हसीनाबाद, सन 1975।
जमुना ने रोज की भांति आज भी रात के दस बजते-बजते डाक-बंगले पर हाजिरी लगा दी। उसने बग्घी को बाहर ही खड़ा किया और टिफिन लिए हुए कंपाउंड में दाखिल हो गया फिर जल्दी-जल्दी फासले तय करते हुए डाक बंगले के हॉल में पहुँचा, जहाँ से एक जीना दूसरी मंजिल को जाता था। हॉल में सन्नाटा था। सर्दी की उस खामोश रात में वहाँ कोई कर्मचारी नहीं नजर आ रहा था, सिवाय एक काउंटर पर मौजूद उस अधेड़ आदमी के, जो बदन से शाल लपेटे हुए लालटेन की रोशनी में कुछ लिख रहा था। पहले जमुना का इरादा सीधे दूसरी मंजिल पर जाने का हुआ लेकिन फिर कुछ सोचकर वह उस आदमी की ओर बढ़ गया। जब वह आदमी के सामने पहुँचकर थमा तो आदमी ने अपनी लेखनी रोक कर सवाल करती निगाहों से उसे घूरा।
“एक जानकारी देंगे मिश्रा जी?” उसने होठों पर खुशामदी मुस्कान सजाते हुए पूछा।
“पूछ तो ऐसे रहे हो, जैसे हम मना कर देंगे तो मान ही जाओगे और दोबारा नहीं पूछेंगे।”
“लिहाज भी तो कोई चीज होती है न साहब जी।” जमुना का लहजा खुशामद की चाशनी में और गहरा डूब गया।
“अब इतने फॉर्मल न बनो। आराम से बैठ जाओ और पूछो, जो पूछना चाहते हो।”
जमुना खींसे निपोरते हुए एक कुर्सी खींचकर काउंटर के करीब ही काबिज हो
गया और जब मिश्रा जी ने अपना कलम रजिस्टर पर छोड़कर उसे मुकम्मल तवज्जो दे दी तो उसने आँखें गोल करते हुए पूछा- “एक बात बताओ मिश्रा जी, जो साहब महीने भर से ऊपर टिके हुए हैं, कल रात वो कितने बजे लौटे थे?”
“कौन, पशुपति जी?”
“जी हाँ, उन्हीं की बात कर रहा हूँ।”
“पता नहीं कब लौटे थे। तुम्हारे जाने के दस मिनट बाद ही तो नीचे आये थे। शायद कहीं जाने की तैयारी में थे। मैंने पूछा तो बोले कि कबाइलियों की पूर्णमासी वाली रस्म देखने की बड़ी इच्छा हो रही है। मैंने उन्हें ये कहकर रोकने की कोशिश की कि आज पूरे चाँद की रात है। लोग मानते हैं कि इस रात नरभेड़िया निकलता है, लिहाजा बाहर जाना सुरक्षित नहीं है तो हँसकर कहने लगे कि वे इन सब बातों में यकीन नहीं रखते हैं। जब उन्होंने बताया कि लौटने में काफी देर हो जायेगी तो मैंने मेन दरवाजे की चाबी उन्हें दे दी और कहा कि दरवाजा बाहर से बंद करके जाएँ और चाबी अपने पास ही रखें क्योंकि उतनी रात को कोई अंदर से बाहर या बाहर से अंदर जाने-आने से तो रहा। फिर रात को वे कब लौटे, मुझे नहीं पता। आने के बाद उन्होंने चाबी इसी काउंटर की दराज में रख दी थी, जो सुबह मैंने बरामद कर ली।”
“कल रात जंगल की ओर से आपने चीखें सुनी थीं?” जमुना ने बेहद धीमे स्वर में पूछा, मानो किसी तीसरे को अपने सवाल की भनक न लगने देना चाहता हो।
“क्या बात करते हो जमुना।” मिश्रा हँसा- “दिन भर की कमर तोड़ मेहनत के बाद जब रात के ग्यारह बजे रजाई में दुबकता हूँ तो आँख सुबह सात बजे ही खुलती है, उससे पहले नहीं।”
“हाँ, ये भी खूब कही आपने।” जमुना ने एक बार फिर जबरदस्ती खींसे निपोर दी। इस बात का वह पूरा ख्याल रख रहा था कि सवाल पूछने के पीछे निहित उसके इरादों को मिश्रा भांपने न पाए- “मैं तो इसलिए पूछ रहा था क्योंकि आज दिन भर बस्ती में ये चर्चा रही कि कबाइलियों के इलाके में कोई जंगली जानवर घुस गया था। जान का बड़ा भारी नुकसान किया उसने। केवल वही कबाइली बच पाए, जो कबीला छोड़कर भाग गए थे। कुछ घायल कबाइली बस्ती में भी आये थे इलाज के लिए।”
“तो इसमें हैरानी क्या है भाई। कोई पागल शेर, चीता या तेंदुआ घुस गया होगा कबीले में। घने जंगल में बसे भी तो हैं वे खूसट जंगली।”
“हम्म। ये भी ठीक कहा आपने। अच्छा ये पशुपति साहब अभी कितने दिन टिकेंगे यहाँ?”
“जो एडवांस रकम उन्होंने दी है, उसके मुताबिक़ तो अभी एक महीना और रहेंगे।”
‘एक महीना।’ जमुना मन ही मन काँप गया-‘यानी कि ये दरिंदा कम से कम एक पूर्णमासी और यहाँ गुजारेगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि कबीले के बाद अब बस्ती की बारी है?’ ये ख्याल आते ही जमुना की रीढ़ की हड्डी सनसना उठी।
“क्या सोचने लगे जमुना?”
“आं...कुछ नहीं।” मिश्रा की आवाज़ ने उसकी तंद्रा भंग की- “मैं साहब को खाना पहुँचाकर आता हूँ क्योंकि घर भी जाना है मुझे। आज ससुरी ठण्ड भी बेजोड़ पड़ रही है।”
जमुना जीना चढ़कर दूसरी मंजिल पर पहुँचा और फिर पशुपति के कमरे में दाखिल हुआ, जहाँ लालटेन की रोशनी तो फ़ैली हुई थी लेकिन पशुपति कहीं नहीं था। कमरे का वह दूसरा दरवाजा भी खुला हुआ था, जिसका रुख बरामदे की ओर था। जमुना बरामदे में पहुँचा लेकिन पशुपति वहाँ भी नहीं था।
‘ तो क्या आज फिर शिकार करने निकला है?’
