“देवराज चौहान भाई। नमस्कार।" आवाज सुनते ही कृष्णलाल ने देवराज चौहान को बोलने का मौका ही नहीं दिया "आज अखबार पढ़ना भूल गया। अभी पढ़ा। ये खबर पढ़ते ही कि कोई दरिया-ए-नूर को ले उड़ा है तो मैं समझ गया, वो अपने देवराज चौहान के अलावा दूसरा कोई नहीं हो सकता। कब लौटे ? "


"आज सुबह ही।" “वाह! तुमसे बात करके बोत मजा आ रहा है। मुझे फोन नहीं मारा।


"तुम्हें खबर करने की अभी जरूरत नहीं थी। "


"कैसे जरूरत नहीं थी। बाकी का चौबीस करोड़ तैयार करना है। कब मिल रहे हो। मैं...।"


"मेरे फोन का इंतजार करना।


"क्या मतलब?"


"हीरा मैं मुंबई ले आया था, लेकिन वो मेरे हाथ से निकल गया। " देवराज चौहान का स्वर शांत था।


दो पल के लिए कृष्णलाल की आवाज नहीं आई। 


"जो सच है, वो बोलो देवराज चौहान ।" कृष्णलाल के स्वर में उलझन थी।


"मैंने ठीक ही कहा है।"


"मेरे ख्याल में अखबार में उसकी कीमत पचास-साठ करोड़ पढ़कर, तुम्हारी नियत में फेर आ गया है और पच्चीस करोड़ तुम्हें कम लगने लगा है। यही सच बात है।"


देवराज चौहान के होंठों पर मुस्कान उभरी। 


"ऐसे मौके पर तुम्हारी जगह मैं होता तो शायद ऐसा कुछ ही सोचता। "


"मैंने ठीक कहा है। " 


"तुमने गलत कहा है। एक-दो दिन का इंतजार करो। हीरा तुम्हें मिलेगा।" । 


"मुझे तो नहीं लगता। क्या तुम हीरा पुनः पाने जा रहे हो?"


"हां। " 


"मतलब कि मालूम है कि दरिया-ए-नूर किसके पास है। 


“तुम्हें हीरा मिल जाएगा।" कहने के साथ ही देवराज चौहान ने रिसीवर रख दिया।


जगमोहन पास आया। 


"कृष्णलाल का फोन था ?" जगमोहन ने पूछा ।


जगमोहन गहरी सांस लेकर रह गया।


***


एक घंटे में ही बांकेलाल राठौर ने फाइल के पांच पेजों को इस तरह बना दिया जैसे वो वास्तव में नक्शा हो। कई जगह ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया कि कोर्ड-वर्ड लगे। इन शब्दों के पास इस तरह रेखाएं खींची गई थी कि जैसे खजाने तक जाने का रास्ता हो। 


"लिओ।" बांकेलाल राठौर का हाथ अपनी मूंछ पर जा

पहुंचा।


" मन्ने सिकन्दर के खजाने तको का रास्ता बनाया दयो हो। पण खजाने तक तो वो ही पोंचो, जो इसो को समझयो। मन्ने बना के जब म्हारे को न समझ में आवे तो किसो का समझ में आयो। म्हारा मतलब कि सिकन्दर के खजाने तक कोई न पोंचो। " 


देवराज चौहान ने फाइल में लगे उन पेजों को देखा जो बांकेलाल राठौर ने भरे थे। उन्हें देखते ही देवराज चौहान के चेहरे पर तसल्ली से भरे भाव नजर आने लगे


"गुड। ये तो वास्तव में कहीं का नक्शा लग रहा है। " देवराज चौहान ने कहा। "


"मने बनायो। पीठो पर थपकी मारो जरा।"


देवराज चौहान ने आगे बढ़कर फाइल वापस तिजोरी में रखी।


‘‘मोना चौधरी कहीं पर भी, हमसे चाल चल सकती है। "देवराज चौहान की निगाह सब पर दौड़ रही थी—"हो सकता है कि वो वहां इस तैयारी के साथ पहुंचे कि तिजोरी भी ले ले और हीरा भी न देना पड़े। यानी कि इन सब बातों को सामने रखते हुए ही, हमें तैयारी के साथ वहां पहुंचना है कि वो हमें किसी रूप में मात न दे सके। " 


