मोना चौधरी ने दरवाजा धकेला और अपने अपार्टमेंट में प्रवेश करके दरवाजा बंद कर लिया। शाम के आठ बज रहे थे। आज दिन भर वो यूं ही घूमती रही थी। कोई खास काम नहीं था और अब उसका इरादा लम्बी नींद लेने का था, यही वजह थी कि 'डिनर' के नाम पर थोड़ा-बहुत पहले ही खा आई थी।
बदन पर पसंदीदा कपड़े, जींस की पैंट और जींस की ढीली-ढाली कमीज थी। बेड पर जाने से पहले वो नहा लेना चाहती थी। यही सोचकर उसने खड़े-खड़े ही जूते उतारे और बाथरूम की तरफ बढ़ते हुए शर्ट के बटन खोलने लगी। अभी चार कदम ही बढ़ी थी, दो बटन ही खोले थे कि फोन की बेल बज उठी।
मोना चौधरी ठिठकी। फोन की तरफ निगाह उठी फिर उसकी तरफ बढ़ गई।
"हैलो।" मोना चौधरी ने रिसीवर उठाया।
"मोना चौधरी?"
"मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी। ये आवाज वो पहली बार सुन रही थी।
"कौन हो तुम?"
"तुम मोना चौधरी हो?" पुनः पूछा गया।
मोना चौधरी के चेहरे पर अजीब से भाव आ ठहरे।
"हां।"
"हमारे 'सर' तुमसे मिलना चाहते हैं?" आवाज मोना चौधरी के कानों में पड़ी।
"सर?"
"हां।"
"तुम कौन हो। तुम्हारे 'सर' कौन हैं। क्यों मिलना चाहते हैं। एक बार में बोलो।"
"इस बारे में कोई भी बात फोन पर नहीं होगी मोना चौधरी।" फोन पर आता शीत स्वर मोना चौधरी के कानों में पड़ा--- "मिलने पर ही बात होगी और 'सर' से मुलाकात करके तुम्हें निराशा नहीं होगी।"
"निराशा या आशा इस बारे में सोचना-समझना, देखना मेरा काम है। बिना मांगे मुझे सलाह की जरूरत नहीं। तुमसे जो पूछा है, उसका जवाब तुम्हें फोन पर ही देना पड़ेगा।"
"नहीं। तुम्हारे किसी भी सवाल का जवाब देने की मुझे इजाजत नहीं है। मिलकर ही बात होगी।"
मोना चौधरी के माथे पर बल उभरे।
"मेरे बारे में तुम्हें किसने बताया?"
"तुम्हारे बारे में किसी से पूछने की हमें जरूरत नहीं। अपने काम की बात मालूम करना हमें आता है।"
"मेरा फोन नंबर कैसे मालूम हुआ?"
"हमारे लिए इन बातों को भी मालूम करना कोई बड़ी बात नहीं है।"
"अब मैं कुछ कहूं।" मोना चौधरी की आवाज में तीखापन आ गया।
"हां।"
"मुझे तुमसे या तुम्हारे सर से मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं...।"
"तुम जल्दबाजी में फैसला कर रही हो।" फोन पर आती आवाज मोना चौधरी के कानों में पड़ी--- "हम...।"
मोना चौधरी ने रिसीवर रख दिया। वहीं खड़ी वो कई पलों तक फोन को देखती रही। लेकिन दोबारा बेल नहीं बजी। मोना चौधरी कमीज के बटन खोलते हुए बाथरूम की तरफ बढ़ गई।
■■■
मोना चौधरी गहरी नींद में थी। महीन पारदर्शी नाईटी, घुटनों से ऊपर सरककर, कूल्हो तक आ पहुंची थी। शरीर पर नाइटी के अलावा और कोई कपड़ा नहीं था। आधी रात के बाद ही कोई वक्त हो रहा था। उसके नींद में डूबे चेहरे पर, मासूमियत से भरी खूबसूरती नाच रही थी। नाईटी ऊपर चढ़ जाने की वजह से कूल्हों तक नजर आ रही टांगे किसी का भी ईमान खराब कर देने के लिए काफी थीं।
मोना चौधरी ने करवट ली।
अगले ही पल उसके नींद से भरे मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा।
बंद आंखें भिंच-सी गईं। शांत पड़ा मस्तिष्क तेजी से दौड़ा। उसे अच्छी तरह याद था कि बेड पर जाने से पहले उसने लाइट ऑफ की थी और नाइट बल्ब ऑन किया था। परंतु इस वक्त उसे कमरे में फैली तीव्र रोशनी का एहसास हुआ।
मोना चौधरी ने लेटे-ही-लेटे फौरन आंखें खोलीं। पुतलियां घूमने लगीं। उसी मुद्रा में पड़े जो भी नजर आया। वो देखा। परंतु कोई इंसान नजर नहीं आया। कमरे की लाइट ऑन थी। मोना चौधरी का हाथ धीमे से तकिए के नीचे सरका और वहां मौजूद छोटी-सी पिस्तौल पर जा टिका।
उसने करवट ली। दूसरी तरफ देखा और उस पर निगाहें ठहर गईं।
वो पैंतालीस बरस का एक स्वस्थ व्यक्ति था। बदन पर कीमती सूट था। उसका चेहरा ऐसा था कि उसे देखकर, उसके मन का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था। उसकी उंगलियों में बिना सुलगी सिगरेट फंसी थी। मोना चौधरी को अपनी तरफ देखते पाकर वो हौले से मुस्कुराया फिर उसने सिगरेट सुलगा ली।
होंठ सिकोड़े मोना चौधरी बेड पर ही सीधी बैठती चली गई। पिस्टल का रूख उसकी तरफ कर दिया। उसे देखने के बाद एक पल के लिए भी उसकी तरफ से निगाह नहीं हटी थी।
उसने कश लिया और बोला।
"मैंने सिगरेट इसलिए नहीं सुलगाई थी स्मैल से तुम्हारी नींद खराब न हो। मेरे इस तरह ख़ामोशी से बैठे रहने का मतलब ये नहीं था कि नींद में डूबे तुम्हारे जिस्म को देखूं। मैंने ऐसा किया भी नहीं। वैसे तुम्हारे जिस्म की जितनी भी तारीफ की जाए वह कम है। भगवान झूठ ना बुलाए। मैंने ऐसा बे-मिसाल जिस्म पहले कभी नहीं देखा।"
मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी।
ये वही आवाज थी, किसका फोन आया था कि 'सर' उससे मिलना चाहते हैं।
"मेरी मौजूदगी को दो घंटे हो चुके हैं। या फिर होने वाले हैं।" उसने पुनः कहा--- "मैं चाहता तो तुम्हें नींद से उठा सकता था, लेकिन ऐसा करना मैंने ठीक नहीं समझा। क्योंकि तुम बहुत शांत और मीठी नींद में थी। ऐसे में मैंने इंतजार कर लेना बेहतर समझा।"
"तुम...?" मोना चौधरी के होंठ भिंचने लगे।
"हां। मैं जानता हूं, तुमने मेरी आवाज से, मुझे पहचान लिया है। दरअसल तुमने 'सर' से मिलने को मना कर दिया। आगे बात ही नहीं की तो इसलिए मुझे खुद आना पड़ा। तुम्हें लेने के वास्ते।"
"तुम भीतर कैसे आए। इतना आसान नहीं है, मेरे घर में आना कि...।"
"अब क्या बताऊं तुम्हें।" उसने कश लिया--- "दरअसल ये छोटी-छोटी बातें मेरे लिए कोई महत्व नहीं रखतीं। खैर, छोड़ो इन बातों को। चेंज करो और चलो मेरे साथ, सर, से तो मिल लो।"
"तुमने इस तरह मेरे घर में आकर अपनी मौत को बुलावा भेजा है।" मोना चौधरी का स्वर कठोर होता चला गया--- "ऐसी हरकतें मुझे पसंद नहीं आती और...।"
"कभी-कभी न चाहते हुए सब कुछ बर्दाश्त करना पड़ता है। जैसे कि अब तुम भी करोगी।" वो मुस्कुराया।
मोना चौधरी ने उसे कहर भरी निगाहों से देखा। हाथ में दबी पिस्टल का रुख उसकी तरफ था।
"मैं तुम्हारे साथ बाहर चलूंगी और किसी बढ़िया जगह पर तुम्हारे दोनों घुटनों पर गोलियां मारकर मालूम करूंगी कि तुम कौन हो और तुम्हारे 'सर' कौन हैं। ताकि उसे भी समझा सकूं कि मोना चौधरी के रास्ते में आने के लिए हिम्मत चाहिए। और...।"
