राजनगर, वर्तमान
“आज का दिन कैसा रहा हसन साहब?” फाह्याज़ ने डिनर के लिए डाइनिंग टेबल पर मौजूदगी दर्ज कराने के बाद हसन से मुखातिब होकर पूछा।
“एकदम मस्त।” हसन ने बालसुलभ गर्वोक्ति के साथ कहा और एक तिरछी नजर थोड़े से फासले पर बैठे लियाकत पर डाली, जो प्लेट में नजरें गड़ाए हुए किन्हीं ख्यालों में गुम थे, यूँ गुम थे कि फाह्याज़ के आने के बाद उसकी ओर नजर उठाकर देखे तक नहीं। तीनों सदस्यों के आ जाने के बाद मेड भोजन सर्व करने में जुट गयी। जब हसन ने पाया कि लियाकत की निगाह उन दोनों पर नहीं है तो उसने विक्ट्री साइन बनाकर फाह्याज़ को बताया कि मिशन पहले चरण में ही सफल हो गया था। उक्त सूचना पर फाह्याज़ ने चेहरे पर बनावटी हैरानी जाहिर की और कुर्सी से उठकर बेटे के बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया।
“तो तुम्हें सपने में अपनी अम्मी को बुलाने का नुस्खा पता चल गया?” उसने फुसफुसाते हुए पूछा।
“शी!” हसन ने होंठों पर उंगली रखकर उसे शांत रहने का संकेत किया फिर फुसफुसाया- “प्लान मिल गया है। हम सोते समय ट्राई करेंगे, आज ही।”
फाह्याज़ ने कुछ और पूछना चाहा लेकिन हसन ने ‘शी’ बोलकर उस गोपनीय बातचीत का गला घोंट दिया। तब तक मेड भी सर्व करने के बाद किचन में जा चुकी थी।
“आपकी तबियत ठीक नहीं लग रही है अब्बू, सब खैरियत तो है?” लियाकत को ख्यालों में गुम देख फाह्याज़ ने पूछा।
“ह..हाँ।” लियाकत मानो नींद से जागे- “शुरू करो तुम लोग।”
उन्होंने एक निवाला मुँह में रखकर रात्रि भोज का ‘उद्घाटन’ किया तत्पश्चात हसन और फाह्याज़ भी खाने के साथ-साथ इधर-उधर की बातचीत में लग गए। चार दिन बाद ये मौक़ा आया था, जब डाइनिंग टेबल पर पूरा परिवार एक साथ था, अन्यथा फाह्याज़ अक्सर ‘मिसिंग एलिमेंट’ हुआ करता था।
“स्कूल में आज नयी बात क्या पता चली?” फाह्याज़ ने हसन को लक्ष्य करके पूछा।
“एक्स्ट्राकैरीकुलर एक्टिविटी की क्लास में चंचला पाठक मैम ने फिशरमैन
और जिनी की कहानी सुनाई।” हसन ने बालसुलभ भंगिमाएं बनाते हुए उत्तर दिया। उसकी बात सुनकर लियाकत ने गर्दन ऊपर उठाकर क्षण भर के लिए उसे देखा, फिर प्लेट पर दोबारा निगाहें जमा लीं।
“उसी जिनी की कहानी, जिसे एक मछुआरा बोतल में से आजाद कर देता है?”
“हाँ लेकिन जिनी बहुत सेलफिश होता है। वह फिशरमैन को ही चट कर जाने की फ़िराक में पड़ जाता है।”
“फिर?” फाह्याज़ ने जुगाली करते हुए पूछा।
“फिर फिशरमैन उल्टा उसे ही उल्लू बनाकर दोबारा से बोतल में बंद कर देता है। वह जिनी से कहता है कि मैं मान ही नहीं सकता कि तुम्हारे जैसा हाथी से भी बड़ा शरीर वाला इंसान इत्ते छोटे से बोतल में घुस सकता है। इसी तरह से बार-बार कहकर वह जिनी को उकसा देता है और मूर्ख जिनी फिर से बोतल में घुसकर बैठ जाता है।”
“और मछुआरा बोतल का ढक्कन बंद करके उसे फिर से समुद्र में फेंक देता है।” फाह्याज़ ने कहानी को पूरा करके जोर से अट्टहास किया, हसन ने भी किया लेकिन लियाकत पर ने बेटे और पोते को यूँ घूरा, जैसे उन दोनों की बातचीत में जिन्न का होना, उन्हें खल रहा हो।
“बस इतना ही हुआ उस क्लास में?” हँसी थमने के बाद फाह्याज़ ने पूछा।
“अरे नहीं अब्बू, असली मजा तो बाद में आया।”
“अच्छा?” फाह्याज़ ने बनावटी हैरानी से दीदे फाड़ी- “भला वो कैसे?”
