फाह्याज़ की आँखें हैरत से फ़ैली हुई थीं। जीवन में पहली बार उसने ऐसी कोई औरत देखी थी, जिसके ऊपर सफ़ेद बालों वाली परी की उपमा बिल्कुल सटीक बैठ रही थी। कम उम्र में बालों के सफ़ेद हो जाने वाली बीमारी का ख्याल करके वह अपनी हैरानी कुछ हद तक कम कर सकता था लेकिन नहीं कर सका क्योंकि सामने खड़ी उस औरत की भंवें भी पूरी तरह सफ़ेद थीं। सिर्फ़ सफ़ेद ही नहीं थीं बल्कि निहायत ही घनी भी थीं। उपर्युक्त अपसामान्यताओं को भूलकर फाह्याज़ उसे साधारण महिला समझने की कोशिश करता भी तो उसका ध्यान उसके अजीब से पहनावे पर चला जाता था, जो जमीन पर काफ़ी दूर तक फैला हुआ एक सफ़ेद मखमली चोगा था। आधुनिक परिवेश में ऐसा परिधान पूरी तरह अनपेक्षित था। महिला को देखकर उसे बार-बार रामानंद सागर की ‘अलिफ़-लैला’ में दिखाई जाने वाली जादूगरनियों की ख्याल आ रहा था।

फाह्याज़ विचित्रताओं से भरी उस महिला के दीदार में डूबा हुआ था कि उसका सेलफोन बजा। जेब से मोबाइल बरामद करके जब उसने डिस्प्ले पर नजर डाली तो पाया कि कामरान का फोन था, जिसे रिसीव करना इस पल उसे जरूरी नहीं लगा लिहाजा उसने कॉल रिजेक्ट कर दी।

“आदाब।” महिला ने अभिवादन किया।

फाह्याज़ तुरंत कोई भाव नहीं व्यक्त कर पाया और जब व्यक्त करने के काबिल हुआ तो बस इतना ही कह पाया- “आप...आप...।”

“फ़िज़ा, तबस्सुम की अम्मी।”

अगले ही पल फाह्याज़ को लगा उसका जेहन अंतरिक्ष में तैर रहा है। उसने पलकें झपकाकर सामने खड़ी औरत को देखा, कई बार देखा लेकिन दृश्य नहीं बदला। थोड़ी देर पहले जहाँ उसने अजीब सी औरत को खड़ी पाया था, वहाँ अब सलवार और सूट में एक साधारण औरत खड़ी थी।

“आप ठीक तो हैं?” फ़िज़ा, फाह्याज़ को यूँ पलकें झपकाते देख हैरान हुई।

“ह..हाँ....।” फाह्याज़ ने लड़खड़ाते लहजे में जवाब दिया।

“प्लीज बैठ जाएँ आप।”

वह सोफे पर दोबारा बैठ तो गया लेकिन ये यकीन उसे अब भी नहीं हुआ था कि उसकी नज़रों ने उसके साथ धोखा किया था। ऊहापोह में उलझा वह आदमी ये नहीं देख पाया कि उसकी मनोदशा को देख फ़िज़ा के होठों पर एक अर्थपूर्ण मुस्कान उभरी थी।

“मुझे आपसे कुछ बात करनी है।” कुछ हद तक संभलने के बाद फाह्याज़ ने कहा।

“आप नेक्रोमेंसी के निशान के बारे में बात करना चाहते होंगे।” फ़िज़ा का लहजा संजीदा हुआ- “इन्हीं सब वजहों से मैंने हसन से कहा था कि वह निशान के बारे में किसी को न बताये, अपने घरवालों को भी नहीं।”

“आपको पता है मोहतरमा कि किसी बच्चे के दिमाग में भयानक बातें डालना कितना ऑफेंसिव है?” फाह्याज़ ने तल्ख़ लहजे में पूछा।

“बिल्कुल पता है। हाँ, ये जरूर नहीं पता है मुझे कि मैंने किस बच्चे के मन में क्या भयानक बातें डाली हैं। क्या आप बतायेंगे?”

फाह्याज़ ने जेब से वह कागज़ निकालकर सेंटर टेबल पर फैला दिया, जिस पर

नेक्रोमेंसी का सिगिल था तत्पश्चात फ़िज़ा से कठोर लहजे में पूछा- “क्या है ये?”