"फिक्र कादी, सब नू 'वड' के रख दयागें ।" 


"बांके ने फाइल पर जो नक्शा बनाया है, क्या भरोसा, मोना चौधरी समझ जाए कि वो नकली नक्शा है। " जगमोहन की निगाह देवराज चौहान के चेहरे पर जा अटकी। 


"इस बात की सम्भावना पूरी है।" देवराज चौहान ने सिर हिलाया— "इसलिए हमें हर तरह की तैयारी के साथ मोना चौधरी से मिलना है। मामले का रुख किसी भी तरफ पलट सकता है। " 


"पूरी तैयारी होएला बाप।" रुस्तम राव ने अपना कान मसला । देवराज चौहान ने कर्मपाल सिंह को देखा।


"तुम बंगाली के द्वारा ये मालूम करने की कोशिश करो कि मोना चौधरी मुंबई में कहां रह रही है।


कर्मपाल सिंह ने फौरन सहमति में सिर हिलाया।


"मेरे को साथ चलने की जरूरत नहीं है?" सोहनलाल बोला। 


"नहीं। " देवराज चौहान ने सिर हिलाया "मैं, जगमोहन, बांके और रुस्तम राव जाएंगे।" कहते हुए देवराज चौहान के चेहरे पर सख्ती चली आई थी।


***


तीन बजे द्वारका का फोन आया शंकर भाई को। शंकर भाई तब बंगले पर वापस लौटा ही था।


"हां बोल द्वारका पता चल गया?


“अभी तो नहीं। "


“कमाल करता है तू। पांच घंटे बीत गए और बोलता है नहीं।" शंकर भाई के चेहरे पर सख्ती उभरी।


"वो जिसका लायसेंस आपने दिया था, उसके बारे में मालूम किया है। उसे लोग पाली के नाम से जानते हैं। पाली एक्सपर्ट ताला-तिजोरी तोड़ है। जहां वो रहता है, वहां नहीं मिला। कल शाम के बाद उसे किसी ने नहीं देखा।"


"उसके घर पर अपना बंदा बिठा दे।"


"बिठा दिया है।" 


"मालूम कर, वो किसके साथ काम कर रहा था। " शंकर भाई होंठ भींचकर बोला। 




“आदमी मालूम करने की कोशिश कर रहे हैं। " द्वारका की आवाज आई।


एक बात मेरे भेजे में नहीं आ रही द्वारका।


"वो क्या शंकर भाई "


"जब तिजोरी खोलने वाला साथ आया था तो फिर वो तिजोरी साथ क्यों ले गए।" शंकर भाई बोला।


"मैं भी यही सोच रहा "


"ज्यादा मत सोचा कर इसका एक ही मतलब हो सकता है। " शंकर भाई ने होंठ सिकोड़कर कहा "वो पाली घायल हो गया होगा। गोली-चोली लगी होगी। तब तिजोरी खोलने के लायक नहीं रहा होगा।"


"हां। यही बात होगी।"


"मेरी बात में ज्यादा हां मत मिलाया कर अपना दिमाग इस्तेमाल किया कर।"


"जी"


"वो घायल हुआ होगा तो कहीं न कहीं से उसने दवा-दारू भी ली होगी या फिर हो सकता है कि अभी भी वो किसी हस्पताल में पड़ा हो। अपने आदमी दौड़ा। सरकारी हस्पताल छोड़ देना। नर्सिंग होमों को चैक करो। वहां से उसने इलाज कराया होगा या अभी वहीं कहीं पड़ा होगा।"


“मैं अभी ये काम करता हूं।"


"और कुछ पता चला, पाली के साथ कौन था ?"


