देवराज चौहान ने फोन बंद किया तो शेख फौरन कह उठा--- "क्या हुआ?"

"वैन वहाँ पर पहुँच गई है।" देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा।
"सच?" पव्वा का चेहरा चमक उठा।
"तुम्हें खुशी नहीं हुई देवराज चौहान?" टिड्डे की निगाह उसके चेहरे पर थी।
"एक नई समस्या खड़ी हो गई है।" देवराज चौहान ने चारों को देखा।
"क्या?" प्रतापी के होंठों से निकला--- "हम वैन में पड़े नोट ले सकते हैं या नहीं?"
"वो समस्या नहीं है।"
"तो?"
"वैन के साथ वहाँ जगमोहन भी पहुँचा है। सोहनलाल ने बताया कि जगमोहन को ये कहा गया है कि अगर वो उनकी बात नहीं मानेगा तो वो लोग मुझे मार देंगे।" देवराज चौहान ने कहा।
"तुम्हें...।"
"हाँ...।"
"ये कैसे हो सकता है? तुम तो पूरी तरह आजाद हो और उनसे दूर हो...।"
"वो लोग हम पर नजर रखते भी हो सकते हैं।"
चारों की निगाह पल भर के लिए देवराज चौहान पर जा टिकी।
"मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ है।" पव्वा गम्भीर स्वर में बोला।
देवराज चौहान की निगाह भी हर तरफ गई।
इस वक्त वह सब एक बाजार के बीचों-बीच लगे बेंच पर बैठे थे। रात के नौ से ऊपर का वक्त हो गया था। इसलिए बाजार की भीड़ छँटनी शुरू हो गई थी। कम लोग ही नजर आ रहे थे।
"यहाँ तो ऐसा कोई नहीं दिख रहा कि जो हम पर नजर रख रहा हो।" टिड्डे ने कहा।
"जगमोहन को खामखाह का झांसा देकर नहीं फाँसा जा सकता।" देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा--- "जगमोहन को उन लोगों की बात का यकीन आया होगा, तभी तो उसने उन लोगों की बात मानी।"
"हमें वैन के पास उस जगह पर पहुँचना चाहिए।" बेसब्र सा पव्वा कह उठा।
"अगर कोई हम पर नजर रखता हुआ तो उन्हें खबर कर देगा कि हम वहाँ पहुँचे हैं।"
"तुम चाहते क्या हो? अब वैन के यहाँ पहुँचने की खबर आई तो...।"
"पव्वे।" शेख ने टोका--- "सब्र के साथ काम ले। इसका भी कोई रास्ता निकलेगा।"
"शेख ठीक कहता है।" प्रतापी ने कहा। फिर देवराज चौहान से बोला--- "तुम्हारा अब क्या करने का इरादा है?"
"कोई हम पर नजर रख रहा है तो उसे ढूंढ निकालना है। अपने आसपास ही नजर रखनी है और अपनी जगह हमें बदलते रहना है। इस तरह दो घंटों में ही नजर रखने वाला सामने होगा।"
"हम आसानी से यह काम कर लेंगे।" टिड्डा बोला--- "दो घंटे की तो बात है।"
"मैं उस वैन के पास जल्दी पहुँचना चाहता हूँ।" पव्वा व्याकुलता से कह उठा।
"आओ।" देवराज चौहान बैंच से उठता हुआ कह उठा--- "हमें अपनी जगह बदलनी है। आसपास नजर रखते रहो। वो जो कोई भी है, जल्दी ही सामने आएगा।"
"तब तक सोहनलाल ने वैन खोल दी तो?" टिड्डे ने देवराज चौहान को देखा।
"वो नहीं खोलेगा।" देवराज चौहान कह उठा--- "इस बात के प्रति तुम सब निश्चिंत रहो।"
◆◆◆
