वह एक बेहद तूफानी रात थी । पहले बेहद तेज रफ्तार से आंधी का तूफान चलता रहा था और अब मूसलाधार बारिश हो रही थी ।
काबुल एयरपोर्ट की इमारत के वेटिंग हाल में बैठी गीता सेन के शरीर में झुरझुरी दौड़ गई । उसने बड़ी मजबूती से अपना गर्म कोट अपने शरीर के गिर्द लपेट लिया और विशाल शीशे के पल्लों वाले दरवाजे से बाहर झांका ।
वर्षा के भीषण थपेड़ों से दरवाजे के शीशे धुंधला गये थे और उनसे पार एयरपोर्ट का रनवे पूर्णतया अन्धकार में डूबा हुआ लग रहा था ।
उसने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर दृष्टिपात किया ।
साढे ग्यारह बज चुके थे ।
कान्टास एयरवेज (Qantas Airways) की फ्लाइट नम्बर सात सौ बावन पहले ही एक घण्टा लेट हो चुकी थी । गीता सेन उसी फ्लाइट की प्रतीक्षा में काबुल एयरपोर्ट पर मौजूद थी और उसे पहले से मालूम था कि कान्टास एयरवेज की फ्लाइट नम्बर सात सौ बावन का मालवाहक बोइंग 707 प्लेन काबुल एयरपोर्ट पर बारह और साढे बाहर के बीच किसी समय लैंड करेगा । वह फ्लाइट काबुल एयरपोर्ट पर अपेक्षित नहीं थी । वह एक लम्बे रूट का कार्गो (मालवाहक) प्लेन था जो सिडनी से चलकर मनीला, हांगकांग, दिल्ली, तेहरान और वियना में रुकता हुआ लन्दन पहुंचता था । दिल्ली के बाद उसका अगला स्टापेज तेहरान था । आज वह प्लेन किसी भी क्षण काबुल एयरपोर्ट पर अपेक्षित था और इस बात की जानकारी अभी तक काबुल एयरपोर्ट के अधिकारियों को भी नहीं थी ।
गीता सेन ने फिर घड़ी देखी और हिसाब लगाया । अगर कोई भारी गड़बड़ नहीं हो गई होगी तो उस समय कान्टास एयरवेज की फ्लाइट 752 का विशाल बोइंग 707 कार्गो प्लेन अपने नार्मल रूट से लगभग दो सौ मील भटककर पेशावर के आसपास कहीं उड़ रहा होगा । वैदर रिपोर्ट के अनुसार आज रात को जैसा मौसम काबुल, अफगानिस्तान में था, वैसा ही मौसम पश्चिमी पाकिस्तान में रावलपिंडी और पेशावर के आस-पास के इलाकों में भी था ।
कान्टास एयरवेज की फ्लाइट 752 के पायलेट का नाम पीटर विंस्टन था । उसकी सूचनानुसार वह एक लम्बा तडंगा तन्दुरुस्त अंग्रेज था और पिछले तीन साल से लन्दन, सिडनी रूट का कान्टास एयरवेज के कार्गो प्लेन से जा रहा था । गीता सेन को पीटर विंस्टन की केवल तस्वीरें दिखाई गई थीं । उसने अपने जीवन में पहले कभी पीटर विंस्टन की सूरत नहीं देखी थी ।
उसने अपने कोट की भीतरी जेब को टटोला । उसकी भीतर जेब में बीस हजार पाउण्ड के नोटों का बंडल सुरक्षित था । नोट एक मोटे वाटरप्रूफ लिफाफे मे बन्द थे और बाहर से देखकर यह नहीं जाना जा सकता था कि लिफाफे के भीतर क्या था ।
काबुल-राजनगर ट्रंक लाइन पर कोड शब्दों में जो सीमित बातचीत गीता सेन की भारतीय सीक्रेट सर्विस की ब्रांच स्पेशल इन्टैलीजेन्स के डायरेक्टर कर्नल मुखर्जी से हुई थी, उससे वह यह तो जान ही गई थी कि शनिवार की रात को काबुल एयरपोर्ट पर मौजूद रहकर उसने क्या करना था, साथ ही उसे सारे सिलसिले का थोड़ा-बहुत आभास भी मिल गया था ।
उस तूफानी रात में कान्टास एयरवेज की फ्लाइट नम्बर 752 के बोइंग 707 कार्गो प्लेन के पायलेट पीटर विंस्टन को पश्चिमी पाकिस्तान के ऊपर से उड़ते समय अपने नार्मल रूट से लगभग दो सौ मील भटक जाने के बदले में बीस हजार पाउण्ड की मोटी रकम हासिल होने वाली थी ।
कर्नल मुखर्जी को पूरा भरोसा था कि बीस हजार पाउण्ड की रकम के बदले में पीटर विंस्टन उनका काम जरूर करेगा और इसी विश्वास के अन्तर्गत गीता सेन उस तूफानी रात में काबुल एयरपोर्ट पर मौजूद थी और उसके कोट की भीतरी जेब में बीस हजार पाउण्ड के नोटों से भरा लिफाफा रखा हुआ था ।
पीटर विंस्टन का प्लेन किसी भी क्षण काबुल एयरपोर्ट पर लैंड कर सकता था ।
लेकिन सम्भावना इस बात की भी थी कि ऐन मौके पर पीटर विंस्टन का इरादा बदल जाता और वह दिल्ली से टेक आफ करने के बाद प्लेन को सीधा तेहरान के मेहराबाद एयरपोर्ट पर ही ले जाकर उतारता और गीता सेन काबुल एयरपोर्ट पर उसकी प्रतीक्षा ही करती रह जाती ।
आधा घण्टा और गुजर गया ।
खराब मौसम की बजह से काबुल से टेक आफ करने वाली लगभग सभी फ्लाइट कैंसिल हो ही चुकी थीं और काबुल में लैंड करने वाले अधिकतर प्लेनों के लेट आने की सूचना भी एनाउन्स हो चुकी थी इसलिये उस तूफानी रात के बारह बजे एयरपोर्ट पर बहुत कम लोग रह गये थे ।
उसी क्षण वेटिंग हाल में एक नया आदमी प्रविष्ट हुआ ।
वह सिर से पांव तक बारिश में भीगा हुआ था । उसने अपने सिर पर लाल रंग की तुर्की टोपी पहनी हुई थी । उसने टोपी उतारकर उस पर से पानी झटका और उसे फिर अपने सिर पर पहन लिया । गीता सेन ने देखा उसकी खोपड़ी एकदम गंजी थी और शायद इसी वजह से वह हर क्षण सिर पर टोपी पहने रहने का आदी था ।
लाल टोपी वाले आदमी ने अपने कपड़ों से पानी झटका, जेब से रूमाल निकालकर चेहरा पोंछा और फिर अपने चारों ओर देखा । एक क्षण के लिये उसकी निगाह गीता सेन पर टिकी और फिर तत्काल वहां से हट गई । वह गीता सेन के सामने पड़े सोफे पर आ बैठा, जहां पर एक मोटा-सा आदमी पहले से ही बैठा था । वह रह-रहकर जम्हाइयां से रहा था और थोड़ी-थोड़ी देर बाद उसकी दृष्टि अपने आप ही शीशों से पार रनवे की ओर उठ जाती थी जहां अभी भी मूसलाधार वर्षा हो रही थी और अन्धकार में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था ।
“हांगकांग से आने वाले प्लेन के बारे में कोई एनाउन्समेंट हुई, साहब ?” - लाल टोपी वाले ने उस मोटे आदमी से अंग्रेजी में पूछा ।
“आज की रात तो वह काबुल पहुंचता दिखाई देता नहीं ।” - मोटा आदमी जबरदस्ती जम्हाई दबाता हुआ उकताये स्वर में बोला - “यह बारिश का तूफान बन्द होगा तभी एयरपोर्ट वाले हांगकांग के प्लेन के बारे में निश्चित रूप से घोषणा कर सकेंगे । मैं खुद उसी प्लने के इन्तजार मैं बैठा हुआ हूं ।”
“ओह !” - लाल टोपी वाला बोला । उसके चेहरे पर निराशा के भाव उभर आये । भीगा होने की वजह से रह-रहकर उसके शरीर में कंपकंपी दौड़ जाती थी ।
मोटे आदमी ने अपने हाथ बगलों में दबा लिये, पांव सामने फैला लिये और नेत्र बन्द कर लिये । थोड़ी देर बाद गीता सेन को यूं लगा जैसे उस पर नींद ने काबू पा लिया हो ।
लाल टोपी वाले ने बाहर एयरोड्रम की दिशा में मुंह फेर लिया और धीरे से बोला - “या अल्लाह !”
गीता सेन चुपचाप अपने स्थान पर बैठी रही ।
उस तूफानी रात से हर कोई परेशान था ।
गीता सेन ने फिर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर दृष्टिपात किया ।
सवा बाहर बजे गये थे ।
उसी क्षण गीता सेन के कानों में एक आवाज पड़ी । वह सतर्क हो गई । बादलों के गर्जन, कड़कती बिजली, तेज हवा और बारिश के शोर में उसे हवाई जहाज के जेट इंजन की धीमी-सी आवाज सुनाई दी ।
उसी क्षण लाउडस्पीकर पर कोई ऐसी एनाउन्समेंट होने लगी जिसका एक भी शब्द गीता सेन की समझ में नहीं आया । उसके कान हवाई जहाज के इंजन की आवाज की ओर लगे हुए थे जो क्षण-प्रतिक्षण समीप होती जा रही थी ।
फिर इंजन की आवाज स्पष्ट सुनाई देने लगी ।
लाल रंग की तुर्की टोपी वाला आदमी एकदम सतर्क हो गया था । उसकी बगल में बैठे मोटे आदमी ने भी नेत्र खोल लिये थे और सम्भलकर बैठ गया था ।
“यह शायद हांगकांग वाला प्लेन आ रहा है ।” - वह आशापूर्ण स्वर से बोला ।
“नामुमकिन ।” - लाल टोपी वाला उसकी ओर घूमे बिना बोला - “अगर ऐसा होता तो इसकी एनाउन्समेंट लाउडस्पीकर पर जरूर हुई होती ।”
मोटे का चेहरा उतर गया ।
गीता सेन, मोटा और लाल टोपी वाला और वेटिंग हाल में मौजूद अन्य सभी लोग बाहर की ओर देख रहे थे ।
उसी क्षण लम्बे रनवे की बत्तियां जल उठीं ।
एकाएक लाल टोपी वाला अपने स्थान से उठा और यूं बोला जैसे अपने आपसे बात कर रहा हो - “मैं पूछकर आता हूं यह कौन-सा प्लेन आ रहा है !”
मोटे ने अनजाने में ही सहमतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
गीता सेन सतर्क हो उठी थी और बड़ी व्यग्रता से रनवे की ओर देख रही थी ।
यह जरूर पीटर विंस्टन का प्लेन होगा, वह मन-ही-मन बोली ।
हवाई जहाज उसे अभी तक दिखाई नहीं दिया था, लेकिन इंजन की आवाज पहले से तेज हो गई थी ।
फिर दूर काले अन्धेरे आसमान में उसे हवाई जहाज का आभास देने वाली बत्तियों की हल्की-सी टिमटिमाहट दिखाई दी ।
उसी क्षण लाल टोपी वाला वापस आ गया । वह आकर धम्म से मोटे आदमी की बगल में बैठ गया और निराशापूर्ण स्वर में बोला - “यह तो कोई कार्गो (मालवाहक) प्लेन आ रहा है जो कालपुर्जों की खराबी और खराब मौसम की वजह से यहां फोर्स-लैण्ड कर रहा है ।
मोटे के मुंह से एक अजीब-सी आवाज निकली और फिर उसने आंखें बन्द कर लीं ।
गीता सेन सम्भलकर अपने स्थान पर बैठ गई । उसने अपने कोट की जेब में पड़े नोटों से भरे लिफाफे को एक बार फिर टटोला । उसका चेहरा एकदम भावहीन था ।
लाल टोपी वाले ने गीता सेन की ओर देखा । उसने कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन फिर अपना इरादा बदल दिया । उसने एक सिगरेट सुलगाया और फिर लापरवाही से रनवे की ओर देखने लगा ।
एयरफील्ड के आखिरी सिरे पर एक विशाल बोइंग प्लेन प्रकट हुआ । प्लेन की तेज स्पाट लाइट रनवे पर पड़ने लगी । कुछ ही क्षणों बाद प्लेन के पहियों ने जमीन को छुआ और फिर प्लेन लम्बे रनवे पर दौड़ता हुआ दिखायी दिया ।
अन्त में रनवे पर प्लेन रुक गया । उसके इंजन का शोर बन्द हो गया । वह सुरक्षित रूप से लैंड कर चुका था ।
गीता सेन ने घड़ी देखी, बांह फैलाकर जोर की अंगड़ाई ली और फिर अपने स्थान से उठ खड़ी हुई । अपनी बगल में रखा बैग उसने अपने बायें हाथ में लिया और फिर लापरवाही से चलती हुई आगे बढ गई ।
लाल टोपी वाले ने उत्सुकतापूर्ण नेत्रों से उसकी ओर देखा । गीता सेन को एक फिर लगा जैसे वह उससे कछ पूछने वाला ही लेकिन उसके होंठ नहीं हिले ।
गीता सेन बिना एयरफील्ड की ओर दृष्टिपात किये रेस्टोरेन्ट की ओर बढ गई । रेस्टोरेन्ट वेटिंग हाल के ही एक कोने में था ।
रेस्टोरेन्ट लगभग खाली पड़ा था । वह खिड़की के समीप वाली एक मेज पर बैठ गई । वहां से सारा वेटिंग हाल और एयरफील्ड का बहुत बड़ा भाग दिखाई दे रहा था ।
उसने अपना बैग अपने से दायीं ओर की कुर्सी पर रख दिया और प्रतीक्षा करने लगी ।
रेस्टोरेन्ट की तीन-चौथाई खाली सीटों की वजह से गीता सेन तनिक चिन्तित हो उठी थी । अगर मौसम खराब न होता और फ्लाइट कैंसिल न हुई होती तो रात के उस समय भी रेस्टोरेन्ट में काफी भीड़भाड़ होती और कर्नल मुखर्जी के प्लान के अनुसार पीटर विंस्टन और गीता सेन की मुलाकात भारी भीड़ भरे वातावरण में होती - ऐसे वातावरण में जहां किसी को यह जानने की फुरसत न होती कि कौन किससे क्या बात कर रहा था ।
उसी क्षण रेस्टोरेन्ट में एक लम्बा-तड़ंगा अंग्रेज प्रविष्ट हुआ । उसका सारा शरीर रेनकोट से ढका हुआ था । उसके सिर पर पायलेट की टोपी थी । रेनकोट और टोपी दोनों में से बारिश का पानी टपक रहा था ।
गीता सेन उसे फौरन पहचान गई ।
पीटर विंस्टन !
गीता सेन खिड़की से बाहर वेटिंग हाल में देखने लगी जहां लाल तुर्की टोपी वाला और दूसरा मोटा आदमी पहले की तरह बोरियत और परेशानी की प्रतिमूर्ति बने बैठे थे ।
पीटर विंस्टन ने एक सरसरी दृष्टि सारे हाल में दौड़ाई । गीता सेन को देखकर वह तनिक हिचकिचाया और फिर लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ नाक की सीध में उसकी ओर बढ चला ।
वह गीता सेन के एकदम समीप आ खड़ा हुआ और भावहीन स्वर से बोला - “हल्लो !”
गीता सेन ने सकपकाकर सिर उठाया ।
“नेम इज पीटर विंस्टन ।” - वह पूर्ववत भावहीन स्वर में बोला - “आई एम पायलेट आफ कान्टास कार्गो फ्लाइट नम्बर सेवन फाइव टू । आई हैव जस्ट फोर्सलैन्डिड माई काइट हेयर । डज इट मीन ऐनी थिंग टू यू ? (मेरा नाम पीटर विंस्टन है । मैं कान्टास कार्गों प्लाइट नम्बर 752 का पायलेट हूं । मैंने अभी अपना जहाज यहां उतारा है । तुम्हारा इस सिलसिले से कोई वास्ता है ?)”
गीता सेन बौखला गई । पीटर विंस्टन के उस एक्शन ने उसे बुरी तरह से गड़बड़ा दिया था । उसे यह बताया गया था कि पीटर विंस्टन उसके लाल रंग के चमड़े के कालर वाले ओवकोट से उसे पहचानेगा और फिर रेस्टोरेन्ट में भीड़ होने की वजह से वह उसकी टेबल पर बैठने की आज्ञा मांगेगा । गीता सेन उससे दो सवाल पूछेगी । जहाज कितनी ऊंचाई पर उड़ रहा था और हवा की रफ्तार क्या थी ? उत्तर मिल जाने के बाद वह पीटर विंस्टन का ध्यान बगल की कुर्सी पर पड़े बैग के और आकर्षित करेगी । पीटर विंस्टन चुपचाप उसमें फिल्म डाल देगा । गीता सेन बीस हजार पाउण्ड के नोटों से भरा लिफाफा निकालकर मेज पर रख देगी । वह अपना बैग सम्भाल लेगी और बिना पीटर विंस्टन पर दोबारा दृष्टिपात किये वहां से चल देगी ।
लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था ।
“आफकोर्स इट डज, मिस्टर विंस्टन ।” - वह हड़बड़ाकर बोली - “प्लीज, बी सीटिड (तशरीफ रखिये)” ।
लेकिन गीता सेन का तशरीफ रखने का निमन्त्रण मिल चुकने से पहले ही पीटर विंस्टन गीता सेन का बैग कुर्सी से उठाकर मेज पर रख चुका था और उस कुर्सी पर धम्म से बैठ गया था । उसने सिर से टोपी उतारकर बैग के पास मेज पर पटक दी, फिर उसने अपने शरीर पर पहने रेनकोट पर निगाह डाली और बुरा-सा मुंह बनाकर उठ खड़ा हुआ । उसने रेनकोट को उतारकर बगल की खाली कुर्सी की पीठ पर डाल दिया । उसने दुबारा गीता सेन की ओर देखा और चेहरे पर हाथ फिराता हुआ धीरे से बोला - “ओह जीसस !”
गीता सेन ने कुछ कहने के लिये मुंह खोला लेकिन उससे पहले ही पीटर विंस्टन उच्च स्वर में बोला पड़ा - “वेटर !”
एक वेटर फौरन प्रकट हुआ ।
“वाट इज योर्स ? (तुम क्या लोगी)” - पीटर विंस्टन ने उससे पूछा ।
“काफी ।” - गीता सेन के मुंह से अपने-आप निकल गया ।
“ब्रांडी फार मी ।” - वह वेटर से बोला - “काफी फार मैडम ।”
वेटर सहमतिसूचक ढंग से सिर हिलाया हुआ फौरन वहां से चला गया ।
“मैडम” - पीटर विंस्टन उखड़े स्वर में बोला -“लानत है उस बुरी घड़ी पर जब मैंने दौलत के लालच में आकर वह बेहूदा काम करना स्वीकार किया ।”
“लेकिन काम हुआ ?” - गीता सेन ने व्यग्र स्वर में पूछा ।
पीटर विंस्टन ने जुबान से उत्तर नहीं दिया । उसने अपने कोट की भीतर जेब से एल्युमीनियम के खोल में रखी हुई एक फिल्म निकाली और उसे गीता सेन के सामने उछाल दिया ।
गीता सेन के मुंह से सिसकारी निकल गई । उसने भयभीत दृष्टि से चारों ओर देखा ।
किसी का ध्यान उनकी ओर नहीं था ।
उसने जल्दी से फिल्म उठाई और उसे कोट में हाथ डालकर अपने ब्लाउज के भीतर रख लिया ।
“मेरे बाप की भी तौबा” - पीटर विंस्टन बोला - “अगर मैं दुबारा तुम्हारे ऐसे किसी काम को स्वीकार करने के बारे में सपने में भी सोचूं ।”
“कोई गड़बड़ हो गयी थी क्या ?” - गीता सेन ने यूं ही पूछ लिया । पीटर विंस्टन पाकिस्तान की हद से बाहर निकल आया था । काम हो गया था अब वह सुरक्षित उसके सामने बैठा था । वास्तव में अब गीता सेन को परवाह नहीं थी क कोई गड़बड़ हुई थी या नहीं ।
“गड़बड़ !” - पीटर विंस्टन जलकर बोला - “मेरी तो तकदीर अच्छी थी जो पेशावर में उन्होंने ऐन्टी एयरक्राफ्ट गन से मुझे मार नहीं गिराया या मुझे कहीं फोर्सलैंड करने के लिये नहीं कहा । मेरी मौजूदगी की जानकारी उन्हें मेरी अपेक्षा से जल्दी हो गई थी । तुम लोगों द्वारा बताये सारे इलाके का मैं अभी एक ही चक्कर लगा पाया था कि पाकिस्तान एयरफोर्स के दो बौम्बर हवाई जहाजों ने मुझे दायें-बायें से घेर लिया था । बड़ी मुश्किल से मैं उन्हें यह विश्वास दिलाने में सफल हो पाया था कि बेहद खराब मौसम की वजह से मैं रास्ता भटक गया । मैंने उन्हें यह भी बताया कि प्लेन के दो इंजनों में खराबी आ गयी है और फ्यूल टैंक लीक करने लगा है । खुदा का शुक्र था कि उन्हें मेरी बात पर विश्वास आ गया और उन्होंने मेरा पीछा छोड़ दिया । फिर फौरन पेशावर कन्ट्रोल टावर से मेरा सम्पर्क हुआ । यह जाहिर करने के लिये कि मैं वाकई बड़ी मुश्किल में था, मैंने अपने हवाई जहाज को पेशावर हवाई पट्टी पर उतारने की इजाजत मांगी लेकिन उन्होंने फौरन सख्त इन्कार कर दिया । मेरे नेवीगेटर को सही रास्ते का निर्देश दे दिया गया कि या तो मैं वापस रावलपिन्डी एयरपोर्ट पर चला जाऊं और या काबुल की ओर बढ जाऊं । मैंने दूसरी राय मान ली जो कि मैंने माननी ही थी । मैडम, मैंने जब तक काबुल एयरपोर्ट पर प्लेन नहीं उतार लिया, मेरा जान गले में अटकी रही । ओह गाड ! ओह, माई गुड गाड !”
