हिटलर बना तानाशाह
5 मार्च, 1933 के चुनावों के बाद नाज़ियों ने संपूर्ण जर्मनी में योजनाबद्ध तरीके से राज्य सरकारों को अधिकार में लेना शुरू कर दिया और इस तरह सदियों पुरानी स्थानीय राजनीतिक स्वतंत्रता की परंपरा का अंत हो गया। सशस्त्र एस.ए. और एस.एस. ठगों ने आपात-स्थिति के आदेश की आड़ में सरकारी कार्यालयों पर धावा बोलकर वैध पदाधिकारियों को बाहर निकाल दिया और उनकी जगह नाज़ी जर्मन राज्य आयुक्तों को तैनात कर दिया।
हजारों की तादाद में राजनीतिक शत्रुओं को गिरफ्तार करके जल्दबाजी में निर्मित बाड़ों में बंद कर दिया गया। पुरानी सैनिक बैरकों तथा परित्यक्त कारखानों को जेल की तरह इस्तेमाल किया गया। जेल में डाल दिए जाने के बाद कैदियों से सैनिकों जैसी कवायद कराई गई और उन्हें कठोर अनुशासन में रखा गया। उन्हें अकसर पीटा जाता और कभी-कभी इतनी यंत्रणा दी जाती कि कई कैदियों की मौत हो गई। यह शुरुआत थी नाज़ियों के नजरबंदी शिविरों की।
उस समय, शुरू-शुरू में, एस.ए. तथा प्रतिद्वंद्वी एस.एस. के नियंत्रण में बनाए गए नजरबंदी-शिविरों की व्यवस्था बड़ी ढीली-ढाली थी। बहुत से शिविर तारों से बने घेरों से ज्यादा कुछ नहीं थे, जिन्हें स्थानीय तथा एस.ए. नेताओं द्वारा स्थापित किया गया था और ‘जंगली’ बंदी शिविर का नाम दिया गया था।
एडोल्फ हिटलर को लगने लगा था कि उसका विधिपूर्वक तानाशाह बनने का लक्ष्य अब ज्यादा दूर नहीं है। 15 मार्च, 1933 को मंत्रिमंडल की एक बैठक आयोजित की गई, जिसके दौरान हिटलर तथा गोरिंग ने यह चर्चा की कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का जो कुछ शेष रह गया है, उसे किस तरह रोका जाए, ताकि राइचस्टैग से वह कानून पास कराया जा सके, जिसके अंतर्गत उसे मनचाहे अधिकार मिल सकें। इस कानून ने राइचस्टैग के संवैधानिक कार्य हिटलर को सौंप दिए, जिनमें कानून बनाने की शक्ति, बजट नियंत्रण तथा विदेशी सरकारों के साथ संधियों को मंजूरी देना भी शामिल था।
राइचस्टैग के अग्निकांड के बाद 28 फरवरी को हिंडेनबर्ग द्वारा हस्ताक्षरित आपातकालीन आदेश ने उनके लिए यह काम आसान कर दिया, क्योंकि अब वे लोग निर्वाचित गैर-नाज़ी प्रतिनिधियों को सिर्फ गिरफ्तार करके उनके काम में हस्तक्षेप कर सकते थे।
हिटलर ने जैसे ही जर्मनी में लोकतंत्र समाप्त करने की योजना बनाई, प्रचार मंत्री जोसेफ गॉबेल्स ने नव-निर्वाचित जर्मन लोकसभा (राइचस्टैग) के औपचारिक उद्घाटन में एक तड़क-भड़कवाला जन-संपर्क प्रदर्शन भी जोड़ दिया।
21 मार्च को फ्रेडरिक महान् के समाधि-स्थल पॉट्सडैम स्थित गैरीसन चर्च में बड़ा समारोह हुआ। इसकी योजना हिटलर के बारे में जनसाधारण की चिंता और उसके लुटेरों जैसे नए शासन से जुड़ी भय की भावना को दूर करने के लिए बनाई गई थी।
इस समारोह में राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग, विदेशी राजनयिक, जनरल स्टाफ और सम्राट् के समय के पुराने गार्ड भी मौजूद थे। उन्होंने अपनी खूबसूरत पोशाकें पहनी हुई थीं एवं पदक लगाए हुए थे और वह देख रहे थे अत्यंत आदरणीय एडोल्फ हिटलर को भाषण देते हुए, जो हिंडेनबर्ग को सम्मान अर्पित करते हुए प्राचीन प्रशियाई सैन्य परंपराओं और नए नाज़ी साम्राज्य का जश्न मना रहा था। उसने अपने भाषण में कहा कि इस अवसर के प्रतीक-स्वरूप साम्राज्य के ध्वजों में जल्दी ही स्वस्तिक भी जोड़ दिया जाएगा।
