हसीनाबाद, सन 1975।
दूर नदी के किनारे घोड़े को नहला रहे जमुना को देख कुक्कू ने बग्घी रोक दी। जमुना सड़क से इतनी दूर था कि सहज किसी की निगाह में नहीं आ सकता था। कुक्कू की निगाह में इसलिए आ गया था क्योंकि उसे पहले से ही पता था कि जमुना घाट पर घोड़े नहला रहा है। दरअसल आज शुक्रवार था और हफ्ते में महज़ दो दिन आने वाली पैसेंजर ट्रेन पर्वतरानी के आने का समय हो रहा था। उस ट्रेन से भारी तादात में उतरने वाले मुसाफ़िर बग्घीवालों की अच्छी कमाई का साधन होते थे लिहाजा साथ-साथ स्टेशन चलने के लिए जब कुक्कू ने जमुना के घर पर दस्तक दी थी तो जवाब मिला था कि वह घोड़े को नहलाने के लिए नदी पर गया हुआ है। ये कुक्कू को अटपटा लगा था क्योंकि वे लोग घोड़ों की साफ़-सफ़ाई को तरजीह केवल उस दिन दिया करते थे, जिस दिन स्टेशन पर कोई महत्वपूर्ण ट्रेन नहीं आनी होती थी और मौसम भी साफ़ हुआ करता था लेकिन आज की परिस्थिति उक्त दोनों परिस्थितियों के विपरीत थी। एक जरूरी ट्रेन भी आने वाली थी और वातावरण में दूर-दूर तक धूप का नामोनिशान भी नहीं था। हालाँकि कुहरा नहीं था लेकिन ठण्डी हवाएं अपने चरम पर थीं।
कुक्कू ने बग्घी को सड़क से उतारकर जमुना की ओर मोड़ दिया। थोड़ी देर बाद जब वह उसके करीब पहुँचा तो उसकी हैरानी पहले से कई गुना बढ़ गयी। जमुना घोड़े को नदी के छिछले पानी में खड़ा करके उस पर बाल्टियाँ भर-भरकर पानी उड़ेल रहा था। तेज ठण्ड के कारण घोड़ा जोर-जोर से हिनहिना रहा था लेकिन इससे भी बढ़कर हैरान करने वाली बात ये थी कि घोड़ा खून से सना हुआ था और नदी का पानी भी खून से लाल हो रहा था।
“पागल हो गया है क्या रे जमुना?” कुक्कू कूदकर बग्घी से उतरा और उसके हाथ से बाल्टी छिनते हुए चीखा- “घोड़े को मारने पर क्यों तुला हुआ है? और....और....इतनी चोट कैसे लगी इसे?”
“चोट नहीं लगी है इसे।” जमुना इतने दयनीय लहजे में बोला कि लगा अब रो ही देगा- “खून की होली खेल कर आया है ये।”
जमुना ने कुक्कू के हाथ से बाल्टी दोबारा लेनी चाही लेकिन कुक्कू ने बाल्टी वाला उससे दूर कर लिया और कहा- “पहले घोड़े को ठंडे पानी से बाहर निकाल। तेरी मति मारी गयी है।”
“वो..वो इसे ले गया था कुक्कू।” जमुना जूड़ी के मरीज की भांति कांपते लहजे में कहा- “वो कल रात इसे ले गया था। अब इसमें कोई शंका नहीं है कि वह शैतान की औलाद है। नरभेड़िया है वो।”
हमराज़ दोस्त को सामने पाकर जमुना अपनी बदहवासी को और अधिक जब्त नहीं कर पाया और पिघल गया। वह नदी के पानी में ही बैठ गया होता, अगर कुक्कू ने उसे थाम नहीं लिया होता तो। उसने पहले जमुना को पानी से बाहर निकाला फिर घोड़े को। तत्पश्चात जमुना को साल ओढ़ाया और घोड़े को एक तने से बाँधने के बाद बग्घी में से कुछ सूखी लकड़ियाँ निकालकर आग जलाने लगा। ठण्ड के मौसम में बग्घीवाले सूखी लकड़ियों का बंदोबस्त करके रखते थे ताकि खाली रहने पर अलाव सेंक सकें। जब लकड़ियों ने इतनी पर्याप्त आग पकड़ ली कि घोड़े को अच्छी-खासी गर्मी मिलने लगी तो वह ये भूलकर कि पर्वतरानी स्टेशन पर आ चुकी होगी, जमुना के पास बैठ गया और बोला-
“चल अब बता, हुआ क्या था?”