उसी क्षण वेटर उनकी मेज पर काफी और ब्रांडी छोड़ गया ।
पीटर विंस्टन ने एक ही बार में अपना ब्रांडी का गिलास खाली कर दिया । गीता सेन ने काफी को छुआ तक नहीं ।
“तुम्हें उन लोगों से पेशावर उतरने के बारे में नहीं कहना चाहिये था ।” - गीता सेन धीरे से बोली - “अगर उन्होंने तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर ली होती तो वे लोग तुम्हारे प्लेन की तलाशी भी ले सकते थे और फिर वह कैमरा भी उन लोगों की जानकारी में आ सकता था जो विशेष रूप से तुम्हारे प्लेन में फिट किया गया था जो कि दस हजार फुट तक की ऊंचाई से गन्दे-से-गन्दे मौसम में नीचे की साफ तस्वीरें खींच सकता था ।”
“तुम ठीक कह रही हो लेकिन उन लोगों का विश्वास जीतने के लिये वह कहना जरूरी था, जो कि मैंने कहा । और तुम्हारी जानकारी के लिए उस कैमरे को मैंने पहले ही नष्ट कर दिया है । अब कोई मेरे प्लेन में वैसे किसी कैमरे का अस्तित्व सिद्ध नहीं कर सकता ।”
“लेकिन तुमने तस्वीरें तो ली हैं न ?”
“क्यों नहीं ? अभी फिल्म दी तो है तुम्हें । लेकिन मैडम तुम्हारे लोगों को वहम हो गया है । पेशावर में वैसा कुछ नहीं है जिसकी कि तुम्हारे लोग कल्पना कर रहे हैं । उन्हें पेशावर के बारे में गलत सूचना मिली मालूम होती है ।
“हमारी दिलचस्पी केवल पेशावर में नहीं, उसके आस-पास के इलाके में भी थी ।”
“कहीं भी कुछ नहीं है । तुम लोगों को वहम हुआ है । मैंने कोहाट से लेकर दरगई तक और सैदू शरीफ तक और तक्षिला और ऐबटाबाद से लेकर खैबरपास तक के घेरे का चक्कर लगाया है । मुझे तो कहीं ऐसा राकेट स्टेशन या मिलिट्री इन्स्टालेशन दिखाई नहीं दी जो हिन्दुस्तान के लिये खतरे की वजह बन सके ।”
“यह तुम्हें किसने कहा है कि तुम्हारे माध्यम से हम कोई राकेट स्टेशन या मिलिट्री इन्स्टालेशन चैक कर रहे थे ?”
“हर बात कहने की जरूरत नहीं होती मैडम, और फिर मैं अपने भेजे में अक्ल रखता हूं । पेशावर और उसके आस-पास के इलाके की तस्वीरों का क्या तुम्हारी सरकार कोई कैलेन्डर छापना चाहती है ?”
गीता सेन चुप रही ।
“अब मेरा माल निकालो ।” - पीटर विंस्टन बोला ।
“तुमने तस्वीरें कितनी उंचाई से ली हैं ?”
“छः और सात हजार फुट के बीच की ऊंचाई से । पेशावर कैन्ट और मरदान के इलाके में मैं इससे भी थोड़ा नीचे आ गया था ।”
“हवा की रफ्तार ?”
“दो सौ से दो सौ चालीस तक । लेकिन मैं फिर कहता हूं वहां कुछ नहीं है ।”
“बार-बार एक ही बात मत दोहराओ, मिस्टर । तुम्हारे कहने से कुछ नहीं होता । शायद तुम्हें ही कुछ दिखायी न दिया हो । लेकिन जो कैमरा तुम्हें दिया गया था, उसकी आंख तुम्हारी आंखों से बहुत तेज थी । वह कैमरा उन चीजों की तस्वीरें खींचने की भी क्षमता रखता था जो नंगी आंख से दिखाई नहीं देतीं ।”
पीटर विंस्टन से लापरवाही से कन्धे झटकाये ।
गीता सेन ने अपने कोट की भीतर जेब से नोटों से भरा लिफाफा निकाला और धीरे से मेज पर रखे अपने बैग की ओट में पीटर विंस्टन की ब्रांडी के खाली गिलास की बगल में रख दिया ।
पीटर ने एक निगाह लिफाफे पर डाली और फिर धीरे से बोला - “अब मुझे वह सोचकर भी हैरानी होती है कि मैंने बीस हजार पौंड की मामूली रकम की खातिर अपनी जान को, अपनी कम्पनी के कीमती प्लेन को और प्लेन में लदे लाखों के माल को खतरे में डाल दिया था ।”
“बीस हजार पौंड मामूली रकम नहीं होती ।” - गीता सेन विरोधपूर्ण स्वर में बोली ।
“जब मैंने यह काम करन के लिए हां की थी, तब मेरा भी यही विचार था लेकिन अब.. खैर, छोड़ो ।”
उसने लिफाफा उठा लिया और उसे अपनी जेब में रखने के स्थान पर उसका एक कोना फाड़ा । उसने लिफाफे के भीतर हाथ डाला ।
गीता सेन ने आतंकित नेत्रों से अपने चारों और देखा और फिर व्यग्रता और आतंकपूर्ण स्वर में बोली - “मिस्टर, प्लीज !”
“ओ. के । ओ. के. ।” - विंस्टन बोला । उसने एक बार लिफाफे के भीतर झांका और फिर उसे अपनी यूनिफार्म की भीतरी जेब में रख लिया ।
गीता सेन अपने स्थान से उठ खड़ी हुई । अपने काफी के कप को उसने एक बार छुआ भी नहीं था ।
“थैंक्यू ।” - वह अपने होंठों पर जबरन एक मुस्कराहट लाती हुई बोली - “थैंक्यू, मिस्टर पीटर विंस्टन ।”
पीटर विंस्टन ने सिर उठाकर विचित्र नेत्रों से उसकी ओर देखा और फिर बेहद गम्भीर स्वर में बोला - “मैं तुम्हें एक नेक राय देना चाहता हूं, मैडम ।”
“क्या ?”
“इस धंधे से हाथ खींच लो, वरना तुम्हें खबर नहीं होगी और तुम दूसरी दुनिया में पहुंच जाओगी ।”
“तुम किस धंधे की बात कर रहे हो ?” - गीता सेन उलझनपूर्ण स्वर से बोली ।
“ओ. के ! ओ. के. ! अगर तुम जानबूझकर अनजान बनना चाहती हो तो मुझे कोई एतराज नहीं । धंधा तुम्हारा है, जिन्दगी तुम्हारी है, लेकिन देख लेना, एक दिन न यह धंधा रहेगा और न यह जिन्दगी रहेगी । और तकदीर का कोई भरोसा नहीं । सम्भव है, अन्तिम रात्रि का वह दिन आज ही आ जाये ।”
गीता सेन चुप रही ।
“मैडम, मैं तुम्हें बड़ी नेक राय दे रहा हूं । मैं तुम्हें वह नेक राय दे रहा हूं जिस पर मैं खुद अभी, इसी क्षण से अमल कर रहा हूं । क्विट दिस रैकेट, सिस्टर, एण्ड सूनर दि बैटर ।”
“गुड बाई, मिस्टर पीटर विंस्टन ।” - गीता सेन पटाक्षेप-सा करती हुई बोली ।
पीटर विंस्टन ने उसकी ओर देखा लेकिन वह मुंह से कुछ नहीं बोला । उसके होंठों पर एक अवसादपूर्ण मुस्कराहट थी । गीता सेन छोटे-छोटे कदम रखती हुई रेस्टोरेन्ट से बाहर निकल गई ।
गीता सेन रेस्टोरेन्ट से निकलकर एयरपोर्ट से बाहर की ओर चल दी । उसने एक उड़ती-सी निगाह वेटिंग हाल में डाली । मोटा आदमी अब पूरे सोफे पर पसरा हुआ था और शायद सो चुका था । लाल रंग की तुर्की टोपी वाला आदमी उसकी बगल में मौजूद नहीं था ।
गीता सेन बाहर की ओर बढ चली ।
लाल टोपी वाला इन्क्वायरी काउण्टर पर खड़ा था ।
“अब तो मौसम साफ होता दिखाई दे रहा है ।” - उसके समीप से गुजरते समय उसने लाल टोपी वाले को कहते सुना - “क्या हांगकांग के प्लेन के जल्दी आने की कोई संभावना है ?”
गीता सेन एयरपोर्ट की मार्की में पहुंची ।
पीटर विंस्टन की दी हुई फिल्म उसके ब्लाउज के भीतर उसके उरोजों के बीच सुरक्षित थी । अगली सुबह उसने वह फिल्म काबुल में स्थित भारतीय दूतावास के एक अधिकारी को दे देनी थी और फिर उसकी जिम्मेदारी खत्म !
मूसलाधार वर्षा थम चुकी थी । केवल हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी, लेकिन तेज हवा अभी भी चल रही थी और आसमान में अभी भी बरसाती काले बादल उमड़ रहे थे । तेज वर्षा किसी भी क्षण दुबारा शुरू हो सकती थी ।
तकदीर अच्छी है - गीता सेन ने मन-ही-मन सोचा । उसके एयरपोर्ट से विदा होने के समय पर जैसे केवल उसी के लिये वर्षा रुक गई थी । वह इमारत से बाहर निकल आई और भीगी सड़क पर चलती हुई कार पार्किंग की ओर बढी ।
साइड से एक बड़ी-सी गाड़ी एयरोड्रोम की ओर बढ रही थी । उसके कानों में गाड़ी के हार्न की आवाज पड़ी । उसने तेजी से सड़क को पार कर जाना चाहा लेकिन उसी क्षण उसका पांव सड़क पर बने बरसाती पानी से भरे एक छोटे से खड्डे में पड़ा और वह एकदम मुंह के बल सड़क पर आ गिरी ।
कोई चिल्लाया ।
ब्रेकों की चरचराहट की आवाज उसके कानों में पड़ी ।
एक बार गीता सेन ने उठने का प्रयत्न किया लेकिन उससे पहले ही जैसे उस पर पहाड़ टूट पड़ा । केवल एक क्षण के लिए उसे तीव्र पीड़ा का आभास हुआ और फिर सब खत्म ।
बड़ी-सी गाड़ी एक स्टेशन वैगन थी जिसके अगले दोनों पहिये गीता सेन के शरीर के ऊपर से गुजर चुके थे ।
गीता सेन का बैग दूर कहीं जा गिरा था । बैग झटके से जमीन पर गिरने से खुल गया था और उसके भीतर मौजूद सारी चीजें सड़क पर बिखर गई थीं । उसके ब्लाउज में दबी एल्यूमीनियम के खोल में बन्द फिल्म एक झटके से ब्लाउज से बाहर निकल गई थी और सड़क पर लुढकती हुई एक मटमैले पानी से भरे छोटे से खड्डे में जा गिरी थी ।
स्टेशन वैगन का ड्राइवर लपककर बाहर निकला । सड़क से पार टैक्सी स्टैंड पर खड़े टैक्सी वाले उस ओर भागे । बीट पर मौजूद पुलिस का सिपाही उस ओर लपका ।
पलक झपकते ही गीता सेन के आस-पास लोगों की भीड़ लग गई ।
“बाई गाड, मेरी इसमें कोई गलती नहीं थी ।” - स्टेशन वैगन का ड्राइवर आतंकित स्वर में बार-बार कह रहा था ।
कोई ड्राइवर की बात नहीं सुन रहा था । लोगों ने बड़ी सावधानी से गीता सेन का बुरी तरह कुचला हुआ शरीर स्टेशन वैगन के नीचे से निकाला ।
“फिनिश्ड ।” - कुछ क्षण बाद कोई बोला ।
गीता सेन मर चुकी थी ।
उसी क्षण फ्लाइंग स्क्वायड के सायरन की आवाज से वातावरण गुज उठा ।
लाल टोपी वाला एयरपोर्ट की मार्की में खड़ा सारा नजारा देख रहा था । उसने दुर्घटनास्थल की ओर कदम बढाने का उपक्रम नहीं किया था । उसने अपने सिर से टोपी उतार ली और अपनी गंजी खोपड़ी पर हाथ फेरने लगा ।
फिर उसने गहरी सांस ली, टोपी को दुबारा अपनी गंजी खोपड़ी पर जमाया और फिर लम्बे डग भरता हुआ एयरपोर्ट के उस कोने की ओर बढ चला जहां पब्लिक टेलीफोन के छोटे-छोटे केबिनों की कतार दिखाई दे रही थीं ।
***
कर्नल मुखर्जी ने पाइप का एक लम्बा कश लगाते हुए अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर दृष्टिपात किया और फिर ढेर सारा धुआ उगलते हुए बोले - “प्लेन्टी ऑफ टाइम (अभी बहुत वक्त है) ।”
उनकी बगल में बैठे सुनील ने अपनी घड़ी देखी और फिर सहमतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।
कर्नल मुखर्जी की विशाल शेवरलेट कार की धर्मसिंह ड्राइव कर रहा था । धर्मसिंह उनका पीर-बावर्ची-भिश्ती खर सभी कुछ था । उनका खाना पकाने से लेकर उनकी कार ड्राइव करने तक के सभी काम धर्मसिंह ही करता था । कर्नल मुखर्जी का वह बहुत विश्वसनीय आदमी था लेकिन न जाने क्यों सुनील को कभी-कभी उस पर सन्देह हो जाता था । पिछले कुछ केसों में कुछ ऐसी बातें लीक हो गई थीं जो कर्नल मुखर्जी और सुनील के सिवाय किसी तीसरे आदमी को मालूम नहीं थी और हर बार सुनील को ऐसा लगता था कि अगर कोई तीसरा आदमी उन बातों की जानकारी हासिल करने में सफल हो सकता था तो वह केवल धर्मसिंह था । सुनील ने एक-दो बार अपना यह सन्देह कर्नल मुखर्जी पर व्यक्त भी किया था और उसी के अनुरोध पर उन्होंने धर्मसिंह को अच्छी तरह चैक भी करवाया था लेकिन अन्त में वे इस नतीजे पर पहुंचे थे कि धर्मसिंह पूर्णतया ईमानदार और अपने देश से प्रेम करने वाला आदमी था ।
बाद में सुनील को भी ऐसा अनुभव होने लगता था कि वह धर्मसिंह पर सन्देह करके उसके साथ ज्यादती कर रहा है ।
कार में अगली और पिछली सीट के मध्य में एक साउंडप्रूफ शीशे की स्क्रीन लगी हुई थी ।
“राजनगर एयरपोर्ट से इण्डियन एयरलाइंस का काबुल को रवाना होने वाला कैरेवल (Caravelle) प्लेन सात बजकर बीस मिनट पर टेक आफ करेगा । बड़ी मुश्किल से तुम्हारे लिये उस प्लेन मे एक सीट का इन्तजाम करवाया गया है । प्लेन मे सीट मांगते समय इस बात पर विशेष रूप से जोर दिया गया था कि काबुल में तुम्हारी पत्नी का एक्सीडेण्ट में देहान्त हो गया है इसलिए तुम्हारा फौरन काबुल पहुंचना बहुत जरूरी है । शुक्र है बात निचले स्तर पर ही बन गई वरना उस फ्लाइट में तुम्हें सीट दिलवाने के लिए हमें गृह मन्त्रालय और शायद प्रतिरक्षा और विदेश मन्त्रालय तक से प्रार्थना करनी पड़ती जो कि मैं मजबूरी में करता जरूर लेकिन तुम्हारी सुरक्षा के नाते यह कोई अच्छी बात नहीं होती । अगर किसी विदेशी एजेण्ट को सारे सिलसिले की भनक पड़ जाती तो वह जरूर सन्दिग्ध हो उठता कि आखिर एक साधारण आदमी को, अर्थात् तुम्हें फौरन काबुल भिजवाने में इतने बड़े-बड़े सरकारी विभाग क्यों दिलचस्पी ले रहे थे !”
सुनील चुप रहा ।
कर्नल मुखर्जी कुछ क्षण पाइप के लम्बे-लम्बे कश लगाते रहे और फिर बोले - “गीता सेन की जो तस्वीरें तुम्हें दिखाई गई हैं, उनकी सहायता से तुम्हें विश्वास है कि तुम गीता सेन को पहचान लोगे ?”
“जी हां ।” - सुनील विश्वासपूर्ण स्वर में बोला - “बशर्ते कि एक्सीडेण्ट में उनका चेहरा बुरी तरह कुचला न गया हो ।”
“ऐसी सूरत में तुम्हें उसे उसके शरीर के शिनाख्ती निशानों से पहचानना होगा । मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूं कि उसके पेट पर अपैंडेसाइटिस के आपरेशन का निशान है और बायें पांव के अंगूठे का आधा नाखून टूटा हुआ है ।”
“शिनाख्ती निशान तो मुझे याद है, सर लेकिन आपको इनकी जानकारी कैसे हुई ? आपके कथनानुसार आपने तो कभी गीता सेन की सूरत भी नहीं देखी ।”
“करैक्ट । और अगर देखी भी होती” - कर्नल मुखर्जी के होंठों की कोरों पर एक हल्की-सी मुस्कराहट प्रकट हुई और लुप्त हो गई - “तो पेट पर अपैंडेसाइटिस के आपरेशन के निशान के मामले में तो शायद मुझे उसके कथन पर ही विश्वास करना पड़ता । मिस्टर ये दोनों बातें और कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातें मैने उसके उस प्रार्थना-पत्र में से जानी हैं जो उसने आज से दो साल पहले पासपोर्ट हासिल करने के लिये भारत सरकार को दिया था ।”
“आई सी ।” - सुनील आदरपूर्ण स्वर में बोला - “लेकिन आपने अभी तक सारे सिलसिले के बारे में मुझे कुछ बताया नहीं”
“अभी बताता हूं ।” - कर्नल मुखर्जी बोले । उन्होंने पाइप का आखिरी कश लगाया और उसे मुंह से निकाल लिया । वे सुनील की ओर घूमे और फिर धीमे किन्तु स्पष्ट स्वर में बोले - “गीता सेन राजधानी से निकलने वाले एक अंग्रेजी के अखबार की काबुल में नियुक्त कारस्पान्डेंट (प्रतिनिधि) है और पिछले दो साल से काबुल में ही रह रही है । पिछले चौदह महीनों से उसका सम्बन्ध स्पेशल इन्टैलीजेन्स से है लेकिन आज तक हमें कभी उसकी जरूरत नहीं पड़ी थी । पाकिस्तान और अफगानिस्तान में किसी प्रकार के राजनैतिक सम्बन्ध नहीं हैं । पाकिस्तान की कई गतिविधियों के बारे में हमें वैसे तो काबुल से बेहतर सूचनाएं हासिल होने की आशा रहती है । वह आशा भी किसी हद तक बाद में पूरी हुई, लेकिन इसके अतिरिक्त भी मैंने यह जरूरी समझा था कि काबुल में हमारा कोई कान्टैक्ट हो ।”
सुनील चुप रहा ।
“परसों रात मैंने राजनगर-काबुल ट्रंक लाइन पर गीता सेन से बात की थी । कल रात के लिए उसे एक काम सौंपा गया था ।”
“क्या ?”
“काम बहुत मामूली था । उसने कान्टास एयरवेज की कार्गो फ्लाइट नम्बर 752 के पायलेट पीटर विंस्टन से काबुल एयरपोर्ट पर सम्पर्क स्थापित करना था । पीटर विंस्टन ने उसे एक कैमरा फिल्म सौंप देनी थी और पाकिस्तान में पेशावर के आस-पास के इलाके पर से उड़ते समय की प्लेन की ऊंचाई और हवा की रफ्तार के बारे में बताना था । बदले में गीता सेन ने उसे बीस हजार पाउण्ड के नोटों से भरा एक लिफाफा सौंप देना था । काबुल स्थित भारतीय दूतावास के जिस अधिकारी ने गीता सेन को बीस हजार पाउण्ड के नोट दिये थे, उसी को गीता सेन ने वह फिल्म सौंप देनी थी और फिर हमारे दूतावास ने डिप्लोमैटिक बैग में वह फिल्म भारत भेज देनी थी । काम बहुत मामूली था । चौदह महीने से गीता सेन स्पेशल इन्टैलीजेन्स की सदस्या थी और इतने समय में उसे कभी कोई काम नहीं सौंपा गया था । कल रात पहली बार वह स्पेशल इन्टैलीजेन्स का एक मामूली-सा काम कर रही थी और कल रात ही वह पीटर विंस्टन से मिलकर काबुल एयरपोर्ट से निकली और एक स्टेशन वैगन की चपेट में आकर अपनी जान से हाथ धो बैठी ।”
“हत्या !”