“स्टोरी फिनिश करके जब चंचला मैम ने सारे स्टूडेंट्स से पूछा कि अगर हममें से किसी को जिनी मिल गया तो हम उससे कौन-कौन सी थ्री विशेज मांगेंगे, तो जानते हैं बंटी ने क्या कहा?”
“क्या कहा?”
“उसने कहा कि जब जिनी आयेगा तो वह उसे जाने ही नहीं देगा। उसके गले में रस्सी डालकर उसे गाय की तरह खूँटे से बाँध देगा। और फिर थ्री नहीं, थ्री थाउजेंड विशेज पूरी करवाएगा उससे। यहाँ तक कि अपना होमवर्क भी उसी से करवाएगा।”
डाइनिंग टेबल पर एक बार फिर ठहाकों का शोर उभरा जबकि लियाकत एक फिर से किलस कर रह गए।
“फिर मैम ने बड़ा इंटरेस्टिंग क्वेश्चन पूछा। उन्होंने कहा कि अगर हमारे सामने ढेर सारे रंग-बिरंगे जिनी आकर खड़े हो जाएँ और हमें असिस्टेंट के रूप में उनमें से एक को चूज करना हो तो हम किस रंग का जिनी चूज करेंगे।”
“इंटरेस्टिंग क्वेश्चन इंडीड। तो फिर मेरे शेर ने किस रंग का जिनी पसंद किया अपने लिए?”
“ब्लू।” हसन ने उत्साहित लहजे में कहा- “क्योंकि ब्लू कलर रॉयल लोगों की चॉइस होती है। बट अद्वैत ने ग्रीन, बंटी ने रेड, सुमित ने येलो जिनी चूज किया। यू नो अब्बू, मैक्सिमम गर्ल्स ने किस कलर का जिनी चूज किया अपने लिए?”
“ऑबियसली पिंक।” फाह्याज़ ने मंद-मंद मुस्कराते हुए कहा।
“यस। क्लास की मोर दैन हाफ गर्ल्स ने पिंक जिनी चूज किया। कैन यू इमेजिन अब्बू कि बड़ा सा पिंक जिनी आखिर दिखने में कितना ऑड लगेगा।”
“बंद करो तुम लोग अपनी बकवास।” अंतत: लियाकत से रहा नहीं गया और उन्होंने अपनी दोनों मुट्ठी जोर से मेज पर दे मारी। हसन और फाह्याज़ चौंककर उन्हें घूरने लगे, जबकि वे गुस्से में मुँह से फेन निकालते हुए गला फाड़ते चले गए- “जिन्न इज नॉट अ जोक। अलिफ़ लैला की कहानियों का बेवकूफ़ सा दिखने वाला किरदार नहीं है ये, जो चिराग घिसने पर निकलता है और गुलामों की तरह अलादीन की ख्वाहिशें पूरी करता है। ये एक खौफ़नाक मखलूक है, जो किसी को भी दिल के दौरे दे सकता है, किसी का भी ब्रेन हैमरेज करा सकता है।”
“कैसी बातें कर रहे हैं अब्बू।” फाह्याज़ भी संजीदा हो गया- “हसन डर जाएगा।”
“वही तो मैं चाहता हूँ कि ये डरे, तुम भी डरो, हर वो इंसान डरे, जो लम्बी जिंदगी जीने का ख्वाहिशमंद है।”
फाह्याज़ की भंगिमाएं गंभीर हो गयीं। उसने बेटे की थाली में नजर डाली, जो खाली हो चुकी थी।
“डू यू नीड समथिंग?”
“नो, थैंक्स?” हसन ने कहा।
“ओके देन।” फाह्याज़ ने उसकी ओर नैपकिन बढ़ाते हुए कहा- “डेजर्ट लेने के बाद अपने कमरे में जाओ, मैं आता हूँ थोड़ी देर में।”
जब हसन वहाँ से चला गया तो फाह्याज़ एक लम्बी साँस लेकर लियाकत से मुखातिब हुआ- “अब बताइए अब्बू, क्यों गुस्सा हो रहे हैं आप?”
“ये तुम क्या बकवास सीखा रहे थे अपने बेटे को?” लियाकत ने जबड़े भींचे हुए कहा- “नीला जिन्न, पीला जिन्न, गुलाबी जिन्न; आखिर हो क्या रहा था?”
