तब शाम ढल रही थी ।
देवराज चौहान और मोना चौधरी चार घंटों से बराबर चलते जा रहे थे । परंतु रास्ता अभी तक खत्म नहीं हुआ था । उस चौड़े रास्ते के दोनों तरफ तरह-तरह के पेड़ लगे हुए थे। कभी फूलों की क्यारियां नजर आने लगती । रास्ता कहीं भी खत्म नहीं होता नजर आ रहा था।
"मेरे ख्याल में ये रास्ता किसी खास जगह पहुंच कर समाप्त होता है ।" मोना चौधरी बोली ।
"हो सकता है ।" देवराज चौहान ने सिर हिलाया--- "तीसरा दिन भी खत्म होने वाला था, परंतु रास्ता खत्म होने को नहीं आ रहा। स्पष्ट है कि ये रास्ता हमें किसी खास जगह ले जा रहा है।"
"मेरी मानो तो रास्ता बदल लेते हैं । "
देवराज चौहान ने मुस्कुराकर मोना चौधरी को देखा ।
"अगर तुम्हें किसी रास्ते का, रहा का ज्ञान है तो बता दो । उस तरफ चल पड़ते हैं।" देवराज चौहान ने कहा ।
मोना चौधरी भी मुस्कुराई ।
"अगर मालूम होता तो, पहले ही तुम्हें बता चुकी होती ।"
उसी पल देवराज चौहान की निगाह रास्ते के किनारे, मौजूद पेड़ के तने पर पड़ी तो वो ठिठक गया । चेहरे पर अजीब से भाव आ गए। आंखें सिकुड़कर छोटी हो गई ।
उस पेड़ के तने के साथ, लोहे की जंजीर से जगमोहन बंधा था।
देखने में जगमोहन की हालत से स्पष्ट लग रहा था कि अब उसमें खड़े रहने की ताकत बाकी नहीं रही । उसका शरीर पूरी तरह खून में डूबा हुआ था । शरीर के अधिकतर हिस्सों पर चोंटे और यातना के निशान थे, जिनसे बहता खून अब सूखने को आ रहा था । मतलब कि उसे यातना दिए वक्त बीत चुका है और उसके बाद उसे जंजीरों से बंधे, यही छोड़ दिया गया।
आहट पाकर बुरे हाल में डूबे जगमोहन ने आंखें खोली तो सामने देवराज चौहान को पाकर, उसके चेहरे पर जैसे जीवन की लहर दौड़ गई।
"देवराज चौहान।" जगमोहन के होठों से पीड़ा से भरा कांपता स्वर निकला।
"जगमोहन ।" देवराज चौहान उसकी हालत देखकर तड़प उठा ।
मोना चौधरी की निगाह भी जगमोहन पर पड़ी।
"जगमोहन को क्या हुआ ?" मोना चौधरी के होठों से निकला ।
देवराज चौहान जल्दी से उस तरफ बढ़ने को हुआ कि तभी बेला की फुसफुसाहट कानों में पड़ी ।
"रुक जाओ देवा । आगे मत बढ़ो । रुक जाओ।"
न चाहते हुए भी देवराज चौहान ठिठका ।
"क्या है ?" दांत भींचे देवराज चौहान बुदबुदाया ।
"वो जग्गू नहीं, तेरी मौत है देवा, जो दालूबाबा ने भेजी है ।" बेला की फुसफुसाहट सुनाई दी।
"क्या मतलब ?" देवराज चौहान बुदबुदाया उसके होंठ भिंचे हुए थे । नजरें जगमोहन पर थी।
मोना चौधरी हैरानी से देवराज चौहान को बुदबुदाते हुए देख रही थी । जगमोहन की तरफ बढ़ते हुए इस तरह रुक जाना, उसकी समझ से बाहर था ।
"क्या हुआ देवराज चौहान ।" मोना चौधरी के होठों से निकला ।
तभी बेला की फुसफुसाहट, देवराज चौहान के कानों में पड़ी।
"वो तिलस्मी इंसान है, जो दालूबाब ने तेरी जान लेने के लिए, उसका रूप जगमोहन जैसा बनाकर तेरे सामने कर दिया । ताकि तू उसे छुए और मर जाए।"
"उसे छूने से मैं मर सकता हूं।" देवराज चौहान बुदबुदाया।
मोना चौधरी ने उलझन भरी निगाहों से देवराज चौहान को देखा, फिर तेजी से जगमोहन की तरफ बढ़ी । शायद उसके जंजीरों वाले बंधन खोलने के लिए ।
यह देखकर देवराज चौहान चीखा ।
"रुक जाओ मोना चौधरी । "
मोना चौधरी ठिठकी और पलटकर देवराज चौहान को देखने लगी । आंखों में अजीब से भाव थे । वो समझ नहीं पा रही थी कि देवराज चौहान न तो खुद जगमोहन की तरफ बढ़ रहा है और न ही अब उसे बढ़ने दे रहा है और होठों ही होठों में जाने क्या बुदबुदा रहा है । "क्या हुआ ?" मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े ।
देवराज चौहान ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला कि बेला की फुसफुसाहट कानों में पड़ी।
"मिन्नो को भी आगे मत बढ़ने देना । जो भी उसे हाथ लगाएगा। वो मारा जाएगा।"
देवराज चौहान ने मोना चौधरी को देखकर कहा।
"तुम अभी मेरे से बात मत करो और न ही उसकी तरफ बढ़ो। पीछे हट जाओ।"
"लेकिन...।" मोना चौधरी ने कहना चाहा ।
"जो मैंने कहा है, वही करो ।" देवराज चौहान का स्वर सख्त हो गया ।
मोना चौधरी के माथे पर बल नजर आने लगे । परंतु वो खामोश रही ।
