पाली एक छोटे से मकान में था, जोकि नगरी की बस्ती में स्थित था । यह मकान उसी इंतहाई खूबसूरत युवती का था, जो उसे जंगल में बाहों के घेरे में लेकर गायब हो गई थी और उसके बाद पाली ने खुद को इसी घर में पाया और सामने वही खूबसूरत युवती मौजूद थी।
"तुम ?" पाली होश में आते ही सीधा होकर बैठ गया था ।
"हां।" युवती दिलकश अंदाज में मुस्कुराई ।
"कौन हो तुम ? मैं कहां हूं । "
"मेरा नाम रानी है। तुम इस वक्त तिलस्मी नगरी में, मेरे घर पर हो ।" वो पुनः मुस्कुराई ।
"तिलस्मी नगरी में । पाली चौंका।
"हां । "
"मेरे बाकी साथी कहां है ? "
"उन्हें भी कोई न कोई कैद कर लेगा और सेवक के काम पर लगा दिया जाएगा। मुझे कुछ मनुष्यों के आने की खबर मिल गई थी, इसलिए मैं किसी एक मनुष्य को लेने चली गई ।" उसने पाली के हाथ पर हाथ रखकर कहा--- "लेकिन मैं तुम्हें सेवक बनाकर नहीं रखूंगी।"
"क्या मतलब ?"
"मैं तुम्हें अपने दिल में, अपना राजा बनाकर रखूंगी। मैं कब से किसी भले आदमी की जरूरत महसूस कर रही थी । क्योंकि दालूबाबा के पास तो पन्द्रह दिन में एक बार जाना पड़ता है और बाकी के दिन काटते नहीं कटते । नगरी का कोई व्यक्ति मेरे समीप आने का साहस नहीं करता । क्योंकि सब जानते हैं कि मैं दालूबाबा की सेवा करने जाती हूं। ऐसे में मेरे पास आकर कोई दालूबाबा के हाथों मरना पसंद नहीं करेगा ।"
"ये दालूबाबा कौन है ?"
"इस नगरी का मालिक है और मैं जानती हूं वो बहुत बड़ा शैतान है ।" रानी गहरी सांस लेकर कह उठी--- "अब तुम इसी मकान में रहोगे। किसी को मालूम नहीं होना चाहिए कि कोई मनुष्य मेरे पास रहा है। हम प्यार किया करेंगे। तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगी।
"तुम मुझे कैद करके रखना चाहती हो ?"
"ऐसा मत कहो । मैं तुम्हें अपना बनाकर रखना चाहती हूं। वैसे भी तुम यहां से बाहर निकलोगे तो, तुम्हारे शरीर की महक से जान जाएंगे कि तुम मनुष्य हो और पकड़कर अपनी सेवा में लगा लेंगे। यहां से वापस पृथ्वी पर तुम जा नहीं सकते । इसलिए चुपचाप मेरे साथ रहने में ही तुम्हारी भलाई है।" रानी ने उसे समझाने वाले स्वर में कहा । पाली ने उसे देखा ।
"तुम दालूबाबा के पास मत जाओ।"
"दालूबाबा को इंकार करने की हिम्मत किसी में नहीं है। उसके आदमी, नगरी की खूबसूरत लड़कियों को दालूबाबा की सेवा के लिए ले जाते हैं और रात बीतने के पश्चात उसे वापस पहुंचा देते हैं।" रानी ने कहा ।
पाली कुछ नहीं बोला ।
"सब कुछ तुम्हारे सामने है । फैसला तुम्हारे सामने है । मैं जबर्दस्ती तुम्हें अपने पास नहीं रखूंगी।"
पाली को नगरी के हालातों की जानकारी नहीं थी । इस तरह उसका बाहर जाना खतरे वाली बात उसकी भी हो सकती थी । जब तक कोई दूसरा रास्ता नहीं मिलता, तब तक उसने रानी के साथ रहने का मन बना लिया और कई दिनों से वो रानी के पास रह रहा था । उससे भरपूर प्यार पा रहा था ।
कुछ देर पहले ही दालूबाबा का बुलावा आ गया था रानी को । बुला लाने वाले दालूबाबा के आदमी के साथ ही रानी दालूबाबा की तरफ रवाना हो गई थी।
******
दालूबाबा ने केसर सिंह को भीतर प्रवेश करते पाकर पूछा ।
"परसू से क्या नाम बताया उस गद्दार का, जो इन्हें पृथ्वी से लाया ।"
"दालूबाबा ।" केसर सिंह गहरी सांस लेकर कह उठा--- "मेरी तो समझ में कुछ नहीं आता ।"
"क्या हुआ ?" दालू के माथे पर लकीरें गहरी हो गई ।
"ये तो दोबारा जन्म लेकर आया परसू है।" केसर सिंह परेशान सा कह उठा--- "लेकिनलेकिन ये पहले जन्म वाला परसू ही । वैसे ही पत्थर की तरह सख्त इंसान।"
दालूबाबा की आंखें कठोरता से सिकुड़ती जा रही थी ।
"तो क्या परसू ने फकीर बाबा की असलियत के बारे में नहीं बताया ?" दालूबाबा अंगूठे से अपनी आंख मसलने लगा। दूसरी आंख एकटक केसर सिंह पर टिकी थी ।
"नहीं। परसू अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं । उसके शरीर को लोहे की गर्म सलाखों से जल्लादों ने दागा। परंतु वह उस फकीर बाबा का असली नाम बताने को तैयार नहीं। उसे जंजीरों से पीटा गया। उसके जिस्म पर कीले ठोकी गई। उसे नमक वाले गर्म पानी में फेंका गया, ताकि जख्मों में और दर्द हो और वो मुंह खोल दें। परंतु पत्थर ने मुंह नहीं खोला ।"
अंगूठे से आंख मसलना छोड़कर, दालूबाबा ने दांत भींच लिए ।
"ये कैसे संभव है कि इतनी कठोर यातना के पश्चात भी परसू मुंह खोलने पर विवश न हो।"
"ये बात संभव हो चुकी है दालूबाबा । परसु के शरीर की हालत यह है कि जर्रा-जर्रा उसका, मांस के लोथड़ों बदल चुका है । उसे पहचान पाना कठिन हो रहा है ।" केसर सिंह ने कहा--- "उसे यातना देने के लिए उसके शरीर का कोई हिस्सा सलामत नहीं बचा । सिर्फ उसकी सांसें ही बाकी हैं। सांसो के बारे में कोई हुक्म हो तो ?"
