ढह गया गणराज्य

राजनीतिक कुचक्र, अफवाहों और अव्यवस्था के भँवर में फँसे बर्लिन में हर जगह एस.ए., नाज़ी तूफानी दस्ते नजर आने लगे। वर्ष 1932 के वसंत में जर्मन लोकतांत्रिक सरकार में बहुत से लोगों को यह विश्‍वास हो चला था कि भूरी कमीजोंवाले बलपूर्वक शासन पर कब्जा कर लेंगे।

एस.ए. प्रमुख अर्नस्ट रोहम के अधीन 4,00,000 से अधिक तूफानी सैनिक थे। एस.ए. के अनेक सदस्य खुद को सच्चा क्रांतिकारी सैनिक मानते थे और उसी धारणा के अनुसार कार्य करने के लिए उत्सुक थे। एडोल्फ हिटलर को समय-समय पर उन्हें संयम में रखना पड़ता था, ताकि वे ऐसा कुछ न कर बैठें, जिससे कि गणराज्य की जड़ें कमजोर करने के लिए उसके द्वारा बड़ी सावधानी से बनाई गई योजना पर पानी फिर जाए।

हिटलर यह समझता था कि वह जर्मन सेना जैसी वर्तमान संस्थाओं और प्रभावशाली जर्मन उद्योगपतियों की मदद के बिना जर्मनी का फ्यूहरर नहीं बन सकेगा, क्योंकि उन दोनों की क्रांतिकारी एस.ए. पर चौकस नजर रहती थी।

अप्रैल 1932 में जर्मनी के चांसलर हेनरिक ब्रूनिंग ने संविधान के अनुच्छेद 48 का सहारा लिया और उसके अंतर्गत एक आदेश जारी करके पूरे जर्मनी में एस.ए. तथा एस.एस. पर प्रतिबंध लगा दिया। नाज़ियों को इस काररवाई से गहरा धक्का लगा और वे चाहते थे कि हिटलर उस प्रतिबंध के विरुद्ध संघर्ष करे। लेकिन हिटलर, जो हमेशा उनसे एक कदम आगे रहता था, बेहतर जानता था। वह मान गया, क्योंकि वह जानता था कि गणराज्य के दिन चुकने वाले हैं और यह कि गणराज्य के ढहते ही उसे इच्छित अवसर प्राप्त होगा।

वह मौका कुर्त वॉन श्लाइशर के रूप में सामने आया, जो एक षड्यंत्रकारी, महत्त्वाकांक्षी सैनिक अधिकारी था और जर्मनी का नेतृत्व सँभालने के मंसूबे पाले हुए था। किंतु, उसने हिटलर को समझने में भारी भूल कर दी। श्लाइशर हिटलर से परिचित था और उसी ने हिंडेनबर्ग के साथ हिटलर की उस मुलाकात का इंतजाम किया था, जिसका अनुभव हिटलर के लिए बहुत खराब रहा।

8 मई, 1932 को श्लाइशर ने हिटलर के साथ एक गुप्त मुलाकात की और उसे एक प्रस्ताव पेश किया। प्रस्ताव यह था कि अगर एक रूढ़िवादी राष्ट्रवादी सरकार बनाने में हिटलर उसकी मदद करे तो एस.ए. एवं एस.एस. पर लगी रोक हटा दी जाएगी, राइचस्टैग को भंग कर दिया जाएगा और नए चुनाव कराए जाएँगे तथा चांसलर बू्रनिंग को एक कोने में पटक दिया जाएगा। हिटलर ने प्रस्ताव मान लिया।

श्लाइशर ने बर्लिन में परदे के पीछे रहकर चालाकी और धोखेबाजी से सबसे पहले राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग के दीर्घकालीन विश्‍वसनीय सहायक और गणराज्य के मित्र जनरल विल्हैम, ग्रोनर को बड़े अपमानित ढंग से बाहर निकलवाया। राइचस्टैग (जर्मन लोकसभा) में ग्रोनर को हरमैन गोरिंग ने एस.ए. पर रोक लगाने का समर्थन करने के लिए बड़ी खरी-खोटी सुनाई और फिर गॉबेल्स और नाज़ी सदस्यों ने उसकी खिल्ली उड़ाई तथा शोरगुल मचाया।

‘‘हमने उस पर सब तरफ से इतना गुल-गपाड़ा किया कि पूरा सदन हँसी के ठहाकों से हिलने लगा। अंत में, हर किसी को उस पर दया आ रही थी। खत्म हो गया उसका वजूद हमेशा के लिए।’’ जोसेफ गॉबेल्स ने वर्ष 1932 में अपनी डायरी में यह बात लिखी।