"नहीं। लेकिन तेजी से मालूम किया जा रहा है।"


“जल्दी कर और वो तिजोरी मुझे हर हाल में चाहिए। खाली हो । भरी हो। टूटी-फूटी हो। लेकिन उस तिजोरी को तुमने हर हाल में, कहीं से भी मेरे सामने लाना है। " शंकर भाई की आवाज बेहद कठोर हो चुकी थी।


"इस काम पर मैंने आदमी दौड़ा रखे।"


"तू भी आदमियों के साथ दौड़। समझा क्या?" दांत भींचकर शंकर भाई ने फोन बंद कर दिया और बड़बड़ाया "सुसरे जाएंगे कहां। एक-एक को गर्दन से न पकड़ा तो मेरी ताकत मिट्टी हो गई समझो।


***


पाली को दोपहर दो बजे होश आया। दवा की वजह से वो गहरी नींद में था। उसने खुद को बिस्तरें पर पड़े पाया। तभी कमरे में मोना चौधरी ने प्रवेश किया।


"होश में आ गए पाली।" मोना चौधरी मुस्कराई।


"हां। " पाली के होंठों से कमजोर सी आवाज निकली। 


"तुम्हारा खून बहुत बह गया था। हिम्मत वाले हो। कोई कमजोर बे-हिम्मती इंसान होता तो शायद बच न पाता। पारसनाथ ने बताया था कि गोली कंधे के भीतर तक धंसी हुई थी। जख्म गहरा है।"


पाली के होंठों पर शांत मुस्कान उभरी। "


कुछ दिन लगेंगे, ठीक हो जाओगे।" मोना चौधरी भी मुस्कराई— "कुछ खा लो, फिर पारसनाथ तुम्हें दवाई देगा।" 


"तिजोरी मिली?"


“मिली भी नहीं भी।


"क्या मतलब ?"


मोना चौधरी ने उसे सब कुछ बताया कि बाद में क्या हुआ। 


"ओह। " पाली के होंठों से गहरी सांस निकली।


“यह तो अच्छा हुआ कि देवराज चौहान का कीमती हीरा हमारे हाथ लग गया। वरना हमें हार का मुंह देखना पड़ता। " 


"तो शाम को तुम देवराज चौहान से मिल रही हो।" 


"हां। चार बजे।"


"सावधान रहना। देवराज चौहान बहुत खतरनाक इंसान है।" पाली ने उसे आगाह किया।


जवाब में मोना चौधरी मुस्कराई और कमरे से बाहर, दूसरे कमरे में पहुंची। जहां पारसनाथ महाजन और बंगाली मौजूद था। उन्होंने मोना चौधरी को देखा।


"पाली को होश आ गया है। उसे दवा दे देना।" मोना चौधरी ने कहा।


पारसनाथ ने सहमति में सिर हिलाया। 


"बेबी। " महाजन ने घूंट भरा-"तो तुमने सोच लिया कि पचास-साठ करोड़ का हीरा देवराज चौहान को देना है। "


महाजन ने पारसनाथ को देखा।


"मेरा मन तो नहीं मानता।" जवाब में पारसनाथ के खुरदरे चेहरे पर मुस्कान उभरी। बोला कुछ नहीं।


महाजन की निगाह पुनः मोना चौधरी पर आ टिकी। "वेबी। कोई ऐसा रास्ता निकालो कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।"


"तुम्हारा मतलब कि फाइल भी मिल जाए और हीरा भी अपने पास रहे।" 


"हां। यही मैं कहना चाहता था।" महाजन जल्दी से बोला।"


कोई और होता तो मैं सौदेबाजी में शायद हेराफेरी न करती। लेकिन देवराज चौहान के मामले में मुझे हेराफेरी करने पर कोई एतराज नहीं। जैसे भी हो, मैं उसे हारा देखना चाहती हूं।" कहते हुए मोना चौधरी की आवाज में कठोरता आ गई थी- "ये सब कैसे करोगे महाजन -।


"बेबी, हीरा तो हमने दबा ही रखा है। मेरी मानो तो भाग लो।" महाजन ने कहा।


बंगाली ने बेचैनी से पहलू बदला।


"ऐसा किया जाए तो कोई हर्ज नहीं है लेकिन बंगाली को फाइल मिलनी भी जरूरी है। "