मन ही मन सोचते हुए वह कमरे में आ गया और वहाँ खड़ा-खड़ा इधर-उधर देख ही रहा था कि सहसा उसकी निगाह स्टडी टेबल पर गयी, जहाँ पेपरवेट के नीचे एक कागज दबाया हुआ था। वह फ़ौरन टेबल तक पहुँचा, कागज़ को खोला और पढ़ा। लिखा था:
‘मेरा इंतजार मत कीजिएगा। खाना रख चले जाइएगा। मैं आकर खा लूँगा।’
-पशुपति अरोड़ा
जमुना ने टिफिन मेज पर रख दिया और मन ही मन ‘कहाँ गया होगा-कहाँ गया होगा?’ दोहराने लगा। सहसा उसके जेहन में बिजली कौंधी- ‘आज तो शुक्रवार है और हर शुक्रवार जंगल में परछाईं घूमती है। महल दिखाई देता है।’
मन में उक्त संभावना के जागने भर की देरी थी कि जमुना को जागती आँखों से देखा हुआ वह सपना याद आ गया, जब उसके ‘बस्ती में क्यों आये हो?’ इस सवाल पर पशुपति ने सर्द लहजे में जवाब दिया था:
‘महल की तलाश में आया हूँ लेकिन लोगों को ये बताने के लिए अब क्या तू जिंदा रहेगा?’
जमुना के मन में एक नये सवाल ने बड़ी तेजी से करवट ली:
‘इसने कल कबीले वालों को क़त्ल किया और आज महल की तलाश में निकला है। आखिर है कौन ये और चाहता क्या है? मकसद क्या है इसका?’
ख्यालों में गुम जमुना का हाथ जब मेज पर पड़ी एक किताब से टकराया तो वह तंद्रा से बाहर आ गया। उसने किताब पर नजर डाली। ये वही किताब थी, जिसे अक्सर पशुपति पढ़ता रहता था। वह किताब पर लिखे शीर्षक ‘रूपांतरण’ को घूरते हुए कुछ देर तक विचार करता रहा तत्पश्चात उसे कुछ याद आया। उसने किताब का पेज नम्बर फिफ्टी फाइव खोला और वहाँ लिखे शब्दों पर नजर फिराने लगा। और फिर कोई तसल्ली हो जाने के बाद उसने किताब को फिर से मेज पर रख दिया।
कुक्कू के कहे हुए के मुताबिक़ पशुपति के कमरे की तलाशी लेने का ये सबसे
अच्छा मौक़ा था लिहाजा जमुना जल्दी-जल्दी उस काम में जुट गया। उसने हर उस संभावित जगह को टटोला, जहाँ कुछ होने की संभावना हो सकती थी, लेकिन उसे ऐसा कुछ नहीं हासिल हुआ, जिससे पशुपति के छिपे इरादों की भनक लग पाती, सिवाय इसके कि एक दिन जो तस्वीर उसने पशुपति को दीवार पर टाँगते हुए देखी थी और जिसमें दिखी नरभेड़िया की झलक सहसा भगवान् नृसिंह में तब्दील हो गयी थी, वह तस्वीर वाकई नरभेड़िये की ही थी। हैरान करने वाली बात ये थी कि नरभेड़िये की शक्ल काफी हद तक पशुपति से मिल रही थी। अगर पशुपति की तस्वीर में उसके होठों के किनारे से दो नुकीले दांत निकाल दिए जाते, भेड़ियों जैसी मूँछें बना दी जातीं, कान लम्बे और खड़े कर दिए जाते और आँखें भेड़िये की आँखों में तब्दील करके उनमें वहशत भर दी जाती तो वह दीवार पर टंगी नरभेड़िये की ही तस्वीर लगने लगती। अब जमुना के पास इस पर यकीन न करने की कोई वजह नहीं थी कि पशुपति ही नरभेड़िया था। उसने माथे पर चुहचुहा रहे पसीने को पोंछा और उम्मीद के खिलाफ़ उम्मीद करते हुए एक बार बाथरूम में झांका, लेकिन वहाँ ऐसा कोई भी संकेत नहीं था, जो कबीले में हुए रक्तपात में पशुपति के शरीक होने की पुष्टि करता।
‘अगर यहाँ उस शैतान की औलाद ने अपने खिलाफ़ कोई सुराग छोड़ा होता तो अपने पीछे कमरे को खुला छोड़कर मुझे ये मौक़ा नहीं मुहैया नहीं कराता कि मैं कमरे की तलाशी ले सकूँ। हद से ज्यादा शातिर है ये।’
मन ही मन सोचते हुए जमुना बाहर निकल गया।
N
राजनगर, वर्तमान ।
साधना को डाक्यूमेंट्स मेल करने के बाद जब फाह्याज़ ने निगाहें सामने उठाईं तो पाया कि अपने कमरे के दरवाजे पर खड़ा हसन उसे ही ताड़ रहा था।
“तुम सोये नहीं अभी तक?” बेटे पर सवालिया निगाह डालते हुए उसने पूछा।
मैंने डिनर के टाइम आपको बताया न कि आई हैव सक्सीडेड इन माय मिशन।” हसन ने चहकते हुए कहा।
“तो?” फाह्याज़ की पेशानी पर लकीरों की संख्या बढ़ गयी।
“ओफ्फो।” हसन ने माथा पीट लिया- “आप कितने भुलक्कड़ हो गए हो। इतनी जल्दी भूल गये कि मिशन के सक्सेजफुल होने का मतलब है कि आज सपने में हम अम्मी को बुलायेंगे।”
अब फाह्याज़ गंभीर हुआ। हसन की भाव-भंगिमाओं को गौर से परखने के बाद वह इस नतीजे पर पहुँचा कि वह लड़का इस क्षण विस्मित कर देने वाले आत्मविश्वास से भरा हुआ था।
“रात के साढ़े ग्यारह बजने जा रहे हैं। कल स्कूल नहीं जाना है?” उसने सख्त लहजे में कहा लेकिन हसन पर कोई असर नहीं हुआ।
“ओनली फाइव मिनट्स अब्बू।” उसने तुनकते हुए कहा- “कई पेस्ट्रीज खर्च करके मैंने तबस्सुम को कन्विंस किया और अब जब प्लान को एग्जिक्यूट करने का समय आ गया तो आप भाव खा रहे हैं। क्या आपको अम्मी की याद नहीं आती? मैं ये मेथड सिर्फ अपने ऊपर अप्लाई करता और केवल अपने सपने में अम्मी को बुलाता लेकिन मैंने आपको भी प्लान में शामिल किया क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप बताते नहीं है लेकिन उन्हें आप भी मिस करते हैं।”
हसन की समझदारी भरी बातों ने फाह्याज़ को पिघला दिया। बेटे का मन रखने के लिए उसे कहना पड़ा- “प्लान क्या है?”
