हिटलर चला राष्ट्रपति बनने
अपनी भानजी की आत्महत्या के सिर्फ तीन सप्ताह बाद ही एडोल्फ हिटलर ने पहली बार चौरासी वर्षीय जर्मन राष्ट्रपति (प्रेसीडेंट ऑफ जर्मनी) पॉल वॉन हिंडेनबर्ग से भेंट की।
हिटलर ने गेली की मृत्यु के उपरांत छाई गंभीर उदासी से स्वयं को बाहर निकाल लिया। इससे पहले भी वह दो बार गहरी निराशा में डूब चुका था और दोनों बार अधिक सशक्त होकर बाहर निकला था। पहली बार वर्ष 1918 में, जब वह जर्मनी की हार एवं विश्व युद्ध की समाप्ति की खबर सुनने के बाद विषैली गैस से अंधा होकर अस्पताल में पड़ा हुआ था और दूसरी बार 1924 में, जब बीयर हॉल क्रांति की विफलता के बाद उसे जेल की हवा खानी पड़ी थी।
अक्तूबर 1931 में पूर्व ऑस्ट्रियाई कॉरपोरल को फील्ड मार्शल के सामने पेश किया गया। उस वयोवृद्ध भद्र पुरुष के समक्ष हिटलर कुछ सकपका-सा गया और उसको प्रभावित करने की कोशिश में बेसिर-पैर की बातें करने लगा, हिंडेनबर्ग प्रभावित नहीं हुआ और उसने बाद में कहा कि हिटलर पोस्ट मास्टर बनने के काबिल तो हो सकता है, लेकिन कभी भी जर्मनी के चांसलर जैसे उच्च पद के काबिल नहीं हो सकता।
अक्तूबर 1931 में उस राजनीतिक षड्यंत्र का बीज पड़ गया, जो आगे चलकर नवोदित गणराज्य का नाश करने वाला था और आखिरकार हिटलर को जर्मनी का तानाशाह बनाने वाला था।
राइचस्टैग (जर्मनी की लोकसभा) में अनगिनत राजनीतिक दलों के बीच लगातार राजनीतिक कहा-सुनी एवं कलह ने सरकार को निष्प्रभावी अर्थात् पंगु बना दिया।
इसके अलावा राइचस्टैग में सौ से अधिक निर्वाचित नाज़ी सदस्य थे। हरमैन गोरिंग के नेतृत्व में वे अश्लील, झगड़ालू व्यवहार से सदन की काररवाई में लगातार रुकावट डालते रहते थे, ताकि जर्मनी में लोकतंत्र की जड़ कमजोर हो।
जर्मनी के लोग दो साल की महामंदी के कारण आई व्यक्तिगत मुसीबतों से किसी भी तरह राहत पाने के लिए व्याकुल थे। लाखों लोग बेरोजगार हो गए थे, हजारों लघु व्यवसायों पर ताला लग गया था और हर कोई अभाव एवं भुखमरी को मुँह बाए देख रहा था।
बर्लिन में सभ्यता का ही पर्दाफाश हो रहा था, जहाँ लोग सड़कों पर झगड़ रहे थे, अराजकता में एक-दूसरे की जान ले रहे थे।
लोगों को अपने निर्वाचित नेताओं से अनिर्णय के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा। वे निर्णायक व्यक्ति एडोल्फ हिटलर की ओर मुड़ गए, जिसने बेहतर भविष्य के सपने दिखाए थे।
गणराज्य को एक दूसरी समस्या का सामना करना पड़ा। वर्ष 1932 में कानून के अनुसार राष्ट्रपति का चुनाव होना था। लेकिन हिंडेनबर्ग, जिसने लड़खड़ाते लोकतंत्र को अभी तक जोड़कर रखा हुआ था, बहुत बूढ़ा हो रहा था और उसका कहना था कि वह दुबारा चुनाव लड़ने का इच्छुक नहीं है।
अगर उसे चुनाव लड़ने के लिए राजी कर भी लिया जाता, तब भी सात वर्ष का कार्यकाल समाप्त होने तक उसकी उम्र 92 वर्ष की हो जाती और पृष्ठभूमि में हर समय हिटलर ही नजर आता। यदि वह कार्यकाल पूरा होने तक जीवित नहीं रहता तो इसकी संभावना अधिक थी, क्योंकि उसका स्वास्थ्य गिरने लगा था, उस दशा में हिटलर को जल्दी मौका मिल जाता।