बंगाली के चेहरे पर राहत के भाव नजर आए।


मोना चौधरी के चेहरे पर गंभीरता आ गई थी। पारसनाथ शांत भाव से दोनों को देख रहा था।


"महाजन। मैं ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती कि सीधे-सीधे मेरे पर झूठा होने का इलजाम लगे। हीरे की और तिजोरी की अदला-बदली होगी। इस बीच तुम कोई रास्ता निकाल सकते हो तो निकाल लो। रास्ता भी इस तरह कि लगे, मैं इस मामले में तुम्हारे साथ नहीं।"


"ऐसा कुछ हो सकती है बेबी।"


"क्यों नहीं हो सकता।"


"मैं हर कदम पर तुम्हारे साथ हूं। ऐसे में मैं जो भी करूंगा। नाम तुम्हारा ही होगा।"


"महाजन ठीक कहता है और मोना चौधरी को भी ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए कि झूठ का दाग चेहरे पर लगे। उधर देवराज चौहान भी जब मिलेगा तो पूरी तैयारी के साथ होगा। " पारसनाथ ने सपाट स्वर में कहा—"बेहतर यही है कि ये सौदा आराम से हो जाए।'


मोना चौधरी ने महाजन को देखा।


महाजन कंधे उचकाकर रह गया।


"पारसनाथ ठीक कह रहा है।" मोना चौधरी बोली –"इस

वक्त ये काम निपट ही जाए तो बेहतर होगा तिजोरी वापस करने में ही देवराज चौहान का सिर नीचे हो जाएगा।"


"साठ करोड़ गंवाकर तुम सिर नीचे-ऊपर होने की बात कर रही हो। मेरी समझ से तो बाहर की बात है। कोई मुझे साठ करोड़ दे तो मैं सारी उम्र ही अपना सिर नीचे रखूं। "महाजन ने मुंह बनाकर कहा और बोतल से एक साथ दो तगड़े घूंट भरे। मोना चौधरी ने पारसनाथ से कहा। "


"तैयारी पूरी करके चलना है पारसनाथ। "


तभी बंगाली बोला।


"हीरा देने से पहले चैक कर लेना कि फाइल असली है या कोई गड़बड़ है। "


"ये चैक करने के लिए तुम हमारे साथ ही होंगे बंगाली।"


***


खंडाला जाने वाली सड़क के किनारे तीसरे मील का पत्थर लगा था। शाम के चार बज रहे थे। खुशगवार मौसम था। ठण्डी हवाओं के आने-जाने का सिलसिला जारी था।


देवराज चौहान ने चार बजकर पांच मिनट पर सड़क के किनारे तीसरे मील के पत्थर के पास कार रोकी और बाहर निकलकर सिगरेट सुलगाते हुए आसपास निगाह मारी।


सब कुछ शांत नजर आया।


लेकिन वो जानता था कि कुछ भी शांत नहीं है।


मोना चौधरी के साथ जो भी लोग होंगे, वो इधर-उधर छिपे उस पर नजर रख रहे होंगे। जिस तरह उसके साथी इधर-उधर फैले हुए थे।


भीतरी माहौल बिलकुल अशान्त था।


देवराज चौहान कार से टेक लगाकर खड़ा कश लेता रहा। वह जानता था कि मोना चौधरी कहीं पास ही में है। जब उसको हरी झंडी मिलेगी तो वो वहां पहुंचेगी।


करीब सात-आठ मिनट बाद मोना चौधरी की कार वहां पहुंची। कार देवराज चौहान के पास आकर ही रुकी। वो बाहर निकली। दोनों की नजरें मिलीं।


दोनों के चेहरों पर ही किसी तरह का भाव नहीं था। वो जुदा बात थी कि उनके भीतर कोई उफान उठ रहा हो। परंतु वो उफान चेहरे पर नजर नहीं आ रहा था।"