“पहले अंदर आइए।” हसन डोरवे से हट गया और जब फाह्याज़ अंदर दाखिल हो गया तो वह बोला- “प्लीज दरवाजा ऊपर से बंद कर दीजिए।”
फाह्याज़ ने दरवाजे की चिटकनी चढ़ा दी। चूँकि हसन उस ऊंचाई तक नहीं पहुँच सकता था इसलिए उसने ये काम पिता से करवाया।
जब दरवाजा बंद हो गया तो बेहद गंभीर भाव-भंगिमाएं अख्तियार किये हुए हसन ने चारों ओर नजरें घुमाकर ये सुनिश्चित किया कि कमरे में होने वाली गतिविधि की भनक किसी बाहरी को लगने का कोई जरिया तो नहीं रह गया है लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। कमरे की खिड़कियाँ और रोशनदान पहले से ही बंद थे। बाहर खामोशी फ़ैली हुई थी। इक्का-दुक्का कुत्तों के भौंकने की आवाजें जरूर आ रही थीं लेकिन लम्बे अंतराल पर। फाह्याज़ खामोश रहकर बेटे की गतिविधियों को देखता रहा। वह कुछ बोलने को उद्यत हुआ तो हसन ने होठों पर तर्जनी उंगली रखकर ‘शी’ की आवाज़ निकालते हुए उसे खामोश कर दिया। फिर उसने स्कूल बैग से दो फोल्ड किये हुए पेपर शीट निकाले।
“ये बहुत आसान मेथड है।” उसने एक शीट फाह्याज़ की ओर बढ़ाते हुए कहा- “इस पेपर पर एक सील बना हुआ है, हमें बस उस सील को देखते हुए उसे आँखों में बसाकर अम्मी को याद करते हुए सो जाना है।”
फाह्याज़ ने असमंजस में पड़कर हसन को देखा। मन में कई सवाल होने के बावजूद उसे शीट थामनी पड़ी। वह शीट को अनफोल्ड करके उस पर बने निशान को देखने ही जा रहा था कि हसन ने रोक दिया- “अभी नहीं। अभी मुझे सो जाने दीजिए। फिर आप कीजिएगा। एक साथ नहीं करना है।”
फाह्याज़ थम गया जबकि हसन उछलते-कूदते हुए बिस्तर में समा गया और लिहाफ़ को धड़ तक खींचकर उस कागज़ पर बने निशान को देखने लगा। करीब दो मिनट बाद उसने आँखें बंद कर लीं लेकिन फिर तुरंत खोल दीं। शायद निशान अभी पूरी तरह उसकी आँखों में नहीं बस पाया था लिहाजा उसे फिर से दो मिनट घूरने के बाद जब इस बार उसने आँखें बंद कीं तो दोबारा नहीं खोलीं। फाह्याज़ करीब पाँच मिनट तक मूर्खों की तरह बेटे को घूरता रहा और जब समझ गया कि उसकी बारी आ गयी है तो उसने अपनी शीट खोली। यहीं पर मानो क़यामत आ गयी। शीट पर बना हुआ निशान कुछ यूँ था:

फाह्याज़ के हाथ काँपे और आँखें हैरत से फ़ैल गयीं। उसने बौखलाकर हसन की ओर देखा। चेहरे पर मासूमियत संजोकर सो रहे बेटे को देख उसके मन में बड़ी ही मनहूस कल्पना उभरी और अगले ही पल उसने उसे झकझोरकर उठा दिया।
“आ...आपने मुझे उठाया क्यों?” फाह्याज़ की हरकत पर हसन हैरान रह गया- “अभी तो मैं सोया भी नहीं था। अब प्रोसेस रिपीट करना होगा।”
“कुछ नहीं करोगे तुम।” फाह्याज़ ने उसे बिस्तर से उठाकर हवा में नचाते हुए जमीन पर खड़ा कर दिया- “सोओगे भी नहीं, चुपचाप मेरे साथ चलो।”
“ल...लेकिन....।”
“चुप...बिल्कुल चुप..।” फाह्याज़ जोर से चीखा तो हसन खामोश रह गया। उसे समझ में नहीं आया कि अचानक क्या हुआ जबकि फाह्याज़ ने उसके हाथ से नेक्रोमेंसी के सिगिल वाला कागज़ लिया, कमरे का दरवाजा खोला और उसे दौड़ाते हुए ड्राइंग रूम में लेकर आ गया। शोर सुनकर लियाकत भी अपने कमरे से बाहर आ गये और बाप-बेटे की हालत देख हैरान रह गए।
“क्या हुआ?” उन्होंने आश्चर्यान्वित होकर पूछा- “तुम दोनों इतनी रात को पूरी
दुनिया सिर पर क्यों उठा रहे हो?”
“ये देखिए अब्बू।” फाह्याज़ ने निशान वाले दोनों कागज़ लियाकत की ओर बढ़ाते हुए कहा- “ये उल्लू की दुम आजकल स्कूल में जादू-टोना सीखता है और मरे हुए लोगों को सपने में बुलाने की ट्रिक सीखने के लिए घर से पेस्ट्रीज चुराकर ले जाता है।”
लियाकत ने ज्यों ही फाह्याज़ के हाथ से कागज़ लिया, उनके भी रोंगटे खड़े हो गये।
“या अल्लाह!” उन्होंने खौफजदा लहजे में कहा- “ये...ये निशान...ये निशान इसे कहाँ से मिला?”
