राजनगर, वर्तमान।

हालाँकि साधना आज भी अपने केबिन के बगल वाले कमरे में नर्स और बाकी महिला सहकर्मियों के साथ गप्पे लड़ाने में मशगुल थी लेकिन फाह्याज़ द्वारा लताड़े जाने का उस पर ये असर जरूर हुआ था कि आज उसने एक वार्डबॉय को सख्त हिदायत दे रखी थी कि अगर कोई जरूरतमंद आये तो उसे तत्काल सूचित किया जाये। यूँ भी पति की नाक में दम करके रखने वाली साधना जैसी दबंग औरत से इससे अधिक की उम्मीद करना नामुमकिन की हद तक मुश्किल था। ऊपर से नीम चढ़ा करेला वाली बात ये थी कि वह फेमिनिज्म की झंडाबरदार थी और अपने संपर्क के दायरे में आने वाली हर महिला को ये घुट्टी पिलाती फिरती थी कि एक महिला जीवन का खुलकर आनंद तभी उठा सकती है, जब वह पुरुष के गले में पट्टा डालकर रखे। वह हर रोज अपनी सहकर्मिणियों को ‘घर के लोगों के सामने अपनी महत्त कैसे साबित करें?’ विषय पर नुस्खे बाँटती थी। ये बात जुदा थी कि उसके नुस्खे ज्यादातर गृह-क्लेश का ही कारण बनते थे क्योंकि हर पति विभू जैसा नहीं होता था, जो घर को शान्तिपूर्वक चलाने के लिए होम मिनिस्ट्री के आगे हमेशा झुकने में यकीन करता हो।

उस पल भी वह अपने सखियों के बीच वैसा ही कोई नुस्खा साझा कर रही थी, जब विभू का फोन आया। ‘सभा’ में खामोशी छा गयी। साधना ने एक नजर सेलफोन के डिस्प्ले पर डाली लेकिन कॉल पिक नहीं की। फुल रिंग के बाद कॉल ख़त्म हो गयी। ख़त्म होने के बाद दोबारा आयी लेकिन इस बार भी उसका वही हश्र हुआ। सेलफोन के डिस्प्ले पर जब दो मिस्ड कॉल का नोटिफिकेशन दिखाई देने लगा तो वह गर्व से गर्दन ऊपर उठाये हुए अपने सखियों से मुखातिब हुई और बोली- “पति को ये एहसास कभी मत होने दो कि तुम उसके लिए हमेशा इजली अवेलेबल हो। अगर उसके लिए चंद मिनटों का भी समय निकालो तो ये जताना मत भूलो कि ऐसा करके तुम उस पर कितना बड़ा एहसान कर रही हो। ये एक अहम् तरीका है, पतियों की निगाह में अपनी इम्पोर्टेंस को बनाये रखने का।”

सखियों ने प्रभावित मुद्रा में गिरगिट की भांति गर्दन हिलाई। जब नुस्खों के आदान-प्रदान और गप्पेबाजी में करीब दस मिनट और जर्फ़ हो गए तो साधना ने सेलफोन उठाया, सखियों से ‘एक्सक्यूज मी’ कहा और विभू का नंबर डायल

करते हुए कमरे से बाहर आ गयी।

“हद करते हो यार तुम भी।” कॉल रिसीव होते ही वह तमककर बोली- “एक पल भी मेरे बिना चैन नहीं है तुम्हें। मालूम भी है, कितनी इम्पोर्टेंट मीटिंग चल रही थी।”

“ठीक है फिर, फ्री होने के बाद फोन कर लेना।” दो टूक कहने के बाद विभू ने फोन काट दिया।

साधना ने दोबारा कॉल कनेक्ट किया और गुर्राकर बोली- “अब ये फोन क्यों काटा तुमने?”