बेला की फुसफुसाहट देवराज चौहान के कानों में पड़ी।
"जग्गू का रूप बनाकर तुम्हारे सामने इसलिए पेश किया गया है कि तुम सब कुछ भूल कर इसे छुओ और मारे जाओ। यह तिलस्मी जहर का वार तुम पर किया गया । मिन्नो ने इसे छुआ तो वो भी नहीं बचेगी। किसी भी कीमत पर अपने होश मत गंवाना ।"
देवराज चौहान के चेहरे पर कठोरता नजर आने लगी। उसने घूरकर जगमोहन को देखा ।
"देवराज चौहान ।" जगमोहन पुनः बोला--- "मुझे बचाओ मैं मर रहा हूं । खोलो मुझे ।"
मोना चौधरी ने जगमोहन को देखा, फिर तीखी निगाह देवराज चौहान पर जा टिकी ।
"खड़े-खड़े क्या कर रहे हो। ये तुम्हारा खास साथी-दोस्त है और तुम...।"
"खामोश रहो।"
मोना चौधरी ने होंठ भींच लिए ।
"मोना चौधरी । तुम ही खोलो मुझे । मेरी जान निकल रही है । मैं मर रहा हूं।" जगमोहन की आवाज में पीड़ा के ऐसे भाव थे कि मोना चौधरी खुद को रोक नहीं सकी ।
वो तेजी से जगमोहन की तरफ बढ़ी ।
"नहीं।" देवराज चौहान चीखा और चीते की तरह मोना चौधरी पर झपटा जो जगमोहन के करीब पहुंच चुकी थी और अगले ही पल उसका जोरदार घूंसा मोना चौधरी के चेहरे पर पड़ा।
मोना चौधरी के पांव उखड़ गए । वो कराह के साथ दो-तीन कदम दूर जा गिरी । अगले ही पल दांत भींचे उछली और खड़ी होकर खूनी निगाहों से देवराज चौहान को घूरने लगी । "तुम्हारी यह हिम्मत कि तुम मुझ पर हाथ उठाओ। मैं तुम्हें... "
"मोना चौधरी ।" देवराज चौहान गंभीर स्वर में बोला--- "अगर मैं तुम्हें घुसा मार कर इससे दूर नहीं करता, अगर तुम इसे छू लेती तो, अब तक तुम मर चुकी होती ।"
"क्या मतलब ?" मोना चौधरी चौंकी ।
"यह जगमोहन नहीं है । तिलस्मी जहर का वार है, दालूबाबा की तरफ से कि हम मर जाएं । जहर ने जगमोहन का चेहरा ले रखा है कि हम धोखा खा जाएं।"
देवराज चौहान की बात सुनकर, मोना चौधरी हक्की-बक्की रह गई ।
"यह... यह बात तुम कैसे कह सकते हो ?" मोना चौधरी के होठों से निकला।
"कुछ देर रुको । अभी सब कुछ बताता हूं।" कहने के पश्चात देवराज चौहान बुदबुदाया--- "बेला ।"
"हां।" बेला की कानों में फुसफुसाहट पड़ी।
"मुझे बताओ । अब मैं क्या करूं । इससे बिना छेड़े हम आगे बढ़ जाएं ?" देवराज चौहान बुदबुदाया ।
"नहीं । ऐसी गलती मत करना देवा ।" बेला की फुसफुसाहट कानों में पड़ी --- "तिलस्मी जहर अपने शिकार का पीछा कभी नहीं छोड़ता । अपना वार करके ही रहता है । तुम्हें इसकी सही जानकारी नहीं है । अगर अब तुम इसे छोड़ कर आगे बढ़ गए तो ये फिर किसी दूसरे रूप में तुम्हारे सामने आ जाएगा। ऐसे में तुम कब तक तिलस्मी जहर से बच सकोगे। पानी की बूंद बन कर भी तुम पर टपक सकता है और तुम बच नहीं सकते । अब ये तुम्हारे सामने है तो इसे नष्ट करके ही आगे बढ़ने में तुम्हारी भलाई है ।"
"मैं समझा नहीं।"
मोना चौधरी की एकटक तीखी निगाह देवराज चौहान पर टिकी थी ।
"मैं तुम्हें सब कुछ एक ही बार में समझा देती हूं । तिलस्मी जहर को पार पाने के लिए, ईंट जैसा पत्थर उठाकर इसके सिर पर मारो । पूरी ताकत से । परंतु ऐसा करने से पहले मेरा दिया लकड़ी का टुकड़ा हाथ में पकड़ लेना, सिर पर पत्थर का वार करते ही वो लकड़ी का टुकड़ा तुम्हारे हाथ में दबा कटर बन जाएगा । पत्थर के वार के पश्चात, तिलस्मी जहर पतले से ठंडे जैसे सांप की शक्ल अख्तियार कर लेगा और तुम्हें डंसने के लिए तुम पर झपटेगा। उसकी रफ्तार तीर से भी तेज होगी और तुम्हें उससे बचना है । बचते हुए उसे पकड़कर, डंसने का मौका दिए बिना कटार से उसे काट कर, दो टुकड़े कर देना ।"
"मुझे कटार चलानी नहीं आती ।" देवराज चौहान बुदबुदाया ।
बेला की हल्की-सी हंसी, देवराज चौहान के कानों में पड़ी।
"देवा कहता है कि कटार चलानी नहीं आती। कटार चलाने में, नगरी का कोई भी योद्धा तुम्हारा मुकाबला नहीं कर सकता था । मिन्नो भी आखिरकार हार गई थी तुमसे।"
"मैं-वो देवा नहीं । इस वक्त देवराज चौहान हूं और... "
"इस बात की फिक्र मत करो । कटार तुम्हारे हाथ में आते ही तुम वही देवा बन जाओगे । इस बात का इंतजाम मैं कर देती हूं । अब तो तुम्हें कोई झिझक नहीं ?"
