तू बेवफ़ा है
हम जिससे भी प्यार करते हैं, जिसको भी दिल में ख़ास जगह देते हैं, वो धीरे-धीरे हमारा एक अंग बन जाता है। जब भी हम अपने प्यार से घृणा दर्शाते हैं तो उनके साथ-साथ हम ख़ुद को भी प्रताड़ित करते हैं। जितनी तकलीफ़ हमें अपना प्यार देता है, उससे कहीं ज़्यादा तकलीफ़ उसी प्यार के कारण हम ख़ुद को भी देते हैं।
ऐसी ही तकलीफ़ जो वीर को माया से मिली थी, उससे कहीं ज़्यादा वीर ख़ुद को दे रहा था। माया और वीर की बातें बिल्कुल बन्द हो चुकी थीं। दोनों एक-दूसरे से जुद़ा हो गए थे। वीर को माया से बात किए हुए आठ महीने हो चुके थे। इतने लम्बे समय तक कभी भी दोनों एक-दूसरे से दूर नहीं रहे थे, लेकिन अब कारण ही ऐसा था कि माया वीर से बात नहीं करना चाहती थी और वीर के पास माया से बात करने का कोई हक़ ही नहीं बचा था।
वीर आठ महीनें से अपने घर भी नहीं गया था। अजय वीर से मिलने के लिए दिल्ली आता रहता था। वीर पूरी तरह से टूट चुका था। उसके आँसू सूख चुके थे। अब जब भी वह रोना चाहता था तो अन्दर से सिर्फ़ उसका दिल रोता था, आँसू बाहर नहीं निकलते थे। माया पर वीर का गर्व और विश्वास टूट चुका था। माया से मिले धोखे ने उसे पूरी तरह से बिखराकर रख दिया था। वीर हर पल माया के बारे में सोचता रहता था। न चाहते हुए भी माया का चेहरा, उसके साथ बिताए हुए पल वीर की आँखों के सामने आते रहते थे। माया के द्वारा किए गए विश्वासघात ने वीर को अन्दर तक झकझोर कर रख दिया था।
अविश्वास की रंग इतना गहरा हो चुका था कि प्यार मृतप्राय हो गया था। वीर हमेशा सोचता था कि उसे माया कभी दिखी ही क्यों? क्यों उसने माया को प्रपोज़ किया और क्यों उसने माया को इतना ज़्यादा प्यार किया? इस ‘प्यार’ के नाम से ही वीर नफ़रत करने लग गया था। कई बार वीर मरने की सोचता और मर भी जाता अगर अजय उसके साथ नहीं होता तो। नफ़रत ही अब वीर और माया के प्यार की पहचान बन चुकी थी। नफ़रत में प्रेमी पहले ख़ुद को प्रताड़ित, अपमानित और दंशित करता है, फिर उस नफ़रत को बढ़ाने के लिए अपनी पुरानी यादों की खाद से उसे सींचता है और फिर प्यार में की गई बेइंतहा नफ़रत से प्रेमी मौन हो जाता है।
नशे में जब माया की यादें वीर पर हावी होतीं तो बेहोश होने की स्थिति तक वह पीता रहता था। उसे माया का याद आना, किस करना, ‘आई लव यू’ बोलना प्रताड़ित कर रहा था। जब भी माया द्वारा कहा हुआ ‘आई लव यू’ वीर को याद आता तो अचानक ही वीर के मुंह से ‘आई लव यू टू’ निकल जाता। जब वीर ऐसा बार-बार करता तो वह ख़ुद को यक़ीन दिलाना चाहता था कि वाक़ई में प्यार है, लेकिन वह सच नहीं होता था। सच तो यह था कि माया अब खुश थी और वीर उसकी खुशी के लिए हर पल ख़ुद को प्रताड़ित कर रहा था। वीर का मन और आँसू सूख चुके थे। इंसान के मन और आँसू सूख जाने के लिए मौसम के बदलने की दरकार नहीं होती। किसी अपने का साथ छूट जाना ही काफ़ी होता है।
