यह कहानी प्राचीन भारत के मिर्झापुर राज्य की है, एक ऐसा राज्य जो बहोत खतरनाक-वेश्यी काले जंगल से घिरा हुवा है, जिसमे बहोत ही खौफनाक जानवर, आत्माएं, आदमखोर पेड़ो का वास है। इस काले जंगल को आजतक कोई पार नहीं कर पाया, इसलिए मिर्झापुर राज्य का संपर्क बाकिकी दुनिया से टुटा हुवा है। पर जब भी उन्हें बाहर जाने की जरूरत आन पड़ी, तब इन्हें बहोत लम्बा रास्ता लेना पड़ता है। वह रास्ता इतना लम्बा है, की अगर उसका इस्तेमाल किया जाए तो राज्य से बाहर निकल ने में 1 दिन के मुकाबले में 40-50 दिन लग जाए। काले जंगल की वजह से मिर्झापुर राज्य किसी किले की भाती अभेद्य है, जिसे पाने की चाहत बाहरी राज्य के राज्यकर्ताओ को लुभाती है। महामहिम महाराजा हरिशचंद्र बड़े शान से अपने राज्य पर राज करते है। वे बडेही सत्यवादी राजा है। सही न्याय करना, जरुरत मंदों की मदद करना, यही इनका धर्म है। मिर्झापुर की जनता अपने सत्यवादी राजा से बहोत खुश है। महाराजा की धरम पत्नी महारानी जिनका नाम गोपी है, वो पेट से थी। दोनों की शादी को २५ साल हो गए थे। पर उन्हें उनका वारिस नहीं मिल रहा था। उन्होंने अपने वारिस के लिए बहोत जतन किए। हर मंदिर की चौकट पर गए। हर एक वैद के पास गए, पर सबका यही कहना था की महारानी गोपी कभीभी माँ नहीं बन सकती। और फिर अचानक एक दिन पता चला की महारानी पेट से है। इस सुखद खबर से सारे राज्य में ख़ुशी की लहर छा गई। राज्य में दस दिन का स्वागत उत्सव मनाया गया। जिसमे राज परिवार ने बढचढ कर हिस्सा लिया। सब बेहद खुश है। अब नौ महीने गुजर चुके थे। बच्चे का जनम लेने का दिन पास आने लगा था, की तभी एक दिन महारानी को बहोत बुरा सपना आया। उन्होंने सपने में देखा की उन्हें एक प्यारासा लड़का हुवा, पर वह अचानक शैतान में बदलकर पुरे राज्य को बर्बाद कर दिया। इस सपने ने महारानी को डरा दिया। अगली सुबह उन्होंने अपना भयानक सपना महाराज को बताया।
महाराजने महारानी की बातो पर ध्यान न देते हुए उन्हें समजाया, “तुम इस सपने को इतना महत्व क्यों दे रही हो? सपने भी कभी सच होते है क्या? वो भी इतने खतरनाक सपने। तुम इन सब बातो पे ध्यान मत दो; नहीं तो हमारे बच्चे पे असर पड़ेगा।”
महाराज की बात मानकर महारानी ने बुरे सपने को भूलने में ही अपनी समझदारी समजी। पर एक अजीबसा डर उनके मन में घर कर गया। इसी डर पे आग लगाने का काम कुदरत ने किया। उसी दिन सुबह से कुदरत अपना रौद्र रूप दिखाने लगी। जिससे महारानी के मन से डरावना सपना निकल नहीं पाया। आज से लेकर बच्चे के जनम के दिन तक, तूफान आने लगे। आसमान काले बादलो से ढक गया। भर दोपहर रात हो गई। पंछी अपने-अपने घोसले में लौटने लगे। जिव-जन्तुओ में अफरा तफरी मचने लगी। आसमान से बिजलिया गरजने लगी। पानी की तरह उनका वर्षाव जमीं पर होने लगा। इस बिजली की वर्षा में हर दिन राज्य के लोग मारे जाने लगे। जिस दिन-जिस वक्त मरने वालों की संख्या सौ हो गई, लगबग उसी वक्त महारानी को प्रसवपीड़ा होने लगी। महाराज ने राज वैद को बुलवाया।