“मेरी सूचना के अनुसार वह एक सीधा-सादा एक्सीडेंट का ही केस था । एक चश्मदीद गवाह का और खुद स्टेशन वैगन के ड्राइवर का कथन है कि गीता सेन सड़क पार करते समय एकाएक ठोकर खा गई थी और सीधी स्टेशन वैगन के सामने आ गिरी थी । ड्राइवर की बचाव की भरपूर कोशिश के बाद भी स्टेशन वैगन के अगले पहियों के नीचे आकर गीता सेन का शरीर कुचला गया । स्टेशन वैगन के ड्राइवर ने वहां से भाग निकलने का कतई उपक्रम नहीं किया था । ये बातें इस तथ्य की काफी हद तक पुष्टि करती हैं कि गीता सेन की हत्या नहीं की गई थी । वह बदकिस्मती से सचमुच ही एक्सीडेंट की शिकार हो गई थी ।”
“मुझे काबुल क्यों भेजा जा रहा है ?”
“ताकि हमें वह फिल्म हासिल हो सके जो काबुल एयरपोर्ट पर पीटर विंस्टन ने गीता सेन को सौंपी थी । गीता सेन की लाश काबुल के सिविल हस्पताल के मोर्ग में है और उसकी निजी वस्तुएं पुलिस के अधिकार में हैं । तुम उसके पति के रूप में काबुल जा रहे हो । स्वयं को गीता सेन का पति सिद्ध करने के लिए तुम्हारे पास पर्याप्त प्रमाण होंगे । उन प्रमाणों में तुम्हारे नाम विदेश मंत्रालय की एक चिट्ठी भी है जिसमें सरकारी तौर पर तुम्हें यह सूचना दी गई है कि तुम्हारी पत्नी गीता सेन का काबुल में एक एक्सीडेंट में देहान्त हो गया है । इसके अतिरिक्त जरूरत पड़ने पर काबुल स्थित भारतीय दूतावास से भी तुम्हें पर्याप्त सहायता मिल सकती है । काबुल पहुंचने पर हस्पताल वाले तुम्हें गीता सेन का निजी सामान सौंप देंगे । तुम काबुल में ही गीता सेन की अन्तिम संस्कार कर दोगे और उसका सारा निजी सामान समेटकर वापस लौट आओगे ।”
“लेकिन आप इस बात की गारन्टी कैसे कर सकते हैं कि पुलिस के पास सुरक्षित उसके निजी सामान में वह फिल्म भी होगी ?”
“ऐसी कोई पक्की गारन्टी तो मैं नहीं कर सकता लेकिन इस बात की तफ्तीश मैं करवा चुका हूं कि पीटर विंस्टन उसे वह फिल्म सौंप चुका है । मैं इस बात का पता लगा चुका हूं कि पीटर विंस्टन का प्लेन आधी रात के बाद काबुल एयरपोर्ट पर उतरा था । अगर पीटर विंस्टन ने हमारा काम न किया होता तो वह अपने प्लेन को काबुल एयरपोर्ट पर उतारने के स्थान पर सीधा तेहरान ले गया होता । नम्बर दो, इस घटना का समाचार हमारे काबुल स्थित दूतावास ने विदेश मंत्रालय को भेजा था । विदेश मंत्रालय ने इसकी सूचना गृह मंत्रालय को दे दी थी । गृह मन्त्रालय को गीता सेन के स्पेशल इन्टैलीजेन्स के सम्पर्क का ज्ञान था, इसलिए फौरन ही यह सूचना मुझे मिल गई थी । मैंने तत्काल एक्शन लेना आरम्भ कर दिया । मुझे मालूम हुआ कि पीटर विंस्टन सुबह छः बजे ही अपना प्लेन लेकर काबुल से रवाना हो गया था । नौ बजे के आस-पास वह तेहरान पहुंच गया था । मैंने तेहरान में पीटर विंस्टन से सम्पर्क स्थापित किया था । उसके कथनानुसार उसने गीता सेन को फिल्म सौंप दी थी । मुझे पीटर विंस्टन के झूठ बोलने की कोई वजह दिखाई नहीं देती । काबुल में दुर्घटनास्थल पर पुलिस फौरन पहुंच गई थी और पुलिस ने गीता सेन की शरीर और निजी सामान को फौरन अपने अधिकार में कर लिया था । इन तमाम बातों के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि अगर कोई बहुत ही अप्रत्याशित बात नहीं हो गयी है तो फिल्म जरूर गीता सेन की निजी वस्तुओं में होगी । अगर उसके अधिकार में फिल्म नहीं होगी तो बीस हजार पाउण्ड के नोट होंगे और उस सूरत में तुम्हारे काबुल पहुंचते ही वहां की पुलिस इतनी ढेर सारी फारेन करेंसी के बारे में तुमसे प्रश्न पूछे बिना रहेगी नहीं ।”
“गीता सेन के अन्य सम्बन्धियों को भी तो उसकी मृत्यु की सूचना दी गयी होगी ?”
“भारत में उसका कोई सम्बन्धी जीवित नहीं है । गीता सेन का सारा परिवार कोयना के भूचाल में मारा गया था । उसका एक भाई कनेडा में रहता है और वह उसका इकलौता जीवित सम्बन्धी है । उस तक सूचना पहुंचते-पहुंचते ही पहुंचेगी ।”
“मेरे पासपोर्ट पर मेरा नाम सुनील कुमार चक्रवर्ती लिखा हुआ है । क्या मुझसे यह नहीं पूछा जायेगा कि मेरी कथित पत्नी का नाम गीता सेन क्यों है, गीता चक्रवर्ती क्यों नहीं है ।”
“इस सवाल के तमसे पूछे जाने की पूरी सम्भावना है । लेकिन इतना समय नहीं है कि मैं तुम्हें सुनील कुमार सेन या किसी अन्य कुमार सेन के नाम का क्या पासपोर्ट तैयार करवा करके दे सकूं । इसीलिए तुम्हें अपने ओरिजिनल पासपोर्ट पर सफर करना पड़ रहा है । लेकिन इस सवाल का एक काफी हद तक विश्वसनीय जवाब मैं तुम्हें सुझा सकता हूं ।”
“क्या ?”
“गीता सेन जिस अखबार की कारस्पान्डेन्ट थी, उसमें उसके द्वारा भेजी रिपोर्टों पर आरम्भ से ही उसका यही नाम छपता रहा है । इसीलिए शादी के बाद भी उसने अपना नाम बदलना अर्थात गीता सेन से गीता चक्रवर्ती कर लेना उचित नहीं समझा । फिल्म अभिनेता, लेखक, पत्रकार और अन्य समाज में प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्ति अक्सर शादी के बाद भी अपना वास्तविक नाम नहीं बदलते । उदाहरणतया हालीवुड की फिल्म अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर चार शादियां कर चुकी हैं लेकिन कभी भी उसने अपना नाम नहीं बदला । अर्थात् रिचर्ड बर्टन से शादी करने के बाद वह एलिजाबेथ बर्टन नहीं कहलाने लगी या ऐडी फिशर से शादी करने के बाद वह एलिजाबेथ फिशर नहीं कहलाने लगी थी । अभिनेत्री माला सिन्हा पी. सी. लोहानी से शादी करने के बाद माला लोहानी नहीं बन सकी । प्रसिद्ध लेखिका मन्नू भण्डारी ने लेखक राजेन्द्र यादव से शादी करने के बाद अपना नाम बदलकर मन्नू यादव नहीं रख लिया था । इसी प्रकार अगर प्रसिद्ध पत्रकार गीता ने तुमसे शादी करने के बाद अपना नाम गीता चक्रवर्ती नहीं रखा तो इसमें कोई हैरान होनी वाली बात नहीं है । यू अंडरस्टैंड माई प्वाइंट (तुम मेरी बात समझे) ?”
“यस सर ।”
मुखर्जी पाइप के कश लगाने लगे ।
“लेकिन सर, वह फिल्म का किस्सा क्या है ?”
कर्नल मुखर्जी ने फिर घड़ी पर दृष्टिपात किया, एक क्षण हिचकिचाये और बोले - “हाल ही में हमें कुछ ऐसे संकेत मिले थे जिससे यह प्रकट होता था कि पाकिस्तान में पेशावर कैन्ट के आस-पास के इलाके में कहीं चीनियों की सहायता से एक भारी राकेट बेस तैयार किया जा रहा है । हमें यह संकेत मिला था हयात हैदर नाम के एक पश्चिमी पाकिस्तान के नागरिक से, जो कि पेशावर कैन्ट के स्टेशन पर नियुक्त रेलवे कर्मचारी था । उसे हर साल रेलवे का फ्री पास मिलता था और इस फ्री पास पर वह हर साल कराची में रहने वाले अपने रिश्तेदारों से मिलने जाया करता था । पिछली बार जब वह कराची पहुंचा तो वह चुपचाप कराची में स्थित हमारे हाई कमिश्नर के आफिस में भी पहुंचा । हाई कमीशन के एक अधिकारी से उसने बात की और कहा कि पाकिस्तान की फौजी तैयारियों के बारे में वह कुछ ऐसी जानकारी रखता था जो भारत के लिये बहुत हितकर सिद्ध हो सकती थी । उस जानकारी के बदले में हयात हैदर ने भारतीय हाई कमीशन के उस अधिकारी से एक मोटी रकम की मांग की । हाई कमीशन के अधिकारी को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ । उसने सारे सिलसिले को भारतीय हाई कमीशन पर एस्पियानेज (जासूसी) का इलजाम लगाने का मौका तलाश करने की दिशा में एक चाल समझा । परिणामस्वरूप हयात हैदर नाम का पेशावर कैन्ट स्टेशन का वह रेल कर्मचारी बड़ी सफाई से हाई कमीशन से दफा कर दिया गया ।”
कर्नल मुखर्जी एक क्षण रुके और फिर बोले - “हयात हैदर निराश वापस लौट गया । उस घटना के कुछ दिनों के बाद संयोगवश ही हयात हैदर रावलपिंडी में जान मैक्सवैल से टकरा गया ।”
“जान मैक्सवैल कौन ?”
“जान मैक्सवैल एक ऐंग्लो इण्डियन है जो कई सालों से पाकिस्तान में बसा हुआ है और काबुल में गीता सेन की तरह रावलपिंडी में हमारा कान्टैक्ट है । जान मैक्सवैल को भारतीय हाई कमीशन से भी हयात हैदर के बारे में सूचना मिल चुकी थी । पहले जान मैक्सवैल को भी हयात हैदर एक फ्राड ही लगा था लेकिन बाद में जब उसने हयात हैदर से बात की तो उसे धीरे-धीरे उसकी बात पर विश्वास होने लगा । परिणामस्वरूप जान मैक्सवैल ने हयात हैदर से कथित फौजी महत्व की जानकारी खरीदने का फैसला कर लिया । जान मैक्सवैल ने उसे ढेर सारा रुपया दिया और ढेर सारा रुपया और देने का वादा किया । बदले में उसने जान मैक्सवैल को जो बातें बतायीं उनके आधार पर हमें यह स्वीकार करने पर मजबूर होना पड़ा कि पाकिस्तान चीन की सहायता से बहुत भारी और खतरनाक मिलिट्री तैयारियों में जुटा हुआ है ।”
“हयात हैदर ने क्या बताया था ?”
“हयात हैदर ने बताया कि जनवरी के महीने में उसने पांच दिन कि छुट्टी ली थी । हयात हैदर पेशावर कैन्ट की लोकोमोटिव वर्कशाप में काम करता था । छुट्टी के बाद जब वह वापस लौटा तो उसने पेशावर कैन्ट के स्टेशन के आस-पास के इलाके में कई परिवर्तन पाये । पाकिस्तानी फौज के अतिरिक्त उसे हर जगह चीनी सैनिकों के दर्शन हुए । उसे फौज द्वारा वर्कशाप की ओर जाने से रोक दिया गया । उसे बताया गया कि पेशावर कैन्ट स्टेशन के आस-पास के इलाके में साधारण नागरिकों के आगमन पर न केवल प्रतिबन्ध लग गया था बल्कि मिलिट्री के सैनिकों को यह भी आदेश था कि अगर कोई अनधिकृत व्यक्ति उस इलाके में दिखाई दे तो उसे फौरन गोली मार दी जाये । उत्तर में हयात हैदर ने उन्हें बताया कि वह रेल का ही कर्मचारी है और पांच दिन की छुट्टी के बाद वापस लौटा था । मुनासिब शिनाख्त के बाद उसे वर्कशाप इंचार्ज को सौंप दिया गया । वकर्शाप इंचार्ज ने उसे ड्यूटी पर ले लिया और साथ ही उसे कड़ी चेतावनी दी कि वह वर्कशाप के उत्तर में बने किसी शैड की ओर कदम न रखे । उन शैडों की ओर कदम बढाने वाली किसी भी अनधिकृत व्यक्ति को आन साइट शूट किया जा सकता था । हयात हैदर ने आदेश का पालन करने का वादा किया लेकिन उसके खुराफाती दिमाग से यह बात नहीं निकली कि आखिर उसकी पांच दिन की गैरहाजिरी में पेशावर कैंट स्टेशन के उत्तरी शैडों में ऐसी क्या चीज आ गयी थी, किसकी वजह से सारे इलाके में इतना तगड़ा मिलिट्री का पहरा लग गया था और मिलिट्री को किसी अनजाने व्यक्ति को उस ओर कदम बढाते देखते ही उसे फौरन गोली से उड़ा देने का आदेश मिल गया था ।”
कर्नल मुखर्जी ने जेब से दियासलाई निकालकर अपने पाइप के तम्बाकू को कुरेदा, पाइप के दो-तीन लम्बे-लम्बे कश लगाये और फिर बोले - “अगले कुछ दिनों में हयात हैदर की उत्तरी शैड में काम करने वाले कुछ फौजियों से मित्रता हो गयी । मित्रता इस हद तक बढी कि वे लोग दोपहर के खाने के बाद चाय के लिए कभी-कभार उसे अपने पास बुलाने लगे । हयात हैदर ने बातचीत के दौरान में बड़े सरल स्वर से उन लोगों से पूछने की कोशिश की कि उत्तरी शैडों में क्या था लेकिन किसी ने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया । वे लोग बड़ी चतुराई से उसकी बात को टाल गये । उन्हीं दिनों में हयात हैदर ने एक चीनी फौजी अधिकारी को यह कहते सुना था कि अब वे दिन दूर नहीं जब पाकिस्तान इतना छोटा-सा देश होते हुए भी भारत जैसे विशाल देश की ऐसी-तैसी करके रख देगा ।”
“फिर ?”
“फिर एक दिन ऐसा आया जब हयात हैदर ने एक ऐसा काम कर डाला जिसके बारे में सोचने-भर से भी गज-भर के कलेजे वाल आदमी कांप जाये । एक दिन उसके फौरमैन ने उसे कहा कि उसे डबल ड्यूटी देनी पड़ेगी । रात की शिफ्ट में काम करने वाला एक कर्मचारी बीमार हो गया था । उसके स्थान पर हयात हैदर को रात की शिफ्ट में भी काम करने का आदेश मिला । हयात हैदर की शिफ्ट सुबह आठ बजे से शाम के चार बजे तक होती थी । उस रोज के बाद दस दिन तक उसे रात के बारह बजे सुबह के आठ बजे तक चलने वाली शिफ्ट में भी काम करना पड़ा । उन्हीं दिनों में से एक दिन रात के अन्धेरे में वह उत्तरी शैडों में से एक की ओर बढ गया ।”
“वह अपनी जान से हाथ धो सकता था ।”
“धो सकता था लेकिन शायद उसकी उत्सुकता इस कदर बढ गयी थी वक्ती तौर पर वह यह बात भूल गया था कि किसी उत्तरी शैड-की ओर कदम उठाकर वह कितना बड़ा खतरा मोल ले रहा था । या शायद उसके खुराफाती दिमाग ने यह महसूस किया था कि अंधेरी रात में उस ओर बढने का खतरा उतना भयंकर था नहीं जितना कि दिन में उसके इंचार्ज ने जाहिर किया था ।”
“फिर क्या हुआ ?”
“रात के अंधेरे में वह सुरक्षित एक शैड के पास तक पहुंच गया । शैड का दरवाजा मजबूती से बन्द था और उसके सामने एक ऊंघता हुआ फौजी खड़ा था । हयात हैदर के कथनानुसार शैड की पिछली दीवार में छत के पास रोशनदान थे जो खुले हुए थे । उसी दीवार के पास ढेर सारे ड्रम एक-दूसरे के ऊपर और अगल-बगल रखे हुए थे । हयात हैदर चुपचाप उन ड्रमों पर चढ गया । आखिरी ड्रम पर चढने के बाद वह इस स्थिति में पहुंच गया कि वह शैड के भीतर झांक सके ।”
“भीतर तो एकदम अंधेरा होगा ?”
“भीतर एकदम अंधेरा था, लेकिन हयात हैदर के पास एक छोटी-सी टार्च थी । उस टार्च की सहायता से उसने भीतर झांका और फिर नीचे उतर आया । वह चुपचाप वापस अपनी ड्यूटी पर पहुंच गया ।”
“शैड के भीतर क्या था ?” - सुनील ने उत्सुकतापूर्ण स्वर में पूछा ।
“शेड के भीतर जो कुछ भी था, हयात हैदर ने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था । उसके कथनानुसार वह नीचे से गोल और ऊपर से शंकु के आकार की लगभग चालीस फुट लम्बी कोई चीज थी । वैसी कई चीजें उस शैड में मौजूद थीं और उनमें से अधिकतर पर या तो मोटे कपड़े का खोल चढा हुआ था और या वे तिरपाल से ढकी हुई थीं । केवल एक पर से तिरपाल खिसक गई थी और हयात हैदर उस चीज की सूरत देखने में सफल हो गया था और हमें इतना कुछ मालूम हो सका था कि हमारा मिलिट्री रिसर्च सेक्शन यह फैसला कर सके कि वह वास्तव में क्या हो सकता था ।”
“वह क्या था ?”
“हयात हैदर से मिली सूचनाओं के आधार पर मिलिट्री रिसर्च सैक्शन ने यह नतीजा निकाला है कि वह जर्मन वी-2 से मिलता-जुलता मिडिल रेंज राकेट था । हमारी सूचनाओं के अनुसार वह सबसे पहले सन उन्नीस सौ पैंसठ में पीकिंग में लिब्रेशन डे की फौजी परेड में दिखाया गया था । तब से शायद उसकी डिजाइनिंग में कई परिवर्तन भी हो गये हैं, लेकिन बुनियादी तौर पर हमारा रिसर्च सैक्शन इस बात को पूर्णतया निश्चित कर चुका है कि वह चीन द्वारा निर्मित मिडिल रेंज राकेट ही था । वह रोकट कम-से-कम आठ सौ मील तक मार कर सकता है । कहने का मतलब यह है कि जंग छिड़ जाने पर पेशावर के आस-पास से छोड़े गये वे राकेट हमारी राजधानी से भी आगे पांच-छः सौ मील तक आधे से अधिक हिन्दुस्तान में तबाही मचा सकते हैं ।”
“बशर्ते कि रिसर्च सैंटर की रिसर्च ठीक हो ।”
“करैक्ट । लेकिन हयात हैदर से खरीदी जानकारी के अतिरिक्त भी हमें इस बात का दूसरा प्रमाण शीघ्र ही मिल गया कि पेशावर कैन्ट के आस-पास के इलाके में कहीं भारी मिलिट्री इन्स्टालेशन चल रही है ।”
“क्या ?”
“दस जून को यानी कि आज से दस दिन पहले पेशावर कैन्ट के समीप के बीस मील के एक इलाके को प्रोहिबिटिड एरिया (रक्षित क्षेत्र) घोषित कर दिया गया । उस क्षेत्र में मिलिट्री का सख्त पहरा लग गया है और साधारण नागरिकों के किसी भी प्रकार के वहां आवागमन पर कड़ी पाबन्दी लग गई है ।”
“अर्थात् इस बीस मील के क्षेत्र में कहीं राकेट स्टेशन तैयार किया जा रहा है ?”
“जाहिर है ।”
“लेकिन इतनी देर क्यों ? पेशावर कैन्ट के शैडों में राकेट तो जनवरी में देखे गये और समीप के बीस मील के क्षेत्र को रक्षित क्षेत्र जून में घोषित किया गया ।”
“क्योंकि राकेट कोई खिलौना नहीं होता जिसे जब चाहें जहां ले जाकर खड़ा कर दिया जाये । राकेट बेस तैयार करने के लिए केवल राकेटों की ही जरूरत नहीं होती जैसा कि साधारण आदमी सोचता है । राकेट बेस में राकेट बाद में आते हैं, पहले लांचपैड आते हैं, ब्लास्ट शील्ड बनती हैं, केबल ट्रफ और कण्ट्रोल के लिये इमारतें तैयार की जाती हैं । स्टोरिंग के लिये बंकरों की जरूरत होती है । ईंधन और आक्सीडाइजर्स वगैरह के लिये ट्रेलर चाहिए होते हैं । इतना सारा बखेड़ा पहले होता है, तब कहीं जाकर राकेट आते हैं । राकेट बेस कोई ऐसी चीज नहीं जो रात-भर में चुपचाप तैयार हो जाती हो ।”
“सारी । मुझे राकेटों के बारे में जानकारी नहीं है ।”
“नैवर माइन्ड । राकेटों के बारे में जानकारी की तुमसे अपेक्षा भी नहीं की जाती ।”
“फिर ?”
