सोहनलाल वैन के दरवाजे पर लटकते मोटे ताले से उलझा हुआ था।

जगदीश पास ही टहल रहा था।
एकाएक सोहनलाल सारा काम छोड़ कर सिगरेट सुलगाने में लगा तो जगदीश झल्लाकर बोला---
"तू कुछ कर तो रहा नहीं, बार-बार सिगरेट जलाने लग जाता है...।" यह तेरी तीसरी सिगरेट है।"
"तो क्या हो गया? तलब भी तो लगती है। इतना तो मेरा बाप भी नहीं बोलता था।" सोहनलाल ने कश लिया।
"एक ताला तो अभी तक तेरे से खुला नहीं...।" जगदीश झल्लाया।
"ये मोटा ताला है।"
"तो?"
"मोटे ताले देर से खुलते हैं। थोड़ा पतला होता तो कब का खोल कर रख देता।"
"कमाल है!"
"कमाल की क्या बात हो गई इसमें?"
"मलिक तो कहता था कि तू एक्सपर्ट है ताले खोलने में...।"
"तेरे को शक क्यों होने लगा?" सोहनलाल मुस्कुराया।
"एक्सपर्ट तो फटाफट अपना काम करके, निपट कर रख देते हैं।"
"तो मुझे क्या कहता है, मलिक से शिकायत कर।"
"मैं चाहता हूँ कि तू अपना काम जल्दी से...।"
तभी जगमोहन वहाँ आ पहुँचा।
"खुला क्या?" जगमोहन ने जगदीश से पूछा।
"कुछ नहीं खुला। सब पहले जैसा ही है।" जगदीश उखड़ा-सा बोला।
"किसी एक्सपर्ट को लाना था ताले खोलने के लिए...।" जगमोहन ने कहा।
"ये एक्सपर्ट ही है।"
"अच्छा! ये एक्सपर्ट है तो दूसरे कैसे होते होंगे...। एक ताला तो इससे खुला नहीं...।" जगमोहन समझ गया कि सोहनलाल जानबूझकर ताले नहीं खोल रहा। वरना ये सब खोलना तो उसके लिए मामूली काम था--- "इसका नाम सोहनलाल है ना, सुदेश ने बताया था।" जगमोहन बोला।
"हाँ।"
"क्यों उस्ताद!"जगमोहन ने सोहनलाल से कहा--- "तू एक्सपर्ट है तो फटाफट खोल दे ताले।"
मल्होत्रा भी करीब आ खड़ा हुआ था।
"भीतर वाले गनमैन का कोई इंतजाम किया?" सोहनलाल ने कहा।
"उससे तुझे क्या?"
"मैं खोलूँ और वो मुझ पर गोलियाँ चला दें, तो?"
"तू अपना काम कर।" जगदीश बोला--- "वो हम देख लेंगे।"
"वो भी भीतर है, इसलिए ये काम भी मेरा है। सबसे ज्यादा खतरा मुझे है।"
"तेरी जानकारी के लिए बता दूँ कि भीतर एक नहीं, दो हैं।" जगमोहन ने कहा।
"दो हैं?" सोहनलाल के होंठ सिकुड़े।
"और दोनों के पास गनें होंगी। तू ठीक कहता है, सबसे पहले तू ही मरेगा।"
तभी मल्होत्रा ने जगमोहन की बाँह पकड़ी और उसे खींचकर एक तरफ ले गया।
"तू उसे परेशान क्यों करता है। वैन के ताले खोलने दे उसे।"
"मैंने उसका हाथ तो नहीं रोका।"
"तेरी बातें सुनकर वो घबरा जाएगा। तू उसके पास मत जा।"
"ठीक है। नहीं जाता।" जगमोहन ने मुँह बनाया।
"उन गनमैनों से बात कर। उन्हें किसी तरह बाहर निकाल।" मल्होत्रा बोला।
"ये कोशिश धीरे-धीरे ही होगी। थोड़ा और वक्त बीतने दो। फिर बात करुँगा उससे।"
तभी अम्बा पास आता दिखा।
"मलिक कहाँ है?" मल्होत्रा ने पूछा।
"वो वैन के भीतर गनमैनों से बात कर रहा है?" अम्बा ने कहा।
"बेवकूफ!" जगमोहन तेजी से वैन की तरफ बढ़ गया---"मेरी मेहनत मिट्टी में मिला देगा।"
◆◆◆
जगमोहन ने वैन का दरवाजा खोला और भीतर जा बैठा।
ड्राइविंग सीट पर पीछे की खिड़की खोले मलिक मौजूद था। वो गनमैनों से बात कर रहा था।