“और आपने जो किया वो क्या था?” फाह्याज़ का लहजा अब हद से ज्यादा गंभीर हो गया। जब लियाकत भुनभुनाते हुए इधर-उधर देखने लगे तो उसने आगे कहा- “मैं तो बस वही कर रहा था, जो आप चाहते थे कि मैं करूँ। आप ही तो कहते रहते हैं कि मैं बिना माँ के उस बच्चे को फ्रेंडली ट्रीट करूँ और जब मैं कर रहा था तो अचानक आपने पूरे माहौल को ही टेंश कर दिया। डरा दिया आपने अपने पोते को। मैं केवल उसकी बातों में हाँ से हाँ मिला रहा था ताकि वह जिन्न जैसे इमेजिनरी करैक्टर को लाइटली ले। उसकी टीचर ने भी बच्चों की क्रिएटिविटी को उभारने के लिए ही वो कहानी सुनाई थी लेकिन आपने तो ये प्रोजेक्ट किया जैसे जिन्न हकीकत में होते हैं, करिश्माई ताकतों के मालिक होते हैं और लोगों की जिन्दगी और मौत अपनी मुट्ठी में लिए घूमते हैं।”
लियाकत खामोश रह गए। फाह्याज़ को बताने के लिए उनके पास काफी कुछ था लेकिन उन्होंने खुद को जब्त कर लिया। वह तो एक क्षणिक आवेश था, जो बेटे और पोते के बीच जिन्न जैसी भयानक नस्ल को खिलवाड़ बनता देख बाहर आ गया था, वरना वे खुद भी यही चाहते थे कि फाह्याज़, जिन्न को एक मिथक समझे क्योंकि यही उसके लिए सुरक्षित था बल्कि हर इंसान के लिए सुरक्षित था। उसे वास्तविक दुनिया का किरदार समझने की दशा में होना ये था कि फाह्याज़ उसका राज़ तलाशने की कोशिश करता और अपनी जिंदगी दांव पर लगा देता, जैसे मौलाना ने लगा दी थी।
लियाकत ने खुद को सामान्य दर्शाने के कोशिश की लेकिन फाह्याज़ भांप गया कि उनकी मनोदशा ठीक नहीं थी। वह अपनी कुर्सी पर से उठा और उनके बगल की कुर्सी पर काबिज हो गया तत्पश्चात उनके खाने की प्लेट पर नजर डाली और फिर उनके माथे पर हाथ रखा।
“मैं ठीक हूँ।” लियाकत ने उसका हाथ परे हटाते हुए इस बार शांत स्वर में कहा।
“हाँ आप ठीक है, बस बुखार से बदन आग की तरह तप रहा है और डिनर के तौर पर अब तक केवल एक-दो निवाला ही निगला है आपने। पूरी थाली ज्यों की त्यों पड़ी है।”
“दरअसल शाम को हैवी ब्रेकफ़ास्ट ले लिया था, इसलिए भूख नहीं थी, बस तुम लोगों को कंपनी देने के लिए बैठ गया था। इसे स्ट्रीट डॉग को खिला देना।” लियाकत ने प्लेट को खुद से दूर सरकाते हुए कहा और डाइनिंग टेबल से उठकर वाश बेसिन तक गए, हाथ धोया फिर सीधे अपने कमरे का रुख कर लिए।
पिता की उक्त हरकत पर फाह्याज़ के माथे पर बल पड़ गए। उसने बर्तन को समेटने के लिए मेड को आवाज़ दी और डिनर से फारिग होने के बाद लियाकत के कमरे के दरवाजे पर पहुँचकर थम गया।
“अब क्या हुआ?” सोने की तैयारी के तहत बेडशीट और लिहाफ़ दुरुस्त कर रहे लियाकत ने उसे दरवाजे पर खड़ा देखकर पूछा।
“बेटे से कुछ छिपाते समय ये क्यों भूल जाते हैं आप कि वह पुलिस वाला है?” फाह्याज़ कमरे में दाखिल हुआ, लियाकत के हाथ से बेडशीट छिनकर बिस्तर पर फेंका और उन्हें जबरदस्ती खींचता हुआ, रॉकिंग चेयर पर ले जाकर बैठा दिया फिर उस प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ गया, जहाँ दवाओं का बॉक्स रखा हुआ था। वहाँ से उसने एचमीस प्लस का एक टेबलेट बरामद किया, फिर बेडसाइड टेबल पर पड़े जग का पानी गिलास में उड़ेला और उसे लिए हुए लियाकत के पास आ गया।
“इस टेबलेट को घोंट जाइए, बुखार उतारने में मदद करेगा।”
लियाकत के ना-नुकुर की परवाह किये बगैर फाह्याज़ ने टेबलेट उनके मुँह में रख दिया और जब उन्होंने पानी के मदद से उसे हलक से नीचे उतार लिया तो उनके पांव के पास बैठकर किसी छोटे बच्चे की मानिंद जिद भरे लहजे में वह बोला- “चलिए, अब अपनी परेशानी बताइए वरना न तो खुद सोऊँगा और न ही आपको सोने दूँग।”
लियाकत के चेहरे पर एक बार फिर वही उलझन नजर आने लगी, जो फाह्याज़ के आत्मीयतापूर्ण व्यवहार के चलते थोड़े समय के लिए लुप्त हो गयी थी।
“अब फिर से मोरल क्यों डाउन.....?”
“मेरे एक सवाल का जवाब दो फाह्याज़।” लियाकत ने बेटे की बात काटकर तनावपूर्ण लहजे में कहा।
“एक नहीं हजारों सवाल पूछिए।”
“तुम विनायक शुक्ला मर्डर केस की फाइल सच में बंद कर चुके हो न?”