“पशुपति कल जंगल में गया था।” जमुना कुछ हद तक सामान्य होते हुए बोला- “मेरा ये घोड़ा लेकर गया था।”
कुक्कू ने घोड़े की ओर देखा, जिसके ऊपर लगा खून अभी तक नहीं धुला था फिर बोला- “इसके ऊपर इतना खून कैसे लगा?”
“घर से निकलने से पहले तुझे कोई खबर मिली?” प्रत्युत्तर में जमुना ने भी सवाल किया।
“खबर?” कुक्कू ने जेहन पर जोर डालते हुए कहा- “हाँ, कुछ हलचल तो दिखाई दे रही थी। कई जगहों पर लोग झुण्ड बनाकर बातें करते हुए दिखे लेकिन स्टेशन जाना था इसलिए रूककर जानने की कोशिश नहीं की कि। तू ही बता दे, कुछ हुआ है क्या बस्ती में?”
“लोग कह रहे हैं कि कल रात जंगल से दिल दहला देने वाली चीखें आ रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे कहीं क़त्ल-ए-आम मचा हुआ हो। फिर सुबह होने पर कई घायल कबाइली बस्ती में दिखाई दिए, जिन्होंने बताया कि बीती रात कबीले पर नरभेड़िये ने हमला कर दिया था। किसी को नहीं छोड़ा उसने। केवल वही लोग बच पाए, जो या तो कबीला छोड़कर भाग गए या किसी ऐसी जगह छिप गए, जहाँ वह दरिंदा उन्हें ढूंढ नहीं सका। बता रहे हैं कि मुखिया को सबसे दर्दनाक मौत दी उसने।”
“कल रात तो पूर्णमासी थी।”
“हाँ, और वह रहस्यमयी पशुपति भी जंगल में ही था।”
अब कुक्कू की आँखों में भी हैरत व दहशत नजर आने लगी।
“लेकिन...लेकिन जमुना, वे कबीले वाले तो नरभेड़िये से बचने के लिए रस्म करते हैं। उसकी स्तुति और खुशामद करते हैं। तो क्या कल रस्म के बावजूद नरभेड़िया उनका शिकार कर गया?”
“वे कल भी रस्म कर रहे थे कुक्कू लेकिन इस बार जिस नरभेड़िये से उनका पाला पड़ा था, वह उनके सारे रीति-रिवाजों से वाकिफ था। मैंने कल पशुपति को कानों में रूई ठूँसते हुए देखा था। हालाँकि मुझे देखकर उसने कान में दर्द का बहना बना लिया था लेकिन मुझे कहीं भी दवा की कोई शीशी नहीं दिखाई पड़ी थी क्योंकि उसके कान में दर्द हो ही नहीं हो रहा था। वो तो कानों में रुई इसीलिए ठूंस रहा था ताकि कबीले वालों के मंत्र उसे सुनाई न दे सकें।”
“ऐसा कैसे हो सकता है?” कुक्कू ने उलझन भरे लहजे में कहा- “कबीले वालों का नाचना-गाना तो इतना तेज होता है कि बेहद दूर होने के बावजूद उनकी आवाजें बस्ती तक आती हैं। फिर पशुपति कान में रूई ठूँसने जैसा मामूली तरीका
अपनाकर उन मंत्रों से कैसे बच सकता है?”
