लंबे चाकुओं की रात

तीसरे राइक (जर्मन साम्राज्य) के प्रारंभिक वर्षों के दौरान हिटलर के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके अपने भूरी कमीजधारी तूफानी सैनिकों एस.ए. ने खड़ी कर दी, जिनका नेतृत्व चीफ-ऑफ-स्टाफ अर्नेस्ट रोहम कर रहा था।

रोहम ने युद्ध में गहरे जख्म खाए थे; प्रथम विश्‍व युद्ध का यह अलंकृत सैन्य अधिकारी मुठभेड़ योद्धा था और युद्धोपरांत खुलेआम उपद्रव मचाने के लिए मशहूर था। वह शुरू से ही हिटलर के साथ था। हिटलर को सत्ता दिलवाने का बहुत कुछ श्रेय रोहम के तूफानी सैनिकों को जाता है। नाज़ी राजनीतिक क्रांति में आगे की कतार में रहकर उन्होंने सड़कों पर कब्जा जमाने के लिए कम्युनिस्टों से जबरदस्त भिड़ंत की थी और हिटलर के रास्ते में जिसने भी रोड़ा बनने की कोशिश की, उसे उन्होंने कुचलकर रख दिया।

किंतु वर्ष 1934 आरंभ होने तक, अर्थात् हिटलर द्वारा सत्ता हथियाए जाने के पूरे एक साल बाद, वस्तुस्थिति बदल गई। एक प्रचंड क्रांतिकारी बल के रूप में एस.ए. की उपयोगिता वास्तव में खत्म हो गई थी। जर्मनी के तानाशाह के रूप में अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए हिटलर को सबसे शक्तिशाली जर्मन जनरल स्टाफ की मदद की जरूरत थी, जिसके पास 1,00,000 प्रशिक्षित सैनिक थे और जो उसकी तानाशाही को जब चाहे कुचल देने की ताकत रखते थे।

हिटलर के सामने बड़ी समस्या यह थी कि रोहम और उसके भूरी कमीजों वाले उजड्ड जवान खुद को नई ‘जन सेना’ का मुख्यांश समझने लगे थे, जो नेपोलियन की क्रांतिकारी सेना की तरह जर्मनी की पारंपरिक सेना का स्थान ले लेंगे।

इसके कारण उनके और जनरल स्टाफ के बीच सीधे संघर्ष के हालात पैदा हो गए। वे जर्मनी में सदियों पुरनी जीवन-शैली को मिटाने का दु:साहस दिखा रहे थे। जनरल स्टाफ अपने आप में एक अलग वर्ग था। उसमें धन-संपन्न और विशेषाधिकार प्राप्त लोग थे, जिनमें से बहुत से लोगों की वंश-परंपरा जर्मनी के मध्ययुगीन शूरवीर राजकुमारों से चली आ रही थी। सत्ता की ओर कदम बढ़ाने के दौरान हिटलर ने उनका समर्थन पाने के उद्देश्य से बार-बार उन्हें यह आश्‍वासन दिया था कि वह उनका पूर्व गौरव दिलाने के लिए वर्सेलिस संधि की ‘जंजीरों’ को तोड़ देगा, जिनके रहते सेना में 1,00,000 से अधिक जवान रखने और सेना का आधुनिकीकरण करने पर रोक लगी हुई है।

एस.ए. के साथ कुछ और भी समस्याएँ थीं। बड़ा मुँह खोलनेवाली एस.ए. नेताओं द्वारा पूँजीवाद-विरोधी भावनाओं को भड़काए जाने और बड़ी तादाद में बेरोजगार तूफानी सैनिकों द्वारा उनकी आवाज को और बुलंद लिए जाने से जर्मनी के उन व्यापारियों में बड़ी खलबली मच गई, जिन्होंने हिटलर का समर्थन किया था; क्योंकि हिटलर ने उनको भी बार-बार वचन देकर उनका समर्थन प्राप्त किया था। उनके मामले में उसने परेशानी पैदा करनेवाले मजदूर संघों और मार्क्सवादी आंदोलनकारियों के पर कतरने का वादा किया था, जिसे उसने पूरा किया। लेकिन उसके अपने तूफानी दस्तों के सदस्य दूसरी क्रांति की बात करके मार्क्सवादियों जैसा ही व्यवहार करने लगे थे।