श्लाइशर ने ग्रोनर पर इस्तीफा देने के लिए दबाव डाला। उसने हिंडेनबर्ग से अपील की, लेकिन सफलता नहीं मिली और अंतत: उसे 13 मई को अपने पद से त्याग-पत्र देना ही पड़ा। श्लाइशर का अगला शिकार चांसलर ब्रूनिंग था।

हेनरिक ब्रूनिंग जर्मनी में वह अंतिम व्यक्ति था, जिसने लोगों के सर्वाधिक हित को ध्यान में रखते हुए हिटलर का विरोध किया था। हिंडेनबर्ग को दुबारा राष्ट्रपति निर्वाचित कराने, हिटलर को उस पद से दूर रखने तथा गणराज्य को बचाए रखने के लिए वही जिम्मेदार था। जर्मन अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कठोर परिश्रम किया और युद्ध संबंधी हरजाने की अदायगी को समाप्त करने हेतु दूसरे देशों से मदद की गुहार लगाई। लेकिन उसकी आर्थिक नीतियों के परिणाम बहुत खराब रहे। जर्मनी की आर्थिक स्थिति बदतर होती चली गई और करीब 60 लाख लोग बेरोजगार हो गए, जिसके कारण बू्रनिंग पर ‘हंगर चांसलर’, अर्थात् भूखों मारनेवाले चांसलर का ठप्पा लग गया।

ब्रूनिंग ने फरमान द्वारा शासन करने की खतरनाक मिसाल कायम की थी और उसी परिपाटी को आगे बढ़ाया था। उसने बर्लिन में राजनीतिक गतिरोध को भंग करने के लिए कई बार संविधान के अनुच्छेद 48 का सहारा लिया।

श्लाइशर व हिटलर उसे अपने रास्ते का रोड़ा मानते थे और उसे हर हाल में हटाना जरूरी था। उसको हिंडेनबर्ग से मिल रहे समर्थन को काटने के लिए श्लाइशर ने काम करना शुरू कर दिया। ब्रूनिंग पहले से ही मुसीबत में था, क्योंकि हिंडेनबर्ग की नजर में वह उस राजनीतिक खलबली का दोषी था, जिसके कारण उसे 85 साल की उम्र में ‘बोहिमियाई कॉरपोरल’ एडोल्फ हिटलर के विरुद्ध दुबारा चुनाव में खड़ा होना पड़ा।

ब्रूनिंग ने एक और बड़ी गलती की थी। उसने एक मार्क्सवादी की तरह यह प्रस्ताव पेश किया कि दिवालिया रईसों की विशाल जागीरों को टुकड़े-टुकड़े करके किसानों में बाँट दिया जाना चाहिए। उन रईसों ने उद्योगपतियों से मिलकर इतना धन इकट्ठा किया था कि हिंडेनबर्ग अपनी एक संपत्ति खरीद सके। हिंडेनबर्ग ने जब मध्य मई में ईस्टर अवकाश लिया, उस दौरान उसे ब्रूनिंग के बारे में उनकी शिकायतें सुननी पड़ीं। श्लाइशर तो ब्रूनिंग की जड़ें काटने में लगा ही हुआ था।

29 मई, 1932 को हिंडेनबर्ग ने ब्रूनिंग को बुलाया और उसे इस्तीफा देने के लिए कहा। अगले दिन हेनरिक ब्रूनिंग ने अपना इस्तीफा सौंप दिया। उसके साथ ही जर्मनी में लोकतंत्र का अंत हो गया।

अब नियंत्रण श्लाइशर के हाथों में था। उसने अपनी कठपुतली के तौर पर चांसलर पद के लिए फ्रॉज वॉन पपेन नाम के एक ऐसे अज्ञात रईस को चुना, जिसे ऐसे उच्च पद पर काम करने की अपनी योग्यता के बारे में खुद पूरा भरोसा नहीं था। पर हिंडेनबर्ग को पपेन पसंद आया और उसने पपेन को चांसलर का पद ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित भी किया।

धनाढ्य पपेन ने अपने ही सरीखे लोगों को चुनकर एक मंत्रिमंडल बनाया। रईसों और उद्योगपतियों का यह निष्प्रभावी मंत्रिमंडल उस राष्ट्र का कर्ता-धर्ता बन गया, जो शीघ्र ही अराजकता के कगार पर पहुँचने वाला था।