सवाल सुनकर फाह्याज़ की भवें संकुचित हो गयीं। उसकी प्रोफेशनल लाइफ से जुड़े मामलों में लियाकत का यूँ दिलचस्पी लेना अप्रत्याशित था। जब शबनम ज़िंदा थी तो उसी ने ये नियम बनाया था कि बाहर फाह्याज़ के पुलिसिया जीवन में जो कुछ भी होगा, उसका असर न तो घर में उसके व्यवहार पर दिखेगा और न ही घर में उस बाबत कोई चर्चा होगी।
“आपकी मरहूम बहु नाराज हो जायेगी, इसलिए इस बारे में हम कोई बात नहीं करेंगे।” फाह्याज़ ने हँसकर टालने की कोशिश की।
“बस एक बार...।” लियाकत ने बेटे का हाथ अपने हाथों में लेते हुए लहजे पर जोर देकर कहा- “...ये कन्फर्म कर दो कि विनायक की हत्या से अब तुम्हें कोई सरोकार नहीं है।”
“पहले ही बता चुका हूँ आपको कि वह केस क्लोज कर दिया है हमने।” इस दफे फाह्याज़ भी गंभीर हो गया।
“मेरा मतलब है कि किसी भी तरह, ऑफिशियली या अनऑफिशियली तुम्हारा उस मामले में कोई दखल नहीं है और न ही आगे होगा, राईट?”
“अब ये आश्वासन तो चाहकर भी नहीं दे सकता वालिद साहब।” फाह्याज़ ने लियाकत से हाथ छुड़ाकर, लम्बी साँस लेते हुए कहा- “कभी-कभी लिंक जुड़ने पर कई पुराने केस री-ओपन हो जाते हैं इसलिए हो सकता है ये भी कभी ओपन हो जाये लेकिन आज आप मेरी बोरिंग सी प्रोफेशनल लाइफ में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं?”
“क्योंकि बेटे कभी-कभी कुदरत नहीं चाहती है कि हम इंसान उसके किसी मामले में दखल दें।”
“अब इस फिलास्फी का क्या मतलब हुआ?” फाह्याज़ ने मुँह बिचकाया।
“मैं तुम्हारे जितना पढ़ा-लिखा नहीं हूँ फाह्याज़ और न ही तुम्हारी तरह किसी अच्छी पोस्ट हूँ, जो हर पल दुनिया की, सिस्टम की अच्छाइयों और बुराइयों से करीब से रूबरू होता रहूँ लेकिन हाँ, जीवन का अनुभव तुमसे ज्यादा जरूर रखता हूँ और उसी अनुभव के हवाले से कह रहा हूँ कि विनायक के क़त्ल से खुद को अलग कर लो, इसी में हम सबकी भलाई है।”
“विनायक के हत्या की कोई कड़ी शबनम से जुड़ी तो भी? तो भी आप यही कहेंगे कि मैं मामले को रफ़ा-दफ़ा कर दूँ?”
लियाकत मानो आसमान से जमीन पर गिरे। जिस बात का डर था, वही बात सामने आयी थी। फाह्याज़ की तहकीकात इस हद तक आगे बढ़ चुकी थी कि वह भी उस कड़ी को टटोल चुका था, जो शबनम और विनायक को आपस में जोड़ती थी।
“जवाब दीजिए अब्बू, क्या आप नहीं चाहते कि शबनम का कातिल पकड़ा जाए?”
“कातिल?” लियाकत ने चौंकने का शानदार अभिनय किया- “तुम पागल हो गए हो फाह्याज़। शबनम हादसे का शिकार हुई थी। कोई क़त्ल नहीं हुआ था उसका।”
“हाँ जरूर, वह हादसे का ही शिकार हुई थी लेकिन उसकी मौत की पटकथा भी लिखी जा चुकी थी। अगर वह उस हादसे से बच जाती तो विनायक की तरह मारी जाती।”
“किसने लिखी थी वो पटकथा?”
फाह्याज़ जवाब देने के बजाय पिता को घूरने लगा।
“बताओ।”
“इट इज अंडर इन्वेस्टीगेशन। आपको बताना सुरक्षित नहीं समझता मैं।”
“तो इसका मतलब झूठ कहा था तुमने। तुम अब भी उसी केस पर लगे हुए हो?” लियाकत हैरतजदा लहजे में कहा। जब फाह्याज़ ने मौन रहकर सहमति दर्शाई तो उन्होंने तड़पकर पहलू बदलते हुए कहा- “तुम जिद पर क्यों अड़े हो? क्या इससे शबनम लौट आयेगी?”