"मुझे परसू के पास ले चलो ।" दालूबाब गुर्रा उठा।
"आइए।"
दालूबाबा और केसर सिंह कमरे से बाहर निकलकर आगे बढ़े तो सामने से एक पहरेदार रानी के साथ आ रहा था। पास पहुंचते ही पहरेदार ने सलाम किया ।
"मालिक ?" पहरेदार ने कुछ कहना चाहा ।
"रानी को हमारे शयनकक्ष में पहुंचा दो ।" दालूबाबा ने क्षणिक ठिठककर कहा--- "मैं अभी दालूवाबा पहुंच रहा हूं रानी । तब तक तुम स्नान करके श्रृंगार अपना लो।"
"अवश्य दालूबाबा ।" रानी ने थोड़ा सा सिर झुकाया ।
दालूबाबा पुनः केसर सिंह के साथ आगे बढ़ गया ।
पारसनाथ की हालत देखते ही दालूबाबा के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे । उसने केसर सिंह पर निगाह मारी फिर पुनः पारसनाथ पर नजरें टिका दी।
पारसनाथ तो जैसे पहचाना नहीं जा रहा था । सिर से पांव तक जख्म ही जख्म थे । गर्म सलाखें दागे जाने के गहरे निशान थे । जंजीरों से पीटे जाने की वजह से, उसके जख्म और शरीर के अन्य उधेड़ हुए थे । शरीर के कई हिस्सों में कीले ठुकी स्पष्ट नजर आ रही थी । जिस्म के बाकी बचे हिस्सों पर, गर्म पानी की वजह से फफोले उभरे स्पष्ट नजर आ रहे थे । उसके जिस्म का ऐसा कोई हिस्सा नहीं था जो जख्मी न हो।
स्पष्ट नजर आ रहा था कि पारसनाथ के साथ यातना के दौरान, हर उस हद को भी पार कर लिया गया था, जिसे कि इंसान सरलता से, पार नहीं करता।
पारसनाथ इस वक्त बेहोश था ।
दालूबाबा ने अच्छी तरह से पारसनाथ का शरीर देखा फिर केसर सिंह से बोला ।
"केसरे । इसका हाल तो बहुत बुरा हुआ है ।"
"यही तो मैं आपसे कह रहा था कि...।"
"हैरत है कि इतनी यातना के पश्चात भी परसू ने मुंह नहीं खोला ।" दालूबाबा के होंठ सिकुड़ गए । "मैंने पहले ही कहा था कि ये तो वही परसू है, जो पत्थर की तरह कठोर और सख्त जान हुआ करता था ।"
"अजीब बात है। दोबारा जन्म लेने पर भी परसू उतना ही ताकत वाला है ।" दालूबाबा के चेहरे पर सोच के भाव नाच रहे थे । निगाहें बेहोश पारसनाथ पर ही थी ।
"अब आप ही आदेश दें कि परसू का क्या किया जाए ।" केसर सिंह ने कहा--- "इसके शरीर का हाल तो आप देख ही रहे हैं। कहें तो इसकी सांसो की डोर तोड़ दूं ?"