"नहीं।" देवराज चौहान के चेहरे पर गंभीरता के भाव थे ।
"कटार के वार से जब उस सांप के दो टुकड़े कर दोगे तो, अपने हाथों से सांप का आधा शरीर छोड़ना नहीं । अगर छोड़ा तो, वे दोनों टुकड़े मिलकर, पुनः सांप का शरीर जीवित हो जाएगा । कटार से छुटकारा पाकर, तुमने दूसरे हाथ से गिरे सांप के टुकड़ों को उठाकर आगे बढ़ जाना है । ध्यान रहे । सांप के टुकड़ों के शरीर आपस में टकरा भी गए तो, वो सांप पुनः जीवित होकर तुम्हें डस लेगा और तुम उसी पल जान से हाथ धो बैठोगे।"
"समझा । उसके बाद मुझे क्या करना होगा ?"
"इसी रास्ते पर आगे बढ़ जाना । पीछे से तब, तुम्हें पुकारने के बहुत स्वर आएंगे। तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे अपने ही तुम्हें पुकार रहे हैं । परंतु सावधान किसी भी हालत में पीछे मुड़कर मत देखना । वो सब पुकारे, तिलस्मी जहर की चाल होगी अगर तुमने पीछे मुड़कर देख लिया तो उसी वक्त तुम्हारे शरीर से प्राण निकल जाएंगे। तुम्हें बिना पीछे देखे आगे बढ़ते रहना होगा। जब वो आवाजें कानों में पड़नी बंद हो जाए तो सांप के दो टुकड़ों को इस रास्ते के दोनों किनारों पर अलग-अलग रख देना। यानि एक टुकड़ा एक किनारे पर और दूसरा दूसरे किनारे पर । उसके बाद पुनः आगे बढ़ना । तब भी तुम्हें पीछे से पुकारने का स्वर आएगा । परन्तु पीछे मत देखना और जब वो स्वर भी सुनाई देना बंद हो जाए तो समझना तुम्हें तिलस्मी जहर से छुटकारा पा लिया। यह बात तुम पर ही नहीं, मिन्नो पर भी लागू होती है। उसे भी सब समझा देना ।"
"समझ गया ।" देवराज चौहान बुदबुदाया ।
"ध्यान रहे । तिलस्मी जहर के सिर पर पत्थर मारने के पश्चात, वो उसी पल सांप बनकर तीर की रफ्तार से तुम्हारी तरफ आएगा । तिलस्मी जहर के उस वार की रफ्तार से बचना असंभव होता है। लेकिन देवा के लिए यह काम कठिन नहीं, खासतौर से जब कटार उसके हाथ में हो । मुझे विश्वास है कि तिलस्मी जहर पर विजय पाकर, दालूबाबा के मुंह पर तमाचा मारोगे । क्योंकि तिलस्मी जहर तुम पर छोड़ने के पश्चात वो निश्चिंत हो गया होगा कि देवा और मिन्नो अब जीवित नहीं रह सकते।"
देवराज चौहान के चेहरे पर गंभीरता नजर आ रही थी ।
"कुछ और पूछना है?" बेला की फुसफुसाहट कानों में पड़ी ।
"नहीं।"
उसके बाद बेला की आवाज नहीं आई।
देवराज चौहान ने गहरी सांस लेकर, जगमोहन के रूप में बंधे, तिलस्मी फिर सिगरेट सुलगा कर मोना चौधरी पर निगाह मारी जो आंखें सिकोड़े उसे । जहर को देखा देख रही थी।
"फुर्सत मिल गई ?" मोना चौधरी के स्वर में तीखापन था ।
"हां ।" देवराज चौहान ने हौले से सिर हिलाया ।
"ये सब क्या हो रहा है । इतनी देर होठों ही होठों में बुदबुदाकर, तुम क्या कर रहे थे और...।"
"मैं तुम्हारी बहन से बात कर रहा था ।"
"मोना चौधरी चौंकी ।
"मेरी बहन से--- ओह ।" मोना चौधरी के होठों से निकला ।
उसके बाद देवराज चौहान ने बेला की कही, सारी बात बताई ।
सुनकर मोना चौधरी सकते की सी हालत में रह गई ।
"अगर वो ये बात न बताती तो, हमारा मरना निश्चिंत था ।" मोना चौधरी के होठों से निकला है।
"हां ।" देवराज चौहान ने गंभीरता से सिर हिलाया--- "अब तुम्हें भी सावधान रहना होगा। "
"तो अब तुम इस तिलस्मी जहर से मुकाबला करोगे।"
"करना पड़ेगा । तुम्हारी बहन के कहे मुताबिक, अगर हमारे पड़ गए तो यह पुनः किसी भी रूप में हम पर हमला कर सकता है और हमारी जान लेकर रहेगा। ऐसे में, इस खतरे को यहीं खत्म करके, आगे बढ़ना चाहिए ।" कहने के साथ ही देवराज चौहान की निगाह तिलस्मी जहर की तरफ गई।
"देवराज चौहान ।" जगमोहन का चेहरा लिए, जंजीरों से बंधा वो पुनः रो देने वाले स्वर में कह उठा--- "क्या हो गया है तुम्हें, मुझे नहीं पहचान रहे हो क्या? मैं तुम्हारा जगमोहन ।"
देवराज चौहान ने उस पर से निगाह हटाकर, मोना चौधरी को देखा ।
"तिलस्मी जहर को खत्म करने की कोशिश में तुम्हारी जान भी जा सकती है।" मोना चौधरी बोली ।
"हां । लेकिन यहां तो हर कदम पर मौत है । इसलिए अंजाम की परवाह करना बेवकूफी है । दालूबाबा हमें क्यों खत्म करना चाहता है । यह मेरी समझ में नहीं आ रहा।"
मोना चौधरी के दांत भिंच गए ।
"कोई तो वजह होगी ही । मेरे ख्याल में उसके कर्म उसे डरा रहे होंगे कि हमें अपना पूर्वजन्म न याद आ जाए । इससे उसे कोई खतरा हो सकता है । तभी तो वो हमें खत्म करना चाहता है ।" कहते हुए मोना चौधरी का चेहरा गुस्से से सुर्ख हो उठा था ।
देवराज चौहान ने कश लेकर सिगरेट को एक तरफ उछाला और कहा ।
"मेरी कही सब बातें समझ गई ?"