फाह्याज़ ने गुस्से से लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए हसन की ओर देखा, जो मामले को तूल पकड़ चुका देखकर सुबकने लगा था।
“शांत हो जाओ बेटे।” लियाकत ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- “ये बस एक निशान है और कुछ नहीं।”
दादा की पुचकार पाकर हसन की सिसकियाँ तेज होने लगीं, जबकि फाह्याज़ ने निर्णायक लहजे में कहा- “ये आज रात नहीं सोयेगा, बिल्कुल भी नहीं सोयेगा।”
उसका फैसला सुनकर लियाकत ने उसे घूरकर देखा, फिर कहा- “तुम यहाँ से जाओ। मुझे इससे बात करनी है।”
फाह्याज़ वहाँ से हट तो गया लेकिन कहीं और जाने के बजाय मेन दरवाजा खोलकर कंपाउंड में निकल गया। लियाकत समझ रहे थे कि वह किस फ़िराक में बाहर गया है इसलिए उसकी ओर से ध्यान हटाकर वे हसन से मुखातिब हुए।
“बताओ।” उन्होंने उसके आँसू पोंछते हुए पूछा- “किस बात को लेकर लड़ाई हुई तुम दोनों में? और वो निशान तुम्हें कहाँ से मिला?”
हसन कुछ समय तक सुबकता रहा फिर बोला- “मुझे तबस्सुम की अम्मी ने बताया कि उस निशान को देखते-देखते सो जाने पर मरे हुए लोग सपने में आते हैं लेकिन अब्बू उस निशान को देखते ही गुस्सा हो गये। उन्होंने मुझे हवा में नचाया और दौड़ाते हुए यहाँ लेकर आ गये। वे मुझे सोने नहीं देना चाहते क्योंकि वे नहीं चाहते कि मैं सपने में अम्मी से मिलूँ, उनसे बातें करूँ और उनसे ये शिकायत करूँ कि अब्बू अब मुझे कभी अम्यूजमेंट पार्क नहीं ले जाते।”
लियाकत की भंगिमाएं गंभीर हो गयीं। हसन के हाथ में उस निशान को देखकर फाह्याज़ के आपा खो देने के पीछे छिपी वजह से वे वाकिफ़ थे। उन्हें ये इल्म भी था कि उस निशान को देखते हुए सो जाने पर फाह्याज़ के साथ क्या हुआ था।
“तबस्सुम कौन है? तुम उसकी अम्मी से कैसे मिले?” कुछ देर तक हसन को घूरने के बाद उन्होंने पूछा।
“तबस्सुम मेरी क्लासमेट है। एक दिन जब मैंने उससे पूछा कि अल्लाह को प्यारे हो गये अपने अब्बू को कभी वह मिस करती है तो उसने कहा कि नहीं क्योंकि वह सपने में रोज उनसे मिल लेती है। मेरे ये पूछने पर कि ऐसा कैसे पॉसिबल है, उसने बताया कि उसकी अम्मी को नेक्रोमेंसी आती है। उसी के जरिये ये पॉसिबल है।”
“ये नेक्रोमेंसी क्या है?” लियाकत की आँखें गोल हो गयीं।
“इट इज ऐन आर्ट थ्रू व्हिच वी कैन कम्यूनिकेट विद डेड्स एंड कॉल देम इन आवर ड्रीम्स।”
लियाकत के बदन में भय की एक सर्द लहर दौड़ गयी। उन्होंने अधरों पर जुबान फेरी लेकिन हसन के सामने ऐसा कोई भाव जाहिर नहीं किया, जो इंगित करता कि नेक्रोमेंसी डराने वाली चीज है। प्रत्यक्ष में उन्होंने पूछा- “तुम उसकी अम्मी तक कैसे पहुँचे?”
“तबस्सुम ही ले गयी थी। स्कूल में उसने मुझे बताया था कि उसकी अम्मी मुझसे मिलना चाहती हैं। उसकी अम्मी ने मुझे निशान की बस एक कॉपी दी थी लेकिन मैंने कार्बन पेपर की हेल्प से उसकी एक और कॉपी अब्बू के लिए बनाई क्योंकि मैंने अपना प्लान उनके साथ भी शेयर किया था। मैं चाहता था कि वो भी सपने में अम्मी से मिलें।”
लियाकत की समझ में नहीं आया कि हसन ने जो कुछ किया था, उसे क्या नाम दें। ये बिल्कुल वैसा ही था, जैसे कोई नवजात शिशु जीते जागते जहरीले साँप को खिलौना समझकर उसके साथ खेलने लग गया हो। वे कुछ कहने जा रहे थे कि तभी फाह्याज़, गार्ड और मेड को लेकर अंदर आया। गार्ड का ठिकाना केबिन ही हुआ करता था लेकिन मेड की रिहाइश कंपाउंड के बाउंड्री वाल से लगा एक सर्वेंट क्वार्टर था।
“आप इसे स्कूल से सीधा घर ले आने के बजाय कहीं और लेकर क्यों गए थे?” फाह्याज़ ने गार्ड से पूछा।
“ऐसा मैंने पहली बार तो नहीं किया साहब। एक दो बार और भी हुआ है, जब हसन मियाँ स्कूल से छूटने के बाद अपने दोस्तों के यहाँ गए थे।”
“लेकिन पिछली बार वैसा नहीं हुआ था, जैसा इस बार हुआ।”
“कुछ दिक्कत हुई क्या जनाब?” गार्ड सकते में आ गया।
“जब तक हसन उस लड़की के घर पर रहा था, तब तक आप कहाँ थे?”