"नहीं केसरे । ऐसी भूल मत करना ।" दालूबाबा ने हाथ हिलाकर कहा--- "मैं हर हाल में फकीर बाबा की असलियत जानना चाहता हूं। वो धोखेबाज हमारे नगरी का है और इतनी हिम्मत किसमें आ गई कि मेरी नगरी में रहकर, मुझसे ही धोखेबाजी करे ।"
"लेकिन दालूबाबा यातना देने के लिए परसू के शरीर का कोई हिस्सा सलामत नहीं बचा। इसे और यातना दी गई तो इसके शरीर से इसकी जान निकल सकती है। "
"इसे ठीक करो । इसके जख्मों को दुरस्त करो । इसे दोबारा इस काबिल बना दो कि, यातना दी जाए । इस बार पहले से भी ज्यादा भयानक यातना देना । तब भी परसू मुंह न खोलें तो, दोबारा इसे ठीक करके पुनः यातना देना आरंभ कर दो। इस सिलसिले को तब तक कायम रखो, जब तक कि यह फकीर बाबा की हकीकत न बता दे कि नगरी में वो किस रूप में मौजूद है । लेकिन इस बात का ध्यान रखना कि किसी भी हालत में हकीकत बताने से पहले, इसके प्राण शरीर से बाहर न निकल सकें।"
"मैं ऐसा ही करूंगा दालूबाबा।"
"किसी को गुलाबचंद के पास भेजकर खबर मंगवाओ कि तिलस्म में मौजूद देवा और मिन्नो की क्या हालत है । अभी तक वे जिंदा है, या वे अपनी जान गंवा चुके हैं।"
"मैं अभी किसी को गुलाबलाल के पास रवाना करता हूं।"
दालूबाबा ने सिर हिलाया।
"और कमरे में कैद उन मनुष्यों को भरपेट खाना देते रहना । हाकिम को बुलाने के लिए अगर अनुष्ठान करना पड़ा तो मनुष्य का लहू आसानी से मुझे हासिल हो जाएगा।"
"जी । यह बात मुझे अच्छी तरह याद है ।" केसर सिंह ने फौरन सिर हिलाया।
दालूबाबा पलटा और वहां से बाहर निकलता चला गया।
******
दालूबाबा अपने शयनकक्ष में पहुंचा तो ठिठक गया । मस्तिष्क का सारा तनाव जाने कहां गायब हो गया। होठों पर मुस्कान फैलती चली गई। नजर रानी पर टिकी रही ।
रानी आज खूबसूरती का कहर ढा रही थी । पीली, केसर युक्त साड़ी पहन रखी थी । उसका जिस्म श्रृंगारों से लदा था । होठों पर लिपस्टिक, माथे पर बिंदिया, गले में हीरे-जवाहरातों का दमकता सैट । कलाइयों में कंगन और खनकती चूड़ियां। पांवो में सोने के कड़े। कमर में सोने की ऐसी खूबसूरत जंजीर बंधी थी कि देखते ही बन रही थी। कोनों में लटकते-लंबे झुमके।
इतनी खूबसूरत दालूबाबा को वो पहले नहीं लगी थी।
उसे इस तरह देखते पाकर रानी खिलखिलाई ।
"तुम तो इस तरह मुझे देख रहे हो, जैसे पहली बार देखा है ।" हंसी रोकते हुए रानी कह उठी ।
"हां ।" दालूबाबा खुलकर मुस्कुराया--- "आज तो देखकर ऐसा ही लगता है कि तुम्हें पहली बार ही देखा है। पहले कभी तुम इतनी खूबसूरत नहीं लगी ?"
"मैं तो हूं ही तुम्हारी। पहले कभी पारखी निगाहों से तुमने नहीं देखा ।"
"कोई बात नहीं रानी, आज मैं तुम्हें मन भर के देखूंगा ।" कहते हुए दालूबाबा आगे बढ़ा और रानी को अपनी बांहों में ले लिया ।
एक पल बीता |
दूसरा पल बीता ।
तीसरा पल पूरा होने से पहले ही दालूबाबा ने रानी को अपने से जुदा करते हुए जोर से धक्का दिया तो वो लड़खड़ाती हुई वह चार-पांच कदम पीछे हट गई । चेहरे पर हैरानी के अजीब से भाव उभर आए । वो समझ नहीं पाई कि दालूबाबा ने उसे धक्का क्यों दिया है ? दालूबाबा के चेहरे पर निगाह पड़ते ही रानी चौंकी ।
दालूबाबा का चेहरा सुलग लग रहा था । वह क्रोध ही क्रोध था। आंखें लाल सुर्ख हो गई थी । उत्तेजना से मुठियां भिंच गई थी। पूरा जिस्म जैसे कांपता सा लग रहा था । "क्या हुआ ?" रानी के होठों से आवाक सा स्वर निकला । "बदजात । तेरे जिस्म से मनुष्य की महक आ रही है ।" दालूबाबा गुर्रा उठा। रानी चौंकी ।
"मनुष्य की महक ?" उसके होठों से हड़बड़ाया सा स्वर निकला ।
"तुम्हारे बदन पर किसी मनुष्य ने हाथ लगाया है। उसने तुम्हारे हर अंग को छुआ है । अपने रुप-यौवन का रसपान तुम किसी मनुष्य को करा चुकी हो ।" दालूबाबा दहाड़ा।
रानी के चेहरे पर घबराहट के भाव उभरे ।
दालूबाबा क्रोध के सागर में डूब चुका था।
"क्या तेरे को मालूम नहीं कि दालूबाबा, सिर्फ उसी लड़की को अपने शयनकक्ष में आने देता है जो सिर्फ दालूबाबा की ही हो और किसी मर्द ने उसके जिस्म को हाथ न लगाया हो और तुम्हारे शरीर के हर जर्रे से मनुष्य की महक आ रही है ।" दालूबाबा का गुस्सा सातवें आसमान पर था ।
रानी का शरीर भय की वजह से कांपने लगा ।
दालूबाबा अंगूठे से आंख मसलने लगा । दूसरी सुर्ख आंख रानी पर थी। " बता कौन है वो मनुष्य ?"
"प-पाली नाम है उसका ?"
"कहां है वो ?"
"म-मेरे घर पर " रानी की आवाज कांप रही थी ।
"कहां से मिला तुझे ?"
