हिटलर बना चांसलर
जब एडोल्फ हिटलर ने चांसलर बनने के लिए राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडेनबर्ग के कार्यालय में प्रवेश किया, वयोवृद्ध हिंडेनबर्ग उस समय इतने गुस्से में था कि उसने हिटलर की ओर देखा तक नहीं।
उससे इंतजार करवाया गया, जबकि हिटलर और कंजर्वेटिव नेता सेंफ्रेड ह्यूजेनबर्ग हिटलर के नए चुनाव कराने की माँग पर बहस करते रहे। बहस के अंतिम दौर में राजनीतिक स्तर पर हर दर्जे की अंदरूनी लड़ाई और पीठ पीछे वार करने की साजिश के फलस्वरूप एडोल्फ हिटलर जर्मनी का चांसलर बन गया।
जर्मनी ऐसा राष्ट्र था, जिसे लोकतंत्र का न तो अनुभव था और न ही लोकतंत्र में कोई दिलचस्पी थी। जनवरी 1933 में एडोल्फ हिटलर ने उस 14 वर्षीय जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य की बागडोर सँभाली, जिसमें बहुत से ऐसे लोग थे जिनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी थी। उस समय तक महामंदी के कारण उत्पन्न आर्थिक दबावों और निर्वाचित राजनीतिज्ञों की ढुलमुल एवं आत्मोपकारी प्रवृत्ति के चलते जर्मनी की सरकार पूरी तरह निष्क्रिय हो गई थी। लोगों के पास काम नहीं था, खाना नहीं था। उनके मन में भय समा चुका था और वे राहत पाने के लिए व्याकुल थे।
अब वही व्यक्ति उस देश का नेता था, जिसने अपना सारा राजनीतिक जीवन गणराज्य की निंदा करने और उसे नष्ट करने के प्रयासों में लगाया था। 30 जनवरी को दोपहर के आस-पास हिटलर को शपथ दिलाई गई।
‘‘मैं अपनी पूरी शक्ति का उपयोग जर्मन जनता के कल्याण के लिए करूँगा, संविधान और जर्मन जनता के कानूनों की रक्षा करूँगा। मुझे सौंपे गए कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करूँगा और अपने पद से संबंधित कार्यों का संचालन निष्पक्षता एवं सबके साथ न्याय करते हुए करूँगा।’’ हिटलर ने यह शपथ ली थी।
लेकिन पिछले चांसलरों ने हताशा के कारण और वैयक्तिक आकांक्षाओं की वजह से इस शपथ को बार-बार भंग किया था। चांसलर श्लाइशर और चांसलर पपेन ने गंभीरतापूर्वक यह सुझाव दिया था कि राजनीतिक गतिरोध के संकट को दूर करने के लिए गणराज्य को ही समाप्त कर दिया जाए और उसकी जगह सैनिक तानाशाही कायम की जाए। लेकिन हिंडेनबर्ग ने उन दोनों के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।
जब अश्रुपूरित एडोल्फ हिटलर नए चांसलर के रूप में राष्ट्रपति भवन से बाहर आया, उस समय उसका जय-जयकार करनेवाले नाज़ी और उसके समर्थक वही लोग थे, जो हिटलर में विश्वास रखते थे, न कि संविधान या गणराज्य में।
‘‘हमने यह करके दिखा दिया है।’’ हिटलर ने उल्लास भरे शब्दों में चिल्ला कर उन्हें बताया।
अब वह उस मंत्रिमंडल का अध्यक्ष था, जिसमें एक वह स्वयं था और 11 पदों में से केवल 3 पद नाज़ियों के पास थे। हरमैन गोरिंग बिना विभाग का मंत्री था और प्रशिक्षा का आंतरिक कार्य मंत्री। नाज़ी विल्हैल फ्रिक को आंतरिक कार्य मंत्री बनाया गया था। कैबिनेट में नाज़ियों की संख्या इसलिए कम रखी गई थी, ताकि हिटलर पर अंकुश रखा जा सके।