“फिर एक रात को पेशावर कैन्ट के स्टेशन पर मिलिट्री के विशाल टैंकर ट्रक बड़े-बड़े ट्रेलरों के साथ प्रकट हुए और पेशावर कैन्ट स्टेशन के उत्तरी शैडों में रखा हुआ सारा सामान वहां से निकालकर रक्षित क्षेत्र में पहुंचा दिया गया । जान मैक्सवैल के भरपूर प्रयत्नों के बाद भी हमें यह नहीं मालूम हो सका कि उनके पास वैसे कितने चीनी राकेट हैं और न ही हमें कोई ऐसा प्रमाण मिल सका, जिसे हम संसार की प्रेस के सामने रखकर यह सिद्ध कर सकें कि पाकिस्तान चीन की सहायता से भारी फौजी तैयारियों में जुटा हुआ है और किसी भी क्षण भारत की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है । राकेट बेस के बारे में कोई ठोस जानकारी हासिल करने की खातिर हमने कान्टास एयरवेज के पायलेट पीटर विंस्टन से सम्पर्क स्थापित किया । पीटर विंस्टन कान्टास एयरवेज के एक मालवाहक जहाज का पायलेट है जो सिडनी से रवाना होता है और मनीला, हांगकांग, दिल्ली, तेहरान और वियना होता हुआ लन्दन पहुंचता है । दिल्ली से पीटर विंस्टन को कार्गो फ्लाइट नम्बर 752 के विशाल बोइंग प्लेन से शनिवार रात को टेक आफ करना था और फिर तेहरान में जाकर उतरना था । वैदर ब्यूरो से शनिवार की रात को पश्चिमी पाकिस्तान और अफगानिस्तान के काबुल व कांधार के इलाकों में बेहद गंदा मौसम होने की जानकारी हमें पहले ही हो चुकी थी । बीस हजार पाउंड की मोटी रकम के बदले में पीटर विंस्टन को इस बात के लिए तैयार किया गया था कि वह पश्चिमी पाकिस्तान के ऊपर उड़ते समय अपने नार्मल रूट से लगभग दो सौ मील भटक जाये और तक्षिला और ऐबटाबाद से लेकर खैबरपास तक और कोहाट से दरगई और सैदू शरीफ तक के घेरे को एक चक्कर लगा डाले और उस सारे इलाके की तस्वीरें खींच ले । दिल्ली में उसके प्लेन में पहले से ही एक विशेष कैमरा फिट कर दिया था जो दस हजार फुट तक की ऊंचाई से गन्दे-से-गन्दे मौसम में नीचे की साफ तस्वीर खींच सकता था । इन्सान की आंख को न दिखाई देने वाली चीजों की तस्वीर भी उस कैमरे की आंख से ली जा सकती थी । हमारी स्कीम के अनुसार पीटर विंस्टन हमारा काम करने में सफल हो गया । शनिवार की तूफानी रात को उसने अपने प्लेन को काबुल एयरपोर्ट पर उतारा और गीता सेन को फिल्म दे दी । दुर्भाग्यवश आखिरी क्षण में गीता सेन का एक्सीडेन्ट हो गया और हमारी सारी मेहनत पर पानी फिर गया । हम पीटर विंस्टन के भारत का एस्पियानेज एजेंट होने के इल्जाम में पकड़े जाने का खतरा मोल लिया, इतना ढेर सारा रुपया खर्च किया लेकिन नतीजा फिर भी कुछ नहीं निकला ।”
“आपको इस बात का पूरा भरोसा है कि गीता सेन दुर्घटना की ही शिकार हुई है, उसकी हत्या नहीं की गई है ?”
“मैं पहले ही कह चुका हूं, हर बात यही जाहिर करती है कि गीता सेन दुर्घटना की ही शिकार हुई थी ।”
“लेकिन अगर दुश्मन चालाक हो तो ऐसा स्टेज भी तो सेट किया जा सकता है कि किसी की हत्या कर दी जाये लेकिन वह संयोगवश हो गई दुर्घटना ही मालूम हो । सम्भव है पाकिस्तानियों को पीटर विंस्टन के प्लेन की गतिविधि की खबर हो गई हो ।”
“अगर ऐसा हुआ होता तो या तो वे पीटर विंस्टन के प्लेन को मार गिराते और या फिर उसे जबरदस्ती पाकिस्तान में कहीं प्लेन उतारने पर मजूबर कर देते ।”
“शायद उन्हें पीटर विंस्टन के प्लेन की जानकारी तब हुई हो जब वह पाकिस्तान की हद से बाहर निकल गया हो । पीटर विंस्टन की फ्लाइट के प्रोग्राम से उन्हें मालूम हो गया होगा कि उसका अगला स्टापेज तेहरान में था । उसे काबुल की ओर मुड़ते देखकर उन्हें और भी सन्देह हो गया होगा । शायद काबुल में उनका कोई एजेंट हो और उनके पास उससे तुरन्त सम्पर्क स्थापित करने का साधन भी हो । उन्होंने अपने एजेंट को आदेश दिया हो कि वह काबुल एयरपोर्ट पर पहुंचे और कान्टास एयरवेज की कार्गो फ्लाइट नम्बर 752 को चैक करे । शायद उस पाकिस्तानी एजेंट ने पायलेट को गीता सेन की फिल्म सौंपते देखा हो और बाद में उसने ऐसा इन्तजाम किया हो कि गीता सेन एयरपोर्ट की इमारत से निकलते ही स्टेशन वैगन द्वारा इस तरह कुचल दी जाये कि सारी सिलसिला एक दुर्घटना मात्र ही लगे ।”
“लेकिन मेरी सूचनाओं के अनुसार दुर्घटना गीता सेन की गलती से हुई थी, स्टेशन वैगन के ड्राइवर की गलती से नहीं । एक चश्मदीद गवाह ने गीता सेन को ठोकर खाकर स्टेशन वैगन के सामने गिरते देखा था ।”
“वह संयोग भी हो सकता हैं । और शायद उसी वजह से स्टेशन वैगन का ड्राइवर वहां से भागा नहीं । गीता सेन के ठोकर खाकर सड़क पर गिरने से उसका काम आसान हो गया था । अब वह यह दावा कर सकता था कि गीता सेन सरासर अपनी गलती से स्टेशन वैगन के नीचे आकर कुचली गई थी । सम्भव है अगर गीता सेन ठोकर खाकर न गिरती तो वह जानबूझकर उसे कुचलता हुआ वहां से भाग निकलता । और सम्भावना तो इस बात की भी है गीता सेन के ठोकर खाकर गिरने की बात कहानी ही हो । सम्भव है स्टेशन वैगन के ड्राइवर ने ही यह बात कही हो और सबने - आपके कथित चश्मदीद गवाह न भी - मान ली हो ।”
कर्नल मुखर्जी चिन्तित दिखाई देने लगे । पाइप उनके दांतों में फंसा हुआ था लेकिन वे कश नहीं लगा रहे थे ।
“इसका मतलब तो यह हुआ” - वे चिंतित स्वर में बोले - “कि गीता सेन की एक-एक गतिविधि शत्रुओं की निगाह में थी ?”
“जाहिर है ।”
“लेकिन फिर भी मुझे विश्वास है कि फिल्म उनके हाथ में नहीं आई होगी ।” - कर्नल मुखर्जी जोर देकर बोले - “घटनास्थल पर पुलिस फौरन पहुंच गई थी और उसके बाद किसी को गीता सेन की लाश को या उसके किसी सामान को हाथ लगाने का मौका नहीं मिला था ।”
“आपकी सूचना सारी या किसी हद तक गलत भी हो सकती है ।”
कर्नल मुखर्जी चुप रहे । संदेह का बीजारोपण हो चुका था । उन्हें अब सारा आपरेशन पहले जैसा आसान नहीं लग रहा था ।
“अच्छा है कि तुम काबुल जा रहे हो ।” - वे बोले - “आगे हमें क्या करना है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि गीता सेन की निजी वस्तुओं में तुम्हें फिल्म मिलती है या नहीं । दरअसल फिल्म न मिलने की स्थिति में हमारे लिये इस बात का फैसला करना कठिन हो जायेगा कि पीटर विंस्टन ने गीता सेन को फिल्म दी ही नहीं थी या फिल्म एक्सीडेंट के बाद पाकिस्तानी एजेंटों ने हथिया ली थी - या वह यूं ही एक्सीडेंट के दौरान में या बाद में कहीं गुम हो गई थी ।”
“सर !” - सुनील कुछ क्षण चुप रहने के बाद तनिक बदले स्वर में बोला - “मान लीजिए फिल्म मिल जाती है । उसके बाद आप उस फिल्म का क्या इस्तेमाल निकालना चाहते हैं ?”
“मेरे विभाग का काम तो फिल्म हासिल हो जाने के बाद उसे प्रतिरक्षा मन्त्रालय को सौंप देने से ही खत्म हो जायेगा । उस फिल्म के माध्यम से हमारी सरकार को इस बात की गारंटी हो जायेगी कि पाकिस्तान में वाकई भारी राकेट बम तैयार किया जा रहा है । फिर हम संसार के सामने पाकिस्तान और चीन के गठजोड़ की बात जाहिर कर सकते थे और पाकिस्तान की नीयत का प्रचार कर सकते थे । इससे हमें अपने मित्र राष्ट्रों की सहानुभूति हासिल हो सकती थी और वर्ल्ड प्रेस द्वारा पाकिस्तान की भर्त्सना की जा सकती थी । हमारे लिये वह बात बड़ी फायदे की सिद्ध हो सकती है कि पाकिस्तान की गुप्त सैनिक कार्यवाहियां गुप्त न रह सकें, पाकिस्तान के चेहरे से नकाब उठ जाये और सारे संसार को पता हो जाये कि हमारा पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान हमारा मित्र रहने का इरादा तक नहीं रखता है और यह कि वह ताशकन्द समझौते को तनिक भी महत्व नहीं देता है अभी और यह कि वह कई अन्य एशियाई देशों की तरह पूरी तरह हमारे दूसरे शत्रु राष्ट्र चीन के हाथों का खिलौना बनता जा रहा है ।”
कर्नल मुखर्जी एक क्षण रुके फिर बोले - “यह बात हाल ही में रूस ने भी स्वीकार की है कि चीन ऐशियाई देशों में फूट को बढावा दे रहा है । सोवियत पत्रिका नोवो गोमिया (न्यू टाइम्स) में प्रकाशित एक लेख में इसी सन्दर्भ में भारत-पाकिस्तान और भारत-नेपाल सम्बन्धों तथा सिक्किम व भूटान में कूटनीति तथा चीन द्वारा बर्मा व नागालैण्ड के विद्रोहियों की मदद करने का हवाला दिया गया है । चीन एशियाइयों के विरुद्ध एशियाइयों को लड़वाकर एशिया में अपना प्रभुत्व कायम करना चाहता है । वह भारत और पाकिस्तान के मतभेदों को भड़काकर और दोनों देशों में जंग छिड़वाकर भारत को कमजोर करना चाहता है और पाकिस्तान पर पूरी तरह अपना नियन्त्रण कायम रखना चाहता है । चीन चाहता है कि भारत के हर पड़ोसी राष्ट्र से चाहे वह मित्र है या शत्रु, हमारा मतभेद बना रहे । इसीलिये वह पाकिस्तान को युद्ध की तैयारियों में मदद दे रहा है । वह नेपाल और भारत के सम्बन्धों को खराब करने की कोशिश कर रहा है । चीनी एजेन्ट भूटान और सिक्किम में चालें चल रहे हैं । चीन नागालैंड के विद्रोहियों को शस्त्र दे रहा है । और हमारे सारे देश में चीन समर्थक गद्दार पैदा कर रहा है ताकि हम आपस में ही लड़-भिड़कर शक्तिहीन होते जायें । चीन की यह नीति भारत और पड़ोसी देशों पर ही लागू नहीं होती । चीन सारे एशिया में यही कुछ कर रहा है ।”
“सोवियत संघ ने स्पष्ट शब्दों में आरोप लगाया है कि” - एकाएक कर्नल मुखर्जी बेहद आवेग में आ गये थे - “पीकिंग ने छठे दशक में मलेशिया और इण्डोनेशिया के बीच युद्ध भड़काने और पीकिंग-जकार्ता गुट बनाने की कोशिश की । बर्मा के समाजवादी आन्दोलन में भी उसने अपनी टांग अड़ाई । उसने दो वर्ष पूर्व कम्बोडिया में गड़बड़ी कराई जिससे सिंहानूक को पीकिंग से अपना राजदूत वापस बुलाना पड़ा । उसने लाओस को धमकी दी, फिलिपाइन्स, मलेशिया और इण्डोनेशिया में आन्दोलन के साथ गद्दारी की और अब कम्बोडिया में चीन के हस्तक्षेप के कारण कम्बोडिया अमरीकी साम्राज्यवादियों की गोद में चला गया । अध्यक्ष माओ त्से तुंग और उसके समर्थक दक्षिण एशिया में अपना प्रभुत्व कायम करने के लिये उस समस्त क्षेत्र में सतत आंतरिक संघर्ष की स्थिति पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं । चीनी नेता ऐशिया की जनता को जनयुद्ध के लिये भड़का रहे हैं । वे एशिया के देशों को एक-दूसरे से लड़वाने की कोशिश कर रहे हैं । वे समझते हैं कि ये युद्ध ऐसी सीढी का काम करेंगे जिन पर चढकर चीनी एशिया के एक बड़े भाग पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेंगे ।”
उसी क्षण कार की रफ्तार कम होने लगी ।
सुनील ने देखा कार एयरपोर्ट की इमारत के समीप पहुंच रही थी । एयरपोर्ट कृत्रिम प्रकाश से जगमगाता हुआ दूर से ही दिखाई देने लगा था ।
“पाकिस्तान की फौजी तैयारियों का कोई प्रमाण मिल जाने के बाद” - कर्नल मुखर्जी बोले - “संसार के सामने हमारे द्वारा किया गया पाकिस्तान की नीयत का प्रचार ठहरे हुए पानी में पत्थर फेंकने जैसी क्रिया होगी । लेकिन हम वह पत्थर तब तक नहीं फेंक सकते जब तक कि हमारे पास कोई ठोस प्रमाण न हो । अब तुम्हें उस फिल्म का महत्व अच्छी तरह समझ में आ गया होगा ?”
सुनील ने सहमतिसूचक ढंग से सिर हिलाया ।
“काबुल में तुम होटल मेट्रोपोल में ठहरना ।” - कर्नल मुखर्जी बोले - “वह एक बी क्लास होटल है । तुम्हारी हैसियत के पत्रकार का वैसे ही किसी होटल में ठहरना मुनासिब लगता है । वैसे भी उस होटल में विदेशी टूरिस्ट बहुत ज्यादा ठहरते हैं इसलिये तुम अवांछित व्यक्तियों की सन्दिग्ध निगाहों से बचे रहोगे । तुम्हारी बातों ने मेरे मन में सन्देह का बीजारोपण कर दिया है । अब मुझे भी ऐसा लगने लगा है कि शायद गीता सेन की हत्या की गई हो । ऐसी सूरत में इस बात की पूरी सम्भावना है कि शायद पाकिस्तानी एजेन्ट तुम्हारे जैसे किसी आदमी के काबुल में पदार्पण की प्रतीक्षा ही कर रहे हों । इसलिये मैं तुम्हें सावधान रहने की ओर कोई भी ऐसा काम न करने की चेतावनी दे रहा हूं जिसकी वजह से तुम शत्रुओं की निगाहों में आ जाओ ।”
“मैं ख्याल रखूंगा ।”
“ओ. के. । विश यू गुड लक ।”
“थैंक्यू सर ।”
कार मार्की में आकर रुक गयी ।
सुनील ने अपना छोटा-सा सूटकेस सम्भाला और कार से बाहर निकल आया ।
कर्नल मुखर्जी ने अपने स्थान से हिलने का भी उपक्रम नहीं किया ।
सुनील के कार से बाहर निकलते ही उन्होंने धीरे से अपने और धर्मसिंह के बीच के शीशे के पार्टीशन को खटखटाया ।
धर्मसिंह ने कार फौरन आगे बढा दी ।
***
इंडियन एयरलाइन्स का कैरेवल प्लेन रात के लगभग साढे आठ बजे काबुल एयरपोर्ट पर उतरा ।
आकाश पर बादल छाये हुए थे लेकिन बारिश नहीं हो रही थी ।
कस्टम के बखेड़ों से निकलकर सुनील एयरपोर्ट की इमारत से बाहर निकल आया । उसके गले में उसका कैमरा लटक रहा था और वह अपने दायें हाथ में अपना सूटकेस थामे हुए था ।
बाहर सड़कें अभी भी गीली थी । शायद थोड़ी देर पहले बारिश होकर हटी थी ।
“टैक्सी ।” - मार्की में आकर सुनील ने आवाज लगाई ।
एक टैक्सी उसके समीप आ रुकी ।
सुनील ने टैक्सी की पिछली ओर का दरवाजा खोला । उसने सूटकेस को भीतर रख दिया ।
“होटल मेट्रोपोल ।” - वह अफगान टैक्सी ड्राइवर से बोला और स्वयं भी भीतर बैठने लगा ।
उसी क्षण किसी ने पीछे से उसका कन्धा छुआ ।
“बैग योर पार्डन, सर ।” - साथ ही किसी का शिष्ट स्वर सुनाई दिया ।
सुनील ने पीछे घूमकर देखा ।
पीछे क्षमायाचनापूर्ण मुद्रा बनाये एक सूटधारी व्यक्ति खड़ा था । वह अपने सिर पर लाल रंग की तुर्की टोपी पहने हुए था ।
“यस ?” - सुनील भावहीन स्वर में बोला ।
“आप होटल मोट्रोपोल जा रहे है न ?” - वह पूर्ववत् अंग्रेजी में बोला और साथ ही उसने जल्दी से जोड़ दिया - “मैंने आपको ड्राइवर को कहते सुना था । अगर मुझसे सुनने में गलती नहीं हुई तो...”
“आपसे सुनने में गलती नहीं हुई । मैं होटल मेट्रोपोल ही जा रहा हूं । फरमाइए ?”
“दरअसल मैं होटल मेट्रोपोल में ही ठहरा हुआ हूं । मैंने आपको मेट्रोपोल का नाम लेते सुना तो सोचा, कहकर देखता हूं, शायद आप मेरे साथ टैक्सी शेयर करने के लिये तैयार हो जायें । मीटर का आधा किराया मैं दे दूंगा ।”
इन्कार सुनील की जुबान पर आते-जाते रह गया लेकिन फौरन उसके दिमाग में कर्नल मुखर्जी की चेतावनी गूंज गई । उसने ऐसा कोई काम नहीं करना था जो कि किसी के लिये भी संदेह का विषय बन जाये । सुनील की हैसियत का आदमी परदेस में बचत करने का मौका भला क्यों छोडेगा !
“तशरीफ लाइये ।” - सुनील बोला ।
“थैंक्यू ।” - तुर्की टोपी वाला बोला और झटपट सुनील के पीछे टैक्सी में बैठ गया ।
टैक्सी ड्राइवर ने बुरा-सा मुंह बनाया और टैक्सी आगे बढा दी ।
“आपने टैक्सी ड्राइवर का मूड देखा ?” - तुर्की टोपी वाला बोला ।
“जी हां । देखा ।”
“आपके साथ मेरा बैठना इसे बेहद नागवार गुजरा है ।”
“क्यों ?”
“यह मुझे पहचानता है । अपने धन्धे के सिलसिले में मुझे अक्सर एयरपोर्ट पर आना पड़ता है । यहां से लौटती बार हमेशा मेरी यही कोशिश होती है कि मैं होटल मेट्रोपोल या उसके आस-पास कहीं तक किसी के साथ टैक्सी शेयर कर लूं । इसकी टैक्सी पर मैं पहले भी बैठ चुका हूं । आप बाहर से आये आदमी हैं । आपको होटल मेट्रोपोल तक यह दस मील का चक्कर लगाकर ले जाता । मेरी मौजूदगी में इसकी यह बेईमानी करने की हिम्मत नहीं हो सकती ।”
सुनील ने होंठों पर मुस्कराहट दौड़ गई । विदेशियों को ठगने के मामले में भारत और अफगानिस्तान में कोई अन्तर नहीं था ।
लाल टोपी वाले ने अपने सिर से टोपी उतारी । सुनील ने देखा उसकी खोपड़ी एकदम गंजी थी । उसने अपने सिर पर हाथ फेरा और टोपी दुबारा सिर पर जमा ली और फिर बोला - “शुरू-शुरू में किसी को टैक्सी शेयर करने के लिये कहते समय मुझे बड़ी झिझक होती थी कि कहीं कोई मना न कर दे । लेकिन अब मैं इस मामले में बहुत पक्का हो गया हूं क्योंकि अब मुझे यह बात अच्छी तरह समझ आ गई है कि पैसे की बचत के मामले में बाकी लोगों के सोचने का ढंग भी लगभग मेरे जैसा ही है । परदेस में जो बचत हो जाये वही अच्छी ।”
“आप ठीक कह रहे हैं ।” - सुनील बोला ।
“आप तो हिन्दुस्तानी हैं न ?” - लाल टोपी वाला बोला ।
“जी हां ।” - सुनील बोला - “आपने कैसे जाना ?”