वर्ष 1932 के आरंभ में एडोल्फ हिटलर को चांसलर ब्रूनिंग से एक तार प्राप्त हुआ, जिसके द्वारा हिंडेनबर्ग का वर्तमान कार्यकाल बढ़ाने की संभावना पर चर्चा करने के लिए उसे बर्लिन बुलाया गया था। यह न्यौता पाकर हिटलर को बहुत खुशी हुई।
वह मिलने के लिए गया और प्रस्ताव के बारे में सुना, लेकिन कोई जवाब नहीं दिया। चांसलर की मदद करने और इस प्रकार गणराज्य को बनाए रखने का कोई कारण नहीं था।
फरवरी 1932 में राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग न चाहते हुए भी दुबारा चुनाव के लिए तैयार हो गया और पुनर्निर्वाचन के लिए उसने अपनी उम्मीदवारी घोषित कर दी। हिटलर ने राष्ट्रपति पद के लिए उसके विरोध में खड़े होने का निर्णय किया।
हिटलर ने थके हुए और वृद्ध राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग के खिलाफ नाज़ी अभियान के दौरान ‘आजादी और रोटी’ का नारा बुलंद किया।
जोसेफ गॉबेल्स ने हिटलर की ओर से प्रचंड अभियान चलाया, जो वर्ष 1930 के चुनावी प्रयास से बहुत बढ़कर था। हर जगह नाज़ी पोस्टर लगाए गए। उसने अपने लिए और हिटलर के लिए भाषणों का तूफानी कार्यक्रम तैयार किया। नाज़ियों ने पूरे जर्मनी में रोजाना हजारों रैलियों का आयोजन किया। उन्होंने लाखों इश्तहार और नाज़ी अखबारों की अतिरिक्त प्रतियों का वितरण किया। गॉबेल्स ने हिटलर के फोनोग्राफ रिकॉर्ड और फिल्में बनाकर बाँटने के लिए नई टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया।
प्रेसीडेंट हिंडेनबर्ग ने वस्तुत: कुछ नहीं किया। उसने केवल अपनी प्रतिष्ठा पर भरोसा किया और उन जर्मनी वासियों के वोटों पर उम्मीद जताई, जो उग्र सुधारवादियों को सत्ता से बाहर रखना चाहते थे। गॉबेल्स को बहुत आशा थी कि हिटलर पासा पलट सकता है और बहुमत से पद हासिल कर सकता है। परंतु हिटलर की अपनी शकाएँ थीं। उसने मुहिम चलाई, यह समझते हुए कि वह वृद्ध भद्र पुरुष को गद्दी से हटाने में नाकामयाब हो सकता है। लेकिन यह एक मौका भी था कि वह अपने लिए और अपनी पार्टी के लिए समर्थन जुटा सके तथा नाज़ी प्रभाव बढ़ा सके।
जर्मनी में बहुत लोगों को भविष्य में नाज़ियों की लहर नजर आ रही थी। 1930 में हुए चुनावों की अद्भुत सफलता के बाद पार्टी से हजारों नए सदस्य जुड़ गए थे। वर्ष 1932 की वसंत ऋतु में लाखों लोग उस समय हिटलर की ओर मुड़ने लगे, जब उन्होंने देखा कि 60 लाख बेरोजगार हैं। बर्लिन में अराजकता, भुखमरी और तबाही है, मार्क्सवाद का भय व्याप्त है और भविष्य अनिश्चित है।
13 मार्च, 1932 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में हिटलर को 1 करोड़ 10 लाख से अधिक (1,13,39,446) वोट या कुल के 30 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। हिंडेनबर्ग को 1,86,57,497 वोट या 49 प्रतिशत वोट मिले।
हिंडेनबर्ग को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ, जो उसे चाहिए था और इसके परिणामस्वरूप चुनाव को जारी रखना जरूरी हो गया। गॉबेल्स और अनेक नाज़ी नेताओं को काफी निराशा हुई।