“मैं कुछ नहीं जानता।” जमुना का लहजा फिर से व्याकुल होने लगा- “मैं बस इतना जानता हूँ कि कबाइलियों को पशुपति ने ही मारा है क्योंकि कल रात वह मेरा घोड़ा लेकर जंगल में गया था और आज सुबह जब मैं घोड़ा लेने डाक-बंगले पहुँचा तो खून से नहाया हुआ घोड़ा कंपाउंड में खड़ा था। क्या तुझे अब भी समझ में नहीं आया कुक्कू कि घोड़े को कहीं चोट नहीं लगी थी फिर भी वह खून से लाल क्यों हो रहा था?” कुक्कू खामोश रहा तो जवाब जमुना ने ही दिया- “इसलिए हो रहा था क्योंकि कबाइलियों के खून से नहाया हुआ वह पिशाच उसकी सवारी करते हुए कस्बे तक आया था।”
“लेकिन अगर वह नरभेड़िया है तो उसके पास शैतानी ताकतें होंगी। कस्बे से कबीले तक जाने के लिए भला उसे घोड़े की क्या जरूरत थी? बल्कि उसे कोई भी ऐसा रास्ता अख्तियार करने की जरूरत क्या थी, जिससे वह शक के दायरे में आ जाए?”
“वह किसी के शक के दायरे में नहीं है। हर कोई उसे साधारण मानव समझता है, सिवाय मेरे और तेरे। और रही बात शैतानी शक्तियों की तो नरभेड़ियों के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं होती है। पूर्णमासी की रात उनका भेड़िया बनना महज़ एक कुदरती घटना होती हैं, जो उनके साथ खुद ब खुद घटित होती है; उनके चाहने या न चाहने से इस पर कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए कस्बे से कबीले की मीलों लम्बी दूरी तय करने के लिए पशुपति को घोड़े की जरूरत वैसे ही थी, जैसे किसी भी साधारण इंसान को होती।”
“और उसके साथ रहते हुए तुझे जो अजीबोगरीब अनुभव होते हैं, उसका क्या? उसने तुझे जागती आँखों से सपना दिखाया, उसका क्या? हर बार वह तेरे मन में क्या चल रहा है, इसका अंदाजा लगा लेता है, उसका क्या?”
“हो सकता है उसके पास ऐसी कोई मायावी कला हो, जिसके जरिये वह थोड़े समय के लिए किसी के जेहन पर काबू पा लेता हो।”
“तो क्या ये कम खतरनाक है जमुना?” कुक्कू ने उसे घूरा- “तेरी आँखों में झाँककर वह तेरे सारे राज़ से वाकिफ़ हो सकता है, किसी को जागती आँखों से सपने दिखा सकता है; तू..तू...उसकी इन मायावी शक्तियों को शैतानी शक्तियाँ नहीं मानता?”
“अगर मान लूँ तो भी मेरा यकीन नहीं बदल सकता कि उसकी अपनी कुछ कमजोरियाँ हैं, कुछ सीमाएं हैं, जिन्हें वह लांघ नहीं सकता।”
“और तेरे इस घातक यकीन की वजह?”
“उसको यहाँ आये हुए एक महीने से ऊपर हो गए हैं लेकिन उसने कबीले पर
हमला अब जाकर किया, क्यों? यहाँ आने के बाद जब पहली पूर्णमासी पड़ी, तभी कबीले में रक्तपात क्यों नहीं मचा दिया उसने? किस बात का इंतजार था उसे?” थोड़ा ठहरकर जमुना ने आगे कहा- “उसने कबीले पर हमला पूरी प्लानिंग से किया है कुक्कू। एक बार वह मुझसे कबीले के बारे में काफ़ी पूछताछ कर रहा था। पूछ रहा था कि वो कबाइली नरभेड़ियों में इतना यकीन क्यों करते हैं? उन्हें शुक्रवार की रात जंगल में दिखाई देने वाले महल और उसमें रहने वाली परछाईं से डर क्यों नहीं लगता? सिर्फ इतना ही नहीं कबीले के बारे में और जानने के लिए उसने मुझसे किसी कबाइली से मुलाक़ात कराने के लिए कहा था।”
“और तूने करा दी थी?”