मलिक वैन की ड्राइविंग सीट पर जा बैठा। भीतर की डोम लाइट जला दी। सिर घुमाकर पीछे बनी तीन इंची छोटी-सी खिड़की को देखा। जिस पर लोहे की शीट का सरकाने वाला टुकड़ा लगा था। इस टुकड़े को इस तरफ से ही सरकाया जा सकता था, भीतर की तरफ से नहीं। मलिक ने महसूस किया कि इसे खोलना खतरे से खाली नहीं था। भीतर वाले गन से इस तरफ गोलियाँ चला सकते थे। परन्तु एक छोटी खिड़की को खोले बिना, भीतर वालों से बात भी नहीं हो सकती थी।
मलिक ने सिगरेट सुलगाई और कश लेकर बाहर देखा।
सब अपने कामों में व्यस्त नजर आ रहे थे।
तभी अम्बा पास से निकलता दिखा तो मलिक ने कहा---
"सोहनलाल को काम पर लगा दो। वैन के ताले खुलवाओ।"
"वो काम में लगने जा रहा है।मल्होत्रा ने उधर रोशनी के लिए कार खड़ी की है।" कहकर अम्बा आगे बढ़ गया।
मलिक ने पुनः गर्दन घुमाकर उस छोटी-सी खिड़की को देखा। तभी दूसरी तरफ का दरवाजा खुला और सुदेश वैन के भीतर आ गया।
दोनों की निगाह मिली।
"अभी खोलीनहीं खिड़की?" सुदेश ने पूछा।
"खोलने जा रहा हूँ।"
"खतरा रहेगा।" सुदेश गम्भीर स्वर में बोला--- "अपने शरीर का कोई हिस्सा खिड़की के सामने मत लाना। वो भीतर से गोली चला सकता है।"
मलिक कुछ कहने लगा कि तभी भीतर से आहट उभरी।
दोनों की नजरें मिलीं।
मलिक ने उसी पल हाथ बढ़ाकर छोटी-सी खिड़की पर लगी शीट एक तरफ सरका दी। खुद इस तरह पीछे रहा कि भीतर से फायरिंग हो तो उसे गोली ना लगे। सुदेश तो था ही दूसरी सीट पर।
मलिक ने हाथ से खिड़की के पास थपथपा कर ऊँचे स्वर में कहा---
"तुम मेरी आवाज सुन रहे हो?"
जवाब में भीतर से कोई आवाज नहीं आई।
"तुम बैंक के गनर हो। मैं जानता हूँ।" मलिक बोला--- "मेरी बात का जवाब दो। ताकि हम बात शुरू कर सकें।"
जवाब में खामोशी रही।
मलिक ने कश लिया।
सुदेश की निगाह कभी मलिक पर जाती तो कभी खिड़की पर।
मलिक ने पुनः हाथ से वैन की बॉडी थपथपाई।
"मेरी बात का जवाब दो। इसी में हम दोनों का भला है।' मलिक ऊँचे स्वर में बोला।
जवाब में खामोशी रही।
कोई जवाब नहीं।
कोई आवाज नहीं।
मलिक ने सुदेश को देखा। सुदेश के होंठ भिंचे हुए थे।
"इस तरह खामोश रहने से तुम्हारा काम नहीं चलेगा।" मलिक कह उठा--- "तुम्हें बात करनी ही पड़ेगी। वैन के ताले खोले जा रहे हैं। कुछ ही देर में हम आमने-सामने होंगे। तुम भी खून-खराबा नहीं चाहते होगे।"
भीतर से कोई जवाब नहीं आया।
मलिक ने खिड़की की शीट पुनः सरका कर बंद कर दी।
"अभी बात करो उससे।" सुदेश बोला---"वो...।"
"उसे सोचने का मौका दो। मैंने उसे बता दिया है कि हम वैन का दरवाजा खोलने पर लगे हैं। अब वो भी हालातों को समझने की कोशिश करेगा कि दरवाजा खुलने पर क्या हो सकता है। इन हालातों से वो खुश नहीं होगा। परेशान होगा।"
मलिक और सुदेश वैन से नीचे आ गए।
"एक बात बताओ।" सुदेश गम्भीर स्वर में बोला।
"क्या?" मलिक ने उसे देखा।
"अगर भीतर वाला गनमैन बात ही नहीं करता--- तो क्या करेंगे हम?"
"वो बात करेगा।" मलिक बोला।
"मैंने पूछा है कि अगर बात नहीं करता तो क्या होगा?"
