जेस्टेपो का जन्म

यद्यपि जेस्टेपो को आमतौर पर एस.एस. नेता हेनरिक हिमलर के दिमाग की उपज माना जाता है, लेकिन इसकी स्थापना वास्तव में अप्रैल 1933 में हरमैन गोरिंग ने की थी।

जर्मनी का चांसलर बनने के बाद एडोल्फ हिटलर ने गोरिंग को जर्मनी के सबसे बड़े और अत्यंत महत्त्वपूर्ण राज्य प्रशिया का राज्य मंत्री नियुक्त किया था। देश का दो-तिहाई हिस्सा प्रशिया के नियंत्रण में था और राजधानी बर्लिन तथा बड़े औद्योगिक केंद्र भी उसमें शामिल थे। राज्य मंत्री की हैसियत से पुलिस पर भी गोरिंग का नियंत्रण था।

उसने पहला काम यह किया कि नियमित वरदीधारी पुलिस को सड़कों में नाज़ी भूरी कमीजवालों के साथ उलझने से मना कर दिया। उसका मतलब था कि निर्दोष जर्मन नागरिकों को झगड़ालू, शराबी, गुंडों जैसा व्यवहार करनेवाले तूफानी दस्तों के जवानों द्वारा मारा-पीटा जाए, सताया जाए, तब भी वे किसी से मदद की गुहार न लगा सकें। नाज़ी गुंडों ने पुलिस की नरमी का पूरा फायदा उठाया और दुकानों को लूटा, यहूदियों या हर उस अभागे व्यक्ति को आतंकित किया, जो गलत समय पर गलत जगह पकड़ा जाता।

तत्पश्‍चात् गोरिंग ने बर्लिन पुलिस विभाग से उन सिपाहियों को निकाल दिया, जो राजनीतिक दृष्टि से विश्‍वास के योग्य नहीं थे। उनकी जगह 50,000 तूफानी सैनिकों को विशेष पुलिस सहायकों के रूप में शपथ दिला दी। फिर उन्हें गिरफ्तार करने की वास्तविक ताकत मिल गई और वे इससे बहुत खुश थे। उन्होंने ‘एहतियाती हिरासत’ की आड़ में लोगों को पकड़-पकड़कर जेलों में भर दिया, जिसकी वजह से बाहर बड़े जेल-शिविर स्थापित करना जरूरी हो गया। नजरबंदी शिविरों की शुरुआत यहीं से हुई।

वरदीधारी पुलिस बलों से समझौता करने के बाद गोरिंग ने सादा वस्त्रधारी पुलिस की ओर ध्यान दिया। 26 अप्रैल, 1933 को एक गुप्त पुलिस कार्यालय बनाने के लिए आदेश जारी हुआ। वह विभाग जल्दी ही जी.पी.ए. के नाम से मशहूर हो गया। लेकिन वह संक्षेपण रूसी राजनीतिक पुलिस द्वारा प्रयुक्त संक्षिप्त नाम जी.पी.यू. से बहुत मिलता-जुलता था। (‘जेस्टेपो’ शब्द वास्तव में बर्लिन के डाक विभाग के एक पदाधिकारी द्वारा प्रयोग किया गया था, जो एक ऐसा नाम चाहता था, जिसे निर्धारित आकार की डाक रबर-मुहर में फिट किया जा सके। ‘जेस्टेपो’ शब्द जर्मन भाषा से लिये गए सात अक्षरों को मिलाकर बनाया गया था। डाक विभाग के उस पदाधिकारी को कतई पता नहीं था कि उसने अनजाने में ऐसे नाम का आविष्कार किया है, जो इतिहास में सबसे बुरे नामों में गिना जाएगा।

गोरिंग ने बर्लिन और आस-पास के इलाकों में हिटलर के राजनीतिक विरोधियों को खामोश करने के लिए जेस्टेपो का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया; इसके जरिए उसने अपनी शक्ति भी बढ़ाई। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, जब उसे यह पता चला कि प्राचीन प्रशिया राज्य पुलिस ने शीर्षस्थ नाज़ी सदस्यों के निजी जीवन के बारे में बहुत सी गुप्त फाइलें रखी हुई थीं, जिनका उसने अध्ययन किया।