“वाह, साहब, वाह ।” - लाल टोपी वाला जोर का अट्टाहास लगाता हुआ बोला - “यह तो बच्चा भी जान सकता है । चेहरे-मोहरे से आप हिन्दुस्तानी मालूम होते ही हैं, आपका अंग्रेजी बोलने का लहजा भी हिन्दुस्तानियों जैसा है और फिर जिस वक्त आप एयरोड्रोम पर मौजूद थे उस वक्त सिर्फ इंडियन एयरलाइन्स के एक प्लेन ने ही एयरोड्रोम पर लैंड किया था ।”
“आप बहुत होशियार आदमी हैं ।”
“मैंने यह बात होशियारी जताने के लिये नहीं कही थी । मैंने यह बात इसलिये कही थी कि अगर आप हिन्दुस्तानी हैं तो मैं अंग्रेजी की टांग तोड़ना बन्द करूं ।” - इस बार लाल टोपी वाला हिन्दी में बोला ।
“बड़ा अच्छा ख्याल है, साहब ।” - सुनील भी हिन्दुस्तानी में बोला ।
“सिगरेट पीजिये ।” - लाल टोपी वाला अपनी जेब से स्टेट एक्सप्रेस का एक पैकेट निकालकर उसकी ओर बढाता हुआ बोला ।
“शुक्रिया ।” - सुनील बोला । उसने एक सिगरेट ले लिया ।
लाल टोपी वाले ने भी एक सिगरेट निकाल लिया और फिर पहले सुनील का और फिर अपना सिगरेट सुलगा लिया ।
“बन्दे को अब्दुल वहीद कुरेशी कहते हैं ।” - वह सिगरेट का एक गहरा कश लगाता हुआ बोला - “मैं मुम्बई की एक एक्सपोर्ट कम्पनी का प्रतिनिधि हूं ।”
“मेरा नाम सुनील है ।” - सुनील ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया । उसका ख्याल था कि अब उसकी बगल में बैठा आदमी कई तरह के सवालों की झड़ी लगा देगा ऐसा कुछ कुछ नहीं हुआ । अब्दुल वहीद कुरेशी चुपचाप सिगरेट के कश लगाता रहा ।
काबुल की सड़कों पर टैक्सी आगे बढती रही ।
सुनील ने सिगरेट का आखिरी कश लगाकर उसे खिड़की से बाहर फेंक दिया ।
“होटल अच्छा चुना है आपने ।” - एकाएक कुरेशी बोला - “सस्ता है और हर तरह की सहूलियत भी वहां से हासिल है । आपको तो मेट्रोपोल की पहले से ही जानकारी मालूम होती है ।”
“मेरे एक दोस्त ने मुझे मेट्रोपोल में ठहरने की राय दी थी ।”
“बड़ी नेक राय दी थी, साहब । कभी मेरी किसी तरह की मदद की जरूरत हो तो बताइयेगा ।”
“जरूर बताऊंगा ।”
उसी क्षण टैक्सी एक छः मंजिली इमारत के सामने आकर रुकी । इमारत के सामने होटल मेट्रोपोल का विशाल नियोन साइन लगा हुआ था ।
कुरेशी अपनी ओर का दरवाजा खोलकर टैक्सी से बाहर निकला । उसने मीटर पर दृष्टिपात किया और फिर सुनील की मुट्ठी में एक नोट ठूंसता हुआ बोला - “यह लीजिये किराये का मेरा हिस्सा । टैक्सी वाले को तीस अफगानी से ज्यादा मत दीजियेगा ।”
“छोड़िये, मैं दे दूंगा ।” - सुनील बोला ।
“नहीं साहब ।” - कुरेशी बोला - “परदेस में ऐसे मामलों में तकल्लुफ करना मुनासिब नहीं होता ।”
और वह अपनी एड़ियों पर घूमा और होटल में प्रविष्ट हो गया ।
अब्दुल वहीद कुरेशी के प्रति सुनील का रहा-सहा सन्देह भी जाता रहा । उसको पूरी उम्मीद थी कि होटल पहुंचने पर कुरेशी उसके साथ चिपकने की कोशिश करेगा लेकिन अब लगता था कि सुनील में उसकी दिलचस्पी तभी तक थी जब तक कि वह अपनी मंजिल पर नहीं पहुंच गया था । सुनील के साथ चिपकना तो दूर, उसने तो होटल में सुनील के साथ प्रविष्ट होने तक का तकल्लुफ नहीं किया था ।
और न ही एयरपोर्ट से होटल तक के सारे रास्ते में उसने एक भी निजी प्रश्न पूछा था । उसने सुनील को अपनी सहायता की आफर तो दी थी लेकिन यह नहीं बताया था कि होटल के कौन से कमरे में ठहरा हुआ था । लगता था उसने तकल्लुफ में मदद का जिक्र ही किया था वास्तव में उसका सुनील की कोई मदद करने का कोई इरादा नहीं था ।
सुनील ने टैक्सी वाले को तीस अफगानी किराया दिया और अपना सूटकेस और कैमरा सम्भाले टैक्सी से बाहर निकल आया ।
होटल के काउन्टर पर खड़े क्लर्क ने उसे तीसरी मंजिल पर स्थित 315 नम्बर कमरे में बुक कर दिया । होटल का एक कर्मचारी उसे कमरे तक छोड़ आया ।
कमरे में पहुंचकर सुनील ने अपना सूटकेस खोला, उसमें से आवश्यक कागजात निकालकर उसने अपनी जेब के हवाले किये और कमरे से बाहर निकल आया । उसने कमरे को ताला लगाकर चाबी अपनी जेब में रख ली ।
नीचे डायनिंग रूम में पहुंचकर उसने खाना खाया ।
फिर वह कमरे की चाबी बिना रिसेप्शन पर सौंपे होटल से बाहर निकल आया । बाहर आकर वह एक टैक्सी पर सवार हो गया ।
ठीक दस बजे वह काबुल के सिविल हास्पिटल के पूछताछ के काउन्टर पर खड़ा था ।
“मेरा नाम सुनील है ।” - सुनील काउन्टर के पीछे बैठी युवती से अंग्रेजी में बोला - “मैं गीता सेन का पति हूं ।”
“गीता सेन !” - लड़की उलझनपूर्ण स्वर में बोली - “कौन गीता सेन ?”
“जिसका कल रात को एयरपोर्ट के सामने एक्सीडेंट हो गया था । मैं उसका पति हूं और सीधा भारत से आ रहा हूं । मैं अपनी पत्नी की लाश क्लेम करने आया हूं ।”
“लेकिन” - लड़की ने कुछ बोलने का उपक्रम किया, लेकिन फिर कुछ सोचकर चुप हो गई । उसने विचित्र आंखों से एक बार सर से पांव तक सुनील को देखा और फिर होंठों पर एक व्यवसायसुलभ मुस्कराहट लाती हुई बोली - “आप तशरीफ रखिये । मैं अभी अधिकारियों को सूचना देती हूं ।”
“थैंक्यू ।” - सुनील बोला और एक कुर्सी पर बैठ गया । उसके चेहरे पर थकान और गम के वे तमाम भाव झलक रहे थे, जिनकी किसी ऐसे आदमी से अपेक्षा की जाती है, जिसकी पत्नी परदेस में मोटर-दुर्घटना में मर गई हो ।
रिसेप्शनिस्ट ने एक बार सर झुकाये बैठे सुनील की ओर देखा फिर उसने मेज पर रखे टेलीफोन का रिसीवर उठा लिया । उसने तेजी से एक नम्बर डायल किया । कुछ क्षण सम्पर्क स्थापित होने की प्रतीक्षा की और फिर तेजी से ऐसा कुछ कहने लगी जिसका एक भी शब्द सुनील की समझ में नहीं आया । अन्त में उसने रिसीवर को क्रेडल पर रख दिया और फिर सुनील की ओर देखकर मधुर स्वर में बोली - “दि डाक्टर विल बी विद यू इन ए मिनट ।”
सुनील ने सहमतिसूचक ढंग से सर हिलाया और चुपचाप बैठा रहा ।
लगभग पांच मिलट बाद सफेद रंग का कोट पहने एक व्यक्ति रिसेप्शन पर प्रकट हुआ । उसने प्रश्नसूचक आंखों से रिसेप्शनिस्ट की ओर देखा । रिसेप्शनिस्ट ने सुनील की ओर संकेत कर दिया ।
“गीता सेन के पति आप हैं ?” - सफेद कोट वाला सुनील से बोला ।
“जी हां ।” - सुनील ने गमगीन स्वर में बोला ।
“यू आर मिस्टर...”
“सुनील ।”
“यस, मिस्टर सुनील । भारत से कब आये आप ?”
“सीधा चला आ रहा हूं ।”
“मेरा नाम डाक्टर सरवरी है । मैंने गीता सेन का, मेरा मतलब है आपकी पत्नी का, पोस्टमार्टम किया था । मुझे आपकी पत्नी की मौत का अफसोस है ।”
सुनील चुप रहा ।
“मेरे साथ तशरीफ लाइये ।” - डाक्टर सरवरी बोला ।
सुनील उठकर उसके साथ हो लिया ।
“आपको अपनी पत्नी की मृत्यु की सूचना कैसे मिली ?” - रास्ते में डाक्टर ने पूछा ।
“मुझे मेरे देश के विदेश मंत्रालय ने सूचना दी थी ।”
“कैसे ?”
“कैसे क्या मतलब ?”
“मतलब यह कि आपके पास कोई टेलीफोन आया था, कोई संदेशवाहक आया था या आपको पत्र लिखा गया था ।”
“मुझे पत्र लिखा गया था ।”
“फिर तो आप बहुत जल्दी काबुल पहुंचे । आपके विदेश मंत्रालय ने भी आपको सूचित करने में बड़ी फुर्ती दिखाई । इस संदर्भ में मुझे आपके डाक-तार विभाग और हवाई सेवा दोनों की तारीफ करनी पड़ेगी । अगर भगवान न करे मेरे साथ ऐसा हादसा हुआ होता, मेरा मतलब है कि अगर मेरी पत्नी भारत में कहीं दुर्घटना की शिकार होकर जान खो बैठती, तो चार-पांच दिन तक मुझे इसकी खबर भी नहीं मिलती और उसके बाद पता नहीं कितना समय भारत के लिये एयर पैसेज बुक करने में लग जाता ।”
सुनील चुप रहा ।
डाक्टर सरवरी उसे एक आफिसनुमा कमरे में ले आया ।
“आप यहां तशरीफ रखिये ।” - डाक्टर सरवरी एक विशाल आफिस टेबल के समीप पड़ी कुर्सियों में से एक की ओर संकेत करता हुआ बोला - “मैं मृत शरीर के रिलीज के कागजात तैयार करवाता हूं ।”
सुनील ने सहमतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया और एक कुर्सी पर बैठ गया ।
डाक्टर सरवरी कमरे से विदा हो गया ।
सुनील कमरे में अकेला बैठा रहा ।
पांच मिनट गुजर गये ।
सुनील बेचैनी से पहलू बदलने लगा ।
उसी क्षण कमरे का द्वार खुला ।
सुनील ने आशापूर्ण नेत्रों से द्वार की ओर देखा और हड़बड़ाकर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ ।
“हैंड्स अप !” - द्वार पर एक पुलिस इन्स्पेक्टर खड़ा था और उसकी रिवाल्वर सुनील की ओर तनी हुई थी ।
सुनील ने तत्काल हाथ उठा दिये ।
कमरे में चार पांच सिपाही घुस आये । एक ने उसके हाथों को इकट्ठा किया और उनमें हथकड़ी लगा दी ।
सब कुछ पलक झपकते ही हो गया ।
इन्स्पेक्टर ने रिवाल्वर होलस्टर में रख ली और कमरे में प्रविष्ट हो गया । उसके पीछे ही डाक्टर सरवरी भी था । उसके होंठों पर कुटिल मुस्कराहट थी ।
“मिस्टर सुनील !” - डाक्टर बोला - “अब आप हमें यह बतायेंगे कि वास्तव में आप कौन हैं ?”
तब तक शॉक की स्थिति गुजर चुकी थी । वह अपने हथकड़ी लगे हाथ अपने सामने फैलाता हुआ क्रोधित स्वर में बोला - “पहले आप लोग मुझे यह बतायेंगे कि इस हरकत का क्या मतलब है ?”
“जैसे आपको नहीं मालूम ।” - डाक्टर बोला ।
“आप अपना थोबड़ा बन्द रखिये ।” - सुनील गला फाड़कर चिल्लाया ।
डाक्टर सहमकर चुप हो गया ।
“आफिसर !” - सुनील इन्स्पेक्टर से सम्बोधित हुआ - “मैं तुमसे पूछता हूं, इस हरकत का क्या मतलब है ?”
“आप मेरे साथ पुलिस स्टेशन चलेंगे ।” - इन्स्पेक्टर बोला - “वहीं आपके हर सवाल का जवाब दिया जायेगा ।”
“लेकिन मुझे मालूम तो हो कि मेरा अपराध क्या है ?”
“पुलिस स्टेशन पर आपको सब कुछ मालूम हो जायेगा ।”
“लेकिन...”
“बहस करने में कोई फायदा नहीं होगा, मिस्टर ।”
सुनील चुप हो गया ।
इन्स्पेक्टर के संकेत पर वह इन्स्पेक्टर और सिपाहियों के साथ कमरे से बाहर निकल आया और गलियारे में आगे बढ चला ।
सुनील पुलिस वालों के साथ एक बड़ी-सी जीप पर बैठ कर पुलिस स्टेशन पहुंच गया ।
इन्स्पेक्टर उसे एक कमरे में ले आया ।
“आपका नाम ?” - इंस्पेक्टर ने उससे प्रश्न पूछने आरम्भ किये ।
“सुनील ।” - सुनील कठिन स्वर में बोला ।
“पूरा नाम बताइये ।”
“सुनील कुमार चक्रवती ।”
“गीता सेन आपकी पत्नी थी ?”
“जी हां ।”
“आप कोई ऐसा सबूत पेश कर सकते हैं जिससे यह जाहिर हो कि गीता सेन आपकी पत्नी थी ?”
“मैं ऐसे कई सबूत पेश कर सकता हूं लेकिन पहले मेरे हाथों से हथकड़ी निकलवाइये ।”
इंस्पेक्टर कुछ क्षण हिचकिचाया, फिर वह बगल में खड़े सिपाही से अपनी भाषा में कुछ बोला ।
सिपाही ने आगे बढकर सुनील के सारे शरीर को थपथपाकर देखा कि कहीं उसके पास कोई हथियार तो नहीं था । हर प्रकार से सन्तुष्ट हो चुकने के बाद उसने सुनील के हाथों से हथकड़ी निकाल ली ।
सुनील ने अपनी जेब से एक खाकी रंग का लम्बा लिफाफा निकाला और उसमें से कुछ कागजात निकाले ।
“यह मेरी और गीता सेन की शादी का सर्टीफिकेट है ।” - सुनील एक कागज खोलकर इन्स्पेक्टर के सामने रखता हुआ बोला - “यह विदेश मन्त्रालय से मुझे लिखी गई चिट्ठी है जिसके माध्यम से मुझे यह सूचित किया गया है कि मेरी पत्नी गीता सेन का एक मोटर एक्सीडेन्ट में देहान्त हो गया है । यह मेरा राजनगर से काबुल तक का हवाई जहाज का टिकट है जिससे यह जाहिर होता है कि मैं सीधा हिन्दुस्तान से यहां आ रहा हूं । यह मेरा प्रेस कार्ड है जिससे यह जाहिर होता है कि मैं ब्लास्ट नाम के अखबार का कारस्पान्डेन्ट हूं और जिस पर मेरी तस्वीर लगी हुई है जो निर्विवाद रूप से यह सिद्ध करती है कि इन कागजात में जिस सुनील कुमार चक्रवर्ती का जिक्र है, वह मैं हूं । इसके अतिरिक्त आप चाहें तो आप भारत के सरकारी अधिकारियों से पूछताछ कर सकते हैं । अपनी पत्नी की लाश लेने के लिये मेरे यहां आने की सूचना हमारे काबुल स्थित दुतावात को भी है । आप दूतावास में फोन कीजिये या मुझे बात करने की इजाजत दीजिये । अपनी हकीकत के बारे में मैं आपका रहा-सहा सन्देह भी दूर कर दूंगा ।”
इंस्पेक्टर बड़ी बारीकी से कागजों की जांच करने लगा । अन्त में उसने कागज एक ओर सरका दिये । उसके चेहरे पर चिन्ता के लक्षण परिलक्षित हो रहे थे ।
“समझ में नहीं आता” - इंस्पेक्टर यूं बड़बड़ाया जैसे अपने आप से बातें कर रहा हो - “कि किसी दूसरे आदमी को आपकी पत्नी की लाश में क्या दिलचस्पी हो सकती थी !”
“क्या मतलब ?” - सुनील चौंककर बोला ।
“दरअसल बात यह है, मिस्टर सुनील” - इंस्पेक्टर गम्भीरता और खेदपूर्ण स्वर में बोला - “कि थोड़ी ही देर पहले एक दूसरा आदमी अपने आपको गीता सेन का पति बताकर गीता सेन का मृत शरीर क्लेम कर चुका है ।”
“कब ?” - सुनील के मुंह से अपने आप निकल गया ।
“आपके तशरीफ लाने के लगभग दो घण्टे पहले ।”
“और मेरी पत्नी का निजी सामान ?”
“गीता सेन का निजी सामान, जो कि हमें दुर्घटनास्थल पर लाश के आस-पास बिखरा मिला था, भी उसी आदमी को सौंपा जा चुका है ।”
“लेकिन आप लोगों ने किसी गलत आदमी को लाश सौंप कैसे दी ?”
“आपके प्रकट होने से पहले तो हमें वह गलत आदमी नहीं लग रहा था, साहब ।” - इन्स्पेक्टर खेदपूर्ण स्वर में बोला - “आप खुद ही सोचिए, एक आदमी बद्हवास-सा आंसू बहाता हुआ हस्पताल में पहुंचता है और कहता है कि वह गीता सेन का पति है और सीधा भारत से आ रहा है । वह हमें एक पत्र दिखाता है जिससे जाहिर होता है कि उस आदमी को आपके देश के विदेश मन्त्रालय द्वारा उसकी पत्नी की मृत्यु की सूचना दी गई है । सन्देह का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता है । आखिर कोई आदमी खामखाह किसी मृत औरत को अपनी पत्नी क्यों बतायेगा ?”
“आपने उस आदमी को लाश सौंप दी ?”
“जी हां । लाश भी और उनका निजी सामान भी । हमने उससे रिलीज पर साइन करवाये और गीता सेन की लाश और उसका निजी सामान उसके हवाले कर दिया ।”
“विदेश मन्त्रालय की जो चिट्ठी उस आदमी ने आपको दिखाई थी, वह जरूर जाली थी ।” - सुनील आवेशपूर्ण स्वर में बोला - “आपको उस आदमी से कोई ठोस प्रमाण मांगना चाहिए था ।”
“ठोस प्रमाण तो हम तब मांगते जब हमें उसकी हकीकत पर सन्देह होता । हमें तो ख्वाब में भी नहीं सूझा था कि जो आदमी गीता सेन की लाश क्लेम करने आया था, वह वास्तव में उसका पति नहीं था । हमें आपकी हकीकत पर सन्देह हुआ तो आपने देखा ही है कि हमने आपको क्या ट्रीटमेंट दिया है । और अब लग रहा है, साहब, कि वह आदमी बहुत बड़ा अभिनेता था । अपनी पत्नी की लाश देखकर वह फूट-फूट कर रोया था और उसने बड़े करुण स्वर से हमसे प्रार्थना की थी कि दुर्घटनास्थल पर मिली गीता सेन की छोटी-से-छोटी चीज, चाहे वह हेयर पिन ही क्यों न हो, उसे लौटा दी जाये । उसके कथनानुसार उसकी पत्नी की हर चीज उसके लिए उसकी आखिरी निशानी थी और उसे जी-जान से प्यारी थी । हम उसकी भावविहलता से इतने प्रभावित हुए थे कि हमने वाकई बड़ी सावधानी से गीता सेन की मामूली-से-मामूली चीज उसे सौंप दी थी ।”
“क्या आप बता सकते हैं कि मेरी पत्नी की निजी वस्तुएं क्या-क्या थीं जो उस बहुरूपिये को सौंपी गई थीं ?”
“जी हां । हमारे पास कम्पलीट लिस्ट है ।” - और इन्स्पेक्टर ने मेज की दराज खोलकर एक टाइप की हुई लिस्ट उसकी ओर बढा दी ।
सुनील ने सावधानी से लिस्ट पढनी आरम्भ कर दी । वे पन्द्रह आइटम थीं जो कोई भी कामकाजी लड़की साधारणतया अपने पर्स में रखती थी । लिस्ट में लगभग बारह सौ अफगानी के नोटों का जिक्र था लेकिन बीस हजार पाउण्ड का जिक्र नहीं था । न ही लिस्ट में किसी कैमरा फिल्म का जिक्र था ।
“घटनास्थल पर इन चीजों के अतिरिक्त आपको कुछ नहीं मिला था ?”
“जी नहीं । क्या आप किसी विशेष वस्तु के बारे में पूछना चाहते हैं ?
“जी नहीं । उस आदमी ने आपना नाम क्या बताया था ?”
“सुधीर सेन ।”
“उसने लाश की अपनी पत्नी के रूप में विधिवत् शिनाख्त की थी ?”
“विधिवत् शिनाख्त से अगर आपका यह मतलब है कि हमने पहले सुधीर सेन को गीता सेन का हुलिया बयान करने के लिए कहा हो और फिर उसे लाश दी हो तो ऐसा नहीं हुआ था । मैं पहले ही निवेदन कर चुका हूं कि हमें ख्वाब में भी नहीं सूझा था कि सुधीर सेन फ्राड हो सकता था । वह रोता-बिलखता अस्पताल आया, उसने स्वयं को गीता सेन का पति बताया, हम उसे सीधे गीता सेन की लाश के पास ले गये और फिर छुट्टी ।”
“यानी कि आपके पास यह जानने तक का साधन भी नहीं है कि वास्तव में वह मेरी पत्नी को सूरत से पहचानता भी था या नहीं ।”
इन्स्पेक्टर ने हिचकिचाते हुए सहमतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ?”