"एक-एक करोड़ रुपया तुम दोनों को दूँगा। हम बुरे लोग नहीं हैं। अच्छे लोग हैं। तुम दोनों खाली हाथ वैन से बाहर आ जाओ। उसके बाद सिर्फ आध घण्टे की बात है और तुम दोनों को एक-एक करोड़ मिल जायेगा। किसी को शक भी नहीं होगा कि तुम लोगों को कोई पैसा मिला है। मेरी बात मान लेने में ही तुम्हारी भलाई है। क्योंकि हम मानने वाले तो हैं नहीं। वैन का पैसा तो हमने लेकर ही रहना है। तुम दोनों को मेरी बात मान लेनी चाहिए।"
जगमोहन ने इशारे से मलिक से कहा कि वो बातचीत समाप्त करे।
परन्तु मलिक उसकी बात मानने वाला, लगा नहीं।
"हम पैसों को सुरक्षा देने के लिए हैं।" रोमी की आवाज आई--- "हम तुम्हारी बातों में आने वाले नहीं।"
"एक-एक करोड़ मिलेगा। इतना तो तुम लोग कभी भी कमा नहीं सकोगे।" मलिक बोला।
"और बाकी के करोड़ तुम ले लो।" जवाहर की तीखी आवाज आई--- "हमें बेवकूफ समझते हो।"
"ठीक है, तुम दोनों को दो-दो करोड़ देंगे।"
"बहुत बड़ा दिल है तुम्हारा...।" जवाहर का तीखा स्वर आया बाहर।
जगमोहन ने पुनः मलिक को इशारे से चुप करने को कहा।
परन्तु मलिक तो जैसे फैसला कराकर, ताज अपने सिर पर बांध लेना चाहता था।
"तुम हमारा साथ दो। वैन से बाहर आ जाओ। हम दोस्त बन जाते हैं। तुम दोनों को फायदा होगा।"
"ये फालतू की बकवास हमसे मत करो। हम तुम्हारी बातों में आने वाले नहीं...।" जवाहर की आवाज आई।
जगमोहन ने इशारों से मलिक को बात करने से मना किया।
मलिक ने अपनी बात जारी रखी।
"इंकार का मतलब समझते हो तुम लोग?"
"अपनी खैर मनाओ तुम लोग।"
"वैन का पिछला दरवाजा कभी भी खुल सकता है। तब तुम लोग नहीं बचोगे। बेशक हममें से एक-दो तुम्हारी चलाई गोलियों से मर जायें। खून-खराबा नहीं चाहता। हममें दोस्ताना माहौल बन जाना ही ठीक है। तुम दोनों की जान बचेगी और दो-दो करोड़ मिलेंगे।"
"मेरे ख्याल से अगर हम पाँच-पाँच करोड़ भी कहें तो तुम वो भी मानोगे।" जवाहर की आवाज साथ आई।
"पाँच करोड़? ये ज्यादा है। परन्तु इस बारे में सोचा जा सकता है।" मलिक बोला।
"इस वक्त तुम दस-दस करोड़ देने के लिए भी मानोगे।"
"दस करोड़...नहीं। हराम का पैसा नहीं है ये...।"
"तुम्हारे लिए तो हराम का ही है।"
"नहीं। बीस करोड़ तुम लोगों को दे दिया तो बाकी बचेगा क्या? मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ।"
"बेटे!" रोमी की आवाज आई--- "तुम तो हमें तीस करोड़ देने पर भी अब सहमत हो जाओगे। क्योंकि फँसे पड़े हो।"
"फँसे तुम पड़े हो। हम नहीं...।" मलिक का स्वर तीखा हो गया।
"ये तो वक्त बताएगा कि कौन फँसा पड़ा है।" रोमी की आवाज आई--- "हम दोनों के पास ऑटोमेटिक गनें हैं। एक बार घोड़ा दबाया तो तुम लोगों का काम हो गया। गनों से गोलियाँ ऐसे फैल कर निकलती हैं कि कोई बच नहीं पाता।"
मलिक ने जगमोहन को देखा।
जगमोहन ने इशारे से मलिक को वैन से नीचे उतर जाने को कहा।
मलिक अनिश्चिन्त-सा बैठा रहा।
जगमोहन ने पुनः इशारा किया कि वो नीचे उतर जाए।
मलिक न चाहते हुए भी वैन से नीचे उतर गया। इधर से जगमोहन उतरा। मलिक के पास पहुँचा।
"तुम्हें उससे बात करने की क्या जरूरत थी?" जगमोहन ने झल्लाकर कहा।
"क्यों... मैं...।"
"जब तुमने मुझे आगे कर दिया, उससे बात करने के लिए तो, फिर तुमने क्यों बात की उससे?"