गोरिंग ने रुडोल्फ डाइल्स को पहला जेस्टेपो प्रमुख नियुक्त किया। हालाँकि डाइल्स पार्टी का सदस्य नहीं था, फिर भी वह 1930 से प्रशिया राज्य मंत्रालय का ऐसे सदस्य बना रहा और पुलिस में उसने एक वरिष्ठ सलाहकार की हैसियत से काम किया था। उसने डाइल्स को नाज़ी नेताओं से संबंधित फाइलों को बनाए रखने तथा उनमें और मसाला जोड़ते रहने के लिए भी बढ़ावा दिया। चालाक एवं महत्त्वाकांक्षी गोरिंग ने उस सूचना का इस्तेमाल नाज़ी पार्टी के अंदर अपनी पद-प्रतिष्ठा को मजबूत बनाने के लिए किया।

एक और नाज़ी एस.एस. राइच्फयूहरर हेनरिक हिमलर ने जेस्टेपो पर अपनी नजर जमाई। हिमलर और गोरिंग के बीच बराबरी की भीषण होड़ शुरू हो गई। दोनों हिटलर की कृपा-दृष्टि पाने के लिए एक-दूसरे के विरुद्ध काम करने लगे, ताकि यह तय हो सके कि जेस्टेपो का वास्तविक संचालक कौन रहेगा। काफी तर्क-विवाद के बाद 20 अप्रैल, 1934 को गोरिंग ने जेस्टेपो की जिम्मेदारी हिमलर और उसके सहयोगी राइनहार्ड हेड्रिक को सौंपने का फैसला किया, जो दो दिन बाद जेस्टेपो का प्रमुख बन गया।

अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी गोरिंग ने अपनी दृष्टि एक पुलिसमैन बनने के बजाय किसी बड़े लक्ष्य पर गड़ाई हुई थी। प्रथम विश्‍व युद्ध के इस पूर्व विमान चालक और प्रशस्ति-पदक प्राप्तकर्ता की आकांक्षा सेना नायक बनने की थी। वह नवीकृत जर्मन वायु सेना का कार्यभार सँभालना चाहता था। जब उसने देखा कि हिटलर की योजना विशाल सैन्य संगठन बनाने और उसका विस्तार करने की है, तब उसकी दिलचस्पी पुलिस मामलों और जेस्टेपो में कम हो गई।

कुछ वर्षों के अंदर ही हिमलर को एस.एस. नेता के रूप में उसके कार्यों के अलावा जर्मन पुलिस का प्रमुख भी बना दिया गया। हेड्रिक उसका एकदम निकट सहयोगी एवं अत्यंत मेधावी व्यक्ति था। उसने एक बहुत ही कुशल राष्ट्रीय खुफिया तंत्र बनाया, जिसका काम हर किसी पर निगरानी रखना था। जेस्टेपो की निगरानी और ताक-झाँक से कोई नहीं बच सकता था, भले ही नाज़ी पदानुक्रम में उसका ओहदा कितना भी ऊँचा हो। 

10 फरवरी, 1936 को नाज़ी राइचस्टैग ने ‘जेस्टेपो कानून’ पास किया। इस कानून को बनाने का उद्देश्य यह था कि जेस्टेपो कानून से ऊपर है और उसके किसी भी कार्य के बारे में कोई कानूनी अपील नहीं की जा सकेगी।

वास्तव में जेस्टेपो अपने आप में एक कानून बन गया। अब किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता था, पूछताछ के लिए ले जाया जा सकता था, बंदी बनाए जाने या तुरंत सूली पर चढ़ाए जाने के लिए नजरबंदी शिविर में भेजा जा सकता था और इसके लिए किसी बाहरी कानूनी प्रक्रिया की जरूरत नहीं थी।

जर्मनी पर हिटलर के शासन के दौरान न्याय पूरी तरह निरंकुश था, सत्ताधारी व्यक्ति की सनक पर निर्भर करता था, सबकुछ उस व्यक्ति की मुट्ठी में था। हिटलर द्वारा सन् 1938 में घोषित की गई कानून संबंधी नीति इस प्रकार थी—‘‘सभी साधन एवं उपाय, वर्तमान कानूनों एवं पूर्वोदाहरण के अनुरूप न होते हुए भी, वैध माने जाएँगे, बशर्ते कि वे फ्यूहरर की इच्छा की पूर्ति में सहायक हों।’’