“बगल में ही एक पनवाड़ी की दुकान पर। हसन करीम दस मिनट तक उस घर
में रहे थे।”
“ठीक है।” फाह्याज़ ने गहरी साँस लेकर कहा- “इसके पास बैठिए आप लोग। कहानियाँ सुनाकर या कुछ और करके इसका मन बहलाइए लेकिन ध्यान रहे इसे सोने बिल्कुल नहीं देना है।” उसने मेड से मुखातिब होकर आगे कहा- “तुम सबके लिए चाय बनाओ। आप मेरे साथ आइए करीम मियाँ, मैं उस बदरुल औरत की खबर लेने जा रहा हूँ।”
फाह्याज़ ने बाहर का रुख कर लिया। करीम भी उसके पीछे जाने को उद्यत हुआ लेकिन लियाकत ने उसे रोक दिया और खुद बेटे के पीछे-पीछे बाहर आ गये।
“रुको।” बाहर आकर उन्होंने गैराज की ओर बढ़ रहे फाह्याज़ को आवाज़ दी।
आवाज़ सुनकर वह ठिठका।
“पागल मत बनो।” लियाकत ने उसके करीब पहुँचकर कहा- “जिस औरत ने तुम्हारे बेटे को वो अजीब सा निशान दिया है, उससे उलझने अभी जाओगे? रात के बारह बजे, आधी रात को?” फाह्याज़ खामोशी से उन्हें घूरता रहा तो उन्होंने आगे कहा- “उसके खिलाफ़ जो कुछ करना है, सुबह करना; अभी हसन को संभालना जरूरी है।”
फाह्याज़ उलझन में पड़कर पहलू बदलने लगा। कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की उसने।
“सब्र से काम लो।” लियाकत ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा- “बच्चों के सामने धैर्य खो देना अच्छे माँ-बाप की पहचान नहीं है। मैंने पहले ही कहा था कि एक औरत के बगैर बच्चे की परवरिश करना आसान काम नहीं है। हसन की इसमें कोई गलती नहीं है। अपने जीवन के अभावों को पूरा करने के लालच में बच्चे अक्सर ऐसी परीकथाओं पर यकीन कर लेते हैं।”
“अब्बू प्लीज...।” फाह्याज़, लियाकत की ओर घूमा और सख्त लहजे में बोला- “वो निशान किसी परिकथा का हिस्सा नहीं है बल्कि अँधेरी दुनिया में रहने वाले किसी मखलूक का दस्तखत है। और....और आयम टोटली इन पैनिक सो प्लीज ये जो कुछ भी हो रहा है उसकी बाबत ये मत कहिए कि ये मेरे दूसरी शादी न करने के फैसले का नतीजा है।”
“लेकिन इस बात को नकारा भी तो नहीं जा सकता न कि अपनी मरहूम अम्मी से बात करने के ऑब्शेसन में ही हसन ने ये सब कुछ किया, उस खौफ़नाक निशान को बरामद कर लिया?”
“यानी कि आप पहले से जानते हैं उस निशान के बारे में?” फाह्याज़ ने आँखों में हैरत लिए हुए लियाकत को घूरा।
“मैं तो काफ़ी ऐसी चीजें भी जानता हूँ फाह्याज़, जो मैं नहीं चाहता कि तुम जानो।”
“हद करते हैं आप भी।” फाह्याज़ हँसा लेकिन उसकी हँसी में खीझ थी- “आपको लगता है, मैं बच्चा हूँ। सही-गलत की पहचान नहीं है मुझे।”
“बच्चे नहीं हो तुम लेकिन जिद्दी तो हो न? एक बार जो ठान लेते हो उसे अधूरा छोड़ देने में तौहीन महसूस होती तो है न तुम्हें? तुम्हें सब-कुछ बताने का क्या हासिल होता मुझे? क्या मेरी बात सुनकर तुम मामले से हट जाते? या अब भी अगर मैं तुम्हें बता दूँ कि विनायक के क़त्ल में किस-किस का दखल है तो क्या ये सोचकर तुम उस मामले से दूरी बना लोगे कि आसमानी मामलात में हम इंसानों को दखल नहीं देना चाहिए?”
“इस बारे में हम कुछ देर पहले ही बात करके हटे हैं लिहाजा इस पर आपके लेक्चर का मुझ पर कोई असर नहीं होगा। आप बताएं या न बताएं, मुझे कहीं न कहीं से पता चल ही जाएगा लेकिन अब चूँकि ये बात हसन तक पहुँच चुकी है इसलिए ये समझना कि हम एक-दूसरे से फैक्ट्स शेयर न करके किसी बड़े खतरे को टाल देंगे, बेवकूफी होगी।” फाह्याज़ थोड़ा ठहरकर आगे बोला- “वैसे भी मुझे नहीं लगता कि जो बातें आप मुझे बताना नहीं चाहते, वे बातें उन तथ्यों से भी ज्यादा खौफ़नाक होंगी, जो अब-तक मुझे पता चली हैं। विनायक शुक्ला अकेला नहीं है, जो इस तरह मारा गया है। अनगिनत ऐसे केसेज हैं, जिनमें आदमी खुद-ब-खुद अपने बदन पर चाकू फेरकर और एक रहस्यमयी निशान छोड़कर मरा है। हैरान करने वाली बात ये है कि उन सभी की तस्वीरें एक ही शख्स ने बनाई है और किसी रहस्यमयी सम्मोहन में डूबकर बनाई है। इतना ही नहीं उसी आर्टिस्ट ने आपकी बहू की भी तस्वीर बनाई थी। इसका मतलब कि अगर शबनम दुर्घटना में नहीं मरती तो अगले कुछ ही दिनों में वो भी वही मौत मरती, जो मौत विनायक मरा। ये जितनी भी मौतें हो रही हैं, एक पैटर्न पर हो रही हैं। कोई एंटिटी है, जो किसी नियम के तहत अपना शिकार चुनती है और कामरान के जरिये उस शिकार की शक्ल कैनवास पर नुमाया करवाती है। फिर अगले आठ से दस दिनों में उस चुने हुए आदमी के बदन पर नेक्रोमेंसी का सिगिल टैटू की शक्ल में उभरना शुरू होता है। उसे एक काली परछाईं के दिखने का भ्रम होता है। उसे ये ख्वाब भी दिखता है कि वह बड़े से कटोरे में भरे खून से एक नरभेड़िये को नहला रहा है।”
“पर..पर..शबनम ने तो ऐसा कुछ होने की शिकायत नहीं की थी?” लियाकत का लहजा काँप गया।
“हाँ क्योंकि उसके केस में ये सिम्प्टम्स इनिशियल स्टेज में थे और इतने मामूली थे कि किसी की तवज्जो में न आ सके थे, खुद शबनम के भी नहीं। उस एंटिटी ने शबनम को भी चुना था अब्बू, इसीलिए जब विनायक के बदन से बरामद हुए निशान को देखते-देखते मैं नींद के हवाले हुआ था तो वह खौफ़नाक ख्वाब आया था मुझे। वही निशान आज हसन भी लेकर आया है। वो नींद के हवाले होगा और उसी भयानक ख्वाब से रूबरू होगा, जिसने मुझ जैसे पुलिसिये को भी डरा दिया था। नहीं..नहीं...आज मैं उसे किसी भी कीमत पर सोने नहीं दूँगा।”
“कंट्रोल योरसेल्फ फाह्याज़।” लियाकत ने फाह्याज़ का कंधा झकझोरकर उसे होश में लाया- “सब्र से काम लो। मैंने बात की हसन से। उसने बताया कि तबस्सुम की माँ एक नेक्रोमेंसर हैं।”
“नेक्रोमेंसर?” फाह्याज़ के बदन में मानों चींटियाँ रेंग गयीं।
“हाँ, इसीलिए तो मैंने कहा कि होश से काम लो। हसन ने जो कुछ किया है, उसका पॉजिटिव साइड भी देखो। तबस्सुम की माँ, लाश पर मिले उस निशान को लेकर, जिसे तुम नेक्रोमेंसी का सिगिल बता रहे हो, कोई राय कायम करने में तुम्हारी मदद कर सकती है।”
“और अगर वह खुद इन सब में इन्वाल्व हुई तो?” फाह्याज़ ने आशंकित लहजे में कहा।
“तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है? हथकड़ियाँ डाल देना उसके हाथों में, अरेस्ट कर लेना कातिल को।”
“वो कातिल नहीं हो सकती लेकिन उसकी थ्रू हमें वो पैटर्न हासिल हो सकता है, जिसके जरिये वह एंटिटी अपना शिकार चुनती है।” फाह्याज़ ने लियाकत से मुखातिब होकर आगे कहा- “आपको उस निशान के बारे में जानकारी कैसे हुई? आपको अब तक ऐसा क्या-क्या पता चला है, जो मुझ्रे नहीं पता है?”
