया माडल की कारें उनकी कोठी पर मौजूद थी लेकिन बन्दर को तो अपना खटारा ही पसन्द था । उसके विचार से लड़कियां उसके खटारे से ही अधिक प्रभावित होती थीं ।
कार में चार लड़कियां थीं और दो लड़के थे ।
बन्दर ने एक-एक को छूकर सबका परिचय कराया ।
“यह गीता है ।” - उसने बताया ।
सुनील ने बन्दर की पसन्द गीता को बड़े गौर से देखा । मामूली शक्ल सूरत की लड़की थी और सुन्दर होने से बाल-बाल बची थी । हालांकि बन्दर उसकी दांई आंख पर फिदा था लेकिन सुनील के विचारानुसार उसकी किसी आंख में सुन्दर कहलाने लायक कोई बात नहीं थी ।
“ये मीता, नीता और रीता हैं ।” - बन्दर बाकी लड़कियों का पचिय देते हुये बोला ।
बन्दर की प्रेमिका के अतिरिक्त बाकी तीन लड़कियां पर्याप्त सुन्दर थीं लेकिन बार-बार याद रखने की चेष्टा करने के बाद भी सुनील यह नहीं जान पाया कि रीता कौन थी और गीता कौन थी ?
“बन्दर !” - वह बन्दर को एक ओर ले जाकर बोला - “ये बाकी की तीन लड़कियां गीता की बहने हैं क्या ?”
“नहीं सहेलियां हैं ।”
“नाम तो इनके एक ही जैसे हैं ।”
“नाम से क्या होता है, तासीर तो सबकी अलग-अलग है ।”
“लेकिन अगर तुम गीता पर आशिक हो तो बाकी पलटन किसलिये ले जा रहे हो ?”
“गीता अकेली आने के लिये तैयार नहीं हो रही थी ।”
सुनील चुप हो गया और कार के पास वापिस लौट आया ।
बड़ी खींचतान के बाद सब लोग उस कार में सवार हो गये ।
बन्दर ने बहुत कहा कि कार वह चलायेगा लेकिन सुनील ने इसका सख्त विरोध किया । चश्मे के बिना बन्दर को कार चलाने देना सबके लिए इकट्ठी आत्महत्या का सामना करने जैसा था ।
फिर बाद में न जाने कौन स्टियरिंग पर बैठा । दरअसल कार में इतनी भीड़ थी कि यह जानना असम्भव था कि चला कौन रहा है । स्टियरिंग वील पर कोई बैठा था, ब्रेक पर किसी का पांव था, तो क्लच पर किसी का, गियर किसी और के हाथ में था । हर दो मिनट बाद शोर मच जाता था ।
“मैं गियर बदलूंगा ।” - कोई चिल्लाता - “तुम जरा क्लच दबाना ।”
“जरा ब्रेक लगाना, मैं मोड़ने लगा हूं ।”
बड़ी मुश्किल से सब लोग सही सलामत बीच पर पहुंचे । बन्दर ने बीच पर स्थित शानदार होटल ‘मेरिना’ में टेबल रिजर्व करवा रखी थी ।
बन्दर को रात में चश्मे का अभाव बुरी तरह खल रहा था लेकिन वह भी ढीठ था, सुनील की बांह थामे-थामे पार्टी के साथ भीतर आ गया । हाल में से गुजरते हुये बन्दर के पांव के नीचे एक कुत्ते की दुम आ गई । कुत्ते ने एक शानदार नारा लगाया ।
“आई एम सारी जैन्टिल मैन ।” - बन्दर एकदम घूम कर शिष्टता में बोला ।
हाल कहकहों से गूज उठा । लड़कियां भी हंस पड़ी ।
“यार सुनील ।” - बन्दर नर्वस होकर बोला - “अभी क्या हुआ था ? सब लोग एकाएक हंस क्यों पड़े थे ?”
“तुमने एक बहुत ऊंची नस्ल के कुत्ते की पूंछ पर पांव रख दिया था ।”
“तो फिर क्या हुआ, मैंने उससे काफी तो मांग ली थी ।”
“अब पता नहीं क्या बात है, लेकिन वह कुत्ता तुमसे बहुत नाराज है ।”
बन्दर कुछ क्षण चुप रहा और फिर बोला - “दरअसल, सुनील भाई, बात यह है कि आज तक कोई कुत्ता मेरी जिन्दगी में दाखिल नहीं हुआ है ।”
सब लोग अपने-अपने स्थानों पर बैठ गये ।
बन्दर गीता से सटकर बैठा हुआ था और बड़ी ललचाई हुई नजरों से उसकी दांई आंख को देख रहा था ।
लड़कियां इतना शोर मचा रही थीं कि आर्केस्ट्रा पर बजती हुई जाज की धुन सुनाई नहीं दे रही थी । सब अपनी ही धुन में मग्न थीं और बड़ी बेरहमी से बन्दर के माल पर हाथ साफ कर रही थी । किसी की बन्दर को परवाह नहीं थी और वह था कि बिछा चला जा रहा था ।
सुनील असाधारण रूप से चुप था, उसे बन्दर पर रहम आ रहा था और लड़कियों पर क्रोध ।
बन्दर गीता से कछ अजीब ही किस्म की बातें कर रहा था । बोलता-बोलता वह गीता पर इतना झुक जाता था कि गीता को उसे धकेल कर परे करना पड़ता था ।
उसी समय बन्दर ने बिजली के एक बहुत बड़े बल्ब की ओर संकेत किया और गीता को सम्बोधित करके बोला - “ये चान्द...”
सुनील ने जल्दी से उसका हाथ घुमाकर खिड़की की ओर किया जिसमें से बाहर चान्द निकला दिखाई दे रहा था ।
बन्दर ने चान्द की जी भरके तारीफ की और गीता से राय पूछी ।
“चान्द अच्छा है ।” - गीता बोली - “तारे भी कोई खास बुरे नहीं है लेकिन ये पेस्ट्रियां सबसे ज्यादा अच्छी हैं ।”
“देखो ।” - बन्दर ने फिर रोमांटिक होने की चेष्टा करते हुए कहा - “कितना बढिया जाज बज रहा है !”
“समोसे जरा ठण्डे हो गये हैं, वैसे बने अच्छे हैं ।” - गीता का उत्तर था । बन्दर नर्वस होकर चुप हो गया ।
“गीता !” - वह क्षण भर बाद साहस करके बोला - “चलो बीच पर चलें ।”
आशा के विरुद्ध गीता फौरन उठ खड़ी हुई । उनके साथ ही लड़के भी उठे और आर्केस्ट्रा की स्टेज की ओर बढ गये ।
सुनील मेज पर तीन लड़कियों के साथ अकेला रह गया ।
“सुनील !” - बन्दर जाता हुआ बोला - “तुम्हारे पास मेरी तीन लड़कियां उधार हैं सम्हाल कर रखना, वापसी पर वसूल कर लूंगा ।”
बन्दर गीता को लेकर बीच पर चला गया ।
बाकी लोगों के उठते ही लड़कियां सुनील का सिर खाने लगी । सुनील बोर होने लगा ।
“मिस्टर...” - एक लड़की ने बोलने की चेष्टा की ।
सुनील ने जल्दी से मगज के कबाब की एक प्लेट उसकी ओर सरकाते हुआ कहा - “लीजिये दिमाग खाइये ।”
लड़की हतप्रभ होकर उसका मुंह देखने लगी ।
“माफ कीजियेगा ।” - सुनील एक कबाब पर थोड़ी सी चटनी डालकर दूसरी की ओर बढाता हुआ बोला - “मुझे आप लोगों के नाम याद नहीं रहे हैं लेकिन, मीता, नीता, पपीता, फजीता... जो कुछ भी आप हैं, मगज जाहिर है, इसे चाट जाइये ।”
लड़कियां कुछ झिझकीं ।
“अब खाइये भी दिमाग ।” - सुनील आग्रह करता हुआ बोला - “आप तो तकल्लुफ कर रही हैं... लीजिये दिमाग चाटिये ।”
लड़कियां हैरान होकर एक दूसरे का मुंह देखने लगी और फिर एकाएक खिलखिलाकर हंस पड़ी ।
“क्या हुआ ?” - सुनील उसका मुंह ताकता हुआ बोला ।
“आप तो छुपे रुस्तम निकले ।” - एक बोली ।
“अच्छा ?” - सुनील आश्चर्य प्रदर्शित करता हुआ बोला ।
“आप तो अपने मित्र से भी अधिक दिलचस्प आदमी हैं ।”
“अच्छा !” - सुनील आवाज को पहले से भी अधिक खींचता हुआ बोला ।
लड़की चुप हो गई ।
“आपकी शादी हो गई ?” - दूसरी लड़की अधिक स्मार्ट दिखने की चेष्टा करते हुए शोखी से बोली ।
“जी नहीं ।”
“मुहब्बत तो चल ही रही होगी ।”
“जी हां ।”
“किससे ?”
“विश्वास कीजिये किसी गाय भैंस से नहीं चल रही । है लड़की ही ।”
“तो फिर शादी कब हो रही है ?”
“कभी नहीं ।”
“कमाल है ।” - वह हैरान होकर बोली - “तो क्या आप महज ऐश करने के लिये ही मुहब्बत कर रहे हैं ।”
“जी हां, महज ऐश करने के लिये ही मुहब्बत कर रहा हूं, यदि आप हकीकत जानना चाहती हैं जो मैं शादी और मुहब्बत दो बिल्कुल अलग-अलग चीजें समझता हूं । शादी और चीज है और मुहब्बत और चीज । शादी के बाद हर आशिक की हालत खस्ता हो जाती है । नाना फड़नवीज ने कहा है कि प्रेमी पहले चुम्बन के लिए कोशिश करता है, दूसरा चुम्बन जीतता है, तीसरे के लिए खुशामद करता है, चौथा स्वीकार करता है और पांचवा, छटा, सातवां, आठवां, और बाकी सब चुम्बन उसे सहन करने पड़ते हैं । समझीं आप ? वैसे यदि आप चाहें तो पहले चुम्बन के लिए कोशिश करके देखूं ।”
लड़की का चेहरा लज्जा से लाल हो उठा ।
“मैं बीच पर जा रहा हूं ।” - सुनील उठता हुआ बोला - “लेकिन भगवान के लिए, जुगल के आने से पहले आप यहां से जाइयेगा मत । नहीं तो वह तीन लड़कियां मेरे से वसूल करेगा ।”
सुनील बाहर बीच पर आ गया और समुद्र के किनारे की ओर चल दिया ।
पेड़ों के एक झुरमुट के पीछे से बन्दर की आवाज आ रही थी । सुनील जरा और करीब हो गया । बन्दर घुटने टेके गीता के पांवों के पास बैठा हुआ था, उसका एक हाथ अपने सीने पर था और दूसरा बड़े ही रोमांटिक ढंग से हवा में लहरा रहा था ।
“क्या बताऊं गीता !” - बन्दर कह रहा था - “बस यह समझ लो कि मुझे मुहब्बत प्रकट करने के लिये शब्द नहीं मिल रहे हैं ।”
“तो मैं क्या डिक्शनरी हूं ?” - गीता का स्वर सुनाई दिया ।
“न सही, तुम मुझसे शादी तो कर रही हो न ?”
“अभी कछ पक्का नहीं है । अभी तो मैं केवल इतना कह सकती हूं कि आप मेरे सैमी-फाइनल में आ गये हैं ।”
“मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं गीता ! मैं जब तुम्हारे अनार के दानों जैसे दांत, सेब जैसे गाल, चेरी जैसे होंठ...”
“यह आप किसी लड़की का जिक्र कर रहे हैं कि फ्रूट सलाद का ?”
“गीता क्या तुम्हें मेरा बिल्कुल ख्याल नहीं... क्या मैं तुम्हें कभी याद नहीं आता ?”
“आप सिर्फ एक दिन याद आये थे मुझे ।”
“किस दिन ?”
“उस दिन मैं चिड़ियाघर गई हुई थी ।”
क्षण भर शान्ति रही, फिर लड़की बोली - “आप तो नाराज हो गए । जुगल साहब, मैं तो मजाक कर रही थी ।”
उसी समय सुनील की दृष्टि उस झुरमुट के पीछे ऊंचाई की ओर उठ गई । वहां से कोई चीज समुद्र में आकर गिरी । एक शोर सा सुनाई दिया, लहरों में एक हलचल सी पैदा हो गई । और फिर जब पानी शान्त हुआ तो उसे समुद्र में एक गठरी सी तैरती दिखाई दी ।
सुनील क्षण भर हिचकिचाया और फिर उसने अपने जूते और कोट उतार कर किनारे पर रख दिये और स्वयं समुद्र के ठन्डे पानी में घुस गया ।
समुद्र में डूबती उतराती उस वस्तु के पास पहुंचने में उसे दो मिनट से अधिक नहीं लगे । सुनील ने गठरी पर हाथ डाला और फौरन ही उसे महसूस हुआ कि वह एक मानव शरीर था । सुनील उत्तेजित हो उठा । उसने उस मानव शरीर को पीठ का सहारा दिया और किनारे की ओर तैरने लगा । वह अपनी पूरी शक्ति से तैरता हुआ उसे किनारे पर ले आया और उस शरीर को रेत पर डाल दिया ।
सुनील उसके पास खड़ा हांफता रहा । होटल में से निकलती हुई धुंधली सी रोशनी में उसे पेट के बल लेटे हुए मानव शरीर का ढांचा मात्र ही दिखाई दिया । वह अपने सांस को व्यवस्थित करके उस आकृति को उलटने के लिये झुका ही था कि उसे अपने पीछे से एक तेज चीख सुनाई दी । उसने घबराकर पीछे मुड़कर देखा ।
टार्च के तेज प्रकाश को उसने एक बेहद बदसूरत आदमी पर पड़ते देखा । पलक झपकते ही वह आदमी प्रकाश की हद में से निकल कर पेडों के झुरमुट में घुस गया । सुनील केवल एक क्षण के लिए उसका ढांचा देख सका । उस भारी जबडों वाले आदमी के होठ बड़े भयानक ढंग से लटके हुए थे उसकी पीठ पर एक बहुत ही घृणास्पद बड़ा-सा कूबड़ था ।
“सुनील, जल्दी... वह पेड़ों के पीछे गया है ।” - सुनील को बन्दर की आवाज सुनाई दी । उसके पास ही टार्च थामे एक और आदमी खड़ा था ।
सुनील पेड़ों की ओर भागा । बन्दर भी दूसरे आदमी के हाथ से टार्च छीन कर उसके पीछे भागा ।
“जरा रुको ।” - सुनील बन्दर को समीप आता देखकर बोला ।
सुनील ध्यानपूर्वक अन्धकार में कान लगाये खड़ा रहा । एक ओर से किसी के भागते कदमों की दूर होती हुई आवाज सुनाई दे रही थी ।
“तुम यहीं ठहरो ।” - सुनील बोला और आवाज की ओर भागा ।
कुछ देर बाद बन्दर को एक हल्की सी ठक की आवाज आई और उसके साथ ही किसी वजनी चीज के धप्प से जमीन पर गिरने का भारी स्वर सुनाई दिया ।
बन्दर टार्च लेकर उसी और भागा ।
टार्च के प्रकाश में उसे जमीन से उठने की चेष्टा करता हुआ सुनील दिखाई दिया ।
“मैंने उसे पकड़ लिया था ।” - सुनील उठता हुआ बोला - “लेकिन वह मुझे गिराकर भाग गया । हे भगवान, कैसी भयानक सूरत थी । लेकिन तुम्हें कैसे दिखाई दे गया वह ?”