अपना भाषण समाप्त करते हुए हिटलर चलकर हिंडेनबर्ग के पास पहुँचा और उस वृद्ध पुरुष का हाथ पकड़कर उसको सम्मान देते हुए अपना सिर झुकाया। इस दृश्य की फिल्म बनी और दुनिया भर के प्रेस फोटोग्राफरों ने इसकी तसवीर खींची। हिटलर और गॉबेल्स दुनिया को अपनी यही छवि पेश करना चाहते थे, जबकि वास्तव में उनकी योजना हिंडेनबर्ग और निर्वाचित राइचस्टैग को एक तरफ पटक देने की थी।
उसी दिन हिंडेनबर्ग ने हिटलर द्वारा उसके सामने पेश किए गए दो आदेशों पर दस्तखत कर दिए। पहले आदेश के अंतर्गत उन सभी नाज़ियों को पूरी माफी दे दी गई, जो अभी भी जेल में थे। जेलों के दरवाजे खोल दिए गए और सभी नाज़ी लुटेरे एवं हत्यारे बाहर आ गए।
दूसरा आदेश, जिस पर उसके दस्तखत लिये गए, इस बारे में था कि जिस किसी पर भी सरकार और नाज़ी पार्टी को द्वेषपूर्ण आलोचना करने का संदेह होगा, उसे गिरफ्तार किया जा सकता है।
एक तीसरा फरमान जारी करके, जिस पर केवल हिटलर एवं पपेन ने दस्तखत किए थे, राजनीतिक अपराधियों पर मुकदमा चलाने के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने की आज्ञा दी गई। इन अदालतों की काररवाई फौजी अदालतों जैसी होती थी, जिनमें न तो जूरी थी और न ही आमतौर पर बचाव के लिए कोई वकील।
23 मार्च को नव-निर्वाचित राइचस्टैग की बैठक का आयोजन बर्लिन में क्रॉल ओपेरा हाउस में किया गया, जिसमें हिटलर का समर्थकारी अधिनियम पारित करने पर विचार किया जाना था। औपचारिक तौर पर इसे ‘जन-साधारण एवं जर्मन साम्राज्य कष्ट-निवारण कानून’ का नाम दिया गया। इसके पीछे विचार यह था कि अगर यह कानून पास हो गया तो यह जर्मनी में लोकतंत्र का अस्तित्व मिटा देगा और एडोल्फ हिटलर की कानूनी तानाशाही स्थापित हो जाएगी।
भूरी पोशाकवाले नाज़ी तूफानी दस्तों के सदस्य अपनी ताकत दिखाने और धमकी भरे अंदाज में उस पुरानी आकर्षक बिल्डिंग में हर जगह इकट्ठा हो गए। वे बाहर खड़े हुए थे, ड्योढ़ी में खड़े थे और गलियारे में भी कतार बनाकर खड़े हुए थे तथा हर किसी पर अनिष्टसूचक दृष्टि डाल रहे थे, ताकि कोई हिटलर की इच्छा के आड़े आने का साहस न करे।
वोट से पहले हिटलर ने एक भाषण दिया, जिसमें उसने संयम बरतने का वचन दिया।
‘‘सरकार इन शक्तियों का प्रयोग वहाँ तक ही करेगी, जहाँ तक अत्यावश्यक उपायों को लागू करने के लिए अनिवार्य होगा। ऐसे मामलों की संख्या वास्तव में बहुत कम है, जिनमें ऐसे कानून का सहारा लेने की आंतरिक आवश्यकता प्रतीत हो।’’ हिटलर ने राइचस्टैग को बताया।
उसने बेरोजगारी समाप्त करने और फ्रांस, ब्रिटेन तथा सोवियत संघ के साथ शांति को बढ़ावा देने का भी वचन दिया। लेकिन वह सब करने के लिए हिटलर ने कहा, उसे सबसे पहले समर्थकारी अधिनियम की जरूरत है। इस प्रयोजन हेतु दो-तिहाई बहुमत जरूरी था, क्योंकि वह कानून वास्तव में संविधान में परिवर्तन करने वाला था। उसे पास कराने के लिए हिटलर को 37 गैर-नाज़ी वोट चाहिए थे। उसे वे वोट कैथोलिक सेंटर पार्टी से मिल गए, जब उसने यह झूठा वायदा किया कि डिक्री द्वारा छीने गए मूलभूत अधिकारों में से कुछ अधिकार बहाल कर दिए जाएँगे।
इस बीच नाज़ी तूफानी दस्तों ने बाहर यह राग अलापना जारी रखा—‘‘पूरी शक्तियाँ—नहीं तो? हमें चाहिए बिल—नहीं तो देखो खेल, आग और हत्या का!’’