"बेवकूफी वाली बात मत...।"
"मेरी बात में दम है। तुम मेरी बात को यूँ ही मत उड़ाओ।"
"बेकार है तुम्हारी बात। वो बात करेगा।" मलिक ने गम्भीर स्वर में कहा--- "उसे महसूस हो लेने दो कि वैन के दरवाजे को खोलने की कोशिश शुरू हो चुकी है। उसके बाद वह चैन से बैठ नहीं पाएगा।"
दोनों वैन के पीछे वाले हिस्से पर पहुँचे।
वहाँ सोहनलाल अपना बैग खोले वैन के ताले में व्यस्त था। पास में मल्होत्रा खड़ा था।
कब तक लॉक खोल लोगे?" मलिक ने पूछा।
"ये डबल लॉक है।" सोहनलाल ने कहा।
"डबल लॉक?"
"हाँ। तुम्हारे सामने ही है। मोटा ताला कुंडे पर लगा है। इसे खोलने पर वैन के दरवाजे के बीचों-बीच तीन बार चाबी घुमाने वाला लॉक है। उसके बाद एक लॉक दरवाजे के नीचे वाले हिस्से में है, जिसका लीवर वैन के फर्श में गया हुआ है।" सोहनलाल ताले में व्यस्त होता कह उठा।
"कितनी देर में निपटा लोगे?"
"तुम्हारे सामने ही सब कर रहा हूँ। जब तक मैं लॉक खोलूँ, तब तक बैंक के गनमैन के बारे में सोचो, जो कि भीतर बंद है। मैं उसकी आहट सुन रहा हूँ। मैं दरवाजे का आखिरी ताला तब खोलूँगा जब यह बात तय कर लोगे कि उसका किस तरह इंतजाम करना है।"
मलिक चुप रहा।
सोहनलाल ने चेहरा उसकी तरफ घुमाकर पूछा---
"कहीं तुम उसे मार देने का इरादा तो नहीं रखते?"
"तुम्हें क्या?"
"बहुत कुछ है मुझे। मैं भी अब तुम लोगों का हिस्सा हूँ और काम के वक्त हत्या जैसी बात पसंद नहीं करता।"
"तुम्हें इस काम का पचास लाख दिया गया है।"
"मुफ्त में तो नहीं दिया। काम के लिए ही दिया है। कान खोल कर सुन लो कि खून-खराबा नहीं होना चाहिए।"
"हम में ऐसी कोई बात तय नहीं हुई थी। तुम ताले खोलो। हमें मालूम है कि हमने अपना काम कैसे करना है।" कहने के साथ मलिक वहाँ से हट गया और जगमोहन के पास जा पहुँचा जो कि इस वक्त अम्बा के पास खड़ा था।
"जल्दी काम निपटाओ।" जगमोहन बोला।
"सोहनलाल लॉक खोलने पर लगा है।" मलिक ने कहा--- "परन्तु वैन के भीतर जो गनमैन है, उसकी समस्या है।"
"उससे बात करो। ड्राइविंग डोर के पीछे छोटी-सी खिड़की...।"
"वहाँ से मैंने बात करने की कोशिश की, परन्तु वह जवाब नहीं दे रहा।"
जगमोहन ने कुछ नहीं कहा।
"तुम उससे बात करो।" मलिक बोला।
"मैं?"
"तुम्हें इन बातों का ज्यादा तजुर्बा है।"
"तुम्हें नहीं है क्या?"
"नहीं।"
जगमोहन ने मलिक को गहरी निगाहों से देखा, फिर कह उठा---
"तुम आखिर हो कौन?"
"मलिक...।"
"मैंने पूछा हो कौन?"