“मैं गीता के साथ किनारे की ओर आ रहा था कि वह भागता हुआ आया और सीधा मुझसे आ टकराया ।”
“उसी कुबड़े ने पहले समुद्र में एक आदमी को फेंका था । उसे मैं समुद्र में से निकाल कर किनारे पर डाल आया हूं । पता नहीं वह जिन्दा है या मर...”
उसी समय एक फायर की आवाज हुई और गोली सनसनाती हुई सुनील के कान के पास से गुजर गई ।
“जुगल, लेट जाओ ।” - वह अपने आपको जमीन पर गिराता हुआ बोला - “लेट जाओ, जल्दी ।”
बन्दर भी जल्दी से सुनील के पास लेट गया ।
कितनी ही देर उनके सिरों पर से शोले से लपकते रहे । और फिर शान्ति छा गई ।
लगभग दस मिनट बाद सुनील उठ कर खड़ा हो गया ।
“गया ?” - बन्दर बोला ।
“हां ।” - सुनील बोला - “आओ, जरा उस आदमी को तो देखें जिसे मैंने समुद्र में से निकाला था ।”
टार्च के प्रकाश में रास्ता तलाश करते हुए वे वापिस उस मानव शरीर के पास लौट आये ।
शरीर वही था लेकिन उसकी पोजीशन बदली हुई थी ।
“मेरे जाने के बाद जरूर किसी ने इसे छेड़ा है ।” - सुनील बोला - “मैं इसे उल्टा पड़ा छोड़ गया था । लेकिन इसका शरीर करवट लेकर पड़ा हुआ है और... हां... जुगल, मुझे खूब याद है, मैंने शरीर पर कोट भी देखा था जो अब नहीं है ।”
बन्दर झुका और उसने शरीर को सीधा कर दिया । फिर एकाएक उसके मुंह में से एक भयपूर्ण चीख निकल गई ।
“सुनील ।” - वह दहल कर बोला ।
सुनील ने देखा । उस आदमी का सिर कटा हुआ था और उसकी गर्दन से लेकर पेट तक एक बहुत बड़ा छेद दिखाई दे रहा था । शरीर को भीतर से खोखला कर दिया गया था - पेट से लेकर गरदन तक मानव शरीर के भीतर जो कुछ भी होता है, सब निकाल लिया गया था - अंतडियां और शिरायें बाहर लटक रही थी और दिल का पूरा भाग गायब था ।
“यह... यह !” - बन्दर हकलाया - “यह पांचवी हत्या है । इससे पहले भी इसी दशा में चार शरीर मिल चुके हैं जिनमें से धमनियां और दिल गायब था ।”
सुनील को खूब याद था । पहली चार घटनाओं की रिपोर्ट भी उसी ने ‘ब्लास्ट’ में दी थी । अन्तर केवल इतना था कि पांचवी घटना घटित भी उसी के सामने हुई थी । पहली बार घटनायें भी बिल्कुल इसी ढंग से हुई थी । सबके शरीर में से दिल और दिल से जुड़ी हुई मुख्य-मुख्य रक्त वाहिनी नलिकायें निकाल ली गई थीं लेकिन किसी भी बार मृत की पहचान में कठिनाई उत्पन्न करने की चेष्टा नहीं की गई थी । यदि मृत का सिर काटा गया था तो आसपास कहीं पड़ा हुआ वह मिल भी गया था । पहले चारों शिकार साधारण लोग थे, न उनके पास धन था और न ही उनके कोई शत्रु थे । अब तक की घटना के आधार पर पुलिस ने अनुमान लगाया था कि हत्यारा कोई पागल व्यक्ति था ।”
“इस बार ।” - सुनील बोला - “पुलिस को अपराधी की तलाश करने के लिये कम से कम एक सूत्र तो मिल ही जायेगा मेरा एक भरपूर घूंसा उस कुबड़े की आंख पर पड़ा था । कल सुबह तक उसकी आंख के आसपास का भाग सूजकर चेहरे कम से कम एक इन्च उभर आयेगा ।”
“लेकिन जब तक उसकी आंख ठीक नहीं हो जायेगी, वह भला घर से निकलेगा ही क्यों ?”
“लेकिन वह कुबड़ा भी तो है । और शहर में कोई बीस पच्चीस हजार कुबड़े तो होंगे नहीं । जितने कुबड़े हैं, उन्हें चैक करना कोई कठिन काम नहीं होगा । मैं घर जा रहा हूं । तुम पुलिस को इस घटना की सूचना दे देना ।”
“और पार्टी...”
“भाड़ में गई पार्टी । देखते नहीं हो मैं सिर से पांव तक तर हो रहा हूं, ठंड के मारे जान निकल रही है और तुम मुझे उस बोरिंग पार्टी में फिर शामिल होने के लिये कह रहे हो ।”
बन्दर चुप हो गया
सुनील ने अपन जूते और कोट उठाया और टैक्सी लेकर अपने फ्लैट पर पहुंच गया । फ्लैट में घुसते ही उसने सबसे पहले दफ्तर फोन करके सारी घटना डिक्टेट करवा दी और फिर गीले कपड़े उतार कर बिस्तर में घुस गया ।
***
पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट रामसिंह बड़ी बेचैनी से कुर्सी में कसमसाया और फिर मेज के दूसरी ओर बैठे हुए कमिश्नर साहब को देखे लगा ।
बातचीत हत्यारे के पांचवे शिकार के विषय में ही हो रही थी ।
“लाश की शिनाख्त हो चुकी ?” - कमिश्नर घोरपड़े ने पूछा ।
“जी हां ।” - रामसिंह तत्परता से बोला - “मृत लॉ कालेज का विद्यार्थी था और अपने होस्टल के मित्रों से गप्पें लड़ाकर घर वापिस लौट रहा था कि हत्यारे का शिकार हो गया ।”
कमिश्नर घोरपड़े विचारपूर्ण मुद्रा में बैठा रहा ।
“सर !” - रामसिंह बोला - “इस सारे केस में एक बड़ी गौर करने योग्य बात है ।”
“क्या ?”
“आपने गौर किया होगा सर, कि पिछले ही दिनों नगर के कई बड़े प्रतिष्ठत व्यक्ति बड़े रहस्यपूर्ण ढंग से गायब हो गये हैं । जैसे नेशनल बैंक के डायरेक्ट मिस्टर खोसला, फिल्म प्रोडयूसर बनर्जी, इलैक्ट्रिकल इन्जीनियर रामपाल और अभी पिछले ही दिनों देश की सबसे बड़ी पेपर मिल के स्वामी मधोक साहब भी लापता हो गये हैं । ये सारे आदमी कहां हैं, इस विषय में उनके घनिष्ठतम सम्बन्धियों को भी जानकारी नहीं है और न ही उसकी लाश ही मिली है इसलिये ये भी नहीं माना जा सकता कि ये लोग अब इस संसार में नहीं रहे इन्जीनियर रामपाल को छोड़कर बाकी तीनों आदमियों के सम्बन्धियों ने तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई है और उनको जल्दी से जल्दी खोज निकालने के लिये प्रार्थना की गई है लेकिन रामपाल के सम्बन्धियों ने उसके खो जाने पर एक्शन जाहिर नहीं किया है । ऐसा मालूम होता है जैसे वे उसके गायब हो जाने से प्रसन्न हों । तहकीकात करने से यह भी मालूम हुआ है कि लापता होने से पहले इन लोगों ने बिना किसी का ध्यान आकर्षित किए काफी बड़ी-बड़ी रकमें अपने बैंकों में से निकाली हैं जिससे प्रकट होता है कि वे किसी पूर्व निर्धारित स्कीम के अनुसार ही गायब हुए हैं ।”
“लेकिन इन सब बातों का हत्यारे से क्या सम्बन्ध है ?”
“सम्बन्ध यह है सर, कि जब भी हत्यारे ने किसी को अपना शिकार बनाया है उसके दो दिन के भीतर ही मेरे बताए हुए चारों आदमियों में से कोई गायब हो गया है ।”
“और तुम समझते हो कि इन बातों में कोई सम्बन्ध है ?”
“जी हां, देखिये न...”
“खैर, होगा ।” - घोरपड़े उकताये हुये स्वर में बोला - “देखो रामसिंह, यह केस तुम्हारे हाथ में है इसलिये जो तुम ठीक समझते हो, करो । लेकिन जैसे कि तुम देख रहे हो पांच हत्यायें हमारी नाक के नीचे हो चुकी हैं और हम हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहे हैं, अखबारों में भी पुलिस की निष्क्रियता को खूब उछाला गया है । मैं अपने डिपार्टमेंट की यह तौहीन सहने के लिये तैयार नहीं हूं । यदि इस बार भी हत्यारा तुम्हारी आंखों में धूल झोंक कर छटी हत्या करने में सफल हो गया तो मुझे मजबूर होकर केस किसी अधिक योग्य व्यक्ति को सौंप देना पड़ेगा । तुम जा सकते हो ।”
“यस सर ।” - रामसिंह ने उठकर सलाम ठोका और बाहर आ गया ।
रामसिंह अपने कमरे में आ बैठा और चिन्तित सा चारों लापता व्यक्तियों के विषय में सोचता रहा । चारों ही भारी प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति थे और वे अपने-अपने कार्य क्षेत्र में अप्रत्याशित रूप से सफलता प्राप्त कर चुके थे । फिर उसे घोरपड़े का ख्याल आया ।
“साला !” - वह मन ही मन बुदबुदाया । उसे क्रोध इस बात पर आ रहा था कि कमिश्नर ने उसकी पूरी बात क्यों नहीं सुनी ।
उसी समय चपरासी ने उसे सुनील के आगमन की सूचना दी ।
“भेजो ।” - रामसिंह बोला और सम्भल कर बैठ गया ।
सुनील के कमरे में पहुंचने तक रामसिंह ने एक सिगार सुलगा कर उसके तीन-चार लम्बे-लम्बे कश ले डाले थे ।
“सुपर साहब ।” - सुनील उसके सामने बैठते हुये बोला - “किसी ने पीट दिया है क्या ?”
“तकदीर साली ने ही पीट रखा है यार ।” - रामसिंह रूखे स्वर से बोला ।
“क्यों, घोरपड़े साहब ने फिर कोई पटखनी दे दी है क्या तुम्हें ?”
रामसिंह चुप रहा ।
“अगर कहो तो मैं ही दो-दो हाथ जमाकार आऊं उस चिड़ीमार के बच्चे से ?”
“छोड़ यार !” - रामसिंह उखड़कर बोला - “यहां बेजार बैठे हैं और तुझे अठखेलियां सूझ रही हैं । केस की बात करो ।”
“केस की बात तो यही है प्यारे कि उस कुबड़े को तलाश करो जिसकी एक आंख सूजी हुई हो ।”
“लेकिन पहले तुम इस केस के विषय में मेरी मान्यता सुनो ।” - रामसिंह बोला - “साले कमिश्नर ने तो सुनी नहीं, मेरे पर उसे भरोसा ही नहीं है ।”
“बोलो ।”
उत्तर में रामसिंह ने कमिश्नर के सामने कही हुई सारी बातें दोहराई ।
“बात कुछ जंचती तो है तुम्हारी ।” - सुनील गम्भीरता से बोला - “लेकिन इन प्रतिष्ठित नागरिकों का हत्यारे से क्या सम्बन्ध हो सकता है ?”
“मुझे नहीं मालूम लेकिन कुछ न कुछ सम्बन्ध है जरूर । अगर मेरी थ्योरी ठीक है तो आखिरी हत्या के दो दिन के भीतर - यानी कल रात तक शहर का कोई प्रसिद्ध और सम्मानित व्यक्ति गायब हो जाना चाहिए । यदि हम उस आदमी को तलाश कर लें तो हत्यारे तक पहुंचना बच्चों का खेल रह जायेगा ।”
“सुपर साहब यह बेल मुंडेर चढने वाली मालूम नहीं होती है ।”
“लेकिन फिलहाल जब और कुछ सूझ नहीं रहा है, इस लाईन पर कोशिश करने से हर्ज नहीं है । पहले जो चार आदमी गायब हुए हैं, उन्हें ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि पांचवा आदमी भी धनी, प्रतिष्ठित और अपने क्षेत्र में अपार सफलता प्राप्त आदमी होना चाहिये । वह अपने सामाजिक जीवन से सन्तुष्ट नहीं होगा यानी कि अच्छा पति या पिता बनने की योग्यता उसमें नहीं होगी । शहर में इस प्रकार के तीस से अधिक आदमी नहीं होंगे और उनको बड़ी आसानी से चैक किया जा सकता है ।”
“और कुबड़े के विषय में क्या कर रहे हो ?”