"हिम्मत है। हिम्मत मैं साथ ही लाया हूं।" उसने शांत स्वर में कहा--- "वो साथ वाले कमरे में है।"
मोना चौधरी के दांत भिंच गए।
"आ जाओ तुम लोग।" वो कुछ ऊंचे स्वर में बोला।
वो चार थे जो पुकारने पर, एक के बाद एक दूसरे कमरे से निकलकर वहां आ गए। चारों के हाथों में रिवाल्वरें थीं। वो बदमाश तो नहीं लग रहे थे, परंतु उनकी आंखों में शराफत भी नहीं थी। मोना चौधरी ने उनमें से किसी को भी आज से पहले नहीं देखा था।
मोना चौधरी का चेहरा बेहद कठोर हो उठा था।
"दरअसल, मैं पूरी तैयारी करके आया हूं। क्योंकि 'सर' को तुम्हारी सख्त जरूरत है। या फिर कह लो कि तुम्हारी सर से मुलाकात करवाना, मेरी ड्यूटी है। मैं जानता हूं कि तुम्हें मेरा ये ढंग पसंद नहीं आ रहा। लेकिन मजबूरी में सब कुछ करना पड़ता है। 'सर' से तुम्हारी क्या बात होती है, ये बाद की बात है। लेकिन तुम्हें जबरदस्ती ले जाने की एवज में मैं तुमसे पहले ही माफी मांग लेता हूं और मुझे विश्वास है कि अपने मन में मेरे लिए कोई बुरा भाव नहीं रखोगी। चेंज कर लो। चलते हैं अब यहां से।"
दांत भींचे मोना चौधरी बारी-बारी सबको देख रही थी। वे पांच थे। कोई और जगह होती तो उनसे निपटने की सोची भी जा सकती थी, लेकिन अपने ही अपार्टमेंट में गोलियां चलाना, खून-खराबा होना। उसके लिए पूरे तौर पर नुकसानदेह था।
मोना चौधरी को न चाहते हुए भी उसकी बात माननी पड़ी।
■■■
एक घंटे के सफर के दौरान मोना चौधरी, कार के पीछे वाली सीट पर, दो आदमियों के बीच फंसकर बैठी रही। वे लोग बेहद शराफत के साथ, उससे पेश रहे थे। उसे जबरदस्ती साथ ले जाने के अलावा नापसंदी वाला और कोई काम उन्होंने नहीं किया था।
दो आदमी कार चलाने वाले के साथ बैठे थे।
घंटे भर बाद कार ऐसे इलाके में प्रवेश कर गई जो शहर का सबसे कीमती, महंगा इलाका था और सिर्फ देश की बड़ी हस्तियां ही वहां रहती थीं। ये वी.आई.पी. क्षेत्र था। कॉलोनी के बीच के रास्तों पर उन्हें दो जगह रोका गया। वे पुलिस और नाइट गार्ड बैरियर थे। परंतु उनके चेहरे देखते ही, फौरन उन्हें आगे बढ़ने की इजाजत दे दी गई।
फिर वो कार महल जैसे बंगले के विशाल फाटक के सामने रुकी। कार की हैडलाइट फाटक पर पड़ते ही, फाटक की छोटी-सी खिड़की खुली। चेहरा नजर आया। अगले ही पल वो चेहरा गायब हो गया और कुछ ही पलों में फाटक खुलने पर कार भीतर प्रवेश कर गई।
कुछ लंबा रास्ता तय करने के बाद कार पोर्च में रुकी। जहां चार विदेशी कारें पहले ही मौजूद थीं। पोर्च में तीव्र रोशनी ऑन थी। वो सब बाहर निकले।
मोना चौधरी भी बाहर आ गई। उसकी निगाहें हर तरफ फिरने लगीं।
वो चारों आदमी चले गए।
परंतु उनका बड़ा, पांचवा वहीं खड़ा, मोना चौधरी को देखता रहा।
आखिरकार मोना चौधरी की निगाह उस पर टिकी।
"आओ। भीतर चलते हैं।" उसने शांत स्वर में कहा।
"ये किसकी जगह है?" मोना चौधरी ने पूछा।
"यहां तक पहुंच गई हो तो सब सवालों का जवाब तुम्हें मिलेगा मोना चौधरी।" वो बोला।
"मिलेगा मतलब कि तुम कुछ नहीं बताओगे। तुम्हारा सर बतलाएगा।" मोना चौधरी की नजरें उसके चेहरे पर थीं।
"ठीक समझीं तुम...।" उसने संजीदगी से कहा--- "भीतर चलो।"
मोना चौधरी उसके साथ चल पड़ी।
दो मिनट में ही वो बंगले की भीतर इतने विशाल और खूबसूरत ड्राइंग रूम में थी कि ऐसा महसूस होने लगा जैसे वह किसी महल के ड्राइंग हॉल में हो।
मोना चौधरी समझ गई कि जो भी इस जगह का मालिक है, वह शाही हैसियत रखता है। दौलत के इतने ऊंचे ढेर पर बैठा है कि, जहां तक देख पाना भी, आम आदमी को नसीब नहीं होता।
मोना चौधरी ने ठिठककर ड्राइंगहॉल का नजारा किया।
"यहां से चलें?" वो पुनः बोला।
मोना चौधरी ने उसे देखकर सहमति में सिर हिला दिया।
वो मोना चौधरी को लेकर शानदार बेडरूम में पहुंचा जो कि खाली था। तीव्र प्रकाश वहां जगमगा रहा था। डबल बेड पर, कीमती कोरिया की बेडशीट बिछी थी। दीवारों पर कीमती ऑयल पेंटिंग्स और कई बेशकीमती सीनरी लगी हुई थीं। वहां टी.वी., फ्रिज और छोटा-सा सोफा-सेट मौजूद था। यानी कि किसी इंसान की जरूरत की हर चीज वहां मौजूद थी।
मोना चौधरी ने पलटकर उसे देखा।
"यहां तो कोई भी नहीं।"
"मैं तुम्हें यहां इसलिए लाया हूं कि चंद घंटे आराम कर सको। जो तकलीफ हुई है, उसके लिए मैं माफी चाहता हूं।" उसने शांत स्थिर स्वर में कहा।
"क्या मतलब?"
"सर, नींद ले रहे हैं और उन्हें उठाना मैं ठीक नहीं समझता। उनका ऑर्डर था कि आंख खुलने पर उन्हें यही खबर मिले कि तुम्हें यहां लाया जा चुका है। मैंने उनका आर्डर बजा दिया।"
मोना चौधरी के चेहरे पर सख्ती के भाव उभरे
"मैं तुम्हें बांदी लगती हूं जो मुझे यहां ले आए और आराम करने को कह रहे...।"
"मोना चौधरी।" वो बात काटकर कह उठा--- "तुम्हारी जैसी शख्सियत वाला मैं होता और मेरे साथ ऐसा होता तो यकीनन मुझे भी क्रोध आता। लेकिन कभी-कभी बर्दाश्त करना पड़ता है। दौलतमंद लोगों की आधी हरकतें तो हर हाल में वाहियात होती हैं। सब सहना पड़ता है।"
"तुम सहो। तुम नौकर हो और मैं...।"
"अपने काम की बात सुन लो।"
मोना चौधरी के माथे पर बल पड़े।
"दिन निकलने पर, तुम ऐसे इंसान से मुलाकात करोगी, जिसे खुद नहीं मालूम कि उसके पास कितनी दौलत है। वो तुमसे कुछ चाहता है, उसकी इच्छा पूरी हो तो वो मैं तुम्हें मुंह मांगी दौलत दे देगा। बाय, कुछ घंटों के बाद, सुबह मुलाकात होगी।" कहकर वह पलटा और तेज-तेज कदम उठाता हुआ बाहर निकलता चला गया।
मोना चौधरी आंखें सिकोड़े वहीं खड़ी दरवाजे को देखती रही। चेहरे पर सोच के भाव उभर आए थे। फिर वो आगे बढ़ी और दरवाज़े को धकेला। दरवाजा खुलता चला गया। उसने बाहर झांका। बाहर लंबी-चौड़ी गैलरी दूर तक रोशनी में चमकती खाली नजर आ रही थी। कोई नजर नहीं आया। मोना चौधरी ने दरवाजा बंद किया और सोचों में डूबी बेड की तरफ बढ़ गई।
मस्तिष्क में सिर्फ एक ही सोच थी।
कौन है वो, जिसने उसे यहां मंगवा लिया?
क्या चाहता है उससे?
क्या वो उससे पहले मिल चुकी है या पहली बार दिन निकलने पर उससे मिलेगी?