"तुम्हें वैन में पड़ा साठ करोड़ चाहिए ना?" मलिक ने उसे घूरा।
"ये क्या मतलब हुआ।"
"काम की तरफ ध्यान दो। मेरे बारे में जानकर तुम्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा। वैन के भीतर जो गनमैन है, उससे बात करो। उसे बाहर निकाले बिना, ना तो तुम पैसा ले सकोगे, ना ही मैं अपने काम की चीज।"
"इतना तो बता दो कि तुम्हें...।"
"तुम्हें जो कहा है, वो करो। भीतर मौजूद गनमैन को दोस्ताना माहौल में बाहर निकालो।
जगमोहन वैन की तरफ बढ़ गया।
मलिक उसके पीछे चल पड़ा।
◆◆◆
जगमोहन वैन की ड्राइविंग सीट पर बैठा और पीछे बनी तीन इंच की खिड़की की शीट सरका दी। इस बात का पूरा ध्यान रखा कि अगर भीतर वाला खिड़की पर नाल रखकर गोलियाँ चलाये तो उसे ना लगें।
मलिक बगल वाली सीट पर आ बैठा था और उसे देख रहा था।
"भाई जी।" जगमोहन खिड़की के पास मुँह ले जाकर ऊँचे स्वर में बोला, साथ ही मुँह पीछे कर लिया।
मलिक की निगाह जगमोहन पर थी।
भीतर से जवाब नहीं आया।
"उस्ताद जी।" जगमोहन ने खिड़की के पास मुँह ले जाकर कहा--- "कोई तो बात करो।"
जवाब में चुप्पी ही रही।
"यार, कुछ बात-वात करो। चुप रहने से तो काम चलेगा नहीं।" जगमोहन ने पुनः खिड़की के पास मुँह ले जाकर कहा--- पीछे से वैन को खोला जा रहा है। वैन खुलने पर तुम भी फायरिंग करोगे और हम भी करेंगे। क्या फायदा? इस मसले को हम बातचीत करके सुलझा लें तो ज्यादा बढ़िया रहेगा।"
जवाब में कुछ भी सुनाई नहीं दिया।
जगमोहन होंठ भींचे खामोश रहा।
"मेरी बातों का भी उसने कोई जवाब नहीं दिया था।" मलिक बोला।
जगमोहन के चेहरे पर सोचें दौड़ने लगीं।
वैन के पीछे चल रही कार की हैडलाइट की मध्यम-सी रोशनी आगे वैन के भीतर आ रही थी।
"तुम सुबह से बंद हो वैन के भीतर। चाय-पानी-खाना कुछ भी नहीं लिया। परेशान होगे वो अलग।" जगमोहन ने कहा--- "मेरे से दो बातें कर लोगे तो तुम्हारा मन हल्का हो जाएगा। बाकी बातें तो बाद की हैं कि मानो या ना मानो।
भीतर से हल्की आहट उभरी।
"मुझसेबात करने में तुम्हें नुकसान नहीं होगा। कम-से-कम हाँ, या ना तो कहो।"
परन्तु आवाज नहीं आई।
"हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है।" जगमोहन कह उठा--- "कुछ ही देर में वैन का दरवाजा खोल दिया जाएगा। तब तुम भी समझते हो कि क्या होगा! अगर फायरिंग करके एक-दो को मार भी देते हो तो अपनी सोचो। कम-से-कम तुम नहीं बचोगे।"
"तुमने वैन पर डाका डाला है?" भीतर से आवाज आई।
"हाँ।"
"ठीक नहीं किया तुमने...।" आवाज पुनः आई।
"वैन ठिकाने पर पहुँच चुकी है। यहाँ पुलिस या कोई और नहीं आ सकता।" जगमोहन ने कहा--- "हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं। हमें सिर्फ वैन में रखा पैसा चाहिए। उसके बाद तुम वैन लेकर जा सकते हो।"
"बैंक के पैसे को बचाना मेरी जिम्मेवारी है।"
"इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरी है अपनी जान बचाना।" जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।
"हम दो हैं।" भीतर वाले ने कहा।
पल भर के लिए जगमोहन अचकचा उठा।
 मलिक का हाल भी जुदा नहीं था।
दो हो?" जगमोहन के होंठों से निकला।
"हाँ।"
"तुम्हारा नाम क्या है?"
"जवाहर।"
"दूसरे का नाम क्या है?"