“जिस रात तुम्हें शबनम का ख्वाब आया था, उस रात तुम उस निशान पर माथापच्ची कर रहे थे, ये मालूमात मुझे तब हासिल हुई जब सुबह तुम्हारे सेलफोन की गैलरी में उस निशान की तस्वीर खुली हुई देखी मैंने।” लियाकत ने कहा- “उस निशान को मुसलसल तवज्जो देने के कारण ही तुम्हें खौफ़जदा करने वाला वह ख्वाब दिखा था; उस पल मैं इसी ख्याल से रूबरू था, जब मुर्दाघर का गार्ड कमलाप्रसाद मेरे पास आया और फरमाया कि विनायक की लाश देखने के लिए एक रहस्यमयी मोमिन मुर्दाघर आया था और लाश पर मौजूद उस निशान को देखकर कहा था कि अँधेरी दुनिया में एक शख्सियत है, जो लगातार इंसानों का शिकार कर रही है। बकौल कमला के, रहस्यमयी मोमिन तो ये पेचीदी बातें कहकर चला गया था लेकिन इसके बाद से कमला का जीना दुश्वार हो गया था। उसे डरावने सपने आने लगे थे, जिसमें वह विनायक को कटोरे भर खून से एक नरभेड़िये को नहलाते हुए देखता था। ये बातें बताने के लिए वह पुलिस स्टेशन जाने के बजाय मेरे पास आया क्योंकि उसे डर था कि उसे पुलिस की नाराजगी झेलनी पड़ेगी।
कमला की बातें सुनकर मेरा ये यकीन पुख्ता हो गया कि विनायक की लाश पर मिला निशान साधारण नहीं है क्योंकि उसी निशान के कारण तुम्हें शबनम का ख्वाब आया था और हूबहू वही ख्वाब थोड़ी सी तब्दीली के साथ कमला को भी आया था लेकिन उसने तारीफ़ के काबिल बात ये की थी कि उस रहस्यमयी मोमिन की तस्वीर मोबाइल के कैमरे में उतार ली थी, जिसका नतीजा ये हुआ कि उस मोमिन की तस्वीर और लाश से बरामद निशान की तस्वीर लेकर मैं मौलाना से मिला। मौलाना साहब निशान की बाबत तो कोई राय नहीं कायम कर सके, सिवाय इसके कि उन निशान का सम्बन्ध विनायक की मौत के साथ-साथ शबनम की मौत से भी हो सकता है लेकिन मोमिन को लेकर उन्होंने जो खुलासा किया, उसने मेरे पैरों तले जमीन खींच ली। मौलाना ने बताया कि वह रहस्यमयी मोमिन हम इंसानों की तरह मिट्टी का नहीं बल्कि आग का बना हुआ मखलूक है, यानी कि एक जिन्न है।” फाह्याज़ की आँखें हैरत से फ़ैल गयीं जबकि लियाकत ने आगे कहा- “उस जिन्न के बारे में और खुलासा करने के लिए मौलाना को कमला से कुछ दरयाफ्त करने की जरूरत थी लिहाजा उन्होंने उसे लेकर आने के लिए कहा लेकिन अगली सुबह जब मैं कमला के ठिकाने पर पहुँचा तो पता चला कि गुज़री हुई रात को आये हार्ट अटैक से उसकी मौत हो गयी है। उस वक्त तक उठावनी भी नहीं हुई थी। आगे पूछताछ करने पर मालूम चला कि उसे वह दौरा अजीब से हालात में पड़ा था। सिर्फ इतना ही नहीं, उसी रात मौलाना के दिमाग की नस फट गयी और आज सुबह ही खबर आयी है कि उनका भी इंतकाल हो गया है।” फाह्याज़ को अपने रोंगटे खड़े होते महसूस हुए जबकि लियाकत ने आगे कहा- “अब ये भी सुन लो कि मैंने ये बातें तुम्हें क्यों नहीं बतायीं और क्यों ये जिद्द करता रहा कि तुम विनायक के केस से हट जाओ।”
“क्यों?” फाह्याज़ के होठों से अस्फुट स्वर में निकला।
“क्योंकि कमला के घर पर वह जिन्न खुद सामने से रूबरू हुआ था मुझसे और ये हिदायत दे गया था मैं या तुम; कोई भी उसके मामलात में दखल न दे वरना उसे और भी हत्याएं करने से कोई गुरेज नहीं होगा।”
“लेकिन...लेकिन...वो जिन्न इन मामलों में क्यों शरीक है? नेक्रोमेंसी के सिगिल में उसकी क्यों दिलचस्पी है? अँधेरी दुनिया की शख्सियत...।” सहसा फाह्याज़ के होंठ गोल हो गये- “कहीं वो उसी एंटिटी की बात तो नहीं कर रहा था, जो कामरान के जरिये अपना शिकार चुनती है?”