वैद ने महाराज को बताया, “महाराज, राज्य के होनेवाले युवराज के आगमन का समय हो गया है।”
उसी रात जन्म हुवा एक प्यारे से बालक का। बालक का जन्म होते ही कुदरत शांत हो गई। महारानी और महाराज को लगा की उनका वारिस उनके राज्य में सुख समृद्धि लाएगा। महाराजने नन्हे बालक का नाम समर रखा। पर नियतिने नन्हे बालक के लिए कुछ ओर ही सोच रखा था। जन्म के दुसरे दिन महाराजने अपने राज्य के सबसे महान ऋषिमूनी ‘त्रम्बक’ को अपने बालक समर का भविष्य बताने के लिए आमंत्रित किया। साथ में राज्य के छोटे-बड़े सभी ३००० ऋषियों को आमंत्रण भेजा। सभी का फूलों की वर्षा से स्वागत किया गया। ऋषिमुनी त्रम्बक के स्वागत में चारसो हाथियों को रखा। स्वागत समारोह इतना भव्य था की राज्य की सभी प्रजा आमंत्रित थी। सबसे पहले महाराजने ऋषिमूनीयों को पंचपकवान खिलाके उनका मन तृप्त किया और फिर उनसे अनुरोध किया की वो सब मिलके अपना आशीर्वाद भविष्य के युवराज समर को प्रदान करे। ऋषिमूनीयो ने समर को अपना आशीर्वाद दिया। फिर फूलों से सजे विशाल मैदान में एक भव्य आसन बनाया गया, जहा ऋषि त्रम्बक विराजमान हुए। उनके सामने बालक को रखा गया। बाकीके ऋषिमुनी उन्हें घेरके गोलाकार आकार बनाते हुए बैठे और फिर बालक युवराज की कुंडली बनानी आरंभ की गई। सभी ऋषियों ने बालक की कुंडली बना ली। वह कुंडली देखके सारे ऋषिमुनी अचंबित हो गए। उनको अचंबित देखकर महाराज ने पूछा, “गुरुदेव, आप सभी को यहाँ कष्ट तो नहीं हो रहा?”
ऋषि त्रम्बक अचंबित थे, उन्हें लगा की उनसे कुंडली बनाने में गलती हो गई। अपने संकोच भरे स्वर में महाराज से कहा, “नहीं राजन, हमें लगता है की कुंडली बनाने में कुछ गलती हुई है। मै फिरसे युवराज की कुंडली बनाता हु।”
ऋषि त्रम्बक फिरसे कुंडली बनाने लगे। तभी बाकीके ऋषि त्रम्बक के पास अपनी बनाई कुंडली लेकर आए। उन कुंडलियो को देखकर त्रम्बक चिंतित हो गए। उन्हें चिंता में देखकर महाराज ने फिर से पूछा, “गुरुदेव, आप चिंतित लग रहे है। कुछ अनर्थ तो नहीं युवराज की कुंडली में।”
ऋषि त्रम्बक, “अनर्थ नहीं राजन घोर अनर्थ लिखा है, युवराज की कुंडली में”
महारानी चिंतित होकर महाराज से, “महाराज गुरुदेव ऐसा क्यों कह रहे है? जरा पूछिये ना? मेरा दिल बहोत घबरा रहा है।”
महाराज हरिशचंद्र, “आप शांत रहे महारानी हम गुरुवर्य से पूछते है।” उन्होंने गुरुदेव त्रम्बक से पूछा, “गुरुदेव आप ऐसा क्यों कह रहे है? क्या लिखा है युवराज की कुंडली में?”