फ्रांज वॉन पपेन वाइस-चांसलर बना। हिंडेनबर्ग ने उसे कहा था कि हिटलर को राष्ट्रपति कार्यालय में तभी आने दिया जाएगा, जब पपेन उसके साथ होगा।
हिटलर को अंकुश में रखने का यह एक दूसरा उपाय था। वास्तव में पपेन का अपना भी यही इरादा था कि वह मंत्रिमंडल में कंजर्वेटिव सदस्यों के बहुमत और अपनी राजनीतिक निपुणताओं का उपयोग करते हुए खुद सरकार चलाए।
पपेन ने एक राजनीतिक सहकर्मी के सामने डींग मारते हुए कहा था, ‘‘दो महीनों के अंदर हम हिटलर को इतनी दूर के कोने में धकेल देंगे कि वह चीं-चीं करने लगेगा।’’
पपेन और अनेक गैर-नाज़ियों का विचार था कि हिटलर का चांसलर बनना उनके लिए फायदेमंद होगा। पूर्व कुलीन शासक वर्ग चाहता था कि गणतंत्र को समाप्त किया जाए और ऐसी अधिकारवादी शासन-प्रणाली वापस लाई जाए, जो जर्मनी को खोई प्रतिष्ठा और उनके विशेषाधिकार उन्हें लौटा सके। वे जर्मन सम्राट् के दिनों को वापस पाना चाहते थे। उनकी नजर में हिटलर को सत्ता की गद्दी पर बिठाना उस लक्ष्य की ओर बढ़ने का पहला कदम था। वे समझते थे, इस बात की बहुत संभावना है कि वह गणराज्य को नष्ट कर देगा। एक बार गणराज्य समाप्त हो जाए तो वे अपनी पसंद के किसी व्यक्ति, संभवत: सम्राट् के किसी वंशज को उसकी जगह बिठा देंगे।
बड़े बैंकरों और उद्योगपतियों ने हिंडेनबर्ग पर इसलिए दबाव डाला था और हिटलर की तरफदारी करने की गुप्त योजना बनाई थी, क्योंकि उन्हें यकीन था कि उसके रहने से व्यवसाय में लाभ होगा। उसने मुक्त उद्यम का पक्ष लेने और साम्यवाद तथा मजदूर संघ (ट्रेड यूनियन) आंदोलनों को नियंत्रण में रखने का वचन दिया था।
सेना ने भी हिटलर पर अपना दाँव लगाया और उसके बार-बार किए गए इन वादों में विश्वास किया कि वह वर्सेलिस संधि को खारिज कर देगा और सेना को उसकी खोई प्रतिष्ठा वापस दिलाएगा।
उन सबकी सोच में एक बात सामान्य थी—वे हिटलर को कम आँक रहे थे।
30 जनवरी की शाम को ‘एस ए.’ और ‘एस.एस.’ का प्रत्येक सदस्य नए फ्यूहरर-चांसलर एडोल्फ हिटलर का जश्न मनाने के लिए वरदी पहनकर आ गया। हाथों में मशाल लिये और हॉर्स्ट वैसल का गीत गाते हुए जब वे ब्रांडेनबर्ग गेट और विल्हैम स्ट्रॉस से होते हुए राष्ट्रपति निवास की ओर जा रहे थे तो रास्ते में हजारों लोगों ने उनका उत्साहवर्धन किया। गश्ती सिपाहियों ने भी स्वस्तिक बाजूबंद पहन लिये और उनकी ओर मुसकाए, जबकि पहले यही सिपाही उन्हें तंग किया करते थे। फुल बूटों और ढोलों की लयपूर्ण थाप और सैनिक परेड का तेज संगीत कहीं भी सुना जा सकता था।
उन्होंने राष्ट्रपति निवास की खिड़की से नीचे झाँकते हिंडेनबर्ग को सैल्यूट किया। फिर उन्होंने चांसलरी में हिटलर की प्रतीक्षा की। इस कार्यक्रम की योजना जोसेफ गॉबेल्स ने बनाई थी। पूरा दृश्य बड़ा ही शानदार था। हजारों लोग जलती मशालें हाथ में लिये, जिनकी झिलमिलाती रोशनी में लाल और सुनहरे नाज़ी झंडे चमक रहे थे, ढोल की मंद-मंद ध्वनि के बीच फ्यूहरर का दर्शन पाने की आशा में प्रतीक्षा कर रहे थे। एस.ए. और उसके साथ-साथ पुरुष, औरतें तथा बच्चे भी इंतजार कर रहे थे। हिटलर ने उन्हें इंतजार करने दिया, बेचैनी को बढ़ने दिया। पूरे जर्मनी में लोग रेडियो पर कान लगाए बैठे थे और सुन रहे थे कि किस तरह लोग अपने फ्यूहरर की प्रतीक्षा में व्याकुल होकर उसके दर्शन की पुकार लगा रहे थे।