“उसने मुझसे कहा था कि उसे किसी की तलाश है। यही बात मरहूम मौलाना साहब ने भी कही थी कि वह किसी ख़ास मकसद से हम इंसानों की दुनिया में घूम रहा है और बेहद गुस्से में है।”
“इस मिस्ट्री को अब सॉल्व करना निहायत ही जरूरी हो गया है अब्बू।” फाह्याज़ ने व्यग्र भाव से पहलू बदलते हुए कहा- “वरना लोग इसी तरह मरते रहेंगे।”
“आखिर क्यों परवाह कर रहे हो तुम?” लियाकत ने खीझकर कहा- “लोग तो यूँ भी मरते हैं, कभी बीमारी से, कभी दुर्घटना से। अपनी और परिवार की जान जोखिम में डालकर तुम कत्लों के इस सिलसिले को रोक भी लोगे तो क्या लोगों का मरना बंद हो जाएगा? शैतानियत का वजूद मिट जाएगा?”
“अगर हसन या मेरी जान पर बनी होती तो भी आप यही कहते?”
“तुम दोनों की जान पर न बन पाए, इसीलिए आगाह कर रहा हूँ कि रफ़ा-दफ़ा करो इसे। सुराग तलाशने की कोशिश में तुम जहाँ-जहाँ जाओगे, वहाँ-वहाँ लाशें बिछेंगी। उस जिन्न की आँखों को याद करता हूँ तो धड़कनें बढ़ जाती हैं मेरी, इतने करीब था वो मेरे। मैंने उस निशान की बाबत मौलाना से मदद लेनी चाही तो मौलाना को मार डाला उसने। कमला उसका राज़फाश न कर पाए इसलिए कमला का भी काम तमाम कर दिया उसने। तो सोचो, अगर तुम उसकी राह में आये तो क्या करेगा तुम्हारे साथ? क्या तुम्हारी वर्दी तुम्हें उस जिन्न की करिश्माई ताकतों से बचा लेगी?”
“मुझे तो जिन्न से कोई सरोकार है ही नहीं अब्बू, मुझे तो बस क़त्ल की पहेली को सुलझाना है। जिन्न उसे ख़त्म करेगा, जो उसका राज़ खुलने का जरिया बनेगा क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो वह आपको भी ख़त्म कर चुका होता केवल चेतावनी देकर छोड़ नहीं देता।”
“और क़त्ल की पहेली को हल करते-करते अगर तुमने उसका रास्ता काट दिया तो?”
“तब की तब देखेंगे।”
लियाकत लम्बी साँस लेकर बगले झाँकने लगे।
“आप यकीन कीजिए अब्बू।” फाह्याज़ ने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- “मैं जल्द ही मौतों के इस सिलसिले को रोक दूंगा, ट्रस्ट मी। नेक्रोमेंसी का वह सिगिल ही हमारी मदद करेगा। मैं कल तबस्सुम की माँ से मिलूँगा। हमें मेजर लीड मिलेगी।”
लियाकत ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने अपने गुस्से को जब्त किया, कंधे से फाह्याज़ का हाथ झटका और क्षुब्ध होकर दरवाजे की ओर बढ़ गये। पिता को नाराज कर देने के अफ़सोस से घिरा फाह्याज़ कुछ देर तक उन्हें जाते हुए देखता रहा फिर वहीं खड़े-खड़े बोला- “प्लीज उस जिन्न की फोटो मुझे भी फारवर्ड कर दीजिए।”
लियाकत ने मानो उसकी बात सुनी ही नहीं और भीतर चले गये लेकिन करीब दो मिनट बाद फाह्याज़ के वाट्सएप मेसेज का नोटिफिकेशन बजा। उसने जेब से सेलफोन निकाला तो देखा कि लियाकत ने अभीष्ट फोटो भेज दी थी। फाह्याज़ ने कुछ देर तक जिन्न की उस तस्वीर को ध्यान से देखा फिर उसे सुबोध को फारवर्ड करने के बाद उसे फोन लगाया। कॉल तुरंत अटेंड की गयी।
“जाग रहे हैं?” उसने पूछा।
“सिस्टम पर ही हूँ सर। तीन घंटे से कंप्यूटर महाशय को परेशान कर रहा हूँ।” सुबोध का जवाब आया।
“एक फोटो भेजी है आपको, जरा देखकर बताइए।”
लाइन पर कुछ पलों तक खामोशी छाई रही फिर सुबोध का स्वर आया- “देख लिया सर।”
“क्या लगता है, किस टाइप का इंसान हो सकता है वह?”
“मुझे तो कोई पीर-फ़कीर लग रहा है। आप कहीं इसकी सेवाएं लेने की तो नहीं सोच रहे हैं?”
“नहीं, इसकी तलाश करनी है। फोटो सेव करके कोशिश शुरू कर दीजिए।”
“कर लिया।”
“कामरान के हुनर का शिकार हुए लोगों में से किसी की सूरत इंटरनेट पर नजर आयी?”