“नहीं, लेकिन न जाने कितने मासूमों की जिंदगियां बच जाएंगी और यही मेरी ओर से शबनम को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यही अच्छाई की जीत होगी।” लियाकत खामोश रहकर पहले की तरह पहलू बदलते रहे जबकि फाह्याज़ ने आगे कहा- “आप जिस तरह मुझे रोक रहे हैं, उससे मुझे अंदाजा हो रहा है कि आप भी कुछ ऐसा जानते हैं, जो इस केस के रहस्यमयी और डरावने होने की वजह है।”
“नहीं।” लियाकत के चेहरे सख्त प्रतिरोध के भाव उभरे- “मैं कुछ नहीं जानता। मैं तो बस तुम्हारे लिए फ़िक्रमंद हो रहा हूँ।”
“देखिए अब्बू, मैं मानता हूँ कि इस केस में वाकई कोई आसेबी दखल है लेकिन क्या मैं सिर्फ इसलिए पीछे हट जाऊँ क्योंकि इस बार कातिल कोई करिश्माई मखलूक है?” फाह्याज़ ने थोड़ा रुककर लियाकत के जवाब का इंतजार किया फिर आगे कहा- “मैं हिन्दुस्तान की मिट्टी में पैदा हुआ हूँ और इस मिट्टी की एक खासियत है कि इसमें जन्मे लोग कर्म में यकीन करते हैं, विपरीत हालात में भी अपनी किस्मत लिखने का हौसला रखते हैं। पहले अपने पर तौलते हैं, फिर पूरी क्षमता लगाते हैं तब कहीं जाकर मदद की उम्मीद में आसमान की ओर देखते हैं। मैं भी इसी मिट्टी की पैदाइश हूँ। मुझे खुद पर यकीन है, अल्लाह पर यकीन है इसलिए पीछे हटना मुझे मंजूर नहीं है, सामने चाहे इब्लीस की पूरी फ़ौज ही क्यों न खड़ी हो।” फाह्याज़ खड़ा होते हुए आगे बोला-“मेरी आपसे गुजारिश है अब्बू कि अगर आपको कुछ ऐसा मालूम है, जो मेरी मदद कर सकता है तो प्लीज जरूर बताइएगा, सब्बा खैर।”
कहने के बाद फाह्याज़ बाहर निकल गया, ठीक उसी समय साधना का फोन आया।
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साधना हाथ में कॉफी के दो मग लिए हुए उस कमरे में दाखिल हुई, जहाँ सिस्टम पर बैठा लगभग चालीस साल की उम्र का एक शख्स किसी टॉपिक पर पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन बनाने में जुटा हुआ था। साधना उसके करीब पहुँची और डेस्कटॉप की मेज पर तशरीफ टिकाते हुए कॉफ़ी का एक मग उसके आगे रख दी।
“मेरा मूड नहीं है।” आदमी ने कॉफ़ी की ओर देखे बगैर कहा।
“कॉफ़ी पीने का?” साधना ने अपना मग होठों से लगाते हुए पूछा।
“नहीं, वो करने का, जिसकी खुशामद के लिए तुम इतनी रात को कॉफ़ी बनाकर लायी हो।” आदमी ने मॉनिटर पर नजरें गड़ाए हुए कहा।
“हद है यार विभू।” साधना ने जबड़े भींचते हुए कहा- “कम से कम काम के वक्त तो अपनी ठरक को किनारे रख दिया करो।”
आदमी काम रोककर बीवी से मुखातिब हुआ और बोला- “रात के ग्यारह बज रहे हैं, अभी तक जाग क्यों रही हो?”
“तुम भी तो जाग रहे हो।”
“कल एक इंटरनेशनल कांफ्रेंस है। उसी के लिए पीपीपी बना रहा हूँ। अब तुम्हारी तरह सरकारी मुलाजिम तो हूँ नहीं, जो छ: घंटे में से चार घंटे अपनी सहेलियों के साथ गप्प लड़ाते हुए, नाईट आउट और किट्टी पार्टी की प्लानिंग करते हुए गुजारूँगा।”
“न जाने आज सुबह किसकी शक्ल देखी थी मैंने।” साधना भन्ना गयी-“हॉस्पिटल में उस आदमी ने झाड़ा और घर पर पति उलाहना दे रहा है। जैसे सरकारी नौकरी करके कोई गुनाह कर लिया हो मैंने।”
“तुम्हें किसने झाड़ दिया?” विभू ने हैरानी से साधना को घूरा- “तुम तो कट्टर फेमिनिस्ट हो, महिला सशक्तिकरण की जीती-जागती मिसाल हो। तुम्हारी डांट से तो मेरी भी घिग्घी बंध जाती है।”
“एक पुलिसवाला है। बड़े अजीब से केस में उलझा हुआ है आजकल। एक्चुअली उसकी वाइफ मरने के साल भर बाद उसके सपने में आ रही है। और बड़े ही अजीब से तरीके से आ रही है।”
“कमाल है, जीते जी तो डराती ही रही होगी बेचारे को, मरने के बाद सपने में भी डरा रही है।”
“अब अगर मुझे उकसाने से तुम्हारा मन भर हो गया हो तो थोड़ा गंभीर हो जाओ।” साधना ने उसे यूँ घूरा, जैसे अभी काट लेगी- “या कहो तो मैं गंभीर बनाऊं तुम्हें? डिलीट कर दूँ तुम्हारी पीपीपी? प्लग निकाल दूं? या ये डेस्कटॉप ही तोड़ दूँ? हैं...?”