एस.ए. में जो वेतनभोगी थे, उनमें से बहुत से लोगों का राष्ट्रीय समाजवाद के ‘समाजवाद’ में विश्‍वास था और वे आवश्यकता पड़ने पर, किसी दूसरे की कीमत पर भी, जर्मनी की धन-दौलत में अपना हिस्सा हथियाना चाहते थे। वे दूसरी क्रांति के लिए ही संघर्ष कर रहे थे या वे ऐसा ही मानते थे। इस सबके अलावा औसत जर्मन नागरिक भूरी कमीजवालों से नफरत करते थे, जिनका व्यवहार गुंडों जैसा था और जो स्थानीय दुकानदारों से पैसा ऐंठते थे, नई-नई आकर्षक कारों में दिखावा करते घूमते थे, शराब पीते थे और निर्दोष लोगों के साथ मार-पिटाई करते थे तथा उनकी हत्या भी कर देते थे।

हिटलर के लिए एस.ए. का व्यवहार समस्या बनता जा रहा था, जिसके कारण उसका राजनीतिक जीवन और नाज़ी जर्मनी का संपूर्ण भविष्य खतरे में पड़ रहा था।

हिटलर ने एस.ए. समस्या से निपटने की प्रक्रिया शुरू कर दी। फरवरी 1934 के अंत में उसने एक बैठक का आयोजन किया, जिसमें एस.ए. के नेताओं, सेनानायकों के अलावा रोहम तथा जर्मन रक्षा मंत्री जनरल वरनर वॉन ब्लॉम्बर्ग भी मौजूद थे। उस बैठक में हिटलर ने रोहम को सूचित किया कि एस.ए. को जर्मनी में सैन्यबल नहीं बनाया जाएगा बल्कि उसे राजनीतिक समारोहों तक सीमित रखा जाएगा। रोहम ने अपने फ्यूहरर की मौजूदगी में यह बात तुरंत स्वीकार कर ली और ब्लॉम्बर्ग के साथ उस समझौते पर अपने दस्तखत कर दिए।

लेकिन उस बैठक के तत्काल बाद रोहम ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। ‘‘वह बेवकूफ कॉरपोरल जो कहता है, हमारे लिए उसका कोई महत्त्व नहीं है।’’ रोहम ने अपने भूरी कमीजवाले अंतरंग मित्रों को बताया, ‘‘इस समझौते का पालन करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। हिटलर देशद्रोही है और उसके लिए बेहतर यही होगा कि कम-से-कम छुट्टी पर तो चला ही जाए। यदि हम उसके साथ वहाँ तक नहीं पहुँच सकते, हम उसके बिना ही वहाँ पहुँचेंगे।’’

एक भूरी कमीजवाले ने उसकी ये बातें हिटलर के कानों तक पहुँचा दीं। दो माह बाद रोहम ने बर्लिन में एक प्रेस सम्मेलन आयोजित करके अपने लिए और भी गहरी खाई खोद डाली। उस सम्मेलन में विदेशी पत्रकार भी थे। रोहम ने वहाँ बेधड़क घोषणा कर दी—‘‘एस.ए. ही राष्ट्रीय समाजवादी क्रांति है।’’

उस समय एस.ए. के अंदर एक अत्यंत अनुशासित एस.एस. संगठन था, जिसका नेतृत्व हेनरिक हिमलर के हाथों में था। एस.एस. की वफादारी व्यक्तिगत रूप से एडोल्फ हिटलर के प्रति थी, किसी अन्य के प्रति नहीं।

यह समझ जाने पर कि रोहम खतरनाक ढंग से धोखे में आ गया है और संकट में पड़ सकता है, महत्त्वाकांक्षी हिमलर ने अपने निकटतम सहयोगी राइन्हर्ड हेड्रिक के साथ मिलकर साजिश रचनी शुरू कर दी। जल्दी ही एक अन्य मौकापरस्त नाज़ी हरमैन गोरिंग उनसे जुड़ गया, जिसे रोहम के पतन से फायदा होने की उम्मीद थी। उन्होंने मिलकर हिटलर के कानों में रोहम के बारे में झूठी खबरें और आधी-अधूरी सच्चाइयाँ फूँकनी शुरू कर दीं।