“अभी तक तो नहीं सर।”
“कोई नहीं, सो जाइए, कल फिर से कोशिश कीजिएगा। अगर अल्लाह ने चाहा तो कल एक बड़ी मछली हाथ लगेगी।”
“खुलकर बताइए।”
“फिलहाल आराम कीजिए, कल बात करते हैं, गुड नाईट।”
और फिर फाह्याज़ ने कॉल डिसकनेक्ट कर दिया।
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हसीनाबाद, सन 1975।
रात का कोलतार सा गाढ़ा अँधेरा हसीनाबाद के घने जंगल में यूँ उतर चुका था कि चंद्रमा की रोशनी भी कुछ देखने के लिहाज से नाकाफ़ी सिद्ध हो रही थी लेकिन पशुपति को कुदरत की ओर से ये सलाहियत हासिल थी कि रोशनी की गैरमौजूदगी में भी उसकी दृष्टि ज्ञानेंद्री जागृत रहती थी लिहाजा वह अँधेरे में पूरी तरह जर्फ़ उस काले साये की गतिविधि को बखूबी महसूस कर रहा था, जिसके बारे में हसीनाबाद के वाशिंदों की धारणा थी कि वह केवल शुक्रवार को नजर आने वाले आसेबी महल में रहता है और जहाँ से गुजरता है, वहाँ के पौधों और वनस्पतियों से उनकी हरियाली छीन लेता है। वह इस अंदाज में आगे बढ़ रहा था, जैसे उसके पाँव जमीन के बजाय हवा में फासले तय कर रहे हों। कभी-कभी वह ठहर जाता था और आस-पास गर्दन घुमाकर परिवेश का जायजा लेने के बाद फिर से आगे बढ़ने लगता था।
पशुपति उससे बेहद कम फासले पर रहकर उसका पीछा कर रहा था। हालाँकि वह इस बात के प्रति लापरवाह दिखाई दे रहा था कि रात की खामोशी में उस वीरान जंगल में घूम रहा वह रहस्यमय मखलूक उसे देख लेगा तो उसका क्या हश्र करेगा लेकिन जब साया ठहरता था तो वह साँस रोककर अपनी जगह पर स्थिर हो जाता था। किसी बुत की मानिंद यूँ निश्चल हो जाता था कि अँधेरे का ही एक अंग लगने लगा था।
सहसा काला साया यूँ ठिठक गया, जैसे उसे कुछ महसूस हुआ हो और फिर इतनी तेजी से पीछे घूमा कि पशुपति अपने पैंतरे को तुरंत अमल में न ला सका। उसने निश्चलता अख्तियार तो कर ली लेकिन फिर भी उसके जिस्म की हलचल साये के इन्द्रियों से बची न रह सकी।
“क्यों पीछा कर रहे हो मेरा?” साये ने अपना रुख उसी दिशा में करते हुए पूछा, जिस दिशा में पशुपति दम साधे हुए पाषाण-प्रतिमा बना खड़ा था। साये की आवाज़ ऐसी थी, जैसे कहीं दूर से, किसी अँधे कुंएं से आ रही हो लेकिन पशुपति ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। न तो उसकी जुबान हरकत में आयी और न ही कोई अंग।
“कहाँ छिप गये? सामने क्यों नहीं आते?” इस बार साये के लहजे में कोप था। हालाँकि पशुपति उसके ठीक सामने था और इतने कम फासले पर था कि वह हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ सकता था लेकिन इसके बावजूद साया न तो उसे देख पा रहा था और न ही महसूस कर पा रहा था।
“सामने आओ। तुम कोई ऐसी शख्सियत जान पड़ते हो, जो अमरोज़ की कमजोरी से वाकिफ़ है।”
साये के लहजे में छिपी विवशता को महसूस कर पशुपति के होठों पर कुटील मुस्कान थिरक उठी, मगर अब भी वह खामोश और निश्चल ही बना रहा।
“क्यों तंग कर रहे हो मुझे? किसने बताया तुम्हें मेरे बारे में? किसने तुम्हें मेरे ठिकाने तक पहुँचाया?”
“तुम्हारी भूख मिटाने आया हूँ अमरोज़।” आख़िरकार पशुपति ने मौन भंग
किया और इसी के साथ वह साये से एक कदम दूर हो गया। उसके ऐसा करते ही साया इस कदर उससे मुखातिब हुआ, जैसे उसे दिखने लगा हो।
“च..च...च....।” पशुपति ने तरस खाने वाले भाव से कहा- “कितने अफ़सोस की बात है कि मौत को हराकर उसके चंगुल से अमरता को छीन लेने वाला अमरोज़ इस फानी दुनिया में सदियों से भूखा घूम रहा है। अगर अमरता को हासिल करने का यही सिला है तो मैं कहता हूँ कि अमरोज़ जैसा बेवक़ूफ़ न तो पहले कभी इस दुनिया में हुआ और न ही आगे कभी होगा क्योंकि उसने अमरता हासिल तो की लेकिन उसके एवज़ में अपनी किस्मत में ये भी लिखवा लिया कि वह कयामत की रात तक भूखा रहेगा।”
“हो कौन तुम?” इस बार साये ने इस कदर कहा, जैसे जबड़े भींच रहा हो- “मेरा नाम कैसे जानते हो? किसने तुम्हें मुझसे वाकिफ़ कराया?”
पशुपति पर उसके गुस्से का कोई असर नहीं हुआ बल्कि इसके विपरीत उसने कथित अमरोज़ के गुस्से को और भड़का दिया- “बेशुमार तिलस्माती ताकतों का मालिक एक महान नेक्रोमेंसर आज इतना कमजोर है कि अपनी भूख तक नहीं मिटा सकता। ताकत को इतना मजबूर पहले कभी नहीं देखा था मैंने।”
अमरोज़, पशुपति की ओर लपका लेकिन ऐन वक्त पर पशुपति ने अपनी जगह बदल ली और निश्चल खड़ा हो गया। सामने वाले की गतिविधि से उसकी मौजूदगी का एहसास करने वाला अमरोज़ एक बार फिर अंधों की तरह इधर-उधर गर्दन घुमाकर कोई हरकत या आहट महसूस करने की कोशिश करने लगा। जब वह प्रयास करके हार गया तो अंतत: पशुपति ने ही मुँह खोला- “परेशान होने की जरूरत नहीं है अमरोज़ क्योंकि तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ मैं। मैं तो बस तुमसे मदद माँगने आया हूँ और बदले में तुम्हारी मदद करने भी।” इस बार पशुपति के लहजे में न तो कोई तंज था और न ही अमरोज़ की खिल्ली उड़ाने का भाव।
अमरोज़ किसी आवेश का प्रदर्शन करने के बजाय उस दिशा में रुख करके खड़ा हो गया, जिस दिशा से पशुपति की आवाज़ आयी थी।
“तुम्हारी दुनिया का अँधेरा मिटाने आया हूँ।” पशुपति ने कहा।
“बदले में क्या चाहते हो?” अमरोज़ ने खरखराते लहजे में पूछा।
“मैं जो चाहता हूँ, उसे तुम जैसा नेक्रोमेंसर ही मुझे दे सकता है।”
“कैसे मिटाओगे मेरी भूख?” कुछ देर खामोश रहने के बाद अमरोज़ ने पूछा।
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