जब वह एक प्रकाश-बिंदु की किरण में सामने आया, लोग इस कदर अपना प्यार और अपनी श्रद्धा उस पर बरसाने लगे, जैसा जर्मनी में पहले कभी नहीं देखा गया था। बिस्मार्क, महान् फ्रेडरिक या सम्राट् ने भी ऐसा जोश नहीं देखा था।
‘‘धन्य हो यह विजय!’’ वे लोग समवेत स्वर में चिल्ला रहे थे, जिन्हें विश्वास था कि उस व्यक्ति के रूप में हमारा मुक्तिदाता आ गया है, जो ऊपर से उनपर दृष्टिपात कर रहा था।
हिटलर के एक पुराने साथी ने राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग को नए चांसलर के बारे में एक तार भेजा। पूर्व जनरल एरिक ल्यूडेंड्रॉफ ने कभी हिटलर का समर्थन किया था और सन् 1923 में विफल बीयर हॉल क्रांति में भी उसने भाग लिया था।
कुछ ही सप्ताह के अंदर हिटलर जर्मनी का अबाधित तानाशाह बन गया। उसने ऐसी घटनाओं का सिलसिला शुरू किया, जिनकी परिणति दूसरे विश्व युद्ध में हुई और जिसके फलस्वरूप युद्ध और विध्वंस के जरिए करीब 5 करोड़ लोग मारे गए।
सबसे पहले तो हिटलर ने जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य को वास्तव में आग की लपटों में झोंक दिया। फरवरी 1933 में नाज़ियों ने राइचस्टैग भवन को जलाने और लोकतंत्र को हमेशा के लिए मिटा देने की साजिश रची।
राइचस्टैग (जर्मन लोकसभा) भस्म
जर्मनी के नए चांसलर एडोल्फ हिटलर का लोकतंत्र के नियमों के अनुसार चलने का कोई इरादा नहीं था। वह उन नियमों का उपयोग स्वयं को यथाशीघ्र न्यायसंगत ढंग से तानाशाह के रूप में स्थापित करने और फिर नाज़ी क्रांति की शुरुआत करने हेतु करना चाहता था।
उसको शपथ दिलाए जाने से पहले ही वह नए चुनावों की माँग करके उस लक्ष्य की ओर कदम बढ़ा चुका था। हिंडेनबर्ग जब एक दूसरे कमरे में बेचैनी से इंतजार कर रहा था, हिटलर कंजर्वेटिव नेता ह्यूजेनबर्ग के साथ बहस में उलझा रहा, जो उसकी योजना के सख्त खिलाफ था। हिटलर की योजना राइचस्टैग में निर्वाचित नाज़ी सदस्यों का बहुमत स्थापित करना था, ताकि जर्मन लोकसभा सिर्फ एक रबड़ की मुहर बनकर रह जाए और वह अपनी मरजी के मुताबिक कोई भी कानून पास करा सके, वह भी पूरे वैध रूप से।
चांसलर का पद सँभालने के पहले दिन ही हिटलर ने चालाकी से हिंडेनबर्ग को राइच्स्टैग भंग करने और नए चुनाव कराने के लिए राजी कर लिया। चुनाव 5 मार्च, 1933 को होने थे।
उस शाम हिटलर ने जर्मन जनरल स्टाफ के साथ डिनर किया और उन्हें बताया कि जर्मनी विश्व में अपनी पहलेवाली जगह दुबारा हासिल करने के लिए सबसे पहले अस्त्र-शस्त्र का भंडार बढ़ाएगा। उसने आगे के घटनाक्रम की ओर भी पक्का इशारा कर दिया, उन्हें यह बताकर कि पूर्व के देशों को जीतकर जर्मनी के अधीन किया जाएगा और जीते गए प्रदेशों का बेरहमी से जर्मनीकरण किया जाएगा।
हिटलर ने जनरलों को पुन: आश्वस्त किया कि नियमित सेना की जगह एस.ए. तूफानी दस्तों को देने की कोई कोशिश नहीं की जाएगी। जनरलों को वर्षों से यह चिंता रही थी, क्योंकि वे अपने शक्तिशाली पदों को बचाए रखना और पारंपरिक सेना को सुरक्षित बनाए रखना चाहते थे।