इन्हीं विचारों में उलझी मोना चौधरी बेड पर जा लेटी।
■■■
सुबह आठ बजे थे।
मोना चौधरी अटैच बाथरूम से नहा-धोकर निकली तो उसी व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया। वो तैयार और कपड़े भी बदले हुए था। और चुस्त-सा नजर आ रहा था।
"गुड मॉर्निंग मोना चौधरी।" वो मुस्कुराकर बोला--- "सर, नाश्ते की टेबल पर तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।"
मोना चौधरी ने उसे भरपूर निगाहों से देखा और तीखे स्वर में बोली।
"सॉरी, मैं अजनबी लोगों के साथ खाना-पीना पसंद नहीं करती।"
उसके चेहरे पर अजीब से भाव उभरे।
"तुम 'सर' के साथ नाश्ता लेने को मना कर रही हो।" उसके स्वर में हैरानी के भाव थे।
"कुएं में जाए तुम्हारा सर, वो मेरा कुछ नहीं लगता।" मोना चौधरी ने पहले वाले स्वर में कहा--- "मेरा नाश्ता यहीं ले आओ। मेरे आने पर वो सोया रह सकता है तो मैं भी नाश्ता यहीं कर सकती हूं। उसे इंतजार करने दो।"
वो अनिश्चित-सा खड़ा, मोना चौधरी को देखता रहा।
"मुझे 'सर' के पास नाश्ते की टेबल पर ले जाना चाहते हो।" मोना चौधरी ने व्यंग्य से कहा।
उसने सहमति में सिर हिलाया।
"तो रात वाला फार्मूला आजमाओ। रिवाल्वर निकालो, मेरी तरफ तान दो या फिर अपने चार आदमियों को बुला लो। शायद तुम इस कोशिश में कामयाब हो जाओ।" मोना चौधरी का लहजा पहले जैसा ही था।
उसने गहरी सांस लेकर सिर हिलाया।
"नागिन को बार-बार छेड़ना ठीक नहीं।" कहकर वो मुस्कुरा पड़ा--- "जितना हो गया, उतना ही बहुत है। मैं अब तुम्हें मजबूर नहीं करूंगा। तुम्हारा नाश्ता यहीं भिजवा देता हूं।" कहकर वो बाहर निकल गया।
दस मिनट पश्चात ही एक नौकर चांदी की खूबसूरत ट्राली धकेलता हुआ कमरे में आ पहुंचा। ट्राली पर नाश्ते के सामान के अलावा, जरूरत की हर चीज मौजूद थी।
"एनी अदर सर्विस मैडम---।" नौकर ने शालीन स्वर में पूछा।
"नहीं। तुम जाओ।"
वो बाहर निकल गया।
नाश्ता समाप्त करने के आधे घंटे पश्चात वो व्यक्ति कमरे में आया।
"मुझे आशा है कि तुम्हें नाश्ता पसंद आया होगा।"
"ठीक ही था।" मोना चौधरी ने लापरवाही से कहा।
"सर, अपने प्राइवेट रूम में तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं। मैं, तुम्हें उनके पास ले चलता हूं।"
मोना चौधरी के होंठों पर मुस्कान उभरी।
"सॉरी। नाश्ते के बाद मुझे कम-से-कम एक घंटा आराम करने की आदत है।" मोना चौधरी बोली।
उसने गहरी निगाहों से मोना चौधरी को देखा।
"लंच के बाद तो आराम के बारे में सुना था। नाश्ते के बाद आराम के बारे में पहली बार सुन रहा हूं।"
"हमारी नई मुलाकात है। दो-चार बार में मेरी आदतों के बारे में समझ जाओगे।" मोना चौधरी ने तीखे स्वर में कहा--- "रात तुमने अपने जोर पर, अपनी मनमानी की। मैंने इसलिए तुम्हें कोई जवाब नहीं दिया कि मैं अपने घर का कारपेट गंदा नहीं करना चाहती थी और ये भी नहीं चाहती थी कि मेरे घर पर किसी तरह का शोर-शराबा हो। वहां तो इसलिए तुम्हारी चल गई और मैं चाहती हूं कि तुम यहां भी अपनी जोर-आजमाइश करो। फिर देखते हैं किसकी चलती है।"
उसने हौले से सिर हिलाया।
"समझ गया। बिल्कुल समझ गया। कोई बात नहीं। मैं एक घंटे बाद आ जाऊंगा।" उसने बेहद शराफत के साथ कहा--- "लेकिन ये बात अपने दिलो-दिमाग से निकाल दो कि यहां पर तुमसे किसी तरह की जोर-जबरदस्ती की जाएगी। हम मेहमानों को इज्जत देना जानते हैं।"
मोना चौधरी उसे घूरती रही।
वो मुस्कुराकर दोस्ताना अंदाज में बाहर निकल गया।
एक घंटे बाद वो पुनः मोना चौधरी के पास आ पहुंचा।
"अब चलें, मोना चौधरी। सर, आपका इंतजार कर रहे हैं।" उसने कहा।
"चलते हैं। जल्दी भी क्या है।"
और चलते-चलते मोना चौधरी ने आधा घंटा और लगा दिया।
वो मोना चौधरी को साथ लेकर कमरे से निकला और गैलरी में आगे बढ़ गया।
"मैंने 'सर' को आज तक किसी का इंतजार करते नहीं देखा बल्कि लोग ही दिनों और हफ्तों तक 'सर' से मिलने का इंतजार करते हैं।" चलते-चलते उसने कहा।
"तुम्हारा सर, दो-चार बार मुझसे मिला तो, आदत पड़ जाएगी उसे इंतजार की।" मोना चौधरी के स्वर में तीखापन मौजूद था--- "मेरे ख्याल में अभी तक वो गलत कामों में फंसा रहा है।"
जवाब में उसने कुछ नहीं कहा।
महल जैसे बंगले की चंद खूबसूरत गैलरियों को पार करने के बाद, वो एक बंद दरवाजे के सामने ठिठका और हौले से दरवाजा थपथपाया। दरवाजे के ऊपर लाल रंग का छोटा-सा बल्ब ऑन था। फौरन ही वो बुझ गया तो उसने दरवाजा खोला और शांत भाव से मोना चौधरी को देखा।
"आओ। ये 'सर' का प्राइवेट रूम है और 'सर' भीतर ही हैं।" मोना चौधरी के भीतर प्रवेश करने के बाद, वो भी भीतर आ गया। दरवाजा बंद हो गया।
■■■
उस कमरे में कीमती लकड़ी का बेहद खूबसूरत फर्नीचर था। वो लकड़ी की महक थी जो वहां के वातावरण में मौजूद थी। वहां की सजावट जिक्र करने लायक थी। काफी बड़ा कमरा था। एक तरफ टेबल, कुर्सियां मौजूद थीं। ठीक बीचो-बीच सोफा चेयर बहुत अच्छे ढंग से लगी हुई थी। नीचे ऐसा मखमली कालीन था कि पांव धंसते से महसूस हो रहे थे।
उस बड़े टेबल पर कंप्यूटर, प्रिंटर्स मौजूद था।
वो कमरा कुछ इस तरह था कि बाहर की रोशनी भीतर नहीं आ सकती थी और न ही कोई ऐसी जगह थी कि, जहां से भीतर झांका जा सके। दरवाजों के लॉक का सिस्टम ऐसा था कि बाहर से नहीं खोला जा सकता था, भीतर मौजूद व्यक्ति की मर्जी से ही बाहर वाला भीतर प्रवेश कर सकता था।
कठिनता से उसकी उम्र बयालीस बरस की रही होगी, जो टेबल के पीछे लंबी पुश्त वाली चेयर पर बैठा, कंप्यूटर में व्यस्त था। उसका कद छः फीट लंबा था। वह आकर्षक था। प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला था। उसके जर्रे-जर्रे से ही रईसी ठाठ-बाट झलक रहे थे। हाथों की चारों उंगलियों में हीरे की अंगूठियां थीं। दो उंगलियों में सोने की अंगूठियां। गले में सोने की भारी चेन और बाईं कलाई में सोने, हीरे जड़ित कड़ा चमक रहा था।
उनके भीतर प्रवेश करते ही वह उठा। टेबल के पीछे से निकलकर, बेहद शालीन ढंग से वो आगे बढ़ा। बदन पर कमीज-पैंट थी। मोना चौधरी के पास पहुंचकर वो मुस्कुराया।
"वेलकम मोना चौधरी।" मीठे स्वर में कहते हुए उसने हाथ बढ़ाया।
खोज भरी निगाहों से उसे देखते हुए, मोना चौधरी ने उससे हाथ मिलाया।
"मुझे मालूम हुआ कि जिस तरह तुम्हें यहां लाया गया उसकी वजह से तुम नाराज हो और इसी कारण तुमने मेरे साथ नाश्ता नहीं किया और मिलने में भी देरी लगाई।"
मोना चौधरी को लाने वाला व्यक्ति सतर्क-सा खड़ा था। ऐसे कि कहीं उसके खड़े होने के ढंग में गलती न हो जाए। उसकी आंखों की पुतलियां बारी-बारी दोनों पर फिर रही थीं।
"मुझे जानते हो।" मोना चौधरी का लहजा ठोस था।
"हां।"
"तो मेरे बारे में भी सब जानते होंगे।" मोना चौधरी की आंखें उस पर टिकी थीं।
"अवश्य।"
"फिर तो तुम्हें यह भी मालूम होना चाहिए था कि तुम्हारा जबरदस्ती वाला ढंग मुझे पसंद नहीं आएगा।" मोना चौधरी ने एक-एक शब्द चबाकर उसकी आंखों में झांकते हुए कहा।
"मालूम था। पक्का मालूम था मोना चौधरी।" उसने फौरन सहमति में सिर हिलाते हुए कहा--- "लेकिन इसके अलावा और कोई रास्ता भी नहीं था। तुमने आने से इंकार कर दिया था।"
"तो तुम आ सकते थे मेरे पास।"
"नहीं मैं नहीं आ सकता था।" उसने इंकार में, गंभीर अंदाज में सिर हिलाया--- "अगर मेरा आना संभव हो पाता तो मैं हर हाल में आता। खैर, अभी बातें होंगी। मेरी मजबूरी तुम्हें मालूम हो जाएगी। इनसे मिलो, ये मिस्टर गोकुलदास मारवाह हैं। इनके बारे में बाकी बातें भी तुम्हें मालूम हो जाएंगी। आओ।" वो टेबल की तरफ बढ़ता हुआ बोला--- "बैठकर बातें करते हैं।"
मोना चौधरी शांत भाव से टेबल की तरफ बढ़ गई।
वो टेबल के पीछे कुर्सी पर बैठा।
मोना चौधरी ने भी एक कुर्सी संभाल ली।
"तुम...।" उसने गोकुलदास मारवाह से कहा--- "जाओ।"
"यस सर।" उसने सतर्क स्वर में कहा और पलटकर दरवाजे की तरफ बढ़ गया। जब वह बाहर निकल गया तो उसने बेचैनी से पहलू बदला। मोना चौधरी को देखा।
"तुम्हें जो भी कहना-सुनना हो। बाद में कह लेना। पहले मेरे सवालों का जवाब दो।" मोना चौधरी बोली।
उसने सहमति में सिर हिलाया।
"तुम कौन हो?"