त्रम्बक, “ये मै नहीं कह रहा राजन, युवराज की कुंडली कह रही है। बालक युवराज की कुंडली में ‘काल राक्षस सर्पमित्र’ दोष है। काल राक्षस सर्पमित्र एक ऐसा प्राचीन दोष है, जो हजारो सालो में सिर्फ एक ही बालक को होता है। इस दोष के अंतर्गत बालक पर राक्षस की छाया होती है। जिसके कारन बालक अचानक राक्षस में तब्दील हो जाता है। अपने जीवनचक्र में कब वो राक्षस बन जाए, कोई भी ठीक से नही बता सकता।”
महाराज, “ये आप क्या कह रहे है गुरुदेव? ऐसा नही हो सकता?”
त्रम्बक ऋषिमुनीने महाराज को सलाह देते हुए कहा, “जो कहा है, वो शत प्रतिशत सत्य कहा है राजन। मुझे क्षमा कर दीजिए, अगर आपको इस राज्य की फिक्र है, तो आपको इस बालक को मारना होगा।”
महाराज, “मारना होगा, मतलब? स्पष्ट कहिए गुरुदेव।”
ऋषि त्रम्बक, “इस बालक का जीवन समाप्त कर दीजिए। वर्ना जब ये बालक बड़ा होगा, तब सारे राज्य में अपना रौद्र रूप दिखाके तांडव करेगा।”
महाराज गुस्सेमे, “गुरुदेव, आप भूल रहे है की आप किस से बात कर रहे है।”
ऋषि त्रम्बक, “हमें ज्ञात है की हम मिर्झापुर राज्य के महाराज से बात कर रहे है। हम राज्य की भलाई, आपकी भलाई की बात कर रहे है।”
तभी महाराज को अत्यंत क्रोधित देखकर विषय की गंभीरता को समजाने के लिए वहा मौजूद वरिष्ट बुजुर्ग ऋषि देवदत्त ने बताया, “आप शांत हो जाइये महाराज, पर महान मुनि त्रम्बक ने जो उपाय आपको बताया, उसीमे राज्य की भलाई है। इस बालक के कुंडली में अपने राज्य का विनाश करना लिखा है। अगर बालक जिंदा रहा तो कुछ सालो बाद इस राज्य की क्या हालत हो जाए? कोई बता नही पाएगा।”
यह सारी बाते सुनके महारानी वहा मौजूद सभी ऋषिमूनीयों से विनती करने लगी, “गुरुदेव कोई ऐसा रास्ता बताए जिससे समर का काल राक्षस सर्पमित्र दोष मिट जाए। इसका कोई तो इलाज होगा।“
ऋषि देवदत्त ने महाराज से कहा, “काले जंगल के पार एक ‘सम्यकमूनी’ रहते है। जिनकी उम्र एकसो पच्चीस साल की है। उन्होंने देवताओ को प्रसंन किया है। सभी त्रिदेवों का आशीर्वाद उनके ऊपर है। शायद वो ईस राक्षस सर्पमित्र दोष का इलाज बता सके। आपको एक बार उनसे भेट करनी चाहिये राजन।“
ऋषि त्रम्बक, “हाँ राजन, मैंने भी उनका बहोत नाम सुना है। आपको उनके पास अवश्य जाना चाहिये।”
ऋषिमुनीयों की बात मानते हुए महाराज ने निर्णय लिया की वो बालक युवराज को सम्यकमुनी के पास ले जाएँगे। अब आगे क्या होगा? क्या सम्यकमुनी के पास काल राक्षस सर्पमित्र दोष का निवारण मिलेगा? ये तो वहा जाने के बाद ही पता चलेगा।
ऋषि मुनियों की बात मानकर महाराज ने नन्हे युवराज को सम्यकमुनी के आश्रम में ले जाने का निर्णय[1] लिया, पर उस रास्ते पर काला जंगल गिरता है। जहा जाना यानी अपनी मौत को दावत देना है। फिर भी अपने बच्चे के खातिर, अपने भविष्य के महाराज के खातिर वो अपने निर्णय से डगमगाया नहीं। महाराज ने अपने सेनापती सानक को आदेश दिया, “काले जंगल जाने की तैयारी की जाए। हम कल प्रातःकाल को कुच करेंगे।“
काला जंगल का नाम सुनकर सेनापती सानक घबरा गया। घबराहट में उसने हिचकिचाहट भरी आवाज में पूछा, “काला जंगल, महाराज?”