हिटलर के तूफानी दस्ते, अपनी ही शक्ति की ऊँचाइयों को छूने जा रहे थे और उन्होंने आतंक का ऐसा खेल आरंभ किया, जो राइक* (जर्मन राज्य) का वजूद रहने तक जारी रहना था।
राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग हिटलर के प्रभाव में आ गया था और उसके सामने जो कुछ भी लाया जाता, वह उस पर बेहिचक दस्तखत कर देता। उसने एक आपातकालीन आदेश जारी किया, जिसके तहत जर्मनी का प्रशिया राज्य हिटलर के विश्वासपात्र वाइस चांसलर पपेन के हाथों में सौंप दिया गया। प्रशिया जर्मनी का सबसे बड़ा और अत्यधिक महत्त्वपूर्ण राज्य था और राजधानी बर्लिन भी उसमें शामिल थी।
गोरिंग ने तत्काल सैकड़ों पुलिस अधिकारी हटा दिए, जो रिपब्लिक के प्रति वफादार थे। उनकी जगह हिटलर के प्रति निष्ठावान् नाज़ी अधिकारी तैनात कर दिए गए। उसने पुलिस को यह भी आदेश दिया कि एस.ए. और एस.एस. के कार्य में किन्हीं भी परिस्थितियों में दखल न दिया जाए। इसका मतलब था कि अगर नाज़ियों द्वारा किसी को तंग किया जाए, मारा-पीटा जाए या किसी की हत्या की जाए, तब भी वह किसी की मदद न ले सके।
गोरिंग ने पुलिस को यह भी आदेश दिया कि राज्य के प्रति वैरभाव रखनेवाले किसी भी व्यक्ति के साथ कोई नरमी न बरती जाए। इसका सीधा सा अर्थ यह था कि हिटलर के प्रति द्वेष रखनेवाले, विशेषकर कम्युनिस्ट, खतरे में थे।
22 फरवरी को गोरिंग ने 50,000 जवानों के एक सहायक पुलिस बल का गठन किया, जिसमें अधिकतर एस.ए. और एस.एस. के सदस्यों को लिया गया था। बेहूदे, झगड़ालू, खूनी नाज़ी तूफानी दस्तों को पुलिस के अधिकार मिल गए थे।
दो दिन बाद उन्होंने बर्लिन में कम्युनिस्ट मुख्यालय पर धावा बोल दिया। गोरिंग ने झूठा दावा किया कि उसने छापे में कम्युनिस्टों की बगावत का भंडाफोड़ किया है। जबकि वास्तविकता यह थी कि कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों की सूची उसके हाथ लगी थी और वह उन 4,000 सदस्यों में से हर एक को गिरफ्तार करना चाहता था।
गोरिंग और गॉबेल्स ने, हिटलर की मंजूरी से, तब राइचस्टैग भवन को आग लगाकर तहलका मचाने और उसके लिए कम्युनिस्टों को दोष देने की साजिश रची। राइचस्टैग भवन बर्लिन में था, जहाँ गणराज्य के निर्वाचित सदस्य बैठते थे और सरकार के दैनिक कार्य-व्यापार का संचालन करते थे।
यह भी एक अजीब संयोग था कि बर्लिन में एक सनकी किस्म का कम्युनिस्ट अकेले ही बगावत करने में लगा हुआ था। घर फूँक तमाशा देखने वाला मारीन्स वान डेर लुब्बे नामक यह 24 वर्षीय हॉलैंडवासी एक सप्ताह से बर्लिन के चक्कर लगा रहा था और पूँजीवाद का विरोध करने तथा विद्रोह की चिंगारी सुलगाने के इरादे से सरकारी इमारतों को आग लगाने का प्रयास कर रहा था। 27 फरवरी को उसने राइचस्टैग भवन को जलाने का निश्चय किया।
दाहक वस्तुओं से लैस होकर पूरे दिन वह उस भवन के आस-पास घूमता रहा और रात 9 बजे के करीब बिल्डिंग में घुस गया। उसने अपनी कमीज उतारी, कमीज को जलाया और फिर उसे एक मशाल की तरह इस्तेमाल करते हुए अपने काम में जुट गया।