"मैं...। हां, पहले मैं तुम्हें अपने बारे में बताता हूं।" वो धीमे सोच भरे स्वर में कह उठा--- "मैं अजीत वासवानी हूं। वासवानी का नाम तो तुमने सुन ही रखा होगा।"
"मैंने कुछ नहीं सुना। तुम अपने बारे में बताते जाओ।" मोना चौधरी ने उसे घूरा।
"मैं हिन्दुस्तान में नहीं, हिन्दुस्तान के बाहर भी हस्ती रखता हूं।" अजीत वासवानी बोला--- "वासवानी इंडस्ट्रीज। वासवानी केमिकल्स। वासवानी होटल ग्रुप्स लिमिटेड, इस ग्रुप में आठ होटल आते हैं। पांच हिन्दुस्तान के मुख्य शहरों में हैं और तीन विदेशों में। एक विदेशी एयरलाइंस में, मेरी पार्टनरशिप है। वासवानी सूटिंग-शर्टिंग। यानी कि कपड़ों की दो मिलें हैं। हाल ही में, जापान की कारें बनाने वाली कंपनी ओशो कार, नाम से नई कार भारतीय बाजार में पेश होने वाली है, उस कंपनी में मेरी पचास प्रतिशत की भागीदारी है। वासवानी कंस्ट्रक्शन कंपनी भारत की जानी-पहचानी कंपनी है। भारत के साथ-साथ विदेशों और खासतौर से अरब देशों के, लगभग हर बड़े ठेके कंपनी के पास हैं और भी जाने कितने काम हैं मेरे। कई तो शायद अभी मुझे याद भी नहीं आएंगे।"
मोना चौधरी मन-ही-मन सतर्क हो चुकी थी। उसे ध्यान आ चुका था कि वासवानी का नाम हिन्दुस्तान के अमीरों में पहला नाम था और विदेशों में दौलत वालों की कतार में वासवानी का नाम सातवें नंबर पर आता था। अब उसे पूरी तरह एहसास हो गया था कि उसके सामने कितनी बड़ी दौलतमंद हस्ती मौजूद है।
अजीत वासवानी पुनः शांत स्वर में कह उठा।
"वार्षिक अरबों की टर्नओवर है और कभी खरबों तक भी पहुंच जाती है। सच बात तो यह है कि इस सारी दौलत के पीछे, मेरी मेहनत नहीं है। मेरे दादा और पिता की मेहनत है। मैंने काम को बढ़ाना क्या, जो काम फैले हुए हैं उन्हें ही संभाल लूं तो समझूंगा, मेरी मेहनत रंग लाई। मैं अकेला ही हूं जो इन सारे कामों को संभालता हूं। तीन बरस पहले मेरे पिता का एक्सीडेंट में देहांत हो चुका है। मेरा कोई भाई-बहन नहीं। ऐसे में सारा बोझ मेरे कंधों पर है।"
मोना चौधरी की निगाह अजीत वासवानी पर ही थी।
"और जो भी तुम पूछना चाहती हो, पूछ लो। उसके बाद मैं अपनी बात करूंगा।" अजीत वासवानी ने उसे देखा।
मोना चौधरी ने सिगरेट सुलगाई। कश लिया, बोली।
"कई बार तुम्हारी तस्वीरें, अखबारों और पत्रिकाओं में देख चुकी हूं। मेरे ख्याल में अभी मेरे पास कोई सवाल नहीं है, पूछने के लिए। तुम कहो। तुम जैसे इंसान को मेरी जरूरत कहां पड़ गई।"
उसके चेहरे पर गंभीरता और व्याकुलता के भाव स्पष्ट नजर आने लगे।
"मुझे किसी ऐसे इंसान की जरूरत है जो खतरों से खेलना जानता हो। मौत से टक्कर लेने की हिम्मत हो उसमें। काम को हर हाल में अंत तक पूरा करने का दम-खम रखता हो। इन सब कामों के साथ-साथ वो एक सफल हत्यारा भी हो।" अजीत वासवानी का स्वर धीमा था।
"सफल हत्यारा?" मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी।
अजीत वासवानी ने सहमति में सिर हिलाया।
"तो तुम्हें हत्यारे की जरूरत है।"
"हां।" अजीत वासवानी ने मोना चौधरी की आंखों में देखा--- "और तुम इस काम को बखूबी अंजाम दे सकते हो। बहुत सोच-समझकर इस वक्त मैं तुमसे बात कर रहा हूं।"
मोना चौधरी कई पलों तक सोच भरी निगाहों से देखती रही।
"मेरे बारे में किसने बताया तुम्हें?"
"गोकुलदास मारवाह ने।" अजीत वासवानी कह उठा--- "मारवाह, मेरा ट्रबल शूटर है। उसके कई असिस्टेंट हैं। सब मेरे लिए काम करते हैं। मेरे अंडर है। मेरे विश्वसनीय हैं। मुझ पर कोई मुसीबत आती है तो उसे दूर करना, मारवाह का काम है। इसी काम का वो मुझसे पैसा लेता है।" कुछ पल ठिठककर, अजीत वासवानी पुनः कह उठा--- "लेकिन कभी-कभी हालात ऐसे हो जाते हैं, कुछ काम बस से बाहर होते हैं कि जिन्हें हर कोई नहीं, खास-खास इंसान ही उस काम को अंजाम दे सकता है। मारवाह के लिए किसी की जान लेना, किसी को खत्म करना बड़ी बात नहीं है। वह जितना शरीफ नजर आता है, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक है। लेकिन इन हालातों में वह नाकारा होकर रह गया है। ऐसे में उसने काबिल लोगों की लिस्ट बनाई जो मुझे इस मुसीबत से निकाल सकते हैं और उसमें से तुम्हारा नाम चुना गया। क्योंकि औरों में वो खासियत नहीं मिली, जो एक साथ तुममें है। ऐसे में मैंने ही मारवाह को कहा कि जैसे भी हो, तुम्हें मेरे पास लेकर आए। मेरी हैसियत तुम जान ही चुकी हो। मेरा एक-एक कदम सूंघकर अखबार वाले या मेरे कई दुश्मन मुझ तक पहुंच जाते हैं। मैं नहीं चाहता था कि हमारी मुलाकात के बारे में कोई जाने।"
मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव थे।
"तुम किसी की हत्या करवाना चाहते हो।"
"ऐसा ही समझ लो।"
"तुमने कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारी बात पर किसी की हत्या करूंगी।" मोना चौधरी का स्वर शांत था--- "काम-धंधे में सैकड़ों दुश्मन होते हैं, तुम किस-किसकी हत्या करवाते फिरोगे।"
"ये बात नहीं है।" धीमे स्वर में कहते हुए अजीत वासवानी ने पहलू बदला--- "काम धंधे की वजह से मैं भला किसी की हत्या क्यों करवाऊंगा, लेने वाले तो मेरी ही जान के पीछे पड़े हैं।"
"तो फिर क्यों किसी की हत्या करवाना चाहते हो?"
"वजह कुछ और ही है।"
"क्या?"
"इसके लिए तुम्हें उस इंसान की तस्वीर दिखानी पड़ेगी, जिसकी जान लेने के लिए तुमसे बात कर रहा हूं।" गंभीर स्वर में कहते हुए अजीत वासवानी नीचे झुका टेबल की ड्राअर खोली और ऊपर ही पड़ी तस्वीर निकालकर मोना चौधरी के सामने सरकाता हुआ बोला--- "इसकी हत्या तुमसे करवाना चाहता हूं।"
मोना चौधरी ने तस्वीर उठाकर देखी।
अगले ही पल जोरों से चौंकी।
चेहरे पर कई तरह के भाव आए और चले गए।
निगाहें तस्वीर से हटकर अजीत वासवानी पर जा टिकी।
बेचैन-सा अजीत वासवानी मोना चौधरी को देखे जा रहा था।
"ये तस्वीर तो तुम्हारी है अजीत वासवानी।" मोना चौधरी का स्वर उलझन में भरा था।
"हां। तुम ऐसा कह सकती हो। ये तस्वीर मेरी है। परंतु ये तस्वीर मेरी नहीं है।" कहने के साथ ही वो कुर्सी से उठा और जेबों में हाथ डाले बेचैनी से टहलने लगा।
मोना चौधरी की निगाह पुनः तस्वीर पर जा टिकी।
"तो ये तस्वीर तुम्हारी नहीं है। ये तुम नहीं हो।" तस्वीर पर निगाहें टिकाए मोना चौधरी कह उठी।
"हां। ये तस्वीर मेरी नहीं है।" उसने ठिठककर, मोना चौधरी को देखा।
"दिल तो नहीं करता कि तुम्हारी बात मानूं। ये तुम्हारा जुड़वा भाई है।"
"मैं पहले ही कह चुका हूं कि मेरा कोई भाई-बहन नहीं।"
"तो फिर ये मेकअप किए, तुम्हारा चेहरा लिए, कोई दूसरा इंसान है?"
