प्रस्तावना 

हसीनाबाद, मुगलकालीन उत्तर भारत।

उस वक्त रात आधी से अधिक गुजर चुकी थी, जब महल में हुई तेज हलचल सुल्तान आलमबेग की नींद में खलल का सबब बन गयी।

“ये क्या बदतमीजी है?” दहाड़ता हुआ सुल्तान नींदगाह से बाहर आया।

एक ताबेदार, जो वाकये की खबर करने के लिए सुल्तान के कमरे की ही ओर आ रहा था, सुल्तान को खुद बाहर आया देख चाल में तेजी लाकर उसके करीब पहुँचा और छाती पीटते हुए बोला- “श....शा...शाहजादी..महविश।”

“क्या हुआ उन्हें?” सुल्तान घबराया और किसी मनहूस खबर के साथ आये उस ताबेदार का गिरहबान थाम लिया- “फ़ौरन अर्ज करो।”

“शाहजादी महविश अपनी नींदगाह में लहुलुहान हैं।” ताबेदार ने खौफ खाते हुए कहा।

‘शाहजादी लहुलुहान हैं?’ सुनते ही सुल्तान सन्न रह गया। कई पलों तक खामोश रहकर ताबेदार को घूरता रहा और फिर जब उसका गिरहबान छोड़कर वहाँ से गायब हुआ तो सीधा शाहजादी के कमरे के सामने नुमाया हुआ, जहाँ ताबेदारों, बांदियों और सिपाहियों का हुजूम पहले ही जमा हो चुका था। सुल्तान अंदर दाखिल होने को हुआ ही था कि बांदियों द्वारा रोक दिया गया।

“शाहजादी अभी दीदार की हालत में नहीं हैं सुल्तान। उनके बदन पर मौजूद कपड़े तार-तार हैं। हकीम साहिबा को बुलावा भेजा गया है।”

“कोई ज्यादती पेश आयी है क्या उनके साथ?” सुल्तान ने तड़पकर पहलू बदला।

“शाहजादी की नींदगाह में कोई दाखिल नहीं हुआ था सुल्तान।” पहरे पर बहाल सिपाही ने कांपते हुए कहा- “हम पूरी तरह मुस्तैद थे।”

“तो फिर ये कैसे मुमकिन हुआ कि कोई नामुराद शाहजादी को लहुलुहान कर गया?”

“हमारे भी हैरत की इन्तहा नहीं है सुल्तान।” दूसरे सिपाही ने सुल्तान से निगाहें चुराते हुए कातर लहजे में कहा- “हम आपसे बयां करते हुए भी खौफ खा रहे हैं।”

“फ़ौरन बयां करो।” सुल्तान जबड़े भींचते हुए बोला।

“हम रोज की मानिंद अपने पहरे पर तैनात थे।” इससे पहले कि सुल्तान उनके खिलाफ़ कोई फरमान जारी कर देता, एक सिपाही ने मुँह खोला- “हमें किसी नाखुशगवार वाकये का अंदाजा तब हुआ, जब हमने नींदगाह से शाहजादी की सिसकियां सुनीं। कायदे का लिहाज करते हुए हमने तुरंत भीतर दाखिल न होकर, बाहर से ही उन्हें आवाज दी लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। शाहजादी की सिसकियाँ यूँ घुटी-घुटी सी थीं, मानो उन्हें जिबह किया जा रहा हो।” सिपाही ठहरकर भय से शुष्क हो रहे अपने हलक को गीला करने लगा। इस दरम्यान एक दूसरे सिपाही ने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाया- “हम किसी ख्याल पर टिक पाते उससे पहले ही हमने परदे के उस पार शाहजादी का अक्स देखा।” कहने के साथ ही सिपाही के चेहरे पर खौफ ने पारवाज किया- “नींद और मदहोशी के आलम में वो...वो खुद अपने बदन पर खंजर चला रही थीं।”

“क्या बकवास कर रहे हो?” सुल्तान बिफर पड़ा- “अपनी जहालत को यकीन न आने वाली कहानी की आड़ में छुपा रहे हो?”