घटनाक्रम का सही ब्योरा तो शायद कभी नहीं मिल पाएगा, लेकिन यह संदेह अवश्य है कि गोरिंग के अंतर्गत काम कर रहे नाज़ी तूफानी दस्तों के सदस्य भी उस आगजनी में शामिल थे। उन्होंने उस आग लगानेवाले से दोस्ती कर ली थी और हो सकता है, उन्हें उसके इरादे की जानकारी हो या उन्होंने ही उसे उस रात राइच्स्टैग को जलाने के लिए उकसाया हो। एस.ए. नेता कार्ल अर्नेस्ट की अगुआई में तूफानी दस्तों ने भूमिगत सुरंग का प्रयोग किया, जो गोरिंग के निवास से राइचस्टैग में तहखाने से जुड़ती थी। वे इमारत के अंदर घुसे, पेट्रोल तथा अन्य दाहक वस्तुओं का छिड़काव किया और फिर उस सुरंग के जरिए जल्दी से बाहर निकल गए। राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग और वाइस चांसलर पपेन उस समय राइचस्टैग भवन के सामने किसी क्लब में रात्रि-भोज कर रहे थे, जब उनकी नजर आग की गहरी लाल लपटों में घिरे उस भवन पर पड़ी। पपेन ने वयोवृद्ध हिंडेनबर्ग को अपनी कार में बिठाया और घटना-स्थल की तरफ चल पड़ा।

हिटलर तब गॉबेल्स के घर में खाना खा रहा था। वे भी जल्दी से मौके पर पहुँच गए, जहाँ उन्हें गोरिंग मिला, जो चिल्ला-चिल्लाकर कम्युनिस्टों के खिलाफ झूठे आरोप लगा रहा था और धमकियाँ दे रहा था।
पहली नजर में हिटलर ने उस अग्निकांड को स्वर्ग से उतरे संकेत दीप का नाम दिया।
घटना-स्थल पर हिटलर ने एक समाचार संवाददाता को बताया, ‘‘अभी आप जर्मनी के इतिहास में महान् युग-परिवर्तन का नजारा देख रहे हैं। यह आग उसकी शुरुआत है।’’
नुकसान का जायजा लेने के बाद शासनाधिकारियों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई गई। जब उन्हें आगजनी करनेवाले कम्युनिस्ट वॉन डेर लुब्बे की गिरफ्तारी के बारे में बताया गया, हिटलर जान-बूझकर ताव में आ गया।
‘‘जर्मनी के लोग बहुत समय से नरमी बरत रहे हैं। हर कम्युनिस्ट पदाधिकारी को गोली से उड़ा देना चाहिए। सभी कम्युनिस्ट सदस्यों को इसी रात सूली पर चढ़ा देना चाहिए। कम्युनिस्टों के सभी दोस्तों को पकड़कर जेल में डाल देना चाहिए।’’
हिटलर घटना-स्थल से सीधा अपने अखबार के कार्यालयों में गया, यह देखने के लिए कि अग्निकांड की खबर कितने विस्तार से छप रही है। वह गॉबेल्स के साथ सारी रात वहाँ बैठा रहा और अखबार में छापने के लिए तरह-तरह की कहानियाँ जोड़ता रहा, जिनका सार यह था कि बर्लिन में सत्ता हथियाने के लिए कम्युनिस्टों ने एक हिंसक षड्यंत्र रचा है।
बाद में, 28 फरवरी को बुलाई गई मंत्रिमंडल की एक बैठक में, चांसलर हिटलर ने संकट से निपटने के लिए आपातकालीन फरमान जारी करने की माँग उठाई। इसका ज्यादा विरोध नहीं हुआ, हालाँकि उसके मंत्रिमंडल में अधिकतर गैर-नाज़ी सदस्य थे। उस शाम हिटलर और पपेन दोनों हिंडेनबर्ग के पास गए और वयोवृद्ध राष्ट्रपति को चक्कर में डालकर एक आदेश पर उसके हस्ताक्षर करा लिये, जिसे ‘जनता और राज्य की सुरक्षा के लिए’ जरूरी बताया गया।