“उसकी भी तलाश करवाई जाएगी । लेकिन क्या यह आवश्यक है कि तुम्हारा बताया हुआ कुबड़ा मिल ही जाए ।”
“कोशिश करने में क्या हर्ज है ?”
“सुनील, अगर मैं इस बार सफल नहीं हो सका तो यह केस मेरे हाथों से छीन लिया जायेगा । मेरी तो तौहीन होगी ही, तुम्हारे अखबार को भी इस डिपार्टमैंट से समाचार मिलने बन्द हो जायेंगे ।”
“चिन्ता मत करो प्यारे, जब तक सुनील के दम में दम है, ऐसा नहीं होगा ।”
रामसिंह अशान्वित हो उठा ।
“ओ के ओल्ड मैन ।” - सुनील उठता हुआ बोला - “विश यू बैस्ट आफ लक । वैसे में भी आजकल इसी केस पर काम कर रहा हूं । कोई नर्ई बात मालूम होगी तो तुम्हें जरूर बताऊंगा ।”
***
बाहर आकर सुनील कितनी ही देर फुटपाथ पर खड़ रहा । केस में आगे बढने के लिए उसे कोई लाइन नहीं मिल रही थी । उसका सारा ध्यान रात वाले कुबड़े पर ही केन्द्रित था लेकिन उसको खोज निकालना एक आदमी का काम नहीं था, उसे तो पुलिस ही तलाश कर सकती थी ।
कुछ सोच कर उसने एक टैक्सी ली और मिस्टर मधोक के घर पहुंच गया । मधोक मेहता रोड की एक कोठी में अपनी मां साथ रहता था । चालीस वर्ष की अवस्था में भी वह अविवाहित था । बेटे के गायब हो जाने से उसकी मां को बहुत धक्का लगा था और आरम्भ में तो उसने बड़ी सरगर्मी से उसकी लाश करवाई थी, अखबार में बड़े-बड़े पुरस्कारों को भी घोषणा की थी, लेकिन सब बेकार । थक हार कर उसने अपने आपको भाग्य के सहारे छोड़ दिया था ।
नौकर ने उसे ड्राइंग-रूम में बैठा दिया और कुछ क्षण बाद मिसेज मधोक उसके सामने आ बैठी ।
“मिसेज मधोक ।” - सुनील ने सम्मानपूर्ण स्वर से कहा - “आपको याद होगा कि मैं आपको पुत्र के गायब होने के दिनों भी आपसे मिला था । मैं यह जानना चाहता हूं कि मधोक साहब ने अपने विषय में स्वयं आपको कोई सूचना नहीं भेजी ?”
“तुम्हारा मेरे पुत्र से क्या सम्बन्ध है ?” - मिसेज मधोक सख्ती से पूछा ।
“जी ।” - सुनील हैरान होकर बोला - “हम लोग तो आप ही के लिए मधोक साहब को खोज निकालने की चेष्टा कर रहे हैं । क्या आप नहीं चाहती हैं कि वे लौट कर आ जाएं ?”
वे चुप रहीं ।
“गायब होने से पहले क्या आपने उनके व्यवहार में, उनकी दिनचर्या में, कोई अस्वभाविकता नोट की थी ?”
“नहीं ।”
“क्या उन दिनों कुछ अजनबी लोग उनसे मिलने आया करते थे ?”
“मुझे याद नहीं ।”
सुनील कुछ क्षण चुप रहा, फिर एकाएक बोला - “क्या मधोक साहब पिछले दिनों आपसे मिलने कोठी पर आए थे ?”
क्षण भर के लिए वृद्धा का चेहरा फक हो गया । वह कांपी और बड़ी कठिनाई से लड़खड़ाती हुई आवाज से बोली - “न... न नहीं ।”
“आप सच कह रही हैं ?” - सुनील सन्देहपूर्ण स्वर से बोला ।
वृद्धा ने कोई उतर नहीं दिया । कुछ क्षण वह चुपचाप बैठी रही फिर एकाएक उठकर खड़ी ही गई और भावरहित स्वर से बोली - “मुझे क्षमा कीजिए मैं इस समय आपके प्रश्नों के उत्तर देने में असमर्थ हूं ।”
वह चुपचाप लाठी ठकठकाती हुई कोठी के भीतरी भाग की ओर बढ गई । सुनील भी उठ खड़ा हुआ और द्वार की ओर चल दिया ।
“सुनो ।” - उसे वृद्धा की आवाज सुनाई दी ।
वह रुक गया और प्रश्नसूचक दृष्टि से उसकी ओर देखने लगा ।
“बेटा, भगवान के लिए कुबड़ों से बच कर रहो ।”
“कुबड़े ।” - सुनील आश्चर्य प्रदर्शित करता हुआ बोला - “कौन से कुबड़े ?”
उसे वृद्धा की बात बड़ी रहस्यपूर्ण लग रही थी ।
“मुझ से प्रश्न मत करो, बेटा ।” - वह थरथराती हुई आवाज में बोली - “तुम अभी जवान हो तुम्हारे करने के लिए और भी काम हैं दुनिया में । भगवान के लिए कुबड़ों से मत उलझो । वे बहुत भयनाक लोग हैं । तुम उनसे जीत नहीं सकते ।”
वह घूमी और चुपचाप वहां से चल दी ।
“सुनिए ।” - सुनील चिल्लाया ।
लेकिन वृद्धा जा चुकी थी ।
सुनील के दिमाग मे एक उलझन और बढ गई । वह चिन्तत सा कोठी से बाहर निकला और ‘ब्लास्ट’ के आफिस में पहुंच गया ।
“अए हए ।” - रिसेप्शनिस्ट रेणु ने उसे देखते ही सिसकारी भरी - “आज तो बिल्कुल देवानन्द लग रहे हो ।”
“रेणु डियर ।” - सुनील भन्नाए स्वर से बोला - “अभी दस मिनट बाद देखना जब मैं रिकार्ड रूम की फाइलों से सिर टकरा कर लौटूंगा तब के एन सिंह लग रहा हूंगा ।”
“बड़े उखड़ रहे हो ।” - रेणु माजाक उड़ाने की नीयत से बोली - “मालूम होता है किसी ने पटखनी दे दी है ।”
“कौन माई का लाल है” - सुनील रिकार्ड रूम की ओर बढता हुआ बोला - “जो सुनील गुरु को पटखनी दे सके ।”
सुनील कितनी ही देर रिकार्ड रूम में ब्लास्ट की पुरानी फाइलों में पिछली हत्याओं और लापता व्यक्तियों का विवरण पढता रहा हालांकि उसे रिपोर्टों का एक-एक शब्द याद था लेकिन फिर भी वह सोचकर पढ रहा था कि शायद किसी बात को उसने तब महत्त्व न दिया हो लेकिन अब वह महत्वपूर्ण हो उठी हो । अन्त में एक पैराग्राफ ने उसका ध्यान आकर्षित किया । लिखा था -
बड़े दुख का विषय है कि श्री मधोक उस समय अदृश्य हो गए हैं जबकि उनकी सबसे अधिक आवश्यकता थी । वे विदेशी विशेषज्ञों की सहायता से बढिया कागज बनाने की एक बहुत बड़ी फैक्ट्री भारत में लगाने की योजना बना रहे थे । उन्हें पेपर के निर्माण में दिलचस्पी लेने वाले कई उद्योगपतियों का भी सहयोग प्राप्त था । हमारे विषेष सम्वाददाता को प्लानिंग कमेटी के अध्यक्ष श्री शमशेर जी ने बताया है कि श्री मधोक के अभाव के कारण फैक्टरी की योजना अनिश्चित समय के लिए स्थगित कर दी गई है ।
शमशेर - शमशेर !
नाम सुनील के सिर में हथौड़े की तरह बजने लगा । एकाएक उसके मस्तिष्क में एक विचार बिजली की तरह कौंध गया । कहीं रामसिंह की थ्योरी के अनुसार अड़तालीस घण्टे में शमशेर जी हो तो गायब नहीं होने वाला है । शमशेर जी धनी था, प्रतिष्ठित था और सुनील की जानकारी के अनुसार अपने जीवन से असन्तुष्ट भी था । सुनील एक पार्टी में शमशेर जी को देख चुका था उसने उससे मिल लेना ही उचित समझा ।
लगभग आधे घन्टे में वह शंकर रोड पर स्थित शमशेर जी की शानदार कोठी में पहुंच गया ।
शमशेर जी की जगह सुनील को उसका सैक्रेटरी मिला । उसने बताया कि शमशेर जी शहर से बाहर गए हुए हैं और लगभग पन्द्रह दिन तक उनके लौट कर आने की सम्भावना नहीं है ।
“क्या आप बता सकते हैं” - सुनील ने पूछा - “कि मैं उनसे कहां मिल सकता हूं ?”
“उन्होंने किसी को भी अपना पता बताने के लिए मना कर दिया है । यदि आप चाहें तो आपका पत्र उन तक पहुंचाया जा सकता है ।”
“नहीं धन्यवाद, उसकी आवश्यकता नहीं है ।” - सुनील ने कहा ।
सुनील निराशा से सिर हिलाता हुआ कोठी से बाहर आ गया और एक पेड़ से लग कर खड़ा हो गया । जीवन में पहली बार ऐसा हुआ था कि उसे किसी केस में आगे बढने के लिए कोई लाइन ही नहीं मिल रही थी । उसने एक सिगरेट सुलगाया और उसके गहरे-गहरे कश लेने लगा ।
उसी समय उसकी दृष्टि एक बड़े ही अस्वाभाविक दृष्य पर पड़ी ।
एक आदमी बड़ी सतर्कता से कोठी के द्वार की ओर बढा ओर द्वार के पास रखे हुए कूड़े के ड्रम के पास रुक गया ।
सुनील पेड़ की आड़ में हो गया ।
उसने एक खोजपूर्ण दृष्टि अपने चारों ओर दौड़ाई और फिर बड़ी फुर्सी से ड्रम पर झुक कर उसमें पड़े कूड़े को टटोलने लगा । कुछ क्षण बाद उसने कूड़े में से एक लिफाफा खोज निकाला ।
सुनील उत्सुकता से सब कुछ देखता रहा ।
उसी समय उस व्यक्ति की दृष्टि सुनील पर पड़ गई । उसने जल्दी से लिफाफा अपनी जेब में रख लिया और विपरीत दिशा में तेजी से चलने लगा ।
सुनील कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा । जब वह काफी आगे निकल गया तो सुनील ने बड़ी सतर्कता से उसका पीछा करना आरम्भ कर दिया ।
चौराहे पर जाकर वह व्यक्ति एक बस पर चढ गया ।
सुनील ने भी एक टैक्सी पकड़ी और बड़ी सतर्कता से बस का पीछा करने लगा ।
वह आदमी उस स्थान से लगभग पन्द्रह स्टाप आगे रामपुर रोड पर उतरा और सड़क के किनारे पर ही स्थित एक इमारत में प्रविष्ट हो गया ।
कुछ क्षण बाद सुनील ने भी टैक्सी छोड़ दी और उस इमारत के पास आ गया । सूर्य अस्त हो चुका था और अन्धकार बढ रहा था । सुनील चुपचाप द्वार ठेल कर इमारत के लान में घुस गया । नीचे एक कमरे में प्रकाश था और उसकी खिड़कियां खुली हुई थी । सुनील दबे पांव उस खिड़की के नीचे आ गया । वह कुछ क्षण वहीं खड़ा अपने अगले कदम के विषय में सोचता रहा लेकिन फिर वह खिड़की के भीतर के दृश्य पर एक नजर डालने का लोभ संवरण न कर सका ।
उसने उचक कर भीतर झांका और आश्चर्य की एक हल्की सी सिसकारी उसके मुंह से निकल गई ।
भीतर एक आराम कुर्सी पर अधलेटा सा शमशेर भी अखबार पढ रहा था ।
सुनील जल्दी से नीचे उतर आया ।
तो सैक्रेटरी झूठ बोला था, उसने सोचा । वह तो कह रहा कि शमशेर जी नगर से बाहर गया हुआ है ।
अब उसे विश्वास सा होने लगा कि रामसिंह की थ्योरी के अनुसार पांचवी घटना के बाद शमशेर जी ही गायब होने की चेष्टा कर रहा था ।
उसी समय उसे भीतर से द्वार खटखटाए जाने का स्वर सुनाई दिया । सुनील फिर उचक कर खिड़की पर चढ गया और भीतर झांकने लगा ।
कमरे में वही आदमी प्रविष्ट हो रहा था, जिसका पीछा करता हुआ वह यहां तक आया था ।
“लिफाफा मिल गया, बद्री ?” - शमशेर जी में अखबार से सिर उठाकर पूछा ।
“जी हां ।” - बद्री ने लिफाफा उसकी ओर बढाते हुए आदरपूर्ण स्वर से कहा ।
“किसी ने देखा तो नहीं तुम्हें ?”
“जी नहीं ।”
“शाबाश” - शमशेर जी में चैन की गहरी सांस लेते हुए कहा - “सफर की सब तैयारियां हो गई हैं ?”