जब राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग ने एडोल्फ हिटलर से पूछा कि क्या वह चांसलर के रूप में पपेन का समर्थन करेगा? हिटलर ने ‘हाँ’ कह दिया। 4 जून को राइचस्टैग भंग कर दी गई और घोषणा कर दी गई कि जुलाई के अंत में नए चुनाव कराए जाएँगे। 15 जून को एस.ए. और एस.एस. पर लगी रोक हटा दी गई। श्लाइशर ने नाज़ियों से किए गए गुप्त वादों को पूरा कर दिखाया।

जर्मनी में हत्या और हिंसा भड़क उठी। भूरी कमीजोंवाले नाज़ी गुट गलियों-सड़कों में नाज़ी गीत गाते और झगड़ा-फसाद के मौकोें की तलाश में घूमने-फिरने लगे।

नाज़ियों को सड़कों में कम्युनिस्टों के झुंड मिलते, जो दो-दो हाथ करना चाहते थे और वे मौका मिलते ही एक-दूसरे पर गोली दाग देते। यह उनका रोजाना का काम हो गया था। ऐसी सैकड़ों लड़ाइयाँ हुईं। 17 जुलाई को नाज़ी कार्यकर्ता पुलिस रक्षक-दल की निगरानी में बड़ी बेहयाई से प्रशिया राज्य में हैंबर्ग के निकट एक कम्युनिस्ट इलाके में घुस गए। धुआँधार गोली-बारी हुई, जिसमें 19 लोग मारे गए और करीब 300 घायल हुए। इस घटना को बाद में ‘खूनी रविवार’ कहा जाने लगा।

पपेन ने अनुच्छेद 48 के अंतर्गत बर्लिन में मार्शल लॉ (सैनिक शासन) लगा दिया और प्रशिया जर्मन राज्य को अपने अधिकार में ले लिया तथा खुद को जर्मन साम्राज्य का आयुक्त (राइच कमिश्‍नर) घोषित कर दिया। जर्मनी ने अधिकारवादी शासन की ओर इस तरह एक लंबा कदम बढ़ा दिया।

हिटलर ने तय किया कि पपेन उसके रास्ते का रोड़ा बना हुआ है और उसे जाना ही होगा।

हिटलर ने वॉन पपेन से कहा, ‘‘तुम्हारा मंत्रिमंडल सिर्फ एक अस्थायी समाधान है और मैं अपनी पार्टी को देश में सबसे शक्तिशाली बनाने के लिए अपने प्रयास जारी रखूँगा। तब चांसलर का पद खुद-ब-खुद मुझे मिल जाएगा।’’

जुलाई के चुनावों ने वह मौका दे दिया। नाज़ियों को पूरी जीत की पक्की उम्मीद थी, इसलिए उन्होंने चुनाव अभियान में जी-जान लगा दी। हिटलर ने एक-एक बार में एक-एक लाख लोगों को संबोधित किया। उसके प्रशंसकों की भीड़ उसे सुनने के लिए उमड़ी चली आती थी। बड़े पैमाने पर ‘फ्यूहरर की भक्ति’ के गीत गए जाने लगे थे। 31 जुलाई को लोगों ने मतदान किया और नाज़ियों को 1,37,45,000 वोट दिए, जो कुल मतदान का 37 प्रतिशत था। इस तरह, राइचस्टैग (जर्मन लोकसभा) में नाज़ी पार्टी का 230 सीटों पर कब्जा हो गया। नाज़ी पार्टी जर्मनी में सबसे बड़ी और अत्यंत प्रभावशाली पार्टी बन गई।

5 अगस्त को हिटलर ने श्लाइशर के सामने अपनी माँगों की सूची रखी। इस सूची में चांसलर के पद की माँग शामिल थी और यह भी माँग की गई थी कि एक कानून पास करके उसे अपने आदेशानुसार शासन करने का अधिकार दिया जाए, नाज़ियों के लिए कैबिनेट में तीन पद रखे जाएँ, एक प्रचार मंत्रालय बनाया जाए, आंतरिक कार्य मंत्रालय पर उसका नियंत्रण हो और प्रशिया का नियंत्रण भी उसे सौंपा जाए। जहाँ तक श्लाइशर का संबंध है, उसे इनाम के रूप में रक्षा मंत्रालय मिलेगा।