"जंगल में मैं उसे कैद करके, नगरी में, अपने घर पर ले आई थी ।" रानी के चेहरे पर खौफ की परछाइयां नाच रही थी --- "मुझ पर रहम करो दालूबाबा | बहुत बड़ी भूल हो गई मुझसे । फिर कभी भी ऐसी भूल नहीं होगी । उस मनुष्य ने मुझे बहका दिया था। "
दालूबाबा ने आंख से अंगूठा हटाया और कहर से मुस्कुराया।
"भूल तो भूल ही होती है और दालूबाबा ने कभी भी किसी को क्षमा करना नहीं सीखा । बेशक तुम बहुत खूबसूरत हो । तुम्हारी खूबसूरती का जवाब नहीं, लेकिन तुम्हारे जिस्म पर दूसरे के हाथ लग चुके हैं, इसलिए मेरे लिए तुम रहो या न रहो, अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता ।"
"मुझे क्षमा कर दो दालूबाबा ।" रानी की आंखों से आंसू बहने लगे थे।
दालूबाबा एकाएक होठों से होठों में कुछ बड़बड़ाने लगा । मात्र तीस सैकिंड उसके होंठ हिले । फिर उसका हाथ उस दिशा की तरफ उठा, जिस तरफ खड़ी रानी, आतंक भरी निगाहों से उसे देख रही थी ।
अगले ही पल जहां रानी खड़ी थी, वहां रानी नहीं मौजूद थी। उसकी जगह पर नीचे फर्श पर पीली सी खूबसूरत चिड़िया बैठी हुई थी।
दालूबाबा के बड़बड़ाते होंठ थम गए । होठों पर जहरीली मुस्कान थी।
"अपने किए की सजा भुगत । अब तू हमेशा चिड़िया ही बनी रहेगी । जा, चली जा यहां से|"
अगले ही पल चिड़िया उड़ी और खुली खिड़की से बाहर निकलती चली गई।
दालूबाबा ने आगे बढ़कर जंजीर खींची तो घंटा बजा । पहरेदार भीतर आया।
"जी।"
"रानी के घर जाओ । वहां एक मनुष्य छिपा बैठा है । उसे कैद करके हमारे सामने पेश करो।"
"जो हुकुम ।" कहने के साथ ही पहरेदार बाहर निकलता चला गया।
इस तरह पाली को भी कैद करके, उसी कमरे में पहुंचा दिया गया, जहां बाकी सब थे उन सबको देखकर पाली खुश हुआ कि अपनों में आ पहुंचा है। लेकिन बंगाली की लाश देखकर वह व्याकुल अवश्य हुआ । उसे छोड़ने आए पहरेदार, खामोशी से बंगाली की लाश को लेकर वहां से चले गए।
******
शुभसिंह। जिसे मोना चौधरी ने तिलस्मी कैद से आजाद किया था । जो कमरे में पत्थर का बुत बना लेटा, दालूबाबा की दी सजा को भुगत रहा था।
मोना चौधरी को विदा करने के बाद शुभसिंह, दालूबाबा से मिला और उसके बाद अपने पुराने साथियों की तलाश में निकल गया था ।
भरपूर चेष्टा के पश्चात उसे दो साथी मिले । एक प्रताप सिंह, और दूसरा कीरत लाल । दोनों इस वक्त शांत जिंदगी व्यतीत कर रहे थे । शुभसिंह को देखकर पहले तो वे चौंके फिर खुशी से उसे गले लगा लिया । प्रताप सिंह से खुशी रोके न रुक रही थी ।
"शुभ, तेरे सामने होने का मतलब है कि कुलदेवी आ गई है।" प्रताप सिंह कह उठा ।
"ठीक बोला तू ।" शुभसिंह ने खुशी से बताया--- "देवी ने ही मुझे दालूबाबा के द्वारा दी गई कैद से आजाद करवाया है। हमारी कुलदेवी आ गई है।"
"तुम्हें सजा देने की जरूरत ही नहीं थी । दालूबाबा ने जानबूझकर तुम्हें कैद में डाला ।" कीरत लाल कह उठा--- "और ऐसा दालूबाबा ने इसलिए किया कि तुम्हारे होते हुए वो अपनी साजिशों कामयाब नहीं हो सकता था । तुम्हारी मौजूदगी में वो मुद्रानाथ और बेला को टेढ़ी आंख से भी नहीं देख सकता था।"
शुभसिंह गंभीर हो उठा।
"हां । कुछ बातें मुझे मालूम हुई है ।" शुभसिंह ने कहा--- "दालू ने तिलस्म पर ही नहीं, पूरी नगरी पर कब्जा जमा लिया है। नगरी का समय चक्र रोक रखा है। उसने ऐसी घेराबंदी कर रखी है कि कोई उसे खिलाफ नहीं बोल सकता।"
प्रताप सिंह के चेहरे पर गुस्सा नजर आने लगा।
"दालूबाबा की ताकत को कम करना होगा । तभी उसकी घेराबंदी तोड़ी जा सकती है । कीरत लाल ने कहा ।
"लेकिन उसकी ताकत कम कैसे होगी ?" शुभसिंह ने पूछा ।
"सबसे पहले उससे वो 'ताज' हासिल करना होगा, जिसमें मौजूद असीम शक्तियों का वह फायदा उठा-।"
"नहीं।" प्रताप सिंह ने टोका--- "उस 'ताज' को तो दालू ने तिलस्मी पहरेदारी में रखा हुआ है और पक्के तौर पर ऐसा इंतजाम कर रखा होगा कि किसी भी हाल में कोई उस तक न पहुंच सके ।"
"हां । कीरत लाल ने होंठ भींचे--- "ये बात तो तेरी सही है ।"
कुछ देर उनके बीच खामोशी रही।
"तुम दोनों के खिलाफ, मेरी सहायता करने को तैयार हो ?" शुभसिंह बोला ।
"हां ।" अब तो कुलदेवी आ गई है। हमें किसका डर । देवी, दालू का बुरा हाल कर देगी।" "ठीक कहते हो । लेकिन एक समस्या सामने आ रही है ।" शुभसिंह चिंता भरे स्वर में कह उठा।
"कैसी समस्या ?"