ताकत के इस भारी दिखावे के बीच एक व्यक्ति उठा। सोशल डेमोक्रेट्स का नेता ऑटो वैल्स उठा और उसने धीरे से हिटलर से कहा—
‘‘हम जर्मन सोशल डेमोक्रेट्स इस ऐतिहासिक घड़ी में स्वयं को दृढ़तापूर्वक मानवता और न्याय, स्वतंत्रता एवं समाजवाद के सिद्धांतों के प्रति समर्पित करने की कसम खाते हैं। कोई भी समर्थकारी कानून तुम्हें इतनी शक्ति नहीं दे सकता कि तुम उन धारणाओं, मान्यताओं को मिटा सको, जो शाश्वत एवं अविनाशी हैं।’’
हिटलर आगबबूला हो गया और उसने पलटकर जवाब दिया, ‘‘तुम्हारी अब कोई जरूरत नहीं है। जर्मनी का सितारा चमकेगा और तुम्हारा डूब जाएगा। तुम्हारी मौत का घंटा बज चुका है।’’
मतदान हुआ और 441 मत पक्ष में पड़े तथा 84 विरोध में। नाज़ी सदस्यों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वे खड़े होकर तालियाँ बजाने लगे, पैर पटकने व चीखने-चिल्लाने लगे और फिर उन्होंने नाज़ी वंदना ‘हॉर्स्ट वैसल’ का गीत गाना शुरू कर दिया।
लोकतंत्र का अंत हो गया। उन्होंने विधिपूर्वक जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य को धराशायी कर दिया। हिटलर ने जैसा अपनी घोषणाओं में कहा था कि राइच्स्टैग सिर्फ एक बजनेवाला भोंपू रह जाएगा, ठीक वही हुआ।
मजे की बात है कि नाज़ी पार्टी के पास सदस्यता ग्रहण करने की अर्जियों का ढेर लग गया। देर से आनेवालों को पुराने समर्थकों ने नाक चढ़ाकर ‘मार्च वायलेट’ अर्थात् रंग-बदलू कहा। मई में नाज़ी पार्टी ने सदस्य बनाना बंद कर दिया। जो लोग रह गए थे, उन्होंने एस.ए. तथा एस.एस. में भरती होेने के लिए आवेदन किया क्योंकि वे अभी तक अर्जियाँ ले रहे थे। वर्ष 1934 के आरंभ में हेनरिक हिमलर ने एस.एस. से उन ‘मार्च वायलेटों’ में से 50,000 को बाहर कर दिया।
नाज़ी गन्नेक्शालतुंग ने स्वस्तिक तथा एडोल्फ हिटलर के निरंकुश नेतृत्व के अंतर्गत जीवन के सभी पहलुओं का विशाल समन्वय शुरू कर दिया।
हिटलर के शासनकाल में व्यक्ति नहीं, राज्य सर्वोपरि था।
जन्म लेने के समय से ही व्यक्ति का कर्तव्य हो जाता कि वह राज्य की सेवा करे और फ्यूहरर की आज्ञा माने। इनकार करनेवालों के लिए कोई जगह नहीं थी। उन्हें ठिकाने लगा दिया जाता।
बहुत लोग मान गए। अधिकारी वर्ग, उद्योगपति और यहाँ तक कि विश्व-विख्यात नाटककार गर्हार्ट हॉयमैन समेत अनेक प्रबुद्ध और साहित्यजीवी भी खुलकर हिटलर का समर्थन करने लगे।
बहुत से लोगों को यह स्थिति मंजूर नहीं थी, अत: उन्होंने देश छोड़ दिया। 2,000 से अधिक लेखकों, वैज्ञानिकों एवं कला विशेषज्ञों समेत अनेक प्रतिभाशाली लोग जर्मनी से बाहर चले गए और उन्होंने दूसरे देशों, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका का गौरव बढ़ाया। उनमें शामिल थे लेखक टॉमस मैन, निर्देशक फ्रिट्ज लैंग, अभिनेत्री मर्लिन डाइट्रिच, वास्तुकर वाल्टर ग्रोपियस, संगीतज्ञ ओटो क्लेंफरर, कुर्ल वेइल, रिचर्ड टॉबर, मनोविज्ञानी सिग्मंड फ्राइड और वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटाइन, जो उस समय कैलीफोर्निया में थे, जब हिटलर को सत्ता मिली। फिर वह कभी जर्मनी नहीं लौटे।