इसके परिणामस्वरूप 4 जून को हिटलर और रोहम ने एक-दूसरे से दिल खोलकर बात करने के लिए भेंट की और यह बातचीत पूरे पाँच घंटे तक चली। हिटलर के अनुरोध पर रोहम ने कुछ दिनों बाद यह घोषणा कर दी कि वह ‘निजी अस्वस्थता’ के कारण अवकाश पर जा रहा है और एस.ए. में शामिल सभी 40 लाख सैनिक जुलाई के पूरे महीने छुट्टी पर रहेंगे।

फिर रोहम ने जून के अंत में एस.ए. के शीर्षस्थ नेताओं का एक सम्मेलन बुलाया। यह सम्मेलन म्यूनिख के निकट एक गाँव में होना था। हिटलर ने वादा किया कि वह भी सारी स्थिति साफ करने के लिए उस बैठक में आएगा।

लेकिन वाइस चांसलर फ्रांज वॉन पपेन ने अचानक सारा खेल बिगाड़ दिया। पपेन, जिसने चांसलर बनने में हिटलर की मदद की थी, ने 17 जून को मार्बर्ग विश्‍वविद्यालय में एक भाषण देकर सबको अचंभे में डाल दिया। अपने भाषण में उसने एस.ए. के उजड्ड एवं उपद्रवी व्यवहार की तीखी आलोचना की और सख्त प्रेस सेंसरशिप जैसे नाज़ी अत्याचारों की निंदा की। पपेन ने रोहम की दूसरी क्रांति की संभावना का भी जिक्र किया और उसे रोकने के लिए हिटलर से आग्रह किया।

पपेन के भाषण ने तत्काल जर्मन सेना के नेताओं और एस.ए. के बीच तनाव बढ़ा दिया, जिसके कारण हिटलर की पद-प्रतिष्ठा और जोखिम में पड़ गई।

हालात जल्दी-जल्दी बदतर होते चले गए। कुछ दिनों बाद 21 जून को हिटलर ने राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडेनबर्ग से उनके ग्राम्य आवास पर जाकर भेंट की। वयोवृद्ध राष्ट्रपति, जिनके साथ जनरल ब्लॉमबर्ग थे, ने हिटलर को कठोर फटकार लगाई कि या तो एस.ए. समस्या को हल किया जाए या वह खुद, यानी राष्ट्रपति, सैनिक शासन की घोषणा कर देंगे और देश को जर्मन सेना के अधीन कर दिया जाएगा तथा नाज़ी शासन पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा।

इस बीच हिमलर और हेड्रिक ऐसी अफवाहें फैलाने में लगे रहे कि रोहम और एस.ए. एक पूर्ण क्रांति की योजना बना रहे हैं। हिमलर ने जनरल स्टाफ सदस्यों से भी मुलाकात की और इस आश्रय का एक गुप्त समझौता किया कि एस.ए. के विरुद्ध की जानेवाली किसी भी काररवाई में एस.एस. और सेना के बीच सहयोग बना रहेगा। सेना ने हथियार और परिवहन मुहैया कराना स्वीकार कर लिया, लेकिन इस शर्त पर कि वे अपनी बैरकों में रहेंगे तथा एस.एस. को स्थिति से निपटना होगा।

हिमलर और गोरिंग के सामने अब समस्या यह थी कि हिटलर की मंजूरी के बिना कोई कदम नहीं उठाया जा सकता था। हालाँकि हिटलर पर चारों तरफ से दबाव डाला जा रहा था कि रोहम के खिलाफ काररवाई की जाए, फिर भी उसके लिए अपने पुराने सैनिक साथी तथा उस एस.ए. संगठन के खिलाफ काररवाई का आदेश देना वास्तव में कठिन कार्य था, जिसने उसका हर तरह साथ निभाया था। हिटलर की हिचकिचाहट के जवाब में गोरिंग ने हिमलर एवं हेड्रिक के साथ दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से और भी अधिक अफवाहें फैलाना शुरू कर दिया।

25 जून आते-आते जर्मन सेना को चौकस कर दिया गया। सभी छुट्टियाँ रद्द हो गईं और सैनिकोें को हिमलर करार के मुताबिक बैरकों में बंद कर दिया गया।

तीन दिन बाद गुरुवार, 28 जून को हिटलर और गोरिंग इसेन नगर में एक विवाह में शामिल हुए। उसी कार्यक्रम के दौरान हिटलर को टेलीफोन पर बुला कर हिमलर ने यह खबर दी कि उसे रोहम की आसन्न क्रांति और उन प्रभावशाली उदारवादियों द्वारा किए जा सकनेवाले विद्रोह का दोहरा खतरा है, जो चाहते हैं कि हिंडेनबर्ग फौजी शासन लगा दे।