"हां ।"
"कहीं भी गलती मत कर बैठना ।"
"मैं गलती नहीं करूंगी।" मोना चौधरी नहीं खा जाने वाले निगाहों से तिलस्मी जहर को देखा ।
देवराज चौहान ने कुछ दूर पड़ा बड़ा सा पत्थर उठाया और पैंट की जेब से बेला का दिया लकड़ी का टुकड़ा निकाल कर मुट्ठी में दबा लिया।
मोना चौधरी ने कमर में फंसा तिलस्मी खंजर हाथ में ले लिया। चेहरे पर कठोरता आ जमी थी । आंखों में वहशी भाव नजर आने लगे थे ।
देवराज चौहान और मोना चौधरी की नजरें मिली ।
आंखों ही आंखों में, हम तैयार हैं, के इशारे हुए ।
तभी मोना चौधरी के कंधे पर बैठी काली बिल्ली ने छलांग मारी और एक तरफ हटकर जा बैठी। उसकी आंखें किसी हीरे की तरह चमक रही थी ।
फिर देवराज चौहान और मोना चौधरी की निगाह, जगमोहन के रूप में मौजूद तिलस्मी जहर पर जा टिकी। जो अभी भी दर्द और तड़प भरी निगाहों से उन्हें देख रहा था ।
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देवराज चौहान ने पूरी ताकत के साथ, जगमोहन का रूप धारण किए, तिलस्मी जहर पर वो बड़ा पत्थर मारा। देखते ही देखते वो उस चेहरे पर लगा।
उसी पल जगमोहन का शरीर गायब हो गया और पतला किंतु लंबा सांप पल भर के लिए नजर आया और फिर तीर बना तूफानी गति से देवराज चौहान की तरफ बढ़ा । उसके बढ़ने की रफ्तार ऐसी थी कि, मोना चौधरी की निगाहें भी उसकी गति को न पकड़ सकी।
पत्थर उसके चेहरे पर लगते ही देवराज चौहान ने फुर्ती के साथ खुद को जमीन पर गिरा लिया था । यही वजह रही कि तीर की तरह वो सांप सरसराता हुआ उसके ऊपर से निकल गया ।
परन्तु उसी पल देवराज चौहान ने खुद में अजीब सा परिवर्तन महसूस किया। उसने हाथ में दो-धारी कटार को दबा पाया। शरीर पर नीले रंग की कमीज-पायजामा और पैरों में कोई और ही जूते मौजूद पाए । चेहरे पर मूंछे होने का आभास मिला और सिर के बाल छोटे-छोटे से हो गए थे। माथे पर तिलक लगा था । देवराज चौहान समझ गया कि बेला ने उसे पूर्वजन्म का देवा बना दिया है । जैसा कि उसने कहा भी था । साथ ही उसे अपने मस्तिष्क की सोचों को भी देवा के रूप में पाया । अब उसका चेहरा खूंखार और खतरनाक नजर आ रहा था । आंखों में लहराते मौत के साए स्पष्ट नजर आ रहे थे ।
मोना चौधरी उसके बदले रूप पर चौंकी । परंतु यह वक्त इस बात पर ध्यान देने का नहीं था।
"खंजर ।" मोना चौधरी बड़बड़ाई --- "इतना लंबा होता कि तिलस्मी जहर पर तेरा वार हो के।"
मोना चौधरी के शब्द पूरे होते ही खंजर ढाई फीट लंबा हो गया ।
सांप के सिर के ऊपर से गुजरते ही देवा बना देवराज चौहान किसी खिलौने की भांति उछल कर खड़ा हो गया और उस तरफ देखा, जिधर तीर बना, तिलस्मी जहर वाला सांप गया था ।
देवराज चौहान के देखते ही देखते वो हवा में ही घूमा और पुनः तीर की तरह देवराज चौहान की तरफ बढ़ा । उसका छोटा सा फन था। जीभ (डंक) बार-बार बाहर निकल रही थी । उसकी लंबाई छः फीट के बराबर थी और वो स्याह काला था ।
उसे अपनी तरफ बढ़ते पाकर देवराज चौहान के होंठों से गुर्राहट निकली और उसके पास आते ही फुर्ती के साथ उसे थामने का प्रयास करते हुए, खुद को बचाकर कटार का बार उस पर किया । परंतु सांप ने अपने जिस्म को इस तरह लहराया कि खुद को कटार के वार से बचा गया । परंतु वो भी देवराज चौहान को डंस न सका, खुद को बचाने की कोशिश में।
फिर देखते ही देखते सांप ने हवा में लहराते हुए अपनी दिशा बदली और मोना चौधरी की तरफ बढ़ गया । यह देखकर मोना चौधरी पास आते सांप की तरफ खंजर करके उसे हवा में किसी कोड़े की तरह बार-बार लहराने लगी कि, सांप किसी भी दिशा में उस तक न पहुंच सके और ठीक आखिरी समय पर उसने खुद को नीचे गिरा लिया।
मोना चौधरी ने खंजर घुमाने का ढंग कुछ ऐसा था कि तिलस्मी जहर वाला सांप भ्रम में पड़ा, मोना चौधरी के चार फीट ऊपर से गुजरता चला गया । इतने में ही मोना चौधरी को एहसास हो गया कि वास्तव में, तिलस्मी जहर वाले तीर की रफ्तार से आते इस सांप से खुद को ज्यादा देर नहीं बचाया जा सकता । उसकी रफ्तार ही ऐसी थी कि उस पर सटीक वार कर पाना संभव नहीं था ।