"ये बात भी नहीं है।"
मोना चौधरी ने तस्वीर वापस रखकर, उसे देखा।
"तो बात पूरी करो। मामला क्या है?"
होंठ भींचे अजीत वासवानी, वापस कुर्सी पर आ बैठा।
"मेरी हैसियत से तो तुम वाकिफ हो चुकी हो। मेरी जान लेने और मेरी दौलत हथियाने, मेरे बिजनेस फेल करने के षड्यंत्र तो अक्सर होते रहते हैं, परंतु इन कामों को मारवाह संभाल लेता है। आज तक मुझे मारवाह ने परेशानी नहीं होने दी। कई तरह के खतरे आए और आते रहते हैं मेरे लिए तो जैसे यह सब बातें रोजमर्रा की बात हो गई है। इसलिए मैं कुछ ज्यादा ही सतर्क रहता हूं। लेकिन जो दुश्मनी कायम रखते हैं। वो भी कम दिमाग नहीं रखते। मेरे जैसे लोगों के दुश्मन भी बहुत पहुंच वाले होते हैं। इस मामले में मेरा दुश्मन कौन है, मैं नहीं जान पाया। परंतु मेरी सारी दौलत, सारे बिजनेस, यहां तक कि मेरे व्यक्तित्व को छीन लेने की तैयारी पूरी हो चुकी है।"
मोना चौधरी के होंठों पर मुस्कान उभरी।
"वासवानी तुम्हारी दौलत कोई ले सकता है। कोई तुम्हारे बिजनेस छीन सकता है। लेकिन तुम्हारा व्यक्तित्व कैसे कोई छीन सकता है। ये बात मेरे समझ में नहीं आई।"
"तस्वीर तुम्हारे सामने मौजूद है मेरे व्यक्तित्व की।"
मोना चौधरी की निगाह पुनः तस्वीर पर गई।
"माना कि किसी ने तुम्हारा चेहरा बना लिया है। रंग-रूप, कद-काठी भी तुम्हारे जैसी हो सकती है कि, वो तुम्हारी कुर्सी पर बैठ पर जाए तो तुम ही लगो। लेकिन ऐसा इंसान कब तक खुद को छुपा सकता है। कभी तो उसका झूठ सामने आएगा ही।" मोना चौधरी ने अजीत वासवानी को देखकर कहा--- "तुम्हारी उंगलियों के निशान, तुम्हारी आदतें, बोलचाल का खास अंदाज, तुम्हारी खास-खास बातें तो कोई दूसरा पूरी तरह नहीं जान सकता। ऐसे में तुम्हारा व्यक्तित्व...।"
"जो तस्वीर तुम देख रही हो, उसकी उंगलियों के निशान, मेरी उंगलियों के निशानों से मिलते हैं।"
"असंभव।" मोना चौधरी के होंठों से निकला--- "किन्हीं दो इंसानों की उंगलियों के निशान एक जैसे नहीं...।"
"इस तस्वीर वाले की आवाज, बिल्कुल मेरी ही आवाज है। इसकी वजह आदतें हैं, जो मेरी हैं। इसका अंदाज भी वही है, हर बात का, जो मेरा है। मेरा हर खास अंदाज, मेरी खास बातें, पूरी तरह इसमें है।" कहते हुए अजीत वासवानी के दांत भिंच गए--- "ये आसानी से मेरा व्यक्तित्व ले सकता है। मैं यहां से बाहर निकल जाऊं और दो मिनट बाद ये मेरी जगह ले ले तो तुम भी नहीं पहचान पाओगी मोना चौधरी।"
मोना चौधरी के माथे पर बल नजर आने लगे।
"तुम असंभव बात को संभव बनाने की बेकार कोशिश कर रहे हो।"
"नहीं।" अजीत वासवानी ने भिंचे स्वर में कहा--- "एक बात जो कि संभव हो चुकी है। जिस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। मैं वो तुम्हें बता रहा हूं। जब तुम्हें मालूम होगा तो तुम्हारे पास पूछने को कुछ नहीं होगा।"
"मतलब कि अब तुम इस तस्वीर वाले के बारे में बताओगे कि ये कौन है?"
"हां।" अजीत वासवानी के चेहरे पर क्रोध नजर आने लगा।
"कौन है ये?"
"क्लोन।"
"क्या?"
"क्लोन है मेरा।" अजीत वासवानी गला फाड़कर चीखा--- "इसका चेहरा, इसका दिमाग, इसकी लंबाई-चौड़ाई, इसका वजन। इसके उंगलियों के निशान... यानी कि जो मैं हूं, वही है ये। ये जरा भी मेरे से जुदा नहीं। मेरे दुश्मन इसे मेरी जगह बिठाकर मुझे खत्म करके मेरे क्लोन के दम पर मेरा व्यक्तित्व, मेरा सबकुछ पा लेना चाहते हैं। वे मुझे खत्म करके मेरी जगह पर इसे बिठा देंगे और कोई भी साबित नहीं कर सकता कि वो नकली है। मेरा क्लोन है। कानून तक की भी निगाहों में वो मैं ही रहूंगा और मैं कहीं भी नहीं होऊंगा। जो मेरा क्लोन बना सकते हैं, वो कभी न कभी हिम्मत से बढ़कर काम करके, मेरी जान ले सकते हैं। मुझे गायब करेंगे तभी तो उनकी योजना पूरी होगी और अपनी इस योजना को पूरा करने के लिए, वो हर तरह का कदम उठाने की भरपूर हिम्मत रखते होंगे।"
मोना चौधरी कुछ न समझ आने वाले अंदाज में उसे देखती रही।
गुस्से से अजीत वासवानी का चेहरा लाल सुर्ख नजर आ रहा था।
"मैं...।" मोना चौधरी के स्वर में ठहराव था और चेहरे पर सोच के भाव--- "तुम्हारी बात समझकर भी नहीं समझ पा रही हूं। एक बार मुझे खुलकर बताओ।"
अजीत वासवानी अपने गुस्से पर काबू पाने की चेष्टा करने लगा।
"तुमने...।" अजीत वासवानी कह उठा--- "अक्सर सुना होगा कि आजकल वैज्ञानिक भेड़ का, चूहे का, बंदर का, खरगोश का या फिर अन्य कई जानवरों का क्लोन बना रहे हैं। अधिकतर सफल प्रयोग ही हुए हैं। जिसका भी क्लोन बनाया जाता है, यानी कि अगर किसी बंदर का बनाया जाए, जो उस जैसा चेहरा, उस जैसी हरकतें ही लिए होगा। जरा भी उससे जुदा नहीं होगा।"
"हां। मालूम है।"
"ठीक इसी तरह, मेरे दुश्मनों ने जाने कैसे मेरा क्लोन बना लिया है।"
"तुम्हारा क्लोन बनाने के लिए वैज्ञानिक को तुम्हारे ही जिस्म में से कई चीजें लेनी पड़ेंगी। अपने घर बैठे-बैठे तो किसी चूहे का भी क्लोन नहीं बनाया जा सकता।"
"हां। मालूम है मुझे। ठीक कहा तुमने।" अजीत वासवानी के पुनः दांत भिंच गए--- "मैंने भी इस बारे में सोचा और इसका जवाब भी मैंने ढूंढ निकाला है।"
"क्या?"
"आज से डेढ़ साल पहले कुछ लोग मेरा अपहरण करने में कामयाब हो गए थे। मैं आज तक नहीं जान पाया कि वो कौन थे। करीब चौथे दिन, जब मुझे होश आया तो मैंने खुद को एक पार्क में मौजूद पाया। तब मैं समझ नहीं पाया था कि किन लोगों ने मेरा अपहरण किया, क्यों किया और बिना कुछ मांगे मुझे इस तरह आजाद भी कर दिया। उन चार दिनों में मुझे जरा भी होश नहीं आया था कि मैं उन्हें देख पाता। उनकी बातें सुन पाता। या उनकी मंशा जान पाता। मेरा अपहरण करते ही मुझे बेहोश कर दिया और होश आया पार्क में, जहां से मैं वापस आ गया।"
अजीत वासवानी कहते-कहते ठिठका।
उसे अपनी तरफ देखते पाकर मोना चौधरी ने सिर हिलाया।
"तब एक बात अजीब-सी हुई थी मेरे साथ। जिसे मैंने खास गंभीरता से नहीं लिया था।"
"क्या?"