श्लाइशर ने उसकी माँगें सुनकर ‘हाँ’ या ‘ना’ कुछ नहीं कहा, लेकिन उसे बाद में सूचित करने का वादा किया।

हिटलर यह सोचकर खुश था कि उसकी माँगें मान ली जाएँगी, फिर भी उसने श्लाइशर के जवाब का इंतजार किया और इसी बीच उसने आदेश दे दिया कि श्लाइशर के साथ जिस जगह यह ऐतिहासिक बैठक हुई थी, उसे यादगार बनाने के लिए एक स्मारक तख्ती बनवाकर वहाँ लगा दी जाए।

इस बीच एस.ए. ने सत्ता सँभालने की प्रत्याशा में बर्लिन में जमा होना शुरू कर दिया। लेकिन वयोवृद्ध राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग ने हिटलर के सपनों, उसकी खुशियों पर पानी फेर दिया। हिंडेनबर्ग उस समय तक हिटलर पर संदेह करने लगा था और वह उसे चांसलर बनाने के पक्ष में नहीं था, विशेषकर एस.ए. के व्यवहार के बाद।

13 अगस्त को श्लाइशर तथा पपेन ने हिटलर से भेंट की और उसे यह बुरी खबर सुनाई। अधिक-से-अधिक वे एक समझौता कर सकते थे। वे उसे वाइस चांसलर का पद और प्रशिया का आंतरिक कार्य मंत्रालय दे सकते थे।

हिटलर बहुत आवेश में आ गया। उसके बेलगाम आक्रोश को देखकर श्लाइशर और पपेन सकते में आ गए, जब उन्होंने हिटलर की यह धमकी सुनी कि वह पूरे जर्मनी में एस.ए. को तीन दिन तक हिंसा और हत्या का कहर ढाने की खुली छूट दे देगा।

बाद में उसी दिन राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग ने हिटलर को अपने कार्यालय में बुलाया। पूर्व फील्ड मार्शल ने पूर्व ऑस्ट्रियाई कॉरपोरल अर्थात् हिटलर को चांसलर बनने की माँग दुबारा उठाने और पपेन तथा श्लाइशर के साथ सहयेग करने से इनकार करने के लिए कड़ी फटकार लगाई।

फौलादी दृष्टिवाले वृद्ध प्रशियन के सामने हिटलर की फिर घिग्घी बँध गई। संपूर्ण विजय का खेल बुरी तरह विफल हो गया। उसने एस.ए. को दो सप्ताह की घर-वापसी की छुट्टी दे दी और खुद अपने जख्मों को चाटने के लिए अर्शतिसगडने चला गया। उसने उन्हें बताया कि अभी प्रतीक्षा करनी होगी। थोड़ी देर और धैर्य रखना होगा।

12 सितंबर को हरमैन गोरिंग के नए सभापतित्व के अंतर्गत राइचस्टैग ने पपेन और उसकी सरकार को एक अविश्‍वास प्रस्ताव पेश कर दिया। इससे पहले कि उस पर विचार किया जाए, पपेन ने राइचस्टैग को भंग करने और फिर नए चुनाव कराने का एक आदेश गोरिंग के सामने रख दिया।

इससे समस्या उत्पन्न हो गई। हर कोई बार-बार के चुनाव से तंग आ चुका था। कुछ ही महीनों बाद चुनाव के सिलसिले में नाज़ी प्रचार अभियान को पिछले वाले स्तर तक ले जाने में गॉबेल्स को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी।

प्रचार अभियान के बीच में ही हिटलर की प्रेयसी ईवा ब्रॉन ने खुदकुशी के प्रयास में अपनी गरदन में गोली मार ली। हिटलर अभी तक अपनी प्रिय भानजी की खुदकुशी के हादसे को भूल नहीं पाया था। ईवा ब्रॉन हिटलर से बहुत प्यार करती थी; लेकिन उसे लगता था कि हिटलर से उसे अपनी चाहत के मुताबिक प्यार नहीं मिल रहा है। हिटलर तुरंत अस्पताल पहुँच गया और उसी क्षण से उसने ईवा की देखभाल करने का निश्‍चय कर लिया।

इस तरह ध्यान बँट जाने से पहले से ही सुस्त पड़े नाज़ी प्रचार अभियान की रफ्तार और धीमी हो गई। जब गॉबेल्स और अनेक नाज़ी कार्यकर्ताओं ने बर्लिन में परिवहन कामगारों की एक अनधिकृत हड़ताल में साम्यवादियों का समर्थन किया, उसके बाद समस्याएँ और बढ़ गईं, क्योंकि बहुत से मध्य वर्गी मतदाता उनसे विमुख हो गए थे।