आश्‍चर्य की बात तो यह है कि जेस्टेपो असल में कोई बहुत बड़ा संगठन नहीं था। अपने व्यस्ततम काल में भी इस संगठन में दफ्तर के कर्मचारियों तथा सादा वरदी पुलिस एजेंटों को मिलाकर कुल 40,000 के लगभग कर्मचारी थे। किंतु, जेस्टेपो जासूसों तथा मुखबिरों के एक बड़े जाल के बीच में रहकर काम करते थे। औसत नागरिकों के लिए समस्या यह थी कि किसी को भी यह पक्का पता नहीं रहता था कि वे मुखबिर कौन हैं। कोई भी हो सकता था—आपका दूधवाला, सड़क के पार कोई वृद्ध महिला, कोई चुप्पा सहकर्मी, यहाँ तक कि कोई स्कूली लड़का भी। नतीजा यह कि दिन भर भय समाया रहता था। अधिकतर लोग समझ गए कि खुद को संयम में रखना ही बेहतर है। वे सामान्यत: राजनीति के बारे में अपना मुँह बंद रखते थे, जब तक कि कहने के लिए कोई सकारात्मक बात न हो। 

अगर कोई गलती से भी कुछ कहने की मूर्खता कर बैठता या मिले-जुले लोगों के बीच कोई नाज़ी-विरोधी लतीफा छोड़ देता तो अकसर आधी रात के समय घर के दरवाजे पर कोई दस्तक होती या सड़क पर चलते हुए कोई उसका कंधा थपथपा देता। लोगों को इस आशय के खत भेज दिए जाते कि वे कुछ सवालों के जवाब देने के लिए नं. 8, प्रिंज अलब्रेख्त स्ट्रॉस, जेस्टेपो मुख्यालय, बर्लिन में पेश हों। बर्लिन के बीचोबीच जेस्टेपो जेल ऐसी बदनाम जगह बन गई, जहाँ से गुजरते पैदल यात्री उस इमारत से बाहर आती चीखें सुन सकते थे।

जेस्टेपो की पूछताछ के तरीकों में ये तरीके शामिल थे—कैदी को बर्फीले पानी से भरे टब में बार-बार डुबोना; हाथों, पैरों, कानों और जननेंद्रियों में तार लपेटकर बिजली के झटके देना; पुरुष के अंडकोषों को एक विशेष चिमटे से दबाना; कैदी की कलाइयों को पीठ पीछे ले जाना और फिर उसे बाजुओं से लटकाना, जिससे कंधे उतर जाते; रबड़ के बेंतों और गाय की खाल से बने चाबुकों से पीटना और दियासलाई या टाँका लगानेवाली सुई से बदन जलाना।

1930 के दशक के उत्तरार्ध में एस.एस. संगठन में तेजी से विस्तार के साथ-साथ अति महत्त्वाकांक्षी हेड्रिक ने अपरिमित शक्तियाँ और जिम्मेदारियाँ हासिल कर लीं। उसकी एक प्रमुख उपलब्धि यह थी कि उसने समस्त नाज़ी पुलिस शासन का पुनर्गठन किया और अधिकारी-तंत्र को सरल एवं कारगर बनाया। द्वितीय विश्‍व युद्ध भड़कने के कुछ समय बाद ही सितंबर 1939 में राइक मेन सिक्योरिटी ऑफिस (आर.एस. एच.ए.) बनाया। इस नए संगठन की सात मुख्य शाखाएँ थीं। जेस्टेपो को चौथी शाखा का नाम दिया गया और हेनरिक मुलर (जिसका उपनाम ‘जेस्टेपो मुलर’ पड़ गया) को उसका अध्यक्ष बना दिया गया। इससे पहले 1931 में, म्यूनिख पुलिस के एक सदस्य के रूप में मुलर ने हिटलर की भानजी गेली रॉबल की आत्महत्या संबंधी विवाद को सफलतापूर्वक दबा दिया था। इस तरह उसने अपने आपको भरोसे के काबिल सिद्ध कर दिखाया था।

जेस्टेपो का काम सिर्फ ‘यहूदी समस्या’ से निपटना था और यह संगठन अब स्थायी रूप से एडोल्फ आइचमैन के नियंत्रणाधीन था। इस फुरतीले एवं कुशल आयोजक ने पूरे यूरोप से रेलगाड़ियों को नाज़ी काल-कोठरियों तक सही समयानुसार चलाए रखा। ये काल-कोठरियाँ यहूदी समस्या के अंतिम समाधान के दौरान अधिकृत पोलैंड में स्थापित की गई थीं।