महाराज, “हाँ, काला जंगल। कल सुबह मुझे मेरी सेना तैयार चाहिये, मेरे सेनापती के साथ।”
सेनापती, “जैसा आप कहे महाराज।”
महाराज से बातचीत करके सेनापती अपनी सेना तैयार करने चला गया। महाराज अपने महल के सबसे बड़ी खिड़की से काले जंगल को निहारने लगा, की तभी वहा महारानी आई। उन्होंने महाराज से पूछा, “हम युवराज को बचा पाएंगे ना?”
महाराज, “आप चिंता ना कीजिए महारानी युवराज को कुछ नहीं होगा। कल हम काले जंगल को पार करके सम्यकमुनी के आश्रम जायेंगे। हमें यकीं है की उनके पास हमारी दुविधा का इलाज अवश्य होगा।”
काले जंगल का नाम सुनकर महारानी डर गई। उन्होंने महाराज के साथ काला जंगल जाने का फैसला किया। महाराज ने उन्हें मना किया। उनसे विनतीकी की वो राजमहल में सुरक्षित रहे, पर वो नहीं मानी उन्होंने महाराज से कहा, “महाराज, आप और हमारा पुत्र संकट के पास से गुजरेंगे और मै यहाँ राजमहल में आराम से रहू; ऐसा कैसे हो सकता है? मै आपकी अर्धांगिनी हु। आपके हर सुख दुःख में आपका साथ निभाने का वचन दिया है मैंने और मै अपना ये वचन नहीं तोडूंगी। मै भी आपके साथ चल रही हु।”
महारानी के सामने महाराज की एक न चली। आख़िरकार उन्होंने हार मान ली। अब दोनों मिलके अपने बच्चे को सम्यकमुनी के आश्रम में लेकर जाने को तैयार हुए। सेनापती सानक ने सेना की एक टुकड़ी तैयार की और राजपरिवार को डायमंड शेप वाले सेना के घेरे के बीचों बिच रखा। सेना काले जंगल के पास पहुच गई।
तभी सेनापती ने सेना को आदेश दिया, “सैनिको अभी हम खतरे के द्वार पर खड़े है। ध्यान रहे राजपरिवार को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होना चाहिये। चाहे इसके लिए आपको अपने प्राणों का बलिदान ही क्यों न देना पड़े।”
सैनिको ने एक सुर में जवाब दिया, “खून के आखरी कतरे तक रक्षा करेंगे हम राजपरिवार की।”
बाहर इतनी जोशपूर्ण आवाजे सुनकर महाराज ने महारानी को आगाह किया, “संभाल के हम खतरे के पास है।”
महारानी ने अपने पुत्र को सिने से लगाकर कर अपनी सासे थाम ली और उनका काफिला जंगल के अन्दर प्रवेश करने लगा। जैसेही उन्होंने अन्दर प्रवेश किया। हवा की सन-सन आवाज बंद हो गई। हवा से हिल रहे पेड़ो के पत्ते अचानक रुक गए। चारों तरफ शांति छा गई। पेड़ और उसके पत्ते अचानक उनको घूरने लगे। जैसे-जैसे वो अन्दर जाते गए, एक अजीबसी बदबू उन्हें आने लगी। सभी ने अपने नाक पर कपडा लिया, ताकी बदबू उन्हें ना आए। सड़ी गली चीजे, अजीबसी