लाल झंडेवालों का साथ देने से हुई बदनामी और हिंडेनबर्ग के साथ हिटलर की मुलाकात के गलत प्रचार के कारण उनके वोट कट गए। एस.ए. की उजड्ड हरकतों ने भी हालत और बिगाड़ दिए। 6 नवंबर को हुए चुनावों में नाज़ियों को 20 लाख वोटों से हाथ धोना पड़ा जिसके फलस्वरूप राइचस्टैग में उनकी 34 सीटें कम हो गईं। नाज़ियों का प्रभाव कम हो रहा था, हिटलर निरुत्साहित हो गया। लेकिन बर्लिन में अभी तक कोई कामचलाऊ सरकार नहीं थी। चांसलर के रूप में पपेन का प्रभाव बहुत कमजोर हो गया था। श्लाइशर उसके प्रभाव को और भी कम करने के लिए प्रच्छन्न साजिश रच रहा था। 17 नवंबर को पपेन ने हिंडेनबर्ग से भेंट की और उसे बता दिया कि वह किस भी तरह का कामचलाऊ गठबंधन करने में असमर्थ है और फिर उसने इस्तीफा दे दिया।

दो दिन बाद हिटलर ने हिंडेनबर्ग से मुलाकात के लिए समय माँगा। हिटलर ने एक बार फिर चांसलर के पद की माँग की। इस बार हिंडेनबर्ग ने मित्रवत् व्यवहार किया और हिटलर को अन्य पार्टियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने तथा एक कामचलाऊ बहुमत बनाने अर्थात् एक गठबंधन सरकार बनाने का सुझाव दिया। हिटलर ने साफ इनकार कर दिया।

21 नवंबर को हिटलर ने दुबारा हिंडेनबर्ग से भेंट की और इस बार दूसरा ही रुख अपनाया। उसने एक तैयार किया हुआ वक्तव्य पढ़ा और उसमें दावा किया कि संसदीय सरकार फेल हो गई है और साम्यवाद को फैलने से रोकने के लिए नाज़ियों पर ही भरोसा किया जा सकता है। उसने हिंडेनबर्ग से उसे अध्यक्षीय मंत्रिमंडल (प्रेसीडेंशियल कैबिनेट) का नेता बनाने के लिए कहा। हिंडेनबर्ग ने उसकी इस माँग को भी ठुकरा दिया और अपना पहलेवाला अनुरोध दोहराया।

जर्मनी की सरकार का चक्का जाम हो चुका था।

इस बीच में देश के अत्यधिक प्रभावशाली उद्योगपतियों, बैंकरों और व्यावसायिक नेताओं ने हिंडेनबर्ग को एक याचिका प्रस्तुत की, जिसमें उससे हिटलर को चांसलर बनाने का अनुरोध किया गया था। उनका मानना था कि हिटलर के चांसलर बनने से व्यवसाय की तरक्की होगी।

हिंडेनबर्ग बुरी तरह चक्कर में पड़ा हुआ था। उसने पपेन और श्लाइशर को बुलाया और उनसे पूछा कि क्या किया जाना चाहिए। पपेन को एक सनक सूझी। उसने कहा कि वह दुबारा चांसलर बन जाएगा और सिर्फ कानून का डंडा चलाएगा, राइचस्टैग को हटा देगा, सभी राजनीतिक दलों का दमन करने के लिए सेना व पुलिस का इस्तेमाल करेगा और संविधान में जबरन संशोधन कर देगा। अनुदार, कुलीन वर्गों के हाथ में शासन की बागडोर होगी और इस तरह पुन: साम्राज्य के दिन वापस आ जाएँगे।

श्लाइशर ने आपत्ति जताई। पपेन को इसकी उम्मीद नहीं थी। श्लाइशर ने कहा कि पपेन नहीं, वह खुद सरकार का मुखिया बनेगा और उसने हिंडेनबर्ग को वचन दिया कि नाज़ी सदस्यों में दरार डालकर राइचस्टैग में आवश्यक बहुमत हासिल कर लेगा। श्लाइशर ने कहा कि वह ग्रगोर स्ट्रॉसर को अपने पक्ष में कर सकता है और करीब 60 नाज़ी सदस्यों को हिटलर से तोड़ सकता है।