यूरोप विजय के दौरान जेस्टेपो ने प्रत्येक देश में हिटलर की फौजों का अनुसरण किया। जेस्टेपो एजेंटों ने पड़ोसी को पड़ोसी के विरुद्ध खड़ा करके प्रत्येक अधिकृत देश में आतंक का वही जाल बिछा दिया, जैसा जर्मनी में बिछाया था और जो बड़ा कारगर सिद्ध हुआ था।

सन् 1942 में जेस्टेपो ने हिटलर के ‘रात और कोहरा संबंधी आदेश’ पर अमल करने में एक कदम और आगे बढ़ा दिया। धुंध भरी रात में नाज़ी-विरोधी अचानक गायब हो जाते और फिर कभी उनकी कोई खोज-खबर नहीं मिलती। हिटलर के अनुसार, इस फरमान का मतलब था, ‘परिवार एवं जनसाधारण को अपराधी को अंतिम दशा के बारे में अनिश्‍चय की स्थिति में रखना।’ बलि का बकरा बनाए गए अधिकतर लोग फ्रांस, बेल्जियम और हॉलैंड के होते। उन्हें सामान्यत: आधी रात के समय गिरफ्तार किया जाता और यंत्रणा-पूछताछ के लिए दूर-दराज की जेलों में ले जाया जाता और यदि वे बच जाते तो अंतत: उन्हें नजरबंदी शिविरों में डाल दिया जाता।

हिटलर शासन की शुरुआत से ही गिरफ्तारी और नजरबंदी शिविर में अनिश्‍चितकालीन कैद का भय इस कदर छाया रहा कि जर्मन लोगों की अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर ताला लग गया और वे अपनी इच्छाओं को दबाकर हुक्म-बरदारी करने लगे।

लेकिन वह भी पर्याप्त नहीं था। नाज़ी सरकार लोगों की सोच बदल देना चाहती थी। अत: जिस तरह उन्होंने अपने तिरस्कृत राजनीतिक शत्रुओं को हटाया, उसी तरह उन्होंने ‘जर्मन-विरोधी’ धारणाओं को मिटाने के लिए घृणित अभियान शुरू कर दिया। मानव चिंतन और संस्कृति के विरुद्ध सबसे बुरा और निकृष्ट यह अभियान मई 1933 में आरंभ किया गया—किताबों को जलाकर खाक करने का अभियान।

किताबों की चिता जलाना

हिटलर के आविर्भाव से सौ साल पहले जर्मन-यहूदी कवि हेनरिक हाइन ने घोषित कर दिया था, ‘‘जहाँ कहीं पुस्तकें जलाई जाती हैं, वहाँ के इनसानों की किस्मत में भी जलना लिखा होता है।’’

10 मई, 1933 की रात एक ऐसी घटना देखी गई, जो यूरोप में मध्य युग से अब तक किसी ने कभी नहीं देखी थी। जिन विश्‍वविद्यालयों की गिनती कभी दुनिया के श्रेष्ठतम विश्‍वविद्यालयों में होती थी, उनमें पढ़नेवाले जर्मन छात्र ‘जर्मन-विरोधी’ विचारों की पुस्तकों को जलाने के लिए बर्लिन में एकत्र हुए।

उन छात्रों ने भूरी कमीजवाले तूफानी सैनिकों के साथ खड़े होकर ढेरों किताबों को हिटलर को भुजा-सलामी देते हुए और नाज़ी गीत गाते हुए आग में झोंक दिया। आग के हवाले की गई उन 20,000 किताबों में अल्बर्ट आइंस्टाइन, सिग्मंड फ्रायड, मैक्सिम गोर्की, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, हेलेन कीलर, कार्ल मार्क्स, एच.जी. वैल्स, ऐमिल जोला आदि की लिखी किताबें शामिल थीं। 

किताबों की होली में प्रचार मंत्री जोसेफ गॉबेल्स ने भी छात्रों का साथ दिया और घोषणा की, ‘‘चरम यहूदी बुद्धिवाद का युग अब समाप्त हो रहा है।...भावी जर्मन व्यक्ति किताबी कीड़ा नहीं, बल्कि एक चरित्रवान् इनसान होगा।’’

जर्मनी का नेतृत्व अब एडोल्फ नाम के एक स्वयं-शिक्षित, हाई-स्कूल छोड़कर भागे व्यक्ति के हाथों में था, जो स्वभाव से पक्का बुद्धिजीवी-विरोधी था। हिटलर के विचार में लंबे समय से प्रसुप्त जर्मन भावना को, उसकी जातीय एवं सामरिक विशेषताओं को पुनर्जीवित करना शिक्षा की किसी भी पारंपरिक धारणा से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण था।