लेकिन हिटलर ने तत्काल उन्हें 10 अप्रेल को होनेवाले चुनावों के लिए जोरदार अभियान चलाने के लिए कहा। चुनाव के लिए एक माह से भी कम समय रह गया था।
अभियान के दौरान हिटलर ने जर्मनी में एक कोने से दूसरे कोने तक जाने के लिए विमान का प्रयोग किया। वह बादलों को चीरकर नीचे उतरता, जहाँ विशाल जनसमूह उसे हाथोहाथ लेने के लिए बेचैनी से उसका इंतजार कर रहा होता। वह उन्हें एक सकारात्मक संदेश देता, हर किसी के लिए कोई-न-कोई वचन देता और फिर विमान में चढ़कर बादलों में छिप जाता। हिटलर ने एक बार यह वादा किया कि ‘‘तीसरे जर्मन साम्राज्य (राइक) में हर जर्मन लड़की को एक पति प्राप्त होगा।’’
लेकिन किसी भी राजनीतिज्ञ की भाँति हिटलर भी लोक-निंदा से परे नहीं था। सोशल डेमोक्रेट्स नामक एक विरोधी दल द्वारा संचालित अखबार के हाथों में वे पत्र आ गए, जो एस.ए. प्रमुख अर्नस्ट रोहम तथा एक पुरुष डॉक्टर ने एक-दूसरे को लिखे थे और जो पुरुषों में उनकी आपसी दिलचस्पी के बारे में थे। हिटलर को पता था, रोहम समलैंगिक है, लेकिन वह उसकी अनदेखी इसलिए करता रहा, क्योंकि रोहम उसके लिए बड़े काम का आदमी था।
जहाँ तक हिटलर का संबंध है, उसके सामने सवाल यह था कि क्या रोहम ने किन्हीं कम उम्र पुरुषों के साथ दुर्व्यवहार किया है। नाज़ी वकील हेंस फ्रैंक ने इस मामले की जाँच-पड़ताल की और हिटलर को आश्वस्त किया कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला है। हिटलर को कुछ राहत मिली। इस तरह युद्ध में चोट खाया हुआ आक्रामक तूफानी दस्ता नेता अर्नस्ट रोहम कम-से-कम उस समय तो एस.ए. का नेता बना रहा, जिसके अधीन 4,00,000 सैनिक थे।
नाज़ियों ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रचार अभियान जोर-शोर के साथ चलाए रखा। हिटलर ने दिन में कई-कई सभाओं में भाषण दिए। राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग ने पहले से भी कम प्रचार किया और एक भी भाषण नहीं दिया, जिसके कारण यह अफवाह फैल गई कि शायद वह बीमार चल रहा है।
रविवार, 10 अप्रेल, 1932 को जब आसमान बादलों से घिरा था और बरसात भी हो रही थी, लोगों ने मतदान किया। उन्होंने हिटलर को 1,34,18,547 या 36 प्रतिशत वोट दिए, अर्थात् पहले के मुकाबले 20 लाख अधिक और हिंडेनबर्ग को 1,93,59,983 अथवा 53 प्रतिशत वोट मिले, अर्थात् उसे प्राप्त वोटों की संख्या में 10 लाख से भी कम वृद्धि हुई।
85 वर्षीय हिंडेनबर्ग पूर्ण बहुमत के साथ अगले सात वर्ष के लिए निर्वाचित हो गया। पर चैन किसी को नहीं था। हिटलर और नाज़ियों ने जबरदस्त लोकप्रियता का परिचय दिया था।
बर्लिन भय, षड्यंत्र, अफवाहों और अव्यवस्था के भँवर में फँस गया। उस अव्यवस्था भरे माहौल में एक व्यक्ति उठ खड़ा हुआ, जिसका नाम कुर्ता वॉन इलाहइशर था। वह एक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी सेना अधिकारी था और उसकी यह धारणा थी कि जर्मनी पर हिटलर नहीं, वह राज्य करेगा। जर्मन गणराज्य उतना ही अस्थिर था जितना कि उसका नेतृत्व करनेवाला, बूढ़ा और डाँवाँडोल भला-मानुस। वह रत्नाइशर और हिटलर दोनों के खिलाफ था।
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