"मेरे जिस्म में कई जगहों पर असंख्य इंजेक्शनों के निशान थे। मेरे शरीर के कई हिस्सों से ऊपरी तो कहीं से गहराई तक, चर्बी तक मेरा मांस निकाला गया था। जैसे किसी ने मुझे यातना दी हो। मेरा इलाज करने वाले डॉक्टर का कहना था कि ये यातना का मामला नहीं है, बल्कि किसी एक्सपर्ट इंसान ने मेरे शरीर के साथ थोड़ी-बहुत चीर-फाड़ की हो। उस वक्त ये सोचकर, मैंने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया कि जो भी हो मेरी जान बच गई। मैं वापस आ गया। लेकिन अब मुझे समझ आता है डेढ़ बरस पहले मेरे शरीर के हिस्सों से इस तरह चीर-फाड़ करके, मेरा क्लोन बनाने के लिए, जिन चीजों की जरूरत थी, वो हासिल की गई। यानी कि मेरे दुश्मन बेहद शांति और सोच-समझ कर अपनी योजना को अंजाम दे रहे हैं। अब मुझे समझ में आया कि डेढ़ बरस पहले चार दिनों के लिए किए गए मेरे अपहरण की खास वजह क्या थी?"
मोना चौधरी की निगाह पुनः तस्वीर पर गई।
"तुम्हारी बात अभी भी मेरे गले से नीचे नहीं उतर रही।" मोना चौधरी का स्वर शांत था।
"मोना चौधरी।" अजीत वासवानी भिंचे स्वर में बोला--- "मैं तुमसे जो काम कराना चाहता हूं, उसके लिए जरूरी है कि, मेरी कही बातें तुम्हारे गले से नीचे उतरें। तभी तुम अपने काम को ठीक ढंग से अंजाम दे पाओगी। तुम जैसे भी चाहो मैं अंत तक तुम्हारी तसल्ली करवाऊंगा।"
मोना चौधरी की निगाह अजीत वासवानी के चेहरे पर जा टिकी।
"वासवानी। तुम्हारी बात मानी जाए तो, ये बात सामने आती है कि तुम्हारा क्लोन बनाने के लिए डेढ़ बरस पहले तैयारी शुरू की गई। वैसे तो आज तक वैज्ञानिक किसी मानव का क्लोन नहीं बना पाए। फिर भी मान लिया जाए कि कोई वैज्ञानिक तुम्हारा क्लोन बना चुका है। उसे सफलता मिल गई है। ऐसे में क्लोन तैयार होने में साल-सवा साल का वक्त तो लगा ही होगा। कम-से-कम छः महीने तो लगे ही होंगे।"
"जाहिर है।"
"और क्लोन बेशक, भेड़ का हो, चूहे का हो या इंसान का। वो जब बनेगा तो बच्चे के रूप में बनेगा। जैसे कि बच्चा पैदा होता है, कुछ इस तरह। फिर वो बच्चा बड़ा होगा और जब वो पूरी तरह बड़ा हो जाएगा, तो उसका हमशक्ल, हूबहू उस जैसा लगेगा, जिसका क्लोन बनाया गया है। क्लोन तैयार होते ही, वो कभी भी पूरे आकार में नहीं आएगा। इसी तरह अगर छः महीने या फिर साल पहले, डेढ़ साल पहले तुम्हारा क्लोन बना भी लिया गया है तो वो जादू के डंडे से जोर से, तुम जैसा लंबा-चौड़ा कैसे हो सकता है। शायद तुम्हें क्लोन की विधि के बारे में मालूम नहीं कि...।"
"मुझे पूरी जानकारी है।" अजीत वासवानी बात काटकर कह उठा।
"तो फिर बताओ।" मोना चौधरी ने उसे घूरा--- "तुम्हारा क्लोन, किस जादू के डंडे के दम पर आनन-फानन इतना लंबा-चौड़ा हो गया?"
"तुम्हारा सवाल बिल्कुल सटीक है।" अजीत वासवानी गंभीर और व्याकुल नजर आने लगा--- "लेकिन जो वैज्ञानिक, पागल वैज्ञानिक मानव क्लोन बना सकता है, वो कोई और पागलपन वाला काम करना चाहे तो शायद कामयाब हो सकता है, जैसे कि वो मेरे बारे में हो चुका है।"
"क्या मतलब?"
"मेरा क्लोन बनाने वाले वैज्ञानिक ने मेरे जींस को बढ़ाने वाली ऐसी दवा बनाई है जिसकी वजह से मेरे क्लोन का आकार-प्रकार जादुई ढंग से बढ़ने लगे। मेरी बॉडी में किस तरह के जींस हैं, ये बात तो वो वैज्ञानिक, तभी जान गया होगा, जब उसने मेरे शरीर से खून और मांस-गोश्त के पीस निकाले होंगे। उधर मेरा क्लोन बनने की तैयारी होती रही और इधर वो मेरे जींस को आश्चर्यजनक तेजी से बढ़ाने के लिए खास दवा तैयार करता रहा। जब मेरे क्लोन का जन्म हुआ, तो जींस बढ़ाने की दवा, मेरे क्लोन के शरीर में पहुंचानी शुरू कर दी। छः महीने लगे थे मेरा क्लोन पैदा करने में और एक बरस लगा, जींस को बढ़ाने वाली दवा देकर, पैदा हुए क्लोन को बड़ा करने और मेरे बराबर करने में। अब वो बिल्कुल मेरा रूप ले चुका है। उसकी तस्वीर तुम्हारे सामने है।"
मोना चौधरी मुस्कुराई।
"तुम्हारी बातें ऐसी हैं कि जिस पर कोई पागल ही विश्वास कर सकता है।"
"भगवान के लिए, मेरी बातों का विश्वास करो। मेरा कहा एक-एक शब्द सच है। सबूत के तौर पर ये तस्वीर तुम्हारे सामने है और अपने क्लोन की हत्या करने के लिए, मैं तुम्हें मुंह मांगी दौलत दे रहा हूं। इससे बड़ा और क्या सबूत दूं तुम्हें।" एक-एक शब्द चबाकर अजीत वासवानी कह उठा--- "वे लोग जो भी हैं, अपनी तरफ से पूरी तैयारी कर चुके हैं, मेरा वजूद मिटाकर, मेरी जगह किसी और को बिठाने की। ताकि मेरी खरबों की दौलत और मेरी हैसियत को हथिया सकें और...।"
"वासवानी।" मोना चौधरी गंभीर थी।
अजीत वासवानी ने प्रश्न भरी निगाहों से उसे देखा।
"जिन लोगों ने भी ये काम किया है, वो किसी भी हाले-सूरत में ये खबर बाहर नहीं जाने देंगे कि वह किस फेर में हैं और तुम्हारे पास उनके भीतर की हर खबर मौजूद है। यहां तक कि उन्होंने क्या किया है। कैसे किया है। सब मालूम है तुम्हें। ये अजीब बात नहीं है क्या?"
"तुम्हारे लिए अजीब बात हो सकती है। मेरे लिए नहीं।" अजीत वासवानी ने तीखे स्वर में कहा--- "क्योंकि मैंने इन बातों को, जानने की एक करोड़ रुपए की कीमत चुकाई है।"
"एक करोड़।" मोना चौधरी ने उसे देखा।
"हां।"
"किसने दी तुम्हें ये खबर?"
"मैं नहीं जानता उसे। पहले उसने मेरे पास, मेरे क्लोन की तस्वीरें भेजी। वो ऐसी तस्वीरें थीं। जो मेरी होते हुए भी मेरी नहीं थीं। मैं समझ गया कि कहीं गड़बड़ है। परंतु पूरी तरह नहीं समझा। फिर सप्ताह बाद तस्वीरें भेजने वाले का फोन आया। पहले मारवाह ने उससे बात की। फिर मुझे उससे बात करनी पड़ी। उसने बताया कि मेरे दुश्मनों ने, मेरा क्लोन बनाया है। अगर मैं इस मामले में पूरी जानकारी लेना चाहता हूं तो वो एक करोड़ रुपए लेगा। मुझे विश्वास नहीं हुआ कि कोई मेरा क्लोन बना सकता है। मेरे अविश्वास की वजह से उसने कहा कि मैं अपने क्लोन की जिस मुद्रा में भी तस्वीर देखना चाहता हूं वो वैसी तस्वीरें खींच कर ला सकता है। उसकी बात को मैं हवा में भी नहीं उड़ा सकता था। मैंने बहुत सोच-समझकर, उसे फोन पर ही बीस-पच्चीस पोज बता दिए। दसवें दिन ही डाक से मुझे तस्वीरों का लिफाफा मिला, जिसमें निगेटिव्स भी थे। मेरे क्लोन की तस्वीरें, उसी पोज में थीं, जैसी कि मैंने तैयार करने को कहा था। चालबाजी न हो, ये सोचकर मैंने जाने-माने एक्सपर्ट फोटोग्राफर को यहां बुलाया और तस्वीरें-निगेटिव्स उसे दिखाए। उसने अच्छी तरह चैक करने के बाद बताया कि यह ट्रिक फोटोग्राफी नहीं है। तस्वीरें खींची गई हैं। निगेटिव्स असली हैं। फिर भी मैंने दो-चार को और बुलवाकर चैक करवाया। सबने यही कहा।"
मोना चौधरी सोच भरी निगाहों से उसे देख रही थी।
"ऐसे में मेरा चिंता में पड़ना लाजिमी था। वो लिफाफा मिलने के पांच दिन बाद फिर उसका फोन आया। मैं तो परेशान हुआ पड़ा था। इस बार मैंने उससे संभलकर बात की। वो मेरे क्लोन के सिलसिले में मुझसे बात करने को तैयार था, वो जानता था, मुझे बताने को तैयार था और इन सब बातों की कीमत उसने एक करोड़ मांगी। मेरे लिए करोड़ रुपया कोई महत्व नहीं रखता। खासतौर से तब जब मेरा ही वजूद खतरे में पड़ने जा रहा हो। मैंने उससे बात करना मंजूर कर लिया। बिना किसी चालाकी के उसकी बताई जगह पर एक करोड़ की रकम लेकर पहुंचा। सुरक्षा के नाते मेरे साथ मारवाह था। लेकिन उससे बातचीत के दौरान मारवाह निगरानी के लिए कुछ फासले पर ही रहा। वो सुनसान जगह पर मिला था और अपने चेहरे पर रुमाल बांध रखा था। पहले उसने एक करोड़ देखे। कुछ हद तक चैक करके तसल्ली की। उसके बाद उसने मुझसे बात की। मेरे क्लोन के बारे में वो जानता था। जो मैं जानना चाहता था। उसने बताया। जो मैंने तुम्हें बताया है। वही सब उसने एक करोड़ के बदले मुझे बताया। लेकिन दो बातें उसने नहीं बताईं।"
"क्या?"