“जी हां ।”
“मैं सुबह दिन निकलने से पहले ही चला जाऊंगा । तुम आराम से सोना, मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं पड़ेगी, अब जाओ ।”
बद्री आदर से सिर झुकाकर बाहर निकल गया ।
शमशेर जी ने क्षण भर लिफाफे को खोलकर उसके भीतर झांका और फिर उसे उसी प्रकार बन्द करके एक अलमारी में रख दिया और अलमारी में ताला लगाकर उसने चाबी सावधानी से अपने गाउन की जेब में रख ली ।
सुनील की उस लिफाफे के प्रति उत्सुकता इतनी बढ गई थी कि उसके मस्तिक से अपने देखे जाने की सम्भावना ही उड़ गई । उसका चेहरा खिड़की की एक झिरी से जैसे चिपक कर रह गया था ।
उसी समय शमशेर जी अलमारी के पाल से घूमा और उसकी दृष्टि सीधी सुनील की दिशा में उठ गई ।
सुनील ने एक झटके से सिर नीचे खीच लिया और सांस रोक कर परिणाम की प्रतीक्षा करने लगा । लेकिन शमशेरजी ने शायद उसे देखा नहीं था । उसी समय खिड़की के बन्द होने का स्वर सुनाई दिया और फिर कमरे की बत्ती बुझ गई ।
बाहर पहले से भी अधिक अन्धकार छा गया ।
सुनील के दिमाग में वह लिफाफा घूम रहा था । लिफाफा जिसे बद्री कूड़े के ड्रम में से निकाल कर लाया था और अब वह उस कमरे की एक अलमारी में सुरक्षित था ।
भीतर से कमरे से बाहर निकलते हुए कदमों की क्षीण होती हुई आवाज उसे सुनाई दी ।
शमशेर जी उस कमरे से जा चुका था ।
सुनील कमरे के भीतर पहुंचने की तरकीबें सोचने लगा ।
उसने चुपचाप इमारत का एक चक्कर लगा डाला । उसने कई द्वारों को धकेल कर देखा लेकिन सब भीतर से बन्द थे ।
और अन्त में उसे एक खिड़की खुली हुई मिल गई ।
वह भीतर घुस गया । उसने अपनी जेब में सीमित प्रकाश वाली पैन के आकार की टार्च निकाली और उसकी सहायता से रास्ता खोजता हुआ वह उस कमरे में पहुंच गया जिसमें शमशेर जी बैठा था ।
उसने टार्च के प्रकाश में अलमारी में लगे ताले को परखा । ताला साधारण सा था लेकिन सुनील के पास उसकी खोलने का कोई साधन नहीं था ।
उसने कमरे की बाकी वस्तुओं का निरीक्षण करना प्रारम्भ कर दिया । अन्त में उसे एक तार का टुकड़ा मिल गया ।
उसने टार्च को अपने दांतों में पकड़ा और तार द्वार ताला खोलने की चेष्टा करने लगा ।
उसी समय उसे बाहर से एक हल्की सी आवाज आई जैसे कोई दबे पांव चल रहा हो ।
सुनील झपट कर द्वार के पीछे आ खड़ा हुआ ।
लगभग पांच मिनट गुजर गये लेकिन फिर कोई आवाज नहीं आई । उसने कुछ क्षण और प्रतीक्षा की लेकिन उसे अपने वहम समझ कर वह वापिस अलमारी के पास आ गया और ताला खोलने में जुट गया ।
कुछ क्षण बाद ही एक हल्की से क्लिक के साथ ताला खुल गया । उसने अलमारी खोलकर लिफाफा निकाल लिया ।
लिफाफे पर पता लिखा था -
भगवती प्रसाद वर्मा
25, रामपुर रोड
और एक कोने में भेजने वाली फर्म का पता छपा हुआ था - मेसर्स स्मिथ एण्ड होल्डन, लिंक रोड
सुनील ने जल्दी से लिफाफा खोला और बड़ी बेचैनी से उसके भीतर देखा ।
लिफाफे में भगवती प्रसाद वर्मा के नाम नौ सौ सत्तर रुपये का बिल था, फर्म ने उन्हें कुछ बिजली का सामान सप्लाई किया था ।
सुनील निराश हो उठा । खोदा पहाड़ और निकला चूहा - उसने सोचा । आखिर शमशेर जी एक मामूली से बिल को इतना महत्व क्यों दे रहा था ।
सुनील ने बिल का लिफाफे सहित अपनी जेब में डाल लिया और अलमारी में फिर झांका । लेकिन अलमारी बिल्कुल खाली थी ।
उसी समय उसे कमरे से बाहर फिर हल्की सी सरसराहट सुनाई दी । उसने द्वार के पास जाकर हाल में झांका । बाहर गहन अन्धकार था, वहां कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था । लेकिन उसे ऐसी आवाज रह-रहकर सुनाई दे रही थी जैसी कोई सांस ले रहा हो । वह मन ही मन फैसला करने लगा । क्या वह बाहर निकलने की चेष्टा करे या कमरे में ही रुका रहे । वह किसी भी हालत में शमशेर जी या बद्री के हाथ नहीं आना चाहता था । अन्त में उसने बाहर ही निकल जाने का निश्चय किया ।
वह दबे पांव हाल को पार करने लगा लेकिन फिर किसी के कदमों की बड़ी स्पष्ट आहट सुनकर खड़ा हो गया ।
उसी समय एकाएक हाल ही बत्ती जल उठी और उसे सीढियों पर पत्थर के बुत की तरह खड़ा शमशेर जी दिखाई दिया । उसके दायें हाथ में एक रिवाल्वर चमक रहा था ।
“कमरे में वापिस चलो ।” - वह कठोर स्वर से बोला ।
सुनील ने आज्ञा का पालन किया । शमशेर जी भी उसके पीछे-पीछे रिवाल्वर थामे उसी कमरे में आ गया ।
“बद्री ।” - शमशेर जी चिल्लाया ।
बद्री इतनी जल्दी कमरे में पहुंचा जैसे आवाज की ही प्रतीक्षा कर रहा हो ।
“इसकी तलाशी लो ।” - शमशेर जी बोला - “रिवाल्वर वगैरह तो नहीं है इसके पास ?”
बद्री ने बड़ी फुर्ती से उसकी जेबें टटोलकर घोषित कर दिया कि उसके पास हथियार नाम की कोई चीज नहीं थी ।
“कौन हो तुम ?” - शमशेर जी ने रिवाल्वर को एक झटका देते हुए कठोर स्वर से पूछा ।
सुनील ने मन ही मन कुछ फैसला किया और फिर धीमे स्वर से बोला - “रिपोर्टर ।”
“यहां क्या कर रहे हो ?”
“मेरा अखबार यह जानना चाहता है कि आप अपने शंकर रोड के निवास को छोड़कर बड़े रहस्यपूर्ण ढंग से यहां क्यों रह रहे हैं, शमशेर जी ?”
अपना नास सुनकर शमशेर जी बौखला कर एक कदम पीछे हट गया ।
“लेकिन तुम चारों की तरह मेरी कोठी में घुसे हो ।”
“आप रिपोर्टरों के साथ जैसा व्यवहार करते हैं उसको नजर में रखते हुए आपके रहस्यपूर्ण कार्यकलापों के विषय में जानकारी पैदा करने का यही सबसे बढिया तरिका था ।”
शमशेर जी रिपोर्टरों के साथ दुर्व्यव्हार करने के लिये बदनाम था ।
“तुमने यहां से क्या चुराया है ?” - शमशेर जी ने पूछा ।
“कुछ भी नहीं ।” - सुनील ने कहा । अभी तक शमशेर जी की दृष्टि खुली हुई अलमारी पर नहीं पड़ी थी ।
“मैं तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगा ।” - शनशेर जी बोला ।
सुनील ने देखा कि शमशेर जी का यह निर्णय बद्री को बड़ा अप्रत्याशित लगा था । वह हैरानी से उसका मुंह देखने लगा था ।
“लेकिन फिर आप का रहस्य रहस्य नहीं रहेगा । अगले ही दिन सारा नगर जान जायेगा कि आप यहां छुप कर रह रहे हैं ।”
“और अगर मैं तुम्हें छोड़ दूं तो क्या तुम यह बात अखबार में नहीं दोगे ?”
“आपकी मुझे पुलिस में देने की धमकी मुझे कम से कम दो तीन दिन तो चुप रखेगी ही । और आप तो सुबह ही यहां से चले जाने वाले हैं ।”
“तुम्हें कैसे मालूम ?” - शमशेर जी ने सन्दिग्ध स्वर से पूछा ।
सुनील ने होंठ काटे । यह कहकर तो उसने इस बात का भी संकेत दे दिया था कि उसने उनकी बातें सुनी थीं ।
“मैंने हाल में एक होल्डाल पड़ा देखा था ।” - सुनील डरते डरते बोला ।
“हुजूर ।” - उसी समय बद्री बोला ।
“कहो ।”
“हुजूर मैंने इस आदमी को पहले भी देखा है ।”
“कहां ?”
“यह आपकी शंकर रोड की कोठी के इर्द-गिर्द मंडरा रहा था ।”
“ओह !” - शमशेर जी ने उसे घूरते हुए कठोर स्वर से कहा ।
सुनील जान गया है कि ब्लफ मारने का समय गुजर चुका था । बातचीत के दौरान में शमशेर जी का रिवाल्वर वाला हाथ तनिक नीचे झुक गया था । सुनील एकाएक अपने स्थान से उछला । उसका एक हाथ शमशेर जी के रिवाल्वर वाले हाथ पर पड़ा, रिवाल्वर छिटक कर दूर जा पड़ी, और दूसरे हाथ का भरपूर घूंसा शमशेर जी को कनपटी पर पड़ा । शमशेर जी लड़खड़ता हुआ बद्री से जा टकराया ।
सुनील ने मेज से पेपर वेट उठाकर बिजली के बल्ब पर दे मारा । कमरे में अन्धकार छा गया और उसने कमरे के बाहर छलांग लगा दी ।
“बद्री ।” - शमशेर जी की चिल्लाहट सुनाई दी - “हरामजादे, पकड़ उसे ।”
उसी समय बद्री उस पर झपटा । अन्धकार में सुनील की टांग उसके हाथ में आ गई । बद्री ने उसे एक झटके से घसीट कर जमीन पर डाल दिया । सुनील ने गिरे-गिरे ही अपनी दोनों टांगें हवा में उछाली जो संयोगवश एक भयनाक दूलत्ती की तरह बद्री के पेट में पड़ी । बद्री एक हाय करके उलट गया ।
उसी समय शमशेर जी ने उसे पीछे से जकड़ लिया । सुनील छटपटाया और उसने अपनी कोहनी का भरपूर वार शमशेर जी के पेट में करना चाहा लेकिन उसका एक्शन बीच में ही रूक गया । कोई वजनी चीज उसके सिर के पिछले भाग से टकराई और वह लहरा कर फर्श पर गिर गया ।
“ऊपर ले चलो इसे ।” - शमशेर जी का स्वर सुनाई दिया ।
और फिर हल्की सी चेतना में उसे अनुभव हुआ कि किसी ने उसे उठाया और ऊपर की मन्जिल में ले जा कर एक बिस्तर पर डाल दिया ।
फिर कमरे में किसी की उपस्थिति का आभास मिलना बंद हो गया ।
लगभग पांच मिनट बाद वे दोनों भागते हुए कमरे में घुसे सुनील ने नेत्र खोलने की चेष्टा की लेकिन असफल रहा ।
फिर बड़ी बेहरमी से उसका कोट फाड़ कर उतार दिया गया और उसके शरीर के एक-एक भाग की तलाशी शुरु गई ।
सुनील ने बड़ी कठिनाई से नेत्र खोले । उसने देखा शमशेर जी ने उसकी जेब में से स्मिथ एण्ड होल्डन वाला बिल निकाल लिया था ।
“बद्री ।” - शमशेर जी बुदबुदाया - “यह आदमी जिन्दा यहां से निकलना नहीं चाहिये ।”
“नहीं निकलेगा हुजूर ।” - बद्री आदर से बोला - “गुलाम को दस चांदी की जूतियां मारिये और यह दूसरी दुनिया में पहुंचा समझिये ।”
“ये लो पांच ।” - शमशेर जी सौ सौ के पांच नोट निकाल कर बद्री को थमाता हुआ बोला - “पांच काम हो जाने के बाद ।”
“ठीक है सरकार ।” - बद्री ने नोट लेते हए कहा ।
“मैंने अपना सुबह का इरादा बदल दिया है ।” - शमशेर जी बोला - “मैं अभी यहां से जा रहा हूं । काम में कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए समझे ?”