“तिजोरी कहां है?" मोना चौधरी का स्वर शांत था। 


“कार की डिग्गी में। " देवराज चौहान ने सपाट स्वर में कहा। 


मोना चौधरी के होंठों पर शांत मुस्कान उभरी। "तिजोरी तुम्हारी वजह से ही मेरे हाथ से निकली थी।" मोना 

चौधरी बोली। 


"हाँ।"


देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई।


"और अब तुम खुद ही उसे लेकर मेरे पास आए हो। "


"हाँ।"


"इसे एक तरह से 'हार' कहते हैं। "


"नहीं। मेरी निगाहों में इसे समझदारी कहते हैं। " देवराज चौहान की निगाह मोना चौधरी पर थी।


‘‘अपनी 'हार' को समझदारी में बदलने की कोशिश मत करो देवराज चौहान।"


"अभी ऐसा कुछ नहीं हुआ कि मुझे मुंह छिपाने की जरूरत पड़े। " देवराज चौहान मुस्कराया—"हो सकता है मेरी निगाहों में तिजोरी की कम और हीरे की कीमत ज्यादा हो। "


"मैं तो सिर्फ इतना जानती हूं कि वजह बेशक कोई भी रही हो। जो तिजोरी तुम्हारी वजह से मेरे हाथों से निकली वही तिजोरी बाद में तुम ही मेरे हवाले करने आए हो। "


"इसमें कोई शक नहीं। " देवराज चौहान के होंठों पर मुस्कान उभरी।


“डिग्गी खुली पड़ी है। उठाने की जरूरत है। लेकिन पहले वो हीरा दिखाओ।"


डिग्गी खोलो।"


मोना चौधरी ने अपने कपड़ों में हाथ डाला थैली निकाली। 


“यही थैली थी?" मोना चौधरी ने थैली को हथेली पर उछाला। 


"हीरा ?"


मोना चौधरी ने थैली खोली। हीरा निकाला। दो उंगलियों से पकड़कर ऊंचा किया।


"देख लो।"


वास्तव में वहीं, दरिया-ए-नूर हीरा था वह हीरे को लेकर कोई चालाकी नहीं की गई थी। वहीं खड़े देवराज चौहान ने सहमति भरे भाव में सिर हिलाया तो मोना चौधरी ने हीरा वापस थैली में डालकर, थैली वापस रख ली फिर देवराज चौहान की कार की डिग्गी की तरफ बढ़ी।


डिग्गी को खोला।


वहां तिजोरी पड़ी थी। मोना चौधरी ने चैक किया। तिजोरी खुली पड़ी थी। 


"साहनलाल ने खोली होगी तिजोरी।" मोना चौधरी तिजोरी  का दरवाजा खोलते हुए बोली ।


"हां। " देवराज चौहान उसी मुद्रा में खड़ा कश लेता रहा। तिजोरी के भीतर निगाह पड़ते ही मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ीं।


"बस यही था तिजोरी में?" 


"हां"


"तुम्हारा मतलब कि दौलत के नाम पर एक रुपया भी नहीं था तिजोरी में ?"


“नहीं। जब तुमसे तिजोरी ली गई। उस वक्त जो तिजोरी में था। वही सब अब तुम्हें नजर आ रहा है। कुछ निकाला या डाला नहीं गया। " देवराज चौहान ने उसे देखा। 


मोना चौधरी ने तिजोरी में रखी फाइल निकाली और उसके पन्ने पलटने लगी। उस खाली फाइल में वो ही पांच कागज भरे हुए थे, जो बांकेलाल राठौर ने बनाए थे। जो कि नक्शे जैसे लग रहे थे। उन कागजों को देखने के बाद मोना चौधरी ने देवराज चौहान को देखा। "तुमने फाइल देखी थी?"