“यकीन करें सुल्तान, हम सही फरमा रहे हैं। हमने शोर मचाकर इस बांदी को भी जगाया, जो शाहजादी के साथ सोती है।”

सुल्तान का रुख अभीष्ट बांदी की ओर हुआ।

“इनके बयान दुरुस्त हैं सुल्तान।” बांदी, सुल्तान का आशय भांपकर बोली- “जब तक हम नींद के आगोश से बाहर आये, तब तक शहजादी अपने कपड़े तार-तार कर चुकी थीं। बदन पर बेशुमार जख्म बना चुकी थीं।”

“मगर क्यों?” सुल्तान चीखा और इसी के साथ बांदी काँप गयी- “क्यों किया उन्होंने ऐसा? क्या उनकी जेहनी हालत ठीक नहीं थी, क्या कोई साया आया था उन पर, जो वे खामोशी से खुद को घायल करती रहीं और तुम्हारी नींद नहीं खुली?”

सुल्तान के सवाल पर माहौल में चुप्पी छा गयी। इस घटना को आसेबी करार तो हर कोई दे रहा था मगर अभी इसे जाहिर तौर पर बयां करने को जल्दबाजी समझ रहा था। सुल्तान ने नींदगाह के दरवाजे पर लटके परदे पर लहरा रहे काले सायों पर नजर डाली, जो शाहजादी की तीमारदारी में लगी बांदियों के थे। कुछ देर बाद एक बांदी बाहर आयी।

“शाहजादी की नब्ज डूबती जा रही है। जख्म बेशुमार हैं और निहायत ही गहरे हैं।”

“क्या...क्या हम भीतर जा सकते हैं?”

बांदी ने दरवाजे से हटकर सांकेतिक सहमति दी। सुल्तान कमरे में दाखिल हुआ, शाहजादी के करीब पहुँचा। बेटी की हालत देख उसके पत्थरदिल कलेजे से भी दर्द का सोता फूट पड़ा। पट्टियों का लाल रंग ये इल्म करा रहा था कि शाहजादी के जख्म इतने गहरे थे कि अस्थाई मरहम-पट्टी के बाद भी लहू का रिसना थमा नहीं था। बांदियां जब-जब लहुलुहान शाहजादी पर नजर डाल रही थीं, तब-तब उनकी बेकरारी में इजाफा हो जा रहा था और वे मचलकर इस उम्मीद में दरवाजे की ओर देखने लगती थीं कि हकीम साहिबा आ चुकी होंगी लेकिन इसके विपरीत सुल्तान, शाहजादी को देखने के बाद बेजान बुत की मानिंद खड़ा रह गया था।

“शाहजादी के जख्म दिखाओ हमें।”

बांदियों ने कुछ देर पहले ही जख्म पर पट्टी बाँधी थी और हाकिम साहिबा की आमद का इन्तजार कर रही थीं लिहाजा सुल्तान के हुक्म को तुरंत अमल में लाने में हिचकिचायीं।

“हमने कहा, जख्म दिखाये जाए हमें।” सुल्तान ने इस बार तल्ख़ लहजे में कहा। उसकी शारीरिक भाषा जता रही थी कि वह शाहजादी के इलाज के लिए किसी नीम-हकीम के दुनियावी इल्म को अब नाकाफी समझने लगा था। शायद कुछ और भी था; कुछ ऐसा, जो राज़दराना था और सुल्तान को बुरी तरह बेचैन व दहशतजदा किये हुए था।

जब एक बांदी ने शाहजादी के हाथ पर बंधी पट्टी को खोल दिया तो सुल्तान ने जख्म से रिसते खून को पट्टी से साफ़ करके उसका दीदार किया। जिस बात का उसे खौफ था, शायद वही हुआ था; ऐसा उसकी भाव-भंगिमाओं में आयी तब्दीली ने जाहिर किया। उसने तड़पकर शाहजादी के ख़ूबसूरत मुखड़े पर नजर डाली तत्पश्चात उस बांदी से मुखातिब हुआ, जिसे शाहजादी की करीबी ताबेदार होने के साथ-साथ उसकी सहेली होने का भी दर्जा हासिल था।