"रोमी...।"
"उससे मेरी बात कराओ। ताकि मैं जान सकूँ कि तुम सच कह रहे हो।"
दो पलों की चुप्पी के बाद भीतर से आती एक नई आवाज कानों में पड़ी।
"तुम लोग पैसा लूटने में कामयाब नहीं हो सकते।"
जगमोहन ने गहरी साँस ली।
वो सच में दो थे।
दोनों को एक-दूसरे का हौसला था। दोनों के पास गनें थीं। वो आपस में राय-मशवरा कर सकते थे। दो दिमाग, दो हथियार, दो इंसान। वैन में अकेला गनमैन होता तो घबराया होता।
मलिक ने दरवाजा खोला और वैन से नीचे उतर गया।
"हम कामयाब हो चुके हैं।" जगमोहन ने बात आगे बढ़ाते कहा।
"वैन का दरवाजा खुलने दो। सब पता चल जाएगा।" रोमी की आवाज पुनः कानों में पड़ी।
"बेवकूफी वाली बातें मत करो। जो भी होगा, कम-से-कम उसमें तुम नहीं बचोगे।" जगमोहन बोला।
"तुम में से कोई नहीं बचेगा। हम अंदाजा लगा चुके हैं कि तुम लोगों की संख्या 6-7के पास है।"
"ज्यादा हैं।"
"जितने भी हो, बचोगे नहीं।"
"बेवकूफ हो तुम दोनों! जगमोहन ने समझाने वाले स्वर में कहा--- "हम लोग खुले में हैं। आजाद हैं। जबकि तुम दोनों वैन में बंद हो। फंसे पड़े हो। भीतर इतनी गोलियाँ आएंगी कि तुम दोनों की शरीरों की बुरी हालत हो जाएगी।"
"तुम्हारा क्या ख्याल है कि हम तुम्हारी बातें सुनकर वैन से बाहर आ जाएंगे?"
"मैं चाहता हूँ कि पहले तुम दोनों हालातों को महसूस करो। वैन से बाहर आना या ना आना, बाद की बात है।"
"तुम्हारी ये ही कोशिश रहेगी कि हम हाथ उठा कर वैन से बाहर आ जाएं।"
"ये ही समझदारी है।"
"भूल जाओ कि तुम लोग पैसा पा सकोगे।"
"मेरे ख्याल में तुम दोनों को आपस में विचार-विमर्श कर लेना चाहिए। मैं दस मिनट बाद बात करने आऊँगा। खाने-पीने को कुछ चाहिए तो कह दो। इंतजाम हुआ तो मिल जाएगा।" जगमोहन ने कहा।
कुछ पलों की खामोशी के बाद जवाहर की आवाज आई---
"पानी दो।"
जगमोहन ले वैन के बाहर देखा तो मल्होत्रा नजर आया।
जगमोहन ने आवाज मारकर मल्होत्रा को पास बुलाया और कहा---
"पानी की बोतल लाओ। सीलबंद बोतल पड़ी है क्या?"
"मिल जाएगी...।" कहकर मल्होत्रा एक कार की तरफ बढ़ गया।
तभी भीतर से जवाहर की आवाज आई---
"पानी में कुछ मिला मत देना।"
"तुम्हें शक हो तो पानी पीकर दिखा देता हूँ...।" जगमोहन बोला।
"तुमने सीलबंद बोतल मँगवाई है। मैंने सुनी तुम्हारी आवाज।"
"ठीक सुना...।"
तभी मल्होत्रा पानी की बोतल के साथ वापस आया और बोतल देता बोला---
"भीतर गनमैन से बात हुई...?"
"हाँ...।" जगमोहन ने उससे पानी की बोतल ली और तीन इंच लंबी चौड़ी खिड़की के बीच बोतल डाल दी और बोला--- "लो...।"
उधर से बोतल ले ली गई।
"मैं कुछ देर बाद आऊँगा बात करने।" जगमोहन ने कहा और दरवाजा खोलकर नीचे उतर गया।
वहाँ खड़े मल्होत्रा ने पूछा---
"क्या बात हुई?"
"वो दो हैं।"
"ओह... दो हैं।" मल्होत्रा के होंठों से निकला।
जगमोहन, मलिक की तरफ बढ़ गया, जो कि अम्बा के पास खड़ा था।
मल्होत्रा भी पीछे-पीछे आ गया।
सुदेश इस वक्त एक कार के पीछे वाली सीट पर लेटा था।
जगदीश जगमोहन के पास था।
"ये कहता है कि वैन के भीतर दो गनमैन हैं।" मल्होत्रा ने मलिक से कहा।
"हाँ, मैंने दोनों की आवाजें सुनी हैं।" मलिक ने गम्भीर स्वर में कहा।
"उनके दो होने से हमारे लिए समस्या बढ़ गई है।" अम्बा ने कहा।
मलिक ने जगमोहन को देखकर कहा---
"अब तुम क्या चाहते हो?"