बद्री ने सर हिला दिया ।
शमशेर जी द्वार की ओर बढ गया ।
बद्री सुनील की ओर बढा । सुनील उससे भिड़ने के लिये अपने में शक्ति का संचय करने की चेष्टा करने लगा ।
उसी समय बद्री खिड़की की ओर घूम गया ।
सुनील को नीचे की राहदारी की बजरी पर भारी कदमों के पड़ने का स्वर सुनाई दिया और फिर घण्टी बज उठी साथ ही एक अधिकारपूर्ण स्वर सुनाई दिया - “दरवाजा खोलो ।”
“कौन है ?” - बद्री ने ऊंचे स्वर से पूछा ।
“पुलिस ।”
***
पुलिस हैडक्वार्टर में मशीन की तरह काम हो रहा था ।
सुपरिन्टेन्डेन्ट रामसिंह सिगार के लम्बे कदम भरता हुआ कन्ट्रोल रूम के फर्श को अपने भारी कदमों से रौंदे दे रहा था । कई रिसीविंग और ट्रान्समिटिंग सैट इकट्ठे कार्य कर रहे थे । सन्देश प्रसारित किये जा रहे थे, सूचनाएं आ रही थीं । रिकार्डिंग रूम में दीवारों से सटे हुए काउन्टरों के सामने कानों पर चोंगे चढाये कई आपरेटर बैठे हुए थे और रामसिंह उनके बीच यूं घूम रहा था जैसे लड़ाई के मैदान में कोई जनरल फौजों का संचालन करता फिर रहा हो ।
कई संदेश रामसिंह को थमा दिये जाते थे और रामसिंह उन पर एक दृष्टि डाल कर मुंह बिचका कर उन्हें रद्दी की टोकरी की ओर उछाल देता था ।
उसकी दृष्टि बार बार घड़ी की ओर उठ जाती थी और वह बेचैन हो उठता था जैसे वह किसी बड़े ही जरूरी संदेश की प्रतीक्षा कर रहा हो ।
रामसिंह अपनी थ्योरी पर कार्य कर रहा था ।
उसकी तफतीश के अनुसार नगर में तेंतीस ऐसे आदमी थे जिनकी गायब होने की सम्भावना हो सकती थी । उनमें से पांच विदेश गये हुए थे । हालांकि उनके गायब होने की सम्भावना नहीं के बराबर थी लेकिन फिर भी उसने विदेशी पुलिस द्वारा उनकी रक्षा की व्यवस्था करवा दी थी । सत्रह नगर में ही मौजूद थे इसलिये रामसिंह अपनी सुपरविजन में ही उनकी निगरानी करवा रहा था । नौ बाकी देश के विभिन्न प्रान्तों में व्यापार इत्यादि के सिलसिले में गये हुए थे, उनकी भी निगरानी हो रही थी और हर आधे घण्टे की अवधि के प्रान्तिय पुलिस की सूचनायें आ रही थीं । बाकी दो का कुछ पता नहीं चल रहा था । उनमें से एक आदमी, जिसका शराब का कारखाना था, पहले भी नगर से गायब हो जाया करता था । वह अपनी बीवी से संतुष्ट नहीं था इसलिये, तफतीश के बाद पता चला था उसने रतनपुर में कोई रखैल पाली हुई है । बाद में उसकी पड़ताल करवाने पर वह रतनपुर के एक मकान में अपने ही कारखाने के उत्पादन की मस्ती में मदहोश पड़ा पाया गया ।
दूसरा आदमी, जिसका नाम रामसिंह की लिस्ट में सब ऊपर था, शमशेर जी था ।
रामसिंह स्वयं शमशेर जी के सैक्रेटरी से मिला था । पहले तो उसने रामसिंह को भी टरकाने की चेष्टा की थी लेकिन बाद में केस पुलिस की दिलचस्पी देखकर उसने बता दिया था शमशेर जी चन्दन गढ के एक होटल में रह रहा था ।
होटल के मैनेजर को ट्रंक काल करने पर मालूम हुआ कि शमशेर जी के नाम एक कमरा रिजर्व तो कराया गया लेकिन वह वहां पहुंचा नहीं था ।
फिर रामसिंह ने शमशेर को खोज निकालने के लिये अब विभागीय ढंग प्रयोग में लाने आरम्भ कर दिये । सारे पुलिस स्टेशनों पर शमशेर जी का फोटोग्राफ घुमा दिया गया था और रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे पर निगरानी के लिए स्पैशल आफिसर नियुक्त कर दिये गये थे ।
लगभग चौबीस घन्टे कोई उल्लेखनीय घटना नही घठी और फिर एक सिपाही द्वारा उसे शमशेर जी के रामपुर रोड की एक कोठी में उपस्थित होने की सूचना मिली थी ।
उसने कोठी की निगरानी किये जाने की आज्ञा दे दी थी ।
न जाने क्यों रामसिंह को महसूस हो रहा था कि इस बार शमशेर जी ही गायब होने वाला है । उसे भय था कि यदि वो इस बार हत्यारे को पकड़ने के लिए कोई ठोस कार्य न कर सका तो घोरपड़े केस अवश्य ही उसके हाथ से छीन लेगा ।
शमशेर जी के विषय के अन्तिम सूचना प्राप्त हुए तीन घंटे बीत चुके थे बाहर रात्रि का अन्धकार बढता जा रहा था ।
उसी समय एक इन्स्पेक्टर ने रामसिंह का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया । रामसिंह कंट्रोल रूम से बाहर आ गया ।
“सर !” - उसने बतलाया - “अभी अभी सूचना मिली है कि शमशेर की रामपुर रोड वाली कोठी में कोई चोर घुसा है ।”
“क्या कोठी से किसी ने सूचना दी है ?”
“नहीं सर, दो सिपाही कोठी की निगरानी कर रहे थे उन्होंने ही उसे एक खिड़की के रास्ते भीतर प्रविष्ट होते देखा है । मैंने सिपाहियों को कह दिया है कि वे कोठी के भीतर न जायें, नहीं तो शमशेर जी को मालूम हो जायेगा कि उसकी निगरानी हो रही है लेकिन चोर के बाहर निकलते ही फौरन गिरफ्तार कर लें ।”
“ठीक है लेकिन यह सूचना कंट्रोल रूम में क्यों नहीं आई ?”
“उनके पास ट्रांसमिटिंग सेट नहीं है, सर वे टेलीफोन प्रयोग में ला रहे हैं ।”
लगभग आधा घन्टा और गुजर गया ।
“सर ।” - इन्सपेक्टर ने आकर बताया - “रामपुर रोड में सूचना आई है कि इस चोर को गये एक घन्टा हो गया है । भीतर से मार पीट और उठापटक की भी आवाजें आ रही हैं । निगरानी करने वाले सिपाहियों का ख्याल है कि घर के स्वामी ने स्वयं ही चोर को पकड़ लिया है लेकिन आधा घन्टा हो गया है उन्होंने कोतवाली इसकी सूचना नहीं भेजी है । वे लाइन पर आपके आर्डर की प्रतीक्षा कर रहे हैं ।”
रामसिंह शमशेर जी के स्वाभाव को खूब जानता था । यदि उसने चोर को पकड़ लिया होगा तो वह क्रोधित होकर स्वयं ही उसे मार-मार कर अधमरा कर देगा । या शायद मार ही डाले ।
“उनसे कहो कि वे कोठी में घुस पड़ें ।” - रामसिंह ने कहा ।
***
द्वार लगातार खटखटाया जा रहा था ।
बद्री क्षण भर उलझा सा कमरे में खड़ा रहा और सुनील को घूरता रहा । फिर वह कमरे से बाहर निकल गया और जाती बार द्वार को बन्द करता गया ।
सुनील एक झटके से उठ बैठा । उसने सिर पर हाथ फेर कर देखा । खून अब भी घाव में से रिस रहा था ।
उसे मुख्य द्वार खुलने और भारी कदमों के भीतर घुसने का स्वर सुनाई दिया ।
उसे समझ में नहीं आ रहा था कि पुलिस स्वयं ही यहां कैसे पहुंच गई । शमशेरजी तो उसकी हत्या करवाने वाला था, कम से कम उसने तो पुलिस को सूचित किया नहीं होगा । लेकिन अब जब कि पुलिस आ ही गई है, वह निश्यच ही सुनील को पुलिस को हवाले कर देगा और फिर शायद उसे जेल की हवा खानी पड़े ।
सुनील ने निकल भागने की चेष्टा करना श्रेयस्कर समझा ।
वह लड़खड़ाता हुआ खिड़की के पास पहुंचा । उसने बांहों पर जोर देकर खिड़की पर चढने की चेष्टा की लेकिन बांहों ने साथ नहीं दिया और उसका शरीर दीवार के सहारे झूल गया । उसमें निकल भागने योग्य शक्ति भी बाकी नहीं बची थी, चोट ने उसे निढाल कर दिया था ।
उसी समय बद्री फिर कमरे में प्रविष्ट हुआ ।
“क्या कर रहे हो ?” - उसने पूछा ।
“दिखाई नहीं दे रहा ।” - सुनील ने चिढ कर कहा - “भागने की कोशिश कर रहा हूं ।”
“ठहरो मैं तुम्हारी मदद करता हूं ।” - बद्री उसकी ओर बढता हुआ बोला ।
सुनील आश्चर्य चकित होकर उसका मुंह देखने लगा ।
“नहीं, नहीं ।” - बद्री उसे सहरा देता हुआ बोला - “तुम खिड़की पर चढने की चेष्टा करो, खिड़की के साथ ही परनाला है उसे पकड़ कर नीचे उतर जाना । यह कमरा पिछवाड़े में है, तुम्हें कोई देख नहीं पायेगा ।”
लेकिन बद्री को फौरन ही महसूस हो गया कि सुनील में उस घायल अवस्था में इतने बड़े कार्य के लिये शक्ति नहीं थी ।
बद्री ने अपनी पैंट की जेब में से ब्रान्डी की एक थोड़ी भरी हुई बोतल निकाली और उसे सुनील की ओर बढाता हुआ बोला - “इसे पी जाओ ।”
सुनील ने एक बड़ा सा घूंट बोतल से भरा ।
सुनील में जैसे जान सी पड़ गई । उसने एक घूंट और भरा और फिर वह स्वयं में काफी शक्ति का अनुभव करने लगा ।
बद्री ने उसे सहारा देकर सिल पर चढा दिया । उसने खिड़की से बाहर निकल कर परनाले की पाइप थामी और धीरे-धीरे नीचे सकरने लगा ।
बद्री अभी खिड़की में ही खड़ा था ।
लगभग पांच मिनट में वह नीचे पहुंचा ।
बद्री ने ब्रान्डी की बोतल भी उसकी ओर उछाल दी ।
“भागो ।” - वह फसफुसाया ।
सुनील ने बची खुची ब्रान्डी भी हलक में उड़ेली और फिर चारदीवारी पार करके सड़क पर आ गया ।
सुनील ने सड़क पर से एक टैक्सी ली और रामसिंह के आफिस में पहुंच गया ।
जब वह रामसिंह के कमरे में घुसा तो दीवार पर लगी हुई घड़ी में पांच बजे थे ।
सुनील धम्म से एक कुर्सी पर बैठ गया ।
“यह खोपड़ी का कचूमर कहां से बनवा आये हो ?” - रामसिह ने हैरान होकर पूछा ।
“बात मत करो ।” - सुनील लम्बी-लम्बी सांस लेता हुआ बोला - “पहले नीचे टैक्सी वाले को किराया भिजवाओ और मेरी खोपड़ी की मरहम पट्टी करवाओ ।”
“मरहम पट्टी तो अभी हुई जाती है लेकिन टैक्सी का किराया मैं किस खुशी में दूं ?”
“दे दो न यार ।” - सुनील तिक्त से बोला - “अगर मेरे पास होते तो तुम से मांगता ?”
“क्यों, तुम्हारे पास क्यों नहीं है ?”
“सालों ने कोट भी उतरवा लिया था । सारे रुपये उसी में थे, रुपये तो गये ही साथ में इतना कीमती कोट भी गया ।”
रामसिंह उठकर बाहर चला गया । जब वह वापिस आया तो उसके साथ एक डाक्टर भी था ।
“आखिर यह सब हुआ कैसे ?” - रामसिंह ने पूछा ।
और सुनील ने अद्योपान्त सारी घटना सुना डाली ।
“तो.. तो..” - रामसिंह हैरान होकर बोला - “शमशेर जी के घर में चोरों की तरह तुम घुसे थे ?”
“तुम्हें कैसे मालूम ?”
“साले मेरे कारण तो तू बच भी गया वर्ना अभी तक उन्होंने तुझे दूसरे लोक पहुंचा दिया होता ।”
“तो पुलिस तुम्हारे संकेत पर वहां पहुंची थी ?”
“हां, लेकिन मुझे यह मालूम नहीं था कि भीतर तुम हो ।”
“वहां से अभी कोई रिपोर्ट नहीं आई है ?”
“रिपोर्ट आई है, पुलिस ने शमशेर जी की कोठी की तलाशी ली थी लेकिन वहां से मिलता क्या, तुम्हें ही तो वे ढूंढ रहे थे और तुम्हें उन्होंने पहले ही भगा दिया था । शमशेर जी ने उन्हें झाड़ पिलाई और साथ ही उसने बिना वारन्ट तलाशी लेने के कारण मुकदमा चलाने की धमकी भी दी है ।”
“तो इसका अर्थ यह हुआ कि हम घूम फिर कर दुबारा वहीं लौट आये ।”
“हां यार, मेरी तो सारी थ्योरी ही गलत हो गई । जिन्दगी में पहली बार इतनी फुर्ती दिखाई थी लेकिन इस बार किसी ने गायब होने की चेष्टा ही नहीं की ।”
“शमशेर जी कहीं जाने वाला तो था । अगर मैं बीच में न आ गया होता तो शायद अभी तक वह गायब हो चुका होता ।”
“हां, लेकिन अब वह कहीं नहीं जा रहा है ।”
“सुनील ।” - रामसिंह क्षण भर बाद बोला - “इस बार तो मैं कमिश्नर साहब को चैलेंज ही कर आया था कि कुछ न कुछ जरूर करके दिखाऊंगा लेकिन यहां सारी रात कन्ट्रोल रूम में मक्खियां मारते गुजर गई, हुआ कुछ भी नहीं ।”
“तो फिर तुम्हारी एक्सप्लेनेशन कब हो रही है ?”
“अभी होगी । मैंने तुम्हारे आने से थोड़ी ही देर पहले चपरासी को कमिश्नर साहब के पास भेजा था कि वे अपने आफिस में हैं या...”
उसी समय चपरासी कमरे में प्रविष्ट हुआ ।
“साहब कमरे में नहीं हैं ।” - उसने बताया ।
“तो कहीं और देख लिया होता ।”
“मैं सारा दफ्तर तलाश कर आया हूं साहब, वे कहीं भी नहीं हैं ।”
“उनके सैक्रेट्री से कहो, उनके घर फोन करें ।”
चपरासी जाने के लिये घूमा ।
उसी समय एक विचार सुनील के मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंध गया ।
“ठहरो ।” - वह जोर से बोला ।
चपरासी रुक कर प्रश्नसूचक दृष्टि से सुनील की ओर देखने लगा ।
“तुमने अन्तिम बार घोरपड़े साहब को कब देखा था ?”
सुनील ने पूछा ।
“कल रात को ।” - चपरासी बोला - “कल रात लगभग आठ बजे वे अपने कमरे में से निकले थे और लगभग दस मिनट बाद वे सुपर साहब के कमरे में आये थे । लेकिन वे उस समय कन्ट्रोल रूम में थे । वे कुछ देर सुपर साहब के कमरे में ही उन की प्रतीक्षा करते रहे थे । लेकिन वे बहुत बिजी थे । इसलिए घोरपड़े साहब उन्हें बिना सूचित किये ही चले गये थे ।”
“कमाल है ।” - रामसिंह बोला - “घोरपड़े साहब स्वयं उठकर मेरे कमरे तक आये और फिर मुझसे मिले बिना वापिस भी चले जायें । ये तो बुढऊ की आदत के सख्त खिलाफ है । वह हमेशा मुझे अपने कमरे में बुलाता है और अगर आने में एक मिनट की भी देर हो जाये तो लाल पीला होने लगता है ।”
“तुम जाओ ।” - सुनील चपरासी से बोला और फिर रामसिंह की ओर घूमा - “रामसिंह, तुम्हारी थ्योरी क्या थी ?”