“बीते दिनों में शाहजादी के साथ कोई वाकया हुआ था?” सुल्तान ने उस बांदी से पूछा।

“वाकया हुआ तो जरूर था सुल्तान....।” बांदी ने भयजदा लहजे में कहा- “पर वो इस काबिल नहीं लगता कि इस घटना का सबब बन सके।”

“वाकया क्या था?” सुल्तान का लहजा अधीर हुआ।

“दस रोज़ पहले शिकार के दौरान शहजादी सिपाहियों से बिछड़कर जंगल में अंदर चली गयी थीं।”

“हमें बताया क्यों नहीं गया?” सुल्तान दहाड़ा।

“ये...ये...कोई काबिल-ए-जिक्र वाकया नहीं लगा था हमें और न ही सिपाहियों को क्योंकि शाहजादी ज्यादा वक्त तक गुम नहीं थीं।”

सुल्तान ने बेचैन होकर पहलू बदला, कुछ देर तक विचार किया फिर बांदी से

दोबारा मुखातिब हुआ- “कितने रोज पहले का वाकया है?”

“ठीक से याद तो नहीं सुल्तान मगर चार-छ: रोज पहले की बात है।”

सुल्तान इससे अधिक वहाँ रुकने का सब्र नहीं ला सका। उसने शाहजादी की नाजुक हालत की बाबत हाकिम साहिबा से दरयाफ्त करने के लिए उनके इंतज़ार में वहाँ रुकना जरूरी नहीं समझा और तूफ़ान के वेग से अस्तबल की ओर भागा। सिपाही और अन्य लोग उसके साथ चलने को उद्यत हुए लेकिन उसने उन्हें इशारे से मना कर दिया। अस्तबल में पहुँचकर उसने अपने सबसे उम्दा नस्ल के घोड़े का चुनाव किया और फिर ठिठुरन भरी उस रात की खामोशी को घोड़े की टापों की आवाज़ से चाक-चाक करते हुए जंगल की ओर रवाना हो गया।

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वहाँ की फिजा में हवा का नाम-ओ-निशान तक नहीं था। दरख़्त बुत की मानिंद खड़े थे और किसी अजनबी खौफ के सदके जंगली जानवर भी अपनी-अपनी खोह में दुबके हुए थे। रात का अँधेरा भी यहाँ अन्य इलाकों की अपेक्षा अधिक गाढ़ा था और खामोशी इस दर्जे की थी कि उस इलाके में अभी-अभी दाखिल हुए आलमबेग को अपनी धड़कनें तक सुनाई देती मालूम पड़ती थीं। वह आगे जाने का तमन्नाई था लेकिन न जाने क्यों उसका घोड़ा सामने के दोनों पैर ऊपर उठाकर, खौफ़जदा अंदाज में जोर से हिनहिनाकर आगे बढ़ने से मना कर रहा था। सुल्तान ने कई दफे कोशिश की, घुड़सवारी के तमाम पैंतरे आजमाए लेकिन उसे कामयाबी मयस्सर नहीं हुई। घोड़ा एक बार अड़ा तो अड़ा ही रह गया। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य दीवार उसका रास्ता रोके खड़ी हो।

हारकर आलमबेग घोड़े से नीचे उतरा और पैदल ही आगे बढ़ने का इरादा किया लेकिन फिर उस सर्द वातावरण की रहस्यमयी खामोशी में छिपे उसके आसेबजदा होने के संकेत को भांपकर उसने घोड़े को पुचकारकर पटरी पर लाने की एक कोशिश और की मगर घोड़े को नहीं बहलना था, सो वह नहीं बहला। आखिरकार सुल्तान ने उसे एक दरख़्त से बाँधा और अपने हौसले को काम पर लगाते हुए पैदल ही आगे बढ़ा।