“बताया तो कि ये नेक्रोमेंसी का सिगिल है। जैसे ओम, स्वास्तिक, सेवेन एट सिक्स का सिंबल होता है, वैसे ही ये भी एक सिंबल है।”

“बात को घुमाइए मत। आपने जो उदाहरण दिए, वे रेलिजियस स्क्रिप्चर्स हैं लेकिन इस निशान का ताल्लुक किसी रिलिजन से नहीं है। ये मौत का दस्तखत है, जो किन्हीं ख़ास कारणों से चुने हुए कुछ ख़ास लोगों के जिस्म पर तब नुमाया हुआ है, जब उनके मरने में महज़ कुछ दिन बाकी थे।”

फाह्याज़ की बात सुनकर फ़िज़ा ने पहले उसे घूरा फिर जोर-जोर से हँसने लगी। उसकी ये हरकत फाह्याज़ को भीतर तक सुलगा गयी।

“आपको शायद अंदाजा नहीं है मैम, मैं इसी वक्त आपको हिरासत में ले सकता हूँ।”

“अगर ऐसा है तो पहले चंचला पाठक को हिरासत में लीजिए।” सहसा फ़िज़ा की हँसी थम गयी और उसका लहजा अप्रत्याशित संजीदगी से भर गया- “क्योंकि तबस्सुम बताती है कि वो भी बच्चों को जिन्नों की कहानियाँ सुनाती हैं।”

“कहना क्या चाहती है आप?” फाह्याज़ के ललाट पर लकीरें उभरीं।

“हिंदी में ही कहा है जनाब, फिर से कहती हूँ। अगर आप बच्चों को फंतासी कहानियाँ सुनाने को एक क्राइम मानते हैं तो उस टीचर को भी हिरासत में लीजिए, जो एक्स्ट्राकैरिकुलर एक्टिविटी की क्लास में बच्चों को ऐसी कहानियाँ सुनाती है। अरेबियन नाइट्स की बिक्री पर रोक लगवा दीजिए क्योंकि एक हजार एक रातों वाली वह दास्ताँ जिन्नों, जादूगरों और परियों की कहानियों से ही भरी पड़ी है।”

“यू मीन, कल आपने मेरे बेटे को नेक्रोमेंसी का निशान देते हुए उससे जो कुछ कहा था, वह महज़ उसका दिल रखने के लिए कहा था?”

“तो क्या आप ये मानकर यहाँ चले आये कि मैं आपके बेटे को जादू-टोना सीखा रही हूँ?” फ़िज़ा ने फाह्याज़ पर यूँ निगाहें जमा दीं मानो उसके हाँ कहते ही जोर-जोर से हँसेगी। फाह्याज़ उसके इरादे को ताड़ गया, इसलिए केवल कसमसाते हुए पहलू बदलकर रह गया।

“मैं अपनी बेटी पर ये तरीका तब से आजमा रही हूँ, जब से उसके अब्बू की रोड एक्सीडेंट में मौत हुई है।” फ़िज़ा ने कहा- “मेरा मानना है कि नींद आने से पहले के आख़िरी पलों में इंसान जिसका ख्याल करता है, वह उसके सपने में जरूर आता है। बच्चों का मन जादुई चीजों पर आसानी से यकीन कर लेता है बजाय लम्बी-चौड़ी दलीलों के, इसलिए अपने यकीन पर तबस्सुम को यकीन दिलाने के लिए मैंने ये फंतासी गढ़ी है कि नेक्रोमेंसी का सिगिल आँखों में बसाकर मरहूम को याद करते हुए सोया जाए तो मरहूम सपने में जरूर आते हैं। कल आपके बेटे हसन को भी मैंने यही बताया था, इट्स सिंपल”

फाह्याज़ का तनाव कुछ हद तक शिथिल पड़ा लेकिन उसकी नायाकीनी अब भी बरकरार रही।

“मैंने कभी ऐसी थ्योरी के बारे में नहीं सुना कि जागने के लास्ट मोमेंट में किसी को याद करते हुए सोने से वह सपने में आता है।”

“ये कोई थ्योरी नहीं, अनुभव की बात है। मैंने जो अनुभव किया है, वही अपनी बेटी को सिखाया और कल आपके बेटे को भी वही बताया मैंने। हो सकता है इस मामले में आपका अनुभव कुछ और हो।”

“लेकिन आपने जो फंतासी गढ़ी, उसमें नेक्रोमेंसी के भयानक निशान को ही क्यों शरीक किया, कोई और निशान क्यों नहीं लिया आपने?”