"क्या फर्क पड़ता है कि...।"
"बहुत फर्क पड़ता है।" जगमोहन उखड़ा--- "उन्हें मैं अपने हिसाब से दाना डाल रहा था, तुमने सब कुछ गड़बड़ कर दिया।"
"तुम्हारा मतलब कि मैंने उनसे गलत बात की?"
"हाँ। तुम उन्हें सीधा-साधा करोड़ों का लालच देने लगे। वो क्या बच्चे हैं जो तुम्हारी बातों में फँस कर, बाहर आ जाएंगे?"
"वो तो गोलियाँ चलाने के लिए तैयार बैठे हैं।" मलिक ने कहा।
"उसकी जगह तुम होते तो तुम भी ऐसा ही करते।"
"मैं नहीं करता।"
"तो क्या तुम बाहर वालों की बात मानकर, गन वैन में छोड़कर बाहर आ जाते?"
मलिक कसमसाया।
"हम कितने भी सच्चे हों, वो बाहर नहीं आएंगे।" जगमोहन ने कहा।
"उन्हें बाहर निकालना जरूरी है।"
"तुमने बात करके मेरी सारी मेहनत खराब कर दी।"
"जाओ, तुम जो करना चाहते हो, वो कर लो।" मलिक ने मुँह बनाकर कहा।
"अब बचा ही क्या है करने को?" जगमोहन ने कहा और वैन के गिर्द घूमकर स्टेयरिंग सीट की तरफ बढ़ गया।
उधर से मलिक ने दरवाजा खोला और भीतर चढ़कर सीट पर जा बैठा।
जगमोहन स्टैंड पर बैठा। पीछे की खिड़की खुली हुई थी।
"हैलो!" जगमोहन बोला--- "पहचाना मुझे, मैं हूँ...।"
बगल वाली सीट पर बैठा मलिक जगमोहन को देख रहा था।
"तुमने पहले हम से बात की थी?" जवाहर की आवाज कानों में पड़ी।
"हाँ, मैं वही हूँ। मैं तुम लोगों से कुछ कहना चाहता हूँ। अभी-अभी जिस आदमी ने तुम से बात की, वह पागल था।"
"पागल?"
"हाँ...।" जगमोहन ने मलिक पर निगाह मारी।
मलिक के होंठ भिंच गए।
"तुम्हारी पागलों की टोली है?" जवाहर का कड़वा स्वर कानों में पड़ा।
"नहीं, सिर्फ वो ही पागल है टोली में। उसका बहुत इलाज करवाया। अभी भी चल रहा है इलाज। परन्तु कोई फायदा नहीं हुआ। वो पागल का पागल ही रहा । यूँ ही बातें करता फिरता है...।"
मलिक ने दूसरी तरफ मुँह घुमा लिया।
"हमें तो वो पागल नहीं लगा।"
"वो ऐसा ही पागल है कि सामने वाले को वो पागल नहीं लगता। उसके पागलपन की सबसे बड़ी निशानी है कि वह हर किसी से करोड़ों की बात करता रहता है, जैसे कि उसने तुमसे की। कितने करोड़ देने को कह रहा था वह?"
जवाहर की आवाज नहीं आई।
"छोड़ो। मैंने उसकी बीमारी की निशानी बता दी है कि वो करोड़ों में ही बात शुरू करता है।"
"तो तुम कहना चाहते हो कि तुम पागल नहीं हो।"
"तुम्हें ऐसा लगता हूँ...।"
"एक पागल ही दूसरे को पागल और खुद को ठीक कहता है।"
"तुम्हें इस वक्त समझदारी से भरी बातें करनी चाहिए।"
"तुम करोड़ों की बात नहीं करते?"
"नहीं। मैं करोड़ों की बात नहीं करता। मैं तो सीधी-सीधी बात करता हूँ कि वैन का दरवाजा खुलेगा और इतनी गोलियाँ भीतर आएंगी कि तुम दोनों को अगली साँस लेने का भी मौका नहीं मिलेगा। इस बंद वैन में तुम्हारी जिंदगी खत्म होने वाली है।"
"तो ये तो समझदारी वाली बात कर रहे हो?"