विभू यूँ सहमकर खामोश हो गया, जैसे रिंग में शेर ने रिंगमास्टर के हाथ में चाबुक देख लिया हो।
“दस मिनट के लिए काम रोक दो अपना, कुछ बात करनी है।” साधना ने अधिकारपूर्ण लहजे में कहा।
आदमी ने बगैर कोई सवाल-जवाब किये अब तक की प्रोग्रेस को सेव करके पॉवरपॉइंट को मिनीमाइज कर दिया और किसी आज्ञाकारी शिष्य की भांति बीवी से मुखातिब हुआ। डेस्कटॉप वालपेपर के रूप में उसकी और साधना की मैरिज एनिवर्सरी की तस्वीर लगी हुई थी।
“क्या एनाफिलैक्सिस जानलेवा होता है?”
“इन मोस्ट केसेज तो नहीं होता है लेकिन तुम्हें इसकी क्या जरूरत पड़ गयी?”
“ये होता किन वजहों से है?”
“कई वजहें होती हैं; कॉमनली फ़ूड एलर्जी, मेडिसिनल रिएक्शन।”
“यानी कि अगर नर्सिंग स्टाफ के द्वारा किसी पेशेंट के मेडिकेशन में लापरवाही बरती गयी तो एनाफिलैक्सिस का खतरा होता है?”
“बिल्कुल होता है लेकिन रिस्क फैक्टर ज्यादा नहीं होता। मोस्टली कण्ट्रोल में आ जाती है सिचुएशन।”
“तो फिर रिस्क फैक्टर ज्यादा कब होता है? ऐसा कब होता है कि इस कंडीशन में पड़ा पेशेंट मर जाता है?”
साधना के अजीब से सवाल पर विभू ने उसे घूरा।
“हुआ क्या है? पॉइंट वाइज ऐसे सवाल क्यों पूछ रही हो?”
“पहले जो पूछा है, वो बताओ।”
“बहुत रेयर केस में होता है। अपने पंद्रह साल के कैरियर में मैंने अभी तक ऐसी कोई मौत नहीं देखी है, जिसका जिम्मेदार अकेले एनाफिलैक्सिस रहा हो। तुम्हारा एक्चुअल केस क्या है?”
“वजायनल ब्लीडिंग के बाद एक औरत हॉस्पिटल में एडमिट की जाती है, जहाँ वह ब्लड ट्रांसफ्यूजन से गुजरती है लेकिन ट्रांसफ्यूजन के तुरंत बाद दो से तीन घंटे में उसकी मौत हो जाती है। सिम्प्टम होते हैं बुखार, साँस लेने में दिक्कत, बदन दर्द वगैरह-वगैरह।”
विभू कुछ देर तक साधना को घूरता रहा फिर पूछा- “किस हॉस्पिटल में हुआ था ऐसा?”
“गैलेक्सी हॉस्पिटल के मैटरनिटी वार्ड में, लगभग साल भर पहले।”
“तुम इसमें क्यों इन्वाल्व हो?” विभू का लहजा आशंकित हुआ।
“पहले बताओ कि उस औरत के मौत की एक्चुअल वजह क्या है?”
“नहीं बताऊँगा। तुम फेमिनिज्म का झंडा बुलंद करने वाली महिलाओं में से हो। तुम वाट्सएप्प और फेसबुक के दर्जनों फेमिनिस्ट ग्रुप की एडमिन हो। मुझे डर है कि अगर मैंने बता दिया तो तुम आन्दोलन करने लग जाओगी।”
“नहीं मेरे सोना।” साधना, पति को पुचकारते हुए बोली- “तुम्हारी कसम, ऐसा कुछ भी नहीं करूँगी मैं, ट्रस्ट मी।”
“ये केस हिमोलिटिक ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन का है। है तो ये एक प्रकार का एनाफिलैक्सिस ही, लेकिन घातक स्तर का। और ये तब होता है जब किसी को रॉंग ग्रुप का ब्लड चढ़ा दिया जाता है।”
“मुझे भी यही लगा था लेकिन श्योर नहीं थी मैं।” साधना की आँखें चमक उठीं- “यानी कि मेडिकल नेग्लिगेंसी का शिकार हो गयी वह बेचारी औरत। एक बार फिर एक महिला इस क्रूर पितृसत्तात्मक समाज द्वारा छली गयी।”
“शांत हो जाओ दुर्गा, पहले मेरी पूरी बात तो सुन लो। आमतौर पर ऐसा होता नहीं है, वो भी गैलेक्सी जैसे एलिट क्लास हॉस्पिटल्स में। ट्रांसफ्यूजन के वक्त पूरी एहतियात बरती जाती है। और कभी गलत खून की बोतल लग भी जाती है तो ट्रांसफ्यूजन के बीच में ही सिम्प्टम नजर आने लगते हैं और डॉक्टर आमतौर पर सिचुएशन को कण्ट्रोल में कर लेते हैं।”
“तो फिर उस औरत के साथ ऐसा क्यों हुआ? मरी तो वो गलत खून चढ़ाने से ही न?”