यह मानकर कि उसका सबकुछ खतरे में है, हिटलर ने गोरिंग को वापस बर्लिन भेज दिया और उसको एस.ए. तथा उदारवादियों को दबाने की योजना बनाने की मंजूरी दे दी। हिमलर के एस.एस. संगठन को भी सतर्क कर दिया गया।

शुक्रवार 29 जून को हिटलर ने वेस्टफैलिया में लेबर सर्विस शिविरों का निर्धारित निरीक्षण दौरा किया और फिर रात बिताने के लिए बॉन के निकट एक होटल में चला गया। उसे देर रात हिमलर और गोरिंग से लगातार फोन आते रहे और ऐसी सूचनाएँ मिलती रहीं कि एस.ए. सैनिकों को किसी तरह भनक लग गई है कि उनके खिलाफ काररवाई किए जाने की योजना है और अब वे जवाबी हमले की तैयारी कर रहे हैं। हिटलर ने प्रात: 2 बजे होटल छोड़ दिया और विमान द्वारा म्यूनिख चला गया, जहाँ वह रोहम और एस.ए. नेताओं से व्यक्तिगत रूप से मिलना चाहता था, जो पास ही की बॉड विएसी सैरगाह में जमा थे।

हिटलर 30 जून (शनिवार) की सुबह म्यूनिख पहुँचा और गाउलाइटर एडोल्फ वैगनर ने उसे सूचित किया कि एस.ए. के लोगों ने रात में सड़कों पर कुछ प्रदर्शन किए थे, लेकिन बाद में प्रदर्शनकारी तितर-बितर हो गए। विश्‍वासघाती प्रदर्शनों की खबर से हिटलर बहुत क्रोध में आ गया। एस.एस. अर्थात् अपने अंगरक्षकों के साथ वह म्यूनिख में राज्य मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट) भवन में गया, जहाँ एस.ए. के तीन उच्चाधिकारियों से उसका सामना हुआ और हिटलर ने उनकी वरदी से नाज़ी निशान खींचकर उतार दिए।

इसके बाद रोहम से मिलने की बारी थी। हिटलर और एस.एस. को लेकर कारों का एक काफिला बॉड विएसी रिसॉर्ट की ओर चल पड़ा। रास्ते में उन्हें सैप डाइट्रिच के नेतृत्व में हिटलर के व्यक्तिगत अंगरक्षकों से भरे ट्रक मिले, जो उनके काफिले के पीछे हो लिये।

वे सुबह 6.30 बजे जब वहाँ पहुँचे, एस.एस. ने हिटलर के अंदर जाने से पहले होटल को निरापद कर लिया। कई एस.एस. जवानों को साथ लेकर हिटलर अंदर गया और उसने रोहम के दरवाजे को खड़काया। एस.ए. नेता रोहम ने जब दरवाजा खोला तो हिटलर को सामने देखकर चौंक गया और फिर कई मिनट तक हिटलर उस पर चीखता-चिल्लाता रहा, उसे धोखेबाज कहता रहा।

‘‘अर्नेस्ट!’’ हिटलर ने अंतत: घोषणा की, ‘‘तुम्हें गिरफ्तार किया जाता है।’’

इस घटना से हिटलर और नाज़ी पार्टी के एक आरंभिक सदस्य के बीच पंद्रह साल का संबंध टूट गया। रोहम तथा झिंझोड़कर जगाए गए अन्य एस.ए. सैनिकों को एस.एस. की हिरासत में म्यूनिख के बाहर स्टेडिल्हैम जेल भेज दिया गया। एक एस.ए. नेता एडमंड हाइंस को एक युवक के साथ बिस्तर में पाया गया। हिटलर को जब यह खबर दी गई तो उसने उसे तत्काल सूली पर चढ़ाने का हुक्म दे दिया।

रोहम सहित अनेक एस.ए. नेता समलैंगिक थे और यह बात जग-जाहिर थी। उनसे पीछा छुड़ाने से पहले हिटलर उनके व्यवहार की उपेक्षा इसलिए करता रहा, क्योंकि वे उसके लिए काम के आदमी थे। किंतु उनकी उपयोगिता और हिटलर की सहन-शक्ति अब समाप्त हो गई थी। बाद में उनको मृत्युदंड दिए जाने के लिए उनकी समलैंगिकता को भी एक आंशिक कारण बताया गया।