सुनील निराश हो गया ।
भरपूर चोट हो चुकी थी ।
“अब आप क्या करेंगे ?” - उसने इन्स्पेक्टर से पूछा ।
“सुधीर सेन नाम के उस फ्राड को आपकी पत्नी की लाश ले जाए अभी ज्यादा देर नहीं हुई है । हम उसे तलाश करने में कोई कसर उठा नहीं रखेंगे ।”
“मेरी पत्नी के निजी सामान की लिस्ट में उसके फ्लैट की चाबियों का भी जिक्र है । सम्भव है वह आदमी वहां भी जाये ।”
“मैं अभी वहां पहरा बिठवाता हूं ।” - वह एक सिपाही की ओर घूमा । अपनी भाषा में उसने सिपाही को कोई आदेश दिया । सिपाही फौरन वहां से रवाना हो गया ।
“आप लोगों की लापरवाही की वजह से मुझे अपनी पत्नी के आखिरी दर्शन भी नसीब नहीं हुए ।” - सुनील गमगीन स्वर में बोला ।
“हमें अफसोस है ।” - इन्स्पेक्टर बोला - “हमारी वजह से आपको जो परेशानी हुई उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं ।”
“नैवर माइन्ड ।” - सुनील अपने स्थान से उठता हुआ बोला - “मैं होटल मेट्रोपोल में ठहरा हुआ हूं । अगर कोई नई बात हो तो मुझे जरूर और फौरन सूचित कीजिएगा ।”
“जरूर करेंगे, साहब ।” - इन्स्पेक्टर भी उठ खड़ा हुआ - “चलिये, मेट्रोपोल तक मैं आपको जीप पर छोड़ आता हूं ।”
“कोई जरूरत नहीं ।” - सुनील बोला - “दरअसल मैं इस समय अच्छे मूड में नहीं हूं । मैं थोड़ी देर तनहाई चाहता हूं । जरा थोड़ी देर पैदल चलूंगा और फिर मेट्रोपोल के लिए टैक्सी ले लूंगा ।”
“जैसी आपकी इच्छा ।” - इन्स्पेक्टर सहानुभूतिपूर्ण स्वर में बोला - “आइये, आपको बाहर छोड़ आऊं ।”
सुनील इन्स्पेक्टर के साथ हो लिया ।
***
सुनील ने होटल मेट्रोपोल के अपने कमरे में कदम रखा और दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया । वह एक कुर्सी पर ढेर हो गया और पिछली घटनाओं पर विचार करने लगा । गीता सेन की लाश का जो अंजाम हुआ था, उससे उसे और भी विश्वास हो गया था कि उसकी हत्या की गई थी और उसे पीटर विंस्टन द्वारा सौंपी गई फिल्म की खातिर ही उसकी हत्या की गई थी । शत्रुओं ने बड़ी हिम्मत और चालाकी से गीता सेन की लाश और उसका सारा निजी सामान हथिया लिया था और अब तक फिल्म निश्चय ही उन लोगों के हाथ में पहुंच चुकी थी । अब वर्तमान स्थिति में काबुल में सुनील के लिए करने लायक कुछ नहीं रह गया था । सुबह उसने भारतीय दूतावास से राजनगर में कर्नल मुखर्जी को फोन करके सारी स्थिति की सूचना दे देनी है और फिर छुट्टी । कर्नल मुखर्जी ने निश्चय ही उसे फौरन वापस आने के लिए कह देना था ।
सुनील कुर्सी से उठा । उसने सूटकेस में से अपना नाइट सूट निकाल लिया और फिर कोट उतारकर कुर्सी की पीठ पर डाल दिया । उसने टाई की गांठ ढीली की और...
उसी क्षण किसी ने बाहर से कमरे का दरवाजा खटखटाया ।
सुनील ने आगे बढकर दरवाजा खोला ।
बाहर होटल का एक वेटर खड़ा था ।
“आपका टेलीफोन है ।” - वह आदरपूर्ण स्वर में बोला ।
“मेरा टेलीफोन !” - सुनील आश्चर्यपूर्ण स्वर में बोला ।
“नीचे रिसेप्शन पर ।”
सुनील कमरे से बाहर निकल आया । उसने द्वार बन्द करके बाहर से ताला लगाया और वेटर के साथ हो लिया ।
सीढियों पर उसे ऊपर आता हुआ कुरेशी मिल गया ।
“हल्लो ।” - कुरेशी बोला ।
“हल्लो ।” - सुनील ठिठककर बोला ।
“आराम से तो हैं आप ?”
“जी हां । कृपा है ।”
कौन-सा कमरा मिला ?”
“315 नम्बर ।”
“वैरी गुड । कोई मेरे लायक सेवा हो तो बताइयेगा ।”
“जरूर, साहब ।”
कुरेशी आगे बढ गया ।
सुनील फिर सीढियां उतरने लगा ।
रिसेप्शन काउन्टर पर रिसीवर टेलीफोन के क्रेडल से नीचे पड़ा था । सुनील ने रिसीवर उठाकर कान से लगा लिया और बोला - “हल्लो !”
“सुनील साहब बोल रहे हैं ?” - दूसरी ओर से आवाज आई ।
“यस ।”
“सनील साहब, मैं शेरजादा बोल रहा हूं ।”
“शेरजादा ?” - सुनील ने उलझनपूर्ण स्वर में नाम दोहराया ।
“जी हां । इन्स्पेक्टर शेरजादा । अभी थोड़ी देर पहले पुलिस स्टेशन पर आपसे मुलाकात हुई थी । शायद मैं आपको अपना नाम बताना भूल गया था ।”
अब तक सुनील दूसरी ओर से बोलने वाले को आवाज से भी पहचान चुका था । लाइन पर वही पुलिस इन्स्पेक्टर था जिसने हस्पताल में उसे गिरफ्तार किया था ।
“मैं आपको पहचान गया ।” - सुनील बोला - “फरमाइये, कैसे याद किया ?”
“क्या आप अभी पुलिस स्टेशन आ सकते हैं ?”
“क्या बात हो गई है ?”
“हमें दुर्घटनास्थल से आपकी पत्नी की एक-दो चीजें और मिल गई हैं । शायद वे आपके किसी काम की हों ।”
“मैं आता हूं ।” - सुनील बोला और उसने सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया ।
वह वापस अपने कमरे में आया । उसने टाई की गांठ ठीक की, कोट पहना और फिर कमरे से बाहर निकल आया ।
होटल से बाहर आकर उसने एक टैक्सी की और सीधा पुलिस स्टेशन पहुंच गया । वह इंस्पेक्टर शेरजादा के कमरे में पहुंचा ।
“आइये ।” - इंस्पेक्टर बोला ।
सुनील एक कुर्सी पर ढेर हो गया और बोला - “क्या मिला है ?”
इंस्पेक्टर ने अपनी मेज का एक दराज खोला और उसमें से निकालकर दो वस्तुएं सुनील के सामने मेज पर रख दीं ।
सुनील ने देखा,एक सुनहरी खोल वाली लिपस्टिक थी और दूसरी चीज...
दूसरी चीज एल्यूमीनियम का एक वैसा खोल था जिसके अन्दर फिल्में रखी जाती हैं ।
सुनील का दिल तेजी से धड़कने लगा लेकिन उसने अपने चेहरे पर किसी तरह की उत्तेजना या उत्कंठा नहीं झलकने दी । एकाएक वह एकदम गम्भीर हो उठा । उसने धीरे से हाथ बढाकर लिपस्टिक उठा ली और भावविहृल नेत्रों से उसे देखने लगा । कुछ क्षण बाद उसने एल्यूमीनियम का खोल उठाया । खोल के वजन से ही उसे महसूस हो गया कि भीतर फिल्म थी । उसने धीरे से खोल का ढक्कन खोला और भीतर झांका । भीतर फिल्म मौजूद थी । सुनील ने ढक्कन बन्द कर दिया ।
“यह दोनों चीजें केवल आधा घण्टा पहले मेरे अधिकार में आई हैं ।” - इंस्पेक्टर शेरजादा बोला - “लगता है दुर्घटना के बाद ये दोनों चीजें गीता सेन के जिस्म से छिटककर सड़क के किनारे के बरसाती पानी के एक छोटे से खड्डे में जा गिरी थीं और तफ्तीश के दौरान में हमारी निगाह इन पर नहीं पड़ी थी । बरसात बन्द होने के बाद खड्डे में से पानी काफी हद तक निकल गया था और बीट के सिपही को ये दोनों चीजें वहां दिखाई दे गई थीं । उसने ये चीजें पुलीस स्टेशन जमा करवा दी थीं । हालांकि मैं दावे से तो नहीं कह सकता लेकिन हालात यही जाहिर करते हैं कि ये दोनों चीजें गीता सेन की हैं ।”
“ये दोनों चीजें जरूर मेरी पत्नी की हैं ।” - सुनील भावविहृल स्वर में बोला - “मैं इस लिपस्टिक को पहचानता हूं । यह बड़े असाधारण शेड की लिपस्टिक है । अधिकतर महिलायें ये शेड पसन्द नहीं करतीं, लेकिन मेरी पत्नी को केवल यही शेड पसन्द था ।”
“और फिल्म ?”
“फिल्म भी जरूर मेरी पत्नी की होगी । इंस्पेक्टर साहब, शायद उसमें गीता की तस्वीरें हो । क्या आप ये दोनों चीजें मेरे सुपुर्द कर सकते हैं ?”
“क्यों नहीं ? क्यों नहीं ? यह आप ही की तो प्रोपर्टी है, साहब । इसीलिये तो मैंने आपको पुलिस स्टेशन बुलाया है । मैंने सोचा आप अपनी पत्नी की आखिरी निशानी देखकर खुश होंगे ।”
“बहुत-बहुत मेहरबानी, इंस्पेक्टर साहब ।” - सुनील कृतज्ञतापूर्ण स्वर में बोला, उसने दोनों चीजें अपने कोठ की भीतरी जेब में डाल लीं, फिर वह अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ । उसने इंस्पेक्टर से हाथ मिलाया और अपने चेहरे पर मनहूसियत दर्शाता हुआ वहां से विदा हो गया ।
पुलिस स्टेशन के बाहर से उसने फिर एक टैक्सी पकड़ी और अपने होटल में पहुंच गया । अपने कमरे में आकर उसने कमरे का द्वार भीतर से बंद कर लिया और द्वार के हैंडल के नीचे एक कुर्सी की पीठ अटका दी । उस हालत में द्वार का हैंडल बाहर से नहीं घुमाया जा सकता था ।
उस ने कपड़े बदले और बिस्तर पर आ लेटा ।
केवल संयोग से ही फिल्म उसके हाथ लग गई थी । शत्रुओं की होशियारी से चारों खाने चित्त हो जाने के बावजूद भी वह अपने अभियान में सफल हो गया था । उसे इस बारे में रंचमात्र भी संदेह नहीं था कि यह वही फिल्म थी जो पीटर विंस्टन ने गीता सेन को दी थी । वह एक विशेष प्रकार की फिल्म थी जिसके बारे में कर्नल मुखर्जी उसे पहले ही काफी डिटेल से समझा चुके थे । यह भी अच्छा हुआ था कि फिल्म का एल्युमीनियम का खोल वाटरप्रूफ था और इस इसलिये बरसात का पानी खोल के भीतर नहीं घुस पाया था ।
उसने कमरे की बत्ती बुझा दी और फिल्म को तकिये के नीचे रख दिया ।
कुछ क्षण वह आंखें खोले लेटा रहा ।
फिर यकायक उसे एक ख्याल आया । वह बिस्तर पर उठकर बैठ गया । बिना बत्ती जलाये उसने बगल की मेज पर पड़े कैमरे की ओर अपना हाथ बढा दिया । उसने अपने कैमरे के भीतर पड़ी फिल्म को बाहर निकाल दिया । उसने तकिये के नीचे से पीटर विंस्टन वाली फिल्म निकाल ली । उसने एल्यूमिनियम के खोल में से पीटर विंस्टन वाली फिल्म निकालकर अपने कैमरे में डाल ली और कैमरा बंद कर दिया, फिर उसने कैमरे से निकला साधारण, अनएक्सपोज्ड फिल्म का स्पूल एल्यूमीनियम के खोल में रख दिया ।
उसका हाथ दोबारा तकिये की ओर बढ़ा ही था कि यकायक उसके कानों में हल्की-सी खट की आवाज आई । आवाज इतनी मद्धिम थी कि अगर उस समय वहां पूर्ण शांति न होती और सुनील तीव्र श्रवण शक्ति का स्वामी न होता तो वह आवाज उसे कभी सुनाई न देती । सुनील की दृष्टि अपने-आप ही दरवाजे की ओर उठ गई ।
कोई बाहर से बड़ी सावधानी से हैंडल को घुमाने की कोशिश कर रहा था लेकिन हैंडल के नीचे कुर्सी की पीठ अटकी होने के कारण हैंडल अपनी जगह से जरा-सा हिल कर रह गया था । संयोगवश ही सुनील बत्ती बुझाने के बाद भी काफी देर तक जागता रहा था । अगर वह सो चुका होता तो बाहर से हैंडल घुमाये जाने की खबर उसे हरगिज नहीं हो पाती ।
सुनील बिना हिले-डुले चुपचाप पलंग पर बैठा रहा । उसके नेत्र द्वार पर टिके हुए थे ।
फिर बाहर से किसी ने हैंडल छोड़ दिया । हैंडल जो रंचमात्र अपनी जगह से हिला था, वापस अपनी पहली हालत में आ गया ।
सुनील अपनी जगह से उठा और दबे पांव द्वार की ओर बढा । अभी वह द्वार से दो कदम दूर ही था कि किसी ने बाहर से द्वार खटखटा दिया ।
सुनील अपनी जगह पर ठिठककर खड़ा हो गया । कुछ क्षण वह अनिश्चय की मुद्रा में खड़ा रहा, फिर उसने पलंग पर से कैमरा उठाकर वापस मेज पर रख दिया और एल्यूमीनियम के खोल में रखी फिल्म को तकिये के नीचे रख दिया । उसने कमरे की बत्ती जला दी और द्वार के समीप पहुंचा । धीरे से उसने हैंडल के नीचे से कुर्सी निकाली और उसे एक ओर रख दिया । फिर उसने द्वार खोल दिया ।
बाहर अब्दुल वहीद कुरेशी खड़ा था ।
कुरेशी के होंठों पर मुस्कराहट थी और वह अपने हाथ में एक बुझा हुआ सिगार थामे हुए था ।
“गुस्ताखी माफ, साहब ।” - वह मीठे स्वर में बोला - “सो गये थे क्या ?”
“न... हीं ।” - सुनील अनिश्चयपूर्ण स्वर में बोला ।
“मेरी माचिस में एक ही तीली थी जिससे मैंने यह सिगार सुलगाया था ।” - कुरेशी अपना सिगार वाला हाथ ऊंचा करता हुआ बोला - “माचिस खाली हो गई और फिर सिगार बुझ गया । बरसात का मौसम है न ! सिगार सील गया था । मेरी कुछ ऐसी आदत हो गई है कि जब तक रात को सोने से पहले एक-डेढ इंच सिगार न पी लूं, मुझे नींद नहीं आती । नीचे माचिस मांगने जा रहा था । आपके कमरे के समीप से गुजरा तो ख्याल आया, क्यों न आपसे ही माचिस मांगूं ! इससे मैं तीन मंजिल सीढियां उतरने की जहमत से बच जाऊंगा ।”
सुनील ने एक उड़ती-सी दृष्टि सर से पांव तक कुरेशी पर डाली । वह एक चायना सिल्क के गाउन में लिपटा हुआ था । तुर्की टोपी की अनुपस्थिति की वजह से उसका गंजा सर कृत्रिम प्रकाश में अण्डे की तरह चमक रहा था । उसके चेहरे पर आत्म-विश्वास की छाप थी और उसके किसी भी एक्शन से यह जाहिर नहीं होता था कि जो कुछ वह कह रहा है, वह सच नहीं था ।
“ओह, श्योर ।” - सुनील अपने होंठों पर मुस्कराहट लाता हुआ बोला - “मैं अभी माचिस हाजिर करता हूं ।”
सुनील द्वार से वापस घूमा और मेज की ओर बढा जिस पर उसके कैमरे की बगल में लक्की स्ट्राइक का पैकेट और माचिस पड़ी थी । उसने जान-बूझकर कुरेशी को भीतर आने के लिये नहीं कहा था लेकिन कुरेशी लापरवाही से चलता हुआ लगभग उसके साथ ही कमरे में प्रविष्ट हो गया ।
सुनील ने मेज से माचिस उठाकर उसके हाथ में दे दी ।
“थैंक्यू ।” - कुरेशी माचिस लेता हुआ बोला - “आप सिगरेट पीजिये ।”
“नहीं” - सुनील बोर-सा होता हुआ बोला - “मेरी इच्छा नहीं है ।”
“वैसे, सुनील साहब” - कुरेशी विनोदपूर्ण स्वर में बोला - “मैंने आपका दरवाजा खटखटाने से पहले एक बहुत गलत हरकत की थी । अगर आपकी निगाह उस पर पड़ गई होती तो आप मुझे न जाने कैसा आदमी समझ बैठते !”
“कैसी हरकत ?”
“यानी कि मेरी उस बेहूदा हरकत पर आपकी वाकई निगाह नहीं पड़ी ?”
“लेकिन, कुरेशी साहब” - सुनील तनिक झुंझलाये स्वर में बोला - “जब तक आप मुझे बतायेंगे नहीं, मुझे कैसे पता चलेगा कि आप किस गलत हरकत का जिक्र कर रहे हैं ?”