खौफनाक आवाजे उनका पीछा करने लगी और चारो तरफ घबराहट भरी काली आत्माओ से सनी धुंद छाने लगी। तभी उन्हें ऐसा अहसास हुवा की कोई उनपे नजर रख रहा है। अचानक कुछ काली परछाईयां उनके सामने आकर खड़ी हो गई। सैनिक डर गए। सेनापती सानक ने सभी सैनिको को संभाला और उन्हें सतर्क रहकर राज परिवार की ढाल बनने को कहा। काली परछाईयों ने सैनिको पर हमला कर दिया। अपनी और राजपरिवार की रक्षा कर रहे सैनिको की तलवारे उन काली परछाईयों को नहीं छू पाई।
खतरे को भापकर सेनापती ने अपने पुत्र सार्थक से कहा, “पुत्र, तुम्हे महाराज और उनके परिवार की रक्षा करनी है। उन्हें दुसरे रास्ते से ले जाओ।” बादमे महाराज से कहा, “महाराज आप महारानी को लेकर जंगल से निकल जाइये। यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं।”
सार्थक और कुछ सैनिको के साथ महाराज लम्बे रास्ते से महारानी और युवराज को लेकर वहासे चले गए। काले जंगल में मौजूद सभी सैनिको को काली परछाइयों ने बे मौत मारा। उनके सिर काटकर पड़ो पर टांग दिया गया और शरीर शैतान में बदल गया। जैसे-तैसे सार्थक और बचे-कुचे सैनिक राजपरिवार को लेकर जंगल से बाहर निकले। महाराज ने सेनापती सानक के पुत्र सार्थक को अगला सेनापती नियुक्त किया और नए सेनापती के मार्गदर्शन में उनका काफिला एक लम्बे और उबाऊ, पर सुरक्षित मार्ग से होकर 45 दिन में सम्यकमुनी के आश्रम पंहुचा।
सम्यकमुनी ने बालक की कुंडली देखी। बालक को जांचा-परखा और बताया, “ईस दोष को रोक पाना नामुनकिन है। इस बालक की नियति में जो लिखा है, वो होकर रहेगा।”
सम्यकमुनी की बाते सुनकर महाराज और महारानी बहोत हताश हो गए। दोनों सम्यकमुनी के पैरो में झुके और विनती की, “गुरुदेव बड़ी उम्मीद से हम आपके पास आए है, कृपा करके इसका कोई मार्ग निकाले।”
सम्यकमुनी, “अब सिर्फ दोही रास्ते है, पहला आप बाकीके ऋषिमुनी की बात मानके अपने पुत्र को मार डाले। या फिर ‘कालसमितुल’ का इंतजार करे। कालसमितुल के जर्ये काल राक्षस सर्पमित्र दोष को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। पर ये सब ‘शनिश्राप’ उल्कापिंड के पृथ्वी के पास से गुजरने के पहले होना चाहिए, क्योकि यह उल्कापिंड किसी भी दोष को 100 गुना बढ़ा ने की ताकद रखता है। जिसे अभी 18 साल का समय है। अगर हमने उससे पहले कालसमितुल नहीं खोजा तो बालक को राक्षस सर्पमित्र दोष से कोई नही बचा सकता।”
महाराज, “ये कालसमितुल क्या है?”