“यह कि हत्या के पश्चात दो दिन के भीतर ही नगर का कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति अवश्य हो जाना चाहिए ।”
“तो फिर तुम्हारी बात अक्षरशः सत्य निकली है ।”
“कहां यार, उस ला कालेज के विद्यार्थी की हत्या हुए दो दिन तो हो गये लेकिन लापता कोई भी नहीं हुआ ।”
उसी समय चपरासी ने आकर बताया कि सैक्रेटरी ने सब जगह ट्राई कर लिया है, घोरपड़े साहब कहीं भी नहीं हैं और न ही किसी को मालूम है कि कहां गये हैं ।
“रामसिंह ।” - सुनील गम्भीरता से बोला - “क्या घोरपड़े तुम्हारी लिस्ट में आने योग्य प्रतिष्ठित और धनी नहीं है ?”
कुछ क्षण तो रामसिंह पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं हुई और फिर वह एकदम उछल पड़ा - “सुनील, भगवान कसम यही बात है, घोरपड़े साहब उड़ गये, वे ठीक मेरी नाक के नीचे से गायब हो गये लेकिन मैंने उनके विषय में सोचा ही नहीं... लेकिन प्रश्न यह है कि वे जाने से पहले मेरे कमरे में क्यों आये, क्या वे...”
“रामसिंह देखो ।” - सुनील दीवार पर लगी घड़ी की ओर रामसिंह का ध्यान आकर्षित करता हुआ बोला ।
“क्या है ?”
“घड़ी... कितने बजे हैं ?”
“पांच बजे हैं, क्यों ?”
“लेकिन पांच बजे तो मैं यहां आया था और मुझे यहां आये लगभग एक घंटा हो गया है ।”
“तो फिर क्या हुआ, घड़ी रुक गई होगी ।”
“लेकिन टिक टिक तो साफ सुनाई दे रही है केवल सुइयां ही आगे नहीं बढ रही हैं ।”
रामसिंह उलझनपूर्ण दृष्टि से सुनील की ओर देखता रहा ।
“लेकिन” - सुनील उठकर घड़ी के समीप जाता हुआ बोला - “यह टिक-टिक घड़ी की आवाज जैसी मालूम नहीं होती । यह तो कुछ...”
उसी समय टिक-टिक का स्वर रुक गया और ऐसी आवाज घड़ी में से निकलने लगी जैसे किसी स्प्रिंग के फोल्ड खुल रहे हों ।
“रामसिंह ।” - सुनील फटी-फटी आंखों से चिल्लाया । आतंक से उसका चेहरा विकृत हो उठा था । उसने एक झपट्टे से रामसिंह की बांह पकड़ी और उसे कुर्सी पर से लगभग नोंच कर घसीटता हुआ एक कोने में स्टील की मेज के नीचे घुस गया ।
उसी समय एक जोर का धमाका हुआ । जिस दीवार पर घड़ी लगी हुई थी, उसके परखचे उड़ गये और जिस मेज के इर्द-गिर्द सुनील और रामसिंह कुर्सियों पर बैठे थे, वह भी चूर-चूर हो गई ।
ढेर सारा मलबा उस मेज पर आकर गिरा जिसके नीचे सुनील और रामसिंह दुबके हुए थे ।
जब धूल उड़नी जरा बन्द हुई तो सुनील और रामसिंह मलबे को कुरेदते हुए बाहर निकल आये ।
“घोरपड़े साहब अपने गायब होने की रसीद बम की शक्ल में देकर गये हैं, रामसिंह ।” - सुनील विचित्र स्वर से बोला - “शायद उन्हें तुम्हारी थ्योरी पसन्द नहीं थी इसलिए उन्होंने तुम्हारी थ्योरी के साथ तुम्हें ही समाप्त कर देना श्रेयस्कर समझा था ।”
***
दिन भर सुनील अपने आफिस के एक केबिन में बैठा काम करता रहा । शाम को उसने रामसिंह को फोन किया ।
“कोई नई बात ?” - उसने पूछा ।
“कमिश्नर साहब की गिरफ्तारी के लिए वारन्ट जारी हो गए हैं ।” - रामसिंह ने बताया ।
“लेकिन उसकी खोज भी तो करवाओ ।”
“अब यही तो दिक्कत है सुनील, घोरपड़े हमारे विभाग का हैड था । ऐसे मामलों में हमारा विभाग जो तरीके प्रयोग में लाता है उनमें से कितने ही तो उसके अपने आविष्कार के किए हुए हैं । इसलिए उसकी तलाश के लिए हम जो भी कदम उठायेंगे, उसके लिए वह पहले ही तैयार होगा ।”
“क्या उसके व्यक्तित्व से कोई सूत्र प्राप्त नहीं हो सकता ? कैसे आदमी था वह ?”
“घोरपड़े बड़ा तनहाई पसन्द आदमी रहा है । कोई भी उसके विषय में अधिक नहीं जानता । सोशल लाइफ में उसने कभी रूचि ली ही नहीं... और सुनील, उसने भी गायब होने से कुछ दिन पहले अपने बैंक में से कई हजार रुपये निकलवाए थे... यार इतने सूत्र हाथ में थे लेकिन फिर भी चोट हो गई ।”
“क्या तुम्हें अब भी विश्वास है कि हत्याओं और लापता आदमियों के कोई सम्बन्ध है ?”
“बिल्कुल, और मुझे एक और बात सूझी है । सुनील, क्या एक आदमी का दिल निकाल कर दूसरे में लगाया जा सकता है ?”
“तो तुम्हारा विचार है कि हत्या के बाद मृत के शरीर में से दिल इसलिए निकाल लिया जाता था कि उसे उन लोगों में से किसी से फिट किया जा सके जो गायब हो गए हैं ।”
“क्या यह असम्भव है ?”
“नहीं, असम्भव तो नहीं है । ऐसे प्रयोग बन्दरों पर किए जा चुके हैं और यह भी सत्य है कि यदि किसी के निष्क्रय आर्गन स्वस्थ आर्गन से बदल दिये जायें तो वह नई शक्ति प्राप्त कर सकता है । लेकिन प्रश्न तो यह है कि यदि प्रतिष्ठित व्यक्ति इसी प्रकार के किसी आपरेशन को करवाने के लिए गायब हुए हैं तो फिर वे स्वस्थ हो जाने के बाद वापिस क्यों नहीं लौट आये ?”
“भगवान जाने, शायद वे मर ही गए हों ।”
“अब क्या इरादा है ?”
“फिलहाल तो हाथ पर हाथ धर कर बैठे हैं । मैंने पहले वाले तेंतीस व्यक्तियों की लिस्ट में बड़ी सावधानी से कुछ नाम और बढाए हैं और उनकी निगरानी करवा रहा हूं । शायद कमिश्नर साहब की ही तरह कोई गायब होने की...”
“इसका अर्थ तो यह हुआ कि तुम एक नई हत्या की प्रतीक्षा कर रहे हो । कोई बड़ा आदमी तभी तो अदृश्य होगा जब उसे किसी स्वस्थ व्यक्ति का दिल प्राप्त होगा ?”
“बात तो तुम्हारी ठीक है लेकिन इसके अतिरिक्त किया भी क्या जा सकता है ?”
“आखिर तुम कुबड़ों को क्यों नहीं चैक करते ?”
“अब करूंगा ।”
“अच्छा मुझे सूचना देते रहना । ओ के ?”
“ओ के ।”
सुनील ने फोन रख दिया ।
उसी समय चपरासी ने जुगल के आने की सूचना दी ।
“भेजो ।” - सुनील ने कहा ।
कुछ क्षण बाद बन्दर लड़खड़ाता हुआ भीतर घुमा और अपनी ऐनक रहित आंखों को फाड़-फाड़ कर चारों ओर देखता हुआ बोला - “अरे भई कहां हो तुम ?”
“ओ बन्दर के बच्चे !” - सुनील चिढकर बोला - “भगवान के लिए चश्मा लगाया कर ।”
“चश्मे का जिक्र मत किया करो ।” - बन्दर उसके बिल्कुल पास से निकलता हुआ बोला - “मेरे दिल को चोट लगती है । ...लेकिन तुम हो कहां ?”
सुनील ने बन्दर की बांहें पकड़ कर उसे बिठाया ।
“सुनील बड़ी जोरदार खबर है ।” - बन्दर बोला ।
“फिर किसी से इश्क हो गया है क्या ?”
“वैसी खबर नहीं है ।” - बन्दर जल्दी से बोला - “तुम्हारे काम की खबर है ।”
बन्दर कभी उसके काम की खबर भी ला सकता था यह बात सुनील के हलक से उतरी नहीं ।
“मेरे काम की खबर को गोली मारो । तुम अपने लेटेस्ट इश्क के बारे में सुनाओ । तुम्हारी सीता, गीता, पपीता, फजीता का क्या हाल है ?”
“यार तुम गलत नाम मत लिया करो ।” - बन्दर चिढ कर बोला ।
“मैं क्या करूं, उनके नाम ही ऐसे हैं । खैर, नाम को छोड़ो फिर मुलाकात हुई उससे ?”
“हां ।” - बन्दर जोश में बोला - “कई बार । अब तो उसका कुत्ता भी मुझे लिफ्ट देने लगा है । हालत बड़ी आशाजनक हैं । बस यह समझो कि बड़ा ऐन्टी फ्लोजिस्टीन किस्म का इश्क चल रहा है ।”
“यह इश्क की कौनसी किस्म है ?”
“तुम नहीं समझोगे । ये बड़ी ही दुर्लभ किस्म का इश्क है, सिर्फ बड़े आदमियों को ही होता है । इतिहास में केवल दो ही हस्तियां इस इश्क की शिकार हुई हैं - क्लोपेट्रा और रोमियो ।”
“भला रोमियो का क्लोपेट्रा से क्या सम्बन्ध है ?”
“यह तो इस इश्क की विशेषता है । जिन्हें समाज नहीं मिला सकता, समय नहीं मिल सकता, उन्हें एन्टीफ्लोजिस्टीन लव मिला देता है । यह इश्क असम्भव को सम्भव कर सकता है ।”
“लेकिन क्लोपेट्रा और रोमियो...”
“सुनील, लानत है तुम पर ।” - एकाएक बन्दर स्वर बदल कर बोला - “साले मैं तुझे इतनी जरूरी बात बताने दौड़ा आया था और तुमने मुझे उल्टी ही बातों में उलझा लिया ।”
“क्या बात थी ?” - सुनील भी तनिक गम्भीर होकर बोला ।
“मैंने उसे देखा था ।”
“किसे ?” - सुनील उलझ कर बोला ।
“अबे उसी कुबड़े को ।”
“क्या ?” - सुनील कुर्सी से यूं उछला जैसे कुर्सी में कांटे निकल आए हों - “बन्दर के बच्चे, पहले क्यों नहीं बताया ?”
“मैं तो यही बताने आया था, तुम ही ने मुझे उलझा लिया ।”
“खैर, अब बताओ ।”
“मैंने उसे न्यू रोज पर देखा था । वह फुटपाथ पर जा रहा था । उसकी एक आंख सूजी देखकर ही मेरा ध्यान उसकी ओर आकर्षित हुआ था । मैंने उसका पीछा किया था । वह पैदल ही मेहता रोड पर गया और एक इमारत में घुस गया । मैं वहीं से सीधा तुम्हारे पास आ रहा हूं ।”
“लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि वह अब भी वहीं होगा ?”
“मेहता रोड की कोठी उसी कुबड़े की है । मैंने पड़ोस से पूछताछ की थी । पिछले बीस वर्ष से वह उसी कोठी में रह रहा है । उसका नाम राबर्ट फिंच है - एंग्लो इन्डियन है । पड़ोसियों ने बताया है कि वह स्वयं को डाक्टर कहता है ।”
सुनील ने बड़े बेचैनी से रामसिंह का नम्बर मिलाया और रामसिंह के लाइन पर आते ही बोला - “रामसिंह, जिस कुबड़े ने हत्या वाली रात को बीच पर मेरे से घूंसा खाया था, उसका पता मिल गया है । उसका नाम डाक्टर राबर्ट फिन्च है और वह मेहता रोड पर रहता है ।”
“मैं अभी उसे चैक करता हूं ।” - रामसिंह ने कहा ।
सुनील ने लाइन काट दी ।
“मैं जा रहा हूं ।” - बन्दर बोला ।
“अच्छा ।” - सुनील ने कहा और बन्दर फर्नीचर से उलझता हुआ बाहर निकल गया ।
कुछ क्षण सुनील चुपचाप बैठा रहा । फिर उसने यूथ क्लब के नम्बर डायल कर दिए । सुनील के भाग-दौड़ के काम यूथ क्लब के सदस्य और उसका स्वामी रमाकांत किया करता था ।
“रमाकांत है ?” - नम्बर मिल जाने पर उसने पूछा ।
“जी हां, बुलाता हूं ।” - आपरेटर उसका स्वर पहचान कर बोला ।
“हैलो सुनील ।” - क्षण भर बाद फोन पर रमाकांत का स्वर सुनाई दिया ।
“रमाकांत ।” - सुनील बोला - “तुमने बिजली का सामान बेचने वाली स्मिथ एण्ड होल्डन नाम की फर्म तलाश करनी है । प्रमुख उद्योगपति शमशेर जी ने उनसे भगवती प्रसाद वर्मा के जाली नाम से नौ सौ सत्तर रुपये का बिजली का सामान खरीदा था । मैं यह जानता हूं कि वह बिजली का सामान क्या था ? शमशेर जी का चित्र तुम्हें किसी पुराने अखबार में मिल जाएगा ।”
“हो जाएगा ।” - रमाकांत निश्चित स्वर से बोला - “और कुछ ?”