“करैक्ट ।” - कुरेशी उसकी झुंझलाहट की ओर तनिक भी ध्यान दिये बगैर बोला - “मैं भी कैसा अहमक हूं । दरअसल बात यह है साहब कि मेरे में एक बड़ी गन्दी आदत है । दरवाजा खटखटाने से पहले मेरा हाथ आदतन दरवाजे के हैंडल की ओर बढ जाता है और हैंडल घुमा देता हूं । मैं समझता हूं कि यह एक गलत हरकत है, लेकिन जनाब, क्या बताऊं, आदत से मजबूर हूं । यह गलत हरकत पहले कर चुका होता हूं तो मुझे ख्याल आता है कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिये था । आपका दरवाजा खटखटाने से पहले से भी मैंने यही किया था । अगर आप मुझे हैंडल घुमाते देख लेते तो शायद आप यही समझते कि कोई चोर भीतर घुसने की कोशिश कर रहा था ।”
और वह यूं जोर से हंसा जैसे उसने भारी मजाक की बात कह दी हो ।
सुनील के मस्तिष्क में से कुरेशी के प्रति उत्पन्न शंका के बादल घटने लगे । उसके होंठों पर मुस्कराहट आ गई ।
कुरेशी ने अभी तक अपना सिगार सुलगाने का उपक्रम नहीं किया था
“टाइम क्या हो गया है ?” - सुनील संकेतात्मक स्वर में बोला ।
“एक बजने को है ।” - कुरेशी घड़ी देखकर मशीनी स्वर में बोला । वह क्षण-भर ठिठका और फिर यूं बोला जैसे उसे कोई भूली बात याद आ गई हो - “ओह, आई एम टैरीबली सारी । मैं आपको खामखाह लेट करवाये जा रहा हूं ।”
कुरेशी ने माचिस जलाकर अपना सिगार सुलगाया, फिर माचिस को उसने फूंक मारकर बुझा दिया । बुझी हुई तीली को हाथ में थामे उसने दायें-बायें दृष्टि दौड़ाई ।
ऐश-ट्रे मेज पर रखी थी ।
कुरेशी बुझी हुई तीली हाथ में थामे मेज की ओर बढा । मेज के समीप पहुंचकर उसने बुझी हुई तीली ऐश-ट्रे में डाल दी और माचिस भी वहीं मेज पर रख दी । सिगार का लम्बा कश लेता हुआ वह वापस घूमा । फिर यकायक पता नहीं कैसे उसका पांव मेज के समीप रखी कुर्सी की टांग से उलझा । कुर्सी एक ओर पलट गई । उसने एक शानदार कलाबाजी खाई । उसके मुंह से सिगार निकालकर फर्श पर आ गिरा, दोनों हाथ किसी अदृश्य सहारे के लिये हवा में फैल गये । गिरते-गिरते उसका एक हाथ पलंग की साइड पर पड़ा । पलंग की साइड के स्थान पर केवल चादर ही उसके हाथ में आई ओर उसके साथ खिंचती चली गई । पलक झपकते ही सब कुछ हो गया । पलंग की चादर से उलझा कुरेशी औंधे मुंह जमीन पर पड़ा था ।
पलंग का तकिया एक ओर उछल गया था और उसके नीचे रखी एल्यूमीनियम के खोल में लिपटी फिल्म जमीन पर आ गिरी थी और लुढकते हुए कमरे के कोने तक पहुंच गई थी ।
सुनील कुरेशी की ओर लपका, लेकिन कुरेशी सुनील के सहारे के बिना ही उठ खड़ा हुआ ।
“चोट तो नहीं आई, साहब ?” - सुनील बोला ।
“नहीं ।” - कुरेशी हांफता हुआ बोला - “आई एम सारी । आई एम क्रियेटिंग न्यूसेंस ।”
“नेवर माइन्ड ।” - सुनील बोला ।
कुरेशी ने अपना गाउन ठीक किया । अपने गंजे सिर पर हाथ फेरा । उसने कमरे में आस-पास दृष्टि दौड़ाई । एक कोने में उपेक्षित-सा उसका सिगार पड़ा था । वह अपनी गंजी खोपड़ी पर हाथ फेरता हुआ आगे बड़ा । उसने जमीन पर से सिगार उठा लिया और हाथ ही सिगार के समीप पड़ी फिल्म भी उठा ली । सिगार बुझा नहीं था । उसने सिगार को मुंह में दबाया और फिल्म को हाथ में उछालता हुआ बोला - “होटल के बगल में ही एक फोटोग्राफर की दुकान है । मालिक मेरा दोस्त है । कहें तो आपकी फिल्म मैं धुलवा दूं । बढिया काम हो जायेगा ।”
“जी नहीं” - सुनील अपना हाथ उसकी ओर बढाता हुआ बोला - “मुझे कोई जल्दी नहीं है और फिर मैं खुद फोटोग्राफर हूं । मैं अपना काम खुद ही करता हूं ।”
“मैं इसका भी इन्तजाम करवा सकता हूं । आप चाहें तो उसके स्टूडियो में खुद फिल्म को धो लीजियेगा और प्रिंट निकाल लीजियेगा ।”
“साहब, मैने अर्ज किया है, मुझे जल्दी नहीं है ।”
कुरेशी ने गहरी सांस ली और फिल्म उसके हाथ में रख दी ।
सुनील ने फिल्म जेब में डाल ली ।
“मैंने आपको बहुत डिस्टर्ब किया, साहब ।” - कुरेशी खेदपूर्ण स्वर में बोला ।
“कोई बात नहीं ।”
“लाइये, पलंग की चादर तो बिछा दूं ।”
“जाने दीजिए । मैं बिछा लूंगा ।”
“मैं एक बार फिर माफी चाहता हूं ।”
“ओह, फारगेट इट ।”
कुरेशी सिगार के कश लगाता हुआ द्वार की ओर बढ गया । सुनील भी द्वार बन्द करने के इरादे से उसके साथ आगे बढा ।
द्वार के समीप पहुंचकर कुरेशी उसकी ओर घूमा और बोला - “आइये, मेरे कमरे मे तशरीफ लाइये । एक-एक काप कॉफी हो जाये । मैं थरमस में रखता हूं ।”
“मेहरबानी जनाब, मैं इतनी काफी पीने का आदी नहीं ।”
“आलराइट । थैंक्स अगेन ।”
“डोन्ट मेंशन ।”
“शब्बाखैर ।”
सुनील ने गलियारे में कदम रखा और सिगार के लम्बे कश लगाता हुआ गलियारे में आगे बढ गया ।
सुनील चेहरे पर उलझन के भाव लिये द्वार के समीप ही खड़ा रहा ।
अब्दुल वहील कुरेशी उसकी समझ से बाहर था । पहले वह उसे एक निर्दोष व्यक्ति लग रहा था लेकिन अब फिर उसे उस पर संदेह होने लगा था । उसने फिल्म को खुद धुलवा देने के बारे में जरूरत से ज्यादा अनुरोध किया था । और सुनील को ऐसा लग रहा था जैसे कुरेशी काफी के बहाने उसे कमरे से निकालना चाहता था ताकि वह बाद में अपने किसी साथी द्वारा उसकी तलाशी करवा सकता । इसके विपरीत सुनील के सन्देह को निराधार सिद्ध करने वाली सबसे बड़ी बात यह थी कि होटल मेट्रोपोल में कुरेशी पहले से ही ठहरा हुआ था और उसको इस बात की जानकारी होने की सम्भावना कतई नहीं थी और कि सुनील काबुल आकर मेट्रोपोल में ठहरेगा । इस बार यह कर्नल मुखर्जी के नौकर धर्मसिंह पर भी सन्देह नहीं कर सकता था क्योंकि कर्नल मुखर्जी की कार का पृष्ठ भाग साउन्ड प्रूफ था । ड्राइविंग सीट पर बैठ धर्मसिंह का उनका वार्तालाप सुन पाना सम्भव नहीं था ।
या शायद कार का पृष्ठ भाग उतना साउन्ड प्रूफ नहीं था, जितना कर्नल मुखर्जी उसे समझते थे ।
सन्देह और विश्वास के तानों-बानों में उलझे सुनील ने अपने कमरे का द्वार फिर भीतर से बन्द कर लिया ।
***
अगले दिन सूर्योदय से पहले ही सुनील सोकर उठ गया । पन्द्रह मिनट में वह नित्यकर्म से निवृत हो गया । उसने तकिये के नीचे रखी फिल्म को यथास्थान रहने दिया लेकिन मेज पर से कैमरा उठाकर अपने कन्धे पर लटका लिया । कमरे के कोने में एक स्टूल पड़ा था जिस पर एक कांच की सुराही रखी थी । उसने सुराही का पानी सिंक में पलट दिया और स्टूल और सुराही को उठा लिया । वह द्वार के समीप पहुंचा, उसने स्टूल को दरवाजे के एक पल्ले से एकदम सटाकर रख दिया और स्टूल के ऊपर सुराही रख दी ।
वह कमरे से बाहर निकल आया ।
कारीडोर सुनसान पड़ा था ।
उसने कमरे का दूसरा दरवाजा तीन-चौथाई बन्द किया और फिर बाकी बच गये स्थान में हाथ डालकर स्टूल को दोनों दरवाजों से पीछे सरका दिया । फिर उसने सुराही को स्टूल के एकदम किनारे पर इस प्रकार रख दिया कि उसके तले का केवल दो-तिहाई भाग ही स्टूल पर रखा था । उसने दरवाजा बाहर से बन्द करके उसमें ताला लगा दिया ।
बन्द दरवाजे के पीछे रखे स्टूल की स्थिति ऐसी थी कि बाहर से दरवाजा खोले जाने पर स्टूल को धक्का जरूर लगता और स्टूल को मामली-सा धक्का लगने पर स्टूल पर रखी शीशे की सुराही नीचे जरूर गिरती ।
सुनील सन्तुष्टिपूर्ण ढंग से सिर हिलाता हुआ आगे बढा और सीढियां उतरने लगा ।
नीचे आकर वह होटल के मुख्य द्वार के समीप बने टेलीफोन बूथ की ओर बढ़ा ।
उसने रिसीवर उठाया और एक नम्बर डायल कर दिया ।
वह नम्बर काबुल स्थित भारतीय दूतावास के फर्स्ट सेक्रेटरी कुलकर्णी का था । कभी सहायता की आवश्यकता पड़ने पर कर्नल मुखर्जी ने उसे उसी नम्बर पर कुलकर्णी से बात करने के लिये कहा था ।
कुछ क्षण दूसरी ओर घन्टी बजती रही, फिर किसी का उनींदा-सा स्वर सुनाई दिया - “हल्लो !”
सुनील ने जल्दी से कायन बाक्स में सिक्के डाले और सावधान स्वर में बोला - “हल्लो ! हल्लो ! मुझे मिस्टर कुलकर्णी से बात करनी है ।”
“कुलकर्णी बोल रहा हूं ।”
सुनील एक क्षण चुप रहा और फिर धीमे किन्तु स्पष्ट स्वर से बोला - “मेरा नाम सुनील है । मैं एक भारतीय समाचार-पत्र ‘ब्लास्ट’ का प्रतिनिधि हूं । मैं परसों रात काबुल एयरपोर्ट पर हुए एक्सीडेंट के बारे में आपसे बात करना चाहता हूं ।”
“तुम्हारा पूरा नाम ?”
“सुनील कुमारा चक्रवर्ती ।”
“कैन यू आइडेन्टीफाई युअरसैल्फ (क्या तुम अपनी शिनाख्त करवा सकते हो) ?”
“पड़ोसी की छत पर उड़ते हुए बाज ने जो शिकार किया था, उसकी खबर पड़ोसी को भी है और बाज के मालिक को भी लेकिन शिकार बाज के मालिक के अधिकार में है ।” - सुनील पूर्ववत् धीमें किन्तु स्पष्ट स्वर में बोला ।
कुछ क्षण शान्ति रही ।
थोड़ी देर बाद दूसरी ओर से जो स्वर सुनाई दिया, वह मित्रतापूर्ण था - “ओ. के. मिस्टर सुनील । आई नो यू । व्हाट डू यू वांट (मैं तुम्हें जानता हूं । तुम क्या चाहते हो) ?”
“मुझे आपकी सहायता की जरूरत है ।”
“कैसी सहायता ?”
“मेरी अधिकार में एक ऐसी चीज है जिसे खुद भारत ले जाने में मैं थोड़ा खतरा महसूस कर रहा हूं । मुझे लग रहा है कि कुछ अवांछनीय व्यक्ति मेरे पीछे लगे हुए हैं । मैं वह चीज आपको सौंपना चाहता हूं ताकि आप उसे डिप्लोमैटिक बैग में भारत भिजवा सकें ।”
“वह चीज इस वक्त तुम्हारे पास है ?”
“जी हां ।”
“तुम कहां से बोल रहे हो ?”
“मैं होटल मेट्रोपोल से बोल रहा हूं । मैं होटल के 315 नम्बर कमरे में हूं ।”
मैं अभी तुम्हारे पास अपना एक आदमी भेजता हूं । तुम वह चीज उसे सौंप देना ।”
“सॉरी ।” - सुनील दृढ स्वर में बोला ।
“क्या मतलब ?”
“आपको खुद आना होगा । मैं किसी दूसरे आदमी का भरोसा नहीं कर सकता ।”
“लेकिन मेरा आ पाना सम्भव नहीं है । मैं बिस्तर पर पड़ा हूं । कल रात मेरे पांव में मोच आ गई थी ।”
“तो फिर मुझे वहां बुला लीजिये ।”
“आलराइट । आ जाओ ।”
“मैं खुद नहीं आ सकता । मैं काबुल में नया हूं । मुझे पता नहीं भारतीय दूतावास काबुल में कहां हैं । मैं किसी अनजाने टैक्सी वाले पर निर्भर नहीं करना चाहता । सच पूछिये तो मुझे तो ऐसा वहम हो गया है कि होटल से बाहर कदम रखने ही कोई-न-कोई मुझ पर झपट पड़ेगा ।”
“आलराइट । आलराइट । मैं दूतावास की गाड़ी भेजता हूं ।”
“गाड़ी का नम्बर बता दीजिये ।”
“सी डी 212 और ड्राइवर का नाम जय भगवान है । वह मेरा निजी आदमी है ।”
“ओ. के. । मैं अपने कमरे में उसका इन्तजार करूंगा ।”
सुनील ने रिसीवर को हुक पर टांग दिया ।
वह बूथ से बाहर निकल आया ।
रिसेप्शन काउण्टर के पीछे पिछली रात वाला ही कलर्क बैठा था और अखबार पढ रहा था । उसने एक उदासीन-सी दृष्टि सुनील पर डाली और दोबारा अखबार पढने में तत्लीन हो गया ।
सुनील सीढियों की ओर बढा ।
सीढियों के पास पहुंचकर वह ठिठक गया । वह एक क्षण हिचकिचाया और फिर वापस लौट पड़ा ।
वह रिसेप्शन काउण्टर पर पहुंचा ।
उसकी आहट सुनकर कलर्क ने अखबार से सिर उठाया और फिर प्रश्नसूचक नेत्रों से उसकी ओर देखा ।
“हल्लो !” - सुनील अपने होंठो पर एक आत्मीयतापूर्ण मुसकराहट लाता हुआ अंग्रेजी में बोला - “गुड मोर्निंग ।”
“गुड मार्निग, सर ।” - क्लर्क ने उत्तर दिया ।
“ये अब्दुल वहीद कुरेशी साहब कौन से कमरे में हैं ?”
क्लर्क ने अपने पीछे टंगे की बोर्ड पर दृष्टि दौड़ाई और फिर यन्त्रचलित स्वर में बोला - “322 में ।”
“322” - सुनील होंठों में बुदबुदाया और फिर दुबारा क्लर्क की ओर आकर्षित होता हुआ बोला - “यार, सुनो । क्या नाम है तुम्हारा ?”
“अब्दुल सलाम ।” - क्लर्क बोला ।
“अब्दुल सलाम !” - सुनील फिर अपने स्वर को यूं आत्मीयता से लादता हुआ बोला जैसे वह उसे वर्षों से जानता हो - “यार, पता नहीं क्या बात है, ये कुरेशी साहब मुझसे बड़ी यारी गांठने की कोशिश कर रहे हैं । तुम इनके बारे में कुछ बता सकते हो मुझे ?”
“आप क्या पूछना चाहते हैं ?” - क्लर्क बोला । उसके स्वर से ऐसा नहीं लग रहा था जैसे वह ऐसी किसी पूछताछ को प्रोत्साहन दे रहा हो ।
“जैसे वे कौन हैं ? क्या करते हैं ? इस होटल में कब से रह रहे हैं ? वगैरह ?”
“आप यह सवाल उन्हीं से क्यों नहीं पूछते ?”
“यार, मैं तुमसे पूछ रहा हूं ।”
“देखिये, साहब” - क्लर्क निर्णयात्मक स्वर में बोला - “यह इस होटल का नियम है कि जब तक कोई विशेष कारण न हो, तब तक हम अपने होटल में ठहरे एक मेहमान से सम्बन्धित साधारण से साधारण बात भी दूसरे मेहमान को नहीं बताते ।”
“लेकिन जब कोई विशेष कारण हो तब तो बताते हो ?”
“जी हां । तब तो बताते हैं ।”
सुनील ने अपनी जेब में हाथ डालकर कुछ नोट निकाले और उन्हें काउंटर पर क्लर्क की ओर सरकाता हुआ बोला - “विशेष कारण यह है ।”
क्लर्क ने एक गहरी सांस ली और फिर नकारात्मक ढंग से सिर हिलाता हुआ उदासीन स्वर में बोला - “नहीं साहब, यह कोई कारण नहीं है । यह तो रिश्वत है ।”
“जाहिर है ।” - सुनील बोला । उसका उत्साह ठण्डा हो चुका था ।
“साहब !” - क्लर्क स्थिर स्वर में बोला - “जो जानकारी मैं आपको अपनी मर्जी से नहीं दूंगा, वह मैं दौलत के लालच में आकर भी नहीं दूंगा । जिन्दगी में बहुत-से काम हैं जो मैं उसूल के तौर पर नहीं करता ।”
“जैसे रिश्वत लेना ?” - सुनील जलकर बोला ।
“जैसे रिश्वत लेना ।” - क्लर्क बोला ।
एक गहरी शर्मिन्दगी के अहसास के साथ सुनील ने नोट वापस अपनी जेब में ठूंस लिए ।
“मैं तुम्हारे उसूल की कद्र करता हूं ।” - सुनील बोला ।
“थैंक्यू ।”
“और साथ ही उम्मीद करता हूं कि तुम कुरेशी साहब को यह नहीं बताओगे कि मैंने तुम्हें रिश्वत देकर उनके बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की थी ।”
उत्तर में क्लर्क एक बार सुनील को देखकर मुस्कराया और दोबारा अखबार देखने में तत्लीन हो गया ।
सुनील वहां से हट गया और सीढियां चढकर वापस अपने कमरे के सामने पहुंच गया ।
तीसरी मंजिल का गलियारा अभी भी खाली था ।
उसने अपने कमरे के द्वार का ताला खोला और बड़ी सावधानी से द्वार के पल्ले को भीतर की ओर धकेला ।
उसकी पूरी सावधानी के बावजूद भी पल्ला भीतर लगे स्टूल से धीरे से जा टकराया और पल्ले की उतनी-सी ठोकर से ही स्टूल पर रखी सुराही जमीन पर आ गिरी और एक छनाक की आवाज से टूट गयी ।
सुनील ने सन्तुष्टिपूर्ण ढंग से सिर हिलाते हुए द्वार को पूरा धकेला दिया ।
उसे विश्वास था कि उसकी अनुपस्थिति में किसी ने उसके कमरे में घुसने का उपक्रम नहीं किया था ।
उसने कमर में घुसकर दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया ।
उसने स्टूल को एक ओर सरका दिया और टूटी सुराही के टुकड़ों को बटोरकर स्टूल के ऊपर रख दिया ।
वह एक कुर्सी पर जा बैठा । कैमरा उसने अपनी गोद में रख लिया । उसने एक सिगरेट सुलगा लिया और सिगरेट के छोटे-छोटे कश लगाता हुआ प्रतीक्षा करने लगा ।
रह-रहकर उनकी दृष्टि कलाई पर बंधी घड़ी की ओर उठ जाती थी ।
एक के बाद उसने दूसरा सिगरेट सुलगा लिया ।
ठीक पन्द्रह मिनट बाद किसी ने बाहर से उसका द्वार खटखटाया ।
सुनील ने हाथ का सिगरेट फेंक दिया । वह अपने स्थान से उठा और दरवाजे के समीप पहुंच गया ।
“कौन है ?” - वह जोर से बोला ।
“मैं भारतीय दूतावास से आया हूं, साहब ।” - बाहर से कोई साफ-साफ हिन्दोस्तानी में बोला - “मुझे फर्स्ट सैक्रेटरी कुलकर्णी साहब ने भेजा है ।”
“नाम बोलो ।”
“जय भगवान ।” - उत्तर मिला ।
सुनील ने तकिये के नीचे रखी फिल्म को निकालकर अपने कोट की भीतर जेब में रख लिया । उसने कैमरा फिर कन्धे पर लटकाया और दरवाजा खोलकर कमरे से बाहर निकल आया ।
बाहर एक वर्दीधारी शोफर खड़ा था । सुनील को देखकर उसने अपनी पीक-कैप छूकर सुनील को सलाम किया ।
सुनील ने सिर हिलाकर सलाम का उत्तर दिया । उसने अपने कमरे के द्वार को ताला लगाया और शोफर के साथ हो लिया । वह शोफर के साथ सीढियां उतरता हुआ नीचे आ गया ।
रिसेप्शन और होटल के बाहर की सड़क दोनों सुनसान पड़े थे ।
बाहर दूतावास की सी डी 212 नम्बर की विशाल स्टेशन वैगन गाड़ी खड़ी थी ।
शोफर ने आगे बढकर स्टेशन वैगन का दरवाजा खोला ।
सुनील भीतर बैठ गया ।
शोफर ने द्वार बन्द कर दिया और गाड़ी के सामने से घूमकर ड्राइविंग सीट की ओर पहुंच गया ।
वह स्टियरिंग के पीछे जा बैठा ।
सुनील ने अपनी जेब से लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकाला और एक सिगरेट सुलगा लिया ।
शोफर ने एक उड़ती-सी दृष्टी अपनी बगल में बैठे सुनील पर डाली और गाड़ी स्टार्ट कर दी ।
स्टेशन वैगन सड़क पर दौड़ने लगी ।
सुनील सिगरेट में कश लगाता रहा ।
शोफर चुपचाप गाड़ी चला रहा था ।
स्टेशन वैगन काबुल की विभिन्न सड़कों पर दौड़ती हुई आगे बढ रही थी ।
एकाएक सुनील की दृष्टि शोफर की बाईं बांह पर पड़ी और उसके नेत्र फैल गये ।
शोफर का बायां हाथ स्टियरिंग व्हील पर टिका हुआ था । उसकी यूनीफार्म की पूरी बांह की शर्ट का बटन कलाई के पास बन्द था और कफ से आगे बनी लगभग चार इंच की झिरी में से उसकी मजबूत कलाई झलक रही थी ।
कलाई पर नीले रंग के गोदने से उर्दू में ‘अल्लाह’ गुदा हुआ था ।
सुनील ने फौरन उस ओर से दृष्टि फिरा ली । केवल एक क्षण के लिये उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव प्रकट हुए और फिर उसका चेहरा एकदम भावहीन हो उठा । वह पूर्ववत् लापरवाही से सिगरेट के कश लगाता रहा ।
जरूर कहीं कोई गड़बड़ हो गई थी ।
उसकी बगल में मौजूद शोफर का नाम जय भगवान नहीं हो सकता था । उसकी बाईं कलाई पर गुदा अल्लाह का नाम जाहिर कर रहा था कि वह हिन्दू नहीं था ।