“मुझे नहीं मालूम कि आपको नेक्रोमेंसी का ये साधारण सा निशान भयानक क्यों लग रहा है। जबकि गूगल पर केवल सिगिल ऑफ़ नेक्रोमेंसी सर्च कीजिए, ऐसे बेशुमार निशान मिल जाएँगे आपको।”

“वेट अ मिनट।” फाह्याज़ ने अपने सेलफोन में मौजूद विनायक की डेड बॉडी की वो तस्वीरें फ़िज़ा के सामने पेश कीं, जिनमें उसकी छाती पर बना निशान नजर आ रहा था- “ये आदमी मर चुका है, इसके बदन पर यही निशान था। मेरी वाइफ भी मर चुकी है, उसकी हँसली पर भी यही निशान उभर रहा था।”

“इट्स नॉट अ बिग मिस्ट्री।” फ़िज़ा ने लापरवाह अंदाज में कहा- “टैटू के दीवाने लोग तो इससे भी अजीब टैटू बनवाते हैं।”

“पर इन दोनों केसेज में कोई भी टैटूज का शौक़ीन नहीं था, न तो विनायक और न ही मेरी वाइफ।” फाह्याज़ कुछ देर तक फ़िज़ा को घूरता रहा फिर बोला- “दोनों के बदन पर ये निशान खुद ब खुद उभरा था। साधारण लगने वाला ये निशान साधारण नहीं है मैडम क्योंकि ये अनगिनत मौतों से जुड़ा हुआ है। एक चित्रकार किसी आदमी का चित्र बनाता है, फिर वह आदमी दिमागी बीमारी का शिकार होता है, उनके बदन पर ये निशान बनता है और अंत में वह खुद से ही खुद के बदन को काट डालता है।”

“हम्म।” फ़िज़ा ने गर्दन हिलाई- “विनायक शुक्ला का केस अखबार में पढ़ा था मैंने और ये भी पढ़ा था कि मकतूल को दिमागी मरीज करार देते हुए पुलिस ने केस क्लोज कर दिया है।”

“वह हमारी ही ज्युरिडिक्शन का मामला है। हमें कुछ क्लू मिले हैं इसलिए हम उस केस को री-इन्वेस्टिगेट कर रहे हैं।”

“और वो क्लू है नेक्रोमेंसी का निशान, जो न जाने कितनी वेबसाईट पर और कितनी फिल्मों में मिल जाएगा, है न?” फ़िज़ा इतनी तीक्ष्ण मुस्कान मुस्कायी कि फाह्याज़ बमुश्किल खुद को जब्त कर पाया- “कितना दिलचस्प वाकया है, पुलिस किसी फैटेंसी कहानी की बुनियाद पर एक केस को इन्वेस्टिगेट कर रही है, ऐसा तो मैंने आज तक फिल्मों और ड्रामो में भी नहीं देखा था।”

फाह्याज़ का दिल हुआ कि वह फ़िज़ा के सामने अपने साथ हुए हर वाकये को तफ्शील से बया कर दे लेकिन वह नहीं चाहता था कि महिला एक कदम और आगे बढ़कर उसे दिमागी मरीज समझ ले।

“जिन पर गुजरती है, वही जानता है मैडम।” प्रत्यक्ष में उसने कहा- “जिसे आप फंतासी कह रही हैं, उसी फंतासी की भेंट न जाने कितने लोग चढ़ चुके हैं, खुद मेरी वाइफ भी।”

“अगर इस केस के साथ आपके सेंटिमेंट्स जुड़े हुए हैं और मैंने उन्हें हर्ट कर दिया हो तो आयम रियली सॉरी।” फ़िज़ा ने गहरी साँस लेकर कहा- “लेकिन नेक्रोमेंसी के निशान के बाबत आप जो सवाल लेकर आये हैं, उसका जवाब मैं आपको विद एक्सप्लानेशन दे चुकी हूँ। अगर आप मुतमईन नहीं हैं तो मुझे अपने वकील को बस एक फोन कॉल कर लेने दीजिए, उसके बाद मैं आपके साथ पुलिस स्टेशन चलने को तैयार हूँ।”

“देखिए मोहतरमा...।” फाह्याज़ ने अपना लहजा विनम्र रखने की पुरजोर कोशिश करते हुए कहा- “हम जानते हैं कि हम जो कुछ कर रहे हैं वो कानून और दुनिया की नज़र में महज़ एक मजाक है लेकिन आप यकीन कीजिए मैं बेवक़ूफ़ नहीं हूँ; मैथेमैटिक्स में फर्स्ट क्लास एम.एससी. हूँ, स्टेट पुलिस में आने से पहले जूनियर रिसर्च फेलोशिप था और फर्स्ट अटेम्प्ट में सी.एस.ई. के इंटरव्यू तक पहुँचा था, बावजूद इसके आज मैं इन दकियानूसी लगने वाली चीजों के पीछे भाग रहा हूँ तो सिर्फ इसलिए क्योंकि...क्योंकि मैं नज़रों से परे बसने वाली अँधेरी दुनिया का असर खुद अपने जीवन में देख रहा हूँ। और...और न जाने क्यों मेरी इनर इंस्टिक्ट बार-बार ये कह रही है कि यू कैन हेल्प अस, यू कैन हेल्प द पुलिस।”

“आपका दिल तोड़ने के लिए माफ़ी चाहती हूँ सर लेकिन मुझसे आपकी ये उम्मीद बेमानी है।”