जर्मनी में निरंतर रैलियाँ निकल रही थीं, परेडों व मार्चों का आयोजन किया जा रहा था, सभाएँ हो रही थीं और साथ ही गॉबेल्स का प्रचार चल रहा था तथा हर कहीं स्वस्तिक विद्यमान था। जो लोग रह गए थे, उनके लिए वायुमंडल में मिला-जुला भय और आशावाद था।
अधिनायक के रूप में पहली बार एडोल्फ हिटलर ने उस प्रेरक बल की ओर अपना ध्यान दिया, जिसने उसे पहले-पहल राजनीति में धकेला था और यहूदियों से नफरत करना सिखाया था। इसकी शुरुआत 1 अप्रैल, 1933 को एक मामूली बहिष्कार से हुई और बाद में उसका अंत मानव जाति के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी में हुआ।
नाज़ियों द्वारा यहूदियों की दुकानों का बहिष्कार
समर्थकारी अधिनियम पारित हो जाने से हिटलर जब जर्मनी का तानाशाह बन गया, उसके एक सप्ताह बाद प्रचार मंत्री जोसेफ गॉबेल्स के निर्देशन में यहूदियों की दुकानों एवं विभागीय स्टोरों का राष्ट्रीय बहिष्कार अभियान चलाया गया।
यह बहिष्कार ब्रिटेन और अमरीका के अखबारों में हिटलर के नए शासन के बारे में छपी स्पष्टवादी खबरों के बदले प्रतिक्रिया के रूप में किया गया था। नाज़ियों का मानना था कि अधिकतर पत्रकार या तो यहूदी थे या यहूदियों से सहानुभूति रखते थे और यही कारण था कि उन्होंने खराब प्रचार को ‘अंतरराष्ट्रीय यहूदी जाति’ द्वारा फैलाए गए ‘नृशंसता प्रचार’ का नाम दिया।

बहिष्कार शनिवार, 1 अप्रैल, 1933 को सुबह 10 बजे शुरू हुआ और सिर्फ एक दिन तक चला। भूरी कमीजोंवाले एस.ए. तूफानी सैनिक यहूदियों की दुकानों, विभागीय स्टोरों, व्यावसायिक कार्यालयों तथा व्यवसाय के स्थानों के आगे रास्ता रोककर खड़े हो गए। उनके पास पोस्टर थे, जिनपर लिखा हुआ था—‘जर्मनी वासियो, अपने आपको यहूदी जाति के भद्दे प्रचार से बचाएँ, खरीदारी केवल जर्मन दुकानों से करें।’
बहुत से जर्मन लोगों ने उनको अनदेखा कर दिया। उनकी अधिक दिलचस्पी या तो सौदेबाजी में थी या शनिवार की खरीदारी टालने में और चूँकि यह शनिवार था, यहूदियों के विश्राम का दिन, इसलिए आस-पास की यहूदियों की अधिकतर छोटी-छोटी दुकानें पहले ही बंद थीं।
एस.ए. क्रिया-कलापों के अलावा प्रचार मंत्री गॉबेल्स बर्लिन, लस्टग्रार्टन में जमा कई हजार लोगों के सामने हाजिर हुआ और उसने ‘दुनिया भर की यहूदी जाति के अत्याचारों के खिलाफ’ कड़वी बातें कहीं। उसका भाषण सभी जर्मन रेडियो स्टेशनों पर प्रसारित किया गया। गॉबेल्स ने दावे के साथ कहा कि यदि जर्मनी के यहूदियों ने दुनिया भर में अपने बिरादरी भाइयों (यहूदियों) को नाज़ी-विरोधी प्रचार करने से नहीं रोका तो नाज़ियों को मजबूर होकर जर्मनी के यहूदियों को सबक सिखाना पड़ेगा।