"देवी इस वक्त तिलस्म में भटक रही है और पहले की जिंदगी की बातें भूली हुई है। ऐसे में दालू का मुकाबला करना कठिन हो जाएगा देवी के लिए।" शुभसिंह ने दोनों को देखा --- "सबसे पहले हमें देवी को तिलस्म से निकालना है और उसे बीते जन्म की एक-एक बात याद करानी है ताकि दालू के जाल को देवी तोड़ दे । वरना दालू देवी का नुकसान भी पहुंचा सकता है ।
"तुम ठीक कहते हो ।" कीरत लाल फौरन बोला--- "मैं पुराने विश्वासी साथियों को इकठ्ठा...।"
"अभी जरूरत नहीं है किसी और कोई इकट्ठा करने की। क्योंकि हमें तिलस्म में जाकर देवी को तलाश करके, उसको बीते जन्म की बातें याद करानी है और मैं नहीं चाहता कि तिलस्म में हमारे प्रवेश करने के बारे में गुलाबलाल जान जाए । ऐसा हुआ तो वो हमारे लिए रुकावटें पैदा करेगा । इसलिए ज्यादा लोगों के साथ तिलस्म में जाना ढोल पीटने के बराबर होगा।"
"तुम ठीक कहते हो शुभसिंह ।" कीरत लाल ने सोच भरे स्वर में कहा।
"तिलस्म में चलने की तैयारी करें ?" प्रताप सिंह के स्वर में उत्साह था--- "देवी तिलस्म में किस दिशा में है, यह मालूम करने में वक्त भी लग सकता है ।"
और तीनों तिलस्म में जाने की तैयारी करने लगे।
******
देवराज चौहान और मोना चौधरी को आगे बढ़ते-बढ़ते दो दिन बीत गए थे । वो जो रास्ता शुरू हुआ था, खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था । थकान उनके शरीर में भरी हुई थी । चेहरों से स्पष्ट नजर आ रही थी । जब आगे बढ़ना कठिन हो जाता तो कुछ देर रुककर वे आराम कर लेते । काली बिल्ली मोना चौधरी के कंधे पर चुप्पी साधे बैठी थी । भूख लगती तो खाना तिलस्मी खंजर या बेला के दिए लकड़ी के टुकड़े से प्राप्त कर लेते। ।
"मुझे नहीं लगता कि ये रास्ता समाप्त होगा ।" मोना चौधरी कह उठी--- "हमें आगे बढ़ने की दिशा बदलनी चाहिए।"
देवराज चौहान ने सीधे रास्ते पर दूर तक निगाह दौड़ाते हुए कहा ।
"रास्ता है तो, कहीं ना कहीं तो खत्म होगा ही "
"दो दिन हो गए हैं, हमें आगे बढ़ते हुए ।" मोना चौधरी बोली ।
"हम यहां की राहों से अनजान है। रास्ता है तो हम उसी पर आगे बढ़ेंगे। क्योंकि किसी भी दिशा में बढ़े तो उसका अंत कहां होगा हमें नहीं मालूम ।" देवराज चौहान ने गंभीर स्वर में कहा--- "इसलिए हम इसी रास्ते पर आगे बढ़े तो ठीक रहेगा । खतरा तो हर तरफ हमारे सामने आना ही है । "
मोना चौधरी ने होंठ सिकोड़कर देवराज चौहान को देखा।
"खतरों का मुकाबला किए बिना तिलस्म में आगे नहीं बढ़ा जा सकता ।" मोना चौधरी बोली ।
"सबसे बड़ी दिक्कत हमारे सामने तो यह है कि हमें यह नहीं मालूम कि तिलस्म से बाहर कैसे निकलना है।" देवराज चौहान ने कहा ।
"तिलस्म से बाहर निकलने के लिए अवश्य किसी खास क्रिया को अंजाम दिया जाना चाहिए और वो क्रिया क्या है, उसका हमें जरा भी ज्ञान नहीं।" मोना चौधरी ने सोच भरे स्वर में कहा ।
"तुम ठीक कहती हो ।"
दोनों तेजी से आगे बढ़े जा रहे थे।
"कुछ खा ले। रुकने से आराम भी हो जाएगा ।" मोना चौधरी बोली ।
"मुझे कोई एतराज नहीं । यहां हमारे सामने कौन सी मंजिल है, जहां ठीक वक्त पर हमें पहुंचना है ।" कहने के साथ ही देवराज चौहान मुस्कुराया और रुक गया।
मोना चौधरी भी रुकी और कमर पर बांधे खंजर को छूकर बुदबुदाई।
"हमारे लिए खाने का इंतजाम करो।"
अगले ही क्षण सामने टेबल और दो कुर्सियां नजर आने लगी । टेबल पर कई तरह के गर्म में खाने मौजूद थे । उनकी महक उनकी सांसो से टकराने लगी। काली बिल्ली कंधे से छलांग मारकर, नीचे जा बैठी।
दोनों कुर्सियों पर बैठे और खाना शुरू किया ।
"हमारे साथ ही मालूम नहीं किस हाल में होंगे ?" मोना चौधरी ने कहा ।
"वे जहां भी होंगे, कम से कम खुशी से भरे हाल में तो होंगे नहीं।" देवराज चौहान ने उसे देखा ।
मोना चौधरी की निगाह, देवराज चौहान पर जा टिकी ।
"यह भी तो हो सकता है कि वे हम भी हमारी तरह तिलस्म में कहीं फंसे हों।" मोना चौधरी के होठों से निकला ।
"हो सकता है। लेकिन ऐसा न ही हो तो अच्छा है ।"
"क्यों ?"