"एक यह कि कौन लोग इस मामले के पीछे हैं और दूसरी यह कि इनका ठिकाना। मेरा क्लोन कहां है। उसने ये दो बातें बताने को स्पष्ट तौर पर इंकार कर दिया।" अजीत वासवानी सख्त स्वर में कह उठा--- "और मेरी स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं उस पर किसी तरह की जोर जबरदस्ती कर पाता।"
"इन दो बातों की भी कीमत लगा देते।" मोना चौधरी बोली--- "वो बता देता।"
"एक करोड़ के अलावा इन बातों की कीमत, मैंने दो करोड़ अलग से लगा दी थी।" अजीत वासवानी गुस्से में आ गया।
"नहीं माना वो।" मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े।
"नहीं। इस बारे में वो और बात नहीं करना चाहता था।" शब्दों को चबाते हुए कह रहा था वासवानी--- "उसने ये अवश्य कहा था कि अब जो हालात मेरे सामने आएंगे। उन्हें संभाल सकता हूं तो संभाल लूं। वरना मेरे बचने की गुंजाइश कहीं भी बाकी नहीं बची है। वो लोग खतरनाक हैं और अपनी योजना पूरी करके ही दम लेंगे।"
मोना चौधरी सोच भरी निगाहों से अजीत वासवानी को देखती रही।
"मेरे...।" अजीत वासवानी के होंठ भिंच गए--- "बहुत जोर देने पर, वो सिर्फ इतना ही बोला कि जो ये सब कर रहे हैं, उनका ठौर-ठिकाना जयपुर में है।"
"जयपुर?" मोना चौधरी के होंठों से निकला।
"हां। ये बात पच्चीस दिन पहले की है।" अजीत वासवानी व्याकुल हो उठा था---- "अब जयपुर में इन लोगों को ढूंढना। अपने क्लोन को तलाश कर पाना असंभव ही था। मेरा क्लोन जाहिर है, आसानी से खुले में नहीं आएगा। उसे बनाने वाले, मेरे बारे में उसे सब कुछ पढ़ा-सिखा रहे होंगे और यूं ही उसे सड़कों पर भेजकर खामख्वाह अपनी योजना तो फेल कराने से रहे। लेकिन मैं भी हाथ-पर-हाथ रखकर नहीं बैठ सकता था। आखिरकार, इस मामले की खोज-खबर लेने के लिए मैंने मारवाह को जयपुर भेजा। मारवाह अपने साथ अपने दो खास आदमी भी ले गया था। इस दौरान मैंने अपने गिर्द सुरक्षा और भी कड़ी कर ली कि, वे लोग जिन्होंने मेरा क्लोन बनाया है। मेरा अपहरण करके, मेरे क्लोन को मेरी जगह बिठाने की अपनी योजना को अंजाम न दे दें।"
कहकर अजीत वासवानी होंठ भींचकर खामोश हो गया।
"आगे...।" मोना चौधरी की निगाह उस पर थी--- "मारवाह ने जयपुर में कुछ किया?"
अजीत वासवानी ने व्याकुलता से पहलू बदला।
"जयपुर के बारे में, मारवाह से सुनना चाहो तो उसे बुला लेता हूं।" वासवानी बोला।
"बुलाओ।"
अजीत वासवानी ने टेबल के नीचे लगा रखे, एक स्विच को दबा दिया। साथ ही टेबल के नीचे वाले ड्राअर से एक लिफाफा निकालकर मोना चौधरी के सामने रखा।
"इसमें वो तस्वीरें हैं, जो मेरे कहने के मुताबिक, मेरे क्लोन का पोज बनाकर ली गई और मुझे भेजी गई। निगेटिव्स भी इसी में हैं। तुम देख सकती हो।" अजीत वासवानी ने कहा।
मोना चौधरी ने लिफाफे में से तस्वीरें निकालीं और उन्हें देखने लगी। तस्वीरों को देखकर कोई भी नहीं कह सकता था कि वो तस्वीरें सामने बैठे अजीत वासवानी की नहीं हैं। ऐसा तो होना ही था। क्योंकि वे तस्वीरें, उसके क्लोन की जो थीं।
बीतते वक्त के साथ, इस मामले में मोना चौधरी की दिलचस्पी पैदा होने लगी थी।
"मैंने...।" अजीत वासवानी ने कहा--- "अपनी जिंदगी में बड़ी-बड़ी मुसीबतों का सामना किया है। लेकिन इस वक्त जो हालात मेरे सामने आए हैं, उन्हें समझकर और सोच-सोचकर मैं खुद को पागल-सा महसूस कर रहा हूं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आने वाले वक्त में क्या होगा।"
मोना चौधरी की निगाह एक के बाद एक तस्वीरों पर फिर रही थी।
दो मिनट बाद ही गोकुलदास मारवाह ने भीतर प्रवेश किया।
■■■
"सर---।" पास पहुंचते ही मारवाह सतर्क स्वर में कह उठा। जिस दरवाजे से वो आया था। वो दरवाजा बंद हो चुका था।
अजीत वासवानी ने मारवाह को देखा फिर सूखे होंठों पर जीभ फेरकर कहा।
"जयपुर में तुम्हारे साथ जो भी हुआ। मोना चौधरी को बताओ।"
"यस सर---।" गोकुलदास मारवाह ने सिर हिलाकर मोना चौधरी को देखा।
अजीत वासवानी अपनी जगह से उठा और कमर पर हाथ बांधे कमरे में टहलने लगा।
तस्वीरों से हटकर मोना चौधरी की निगाह, गोकुलदास मारवाह पर टिक चुकी थी।
"सबकुछ जानने के बाद 'सर' ने मुझे जयपुर भेजा। इतने बड़े जयपुर में ऐसे लोगों को ढूंढना, असंभव-सी बात थी, जिनके बारे में कोई जानकारी नहीं थी मेरे पास। फिर भी जयपुर में उनकी खोज-खबर पाने की मैंने पूरी कोशिश की। जयपुर में ही ड्रीमलैंड होटल में ठहरा था। जो कि वहां का शानदार और महंगा होटल था। अपने ढंग से दिन भर इधर-उधर की भागदौड़ करता कि शायद 'सर' के क्लोन या क्लोन बनाने वालों के बारे में कुछ मालूम हो जाए। 'सर' ने अपने क्लोन की तस्वीर मुझे दी थीं। वो दिखाते हुए भी, मैं लोगों से पूछताछ करता कि इस इंसान को कहीं देखा है। चौथे दिन ही मुझे और मेरे दोनों साथियों को लगा कि हम पर, हमारी हरकतों पर नजर रखी जा रही है।"
मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े।
गोकुलदास मारवाह ने कहना जारी रखा।
"छठे दिन हमें पूरा विश्वास हो गया कि हमें वॉच किया जा रहा है। हम पर इतनी सावधानी के साथ निगाह रखी जा रही थी कि बेहद कठिनता से हम, अपने पर निगाह रखने वालों को पहचान पाए और जब उन लोगों को मालूम हुआ कि हमें उन पर शक हो गया है तो वो खुलकर सामने आ गए।"
"कैसे?" मोना चौधरी के होंठों से निकला।
दो पल की सोच के बाद, गोकुलदास मारवाह कह उठा।
"यूं कि हम पर कुछ लोग नजर रख रहे हैं, इस वजह से उस रात हम सतर्क थे। लेकिन वे लोग हमसे ज्यादा सतर्क निकले। रात बारह बजे के करीब हमारे पास होटल के कमरे में फोन आया कि तस्वीर लेकर इस तरह भागदौड़ करने से हमें कुछ हासिल नहीं होगा। अगर जानकारी की वास्तव में जरूरत है रात को एक बजे पचास हजार रुपया लेकर, होटल के बाहर सड़क पर मिलो।" कहकर वो खामोश हुआ।
"तुम मिले?" मोना चौधरी ने पूछा।
"हां। न चाहते हुए भी, ये जानते हुए भी कि ये कोई चाल हो सकती है। मैं मिला। इस बात को मैं यूं ही नहीं जाने दे सकता था। मेरे दोनों साथियों ने कुछ दूर रहकर, मुझे कवर कर रखा था। लेकिन वो लोग बहुत चालाक थे और हर संभावना को सामने रखकर चल रहे थे। मुझसे पहले ही उन्होंने कुछ दूर मौजूद मेरे साथियों को, अपने कब्जे में कर लिया था। उसके बाद रात के अंधेरे में मैं उनके चेहरों को नहीं देख पाया। मेरी ठुकाई की और रुपया भी छीन लिया। साथ में ये धमकी दी कि अगर हमने कल तक जयपुर नहीं छोड़ा तो हम लोग जिंदा नहीं बचेंगे। उनकी ठुकाई ऐसी नहीं थी कि बाहर से चोट नजर आती। हम लोग, होटल पहुंचे और वहां से सीधे 'सर' से बात करके, पूरे मामले की रिपोर्ट दी तो 'सर' वापस दिल्ली आने को बोला।"
तभी अजीत वासवानी पास आया और कह उठा।
"मारवाह की बात से मैं समझ गया कि, वे लोग मारवाह को पहचान चुके हैं। जिन लोगों ने मेरा क्लोन बनाया है, वो मेरे आस-पास के आदमियों की भी जानकारी रखते होंगे। ऐसे में मैंने मारवाह या उसके असिस्टेंट की जान खतरे में डालना ठीक नहीं समझा। इसलिए इसे वापस बुलवा लिया। उसके बाद मारवाह के साथ बैठकर ये तय किया कि इस मामले से इन हालातों से कैसे निपटा जाए। तो हमें एक ऐसे इंसान की जरूरत महसूस हुई जो खतरों से खेलने का आदी हो। जिसका संबंध हमारे साथ न हो। जो मेरे क्लोन तक पहुंचने की कुव्वत रखता हो। उसे खत्म करने का दम रखता हो। तो मेरे आदेश पर मारवाह ने ऐसे लोगों की लिस्ट बनानी शुरू की, जो इन हालातों में मेरे काम आ सकते हैं। मरवाहाल की बनाई लिस्ट में तुम्हारा भी नाम--- जिक्र था। और तुम्हारी डिटेल्स पढ़कर, जानकर, सुनकर मुझे और मारवाह को भी लगा कि युवती होने के नाते और अपनी काबिलियत के नाते तुम हमारा बखूबी काम कर सकती हो। मेरे सिर पर आए खतरे को तुम दूर कर सकती हो। मुझे बचा सकती हो।"
मोना चौधरी की नजरें, अजीत वासवानी के चिंता भरे चेहरे पर टिकी थीं।
कई पलों तक वहां खामोशी रही।
गोकुलदास मारवाह, सतर्क से अंदाज में खड़ा था।
कुछ लंबी सोच के बाद मोना चौधरी ने, गोकुलदास मारवाह को देखा।
"जयपुर में तुम पूछताछ के लिए कहां-कहां गए?"