“फिलहाल इतना ही ।”
“ओ के ।”
सुनील ने फोन बन्द कर दिया ।
रात के लगभग आठ बजे तक वह किसी सूचना की प्रतीक्षा में आफिस में बैठा रहा और फिर वह अपने बैंक स्ट्रीट स्थित फ्लैट में लौट आया ।
***
अगले दिन लगभग दस बजे रमाकांत का टेलीफोन आया ।
“हैलो सुनील ।” - रमाकांत का स्वर सुनाई दिया - “भई तुम्हारी उस फर्म ने शमशेर जी को कोनायर बैट्री के नाम की एक नई प्रकार की ड्राई बैट्री बेची है ।”
“ये कोनायर बैट्री क्या बला है ?” - सुनील बोला - “मैंने कभी सुना नहीं इसके विषय में ।”
“यह एक नया आविष्कार है । इस बैट्री की यह विशेषता है कि इसका वजन बहुत कम है और आकार बहुत छोटा है लेकिन इसकी कार्यक्षमता साधारण बैट्रियों से सौ गुना अधिक है । स्मिथ एण्ड होल्डन की इसके एक मात्र विक्रेता हैं इसलिये वह बैट्री या तो इस कम्पनी से मिल सकती है या फिर मैनूफैक्चरर से । मैनूफैक्चरर है मॉडर्न इलैक्ट्रिक कम्पनी ।”
“साधारणतया यह बैट्री किस काम आती है ?”
“कुछ बड़े उद्योगों में प्रयोग होती है लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि पिछले तीन महीनों में पांच बैट्रियां ऐसे लोगों को भी बेची गई हैं जो किसी प्रकार के भी उद्योग से सम्बन्धित नहीं हैं । जैसे शमशेर जी ।”
“अच्छा रमाकांत फिलहाल इतना काफी है ।” - और सुनील ने फोन बन्द कर दिया ।
लगभग ग्यारह बजे सुनील रामसिंह के आफिस में उसके सामने बैठा था ।
“डाक्टर फिंच का क्या हुआ ?” - सुनील ने पूछा ।
“यार ।” - रामसिंह बोला - “यह डाक्टर तो बड़ा घिसा हुआ आदमी है । वह कहता है कि वह सोमवार की रात को बीच पर नहीं गया और उसने अपने कथन की सत्यता प्रमाणित करने के लिए बड़ी ठोस गवाही भी दिला दी है ।”
“उसकी आंख पर चोट का निशान था ?”
“था, लेकिन वह कहता है कि उसे कुछ गुंडों ने उसके बटुआ छीनने के चक्कर में पकड़ कर पीट दिया था ।”
“वह डाक्टर कैसा है ?”
“अब यह बात भी दिलचस्पी से खाली नहीं है कि बीस वर्ष से मेहता रोड पर रह रहा है लेकिन उसका कोई पड़ोसी उसे अच्छी तरह नहीं जानता । न तो वह रजिस्टर्ड मैडिकल प्रेक्टीशनर है न ही उसका नाम किसी मैडिकल रेफरेंस बुक में है, उसकी प्राईवेट प्रैक्टिस भी नहीं है और न ही वह किसी हस्पताल में नियुक्त है जब मैंने उसका ध्यान इस ओर आकृष्ट किया तो वह बोला कि वह तो डाक्टर है ही नहीं ।”
“तो फिर वह अपने आपको डाक्टर क्यों कहता है ?”
“सुनील, किसी को भी स्वयं को डाक्टर कहने का हक जब तक कि वह प्रैक्टिस न करे ।”
“मैं अपने आपको डाक्टर सुनील कुमार चक्रवर्ती कह सकता हूं ?”
“बिल्कुल कह सकते हो । बशर्ते कि तुम अधिकृत रूप किसी का इलाज करना न आरम्भ कर दो ।”
“तुम उसकी निगरानी करवा रहे हो ?”
“हां, कल से ही । तुम्हारे आने से थोड़ी देर पहले उसने मुझे एक चिट्ठी भिजवाई है, देखो उसने क्या लिख मारा है ?”
सुनील चिट्ठी लेकर पढने लगा । लिखा था -
आदरणीय सुपर साहब,
मैंने नोट किया है कि जब से आप मुझे मिले हैं, दो पुलिस अफसर लगातार मेरी निगरानी कर रहे हैं । आप जानते हैं आज कल बहुत ठंड पड़ रही है और ऐसे मौसम में किसी पर निगरानी रखने जैसी ड्यूटी बड़ी दुखदाई होती है । इसलिए उन अफसर की तकलीफ को ध्यान में रखते हुए मैंने यहीं उचित समझा कि मैं अपनी सारी दिनचर्या बयान कर डालूं । कृपया मेरा निम्नलिखित प्रोग्राम आप अपने अफसरों तक पहुंचा दें ताकि घर बैठे जान सके कि मैं कहां हो सकता हूं ।
मैं प्रातः साढे आठ बजे ब्रेकफास्ट लेता हूं, फिर मेहता रोड का एक चक्कर लगाता हूं और सवा नौ बजे वापिस आ जाता हूं । साढे बारह बजे तक मैं घर में ही स्टडी करता हूं । फिर स्टैण्डर्ड में लंच लेता हूं । लंच के बाद मैं मैडिकल लायब्ररी के रीडिंग रूम में जाता हूं और सारी शाम वहीं रहता हूं । छः बजे मैं लायब्रेरी के निकट ही स्थित कॉफी कार्नर पर कॉफी पीता हूं । वहां से सीधा स्टैण्डर्ड में जाता हूं । वहां आठ बजे तक बिलियर्ड खेलता हूं और वहीं डिनर लेता हूं । डिनर के बाद सीधा घर आकर सो जाता हूं ।
पिछले बीस वर्षों से मेरी इस दिनचर्या में कोई अन्तर नहीं आया । फिर भी यदि मैं कभी अपने प्रोग्राम में कोई परिवर्तन करूगां, आपको पहले ही सूचना भिजवा दूंगा ।
सदभावनाओं के साथ ।
विनीत -
डाक्टर राबर्ट फिंच
सुनील हक्का-बक्का सा रामसिंह का मुंह देखने लगा ।
“भगवान कसम, सुनील !” - रामसिंह बोला - “इस कुर्सी पर बैठकर आज तक इतनी तौहीन नहीं हुई । जी चाहता है उस डाक्टर के बच्चे की गरदन मरोड़ कर रख दूं ।”
“तो मरोड़ दो गरदन ।”
“यही तो दिक्कत है । वह हरामजादा अपने पर उंगली रखने का तो मौका ही नहीं देता । साधारण आदमी के तो यह सोचकर ही प्राण निकल जाते हैं कि पुलिस उसमें दिलचस्पी रखती है । लेकिन यह हमारे साथ चूहे की तरह खिलवाड़ कर रहा है । यही कारण है कि उस पर हाथ डालने का हौसला नहीं होता कि कहीं लेने के देने न पड़ जाए ।”
“रामसिंह !” - कुछ क्षण बाद सुनील बोला - “स्मिथ एण्ड होल्डन नाम की एक फर्म है जो कोनायर नाम की एक विशेष प्रकार की बैट्री बेचती है । अभी तक वे पांच बैट्रियां बेच चुके हैं, अन्तिम शमशेर जी ने खरीदी थी । तुम यह पता लगाने की चेष्टा करो कि बाकी चार बैट्रियां खरीदने वाले कौन थे । और उनसे कहो कि अगर कभी भी उन्हें किसी व्यक्ति का फर्म का नहीं, बैट्री के लिए आर्डर मिले तो सप्लाई से पहले वे तुम्हें सूचित कर दें ।”
“इससे क्या होगा ?”
“इससे यह होगा कि नए गायब होने वाले आदमी को तुम पहले ही जान जाओगे ।”
“शमशेर जी तो बैटरी खरीद कर भी गायब नहीं हुआ ।”
“हो जाएगा, शायद वह किसी नई हत्या की प्रतीक्षा कर रहा है ।”
कुछ क्षण शान्ति छाई रही ।
“क्यों न एक बार मिसेज मधोक से फिर मिला जाए ?” - सुनील बोला ।
“मधोक की मां से ?”
“हां, मेरा विचार है, वह कुछ छुपा रही है । उसने मुझे तो टरका दिया था लेकिन शायद तुम्हारी मौजूदगी में कुछ बता दे ।”
“चलो ।”
वे मेहता रोड स्थित मधोक के निवास स्थान पर पर पहुंच गए ।
“मिसेज मधोक !” - औपचारिकता निभा चुकने के बाद रामसिंह बोला - “क्या आप नहीं चाहतीं, कि मिस्टर मधोक कुशलपूर्वक घर लौट आयें ?”
“क्यों नहीं चाहती ?” - वृद्धा भावुक स्वर से बोली - “मेरा एक ही तो बेटा है...”
“तो फिर आप हमें सब कुछ साफ साफ क्यों नहीं बता देतीं ?”
“मैं जो कुछ जानती हूं, आप लोगों को बता चुकी हूं ।”
“आपने” - सुनील ने अन्धेरे में तीर छोड़ा - “आपने यह नहीं बताया कि मधोक साहब गायब होने के बाद भी आपसे मिलने यहां आये हैं ।”
वृद्धा का चेहरा फक हो गया ।
वृद्धा ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया । उसकी आंखों से आंसू छलछला आए थे ।
“लेकिन आप यह क्यों समझती हैं मिस्टर मधोक को जीवित प्राप्त करने का यही एकमात्र तरीका है । आखिर कब तक वे गुमनामी का जीवन व्यतीत करते रहेंगे । कुछ दिनों से पुलिस ऐसे व्यक्तियों के सारे गिरोह को पकड़ लेगी । उस सूरत में वे बच नहीं सकेंगे । वे एक व्यक्ति की हत्या के लिए उत्तरदायी हैं ।”
“नहीं, नहीं !” - वृद्धा चिल्लाई - “यह झूठ है । मेरा बेटा किसी की हत्या नहीं कर सकता । उसने खुद मुझसे कहा है कि उसने कोई अपराध नहीं किया । वह कहता है कि उसके छुप के रहने का कोई और ही कारण है । वह...”
एकाएक वह चुप हो गई । उसने सहमी हुई दृष्टि से पहले रामसिंह को और फिर सुनील को देखा ।
“अभी मैंने क्या कहा था ?” - उसने भयभीत स्वर से पूछा ।
“अभी आपने स्वीकार किया है कि मधोक साहब गायब होने के बाद भी आपसे मिल चुके हैं ।”
वृद्धा के चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं ।
“यदि उन्होंने हत्या नहीं की तो वे किस बात से भयभीत हैं ?”
“मैं कुछ नहीं जानती ।” - वृद्धा बुदबुदाई ।
“देखिये” - रामसिंह मीठे स्वर से बोला - “एक पुलिस अफसर होने के नाते मैं कोई गारन्टी तो नहीं कर सकता । ये लोग देर सवेर पकड़े तो जाएंगे ही । यदि आप मुझे सब कुछ बता दें तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि कानून की हद में रह कर मैं उनकी जो सहायता कर सकूंगा करूंगा ।”
वृद्धा क्षण भर चुर रही और फिर स्थिर स्वर से बोली - “अच्छा बेटा, बताती हूं । मैं तो शुरू से ही इस बात के विरुद्ध थी लेकिन वह नहीं माना । उसने वही किया जो उसे कुबड़े...”
एकाएक वृद्धा चुप हो गई और स्थिर नेत्रों से द्वार की ओर देखेने लगी । एक कुबड़ा विचित्र सी शान से कमरे में प्रविष्ट हो रहा था ।
“डाक्टर फिंच !” - रामसिंह फुसफुसाया ।
सुनील ने उसे गौर से देखा । सूजन का हल्का सा निशान अब भी उसकी आंख पर मौजूद था ।
“ये कबाब में हड्डी कहां से आ गई ?” - सुनील धीरे से बोला । विचित्र संयोग था कि फिंच उसी समय पहुंचा था जबकि वृद्धा बड़ी महत्वपूर्ण बात बताने वाली थी ।
फिंच ने वृद्धा का अभिवादन किया और फिर रामसिंह को देखकर आश्चर्य का प्रदर्शन करता हुआ बोला - “हैलो सुपर साहब, आप भी मौजूद हैं ।”
“आप यहां कैसे आए ?” - रामसिंह ने कठोर स्वर से पूछा ।
“भई पड़ोसी हूं, मिसेज मधोक की तबियत खराब रहती है इनको देखने चला आया ।”
“क्या आपको मालूम था कि मैं भी यहां हूं ?” - रामसिंह ने उसी स्वर में दूसरा प्रश्न किया ।
“विश्वास कीजिए, सुपर साहब !” - फिंच मीठे स्वर में बोला - “मुझे कतई जानकारी नहीं थी कि आप भी यहां हैं नहीं तो मैं...”
“आप झूठ बोल रहे हैं ।” - रामसिंह क्रोधित होकर बोला वह अपने पर अधिकार खोता जा रहा था - “आप जान बूझकर ऐसे मौके पर यहां आ टपके हैं जब हम मिसेज मधोक से बहुत महत्वपूर्ण बातें कर रहे थे ।”
“ऐसे ही सही सुपर साहब ।” - फिंच उत्तेजना रहित स्वर से बोला ।
“आप कृपा करके यहां से तशरीफ ले जाइए ।”
“सुपर साहब यह घर आपका नहीं, मिसेज मधोक का है, आप...”