"हां। लेकिन मेरा असल ध्यान हीरे की तरफ था। फाइल चैक कर लो।"


"मैं इस फाइल के बारे में खास कुछ नहीं जानती। जो जानता है, उसे बुलाना पड़ेगा।" मोना चौधरी ने कहा।


"बुला लो।" मोना चौधरी ने हाथ उठाकर खास अंदाज में हिलाया तो सड़क की जंगल जैसी ढलान से निकलकर बंगाली वहां आ पहुंचा।


"लो बंगाली फाइल देख लो। "


बंगाली ने जल्दी से फाइल ली। देखी। उन पांच कागजों को देखा, जहां बांकेलाल राठौर ने अपनी कारीगरी दिखाई थी। बंगाली की आंखों में तीव्र चमक उभर आई।


"ये ही है, वो फाइल – ।"


"पक्का?'


"हां। मैंने फाइल देखी तो नहीं लेकिन मरते वक्त पाटिल ने जो बताया था। उस हिसाब से यही फाइल है वो। " बंगाली की आवाज में खुशी फूट-फूटकर भरी हुई थी।


"ठीक है। तुम जाओ।"


बंगाली फाइल लेकर जाने लगा तो देवराज चौहान ने टोका।


“फाइल यहां से नहीं जाएगी। पहले हीरा इधर करो।"  देवराज चौहान का स्वर सपाट था।


बंगाली ठिठका।


मोना चौधरी के होंठों पर तीखी मुस्कान उभरी।


कोई जरूरी नहीं कि हीरा तुम्हें दिया जाए।


"तो फिर फाइल को वापस तिजोरी में रख दो। हम जैसे आए थे, वैसे ही चले जाएंगे। " देवराज चौहान भी मुस्कराया।


"अगर तुम्हारी ये बात भी न मानी जाए तो?" 


देवराज चौहान मन ही मन सतर्क हुआ।


"तो फिर तुम जो भी कोशिश करना चाहती हो, कर लो। फाइल या हीरा, एक चीज तुम्हें यहीं छोड़कर जानी पड़ेगी।" देवराज चौहान का पक्का स्वर सपाट था।


मोना चौधरी मुस्कराई। उसने वो काली थैली निकाली और देवराज चौहान की तरफ उछाल दी। देवराज चौहान ने थैली को थामा। उसे खोला। देखा भीतर दरिया-ए-नूर ही था। उसने थैली बंद की और जेब में डालकर मोना चौधरी को देखा।


"फाइल वापस लौटाने का शुक्रिया देवराज चौहान कम से कम यह बात तो तुम्हें हमेशा याद रहेगी कि जो चीज तुम्हारी वजह से मेरे हाथों से निकली, उसे तुम्हीं मेरे पास लेकर आए।"


देवराज चौहान मुस्कराया और शांत स्वर में बोला।


"मोना चौधरी।" आवाज में शांत भाव थे— "इत्तफाक से मेरा हीरा तुम्हारे पास आ गया था और कुछ ऐसे ही इत्तफाक के तहत, तुम्हारी तिजोरी मेरे पास आ पहुंची। हमने एक-दूसरे की चीज को वापस करके बदले हुए हालातों को अपने हक में कर लिया है। मुझे आशा है कि इस सिलसिले में अब हमारी बात नहीं होगी। हमारा वास्ता नहीं पड़ेगा।"


"ठीक कहते हो देवराज चौहान ये बात यहीं खत्म होती है। लेकिन हमारी मुलाकात तो हर हाल में होगी ही। इस सिलसिले में नहीं तो किसी और सिलसिले में, लेकिन मुलाकात होगी।" कहते हुए मोना चौधरी के होंठों में कसाव आ गया था ।


"वैसे मैं हैरान हूं कि इस बार सब कुछ ठीक-ठाक कैसे निपट गया?"