रात के 11:00 बज रहे थे। वीर और अजय, दोनों छत पर बैठे थे। दोनों एक बोतल पूरी ख़ाली कर चुके थे। अजय अपने मोबाइल में कुछ देख रहा था और वीर आसमान में शून्य की तरफ़ लगातार देख रहा था। वीर के फ़ोन की घंटी बजी। वीर ने देखा कि माया का कॉल आ रहा था। वीर ने फ़ोन काट दिया। अजय ने वीर से कहा कि उठा लेता उस बेदर्दी का फ़ोन, शायद तुझे अभी और दर्द देना बाक़ी हो। वीर ने कुछ नहीं कहा और लगातार शून्य में ही ताकता रहा। दोबारा फ़ोन की घंटी बजी तो अजय ने वीर की तरफ़ इशारा किया कि उठा ले। वीर ने फ़ोन उठाया।
“कैसे हो?” माया ने पूछा।
“ठीक हूँ।” वीर ने जवाब दिया।
“कहाँ पर हो?” माया ने फिर पूछा।
“क्यों तुम्हें क्या करना है? तुम्हें तो अब इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए।” वीर ने बेरुखी से कहा।
“परसो मेरी शादी है। तो सोचा कि तुमसे एक बार बात कर लूं।” माया ने कहा।
यह सुनने के बाद वीर कुछ नहीं बोला। दोनों के बीच फ़ोन पर कुछ देर तक चुप्पी रही और फिर अचानक वीर फूट-फूटकर रो पड़ा। वो लड़का जो आज तक किसी बड़ी से बड़ी बात पर भी नहीं रोया, जब वह रो देता है अपने प्यार के दूर जाने पर, तब ख़ुद भगवान भी रो देता है और आ जाती है उसके आँसुओं से बाढ़।
“प्लीज़ मत कर तू ऐसा। मैं मर जाऊँगा तेरे बिन। ये शादी मत कर। मैं नहीं रह पाऊँगा तुझसे अलग होकर। और मैं जानता हूँ कि तू भी नहीं रह पाएगी।” वीर ने रोते हुए कहा।
“यह अब नहीं हो सकता। मैंने तुम्हें कितनी बार शादी के लिए कहा। कितनी बार कहा तुम्हें कि घर पर बात कर लो। वो लड़का देख रहे हैं, लेकिन तुम तो यही कहते रहे कि कुछ नही होने वाला। बाद में देखेंगे। तो अब देख लो बाद में देखने का नतीज़ा।” माया ने गुस्से से कहा।
“हाँ, कहता था कि बाद में देखेंगे। कभी यह तो नहीं कहा न कि नहीं देखेंगे। और तुम साला बहुत बडी कपटी निकली। जब लड़का फ़ाइनल किया और Engagement की, तब मुझसे बात छुपाई। बता, कौन हुआ धोखेबाज अब?” वीर ने कहा।
“अगर तुझे मेरी मजबूरी समझ में नहीं आती तो फिर मान ले मुझे धोखेबाज़, लेकिन एक बात मत भूलना कभी कि प्यार सिर्फ़ तुझसे किया है और आगे भी तुझसे ही रहेगा। अगर तुझसे प्यार नहीं होता न तो उस थर्ड क्लास लड़के से शादी के लिए ‘हाँ’ नहीं करती। छोड़, तूने आज तक मुझे समझने की कोशिश ही नहीं कि तो आज क्या समझेगा?” माया ने कहा।
“भैंचो, क्या है तू? मैंने क्या नहीं समझा तुझे? आज तो अच्छी तरह से समझ चुका हूँ। बेवफ़ा है तू, समझी बेवफ़ा।” वीर ने चिल्लाकर कहा।
“मैं बेवफ़ा नहीं हूँ और सुन कुत्ते, मुझे आज के बाद कभी बेवफ़ा मत कहना। यह देखना कि मैं आगे भी अपना प्यार निभाउँगी और तू मुझे आगे से कभी भी फ़ोन करने की कोशिश मत करना।” माया ने भी चिल्लाकर कहा और फ़ोन काट दिया।
वीर को माया की बातों पर इतना गुस्सा आया कि उसने अपना फ़ोन छत से नीचे फेंक दिया। लड़ाई प्रेम की आख़िरी हद होती है। इंसान इस झुंझलाहट में लड़ता है कि आप जिसे अपना मानते हैं, जिसे प्रेम करते हैं, जिसके लिए जीते हैं, मरते हैं, वह आपका क्यूँ नहीं है?
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