हिंडेनबर्ग स्तब्ध रह गया और अंत में उसने पपेन को हरी झंडी दे दी तथा उसे अपनी योजनानुसार सरकार का गठन करने के लिए कहा। हिंडेनबर्ग जब कमरे से चला गया, उसके बाद पपेन और श्लाइशर ने एक-दूसरे पर चिल्लाना शुरू कर दिया।

अगले दिन मंत्रिमंडल की एक बैठक में श्लाइशर ने पपेन से कहा कि अगर वह नई सरकार बनाने का कोई भी प्रयास करेगा तो उससे देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। उसने जोर देकर कहा कि सेना साथ नहीं जाएगी और फिर उसने एक मेजर ऑट को पेश किया, जिसने उसके दावों की पुष्टि की। श्लाइशर गुप्त रूप से सेना को अपनी ओर करने में लगा हुआ था। पपेन बड़ी मुसीबत में था।

वह दौड़कर हिंडेनबर्ग के पास गया, जिसने आँखों से आँसू बहाते हुए पपेन को बताया कि अब कोई चारा नहीं है, श्लाइशर को नया चांसलर बनाना मजबूरी हो गई है।

‘‘मेरे प्रिय पपेन, अगर मैं अपना विचार बदल दूँ, तुम मेरे बारे में ज्यादा नहीं सोचेगे। लेकिन मैं अब बहुत बूढ़ा हो गया हूँ और इतना कुछ दे चुका हूँ कि एक गृहयुद्ध की और जिम्मेदारी स्वीकार करने का साहस अब मुझमें नहीं है। एक यही उपाय बचा है कि हम श्लाइशर को उसका भाग्य आजमाने दें।’’ हिंडेनबर्ग ने पपेन से कहा।

2 दिसंबर, 1932 को कुर्त वॉन श्लाइशर जर्मनी का चांसलर बन गया। इसके भयंकर परिणाम हुए। बड़े-बड़े राजनीतिक षड्यंत्र रचे गए और पीछे से वार किया गया। इस घटनाक्रम ने 57 दिनों के अंदर ही हिटलर को सत्ता के सिंहासन पर बिठा दिया।

श्लाइशर ने सबसे पहले नाज़ी सदस्यों में फूट डालने के अपने वादे पर अमल किया। उसने एक नाज़ी ग्रगोर स्टॉसर के साथ एक गुप्त बैठक की, जो शुरू से हिटलर के साथ रहा था। श्लाइशर ने उसे वाइस चांसलर बनाने और प्रशिया का नियंत्रण उसे देने का प्रस्ताव उसके समक्ष रखा।

स्ट्रॉसर के लिए यह प्रस्ताव काफी लुभावना था। हाल ही में नाज़ी पार्टी की लोकप्रियता में आई कमी, लाखों वोटों का हाथ से निकल जाना और अब उसका भयंकर वित्तीय समस्याओं से घिर जाना—कुल मिलाकर ये सब कारण यह संकेत दे रहे थे कि हिटलर की कठोर रणनीतियाँ दीर्घकालीन सफलता के लिए शायद उचित नहीं होंगी। स्टॉसर को उन उजड्ड और निर्दयी लोगों से भी घृणा हो चली थी, जो हिटलर की अंतरंग मंडली में थे।

पपेन के जरिए हिटलर को पता लग गया कि क्या खिचड़ी पक रही है। 5 दिसंबर को स्ट्रॉसर और उसके कु्रुद्ध फ्यूहरर की भेंट अन्य नाज़ी नेताओं की मौजूदगी में बर्लिन के एक होटल में हुई। स्ट्रॉसर ने आग्रह किया कि हिटलर और नाज़ी सदस्य सहयोग करें या फिर श्लाइशर सरकार को बरदाश्त करें। गोरिंग और गॉबेल्स ने उसका विरोध किया। हिटलर ने स्ट्रॉसर के खिलाफ उनका पक्ष लिया।

दो दिन बाद स्ट्रॉसर और हिटलर फिर एक-दूसरे के आमने-सामने हुए और दोनों के बीच जोरदार बहस हुई। स्ट्रॉसर ने हिटलर पर पार्टी को तबाह करने का दोष लगाया। हिटलर ने स्ट्रॉसर को पीठ में छुरा भोंकने का दोष दिया।