हिटलर से पूर्व जर्मन यूनिवर्सिटी शहरों की गणना विश्‍व के महान् वैज्ञानिक नवाचार एवं साहित्यिक विद्वत्ता केंद्रों में की जाती थी। हिटलर के शासनकाल में जर्मनी की बौद्धिक ओजस्विता जल्दी ही घटने लगी। नाज़ी छात्रों और प्रोफेसरों ने रहस्यवाद, निराधार कल्पना और जर्मनी के लिए एक शानदार भविष्य की दिशा निश्‍चित करने के एक सामान्य लक्ष्य की ओर सामूहिक चिंतन के पक्ष में सच्चाई, तर्कसंगत सोच-विचार तथा वास्तविक ज्ञान को तिलांजलि दे दी, जिन्हें पाश्‍चात्य सभ्यता की आधारशिला माना जाता था।

नाज़ी आंदोलन युवा-उन्मुख था और दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रभावित विश्‍वविद्यालय छात्रों को यह आंदोलन हमेशा आकर्षित करता रहा। 1920 के दशक में भी उन्हें एहसास होने लगा था कि भविष्य में शायद नाज़ीवाद छा जाए। वे राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन छात्र संघ में शामिल हो गए और स्वस्तिक बाजूबंद पहनकर उन्होंने नाज़ी-विरोधी शिक्षकों को परेशान करना शुरू कर दिया।

हिटलर द्वारा सत्ता ग्रहण करने के बाद छात्रों के असीम उत्साह को देखते हुए बहुत से वे प्रोफेसर भी इसी धारा में शामिल हो गए, जो पहले ऐसा करने से कतराते थे। अधिकतर प्रोफेसरों ने बड़ी आतुरता से अपनी बौद्धिक ईमानदारी त्याग दी और नाज़ी शासन के प्रति निष्ठा की शपथ ले ली। वे यहूदी प्रोफेसरों तथा संकायाध्यक्षों के सामूहिक निष्कासन के फलस्वरूप खाली हुए शैक्षिक पदों को हासिल करने के लिए नाज़ी पार्टी के पदाधिकारियों की कृपा-दृष्टि भी पाना चाहते थे। पूरे जर्मनी में प्राथमिक स्कूलों से लेकर विश्‍वविद्यालय स्तर तक सभी यहूदी शिक्षकों और राजनीतिक दृष्टि से संदिग्ध प्रत्येक यहूदी को नौकरी से हटा दिया गया और ऐसा करते समय उनको जाँची-परखी शैक्षिक योग्यताओं एवं उपलब्धियों का भी कोई लिहाज नहीं किया गया। निष्काषित किए गए विद्वानों में पिछले (और भावी) 20 नोबेल पुरस्कार विजेता भी शामिल थे। सन् 1933-34 में जर्मनी के विश्‍वविद्यालय स्तर के लगभग 10 प्रतिशत शिक्षकों को नौकरी से हटा दिया गया, जिसका भौतिकी तथा गणित जैसे विषयों की पढ़ाई पर बहुत बुरा असर पड़ा; क्योंकि इन विषयों में यहूदी शिक्षकों का बड़ा नाम था। विश्‍व के प्रमुख भौतिक-विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टाइन सहित अनेक अन्य बौद्धिक शरणार्थी हिटलर के जर्मनी से निकलकर अमेरिका में जाकर बस गए।

सत्य और स्वतंत्रता-प्रेमी जो जर्मनी में रह गए, वे सिर्फ इसलिए बच गए, क्योंकि उन्होंने आंतरिक प्रवास से नाता जोड़ लिया था। असलियत यह थी कि जब तक वे भावशून्य चेहरा बनाए रखते और अपने निजी विचार प्रकट नहीं करते, तब तक नाज़ियों को कभी यह पता नहीं चल सकता था कि उनके अंदरूनी विचार क्या हैं, उनके मन में क्या चल रहा है! किंतु इस तरह के जीवन में एक भयावह अकेलापन भी था।