तभी देवराज चौहान मोना चौधरी के पास आ पहुंचा । गुस्से से लाल सुर्ख हो रही आंखें, हवा में लहराते सांप पर थी जो कि हवा में ही अपना रुख मोड़कर पुनः उसकी तरफ आने लगा था।
मोना चौधरी को उठने का मौका नहीं मिला । वो नीचे ही पड़ी रही। देवराज चौहान के होठों से गुर्राहट निकली । हवा में ही उसने कटार लहराई । चेहरे पर दरिंदगी के वो भाव थे, जो आज से पहले कभी उसके चेहरे पर नहीं आए थे । शायद इसलिए कि वो देवा के रूप में था।
इस बार देवराज चौहान ने खुद को बचाने की चेष्टा नहीं की।
कटार वाला हाथ हवा में उठा हुआ था । दूसरा हाथ भी हवा में उठा, कंधे तक उठ चुका था । तब तक सांप काफी करीब आ चुका था और देवराज चौहान की सुर्ख निगाह सांप पर थी ।
नीचे पड़ी मोना चौधरी की आंखें खौफ से फैल गई थी । वो चीखी ।
"खुद को बचाओ, देवराज चौहान ।"
परंतु इस वक्त तो वो देवा था । देवा, कटार का खिलाड़ी । फुर्ती उसके लहू के जर्रे-जर्रे में शामिल थी । चेहरा अब पत्थर की तरह कठोर हो चुका था । ।
सांप के फन का निशाना देवराज चौहान का चेहरा था ।
बांहों में लंबाई की जद में सांप के पहुंचते ही, देवराज चौहान कहां तीर से भी तीव्र गति से आगे बढ़ा और उससे भी तीव्र गति से आगे बढ़ा, कटार वाला हाथ ।
एक हाथ से तूफानी फुर्ती के साथ देवराज चौहान ने सांप के शरीर को, मुट्ठी में जकड़ा और ठीक उसी पल, दूसरे हाथ में दबी कटार का वार सांप के शरीर पर किया तो फन के साथ पौने फीट सांप का शरीर कट कर नीचे जा गिरा।
नीचे पड़ी मोना चौधरी आंखें फाड़े ये सब देख रही थी। उसने यह भी देखा, तिलस्मी जहर वाले सांप का फन, देवराज चौहान के चेहरे से मात्र छः इंच दूर रह गया था । अगर सांप की पकड़ या फिर कटार का वार करने में, एक पल की भी देरी होती तो, तिलस्मी जहर ने अपना काम कर जाना था ।
लेकिन देवा बना देवराज चौहान, मौत की बाजी में जीत गया था ।
कई पलों तक मौत का सन्नाटा छाया रहा । सब कुछ वैसे ही रहा । हैरानी की बात तो यह थी यह भी रही कि, सांप के काटने के बाद, न तो कटे शरीर से खून की कोई बूंद निकली थी और न ही सांप के शरीर के हुए दो टुकड़ों में से कोई टुकड़ा तड़पा था।
"देवराज चौहान ।" नीचे पड़ी मोना चौधरी के होंठ हिले ।
देवराज चौहान के मस्तिष्क को हल्का सा झटका लगा । दिमाग में हलचल हुई। उसके बाद उसकी आंखें हिली और जमीन पर पड़े कटे फन पर टिकी। उसके बाद देवराज चौहान की निगाह नीचे पड़ी मोना चौधरी पर गई । अभी तक वो देवा के रूप में था ।
"मिन्नो तू ?" मोना चौधरी पर निगाह जाते ही देवराज चौहान के होठों से निकला।
मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी । वो तुरंत उठ खड़ी हुई ।
"देवराज चौहान, मैं मोना चौधरी हूं।" मोना चौधरी की एकटक निगाह, देवराज चौहान पर थी ।
"नहीं, तू तो मिन्नो है और...।"
तभी देवराज चौहान के मस्तिष्क को ऐसा झटका लगा जैसे किसी ने उसके मस्तिष्क को छेड़ा हो । अगले ही पल उस पर से देवा का रूप गायब था। अब वो देवराज चौहान के रूप में आ गया था ।
आंखों के सामने ही, मोना चौधरी ने उसके बदलते रूप को देखा तो ठगी सी रह गई ।
देवराज चौहान को लगा जैसे उसे होश आया है। उसने हाथ में दबी कटार को, दूसरे हाथ में दबे सांप के आधे शरीर को देखा फिर मुस्कुराया। मोना चौधरी को देखा।
मोना चौधरी एकटक उसे देखे जा रही थी ।
देवराज चौहान के हाथों में दबी कटार एकाएक गायब हो गई और मुट्ठी में वही छोटा-सा लकड़ी का टुकड़ा दबा नजर आने लगा । देवराज चौहान ने लकड़ी के टुकड़े को जेब में डाला और आगे बढ़कर सांप के फन वाला कटा हिस्सा उठा लिया । बांहों को थोड़ा सा फैलाए रखा ताकि, बेला के कहे मुताबिक उनके शरीर आपस में मिलकर, सांप पुनः जीवित न हो उठे ।
मोना चौधरी हाथ में दबे खंजर को देखकर बुदबुदाई ।
"खंजर छोटा हो जा ।"
अगले ही पल वो पहले की तरह छोटा हो गया तो मोना चौधरी ने उसे कमर में फंसा लिया
"मोना चौधरी । तुम्हें अच्छी तरह याद है कि अब क्या करना...।"
"सब याद है ।" मोना चौधरी का स्वर शांत था ।
"आओ चलें ।"
"तुमने मुझे मिन्नो कहा था ।" मोना चौधरी बोली ।
"मिन्नो ? मैंने कहा ?"