अगले दिन स्ट्रॉसर ने हिटलर को एक पत्र लिखा, जिसमें उसने सूचित किया कि वह नाज़ी पार्टी के एक सदस्य के रूप में अपने सभी कर्तव्यों से छुटकारा पा रहा है। हिटलर और अन्य नाज़ी नेता इस बात से अचंभे में पड़ गए कि एक संस्थापक सदस्य और अत्यंत प्रभावशाली नेता ने उनका साथ छोड़ दिया। नाज़ी पार्टी लगता था, तार-तार हो रही है। हिटलर की हिम्मत टूट गई और वह इतना निराश हो गया कि खुद को गोली मारने की धमकी दे डाली।

स्ट्रॉसर लंबी छुट्टी बिताने के लिए इटली चला गया।

हिटलर ने अपने विश्‍वसनीय सहायक रुडोल्फ हैस को स्ट्रॉसर के कार्य सौंप दिए। क्रिसमस के दौरान हिटलर अपनी पार्टी की विफलताओं को लेकर बहुत उदास रहा।

बहुत से राजनीतिक प्रेक्षकों को ऐसा लगने लगा कि हिटलर की तानाशाही का खतरा टल गया है।

किंतु नए साल में नई दुरभिसंधियों का सूत्रपात हुआ। जिन बड़े बैंकरों एवं उद्योगपतियों ने हिटलर की ओर से हिंडेनबर्ग को याचिका दी थी, वे अभी भी यही चाहते थे कि हिटलर को सत्ता मिले। पपेन अपने इन्हीं मंसूबों के पीछे पड़ा हुआ था कि किस तरह श्लाइशर को नीचे उतारा जाए। 4 जनवरी, 1933 को हिटलर पपेन से मिलने के लिए बैंकर कुर्त वॉन शोएडर के घर गया। पपेन ने श्लाइशर को हटाकर पपेन-हिटलर सरकार बनाने का प्रस्ताव रखकर हिटलर को चकित कर दिया। उसका सुझाव था कि इस सरकार में वह और हिटलर दोनों बराबर के हिस्सेदार रहेंगे।

हिटलर को श्लाइशर को हटाने का विचार तो पसंद आया, लेकिन सरकार का वास्तविक प्रधान वह खुद बनना चाहता था। फिर भी, वह पपेन और उसके मंत्रियों के साथ काम करने के लिए तैयार था। पपेन ने उसकी बात मान ली।

श्लाइशर को जब यह पता चला, वह दौड़कर हिंडेनबर्ग के पास पहुँचा और पपेन की धोखेबाजी की कथा उसे सुनाई। लेकिन हिंडेनबर्ग के दिल में पपेन के लिए नरमी थी, अत: उसने श्लाइशर की बातों पर ध्यान नहीं दिया।

श्लाइशर की स्थिति पहले ही बहुत कमजोर हो चुकी थी। वह सरकार चलाने में असमर्थ था; क्योंकि किसी को भी उस पर इतना भरोसा नहीं था कि एक कामचलाऊ गठबंधन में उसका साथ दे। जर्मन सरकार में गतिरोध बना रहा और देश के लोगों तथा हिंडेनबर्ग की बेचैनी दिनोदिन बढ़ती गई। कुछ-न-कुछ करना जरूरी था। हिंडेनबर्ग ने पपेन को हिटलर के साथ सौदेबाजी करने की आज्ञा दे दी, लेकिन यह भी हिदायत कर दी कि इस बात को श्लाइशर से गुप्त रखा जाए।

एक छोटे जर्मन राज्य लिप्पे में 15 जनवरी को स्थानीय चुनाव होने थे। हिटलर और नाज़ियों ने इस अवसर पर अच्छा प्रभाव जमाने का निश्‍चय किया। उन्होंने जबरदस्त प्रचार अभियान चलाया, इस उम्मीद के साथ कि उन्हें भारी सफलता मिलेगी और वे साबित कर देंगे कि उनमें फिर पहले जैसी तेजी आ गई है।

उनके वोटों में पिछली बार के मुकाबले कुछ वृद्धि हुई। लेकिन उन्होंने दूर-दूर तक प्रचलित नाज़ी अखबार का इस्तेमाल किया, अपने महत्त्व को बढ़ा-चढ़ाकर जताने और यह दावा करने के लिए कि आनेवाला समय हिटलर और नाज़ी पार्टी का है। यह तरकीब काम कर गई और राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।