"यहां कदम-कदम पर मौत है। तिलस्म में वे आसानी से अपनी जान गंवा सकते हैं।"
मोना चौधरी ने होंठ भींचकर सिर हिलाया और खाने लगी।
"बाबा, यहां पर हमें ताज, हासिल करने के लिए लाए थे ।" देवराज चौहान बोला--- "लेकिन अब ताज को भूलकर, दूसरी ही मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है । "
"फकीर बाबा ने हमारी आड़ में अपना कोई मकसद हल करने की चेष्टा की है । "
"वो कैसे ?" देवराज चौहान ने मोना चौधरी को देखा।
"तुमने बताया कि पिछले डेढ़ सौ बरस से तुम्हारे पहले जन्म का परिवार तिलस्म में कैद है । तुम उन सब से मिल चुके हो और वे तुम्हारे इंतजार में थे कि तुम आओगे और उन्हें आजाद करवाओगे।"
"हां ।" देवराज चौहान ने सिर हिलाया ।
"और दालूबाबा जो भी है, उसने नगरी का समय चक्र रोक रखा है । न तो कोई मर सकता है और न ही कोई पैदा हो सकता है । यह बात भी तुम्हारे परिवार वालों ने तुम्हें बताई।"
देवराज चौहान ने सहमति से सिर हिलाया ।
"इधर, जगह-जगह्, तिलस्म से बाहर खंडरह हुए महल में और तिलस्म में भी, मेरे पत्थर के बुत खड़े हैं । मुझे देखने वाले, मुझे कुलदेवी या देवी कहते हैं। एक पत्थर के बुत को हाथ लगाते ही वो धीरे-धीरे पत्थर से इंसान में बदल गया। उसने बताया कि दालूबाबा ने सजा के तौर पर उसे बुत बनाया था और कहा था कि देवी ही आकर, तुम्हें सजा से मुक्ति दिलाएगी और उसे मुक्ति मिल गई । उसने बेहद विश्वास के साथ कहा कि मैं ही वो देवी हूं, परंतु मनुष्य हूं और बीते जन्म की याद भूली हुई हूं।"
देवराज चौहान, मोना चौधरी को देखता रहा ।
"इधर तुमने बताया कि बेला नाम की मेरी कोई बहन है, जो तुमसे मिल चुकी है और तुम्हारी सहायता भी कर रही है। यानी कि इन सब बातों को मद्देनजर रखकर, • विश्वास के साथ यह कहा जा सकता है कि फकीर बाबा हमें कुछ बताने, याद कराने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें अपना कोई मतलब है । "
"मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं । लेकिन इसमें हमारा भी फायदा है ।" देवराज चौहान ने कहा ।
"कैसा फायदा ?"
"जैसे कि मेरे पूर्व जन्म के परिवार के सदस्य, जो कि आज कैदी बने हुए हैं, कम से कम में उन्हें कैद से आजाद तो करवा सकता हूं । उन्हें गुरुवर ने कहा था कि देवा ही आकर, तुम लोगों को कैद से छुड़ाएंगा । गुरुवर कौन हैं, मैं नहीं जानता, परंतु उन सबको गुरुवर की बात पर पूरा विश्वास रहा और दोबारा जन्म लेकर ही सही, मैं वापस आया। इससे उनका विश्वास और पक्का हुआ की वो कैद से आजाद हो जाएंगे।"
मोना चौधरी ने खाते-खाते देवराज चौहान को देखा ।
"लेकिन वक्त आने पर तुम अपने परिवार वालों को तिलस्मी कैद से में कैसे निकालोगे ?" मोना चौधरी ने पूछा--- "ये रास्ता इतना आसान तो होगा नहीं।"
देवराज चौहान के चेहरे पर सोच के भाव उभरे ।
"ये मैं नहीं जानता कि अपने पूर्व जन्म के परिवार और बस्ती वालों को, तिलस्मी कैद से कैसे छुटकारा दिलाऊंगा । नगरी के रुके समय चक्र को भी पुनः चालू कर देना चाहता हूं । जो भी हो, यह दोनों काम पूरे करने के पश्चात ही, पाताल लोक से जाऊंगा ।" देवराज चौहान की धीमी आवाज में पक्कापन था ।
"देवराज चौहान, ये मत भूलो कि इस वक्त हमारे सिरों पर मौत नाच रही है। हम अमर् नहीं है । तुम जो काम करने को कह रहे हो, उससे पहले मौत तुम्हें अपने में समेट सकती है ।" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा।
"जानता हूं ।" देवराज चौहान पहले वाले स्वर में बोला--- "मैं मौत और बुरे वक्त तो कभी नहीं भूलता । अब तक जो हुआ है अच्छा ही हुआ है और आगे भी जो होगा, अच्छा ही होगा।"
तभी मोना चौधरी की निगाह तीस-चालीस कदम दूर जा टिकी । जहां बेहद खूबसूरत युवक खड़ा था और मुस्कुराता हुआ उसे देख रहा था । उसे देखते पाकर खूबसूरत युवक ने उसे पास आने का इशारा किया ।
मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी । वो उसे ही देखती रही ।
उस खूबसूरत युवक ने पुनः मोना चौधरी को पास आने का इशारा किया ।
"तुम जानते हो उसे ।" मोना चौधरी के होठों से निकला ।
"किसे ?" देवराज चौहान खाना खा रहा था ।
"उधर देखो।"
देवराज चौहान उधर देखा, जिधर मोना चौधरी ने देखने को कहा । लेकिन वहां उसे कुछ भी नजर नहीं आया ।
"पहले कभी देखा है उसे ?"