निश्चय ही वह वह आदमी नहीं था जो फर्स्ट सैक्रेटरी कुलकर्णी ने उसके पास भेजा था । शायद किसी प्रकार शत्रुओं द्वारा उसका और कुलकर्णी का टेलीफोन पर हुआ वार्तालाप सुन लिया गया था और फिर या तो शत्रुओं ने जय भगवान को रास्ते में अपने अधिकार में करके उससे दूतावास की गाड़ी हथिया ली थी और या फिर जिस गाड़ी पर वह उस समय सवार था, वह गाड़ी ही दूसरी थी और उस पर केवल सी डी 212 की प्लेट लगा दी गई थी ।
और निश्चय ही सुनील उस समय भारतीय दूतावास में नहीं ले जाया जा रहा था ।
उसका मस्तिष्क तेजी से काम करने लगा ।
उसने सिगरेट का आखिरी कश लगया और बचे हुए टुकड़े को गाड़ी से बाहर उछाल दिया ।
उसकी दृष्टि गाड़ी के डैश बोर्ड में बने एक खाने में पड़ी । वहां एक बड़ा-सा पेचकस पड़ा था ।
उसने एक गुप्त दृष्टि शोफर की ओर डाली ।
शोफर का सारा ध्यान गाड़ी चलाने की ओर था ।
सुनील के मन-ही-मन एक फैसला किया ।
एकाएक उसका बायां हाथ बिजली की फुर्ती से आगे बढा । उसने इग्नीशन में लटकी चाबी को घुमाकर इग्नीशन आफ कर दिया और चाबी बाहर निकाल ली ।
इंजन फौरन बन्द हो गया ।
उसके बायें हाथ के एक्शन के साथ ही उसके दायें हाथ का घूंसा वज्र की तरह शोफर के पेट से टकराया ।
शोफर पीड़ा से बिलबिला गया और स्टियरिंग पर दोहरा हो गया ।
तेजी से आगे बढती हुई स्टेशन वैगन सड़क से नीचे उतर गई ।
सुनील ने जल्दी से ब्रेक पर पांव रखा और स्टियरिंग को तेजी से दाईं ओर घुमा दिया ।
इंजन बन्द हो जाने की वजह से गाड़ी की रफ्तार वैसे भी कम होती जा रही थी ।
सुनील के अप्रत्याशित आक्रमण से तब तक शोफर काफी सम्भल चुका था ।
उसने बिना सुनील की ओर देखे अपनी दाई कोहनी से सुनील पर प्रहार किया ।
शोफर की कोहानी भारी हथौड़े की तरह सुनील की छाती से टकराई । सुनील का शरीर पीछे को गिरा और गाड़ी के दरवाजे से जा टकराया ।
शोफर ने बायें हाथ से स्टियरिंग को थामें रखा और उसका दायां हाथ तेजी से अपनी यूनीफार्म की पतलून में सरक गया ।
सुनील ने अपना हाथ आगे बढाया और झपटकर पेचकस उठा लिया । उसने बिना परिणाम की परवाह किये अपनी मुट्ठी में मजबूती से जकड़े पेचकस से शोफर पर आक्रमण कर दिया ।
पेचकस शोफर के दायें जबड़े के नीचे गले में घुस गया । उसका दायां हाथ, जो अभी तक आधा ही पतलून से बाहर निकल पाया था, वहीं का वहीं रह गया । उसके मुंह से एक हृदयविदारक चीख निकली और फिर उसका बायां हाथ भी स्टेयरिंग से हट गया ।
सुनील को शोफर के दायें हाथ में पतलून से आधी बाहर झांकती हुई रिवाल्वर की झलक मिल गई थी । उसने पेचकस की मूठ से हाथ हटा लिया और बिजली की फुर्ती से शोफर के हाथ से रिवाल्वर झपट ली ।
पेचकस शोफर के गले में ही अटका रह गया जिसे वह अपने दोनों हाथों से बाहर खींचने का प्रयत्न कर रहा था ।
तब तक स्टेशन वैगन सड़क से नीचे ढलान पर उतरकर रुक चुकी थी । सुनील ने ब्रेक के पैडल से अपना पांव हटा लिया ।
उसी क्षण एक फायर की आवाज हुई । साथ ही शीशा चटखने की आवाज सुनाई दी । स्टेशन वैगन के पृष्ट भाग के शीशे के परखचे उड़ गये थे और गोली शीशे को भेदती हुई पिछली सीट में कहीं घुस गई थी ।
सुनील ने घबराकर पीछे देखा ।
पीछे केवल एक जीप थी जो तेजी से उसी की ओर जा रही थी । जीप में तीन-चार आदमी बैठे थे और उन्हीं में से कोई गोली चला रहा था ।
इग्नीशन की चाबी अभी तक सुनील के बायें हाथ में थी । उसने तेजी से चाबी को इग्नीशन में डालकर आन दिया । उसने स्टेशन वैगन का शोफर की ओर वाला दरवाजा खोला और शोफर को स्टेशन वैगन से बाहर धकेल दिया । पलक झपकते ही वह स्टियरिंग के पीछे पहुच गया ।
उसने रिवाल्वर को दायें हाथ में थामे-थामें ही स्टियरिंग सम्भाला । गाड़ी को गियर में डाला, एक्सीलेटर दबाया और गाड़ी को घुमाकर दुबारा सड़क पर चढा लाया ।
जीप से फिर फायर हुआ ।
गोली स्टेशन वैगन की बाईं खिड़की के समीप से गुजर गई ।
सुनील ने भी जवाब में खिड़की से हाथ निकालकर पीछे आती जीप की दिशा में फायर किया । सुनील जानता था कि जिस हालत में वह फायर कर रहा था, उसमें उस द्वारा चलाई गोली का निशाने पर लग पाना सम्भव नहीं था । वह तो जीप वालों को केवल यह जताना चाहता था कि वह भी सशस्त्र था ताकि जीप वाले उसने एकदम समीप आने से झिझकते ।
उसने एक्सीलेटर के पैडल पर अपने पांव का दबाव बढा दिया । गाड़ी तोप से छूटे गोले की तरह सड़क पर भाग निकली ।
जीप की रफ्तार बढ गई । जीप वाले सुनील की ओर से फायर होने की आशंका से भयभीत नहीं हुए मालूम होते थे ।
जीप धीरे-धीरे समीप आती जा रही थी और रह-रहकर जीप से फायर किये जा रहे थे । सुनील जान-बूझकर स्टेशन वैगन को तनिक झोल देकर चला रहा था इसलिये वह गोलियों की मार से बचा हुआ था लेकिन वह जानता था कि झोल देकर गाड़ी को रफ्तार से चलाने में गाड़ी के अधिकार से बाहर हो जाने का खतरा था और ज्यों-ज्यों जीप समीप होती जा रही थी, उसके जीप वालों की गोलियों के शिकार होने की सम्भावनायें बढती जा रही थीं ।
एकाएक सुनील ने गाड़ी के गियर से निकाला और अपनी पूरी शक्ति से ब्रेक दबा दिये । पहियों की चरमराहट की आवाज से वातावरण गूंज गया ।
जीप वालों के लिये सुनील का यह एक्शन बहुत अप्रत्याशित था इसलिये पूरी रफ्तार से भागती हुई जीप एकाएक स्टेशन वैगन के बहुत समीप आ गई ।
सुनील ने ताककर लगातार दो फायर किये ।
उसने कानों में किसी की चीख की आवाज पड़ी और उसने किसी को चलती जीप से बाहर गिरते देखा । साथ ही जीप से लगातार कई फायर हुए ।
तब तक सुनील ने फिर स्टेशन वैगन को पूरी रफ्तार से भगाना आरम्भ कर दिया था ।
सुनील सीधी सुनसान सड़क पर स्टेशन वैगन भगाये जा रहा था । उसे नहीं मालूम था कि वह सड़क कहां जाती थी और न ही उसे अपने पीछे लगी जीप से पीछा छुड़ाने का कोई तरीका सूझ रहा था ।
उसी क्षण उसे दूर सड़क की बाईं ओर एक अन्य सड़क दिखाई दी । पलक झपकते ही स्टेशन वैगन उस तिराहे के समीप पहुंच गई । सुनील ने एक बार फिर जोर से ब्रेक लगाई और गाड़ी को तिराहे से इतनी तेजी से बाईं सड़क पर मोड़ा कि स्टेशन वैगन उलटते-उलटते बची । शीघ्र ही स्टेशन वैगन सुनील के कंट्रोल में आ गई और उसने उसे उस नई, सड़क पर ड्राइव करना आरम्भ कर दिया ।
जीप सर्र पहली वाली सड़क पर ही तेजी से आगे निकल गई ।
सुनील ने स्टेशन वैगन पूरी रफ्तार से भगानी आरम्भ कर दी । जीप के वापस घूमकर उस सड़क पर उसके पीछे आने से पहले ही वह कहीं गायब हो जाना चाहता था ।
रह-रहकर उसकी निगाह स्टेशन वैगन के रियर व्यू मिरर से जा टकराती थी जिसमें से पीछे की ओर भागती हुई खाली सड़क साफ दिखाई दे रही थी ।
वह पूरी रफ्तार से उस सड़क पर गाड़ी दौड़ाता रहा ।
अपने पीछे उसे जीप के दोबारा दर्शन नहीं हुए ।
सुनील की स्टेशन वैगन फिर एक तिराहे के समीप पहुंच रही थी । बाई ओर से एक सड़क तीस अंश के कोण पर आकर उस सड़क से मिल रही थी जिस पर कि उस समय सुनील की स्टेशन वैगन दौड़ रही थी ।
तिराहे के और समीप पहुंचने पर सुनील ने स्टेशन वैगन की रफ्तार थोड़ी कम कर दी ।
वह तिराहे से अभी पचास गज दूर ही था कि एकाएक उसे दाई सड़क पर तिराहे की ओर ही बढती हुई वही जीप दिखाई दी जो थोड़ी देर पहले उसका पीछा कर रही थी ।
सुनील बौखला गया । जीप उससे ज्यादा तेज रफ्तार से तिराहे की ओर बढ रही थी और सुनील को जीप के तिराहे पर पहुंचने से पहले तिराहा क्रास कर जाना सम्भव नहीं दिखाई दे रहा था ।
जीप से बचने का दूसरा तरीका यही था कि वह तिराहे पर पहुंचने से पहले ही गाड़ी को यू टर्न देता और उसी सड़क पर वापस भाग निकलता ।
अपने इरादे पर उसने फौरन अमल करना आरम्भ कर दिया । उसने पूरी शक्ति से स्टेशन वैगन को ब्रेक लगाई ।
तब तक जीप वालों की निगाह भी सुनील पर पड़ चुकी थी और सुनील का इरादा भी उनकी निगाहों से छुपा नहीं रहा था ।
सुनील ने जीप को तिराहे पर पहुंचने से पहले ही दोनों सड़कों के बीच में मौजूद कच्चे मैदान में उतरते देखा । जीप बड़ी खतरनाक हालत से कूदती-फांदती मैदान पार करने लगी ।
जिस समय सुनील स्टेशन वैगन को वापस घुमा रहा था उस समय जीप उनसे केवल सौ गज दूर रह गई थी । स्टेशन वैगन को घुमाकर सुनील ने एक्सीलेटर पर पांव रखा ही था कि जीप की ओर जैसे फायरों की बाढ आ गई । कई गोलियां स्टेशन वैगन की बाड़ी से टकराई । कुछ गोलियां स्टेशन वैगन की बाईं ओर के पहियों में धंस गई और बाईं ओर के दोनों पहिये बैठ गये ।
स्टेशन वैगन का बैलेंस बिगड़ गया । वह सड़क पर शराबी की तरह झूमने लगी । सुनील का पांव स्वयमेव ही एक्सीलेटर के पैडल से हटकर ब्रेक के पैडल पर पहुंच गया । उसकी उंगलियां स्टियरिंग व्हील पर कस गई । उसके दांत भिच गये । उसकी सारी मानसिक और शारीरिक शक्तियां स्टेशन वैगन को सड़क के आस-पास उगे पड़ों, टेलीफोन और बिजली के खम्बों से टकराने से बचाने से बचाने में लग गई ।
बड़ी कठिनाई से उसने कार को सड़क के किनारे रोका लेकिन तब तक जीप एकदम उसके सिर पर पहुंच चुकी थी । सुनील एकदम घूमा । उसका रिवाल्वर वाला हाथ जीप की ओर बढा लेकिन उसे फायर करने का मौका नहीं मिला ।
जीप सीधे बाईं ओर के पिचके पहिये की वजह से एक ओर झुकी हुई स्टेशन वैगन से आ टकराई ।
सुनील का शरीर पीछे को उलट गया । रिवाल्वर उसके हाथ से निकलकर गाड़ी के सामने शीशे से जा टकराई और शीशा तोड़ती हुई बाहर निकल गई । खुद उसका सिर डैश बोर्ड से जा टकराया । उसके सारे शरीर में दर्द की लहर दौड़ गई । उसकी आंखों के सामने लाल-पीले सितारे नाच उठे लेकिन उसकी चेतना लुप्त नहीं हुई ।
जीप में से तीन आदमी बाहर कूदे । वे झपटकर स्टेशन वैगन की साइड में पहंच गये । एक मोटे-ताजे आदमी ने स्टेशन वैगन का दरवाजा खोला । उसने हाथ बढाकर सुनील को अपनी गिरफ्त में दबोचा और उसे बड़ी बेरहमी से स्टेशन वैगन से बाहर खींच लिया । उसने सुनील को गिरेबान से दबोचा और उसे भड़ाक से स्टेशन वैगन की साइड से दे मारा ।
सुनील के मुंह से एक कराह निकल गई । बड़ी कठिनाई से वह स्वयं को अपने पैरों पर खड़ा रख पाया ।
एक अन्य व्यक्ति ने एक लम्बे नाल वाली रिवाल्वर उसकी छाती से टिका दी ।
मोटे-ताजे आदमी के हाथ बड़ी दक्षता से उसके शरीर पर फिरने लगे । अगले ही क्षण सुनील की जेब से निकला एल्यूमीनियम का खोल उसके हाथ में था । उसने खोल का ढक्कन उतारा और उसे अपनी बाईं हथेली पर उलट दिया ।
फिल्म उसकी हथेली पर आ गिरी ।
उसके होंठों पर एक मुस्कराहट आई । उसने विजयपूर्ण नेत्रों से सुनील की ओर देखा और फिर फिल्म को दोबारा एल्यूमीनियम के खोल में डालकर उसका ढक्कन बन्द किया और उसे अपने कोट की जेब में रख लिया ।
सुनील के चेहरे से गहन पराजय के भाव परिलक्षित हो रहे थे लेकिन वह मन-ही-मन खुश हो रहा था । उसका कैमरा उपेक्षित-सा स्टेशन वैगन की अगली सीट के नीचे ब्रेक और एक्सीलेटर के पैडलों के समीप पड़ा था । किसी का ध्यान उसकी ओर नहीं था । पिछली रात को उसने जब पीटर विंस्टन की फिल्म को अपने कैमरे की फिल्म से बदला था, उस समय वह ऐसी किसी घटना या ऐसे किसी परिणाम की अपेक्षा नहीं कर रहा था । वह हारकर भी जीत रहा था ।
एक आदमी ने सड़क पर गिरी रिवाल्वर उठा ली, जो कुछ क्षण पहले सुनील के अधिकार से निकल गई थी ।
फिर मोटे-ताजे आदमी के दायें हाथ का घूंसा स्टीम रोलर की तरह सुनील की पसलियों से टकराया । सुनील पीड़ा से बिलबिला उठा । उसके नेत्रों से आंसू निकल आये । उसका शरीर दोहरा हो गया और उसने अपने दोनों हाथों से अपना पेट थाम लिया । फिर एक भारी बूट की ठोकर उसके शरीर पर पड़ी और सड़क पर लुड़क पर लढुक गया ।
जीप से उतरे तीनों आदमी तेजी से वापस जीप की ओर बढ गये ।
सुनील पीड़ा से बिलबिलाता हुआ फर्श पर पड़ा आंसुओं से धुंधलाई आंखों से उन्हें देखता रहा ।
जीप का इंजन घरघराया, जीप बैक हुई और फिर स्टेशन वैगन से अलग हटकर सड़क पर सीधी खड़ी हो गई ।
उसी क्षण काले रंग की एक कार सड़क पर प्रकट हुई । किसी ने कार से बाहर हाथ निकालकर जीप के ड्राइवर को संकेत किया ।
जीप के ड्राइवर ने इंजन बन्द कर दिया ।
काली कार जीप के समीप आकर रुक गयी ।
मोटा-ताजा आदमी जीप से उतरकर काली कार की ओर बढा ।
काली कार में से एक आदमी बाहर निकला ।
सुनील उसे फौरन पहचान गया लेकिन उसे वहां देखकर सुनील को कोई विशेष हैरानी नहीं हुई ।
वह अब्दुल वहीद कुरेशी था ।
सुनील ने अपने नेत्र बन्द कर लिये और शरीर को ढीला छोड़ दिया । उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे उसकी चेतना लुप्त हो गई हो । कभी-कभार वह बड़ी सावधानी से थोड़ी-सी आंख खोलकर जीप की ओर झांक लेता था ।
मोटे आदमी ने कुरेशी को सलाम किया ।
“काम हुआ ?” - कुरेशी ने अधिकारपूर्ण स्वर में पूछा ।
मोटे ने सहमतिसूचक ढंग से सिर हिलाया और फिर जेब से एल्यूमीनियम का खोल निकालकर कुरेशी की ओर बढा दिया ।
कुरेशी ने कुछ क्षण खोल और उसमें रखी फिल्म का निरीक्षण करता रहा फिर उसने फिल्म को सावधानी से अपने कोट की भीतरी जेब में रख लिया ।
“शाबाश !” - कुरेशी बोला और वापस घूम पड़ा । वह कार के समीप पहुंचकर ठिठका । फिर वह वापस मोटे की ओर घूमा ।
मोटा अभी भी आदरपूर्ण मुद्रा बनाये अपने स्थान पर खड़ा था ।
करेशी फिर मोटे के समीप पहुंचा और बोला - “इसके पास एक कैमरा था ।”
सुनील को अपने दिल की धड़कन रुकती महसूस हुई ।
“कैमरा !” - मोटा उलझनपूपर्ण स्वर में बोला ।
“हां ।”
“मैंने नहीं देखा, जनाब ।”
“स्टेशन वैगन में देखो । सम्भव है इसने फिल्मों की अदल-बदल कर दी हो ।”
मोटा स्टेशन वैगन की ओर बढा ।
अगले ही क्षण सुनील का कैमरा कुरेशी के हाथ में था । कुरेशी कैमरा हाथ में झुलाता हुआ वापस कार की ओर बढ गया । वह कार में जा बैठा । कार सड़क पर घूमी और वापस नगर की ओर दौड़ चली ।
मोटा जीप में जा बैठा । जीप स्टार्ट हुई और वह भी कुरेशी की कार के पीछे चल पड़ी ।
कुछ ही क्षण बाद दोनों गाड़ियां सुनील की दष्टि से ओझल हो गई ।
सुनील लड़खड़ाता हुआ अपने पैरों पर उठ खड़ा हुआ । उसने स्टेशन वैगन के सहारे अपने शरीर को टिकाया और कांपते हाथों से जेब से लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकाला । उसने एक सिगरेट सुलगाया और उसके छोटे-छोटे कश लेने लगा ।
सफलता एक छलावे की तरह उसके बहुत करीब से गुजर गई थी ।
हार की वजह से उसके शरीर में हो रही पीड़ा का अहसास और भी बढ गया था ।
उसने एक गहरी सांस ली और वापस काबुल पहुंचने की तरकीब सोचने लगा । उसे यह भी मालूम नहीं था कि वह कहां था और काबुल से कितनी दूर था ।
गाड़ी की बायीं ओर के दोनों टायर पूरी तरह ध्वस्त हो चुके थे । उसने इग्नीशन में से चाबी निकाली और गुच्छे में मौजूद एक दूसरी चाबी की सहायता से डिक्की का ताला खोला ।
शायद डिक्की में दो स्पेयर पहिये (स्टेपनी) मौजूद हों - वह मन ही मन सोच रहा था ।
डिक्की में पड़ा सामान एक बड़ी-सी तिरपाल से ढका हुआ था । सुनील ने तिरपाल की ओर हाथ बढाया और फिर ठिठक गया ।
तिरपाल के नीचे से किसी का जूते से ढंका एक पांव झांक रहा था ।
सुनील ने हाथ बढाकर तिरपाल को एक ओर उलट दिया । नीचे से एक मुड़ा-तुड़ा शरीर प्रकट हुआ । उसके मुंह पर पट्टी बंधी हुई थी और शरीर पर केवल एक अंडरवियर और बनियान थी । वह होश में था और आतंकित नेत्रों से सुनील की ओर देख रहा था ।
“तुम्हारा नाम जय भगवान है ?” - सुनील ने पूछा ।
वह आदमी जल्दी-जल्दी स्वीकारात्मक ढंग से सिर हिलाने लगा ।
सुनील ने उसके बन्धन खोल दिये और उसे सहारा देकर डिक्की से निकाला । लेकिन उस आदमी में अभी अपने पैरों पर खड़े होने की शक्ति नहीं थी । वह लड़खड़ाया और सड़क पर ढेर हो गया ।
पांच मिनट तक सुनील उसके हाथ-पैरों की मालिश करता रहा, तब कहीं जाकर उसके शरीर में रक्त का संचार व्यवस्थित हुआ । वह सुनील का सहारा लेकर उठा खड़ा हुआ ।
“क्या हुआ था ?” - सुनील ने पूछा ।
“आप कौन हैं, साहब ?” - उत्तर देने के स्थान पर जय भगवान ने प्रश्न किया ।
“मेरा नाम सुनील है ।” - सुनील बोला - “कुलकर्णी साहब के आदेश पर होटल मेट्रोपोल में तुम मुझे लेने आने वाले थे ।”
जय भगवान ने सुनील को दोबारा नमस्कार किया ।
“क्या हुआ था ?” - सुनील ने फिर प्रश्न किया ।
उत्तर में जय भगवान ने जो कहानी सुनाई, वह बहुत सीधी और सक्षिप्त थी । वह दूतावास से गाड़ी लेकर होटल मेट्रोपोल की ओर आ रहा था । रास्ते में एक स्थान पर उसे सड़क बन्द मिली । सड़क पर एक कतार में पांच-छः ड्रम रखे थे जिनकी वजह से सड़क ब्लाक हो गई थी । ड्रमों के सामने ‘सड़क बन्द है’ की तख्ती लगी हुई थी । अभी वह गाड़ी में ही बैठा था कि ड्रमों के पीछे से चार-पांच सशस्त्र आदमी निकल आये । आनन-फानन उन्होंने जय भगवान को अपने अधिकार में कर लिया । एक आदमी ने उसकी वर्दी उतारकर खुद पहन ली । उसे हाथ-पांव बांधकर डिक्की में तिरपाल के नीचे डाल दिया । उसके बाद से तब तक क्या हुआ था, उसे खबर नहीं थी । हां, उसे बेहद तेज रफ्तार से चलती गाड़ी और फायरिंग का आभास जरूर था ।
“सुनो, जय भगवान” - उसकी कहानी सुन चुकने के बाद सुनील बोला - “यह स्टेशन वैगन तो बेकार हो गई है । तुम क्या किसी प्रकार मुझे दूतावास में कुलकर्णी साहब के पास पहुंचा सकते हो ?”
“अभी और थोड़ी देर बाद इस सड़क पर मोटरों का आना-जाना आरम्भ हो जायेगा ।” - जय भगवान बोला - “मैं किसी से लिफ्ट मांगने की कोशिश करूंगा । दूतावास की गाड़ी देखकर कोई न कोई न कोई जरूर लिफ्ट दे देगा ।”
सुनील चुप रहा । उसने एक सिगरेट सुलगा लिया और स्टेशन वैगन का सहारा लेकर प्रतीक्षा करने लगा ।
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