छोटा कद (पाँच फीट) और लंबी जुबान रखनेवाला गॉबेल्स नाज़ी पदानुक्रम में सबसे प्रभावशाली सामी-विरोधी व्यक्ति था। यहूदियों के लगातार उत्पीड़न और अंतत: उनके विनाश के लिए हिटलर के बाद वही जिम्मेदार था। वह कमाल का प्रचारक था। उसकी अपनी शक्ल-सूरत यहूदियों से मिलती थी, जिसके कारण लड़कपन में उसे कभी-कभी परेशान किया जाता था, चिढ़ाया जाता था; लेकिन अब वह जर्मनी के लोगों को रेडियो पर, सिनेमाघरों और समाचार-पत्रों में, यहूदी-विरोधी प्रचार एवं झूठी आलोचना से लगातार भड़काता रहता था।
यहूदियों के बारे में नाज़ी जो कुछ भी मिथ्या प्रचार करते थे, उसके विपरीत अधिकतर यहूदी वास्तव में स्वभाव से काफी उदार थे और जहाँ तक राष्ट्रीयता का संबंध है, वे स्वयं को जर्मन मानते थे और केवल धर्म से यहूदी थे। वे सदियों से जर्मनी में रह रहे थे, लेकिन उनकी जनसंख्या कुल आबादी का केवल 1 प्रतिशत थी। हिटलर से पूर्व जर्मनी के बड़े शहरों में आधे से अधिक यहूदियों ने गैर-यहूदी जर्मन परिवारों में विवाह किया था।
राजनीतिक रूप से देखें तो हिटलर-पूर्व जर्मनी में यहूदियों को हर जगह, हर गतिविधि में शामिल पाया जा सकता था। कुछ वामपंथियों की तरह क्रांतिकारी विचारों के थे, जिन्होंने म्यूनिख या बर्लिन में सड़कों पर रूसी ढंग की क्रांति का स्वागत किया होता। अन्य यहूदी प्रथम विश्व युद्ध पूर्व युग के सम्राट् विल्हैम तथा प्राचीन जर्मन राजतंत्र के कट्टर समर्थक थे। कुछ रूढ़िवादियों ने नाज़ियों का भी समर्थन किया होता, अगर उन्होंने सामीवाद-विरोध का नारा बुलंद न किया होता, जिसकी हिटलर ने खुलेआम घोषणा की थी। अधिकांश यहूदी राजनीतिक दृष्टि से नरम थे। वे अपने लिए और अपने परिवारों के लिए वही चाहते थे, जो हर कोई चाहता है—रहने के लिए अच्छी जगह, अच्छी नौकरी, बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा की व्यवस्था इत्यादि।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लाखों जर्मन यहूदियों ने अपनी पितृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध में वीरता का परिचय दिया था और सेना अधिकारियों के रूप में अपना कर्तव्य निभाते हुए अनेक पदक प्राप्त किए थे। युद्ध के दौरान हिटलर जिन सैनिक अधिकारियों के आदेशाधीन काम कर रहा था, उनमें से एक लेफ्टिनेंट यहूदी नस्ल का था और उसने ही युवा कॉरपोरल हिटलर की सिफारिश प्रथम श्रेणी के आयरन क्रॉस* के लिए की थी, जो किसी पैदल सिपाही को बिरले ही दिया जाता था। हिटलर ने अपने आखिरी दिन तक वह लौह पदक एवं पार्टी की सदस्यता की स्वर्ण-शलाका (गोल्ड पिन) पहने रखी; शेष सभी नाज़ी अलंकरण तथा चीजें उसने दूसरों को बाँट दी थीं।
नए तानाशाह एडोल्फ हिटलर के लिए यहूदियों की कितनी भी राष्ट्रभक्ति या देश-प्रेम की भावना का इस सच्चाई के आगे कोई अर्थ नहीं था कि वे यहूदी हैं, और इस कारण से हिटलर की दृष्टि में वे जर्मन वॉक (जातीय समुदाय) के ‘चिरंतन शत्रु’ थे।
अप्रैल 1933 में यहूदियों की दुकानों का बहिष्कार किए जाने के समय से ही यहूदियों का पतनशील चक्र अर्थात् बुरा समय शुरू हो गया था, जो उन्हें अंतत: ऑश्विटज में गैस-चेंबर तक ले गया। बहिष्कार के बाद ऐसे-ऐसे कानून और फरमान जारी किए जाने लगे, जिनके जरिए यहूदियों के एक-एक करके लगभग सारे अधिकार छीन लिये गए। हिटलर के बारह वर्ष के शासनकाल में सिर्फ यहूदियों को लक्ष्य बनाकर 400 से अधिक कानून और फरमान जारी किए गए।