"लेकिन मुझे कोई हैरानी नहीं है।" देवराज चौहान ने उसे देखा "दो बातों में से एक ही बात होती है या तो मामला ठीक तरह से निपट जाता है या नहीं निपटता। लेकिन ये मुलाकात ठीक रही अब तुम यहां से पहले जाओगी या मैं निकल जाऊं।"


"पहल तुम आए । लेकिन जाऊंगी मैं।" मोना चौधरी ने कहा।


देवराज चौहान ने सहमति में सिर हिला दिया। देखते ही देखते मोना चौधरी कार में बैठी बंगाली उसकी बगल वाली सीट पर बैठ गया। फाइल तो जैसे उसने छाती से लगा रखी थी। कार स्टार्ट करने के बाद मोना चौधरी ने उसे बैक किया और देखते ही देखते तेज रफ्तार से, निगाहों से ओझल होती चली गई। देवराज चौहान सतर्क था।


असल खतरा तो अब था। हो सकता था मोना चौधरी के साथ आए लोग, जो करीब ही कहीं छिपे हों। वे हीरा पाने के लिए उस पर हमला बोल दें।


देवराज चौहान की निगाह हर तरफ फिरती रही। लेकिन कुछ नहीं हुआ । सब ठीक रहा। मतलब कि मोना चौधरी ने बिना किसी चालाकी के हीरे की और तिजोरी में मौजूद फाइल की अदला बदली की थी।


देवराज चौहान खुली डिग्गी के पास पहुंचा। तिजोरी सामने पड़ी थी, जिसे हाथ से सरकाकर डिग्गी से बाहर नीचे गिराया और डिग्गी बंद कर दी। फिर कार में बैठा। कार स्टार्ट करके बैक की। सिगरेट सुलगाई। तभी एक तरफ से बांके, दूसरी तरफ रुस्तम और तीसरी तरफ से जगमोहन निकलकर कार में आ बैठे।


देवराज चौहान ने कार आगे बढ़ा दी।


"मामला आराम से निपट गया। " जगमोहन बोला-"वो हीस तो असली है ना ?"


"हां" कहने के साथ ही देवराज चौहान ने थैली निकालकर जगमोहन को थमाई- "इसे कृष्णलाल तक पहुंचा दो।"


जगमोहन ने थैली संभाली।


"पहुंचा दूं। लेकिन बाकी के चौबीस-1"


"वो कहीं नहीं जाने वाला पहले हीस उस तक पहुंचाओ। मोना चौधरी को जल्द ही इस बात का एहसास हो जाएगा कि फाइल पर जो नुक्शा बना है। वो आंखों को धोखा देने के लिए है। " देवराज चौहान ने गंभीर स्वर में कहा।


"लेकिन हमने कोई धोखेबाजी तो नहीं की। " जगमोहन ने कहा- "फाइल में तिजोरी में कोई नक्शा था ही नहीं तो उसे विश्वास दिलाने के लिए नक्शा बना दिया। ताकि फाइल और हीरे का लेन-देन आसानी से हो जाए। "


"तुम ठीक कहते हो। लेकिन ये बात खुलने पर कि नक्शा नकली है, मोना चौधरी खुद को ठगी महसूस करेगी। वो यही सोचेगी कि उसे बेवकूफ बनाया गया है। असल नक्शा हमने रख लिया है। "


"मन्ने बनायो वो सिकंदर के खजानों का नक्शो। " बांकेलाल राठौर मुस्कराया—"जो किसी को समझ में न आयो। पण एक बात तो उस बंगाली की खोपड़ी के भीतर आयो ही आयो।


"क्या बाप?"


"उसो नक्शो में, अंमने बंगाली के लिए, बंगलो भाषों में मैसेज़ दयो। वो पढ़ो तो अपणों सिर पीटो। "


"क्या लिखा है तुमने?" जंगमोहन के होंठों से निकला।


"बाप तू तो रगड़ा कराएला।" रुस्तम राव ने उसे घूरा "वो तो बंगाली ही जानो कि अंमने का मैसेज दयो। यो थारे काम. की बात न हौवो। "


जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।


"बांके ने कोई गड़बड़ कर दी है। " जगमोहन का स्वर तेज था। जवाब में देवराज चौहान के होंठों पर अजीब सी मुस्कान ही नाच कर रह गई।


"का फिक्र करो हो गड़बड़ो की जो म्हारो रास्तों में आयो उसो को वड़ के रख दयो।" कहते हुए बांकेलाल राठौर का हाथ मूंछ पर पहुंचा और उसे उमेठने लगा।


***