मारवाह ने बताया।
"हूं। तुम जहां-जहां भी गए। वहीं किसी एक जगह से, उन लोगों तक तुम्हारे बारे में खबर पहुंची।" मोना चौधरी ने सोच भरे स्वर में कहा--- "या फिर वो लोग यहां तुम लोगों पर नजर रख रहे हैं और तुम्हारे पीछे-पीछे ही जयपुर गए।"
"ऐसा भी हो सकता है।" मारवाह ने गंभीरता से सिर हिलाया।
"जयपुर की कोई और बात जो तुम्हें खास लगी हो?" मोना चौधरी की निगाह मारवाह पर थी।
"नहीं। बताने लायक तो कुछ भी नहीं।"
मोना चौधरी की निगाह सामने पड़ी तस्वीरों पर फिरने लगी।
अजीत वासवानी वापस कुर्सी पर आ बैठा।
खामोशी लंबी होने लगी तो अजीत वासवानी ही बोला।
"मारवाह से कुछ और पूछना है?"
"नहीं।" कहते हुए मोना चौधरी ने तस्वीरें एक तरफ सरका दीं।
"तुम जाओ।"
गोकुलदास मारवाह बाहर निकल गया।
मोना चौधरी की निगाह, अजीत वासवानी पर जा टिकी।
"मिस्टर वासवानी।" मोना चौधरी ने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा--- "सच बात तो ये है कि तुम्हारी बातें अच्छी तरह सुनने-सोचने और समझने के बाद भी उन पर पूरी तरह विश्वास नहीं कर पाई।"
अजीत वासवानी ने बेचैनी से पहलू बदला।
"मतलब कि--- मतलब कि तुम मेरा काम नहीं करोगी। मेरी सहायता नहीं करोगी।" उसने आहत स्वर में कहा।
"मैंने ऐसा नहीं कहा।" मोना चौधरी बोली--- "तुम कहो तो मैं तुम्हारा काम कर सकती हूं। अगर तुम्हारा क्लोन कहीं पर भी है तो, मैं उसे खत्म कर दूंगी। परंतु तुम्हारी बातें गलत निकली तो, उस स्थिति में मैं पीछे हट जाऊंगी और कीमत वापस नहीं होगी।"
अजीत वासवानी के चेहरे पर राहत के भाव नजर आने लगे।
"मैं तो समझा था कि तुम काम करने से इंकार कर रही हो।" अजीत वासवानी ने लंबी सांस ली--- "तुम नहीं जानती कि इस वक्त मैंने अपनी सारी आशाएं तुम पर लगा रखी हैं वरना मेरे दुश्मन जिस तरह मुझे घेरे हैं, उसे देखते हुए, मेरे बचने की गुंजाइश कहीं भी नजर नहीं आ रही और मैं जानता हूं कि तुम हर हाल में मुझे मुसीबत से निकालकर रहोगी। मारवाह ने तुम्हारी जो रिपोर्ट मुझे दी थी। उसे पढ़ने के बाद मुझे लगा था कि तुम ही हो जो मुझे बुरे हालातों से निकाल सकती हो।"
"नोटों की बात करो।"
"नोटों की बात?"
"काम की कीमत?"
अजीत वासवानी के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान उभरी।
"मेरा काम हो जाए। पूरा कर दो। इस परेशानी से मुझे निकाल दो और मुंह मांगी कीमत ले लो। मुझे...।"
"वासवानी।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा--- "काम की कीमत मैं पहले लेती हूं। उसके बाद काम को पूरा करती हूं। किसी वजह से, हालांकि ऐसी वजह आज तक पैदा नहीं हुई, अगर काम मेरी गलती से अधूरा रह जाए तो, पूरा पैसा वापस हो जाता है।"
"भगवान के लिए, ये काम अधूरा मत छोड़ना।" अजीत वासवानी का स्वर व्याकुल हो गया--- "मैं अपने क्लोन की। अपने हमशक्ल की, हत्या हुई देखना चाहता हूं। वो जिंदा रहेगा तो, मेरा जीना हराम रहेगा।"
"इस काम की क्या कीमत लगाते हो?" मोना चौधरी की निगाह उसके चेहरे पर थी।
"मैं अपने मुंह से इस काम की कीमत नहीं लगा सकता मोना चौधरी। ये काम तो मेरी जिंदगी और मौत से वास्ता रखता है। मैं तुम्हें अपनी आधी दौलत दे दूं, तो भी मुझे लगेगा कि मैं सस्ते में छूटा हूं। तुम नहीं समझ सकती कि मैं किन बुरे हालातों के दौर से गुजर रहा हूं।"
"काम की कीमत बोलो।"
"जो तुम कहोगी, वही मिलेगा।" अजीत वासवानी ने सरल स्वर में कहा--- "और पहले मिलेगा।"
"मैं तुम्हारी हैसियत देखकर काम की कीमत नहीं लगा रही। ये काम वास्तव में कठिन है। जिन्होंने तुम्हारा क्लोन तैयार किया है। उन्होंने अपनी योजना को अंजाम देने के लिए, अपनी ताकत से भी ज्यादा इंतजाम कर रखे होंगे और उन्हें तलाश करके उन तक पहुंचना भी आसान काम नहीं।" मोना चौधरी स्थित स्वर में बोली--- "तुम्हारे क्लोन की हत्या का ठेका मैं तीस करोड़ में लूंगी।"
अजीत वासवानी ने फौरन सिर हिलाया।
"मुझे मंजूर है।" वो फौरन बोला--- "तुम चाहो तो रकम और बढ़ा सकती हो। लेकिन मेरे सिर से खतरा हटा देना।"
"तीस करोड़। एक पैसा कम नहीं। एक पैसा ज्यादा नहीं।"
"ठीक है।" अजीत वासवानी ने सिर हिलाया।
"रकम तैयार कर दो।"
"शाम तक रकम तैयार हो जाएगी।"
"मैं तुम्हें पता दे जाऊंगी कि रकम कहां पहुंचानी है।" मोना चौधरी ने कहा।
"शाम को रकम तुम्हारे बताए पते पर पहुंच जाएगी।"
मोना चौधरी ने एक कागज पर पारसनाथ के रेस्टोरेंट का पता लिख दिया।
"यहां तीस करोड़ पहुंचा देना।"
"समझो पहुंच गए।" अजीत वासवानी ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
"मारवाह को बुलाओ। उससे बात करनी है।"
अजीत वासवानी ने फौरन, टेबल के नीचे लगा बटन दबा दिया।
मिनट भर में ही गोकुलदास मारवाह ने भीतर प्रवेश किया।
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