"नहीं। समझदारी वाली बात तो अब तुम लोग करोगे। जिंदगी बचानी है तो हथियार वैन में छोड़कर ही बाहर आ जाना। मैं वादा करता हूँ कि तुम दोनों की जिंदगी सुरक्षित रहेगी। हम पैसा देकर चले जाएंगे।"
"मुझे तो तुम पागल लगते हो।"
"वो कैसे?"
"तुम्हें सोचना चाहिए कि वैन का दरवाजा खुलते ही हम गोलियों की बौछार कर देंगे। तुम में से कोई नहीं बचेगा। मैं मिलिट्री का सूबेदार था। और रोमी वायु सेना का रिटायर्ड सिपाही। तुम लोगों की किस्मत खराब थी, जो वैन पर डकैती डालने की सोची।"
"तो पक्के हो तुम इस बारे में?"
"एकदम पक्का। वैन का दरवाजा खुलने का इंतजार कर रहे हैं।"
"ठीक है। देखते हैं कि कौन जीतता है!" जगमोहन ने शांत स्वर में कहा--- "मैं तो चाहता था कि खून-खराबा ना हो। फिर भी तुम दोनों का इरादा बदले तो मुझे बता देना। वैन का दरवाजा खोलने से पहले एक बार तुमसे बात जरूर करुँगा।"
"बलराम गोरे और लाल सिंह का तुमने क्या किया?"
"किसकी बात कर रहे हो तुम?"
"वैन ड्राइवर और बैंक के कैशियर की।"
"उन्हें वैन से उतार दिया था।"
"शूट किया उन्हें?"
"नहीं। जिंदा छोड़ा। हम खून-खराबा करने में यकीन नहीं रखते। परन्तु तुम्हारे साथ खून-खराबा होना जरूरी हो गया है। क्योंकि तुम दोनों वैन के भीतर हो और पैसा भी भीतर है।"
भीतर से कोई आवाज नहीं आई।
"मैं चलूँ क्या?" जगमोहन बोला।
कोई जवाब नहीं आया।
"खाना-पीना कुछ चाहिए तो बता दो।"
"खाने में क्या है?"
"पता नहीं, मैं तो वैन के साथ यहाँ पहुँचा हूँ।" फिर जगमोहन ने मलिक से पूछा--- "खाने के लिए कुछ पड़ा है?"
"पराठें और सब्जी होगी...।"
"लेकर आओ।"
मलिक ने वैन का दरवाजा खोला और नीचे उतर गया।
"कौन था पास में?" भीतर से जवाहर ने पूछा।
"वो ही पागल...।" जगमोहन बोला।
"उससे तुम्हारा खास याराना लगता है।"
"खामखाह गले आ बंधा है... मैं उसे पसंद नहीं करता।" जगमोहन ने कहा--- "तुम्हारा परिवार है?"
"हाँ...।"
"रोमी का?"
"उसका भी है।"
"तब तो तुम्हें इस बारे में गम्भीरता से सोचना चाहिए कि वैन का दरवाजा खोलने पर क्या होगा?"
"हम तुम्हारी बात से घबराने वाले नहीं...।"
"मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों समझदारी से सोचो।"
"अगर तुम सोचते हो कि पानी या खाना देकर, हमें अपनी राह पर ले आओगे तो गलत सोचते हो।"
"तुम लोगों को पानी खाना देने का ये मतलब नहीं है। गलत मत सोचो।"
"पुलिस कभी भी यहाँ आ सकती है।" रोमी की आवाज आई।
"गलत-फहमी में मत रहना। हम जहाँ हैं, वहाँ पुलिस नहीं आ सकती।"
"ये कौन-सी जगह है?"
"नहीं बताऊँगा।"
"तुम्हारा नाम क्या है?"
"मैं जगमोहन हूँ। डकैती मास्टर देवराज चौहान का साथी।"
जवाब में आवाज नहीं आई।
"नाम सुना है देवराज चौहान का?"
"हाँ। वो कहाँ है?"
"पास ही है। लेकिन तुम लोगों से बात करने का काम मेरा है।" जगमोहन बोला।
"जो पहले हमसे बात कर रहा था, वो कौन है?"