"हां । मिन्नो कहकर मुझे क्यों पुकारा ?"
देवराज चौहान ने गहरी निगाहों से मोना चौधरी को देखा।
"मुझे याद नहीं कि मैंने तुम्हें मिन्नो कह कर पुकारा हो ।" देवराज चौहान ने कहा ।
"तुम्हें ही मालूम है, तिलस्मी जहर से लड़ते वक्त तुम्हारा रूप बदल गया था?"
"हां । इस बात का एहसास हुआ था मुझे ।"
फिर मोना चौधरी ने कुछ नहीं पूछा । दूर बैठी काली बिल्ली पास आई और उछलकर उसके कंधे पर आ बैठी ।
"आओ।"
इसके बाद दोनों आगे बढ़ने लगे। दोनों हाथों में पकड़े सांप के शरीर के दोनों टुकड़ों में वो फासला बनाए हुए था । मोना चौधरी उसके साथ चल रही थी ।
उनके आगे पीछे बढ़ते ही पीछे से आवाज आने लगी ।
"देवराज चौहान भायो । रुकयो । अंम भी आयो हो ।" बांकेलाल राठौर की पुकार उसके कानों में पड़ी ।
"बेबी, तुम भी तिलस्म में ?" महाजन का स्वर कानों में पड़ा ।
"तुमने मुझे मार दिया, देवराज चौहान ।" जगमोहन का रोता स्वर उसके कानों में पड़ा--- "मैंने तो कभी तुम्हारे साथ बुरा नहीं किया, फिर तुमने मेरी जान क्यों लीं।" देवराज चौहान-मोना चौधरी आगे बढ़ते जा रहे थे ।
"पीछे मत देखना ।" मोना चौधरी सतर्क स्वर में बोली ।
"मालूम है । ये आवाजें तिलस्म का खेल है, इस तिलस्मी जहर को बचाने के लिए | " देवराज चौहान ने कहा ।
तभी विश्राम सिंह की आवाज कानों में पड़ी ।
"देवा । मेरे बेटे, तू यहां और मैं कब से तुम्हें ढूंढ रहा था । तूने तो हमें तिलस्मी कैद से आजाद करवाना था । हम तो कब से तेरे ही भरोसे बैठे हैं। रुक तो ।"
देवराज चौहान ने होंठ भींच लिए।
"ये किसकी आवाज है ?" मोना चौधरी ने चलते-चलते पूछा ।
"मेरे पहले जन्म के पिता की ।"
"भइया । भइया सुनो। देखो, ताऊ जी भी साथ आए हैं । तुम्हारे लिए हम कब से परेशान हो रहे थे ।
"ये आवाज ?"
"ये पहले जन्म की, मेरी छोटी बहन की आवाज है । "
दोनों तेजी से सीधे रास्ते पर आगे बढ़ते जा रहे थे ।
"मोना चौधरी।" पारसनाथ की आवाज कानों में पड़ी --- "मैं यहां हूं। मुझे तिलस्मी में कैद करके, यहां फंसा दिया है । पास आकर मुझे आजाद करवा दो।"
परन्तु देवराज चौहान और मोना चौधरी ने जो जैसे कान बंद कर रखे थे । सुनकर भी वे पीछे से आती आवाजों पर जरा भी ध्यान नहीं दे रहे थे । देवराज चौहान ने थोड़ी सी बांहें फैलाए, सांप के उन टुकड़ों में फासला रखा हुआ था ।
करीब दस मिनट चलने के बाद उन आवाजों के कानों में पड़ने का सिलसिला कम होने लगा और फिर वह वक्त भी आया जब पीछे से सुनाई देने वाले स्वर खामोश हो गए ।
उसके बाद भी देवराज चौहान और मोना चौधरी पांच मिनट तक आगे बढ़ते रहे ।
"अब कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही । "
"हां ।" कहते हुए देवराज चौहान ठिठका--- "अभी भी पीछे मत देखना ।"
"सब याद है मुझे ।"
देवराज चौहान पहले सड़क के बाईं तरफ बढ़ा और सांप के एक टुकड़े को किनारे पर रख दिया । उसके बाद दाएं तरफ बढ़ा और सांप के दूसरे टुकड़े को दाईं तरफ रख दिया ।
उसके बाद आगे बढ़ा । मोना चौधरी बराबर उसके साथ थी ।
"देवराज चौहान ।" जगमोहन का रोता हुआ स्वर उसके कानों में पड़ा--- "आखिर तुमने मेरी जान ले ही ली । मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था । तुम्हारा अपना था मैं ।"
देवराज चौहान, मोना चौधरी होंठ भिंचे आगे बढ़ते रहे।
"जवाब दो देवराज चौहान ।" जगमोहन का फफकता स्वर कानों में पड़ा--- "आखिर तुमने मेरी जान क्यों ली ?"