“हाँ। जो लड़का हमारे कस्बे में जंगली जड़ी-बूटियाँ बेचने आता है, उसकी मुलाक़ात मैंने पशुपति से करवाई थी फिर वह लड़का अक्सर उसके पास जाने लगा था। उस हैवान ने उसके ही जरिये कबीले की तमाम बातें मालूम की होंगी और फिर योजना बनाकर कबीले पर धावा बोल दिया।” जमुना के लहजे में अपराधबोध का भाव समाहित हो गया- “मैं ही जिम्मेदार हूँ उन कबाइलियों की मौत का।”
“गलती तो वाकई तूने की है। जब उसके आने के कुछ दिनों बाद ही तू ये भाँप गया था कि वो आदमी सही नहीं है, तो फिर उसकी बातों में क्यों आया? क्यों बार-बार उसकी मदद करता रहा?”
“पैसे की लालच में आकर मैंने बहुत बड़ी गड़बड़ कर दी है और अब मैं ही उस गड़बड़ को सही भी करूँगा।” जमुना का लहजा पत्थर की मानिंद सख्त हो गया- “मैं मार डालूँगा उसे। सोते समय उसकी छाती में खंजर उतार दूंगा या उसके खाने में जहर मिला दूँगा।”
“तू कुछ भी नहीं कर पायेगा। मुझे तो अब इस पर भी यकीन नहीं है कि वह कभी सोता होगा या तेरा दिया हुआ खाना आँख मूँद कर खा लेता होगा। अगर उसे थोड़ी सी भी भनक लग गयी कि तू उसकी जान लेना चाहता है तो वह तेरा भी वही हश्र करेगा, जो कबाइलियों का किया। आमने-सामने से लड़कर तू उससे कभी नहीं जीत पायेगा।”
“लेकिन उसे रोकना तो होगा न?”
“रणनीती बनानी होगी। उस आसेबी शख्सियत से निपटने के लिए किसी पहुँचे हुए संत-महात्मा की जरूरत होगी।”
“तू जानता है किसी ऐसे इंसान को?”
“जानता हूँ लेकिन पहले ये कन्फर्म कर कि वह वाकई वही है, जो हम उसे समझ रहे हैं। ये पता कर कि यहाँ आने के पीछे उसका असली मकसद क्या है?”
“उसकी दिलचस्पी उस आसेबी महल में है, जो केवल जुम्मे की रात दिखता है और जिसमें जंगल में घूमने वाली परछाईं रहती है।” कुछ याद करने की कोशिश में जमुना की भवें संकुचित हुईं और उसने आगे बताया- “जब उसने मुझे जागती आँखों से सपना दिखाया था तो महल का नाम लिया था। शायद कह रहा था कि महल के लिए ही वो यहाँ आया है।”
“तो फिर उसने कबाइलियों को मौत के घाट क्यों उतारा? उनसे किस बात का बदला लिया?” कुक्कू की सवालिया निगाहें जमुना पर ठहर गयीं।
“शायद वे कबाइली उसके रास्ते की रुकावट थे। ये भी हो सकता है कि उसने कबाइलियों को मारकर अँधेरे के देवता यानी कि जंगल की उस परछाईं को बलि चढ़ाई हो। लेकिन सवाल ये है कुक्कू कि उसके इरादे हम जानेंगे कैसे? ये पता कैसे लगायेंगे कि वह असल में है क्या चीज?”
“सही समय का इंतजार कर। उसकी गैरमौजूदगी में उसके कमरे की तलाशी ले। डाक-बंगले के लोगों से पूछ कि वह कल रात कब लौटा था, किन हालात में लौटा था। अगर जंगल में क़त्ल-ए-आम मचाने वाला दरिंदा वही होगा तो तुझे उसके कमरे में कोई न कोई सुराग जरूर मिलेगा, मसलन खून से सना, चीथड़े-चीथड़े हुआ कपड़ा, खून के निशान या कुछ और।”
“कबाइलियों को उसी ने मारा है, ये साबित करने की कोई जरूरत नहीं है। तुझे खून से नहाया हुआ मेरा घोड़ा दिख नहीं रहा है क्या?”
“दिख रहा है।” कुक्कू ने घोड़े पर नजर डालते हुए निहायत ही गंभीर लहजे में कहा- “पर जल्दबाजी हमें भारी पड़ सकती है। सिर्फ हमारी ही नहीं, पूरे कस्बे की जान पर बन सकती है।”
जमुना ने सहमति में सिर हिला दिया।
0 Comments