अंतत: एक जैसी मानसिकतावाले उन छात्रों एवं प्रोफेसरों के छोटे-छोटे गुटों ने एक-दूसरे को खोज निकाला, जो अभी भी नाज़ीवाद का विरोध करते थे। कभी-कभी वे कैंपस के बाहर चोरी-छिपे इकट्ठा होकर विचार-विमर्श करते और खुलकर आपस में चर्चा करते। ऐसा ही एक गुट म्यूनिख यूनिवर्सिटी का था, जो व्हाइट रोज के नाम से मशहूर हुआ। इस गुट ने हिम्मत के साथ इश्तहार बाँटे, जिनमें यह माँग की गई कि ‘हिटलर, हमें हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता वापस करो; हर जर्मन नागरिक का यह सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार है और जिसे बहुत ही घटिया तरीके से हमसे छीन लिया गया है।’ इस गुट के दो सदस्यों हेंस और सोफी शोल को गिरफ्तार कर लिया गया और फाँसी दे दी गई। कॉलेज की कक्षा में प्रोफेसरों को व्याख्यान देते समय यह डर सताए रहता था कि उनका कोई विद्यार्थी किसी भी कारण से उनपर कोई ऐसा दोष न लगा दे कि उन्हें सारी उम्र नजरबंदी शिविर में काटनी पड़ जाए। राजनीतिक रूप से महत्त्वाकांक्षी शिक्षक प्राय: अपने साथी शिक्षकों द्वारा कही कई बातों और उनकी गतिविधियों का गुप्त विवरण रखते थे, जिसे वे जेस्टेपो को सौंपकर अपनी तरक्की पक्की कर सकते थे। व्यापक असुरक्षा की भावना ने शिक्षक समुदाय को कायर एवं डरपोक बना दिया, जिसके फलस्वरूप शिक्षा का स्तर और नीचे चला गया।

समस्त जर्मनी में व्याकरण स्कूलों और हाई स्कूलों में राष्ट्रीय समाजवादी शिक्षक नियुक्त थे, जिनकी योग्यता संदिग्ध थी और जो छात्रों के अधपके मन में नाज़ी पार्टी का यह संदेश भरने में लगे रहते थे—‘‘स्कूलों का सर्वोपरि कार्य युवकों को राष्ट्रीय समाजवादी भावना के हित में समाज और राज्य की सेवा करने की शिक्षा प्रदान करना है।’’ वे सच के रूप में नाज़ी प्रचार की शिक्षा देते थे और फिर उन छोटे बच्चों को कहा जाता था कि वे उस पाठ को याद करके सुनाएँ।

युद्धकाल के दौरान हिटलर के युवा संगठन ने धीरे-धीरे पारंपरिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूली शिक्षा व्यवस्था को उखाड़ फेंका और जर्मन बच्चों को शिक्षित करने की मुख्य जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। उस शिक्षा की गुणवत्ता बराबर निकृष्ट होती चली गई। विशिष्ट वर्गों के लिए स्थापित एडोल्फ हिटलर स्कूलों से निकले छात्रों का शारीरिक गठन एवं स्वास्थ्य अति उत्तम था और नाज़ी विचारधारा उनमें कूट-कूटकर भरी हुई थी; लेकिन गणित एवं विज्ञान जैसे विषयों का उनको मूलभूत ज्ञान भी नहीं था।

हिटलर पूर्व शिक्षित नाज़ी वैज्ञानिकों की शिकायत थी कि नाज़ी स्कूल शिक्षा-व्यवस्था से निकले स्नातकों की भरती करके उन्हें नए श्रेष्ठ किस्म के हथियारों का विकास करने से रोका जा रहा है। जर्मन सेनानायकों ने भी शिकायत की कि भरती किए गए युवा अधिकारियों में ‘प्रारंभिक ज्ञान का इतना अभाव है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।’

उन्हें इतनी भी जानकारी नहीं है कि किसी व्यक्तिवाचक संज्ञा अर्थात् नाम का पहला अक्षर कैपिटल लेटर में लिखा जाता है। लेकिन हिटलर के लिए उन कमियों का कोई महत्त्व नहीं था। स्कूल व्यवस्था छात्रों को वैसा ही बना रही थी जैसा वह चाहता था—ऐसे युवक तैयार करना, जो कोई सवाल-जवाब किए बिना आज्ञानुसार मरते दम तक पितृभूमि की सेवा करने के लिए सदैव तत्पर हों और उनके कानों में सिर्फ ये नाज़ी नारे गूँजते रहें—‘विश्‍वास, आज्ञा-पालन, संघर्ष।’