"बहुत अच्छा हुआ जो तू मर गया ।" मोना चौधरी ने भिंचे स्वर में कहा --- "जिंदा रहता तो हमें मार देता ।"
"मेरे ख्याल में अब वो मरने जा रहा है ।" देवराज चौहान राहत भरे स्वर में बोला ।
"नहीं मारा, तो बची हुई बाकी सांसे, अभी निकल जाएंगी।" मोना चौधरी का स्वर कड़वा था।
तभी जगमोहन का याचना भरा स्वर देवराज चौहान और मोना चौधरी के कानों में पड़ा।
"भगवान के लिए देवराज चौहान, मुझे बचा लो | तुम तो ऐसे नहीं थे । मोना चौधरी के साथ मिलकर, तुम बहुत बदल गए । आह, मैं-मैं जा रहा हूं। तुमने मेरे साथ धोखा किया । अपनी भाई जैसे दोस्त के साथ दगाबाजी की है । और...।"
"बहुत पक्की जान है ।" देवराज चौहान ने मुस्कुराकर मोना चौधरी को देखा--- "कोई और होता तो, कब का मर जाता ।"
दोनों तेजी से आगे बढ़ते रहे ।
दो बार और जगमोहन की पुकार सुनाई दी । उसके बाद दस मिनट बीत गए। लेकिन फिर कोई स्वर कानों में नहीं पड़ा । लेकिन अभी भी वो, पीछे देखने का खतरा, मोल नहीं लेना चाहते थे ।
तभी देवराज चौहान के कानों में बेला की फुसफुसाहट पड़ी।
"तिलस्मी जहर समाप्त हो गया है देवा ।"
"मेहरबानी ।" देवराज चौहान बुदबुदाया--- "अगर तुम सावधान न करती तो, हम नहीं बच पाते।"
"देवा ।" बेला की फुसफुसाहट कानों में पड़ रही थी--- "कुछ आगे जाकर यह रास्ता बाईं तरफ मुड़ रहा है, लेकिन तुम दोनों ने उस रास्ते पर नहीं मुड़ना, बल्कि सीधे ही जाना है।" "ठीक है ।" देवराज चौहान बुदबुदाया।
आधे घंटे के बाद वो रास्ता बाईं तरफ मुड़ता नजर आया ।
देवराज चौहान ठिठका । मोना चौधरी गहरी सांस लेकर कह उठी ।
"शुक्र है, रास्ते का कोई मोड़ तो आया ।"
"हमें इस रास्ते पर नहीं मुड़ना। आगे ही जाना है।"
मोना चौधरी ने सामने देखा, जिधर जंगली कांटेदार झाड़ियां, कहीं फूलों के पौधे तो कहीं पेड़ भी नजर आ रहे थे। उस तरफ जंगल जैसी जगह थी ।
"लेकिन रास्ता तो इस तरफ जा रहा है ।" मोना चौधरी ने देवराज चौहान को देखा । "मालूम है । परन्तु तुम्हारी बहन बेला इस तरफ बढ़ने को कह रही है।" देवराज चौहान ने कहा ।
मोना चौधरी ने सोच भरे ढंग से सिर हिलाया ।
"ठीक है । यह बात मैं तुम पर छोड़ती हूं ।" मोना चौधरी ने उस तरफ चलने पर कोई एतराज नहीं उठाया ।
दोनों उस रास्ते को छोड़कर, जंगल में आगे बढ़ गए। रास्ते में आने वाली कांटेदार झाड़ियों से वे बचकर आगे बढ़ रहे थे। दूर-दूर वीरानी थी । पैरों के नीचे आने वाले सूखे पत्तों की चरमराहट उस वीरान जगह में गूंजती, अजीब सी लग रही थी । चलते हुए उनकी निगाहें दूर-दूर तक जा रही थी ।
"इस रास्ते पर कब तक आगे बढ़ना होगा ?" मोना चौधरी ने पूछा ।
"तुम्हारी बहन ने यह नहीं बताया ।" देवराज चौहान का स्वर शांत था ।
ज्यों-ज्यों वे आगे बढ़ रहे थे, त्यों-त्यों झाड़ियां बड़ी और गहरी होती जा रही थी। कोईकोई कांटेदार झाड़ी तो उनकी ऊंचाई से भी ऊंची थी । साथ-साथ चलने की अपेक्षा, झाड़ियों के कांटो से बचते हुए उन्हें आगे-पीछे रहकर चलना पड़ रहा था । कई बार कांटे उनके शरीर पर रगड़ा लगा चुके थे ।
रास्ता हर कदम के साथ उलझता जा रहा था।
"देवा ।" बेला के फुसफुसाहट, कानों में पड़ी ।
"हां ।" देवराज चौहान के होंठ हिले, वो रुक गया ।
देवराज चौहान को रुकते पाकर, मोना चौधरी ठिठकी । उसे देखा।
"तुम्हारे ठीक सामने, झाड़ियों का छोटा-सा झुंड है ।" बेला की फुसफुसाहट पुनः कानों में पड़ी ।
देवराज चौहान ने सामने देखा ।
एक जगह पर छोटी-छोटी झाड़ियों का काफी बड़ा झुंड सा था । उन झाड़ियों ने कुछ ज्यादा ही जमीन के रखी थी। वहां हाल ऐसा था कि मैं जानवर भी उन झाड़ियों के पास जाना पसंद न करें ।
"देवा ?" बेला की फुसफुसाहट पुनः कानों में पड़ी।
"हां । "
मोना चौधरी की निगाह देवराज चौहान पर थी ।
"उस तरफ बढ़ो ।"
"वहां क्या है ?" देवराज चौहान बड़बड़ाया ।
"मालूम हो जाएगा। आगे बढ़ो।"
देवराज चौहान ने मोना चौधरी को देखा ।
हमें उन झाड़ियों की तरफ बढ़ना है।" देवराज चौहान बोला ।