आपातकालीन आदेश के अनुसार, ‘‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार तथा समाचार माध्यम की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा दिए गए। निजी डाक, तार-संदेशों और टेलीफोन पर बातचीत की गोपनीयता को भंग किया जा सकता था और घर की तलाशी के आदेश जारी किए जा सकते थे। संपत्ति को भी कब्जे में लिया जा सकता था या उस पर रोक लगाई जा सकती थी। इन काररवाइयों पर कानूनी सीमाएँ लागू नहीं होंगी, जब तक कि अन्यथा कोई काररवाई न की गई हो।’’
इस आदेश के जारी होने के तत्काल बाद नाज़ियों ने बड़े पैमाने पर पकड़-धकड़ का अभियान छेड़ दिया। एस.ए. और एस.एस. सैनिक ट्रकों में भर-भरकर सड़कों पर निकल पड़े। उन्होंने कम्युनिस्टों के उठने-बैठने के अड्डों तथा निजी घरों पर भी धावा बोला। हजारों कम्युनिस्टों, सोशल डेमोक्रेट्स और उदारवादियों को ‘सुरक्षात्मक अर्थात् एहतियाती हिरासत’ के नाम पर गिरफ्तार करके एस.ए. बैरकों में ले जाया गया, जहाँ उनके साथ मारपीट की गई तथा उन्हें सताया गया।
51 नाज़ी-विरोधी मौत के घाट उतार दिए गए। नाज़ियों ने गैर-नाज़ी पार्टियों की सभी राजनीतिक गतिविधियों, सभाओं और प्रकाशनों पर रोक लगा दी। नाज़ियों के विरुद्ध प्रचार की काररवाई को ही वास्तव में गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया।
नाज़ी समाचार-पत्र कम्युनिस्ट षड्यंत्रों की झूठी कहानियाँ छापते रहे, इस दावे के साथ कि केवल हिटलर और नाज़ी ही कम्युनिस्टों को सत्ता हथियाने से रोक सकते हैं। सरकारी रेडियो का नियंत्रण गॉबेल्स के पास था और उसके निर्देशानुसार देश भर में नाज़ी प्रचार अभियान चलाया जा रहा था और हिटलर के भाषणों का प्रसारण किया जा रहा था।
नाज़ियों ने अपना ध्यान चुनाव की तारीख 5 मार्च पर लगा दिया। शानदार जीत सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सभी आवश्यक सरकारी साधनों को जोसेफ गॉबेल्स के जिम्मे छोड़ दिया गया। जिन बड़े उद्योगपतियों ने सत्ता ग्रहण करने में हिटलर की मदद की थी, उन्होंने खुशी से 30 लाख मार्क की राशि इकट्ठा करके दे दी।
अब धन की कोई समस्या नहीं थी और शासन की ताकत भी साथ थी। इस अनुकूल स्थिति के चलते नाज़ियों ने हिटलर को इच्छित बहुमत दिलाने के लिए जबरदस्त चुनाव-प्रचार किया।
5 मार्च को अंतिम मुक्त चुनाव हुए, पर हिटलर को बहुमत नहीं मिला। नाज़ियों को कुल 1,72,77,180 वोटों के केवल 44 प्रतिशत वोट मिले। व्यापक प्रचार-प्रसार और पाशविक पकड़-धकड़ के बावजूद दूसरी पार्टियों ने अपनी धाक बनाए रखी। सेंटर पार्टी को 40 लाख से अधिक वोट मिले और सोशल डेमोक्रेट्स को 70 लाख। कम्युनिस्टों के वोटों में कुछ कमी हुई, लेकिन फिर भी 40 लाख से अधिक वोट उनके खाते में पड़े।
विधिपूर्वक स्थापित तानाशाही का लक्ष्य अब नजदीक आ गया था। फिर भी राइच्स्टैग में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का न होना एक समस्या बनी हुई थी। हिटलर और उसकी निष्ठुर अंतरंग मंडली की दृष्टि में यह कोई बड़ी बाधा नहीं थी और उनका विचार था कि यह समस्या भी जल्दी सुलट जाएगी। जहाँ तक अग्निकांड के आरोपी कम्युनिस्ट वॉन डेर लुब्बे का संबंध है, उस पर मुकदमा चला, उसे दोषी करार दिया गया और फिर उसका सिर कलम कर दिया गया।
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