“कालसमितुल एक ऐसी चीज है, जो ईस प्राचीन दोष का प्रभाव कम कर सकता है। समर अगर कालमितुल के साथ रहेगा, तो उसके राक्षस दोष का प्रभाव कम हो सकता है। कालसमितुल कुछ भी हो सकता है। वो पेड़ भी हो सकता है, या फिर कोई जानवर। वो इंसान भी हो सकता है, या फिर शैतान। कुछ भी हो सकता है। पर जबतक कालमितुल ना मिले तबतक समर को साधा जीवन व्यतीत करना पड़ेगा।“, सम्यकमुनी ने जवाब दिया।
महारानी ने पूछा, “कालसमितुल की पहचान कैसे कर सकते है?” तब सम्यकमुनी ने बताया, “उसकी कोई भी पहचान नही है। नाही उसे खोजा जा सकता है, वह एक अजीबसी शक्ति है। उसका जब दिल चाहे, तब वह खुद बालक के पास आएगी। बस मै भगवान से येही दुवा करता हु की युवराज को कालसमितुल जल्द से जल्द मिल जाए।“
सम्यकमुनी ने बालक की कुंडली देखी। बालक को जांचा-परखा और बताया, “ईस दोष को रोक पाना नामुनकिन है। इस बालक की नियति में जो लिखा है, वो होकर रहेगा।”
सम्यकमुनी की बाते सुनकर महाराज और महारानी बहोत हताश हो गए। दोनों सम्यकमुनी के पैरो में झुके और विनती की, “गुरुदेव बड़ी उम्मीद से हम आपके पास आए है, कृपा करके इसका कोई मार्ग निकाले।”
सम्यकमुनी, “अब सिर्फ दोही रास्ते है, पहला आप बाकीके ऋषिमुनी की बात मानके अपने पुत्र को मार डाले। या फिर ‘कालसमितुल’ का इंतजार करे। कालसमितुल के जर्ये काल राक्षस सर्पमित्र दोष को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। पर ये सब ‘शनिश्राप’ उल्कापिंड के पृथ्वी के पास से गुजरने के पहले होना चाहिए, क्योकि यह उल्कापिंड किसी भी दोष को 100 गुना बढ़ा ने की ताकद रखता है। जिसे अभी 18 साल का समय है। अगर हमने उससे पहले कालसमितुल नहीं खोजा तो बालक को राक्षस सर्पमित्र दोष से कोई नही बचा सकता।”
महाराज, “ये कालसमितुल क्या है?”
“कालसमितुल एक ऐसी चीज है, जो ईस प्राचीन दोष का प्रभाव कम कर सकता है। समर अगर कालमितुल के साथ रहेगा, तो उसके राक्षस दोष का प्रभाव कम हो सकता है। कालसमितुल कुछ भी हो सकता है। वो पेड़ भी हो सकता है, या फिर कोई जानवर। वो इंसान भी हो सकता है, या फिर शैतान। कुछ भी हो सकता है। पर जबतक कालमितुल ना मिले तबतक समर को साधा जीवन व्यतीत करना पड़ेगा।“, सम्यकमुनी ने जवाब दिया।
महारानी ने पूछा, “कालसमितुल की पहचान कैसे कर सकते है?” तब सम्यकमुनी ने बताया, “उसकी कोई भी पहचान नही है। नाही उसे खोजा जा सकता है, वह एक अजीबसी शक्ति है। उसका जब दिल चाहे, तब वह खुद बालक के पास आएगी। बस मै भगवान से येही दुवा करता हु की युवराज को कालसमितुल जल्द से जल्द मिल जाए।“
महाराज और महारानी बड़ी आशा लेकर उनके पास आए थे। भलेही इस प्राचीन दोष का कोई इलाज नही मिला, पर एक आस जगी की भविष्य में युवराज को बचाया जा सकताहै। तब दोनों ने कठोर मन से एक निर्णय लिया। निर्णय था की युवराज को सम्यकमुनी की छत्रछाया में पलने के लिए छोड़ दिया जाए। दोनों ने गुरुदेव से युवराज को अपनी छत्रछाया में रखने की विनती की, जिसे उन्होंने स्वीकार किया। दिल पर पत्थर रखकर अपने नौजात बालक को सम्यकमुनी के आश्रम छोड़ दिया, ईस आशा में की इनके आश्रम में कालसमितुल मिल जाए और उनका बेटा बच पाए।
✽✽✽✽
0 Comments