“अब बिना पूरा केस जाने मैं कैसे कह सकता हूँ कि क्या हुआ था।”
“रुको पूरी फाइल ही दिखाती हूँ तुम्हें।”
साधना ने सेलफोन में से फाह्याज़ का नम्बर ढूंढा और डायल कर दिया।
“हैलो फाह्याज़ जी?” दूसरी ओर से कॉल रिसीव किये जाने पर वह अत्यंत सौम्य लहजे में बोली।
“जी, मैम।” दूसरी ओर से फाह्याज़ की आवाज़ आयी।
“फाइलें मिल गयीं आपको?”
“ओह हाँ, मैं आपको मेल करने ही वाला था।”
“प्लीज कर दीजिये, इट्स अर्जेंट।”
“श्योर मैम।”
साधना ने कॉल डिसकनेक्ट करके जब मोबाइल कान से हटाया तो विभू को हैरान पाया।
“अब घूर क्या रहे हो?”
“तुम बीवियां पराये मर्दों से जितने प्यार से बात करती हो, उतने प्यार से अगर पतियों से बातें करो तो घर में जन्नत उतर आये।”
साधना कुछ बोलने जा ही रही थी कि मोबाइल पर ई-मेल की नोटिफिकेशन बजी। उसने ई-मेल खोला, जो फाह्याज़ का ही था तत्पश्चात सारे पीडीऍफ़ अटैचमेंट्स को डाउनलोड करके उसने मोबाइल विभू की ओर बढ़ा दिया- “लो करो केस स्टडी।”
विभू करीब पंद्रह मिनट तक उन डाक्यूमेंट्स में डूबा रहा फिर गहरी साँस
लेकर सेलफोन टेबल पर रखा और साधना से मुखातिब हुआ- “कुछ तो गड़बड़ है साधू। मेडिसिनल रिएक्शन मेंशन्ड है डाक्यूमेंट्स में, जबकि एक्चुअल सिचुएशन पर गौर करें मौत की वजह एचटीआर है क्योंकि मेडिकेशन के कारण होने वाला एनाफिलैक्सिस इतना मैलीग्नेंट नहीं होता कि पेशेंट कुछ ही घंटों में मर जाए।”
“तो अब?”
“अगर कोई आन्दोलन करना चाहती हो तो भूल जाओ क्योंकि मेडिकल नेग्लिगेंसी सात जन्मों में साबित नहीं कर पाओगी। साल भर पुराना केस है, पोस्टमार्टम भी नहीं हुआ होगा। तुम्हारी जुबानी बताई हुई जो सिचुएशन इसे हिमोलिटिक ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन का केस साबित करती है, उस पर कोई यकीन नहीं करेगा। अगर वाकई नेग्लिगेंसी हुई होगी तो हॉस्पिटल डॉक्यूमेंटेशन के समय ही अपने बचाव का पूरा बंदोबस्त कर चुका होगा मसलन देखा ही तुमने कि एनाफिलैक्सिस की वजह मेडिकेशन बता रखी है। साल भर बाद अब उस केस में कोई हॉस्पिटल का बाल भी बांका नहीं कर सकता। इसलिए इस केस को अपनी फेमिनिज्म की गाड़ी का ईंधन बनाने की कोशिश बिल्कुल भी मत करना क्योंकि हासिल कुछ नहीं होगा।”
विभू के तंज का साधना पर कोई असर नहीं हुआ। वह टेबल पर बैठे हुए ही व्यग्र भाव से पहलू बदलने लगी।
“लेकिन इतने बड़े हॉस्पिटल में ऐसी गलती कैसे हो सकती है?” वह बोली।
“होती तो नहीं है लेकिन अब हुई है तो हुई है। हो सकता है कोई ह्युमन जनरेटेड मिस्टेक रहा हो। जैसे कि बोतल पर गलत लेबल लग गया हो या लास्ट मोमेंट में बोतल ही गलती से बदल गया हो और सिम्प्टम्स पर किसी का ध्यान न गया हो। नसीब खराब होता है तो मामूली सी चूक भी जानलेवा हो जाती है।”
हालाँकि साधना, विभू के तर्क से मुतमईन न हो सकी लेकिन इसके अलावा और संभावना भी क्या हो सकती थी। उसने डेस्कटॉप का ब्राउज़र ओपन किया और गूगल पर ‘गैलेक्सी हॉस्पिटल’ सर्च करके उसकी वेबसाईट पर पहुँची। काफी देर तक वह वेबसाईट के अलग-अलग पेजों पर विचरती रही लेकिन हासिल कुछ नहीं कर पायी। एक बारगी उसके मन में ये ख्याल भी आया कि किसी साज़िश के तहत ट्रांसफ्यूजन के लिए लाया गया ब्लड बदल दिया गया हो सकता है लेकिन फिर जब उसका ख्याल नरभेड़िया, काली परछाईं और रहस्यमयी आर्टिस्ट समेत अन्य पहलुओं पर गया तो वह बुरी तरह उलझ गयी। आगे भी वह जितना सोचती गयी, उतना उलझती गयी फिर एक समय ऐसा भी आया, जब उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया और वह सिर थामकर बैठ