बहिष्कार के छह दिन बाद ‘सिविल सेवा बहाली कानून’ पेश किया गया, जिसके तहत सिविल सेवा पद पाने के लिए ‘आर्यवाद’, अर्थात् आर्य वंश का होना आवश्यक कर दिया गया। ऐसे पदों पर कार्यरत सभी यहूदियों को बरखास्त कर दिया गया था। उन्हें समय से पहले अवकाश-ग्रहण करने के लिए बाध्य कर दिया गया। 22 अप्रैल को यहूदियों के राज्य-संचालित बीमा संस्थाओं में पेटेंट वकील या डॉक्टर की हैसियत से काम करने से रोक दिया गया। जर्मन स्कूलों में भीड़-भाड़ के विरुद्ध 25 अप्रैल को जारी किए गए एक कानून के तहत पब्लिक स्कूलों में यहूदी बच्चों को भरती करने की संख्या सीमित कर दी गई। 2 जून को दंत-चिकित्सकों और दंत तकनीशियनों को राज्य-संचालित बीमा संस्थाओं में काम करने से रोक दिया गया। 6 मई को सिविल सेवा कानून में संशोधन द्वारा यूनिवर्सिटी के अवैतनिक प्रोफेसरों, प्राध्यापकों और नोटरीज को बाहर रखने के उद्देश्य से बचाव के रास्ते बंद कर दिए गए। 28 सितंबर को सभी गैर-आर्यों और उनके पतियों एवं पत्नियों को सरकारी नौकरी से वंचित रखने का कानून जारी कर दिया गया। 29 सितंबर को यहूदियों को सभी सांस्कृतिक एवं मनोरंजन संबंधी क्रिया-कलापों साहित्य, कला, फिल्म एवं थिएटर आदि में भाग लेने से मना कर दिया गया। अक्तूबर के आरंभ में यहूदियों के पत्रकार बनने पर रोक लगा दी गई और सभी जर्मन अखबार या तो बंद कर दिए गए या उन्हें नाज़ी नियंत्रण के अधीन कर दिया गया।
बेहतर समय में जर्मनी में रह रहे यहूदी समुदाय की सर्जनात्मक प्रतिभा ने देश को वैज्ञानिक उपलब्धि, शैक्षिक विद्वत्ता एवं कलात्मक दृष्टि की अभूतपूर्व ऊँचाइयों तक पहुँचाने में भरसक योगदान किया था। बर्लिन, फ्रैंकफर्ट तथा अन्य नगरों में यहूदी समुदाय किसी समय शिक्षा एवं कला के क्षेत्र में खूब फल-फूल रहे थे; लेकिन हिटलर के शासन में अंतहीन नियमों, विनियमों, प्रतिबंधों, निषेधों एवं तत्काल थोपी गई वर्जनाओं के जरिए उनके उत्साह को ठंडा कर दिया गया। जल्दी ही ऐसा समय भी आ गया, जब किसी यहूदी को किसी उद्यान की बेंच पर गैर-यहूदी के साथ बैठना भी वर्जित हो गया, विवाह की बात तो सोचना भी गुनाह था।
हिटलर ने सन् 1933 में जब सत्ता सँभाली, उसके कुछ दिनों के अंदर ही ऐसा लगने लगा कि जर्मनी में पुलिस राज्य स्थापित हो रहा है, जहाँ हर किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता हमेशा के लिए छिन गई है। यहूदी और जर्मन एक समान ऐसे माहौल में रह रहे थे, जो अब तक का सबसे अधिक प्रचंड एवं दमनकारी साम्राज्य बनने वाला था। सैद्धांतिक आतंक प्रणाली एक नया संगठन था, जिसका नाम आज भी हिटलर के जर्मनी की याद आते ही किसी के भी दिल में सिहरन पैदा कर देता है। उस संगठन का नाम था—जेस्टेपो।
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