“आपने कभी जिन्न को देखा है?” सहसा प्रकरण से इतर सवाल पूछकर फाह्याज़ ने फ़िज़ा को चौंका दिया।

“जि...जिन्न?” वह किसी तरह खुद को सोफ़े से उछलने से रोक तो ली लेकिन फाह्याज़ से अपनी बौखलाहट छिपा न सकी।

“हाँ, जिन्न।” फाह्याज़ ने उसकी घबराहट को जेहन में नोट करते हुए कहा- “जिनके बारे में हम मुसलमान मानते हैं कि वो आग से बने होते हैं और उनकी अलग दुनिया होती है।”

“बकवास।” फ़िज़ा ने पुरानी मनोदशा में लौटने की कोशिश करते हुए कहा- “मैं नहीं मानती।”

“तस्वीर दिखाऊँ?” फाह्याज़ के हाथ मानो उसकी कमजोर नस लग गयी।

जवाब में वह खामोश होकर फाह्याज़ को घूरने लगी जबकि फाह्याज़ ने उसकी हाँ का इंतजार किये बिना रहस्यमयी मोमिन की इमेज ओपन करके मोबाइल का डिस्प्ले आगे कर दिया।

उस पल फाह्याज़ के हैरत का कोई ठिकाना नहीं रहा जब उसने पाया कि उस रहस्यमयी मोमिन की तस्वीर, जो लियाकत के मुताबिक़ एक जिन्न था, को देखते ही फ़िज़ा की आँखों में खौफ पारवाज़ करने लगा था और इस दफ़े उसे उस खौफ़ को छिपाने का ख्याल भी नहीं रहा था।

“य..ये...ये....।” वह हकलायी लेकिन अपना कथन पूरा नहीं पायी।

“एक जिन्न है, जो किसी ख़ास मकसद से हमारी दुनिया में घूम रहा है। एक मौलाना से दरयाफ्त की हमने तो उन्होंने बताया कि इस पल ये बेहद गुस्से में है और कुछ भी कर सकता है।” फाह्याज़ ने मानो यज्ञ में आहुति डाल दी।

कुछ देर बाद फ़िज़ा ने तस्वीर पर से अपना ध्यान हटाया और बेचैनी से पहलू बदलने लगी।

“आप जानती हैं इसे?” फाह्याज़ ने अर्थपूर्ण लहजे में पूछा।

“जिस मौलाना ने इसे जिन्न कहा, वह बेवक़ूफ़ है। ये कोई पीर लग रहा है।”

“कमाल है, महज़ एक तस्वीर देखकर पीर-फकीरों पर यकीन होने लग गया आपको?” बातचीत में पहली दफ़ा फाह्याज़ खुद को बीस महसूस करके व्यंग्य भाव से हँसा।

फ़िज़ा कुछ नहीं बोली। उसके चेहरे पर नजर आते खौफ़ का दायरा पल-प्रतिपल बढ़ता जा रहा था।

‘क्या वो जिन्न से डर रही थी? अगर हाँ तो क्यों?’

जब फाह्याज़ के जेहन में उक्त सवालों ने सरगोशी की तो उसने प्रत्यक्ष में पूछा- “वुड यू लाइक टू शेयर समथिंग विद मी?”

“नहीं। ये सब बकवास है, इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कह सकती।”

फाह्याज़ ने कुछ पलों तक फ़िज़ा को घूरा फिर सेंटर टेबल पर पड़ा राइटिंग पैड अपनी ओर खींचा और उस पर पेन चलाते हुए बोला- “अपना मोबाइल नम्बर छोड़कर जा रहा हूँ। अगर कभी इरादा बदलेगा तो फोन कर लीजिएगा।”

नम्बर लिखने के बाद वह उठा और बूटों की भारी आवाज़ उत्पन्न करते हुए बाहर आ गया, जहाँ मेड तोते के पिंजरे में आहार रख रही थी। उसने वालेट से पाँच सौ का नोट निकाला और दबे पाँव मेड के पास पहुँचा।

“इसे रख लो...।” उसने नोट को मेड की मुट्ठी में जबरन ठूंसते हुए धीमे स्वर में कहा- “....और बदले में पुलिस की मदद करो।”

मेड ने हिचकिचाहट के साथ पहले नोट को देखा फिर फाह्याज़ को, तत्पश्चात बोली- “लेकिन...करना..क्या है साहेब।”

“मैडम की हरकतों पर नजर रखो। उनकी कोई गतिविधि संदिग्ध लगे तो तुरंत फोन करना मुझे। मोबाइल नंबर राइटिंग पैड पर लिखकर आया हूँ।”

असमंजस में पड़ी मेड ने सहमति में सिर हिला दिया।