"वहां ।" मोना चौधरी की निगाह झाड़ियों की तरफ उठी, फिर उसने देवराज चौहान को देखा--- "अब तुम कहोगी कि ऐसा करने के लिए मेरी बहन ने कहा है ।"
देवराज चौहान ने मुस्कुराकर सहमति में सिर हिला दिया ।
"जैसा तुम, ठीक समझो।" मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव थे ।
देवराज चौहान रास्ते में आने वाली झाड़ियों से बचत हुआ आगे बढ़ा और अगले दो मिनट में ही वहां पहुंच गया। मोना चौधरी साथ थी। उन्हें ठिठकना पड़ा। क्योंकि आगे रास्ता न होकर झाड़ियां ही झाड़ियां थी । उन्हें पार करने के लिए दांए या बांए से मुड़ कर आगे बढ़ना पड़ता ।
देवराज चौहान और मोना चौधरी की निगाहें मिलीं ।
"देवा ।" बेला की फुसफुसाहट कानों में पड़ी--- "झाड़ियों पर से आगे बढ़ो ।
"ये तो कांटेदार झाड़ियां है ।" देवराज चौहान के होठों से निकला।
"जानती हूं । मिन्नो के साथ झाड़ियों पर से आगे बढ़ो ।"
देवराज चौहान इनकार नहीं कर सकता था । बेला ने कदम-कदम पर उसकी सहायता की थी। ऐसे में बेला के कहे मुताबिक, झाड़ियों पर चलना, उसके लिए मामूली बात थी । देवराज चौहान ने मोना चौधरी से कहा ।
"हमें इन झाड़ियों पर से ही आगे बढ़ना है । "
"ऐसा क्यों ?" मोना चौधरी के होठों से निकला ।
"ये मैं नहीं जानता। आओ ।" कहने के साथ ही देवराज चौहान आगे बढ़ा और झाड़ियों पर पांव रखकर आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ने लगा | पांवों में जूते न होते तो, उन कांटेदार झाड़ियों पर एक कदम भी चलना असंभव सा हो जाता । पिंडली में कांटे रह-रहकर चुभ उठते थे ।
उनके पीछे आ रही मोना चौधरी का भी ऐसा ही हाल था ।
अभी वे पन्द्रह कदम ही आगे बढ़े होंगे कि बेला की फुसफुसाहट उसकी कानों में पड़ी ।
"रुक जाओ देवा ।"
देवराज चौहान ठिठका ।
मोना चौधरी भी ठिठकी।
इस समय वे दो कांटेदार झाड़ियों के झुंड के, लगभग बीचों बीच खड़े थे।
"नीचे देखो ।"
देवराज चौहान ने नीचे देखा । वहां झाड़ियां ही थी ।
"और झाड़ियों के बीच, जमीन में एक कील धंसा हुआ है ।" बेला की फुसफुसाहट कानों में पड़ी--- "उस कील को तलाश करके, उसे जमीन से निकाल लो ।
देवराज चौहान नीचे झुका और कांटेदार झाड़ियों को हाथों से पीछे करता हुआ, जमीन में धंसा कील तलाश करने लगा। कांटों ने हाथ और हथेलियों को कई जगह से घायल कर दिया था । परंतु देवराज चौहान कील तलाशता । रहा जो कि आखिरकार उसे मिला । जमीन में धंसा हुआ वह, जमीन से मात्र आधा इंच ऊपर था ।
देवराज चौहान ने उसे पकड़ा और खींचकर निकालते हुए सीधा खड़ा हो गया ।
चार पल ही बीते होंगे कि एकाएक उनके सामने जमीन फटने लगी । ऐसा लगा जैसे वो जमीन न होकर कोई और ही चीज हो बहरहाल, वहां तीन फीट चौड़ी और पांच फीट लंबी जगह नजर आने लगी जहां, नीचे जाती सीढ़ियां नजर आई, ढलते दिन की रोशनी में । भीतर अंधेरा होने की वजह से कुछ खास, स्पष्ट नजर नहीं आ रहा था ।
मोना चौधरी समझने वाली निगाहों से उसे देख रही थी।
मोना चौधरी और देवराज चौहान की नजरें मिली ।
"यह क्या है ?" मोना चौधरी के होठों से निकला ।
"नीचे सीढ़ियां हैं। कोई रास्ता...।"
तभी बेला की फुसफुसाहट कानों में पड़ी ।
"देवा। यहां रुको मत । मिन्नो के साथ फौरन सीढ़ियां उतर जाओ ।"
"ठीक है। देवराज चौहान बुदबुदाया और फिर मोना चौधरी से बोला--- "हमें इन्हीं सीढ़ियों पर उतरना है । "
मोना चौधरी ने जवाब में कुछ नहीं कहा।
देवराज चौहान ने पांव आगे बढ़ाया और सीढ़ी पर रख दिया । फिर दूसरा । उसके बाद एक-एक करके सीढ़ियां उतरने लगा । मोना चौधरी उसके पीछे, सीढ़ियां उतरने लगी । आगे अंधेरा बढ़ता जा रहा था । जब वो करीब आठ सीढ़ियां उतर चुके थे तो, ऊपर का रास्ता एकाएक बंद होने लगा । जैसे वो खुला था । वैसे ही वो बंद हो गया। वहां पहले की ही तरह सीढ़ियां ही सीढ़ियां नजर आ रही थी पर हर तरफ वीरानी ।
दिन का उजाला और रात का अंधेरा आपस में मिलना शुरू हो गया था।
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