"उसकी बात छोड़ो। वो पागल है और राह चलता है। तुम्हारा वास्ता मेरे से है। जो मैंने कहा है, उस पर सोचो और उसी पर चलना ही तुम दोनों के लिए बेहतर है।" जगमोहन ने शांत स्वर में कहा--- "नहीं तो मजबूरी में एक ही इलाज है, फायरिंग। तुम भी गोलियाँ चलाना हम भी गोलियाँ चलाएंगे। परन्तु जीत हमारी ही होगी। वैन के दरवाजे खुलने के बाद हम जिंदा ग्रेनेड भीतर फेंक देंगे। तुम दोनों के चिथड़े उड़ जाएंगे। और स्टील के बक्सों को कोई नुकसान नहीं होगा, जिनमें नोट भरे पड़े हैं। जाहिर है कि हार तुम दोनों की ही...।"
तभी दरवाज़ा खुला और हाथ में लिफाफे पकड़े मलिक भीतर आ बैठा।
"तुम्हारा खाना आ गया है।" जगमोहन बोला--- "मैं इसे छोटी खिड़की से धकेल रहा हूँ, पकड़ लेना।"
"खाने में जहर जैसा तो कुछ नहीं मिलाया?" जवाहर की आवाज आई।
"हमें पहले नहीं पता था कि तुम्हें खाना देंगे। पता होता तो हम अपने साथ जहर जरूर लाते।" जगमोहन ने व्यंग भरे स्वर में कहा और उस छोटी खिड़की को धकेलकर, खाने का सामान उन्हें देने लगा।
भीतर से वो थामने लगे।
जब ये काम हो गया तो जगमोहन वैन से नीचे उतर आया।
मलिक भी बाहर आ गया।
जगमोहन मलिक के आगे पहुँच कर बोला---
"अब तुम उनसे बात की चेष्टा मत करना।"
"क्यों?"
"ये काम तुम मेरे पे ही छोड़ दो। गनमैनों से मैं ही बात करुँगा।"
"तुम्हारा क्या ख्याल है कि गनमैन बात मानकर बाहर आ जाएंगे?"
"पता नहीं...इन हालातों को वह किस तरह सोचते हैं... क्या फैसला करते हैं।"कहकर जगमोहन वैन के पीछे वाले हिस्से की तरफ बढ़ गया। मलिक उसके साथ चल पड़ा।
वहाँ पहुँचते ही दोनों ठिठके।
सोहनलाल अभी तक बाहर लटकते मोटे ताले से जूझ रहा था। जगमोहन ने गहरी साँस लेकर मुँह फेर लिया। सोहनलाल के लिए चुटकुलों का काम था। इस ताले को खोल लेना। परन्तु वो जानबूझकर वक्त को काट रहा था।
जबकि मलिक झल्ला कर कह उठा---
"इतनी देर से तुमसे एक ताला नहीं खुल रहा? क्या इसी तरह तुम काम करते हो?"
"बकवास मत करो...।" मलिक झल्लाया--- "तुम...।"
"अपना लहजा ठीक करो।" सोहनलाल गुस्से से बोला--- "वरना ये काम मैं अभी छोड़ दूँगा। तुम्हारा पचास लाख भी तुम्हें वापस दे दूँगा। जहाँ इज्जत नहीं, मैं वहाँ काम नहीं करता।"
मलिक दाँत भींचकर रह गया।
"तुम काम करो...।" मल्होत्रा कह उठा--- "लेकिन जरा जल्दी करो।"
"जल्दी तो कर रहा हूँ...।"
"इस गति से तो तुम्हें चार दिन लग जाएंगे। बस इस मोटे ताले रगड़ा है।" सोहनलाल कह उठा।
जगमोहन सोहनलाल के पास ही नीचे जा बैठा।
"बोल।" सोहनलाल ने उसे देखा--- "तू क्या चाहता है?"
"कुछ नहीं, मैं देखूँगा कि तुम कैसे ताले खोलते हो?" जगमोहन ने कहा।
"इसे ले जाओ मेरे पास से।" सोहनलाल ने मलिक से कहा--- "ये मेरे पास रहा तो, मैं जिंदगी भर ताला नहीं खोल पाऊँगा...।"
तभी मल्होत्रा ने जगमोहन की बाँह पकड़कर, उसे उठाते हुए कहा---
"तुम इससे दूर हट जाओ।"
जगमोहन उठा और वहाँ से हट गया।
सोहनलाल ने सिगरेट सुलगाई और पुनः मोटे ताले के साथ उलझ गया।
◆◆◆