शनिवार, सुबह 10 बजे हिटलर ने बर्लिन में गोरिंग को फोन करके पूर्वायोजित सांकेतिक शब्द ‘कोलिब्री’ (मरमर पक्षी) दिया, जिसका मतलब था—पूर्ण शुद्धीकरण की मंजूरी। यह इशारा मिलते ही एस.एस. ने बर्लिन तथा 20 अन्य नगरों में एस.एस. ने हिंसा का खूनी खेल शुरू कर दिया। जेस्टेपो और गोरिंग की प्राइवेट पुलिस के साथ एस.एस. जल्लादी दस्तों ने सड़कों पर हर तरफ तलाशी अभियान चलाकर एस.ए. नेताओं और उस प्रत्येक व्यक्ति को मौत के घाट उतारने की मुहिम छेड़ दी, जिनके नाम तैयार की गई शत्रु-सूची में थे।

उसी शाम थका-माँदा तथा बढ़ी दाढ़ी लिये हिटलर, जो चालीस घंटों से भी अधिक समय से सोया नहीं था, विमान से वापस बर्लिन चला गया। गोरिंग और हिमलर उसे हवाई अड्डे पर मिले।

हिटलर की आनाकानी के बावजूद गोरिंग और हिमलर उसे अर्नेस्ट रोहम को मृत्युदंड देने की मंजूरी के लिए बराबर कुरेदते रहे। रोहम स्टेडिल्हैम जेल के अंदर अपनी कोठरी में बैठा हुआ था। रोहम को एक पिस्तौल दी गई, जिसमें सिर्फ एक गोली थी और उसे खुद को गोली मारने के लिए दस मिनट का समय दिया गया। लेकिन रोहम अंत तक अपनी जिद पर अड़ा रहा और उसने खुदकुशी करने से मना कर दिया। ‘‘अगर मुझे मारना ही है तो एडोल्फ खुद आकर मुझे मार दे।’’

पंद्रह मिनट के बाद दो एस.एस. अधिकारी रोहम की कोठरी में दाखिल हुए और उन्होंने अत्यंत निकट से उसे गोली मार दी।

जेल में पड़े अन्य एस.ए. उच्चाधिकारियों को भी डाइट्रिच के आदेशाधीन एस.एस. के गोलीमार दस्ते ने योजनाबद्ध तरीके से खत्म कर दिया। डाइट्रिच ने प्रत्येक दंडित एस.ए. सैनिक को सूचित कर दिया था—‘‘तुम्हें बड़े देशद्रोह के लिए फ्यूहरर द्वारा मृत्युदंड दिया गया है। हिटलर की जय हो!’’

एक और गोलीमार दस्ता बर्लिन के निकट लिश्टरफील्ड बैरकों में काम कर रहा था। ठीक घड़ी की तरह हर बीस मिनट बाद गोलियाँ चलने की आवाज आती, जब एस.ए. सैनिकों को दीवार के सहारे खड़ा करके आदेश दिया जाता—‘‘फ्यूहरर के हुक्म से निशाना साधो, गोली दागो!’’

1 जुलाई, रविवार की शाम, हालाँकि गोली मारने का कुछ दौर अभी भी जारी था, हिटलर ने बर्लिन में राइक चांसलरी उद्यान में मंत्रिमंडल के सदस्यों एवं उनके परिवारों के लिए बड़े ही सहज ढंग से एक चायपान का आयोजन किया, ताकि ऐसा लगे कि हालात सामान्य हो रहे हैं।

सोमवार, 2 जुलाई को प्रात: 4.00 बजे, हिटलर के कहने पर 72 घंटे तक चला खूनी खेल समाप्त हो गया। कितने लोगों की हत्या की गई, यह तो ठीक-ठीक पता नहीं, क्योंकि ‘शुद्धीकरण’ से संबंधित जेस्टेपो दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया था। अनुमान के अनुसार, मारे गए लोगों की कम-से-कम संख्या 200 और अधिकतम 1,000 या उससे भी ज्यादा हो सकती है। मारे गए लोगों में आधे से भी कम एस.ए. सैनिक थे। हिटलर, गोरिंग, हिमलर और हेड्रिक ने अपने-अपने पुराने बदले चुका लिये।