“आई से गैट आउट !” - रामसिंह चिल्लाया ।
“श्योर सर ।” - फिंच भावनारहित स्वर से बोला । फिर उसने एक भरपूर दृष्टि मिसेज मधोक पर डाली और मीठे स्वर में रामसिंह को सम्बोधित करके बोला - “सुपर साहब, मेरे जैसे आदमी तो आपके सरकारी तरीके सह सकते हैं लेकिन कम से कम इस वृद्धा पर तो रहम कीजिए । देख नहीं रहे हैं आप कि वे कितनी डर गई हैं ! हालांकि मैंने मैडिकल प्रैक्टिस अर्सा हुआ छोड़ दी है लेकिन फिर भी इतना कहूंगा कि अपनी जबान से एक शब्द भी निकलना वृद्धा की सेहत के लिए भयानक सिद्ध हो सकता है नमस्कार ।”
और वह राजसी शान से चलता हुआ कमरे से बाहर निकल गया ।
वृद्धा ने कुछ बोलने की चेष्टा की लेकिन जबान ने साथ नहीं दिया । उसने नेत्र मुंद गये और वह सोफे से पीठ टिका कर लम्बी-लम्बी सांसें लेने लगी । फिंच की मौजूदगी भर ने ही उसे एक शब्द भी बोलने योग्य नहीं छोड़ा था ।
रामसिंह ने नौकर को आवाज दी ।
“इन्हें ले जाकर बिस्तर पर लिटा दो ।” - वह नौकर से बोला - “और डाक्टर को फोन कर दो । मैं अभी एक पुलिस आफिसर यहां भेज दूंगा जो मिसेज मधोक की तबीयत सुधरने तक यहीं रहेगा । किसी को भी वृद्धा के कमरे में घुसने मत देना और डाक्टर फिंच को तो, वह कुबड़ा जो यहां आया था, कोठी का द्वार लांघने की भी आज्ञा नहीं है ।”
***
अगले दिन सुनील मैडिकल लाइब्रेरी गया । वहां से उसे दो काम की बातें मालूम हुईं ।
डाक्टर फिंच पिछले तीस साल से लगातार उस लायब्रेरी में आ रहा था । इस तीस सालों उसने में जो पुस्तकें पढी थी वे हारमोन्स, ह्यूमन ग्लैंड्स और इलैक्ट्रिसिटी से सम्बन्धित थीं ।
लायब्रेरी का सदस्य बनने के लिए नगर के किसी प्रतिष्ठित आदमी का रेफरेंस लाना पड़ता था । डाक्टर फिंच की सिफारिश किसी डाक्टर सक्सेना ने की थी ।
सुनील ने लायब्ररी से डाक्टर सक्सेना का पता नोट किया और उसके क्लिनिक पर पहुंच गया ।
सुनील को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि द्वार पर डाक्टर कमलानी का बोर्ड लगा हुआ था ।
वह डाक्टर से मिला ।
“डाक्टर सक्सेना !” - कमलानी हंसता हुआ बोला - “आप बहुत देर में पहुंचे, जनाब । डाक्टर सक्सेना को मरे हुए पच्चीस वर्ष हो चुके हैं ।”
सुनील निराश हो उठा ।
“डाक्टर साहब ।” - वह क्षण भर बाद बोला - “क्या आप डाक्टर सक्सेना को उसके जीवन काल में जानते थे ?”
“जी नहीं ।” - डाक्टर बोला - “मैंने यह मकान और प्रयोगशाला डाक्टर सक्सेना की मृत्यु के बाद उसके रिश्तेदारों से खरीदी थी । लेकिन हां, मेरे क्लिनिक में एक वृद्ध कम्पाउन्डर है जो डाक्टर सक्सेना के समय भी यहां काम करता था । मैं उसे बुला देता हूं, शायद वह आपको कुछ बता सके ।”
डाक्टर ने एक चपरासी के साथ उसे कम्पाउन्डर के पास भेज दिया ।
“आप डाक्टर सक्सेना के समय भी यहां काम करते थे ?” - सुनील ने पूछा ।
“जी हां ।” - वृद्ध कम्पाउन्डर बोला - “उस समय मैं लगभग बीस वर्ष का था ।”
“आप किसी डाक्टर फिंच को भी जानते हैं ?”
“जी हां डाक्टर फिंच सक्सेना साहब का मित्र था, अक्सर यहां आया करता था लेकिन उसका असली नाम डाक्टर फिंच नहीं था । यह नाम तो उसने एक लम्बी बीमारी के बाद रख लिया था ।”
तो इसीलिए डाक्टर फिंच का नाम किसी मैडिकल रेफरेन्स बुक में नहीं मिला था - सुनील ने सोचा ।
“डाक्टर फिंच ने अपना नाम क्यों बदला था, बाबा ?” - सुनील ने पूछा ।
“उसे कोई भयानक बीमारी हो गई थी, शायद ग्लैंड-ट्रबल थी । उसके कारण उसकी पीठ पर बड़ा सा कूबड़ निकल आया था और चेहरा भी बिगड़ गया था । बेचारा मरता-मरता बचा था । बीमारी से पहले वह बड़ा सुन्दर युवक था लेकिन बाद में इतना बदसूरत लगने लगा था कि उसने लोगों से मिलना जुलना बन्द कर दिया था और अपना नाम भी बदल लिया था ।”
“डाक्टर सक्सेना के मरने के बाद तुमने उसे देखा है कभी ?”
“नहीं, कितने वर्ष हो गये । मैं बूढा हो गया, डाक्टर साहब मर गये और डाक्टर फिंच का पता ही नहीं क्या हुआ । बाबूजी डाक्टर फिंच जैसे मास्टर दिमाग के मालिक रोज-रोज पैदा नहीं होते । वह बेहद काबिल डाक्टर था । जब वह जर्मनी में डाक्टरी पढ ही रहा था तभी वह सिन्थेटिक हारमोन्स से इन्जेक्शनों का अविष्कार करके सारे ससांर में प्रसिद्ध हो गया था ।”
“क्या यह हैरानी की बात नहीं है कि ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त डाक्टर के विषय में कोई यह तक नहीं जानता कि वह जीवित है या मर गया ?”
“अपनी बदसूरती के कारण शायद डाक्टर फिंच खुद ही यह न चाहता हो कि कोई उसे जाने । और फिर उसने अपना नाम भी बदला लिया था । उसने अपने पुराने व्यक्तित्व को तो एकदम से मिटा ही दिया था । कबूड़ निकल आने और चेहरा बदसूरत हो जाने के बाद उसने लोगों से मिलना जुलना बिल्कुल छोड़ दिया था । डाक्टर सक्सेना को छोड़ कर इस संसार में उसका एक भी मित्र नहीं था ।”
“आपने अभी बताया था ।” - सुनील विचारपूर्ण स्वर से बोला - “कि ग्लैंड-ट्रबल के कारण डाक्टर के कूबड़ निकल आया था और चेहरा बिगड़ गया था । आपके ख्याल से क्या ऐसा सम्भव है ?”
कम्पाउन्डर कुछ क्षण चुप बैठा रहा ।
“देखिये जनाब ।” - अन्त में वह बोला - “अब जबकि डाक्टर सक्सेना इस संसार नहीं है और फिंच भी शायद मर चुका हो, मैं यह कहने में कोई हर्ज समझता कि मुझे फिंच की इस बात पर कभी भी विश्वास नहीं हुआ था कि उसका कूबड़ ग्लैंड-ट्रबल के कारण है । कम्पाउन्डर होने के नाते थोड़ी बहुत तो मैं भी इस लाइन की जानकारी रखता ही था । मैं बात को तनिक विस्तार से कहता हूं । डाक्टर सक्सेना इस विषय पर रिसर्च कर रहे थे कि इन्सान के निष्क्रिय अंगों को किसी जानवर के वैसे अंगों से बदल कर शरीर को सक्रियता प्रदान की जा सकती है । फिंच की भी इसी विषय में रुचि थी और इसी कारण वे दोनों गहरे मित्र बन गये थे । लेकिन फिंच डाक्टर सक्सेना से एक कदम आगे की सोचता था । वह मानव अंगों को जानवर से बदलने के स्थान पर किसी दूसरे मानव अंगों से ही बदलने के पक्ष में था । फिंच ने कई प्रयोग किये । वह मुर्दा आदमियों का दिल, धमनियों और शिराओं सहित निकाल लाता था और उन्हीं से विभिन्न प्रयोग करता रहता था । सक्सेना इसके विरुद्ध था लेकिन वह इस विषय में फिंच को महान विद्वान मानता था । इसीलिये वह उसे टोकता नहीं था । फिर एक दिन फिंच खुशी से दमकता हुआ आया और उसने सक्सेना को बताया कि उसने मानव हृदय और मुख्य-मुख्य रक्तवाहिनी नलिकाओं को बदलकर मनुष्य को अजस्त्र यौवन प्रदान करने का तरीका खोज निकाला है । उसने सक्सेना को थ्योरी बताई और सक्सेना इनसे काफी प्रभावित भी हुआ । सक्सेना केवल एक बार को स्वीकार नहीं करता था । वह फिंच के दावे को स्वीकार नहीं करता था कि इस प्रयोग में इस मरे हुए आदमी के अंग प्रयोग में नहीं लाये जा सकते हैं । फिंच ने गरमा-गरमी से स्वयं को ही आपरेशन के लिए प्रस्तुत कर दिया । न जाने कैसे सक्सेना ने भी आपरेशन करना स्वीकार कर लिया । पहले ही दीन फिंच एक मानव हृदय लाया जिसमें धमनियां और शिरायें संलग्न थीं । एक बात मैं कहना भूल गया । डाक्टर फिंच उस समय छत्तीस वर्ष का था । उस आयु में उसे हार्ट अटैक हो चुका था । विशेषज्ञों की धारणा थी कि वह पांच वर्ष से अधिक नहीं जी सकेगा । सक्सेना ने फिंच का आपरेशन किया और फिंच के दिल के स्थान पर उसने द्वारा लाया हुआ किसी और का दिल लगा दिया । आपरेशन सफल रहा फिंच को फिर हार्ट अटैक नहीं हुआ और उसक ब्लड प्रेशर भी नार्मल रहने लगा । आपरेशन के बाद फिंच ने बताया कि आपरेशन के लिये इसीलिए तैयार हो गया था कि यदि आपरेशन सफल रहा तो फिर वह चिर युवक बन जायेगा और यदि आपरेशन असफल रहा तो मृत्यु पांच साल बाद आयी या पांच साल पहले क्या अन्तर पड़ता है । आपरेशन के बाद फिंच बिल्कुल स्वस्थ हो गया । फिर एक सप्ताह बाद बड़ा भारी रहस्योद्घाटन हुआ जिसने सक्सेना को चकरा कर रख दिया । आपरेशन के बाद एक सप्ताह बाद एक युवती की लाश नदी में से प्राप्त हुई । लाश को वजन बांधकर डुबोया गया था लेकिन कुछ पत्थर टूट पड़े थे इसलिए लाश सतह पर तैर आयी थी । लाश का सिर कट एक ओर लटका हुआ था और दिल और उससे सम्बिन्धत रक्त वाहिनी नलिकायें गायब थीं । बात दिन की तरह स्पष्ट थी कि फिंच मृत का नहीं जीवित व्यक्ति का दिल लाया था । यानी कि उसी ने उस लड़की की हत्या की थी । सक्सेना ने फिंच को धमकाया तो उसने स्वीकार किया कि प्रयोग मृत व्यक्ति के हृदय से सफल नहीं हो सका था । उसने एक मजदूर में मृत व्यक्ति का हृदय लगाने की चेष्टा की थी लेकिन वह दस मिनट बाद ही मर गया था । फिंच ने अपने कृत्य पर लज्जित या भयभीत होने के स्थान पर सक्सेना को यह समझाने की चेष्टा की कि उसने लड़की की हत्या करके कुछ भी बुरा नहीं किया है । लड़की कैंसर की मरीज थी । अधिक से अधिक छः मास पहले मर गई तो क्या हुआ ? उसकी मृत्यु से एक महान डाक्टर को जिन्दगी मिली है । सक्सेना ने उसे पुलिस में देने का इरादा किया लेकिन फौरन ही उसे अपना विचार त्याग देना पड़ा । वह स्वयं भी तो उस अपराध में हिस्सेदार था । उसने फिंच का आपरेशन किया था । फिंच अपना सारा अपराध सक्सेना पर थोप सकता था कि सब किया-धरा सक्सेना का ही था । सक्सेना ने चुप रहना ही बेहतर समझा । फिंच उसी प्रकार सक्सेना से मिलने आता रहा । फिर धीरे-धीरे न जाने कैसे उसके चेहरे की नसें गरदन की ओर खिंचने लगीं और उसकी सूरत बिगड़ने लगी । फिंच कहता था कि आपरेशन में कोई टैक्नीकल कमी रह गई थी । भाई साहब फिंच का चेहरा बिगड़ जाने का कारण तो यह हो सकता है लेकिन किसी भी कारण आपरेशन के इतने महीनों बाद पीठ पर फुट भर का कूबड़ पैदा नहीं हो सकता ।”
“फिंच ने सक्सेना को कूबड़ के विषय में कुछ नहीं बताया ?”
“जरूर बताया होगा लेकिन मैं नहीं जान सका । और यह बाकी बातें भी मुझे केवल इसलिए मालूम है क्योंकि सक्सेना साहब को आपरेशन के समय कम से कम एक सहायक की आवश्यकता तो थी ही ।”
“फिर फिंच का सक्सेना से मिलना-जुलना बन्द कैसे हुआ ?”
“सक्सेना सत्तर वर्ष का था । बुढापा उन पर बुरी तरह से अधिकार कर चुका था । फिंच उसका आपरेशन करना चाहता था लेकिन सक्सेना को स्वीकार नहीं था । नये हृदय को प्राप्त करने के लिये किसी की हत्या करने की आवश्यकता थी जो सक्सेना की अन्तरात्मा स्वीकार नहीं करती थी । फिर एक दिन फिंच ने जबरदस्ती पिस्तौल दिखाकर सक्सेना को आपरेशन के लिए तैयार करने की चेष्टा की लेकिन सक्सेना भयभीत नहीं हुआ । उसने फिंच को धमकी दी कि वह मर कर भी फिंच को फंसा जायेगा । फिंच को अपना इरादा छोड़ना पड़ा और उस दिन के बाद वह कभी नहीं आया ।”
सुनील उठ खड़ा हुआ ।
“अच्छा बाबा ।” - वह जाने का उपक्रम करता हुआ बोला - “एक बात और । यदि फिंच आज जिन्दा हो तो कितने वर्ष का होगा ?”
“सत्तर वर्ष का ।” - कम्पाउन्डर मन ही मन हिसाब लगा कर बोला ।
“तो बाबा, यह जान लो कि फिंच जीवित है और उसकी आयु चालीस वर्ष से अधिक नहीं मालूम होती ।”
कम्पाउन्डर मुंह बाये उसका मुंह देखता रहा ।
“अखबार पढते हैं ?” - सुनील ने पूछा ।
उसके नकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया ।
“पढा करो !” - सुनील बोला - “बाबा, फिंच आज भी जिन्दा है और अपनी उस करामती रिसर्च से नगर के धनी वृद्धों को यौवन दान कर रहा है ।”
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