"किसकी बात कर रही हो । मुझे तो कुछ भी नजर नहीं आ रहा ।" देवराज चौहान ने उसे देखा।
"मैं उस खूबसूरत युवक की बात कर रही हूं, जो उधर खड़ा है और मुझे बुला रहा है । " देवराज चौहान ने फिर उस तरफ देखा, जिधर मोना चौधरी ने कहा था ।
इस बार भी उसे कुछ नजर नहीं आया ।
"मुझे नहीं मालूम था कि तुम्हें मजाक करने की आदत है ।" कहने के साथ ही देवराज चौहान खाने में व्यस्त हो गया ।
मोना चौधरी ने घूरकर देवराज चौहान को देखा ।
"और मुझे भी नहीं मालूम था कि उसे देखकर तुम्हें जलन होने लगेगी, क्योंकि वो तुमसे ज्यादा खूबसूरत है ।" मोना चौधरी के लहजे में तीखापन आ गया ।
देवराज चौहान ने मोना चौधरी को देखा ।
"तुम खाते रहो । मैं उससे मिलकर आ रही हूं ।" कहने के साथ ही मोना चौधरी कुर्सी से उठ गई।
देवराज चौहान ने उलझन भरी निगाहों से मोना चौधरी को देखा फिर उधर नजर मारी । परंतु उसे खूबसूरत युवक तो क्या बूढ़ा भी देखने को नहीं मिला। जबकि मोना चौधरी के कदम उस तरफ बढ़ रहे थे।
तभी देवराज चौहान के कानों में बेला की बेचैन फुसफुसाहट पड़ी ।
"मिन्नो को रोको देवा । वो खूबसूरत युवक, तिलस्मी ताकत से मनाया गया है। दालूबाबा का जाल है वो मिन्नो की मौत के लिए । वो युवक मिन्नो की जान ले लेगा।" ।
देवराज चौहान चौंका ।
"तुम किस तिलस्मी युवक की बात कर रही हो ।
"जिसके पास मिन्नो जा रही है।" बेला की फुसफुसाहट में व्याकुलता के भाव थे ।
"मोना चौधरी भी किसी युवक की बात कर रही थी। लेकिन मुझे तो कोई नजर नहीं आ रहा।" देवराज चौहान के माथे पर बल नजर आने लगे थे और चेहरे पर उलझन से भरे भाव।
"ओह ! समझी । बेला की फुसफुसाहट कुछ तीव्र हो गई --- "खूबसूरत मनुष्य तिलस्मी चाल के रूप में, मिन्नो की मौत बनाकर, भेजा गया है । वो सिर्फ मिन्नो को ही नजर आएगा। तुम्हें नहीं । क्योंकि वो मिन्नो की मौत है । देवा, मिन्नो को बचा लो किसी तरह। मिन्नो जब उस युवक के करीब पहुंचेगी तो वो मिन्नो को अपने प्रभाव में ले लेगा । तब मिन्नो कुछ भी सोचने-समझने के काबिल नहीं रहेगी। उसके कहने पर उसकी बांहों में समा जाएगी और वो तिलस्मी युवक उसे बाहों में भींचकर, उसके जिस्म की सारी हड्डियां तोड़ देगा । तब मिन्नो, खुद को उसकी बाहों से आजाद नहीं करा सकेगी।"
देवराज चौहान फौरन उठ खड़ा हुआ । मोना चौधरी की तरफ देखा ।
मोना चौधरी धीमे कदमों से आगे बढ़ रही थी ।
"लेकिन मुझे वो तिलस्मी युवक नजर नहीं आ रहा । मैं कैसे उसे बचाऊं ।" देवराज चौहान विवश स्वर में बोला ।
बेला की आवाज नहीं आई ।
"मोना चौधरी।" देवराज चौहान ने पुकारा ।
परंतु मोना चौधरी आगे बढ़ती रही । देवराज चौहान के पुकारने का उस पर कोई असर नहीं हुआ ।
"मिन्नो तिलस्मी युवक के प्रभाव में आ चुकी है। उसका आने पर बस नहीं रहा ।" बेला की फुसफुसाहट उसके कानों में पड़ी--- "तुम्हें फौरन ही कुछ करना होगा देवा।"
"मुझे वो युवक नजर नहीं आ रहा ।" देवराज चौहान दांत भींचकर बोला--- "ऐसे में मैं क्या कर सकता हूं।"
"वो मुझे नजर आ रहा है।" बेला कि फुसफुसाहट में गुस्सा झलका--- "मैं तुम्हारी सहायता करती हूं।"
"कैसे ?" देवराज चौहान बुदबुदाया ।
"अपने पैरों के पास देखो ।"
देवराज चौहान ने नीचे देखा ।
देखते ही देखते पांवों के पास छोटा-सा पत्थर आ गिरा।
"इस पत्थर को उठाओ देवा ।"
देवराज चौहान ने तुरंत पत्थर को उठाया ।
"समय बहुत कम है ।" बेला की व्याकुलता से भरी फुसफुसाहट कानों में पड़ी--- "जल्दी से मिन्नो की तरफ भागो । मिन्नो के पास नहीं रुकना । उसे पार करके जाना। और जब मैं कहूं, रुक जाना ।"
देवराज चौहान कुर्ती के साथ दौड़ा।