रविवार, 22 जनवरी, 1933 को जोशिम वॉन रिबेनट्रॉप के घर पर एक गुप्त बैठक हुई। इस बैठक में पपेन, हिंडेनबर्ग का पुत्र ऑस्कर और हिटलर तथा गोरिंग मौजूद थे। हिटलर ने ऑस्कर को पकड़ा और उसे एक निजी कमरे में ले गया, जहाँ उसने एक घंटे तक उसे यह समझाने की कोशिश की कि सरकार में नाज़ी उसकी शर्तों पर शामिल होंगे। ऑस्कर को उस बैठक के बाद विश्‍वास हो गया कि जो होने जा रहा है, अवश्यंभावी है। नाज़ियों को लेना ही होगा। फिर पपेन ने हिटलर के प्रति अपनी वफादारी का वचन दिया।

फिर, श्लाइशर यह प्रस्ताव लेकर हिंडेनबर्ग के पास गया कि नाज़ियों पर नियंत्रण करने के लिए जरूरी है कि आपात-स्थिति लागू कर दी जाए, राइचस्टैग (जर्मन लोकसभा) को भंग कर दिया जाए और चुनावों को फिलहाल लटका दिया जाए। हिंडेनबर्ग ने इनकार कर दिया।

पर लोगों को इसकी भनक लग गई, जिसके फलस्वरूप श्लाइशर को उदारवादी और मध्य मार्गी दलों का क्रोध सहना पड़ा। श्लाइशर पीछे हट गया और फिर उसे नाज़ी-विरोधी रूढ़िवादियों का कोपभाजन बनना पड़ा। उसकी स्थिति बड़ी दयनीय थी।

28 जनवरी को वह हिंडेनबर्ग से मिलने गया और राइचस्टैग को भंग करने का प्रस्ताव दोहराया। हिंडेनबर्ग ने फिर उसकी बात को अनसुना कर दिया। श्लाइशर ने इस्तीफा दे दिया।

पपेन और राष्ट्रपति का पुत्र ऑस्कर हिंडेनबर्ग से मिलने गए और उसे हिटलर-पपेन सरकार नियुक्त करने के लिए मनाने की कोशिश की। हिंडेनबर्ग श्रांत-क्लांत वृद्ध आदमी था और इन कुचक्रों से तंग आ चुका था। लगता था, वह तैयार हो जाएगा। हिटलर ने उसकी कमजोरी भाँप ली और उसके साथ ही एक और माँग रख दी कि मंत्रिमंडल में चार महत्त्वपूर्ण पद नाज़ी पार्टी को दिए जाने चाहिए।

वृद्ध राष्ट्रपति को यह बात पसंद नहीं आई और उसे हिटलर के बारे में संदेह होने लगा कि उसे चांसलर बनाना ठीक होगा या नहीं। हिटलर ने उसे पुन: आश्‍वस्त किया कि उन चार पदों में से एक पद पपेन को दिया जाएगा।

29 जनवरी को एक अफवाह उड़ी कि श्लाइशर ने हिंडेनबर्ग को गिरफ्तार करने और शासन की बागडोर सेना को थमाने का इरादा किया है। जब हिंडेनबर्ग के कानों तक यह खबर पहुँची, उसका संकोच खत्म हो गया। उसने हिटलर को जर्मन का अगला चांसलर नियुक्त करने का निश्‍चय कर लिया।

किंतु कंजर्वेटिव नेता एल्फ्रेड ह्यूजेनबर्ग द्वारा अंतिम क्षणों में की गई एक आपत्ति ने सारी योजना को लगभग चौपट कर दिया। 30 जनवरी को, जब राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग दूसरे कमरे में हिटलर को चांसलर नियुक्त करने की प्रतीक्षा में थे, ह्यूजेनबर्ग ने नए चुनाव कराने के बारे में हिटलर की माँग पर नाज़ियों के साथ बहस करके सारी काररवाई को रोक दिया। हिटलर ने उसे समझाने की कोशिश की कि वह अपनी माँग छोड़ दे या कम-से-कम हिंडेनबर्ग को निर्णय लेने दे। सारी बातें सुलझ जाने पर वे सब राष्ट्रपति के कार्यालय में चले गए।

30 जनवरी, 1933 को दोपहर के आस-पास जर्मनी के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हुआ, जब हिटलर आँखों में खुशी के आँसू लिये जर्मन राष्ट्र का चांसलर बनकर राष्ट्रपति के महल से बाहर निकला। अपने प्रशंसकों द्वारा चारोें ओर से घिरा हुआ वह अपनी कार में घुसा और फिर सड़कों पर उसकी शोभा-यात्रा चल पड़ी, जहाँ दोनों ओर प्रसन्नचित्त नागरिक उसका अभिवादन करने के लिए खड़े हुए थे।