“महविश!” चलते-चलते उसने जोर से पुकारा। क्या उसकी जेहनी हालत बिगड़ रही थी, जो वह यहाँ इस बियावान और भयानक जंगल में उस शाहजादी को पुकार रहा था, जो इस वक्त जख्मों का जखीरा बनी महल में पड़ी हुई थी? जवाब नहीं मिला क्योंकि सुल्तान की पुकार दूर तक गूँजी जरूर मगर रही बेनतीजा ही।

ठोकरें खाता, ठण्ड से ठिठुरता और पल-पल प्रतिपल हौसले के कड़े

इम्तिहान से गुजरता सुल्तान उस रहस्यमयी इलाके में दीवानावार भटकता रहा। तब तक भटकता रहा, जब तक कि जंगल से निकलकर महताबी रोशनी से नहाये हुए एक खुले स्थान में नहीं पहुँच गया और उस नज़ारे का दीदार नहीं कर लिया, जो किसी भी हौसलामंद इंसान के पसीने छुड़ा सकता था। उस नजारे का होना ही ये साबित करने के लिए काफी था कि सुल्तान का शाहजादी को पुकारना बेसबब नहीं था।

वह एक साया था; चाँद की रोशनी में चमक रहा एक काला साया, जो यूँ लहराते हुए आगे बढ़ रहा था, जैसे उसके पाँव जमीन पर न हों। पूर्णतया निर्वस्त्र शाहजादी महविश उसका हाथ थामे हुए और किसी लाश की मानिंद बेहद बेजार हालत में उसके साथ ही चल रही थी। दोनों की पीठ सुल्तान की ओर थी और रुख उस वीरान महल की ओर था, जो अँधेरे में एक विशाल परछाईं सदृश खड़ा था।

“महविश!” बेटी की निर्वस्त्रता से शर्मिन्दा हुए बगैर सुल्तान चीखा- “रुक जाइए शाहजादी।”

मगर कोई नहीं रुका, न तो शाहजादी और न ही साया।

“व...व...वह...छलावा है शाहजादी, हकीकत नहीं है।” सुल्तान फिर चीखा मगर वह चीख भी बेनतीजा निकली।

उनकी ओर दौड़ लगाने के लिए उठे सुल्तान के पैर हवा में ही चक्कर काटकर रह गये, फासले न तय कर सके। आगे न बढ़ पाने की बेबसी ने उसे हताश कर दिया। उसने फिर कोशिश की लेकिन बस दौड़ने का उपक्रम ही कर पाया, वास्तव में नहीं दौड़ पाया।

“म..मेरी बेटी को मत ले जाओ।” सुल्तान एक बार फिर दीन-हीन होकर चीखा मगर नतीजे में कोई बदलाव नहीं हुआ। शाहजादी और महल के दरम्यान फासला सिम्त दर सिम्त सिमटता रहा।

“तुम्हें खुदा का वास्ता, रुक जाओ।” आलमबेग रो पड़ा और किसी ढहती हुई दीवार की भांति घुटनों पर गिर गया।

इस बार साया थमा, सुल्तान की ओर घूमा। अँधेरे में उसका चेहरा ढंग से नुमाया नहीं हुआ मगर फिर भी सुल्तान को ये एहसास हो गया कि उसका चेहरा भयानक था।

“उसे मत ले जाओ।” साये की ओर से प्रतिक्रिया हुई देख सुल्तान के मन में एक उम्मीद जगी। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया मगर साये ने जो हरकत की, वह उसकी उम्मीद के खिलाफ़ थी।

वह सुल्तान के आँसू, उसकी दीनता और बेटी के प्रति उसकी मोहब्बत से

तनिक भी प्रभावित नहीं हुआ और फिर से महल की ओर घूम गया। तत्पश्चात वह उसकी दारुण चीखों को तवज्जो के काबिल न समझते हुए महल में चला गया।

ठीक उसी पल महल में हकीम साहिबा ने महविश के इंतकाल की घोषणा की।