“सबसे पहले ये ड्रामा करने की आदत बदलो अपनी।” वह चिढ़कर बोला- “दो बार कॉल पिक नहीं की और बैक कॉल की भी तो एहसान जताकर। जबकि बात तुम्हारे ही जरूरत की थी, मेरे नहीं। यार हमारी शादी हुए दस साल हो गये हैं, कम से कम अब तो नकचढ़ी गर्लफ्रेंड वाले सस्ते एटिट्युड से बाहर निकलो।”

साधना के तन-बदन में आग लग गयी। नारी जाति का ये अपमान उसे शायद कभी स्वीकार्य नहीं होता अगर विभू ने पहले ही ये जाहिर न कर दिया होता कि बात उसके जरूरत की है। गहरी साँस लेकर और जबड़े भींचकर गुस्से को जब्त करने के बाद वह बोली- “ठीक है, बताओ, क्या पता किया?”

“पता तुम्हें खुद करना है, मैंने बस जरिया तलाशा है।”

“और वो जरिया है क्या?”

“मैंने एक नर्स से कांटेक्ट किया है, जिसके पास उस केस से रिलेटेड कुछ इनफार्मेशन्स हैं बट दोज आर वैरी सेंसेटिव सो वह तुम्हारे साथ उन्हें ज़ुबानी शेयर करेगी, वो भी फेस टू फेस, न कि फोनकॉल या किसी और जरिये से। तुम उससे किसी डाक्यूमेंट की उम्मीद मत करना और न ही किसी ऐसी चीज की डिमांड करना, जो आगे चलकर उन इनफार्मेशन्स की ऑथेंटिसिटी को प्रूव करने के लिए इस्तेमाल की जा सके। उसका नाम सामने नहीं आना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो वह तुम्हें पहचाने से इंकार कर देगी। उससे मिलने भी अकेले ही जाना है तुम्हें।”

“ऐसी क्या टॉप सीक्रेट इनफार्मेशन छिपी हुई है उस केस में?” साधना ने हैरतजदा लहजे में पूछा।

“ये तुम जानो और तुम्हारा काम। उससे मिलने जाना तो दस हजार कैश के फॉर्म में साथ रखना। बिना लिए वह कुछ भी नहीं बताएगी।”

“दस हजार? ये तो बहुत ज्यादा है और मेरे पास...।”

“ओके देन। मैं मीटिंग कैंसल कर देता हूँ।” विभू ने उसकी बात काटकर कहा।

“नहीं-नहीं, मैं अरेंज कर लूँगी।”

“मैं डिटेल वाट्सएप कर देता हूँ तुम्हें।” कहने के बाद दूसरी ओर से कॉल

डिसकनेक्ट कर दिया गया।

N

हसीनाबाद, सन 1975।

“ये पक्का हो गया कुक्कू कि वो पशुपति ही नरभेड़िया है।” जमुना ने कुक्कू से मुखातिब होकर कहा, जो अपनी बग्घी के घोड़ों के आगे घास डाल रहा था। दोनों रेलवे स्टेशन पर ट्रेन आने के इंतजार में थे, जिसमें अभी वक्त था। जमुना की टिप्पणी पर कुक्कू ने उसे घूरा और पाया कि उसके मित्र के चेहरे पर ये यकीन इबारत की शक्ल में लिखा हुआ था कि पशुपति आम इंसान नहीं था।

“इस बार तेरे इस दावे के पीछे कोई नया कारण है या वही पुरानी बातें?” उसने पूछा।

“नया कारण तो नहीं है लेकिन अब ऐसी कई बातें सामने हैं, जो उसे लेकर मेरी सभी शंकाओं को सही साबित करती हैं। पहली ये कि ये बात डाक-बंगले के हर मामले पर नजर रखने वाला मिश्रा भी नहीं जानता है कि क़त्ल-ए-आम वाली रात वह कब वापस लौटा था। दरअसल वह कबाइलियों की रस्म देखने की बात कहकर डाक-बंगले से निकला था। देर रात का वक्त था और उसके आते-आते रात और भी गहरा जाने वाली थी इसलिए मिश्रा ने चाबी उसे सौंप दी थी और मेन दरवाजा बाहर से बंद करके जाने के लिए कह दिया था। दूसरी बात ये कि कल रात जब मैं उसे खाना पहुँचाने गया तो वह अपने कमरे में नहीं था। वहाँ मुझे उसका लिखा हुआ एक नोट मिला, जिस पर दर्ज था कि मैं खाना रखकर लौट जाऊं। अगर तुझे याद होगा तो मैंने तुझे बताया था कि पशुपति ने मुझे जागती आँखों से जो सपना दिखाया था, उसमें उसने महल का नाम लिया था।”