शुद्धीकरण, अर्थात् बागियों को मार गिराए जाने के बाद, हिटलर को राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग से एक बधाई तार प्राप्त हुआ, जिसमें इस बात के लिए उसकी सराहना की गई थी कि उसने ‘निर्णीत काररवाई और वीरोचित व्यक्तिगत हस्तक्षेप द्वारा राजद्रोह का समय रहते दमन करके जर्मन लोगों को बड़े खतरे से बचाया है।’ जर्मन सेनाध्यक्षों ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त करते हुए उसकी काररवाई को उचित ठहराया।

हिटलर के लिए अब एक ही काम बाकी बचा था कि इस काररवाई से स्तब्ध रह गए जर्मन लोगों और संदेहशील विदेशी प्रेस को स्थिति किस तरह स्पष्ट की जाए। 13 जुलाई को वह नाज़ी राइचस्टैग के सामने पेश हुआ और दो घंटे का भावपूर्ण भाषण दिया, जो उसके जीवन का एक सबसे महत्त्वपूर्ण संबोधन साबित हुआ। उसने विद्रोह से संबंधित विभिन्न अफवाहों को सच बतलाते हुए हत्याओं को उचित ठहराया और फिर अपनी काररवाई की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली तथा यह ऐलान किया कि 70 लोग अवश्य मारे गए हैं।

हिटलर ने इस तरह न केवल भूरी कमीज के खतरे को मिटा दिया बल्कि अपने आपको जर्मन लोगों का सर्वोपरि न्यायकर्ता भी घोषित कर दिया, अर्थात् खुद को उसने कानून से भी ऊपर रखा।

जर्मन सेनाध्यक्षों ने बागियों के सफाए की उपेक्षा या अनदेखी करते हुए हिटलर के कदम में कदम मिला लिये और फिर उस राह पर चल पड़े, जो अगले ग्यारह वर्षों में उन्हें विश्‍व-विजय के कगार तक और अंतत: न्यूरेंबर्ग में फाँसी के तख्ते पर पहुँचा देगी।

सफाए के कुछ सप्ताह बाद हिटलर ने एस.एस. को स्वतंत्र विभाग का दर्जा देकर हिमलर को पुरस्कृत किया। हिमलर अब एस.ए. का हिस्सा नहीं रहा, वह अब केवल हिटलर के प्रति उत्तरदायी था। बागियों का सफाया करने की योजना के दूसरे सूत्रधार राइन्हर्ड हेड्रिक को लेफ्टिनेंट जनरल बना दिया। जिन एस.एस. सैनिकों ने वास्तव में बागियों को गोली मारी थी, हिटलर ने उनमें से प्रत्येक को एक-एक कटार दी, जिन पर विशेष रूप से एस.एस. का नाम उत्कीर्ण था।

हिटलर को अब भूरी पोशाकवाले सैनिकों का खतरा नहीं रहा और समय बीतने के साथ-साथ लगभग सभी नियमित सेना में सम्मिलित हो गए, जब हिटलर ने सेना में दुबारा जबरन भरती शुरू कर दी। लेकिन जर्मनी के सामने एक नया और पहले से भी बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया—हिमलर के काले कोटवाले एस.एस. सैनिकों के रूप में। वे पूरी तरह हिटलर के वफादार थे। आज्ञा मिलने पर वे किसी को भी मार देंगे और एक महाद्वीपीय स्तर पर फ्यूहरर के वैयक्तिक आतंक का साधन और एक विशाल सैन्य बल में तब्दील हो जाएँगे।

वर्ष 1934 के ग्रीष्मकाल में केवल एक आदमी बचा था, जो एडोल्फ हिटलर और जर्मनी में परम सत्ता के बीच खड़ा था। वह व्यक्ति था 87 वर्षीय राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडेनबर्ग, जो अपने ग्राम्य-आवास में मरणासन्न पड़ा हुआ था। कई सप्ताह तक हर कोई मन में बार-बार उठ रहे इस सवाल के साथ उस वयोवृद्ध के निधन की प्रतीक्षा कर रहा था कि बाद में जर्मनी के भविष्य का क्या होगा! लेकिन हिटलर को निश्‍चित पता था कि आगे क्या होने वाला है।