गयी।
“क्या हुआ?” विभू ने घबराकर पूछा।
“तुम्हारा कोई कांटेक्ट है उस हॉस्पिटल में?” साधना ने पति के चेहरे पर दृष्टिपात करते हुए पूछा।
“बहुत से हैं इवेन मैं खुद केसेज के सिलसिले में महीने में तीन से चार बार वहाँ विजिट कर लेता हूँ।”
“तो फिर एक काम करो।”
“कैसा काम?” विभू के रोंगटे खड़े हो गये।
“उस औरत के केस में अंदर की बात पता करके बताओ मुझे। ये मालूम करो कि उसकी मौत कैसे हुई? इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो गयी कि उसे गलत खून चढ़ा दिया गया?”
“दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा?” विभू खूँटे से उखड़ गया- “वजह क्या बताऊँगा उन्हें अपने इस पूछताछ की?”
“मैं कौन सा तुम्हें मेडिकल सुपेरिटेंडेंट से पूछने को कह रही हूँ? तुम वार्डबॉयज से पूछो, नर्सेज से पूछो। थोड़ा लालच दो उन्हें। ये यकीन दिलाओ कि वे जो कुछ भी बताएंगे, उसे तुम उनके या हॉस्पिटल के खिलाफ़ इस्तेमाल नहीं करोगे।”
“पर ये यकीन मुझे कौन दिलाएगा? मैं कैसे मान लूँ कि उन इनफार्मेशन्स के हासिल हो जाने के बाद तुम कोई खुराफ़ात नहीं करोगी? तुमने तो अभी तक ये भी नहीं बताया कि ये गड़े मुर्दे उखाड़कर तुम्हें हासिल क्या होगा।”
“तुम्हें अपनी जीवनसंगिनी पर यकीन नहीं है?” साधना ने ऐसी शक्ल बनायी, जैसे गंभीर घरेलू हिंसा का शिकार हुई औरत हो- “तुम्हें लगता है कि मैं उन इनफार्मेशन्स के बलबूते किसी को ब्लैकमेल करूंगी?”
“तुम हीरोइन बनने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हो।”
“तुम्हारी कसम, इस बार मुझे हीरोइन नहीं बनना है बल्कि संसार को एक बड़े खतरे से बचाना है।”
“बहुत खूब।” विभू बरबस ही हँस पड़ा- “तो इस बार हीरोइन से भी एक कदम आगे सुपर हीरोइन बनना है तुम्हें, संसार को बचाना है। टाइटल क्या चुनी हो; वंडर वुमन, कैप्टन मार्वल या फिर मैडम साइको?”
“टेक मी सीरियसली यार। सच में ये बहुत बड़ा इशू है, मैं तुम्हें बाद में सब समझाऊंगी।”
“ओके, देखता हूँ कुछ।” आखिरकार विभू को घुटने टेकने पड़े- “लेकिन ये तो बता दो कि मसला क्या है। और ये फाह्याज़ मियाँ क्या लगते हैं तुम्हारे, जो तुम
उनसे इतने प्यार से गूफ्तगू कर रही थी।”
“मेरा नया बॉयफ्रेंड, जलन हुई?”
“नहीं, बिल्कुल नहीं।” विभू ने कंधे उंचकाये- “बल्कि मैं तो खुश हूँ कि तुम्हारे ऐसा करने से मुझे भी एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर करने का लाइसेंस मिल गया।”
साधना जोरों से हँसी।
“हँस क्यों रही हो?”
“उस बेवक़ूफ़ लड़की के बारे में सोचकर हँसी आ गयी, जो हर रोज एक इंच के रेट से बाहर आ रहे तुम्हारे तोंद पर फिसलेगी। बाय द वे, गुड नाईट मेरी जान।”
साधना फुदकती हुई बाहर चली गयी जबकि विभू ‘गजब बेइज्जती है यार।’ भुनभुनाते हुए अपना प्रेजेंटेशन बनाने में लग गया।
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