“हाँ, बताया था।”

“हो न हो, कल वह उसी महल की तलाश में निकला था।” जमुना ने हथेली पर मुक्का मारते हुए कहा- “क्योंकि कल शुक्रवार था।” जब कुक्कू ने सहमति में सिर हिला दिया तो उसने आगे कहा- “मैंने खाना तो रख दिया लेकिन लौट आने के बजाय तेरे सुझाव के मुताबिक़ उसके कमरे में निगाहें दौड़ाने लगा ताकि कोई ऐसा सुराग हाथ लग जाए, जो ये तसल्ली दे सके कि कबाइलियों के सामूहिक क़त्ल में वह शरीक था। मैंने पूरा कमरा देखा, बाथरूम देखा लेकिन ऐसा कुछ नहीं मिला, जिसके मिलने की मुझे उम्मीद थी। हाँ, गौर करने लायक दो ऐसी चीजें जरूर मेरी निगाह में आयीं, जिन्होंने मेरे यकीन को पुख्ता कर दिया।”

“क्या थी वो चीजें?” कुक्कू ने भंवें ऊंचकाईं।

“एक बार जब मैं पशुपति के बुलावे पर उसके यहाँ गया था तो उसे किसी

पेटिंग को दीवार पर टांगते हुए देखा था। जब मेरी नजर उस पेटिंग पर पड़ी थी तो मैंने पाया था कि वह नरभेड़िये की पेटिंग थी लेकिन अगले ही पल जब मैंने दोबारा उस पर नजर डाली तो मेरी हैरत का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि उसमें तो भगवान् नृसिंह थे।”

“ये कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि तूने बताया ही था कि पशुपति के साथ तुझे अक्सर ऐसे दृष्टिभ्रम होते थे।”

“नहीं-नहीं।” जमुना ने तीव्र प्रतिरोध किया- “मैं उसके साथ जो कुछ भी देखता और महसूस करता था, वो मेरा वहम या मेरी नज़रों का धोखा नहीं होता था क्योंकि कल रात उसके कमरे में मैंने वही पेटिंग फिर से देखी तो पाया कि वो असल में नरभेड़िया ही था, भगवान् नृसिंह नहीं।” कुक्कू को हैरान होने का पर्याप्त अवसर देने के बाद उसने आगे कहा- “एक और वाकया बताता हूँ तुझे। गुज़री हुई पूर्णिमा के पहले आयी पूर्णिमा को जब मैं उसके पास गया था तो वह बरामदे में बैठा अपनी पसंदीदा किताब बोलकर पढ़ रहा था। खौफ़जदा करने वाली बात ये थी कि उसकी किताब के अल्फाज़ उस वक्त की मेरी दशा को हूबहू बयाँ कर रहे थे। सिर्फ यही नहीं, मुझे ऐसा आभास हुआ था, जैसे उसके नाखून नुकीले हो गए हों और उसके हाथ पर भेड़िये के फर उग आये हों लेकिन फिर अचानक सब-कुछ पहले जैसा हो गया। वह अपनी कुर्सी से उठा और कहने लगा कि वह तो किताब में लिखे हुए हर्फ़ पढ़ रहा था। उसके मुताबिक़ ये महज़ एक संयोग था कि मैं ठीक किताब में लिखी परिस्थितियों में उसके पास पहुँचा था। उसने मुझे किताब की पेज संख्या भी बतायी और खुद चेक करने के लिए भी कहा। अच्छा हुआ, जो उस वक्त मैंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उसकी हकीकत उसी पल बाहर आ जाती और तब अपनी असलियत छिपाने के लिए उसके पास मुझे मारने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं होता।” जमुना केवल साँस लेने के लिए रुका फिर आगे बोला- “असल बात तो ये है कुक्कू कि मैंने कई बार उसके असली रूप को महसूस किया लेकिन हर बार वह अपनी माया से मुझे भ्रमित करता रहा। कल रात उसके कमरे में जब वह किताब मेरे हाथ लगी और मैंने उसके बताये हुए पेज को पलटा तो...तो देखा कि वहाँ ऐसा कोई प्रकरण था ही नहीं, जो उस रात वह पढ़ रहा था।”

“यानी कि...यानी कि उस रात तेरी दशा को शब्दांकित करती हुई जो लाइनें वह बोल रहा था, वो किताब की लाइनें नहीं थीं?”