"मुझे तो लगता है कि वो अपने इरादों के पक्के हैं। वैन से बाहर नहीं आने वाले।" जगमोहन बोला।
"उनका वैन से बाहर निकलना जरूरी है।" मलिक ने बेचैनी से कहा।
"आसान नहीं है उन्हें निकालना।"
"तुम कुछ करो...।"
"तुम पास ही थे जब उनसे बातें हुईं। तुमने सब सुना था।" जगमोहन गम्भीर स्वर में कह उठा।
"हम फायरिंग नहीं चाहते।"मलिक दाँत पीसकर कह उठा।
जगमोहन की निगाह, मलिक पर जा टिकी।
"फायरिंग क्यों नहीं चाहते?" जगमोहन ने पूछा।
"हम ना तो खुद मरना चाहते हैं और ना ही किसी की जान लेना चाहते हैं।"
जगमोहन के होंठ सिकुड़े। वो अजीब से लहजे में कह उठा---
"किसी की जान क्यों नहीं लेना चाहते?"
"हम हत्यारे नहीं हैं।"
"हत्यारे नहीं हो परन्तु देवराज चौहान का निशाना तो तुम इस तरह ले रहे थे जैसे तुम पेशेवर हत्यारे हो।"
मलिक ने गहरी साँस ली और जगमोहन को देखता गम्भीर स्वर में कह उठा---
"तब ऐसा दिखावा करना मजबूरी थी?"
"क्यों... कैसी मजबूरी थी?"
"तुम्हें इस काम के लिए तैयार जो करना था।"
"और जो देवराज चौहान पर आदमी लगा रखे...।"
"कुछ नहीं लगा रखा। वो सब तुम्हें सीधा रखने के लिए कहा था।"
जगमोहन के मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा।
"तो देवराज चौहान की निगरानी, तुम्हारे आदमी नहीं कर रहे?" जगमोहन के होंठों से निकला।
"नहीं।" मलिक मुस्कुरा पड़ा--- "हमें तो पता भी नहीं कि देवराज चौहान इस वक्त कहाँ है और क्या कर रहा है...।"
जगमोहन से कुछ कहते ना बना।
"ये सोचो कि वैन में मौजूद गनमैनों को कैसे बाहर निकालना है।" मलिक बोला।
"तुमने...।" जगमोहन बोला--- "मेरे साथ गलत किया, जो मुझे इस्तेमाल किया।"
"मैं पैसे नहीं लेना चाहता।" मलिक बोला--- "60 करोड़ तुम लोगों के हैं। मुझे कुछ और चाहिए, जो---।"
तभी मलिक का फोन बजा।
मलिक ने फोन निकाल कर बात की। दूसरी तरफ छाबड़ा था।
"साढ़े दस का वक्त हो चुका है मलिक और वैन...।"
"वैन आ गई है।" मलिक बात करते हुए कुछ कदम पीछे हट गया--- "तुम आ सकते हो।"
"गुड। खोला वैन को?" छाबड़ा का खुशी से भरा स्वर सुनाई दिया।
"खोला जा रहा है। अभी वक्त लगेगा।"
"मैं आता हूँ।"
मलिक ने फोन बंद करके जेब में रखा और पास आ गया।
अम्बा जगमोहन से कह रहा था---"तुम पुराने खिलाड़ी हो। तुम्हें मालूम होगा कि गनमैनों को बाहर निकालने के लिए क्या करना चाहिए।"
"तुम जाकर उनसे बात करो और उन्हें बाहर आने को कहो।" जगमोहन बोला।
"मेरी बात वो नहीं मानेंगे।"
"तो वो मेरी बात क्यों मानेंगे?" कहने के साथ ही जगमोहन वैन के पीछे वाले हिस्से की तरफ बढ़ गया।
मलिक धीमे स्वर में मल्होत्रा से बोला।
"इस पर नजर रखो...।"
मल्होत्रा जगमोहन की तरफ बढ़ गया।
◆◆◆