मोना चौधरी को पार करता चला गया ।
मोना चौधरी सुध-बुध खो चुकी थी। उसकी निगाह सिर्फ उस खूबसूरत युवक पर ही थी धीमे-धीमे कदमों से वो आगे बढ़ी जा रही थी। अब युवक और उसके बीच सिर्फ दस कदम का फासला शेष रहा था।
"रुक जाओ देवा । "
बेला के फुसफुसाहट कानों में पड़ते ही देवराज चौहानों रुका । वो उस खूबसूरत युवक को नहीं देख पा रहा था। जबकि वो देवराज चौहान से मात्र तीन कदम, दाईं तरफ दूर था और मोना चौधरी को करीब आया पाकर मुस्कुराते युवक ने अपनी दोनों बाहें फैला दी थी। उसका पूरा ध्यान मोना चौधरी पर था । देवराज चौहान के पास आने को उससे जरा भी तवज्जो नहीं दी थी । एक बार भी उसे नहीं देखा था ।
"देवा ।" बेला की परेशान फुसफुसाहट कानों में पड़ी --- "जल्दी से अपना हाथ ऊपर उठाओ। "
देवराज चौहान ने फौरन पत्थर वाला हाथ ऊपर उठा लिया ।
"अपने दाईं तरफ। तीन कदमों की दूरी पर वह युवक है । हाथ में पकड़ा पत्थर उससे टकराना चाहिए । वक्त बहुत कम है । हाथ को थोड़ा सा और दाईं तरफ घुमाओ ।"
देवराज चौहान ने ऐसा ही किया ।
"अब ठीक है ।" बेला की अधीर फुसफुसाहट कानों में पड़ी--- "जैसे पत्थर को पकड़ा है, इसे इसी तरह पांच फीट की ऊंचाई में सीध में आगे फेंक दो।"
मोना चौधरी धीमी चाल में आगे बढ़ती, देवराज चौहान के पास से निकली । युवक सामने बाहें फैलाए मौजूद था वह सिर्फ दो कदम बाकी बचे थे, उसकी बाहों में सिमटने के लिए।
अगले ही पल बेला के कहे मुताबिक, देवराज चौहान ने पत्थर फेंक दिया ।
जो कि बाहें फैलाए उस युवक के सीने पर जा लगा । देवराज चौहान के लिए तो युवक अदृश्य था । परंतु उसने चिंगारियां और धुआं उठते स्पष्ट देखा।
छाती पर वो पत्थर लगते ही, खूबसूरत युवक जोरों से चीखा । उसकी छाती में गड्ढा बन गया । वहां से चिंगारियां और धुआं उठने लगा । अगले ही पल उसमें आग लग गई। वो युवक सिर से पांव तक आग की लपटों में घिर गया और फिर देखते ही देखते आग में जलता शरीर गायब हो गया।
देवराज चौहान ये सब नहीं देख पाया । सिर्फ धुआं और चिंगारियां ही देखी थी उसने । मोना चौधरी के मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा । लगा जैसे वो नींद से जागी हो । अजीब की निगाहों से वो आस-पास देखने लगी । फिर देवराज चौहान पर निगाह जा टिकी
"क्या हुआ ?" मोना चौधरी के होठों से निकला--- "मैं-मैं यहां कैसे ?" देवराज चौहान मुस्कुराया । ।
"वो खूबसूरत युवक, जिसे देखकर मुझे जलन हुई थी, तुम उससे मिलने यहां आई थी ।" "ओह, हां । कहां गायब हो गया वो ?" मोना चौधरी को जैसे ध्यान आया। आस-पास देखा ।
"वो तुम्हारी जान लेने आया था और मुझे नजर नहीं आ रहा था। लेकिन तुम्हारी बहन, बेला के प्रयत्न ने तुम्हारी जान बच गई ।" देवराज चौहान ने गहरी सांस लेकर कहा ।
"क्या मतलब ?" मोना चौधरी के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे ।
देवराज चौहान ने सारी बात से बताई
मोना चौधरी के चेहरे पर विश्वास-अविश्वास के भाव नाचने लगे ।
"अजीब हैरत भरी बात है । मुझे विश्वास नहीं आ रहा ।" आखिरकार मोना चौधरी के होठों से निकला ।
देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगा ली । काली बिल्ली पास आकर, छलांग मारते हुए मोना चौधरी के कंधे पर आ बैठी ।
"बेला मुझसे बात क्यों नहीं करती ?" मोना चौधरी ने उसे देखा।
"इस बात का जवाब मेरे पास नहीं है।" देवराज चौहान ने गंभीर स्वर में कहा।
दोनों के बीच कई सालों तक खामोशी रही।
"यहां से आगे चलें ?" देवराज चौहान ने कहा ।
मोना चौधरी ने सहमति में सिर हिला दिया ।
******
0 Comments