“नहीं। और न ही उन पलों में मैंने जो कुछ देखा था, वह मेरी नज़रों का धोखा था। उस पल वह वाकई नरभेड़िया में तब्दील हो रहा था लेकिन किन्हीं कारणों से होते-होते रह गया था।”

कुक्कू को प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं सूझा।

“किसी कारण से उसने कबाइलियों को मौत के घाट उतार दिया और अब वो महल की फ़िराक में है। उसे रोकना होगा कुक्कू, वरना हमारे कस्बे को श्मशान में बदलते देर नहीं लगेगी।”

“हमें लाल घाटी जाना होगा।” कुक्कू ने निर्णायक लहजे में कहा- “वहाँ के जंगल में एक मजार हैं, जहाँ पहुँचे हुए सूफ़ी संत रहते हैं। चाहे हिन्दू हो मुसलमान, ऊपरी बाधा का सताया हुआ हर इंसान उनसे राहत पाता है।”

“मैं चलने के लिए तैयार हूँ।”

“और हाँ, पशुपति का छुआ हुआ कोई सामान साथ रख लेना, जरूरत पड़ सकती है।”

“पर ऐसे सामान मैं लाऊँगा कहाँ से?” जमुना ने विवश भाव से कहा- “दोबारा उसके इर्द-गिर्द मंडराने की मेरी हिम्मत नहीं है।”

“उसके दिए हुए कुछ पैसे तो तेरे पास होंगे ही?”

“हाँ।”

“तो वही साथ लेकर चलना।”

जमुना ने सहमति में सिर हिला दिया।

N

राजनगर, वर्तमान।

आईने के सामने बैठी लम्बे और सफ़ेद बालों वाली उस रहस्यमयी औरत के कान खड़े हो गये। उसने कदमों की उस आहट का जायजा लिया, जो लगातार उसके कमरे की ओर आ रही थी तत्पश्चात पलक झपकने भर के अंतराल में साधारण औरत में तब्दील हो गयी। इधर उसका कायांतरण पूर्ण हुआ, उधर कमरे की चौखट पर मेड ने हाजिरी लगाई।

“क्या हुआ?” उसने मेड की ओर गर्दन घुमाते हुए पूछा।

“कोई पुलिस वाला आया है मैडम। तबस्सुम बेबी के साथ कल जो लड़का आया था, उसी का बाप बता रहा है खुद को।”

सुनते ही औरत की आँखों में शोले भड़क उठे। जबड़ों के साथ-साथ उसकी मुट्ठी भी खुद ब खुद भींचती चली गयी और गुस्से में नथुने फड़कने लगे। खबर सुनते ही वह इतनी बेखबर हो गयी थी कि उसे ये इल्म भी नहीं रहा कि मेड उसकी हालत देखकर सहम गयी है।

“ये नामुराद लड़की, जंजाल बन गयी है मेरे लिए।” वह एक-एक हर्फ़ चबाते हुए बड़बड़ायी और फिर मेड से मुखातिब होकर बोली- “चलता कर दो उसे। कह

दो कि घर पर कोई नहीं है।”

“वह किसी निशान के साथ आया है और बहुत परेशान है....।” मेड सकुचाते हुए आगे बोली- “अगर कोई हर्ज न हो तो मिल ही लीजिए।”

औरत ने कुछ पलों तक मेड के चेहरे पर नजरें टिकाये हुए कोई विचार किया तत्पश्चात बोली- “कहाँ है वह?”

“ड्राइंग हॉल में।”

“ठीक है, चलो।”

वह आईने के सामने से उठी और मेड के साथ हो ली।