राजनगर, वर्तमान।

वह शहर का सरकारी अस्पताल था, जहाँ डॉक्टर के केबिन के बाहर पड़े लकड़ी के बेंच पर बैठा फाह्याज़ बोर होने की कगार पर पहुँच चुका था। कारण कि आधा घंटा गुजर जाने के बाद भी डॉक्टर का केबिन यूँ खाली पड़ा था, जैसे मंदिर के गर्भगृह से भगवान् की मूर्ति चोरी हो गयी हो। वह थोड़े-थोड़े अंतराल पर गुजर रहे हर वार्डबॉय से इस बाबत दरयाफ्त कर रहा था कि डॉक्टर साहिबा का आगमन कब होगा लेकिन उनमें से कोई भी या तो भाव नहीं दे रहा था या फिर संतोषजनक जवाब।

वह अस्पताल का मनोचिकित्सा के लिए समर्पित खण्ड था और जिस केबिन के सामने फाह्याज़ इस वक्त अपना खूँटा गाड़ा हुआ था, उसमें डॉ. साधना वैरागी नाम की कोई मोहतरमा बैठती थीं। बगल के कमरे से महिलाओं के जोर-जोर से बातें करने की आवाजें आ रही थीं। फाह्याज़ ने एक-दो बार उस कमरे में भी झाँककर डॉक्टर साहिबा के आने को लेकर पूछताछ करनी चाही थी लेकिन जब-जब वह अंदर झाँकता था, तब-तब महिलाएं अपनी बातचीत यूँ रोक देती थीं, जैसे उनका स्विच एक साथ ऑफ कर दिया गया हो तत्पश्चात इतने गंभीर भाव से उसे घूरने लगती थीं कि कुछ पूछने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ती थी। अंतर्मुखी और साथ ही साथ महिलाओं के मामले में दब्बू होने के कारण फाह्याज़ को अक्सर ऐसे खामियाजे भुगतने पड़ते थे। यूनिफार्म में न आने की गलती पर उसे बहुत अफ़सोस हुआ, उस दशा में कम से कम उसे तवज्जो तो दी जाती, डर से ही सही। वह जेब से एक रुपये में कटाई गयी पर्ची निकालकर यूँ ही घूरने लगा और कुछ समय बाद वापस जेब में रखा ही था कि डॉक्टर के केबिन से कोई आहट आयी। बिजली की फूर्ती से वह केबिन के डोरवे पर प्रकट हुआ और यही वह पल था, जब बुरी तरह उछल पड़ा।

केबिन में बदन पर डॉक्टरी कोट डाली हुई जो औरत कुर्सी पर बैठने की तैयारी में थी, वह उन्हीं में से एक थी, जिसे उसने बगल वाले कमरे में गप्पे लड़ा रही महिलाओं के हुजूम में देखा था। लगभग पैंतीस साल की वह खूबसूरत महिला सीधे केबिन में कैसे प्रकट हो गयी थी, इसका जवाब उस दरवाजे ने दिया, जो संभवत: उस केबिन को बगल वाले कमरे से जोड़ रहा था। ‘बगल में छोरा, गाँव में ढिंढोरा’ का शिकार बना फाह्याज़ बुरी तरह भन्ना गया और धड़धड़ाते हुए भीतर घुस गया। उसकी हरकत पर डॉक्टर साहिबा ने उसे यूँ घूरा, जैसे वह कोई परग्रही हो।

“हद करती हैं आप लोग भी।” वह किलस कर बोला- “मुझे आधे घंटे से ऊपर हो गए यहाँ बैठे हुए और आप गप्पें लड़ाकर अब खाली हुईं।”

“तुम्हारी शक्ल पर तो नहीं लिखा है न कि तुम पेशेंट हो। बदतमीजों की तरह बार-बार कमरे में झाँककर महिलाओं को ताड़ रहे थे। एक भी बार बताया तुमने कि दिमाग का इलाज करवाने आये हो?” साधना ने भी उसी के जैसी ऊँची टोन में कहा।

“ये आपका ड्यूटी ऑवर है, आपको अपने केबिन में होना चाहिए। हर पेशेंट आपको पहचानता तो नहीं होगा न, जो इतने बड़े हॉस्पिटल के किसी कोने से पहले आपको ढूंढकर लाएगा, फिर सलाह लेगा।”

“मुझे नहीं पता था कि तुम्हारे जैसा खाता-पीता शख्स भी सरकारी अस्पताल में इलाज करवाता है।” साधना ने व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, जो कि फाह्याज़ को चुभ गया।

“बहुत गलत बात बोल दी आपने मैडम।” उसने अप्रत्याशित रूप से गंभीर लहजे में कहा- “मुझे तो अब आपकी डिग्रियों पर शक हो गया है। ये डाउट हो गया कि आपने ये पद काबिलियत के बल पर नहीं बल्कि तगड़ी सिफारिश के बल पर हासिल की है। हमारे देश का बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है, जो फाइव स्टार होटल सरीखे बड़े-बड़े अस्पतालों के रंग-बिरंगे प्रिस्क्रिप्शन पेपर के बजाय एक रुपये की पर्ची पर भरोसा करता है लेकिन आप जैसे लोग ऐसी संवेदनहीन टिप्पणी करके, उनके साथ दुर्व्यवहार करके उनके भरोसे का, उनकी गरीबी का मजाक उड़ाते हैं। किस हक़ से करते हैं आप ऐसा? क्या यहाँ बैठकर आप कोई चैरिटी कर रही हैं? क्या जनता को मुफ्त में सलाह देने की एवज में सरकार आपको अच्छी पगार नहीं देती?” फाह्याज़ ने ठहरकर कुछ देर तक साधना को घूरा फिर हौले से मेज पर मुक्का मारते हुए बोला- “यू आर टोटली अनफिट फॉर दिस हाइली रेस्पोंसिबल जॉब। आई विल फाइल अ ऍफ़आईआर इन माय पुलिस स्टेशन अगेंस्ट यू फॉर बीइंग एब्सेंट इन द वार्ड ड्यूरिंग ड्यूटी ऑवर्स।”

‘....इन माय पुलिस स्टेशन’ ये वाक्यांश सुनते ही साधना के हाथ पाँव फुल गए। उसने घबराहट का भाव लिए हुए फाह्याज़ की ओर देखा प्रतिक्रियास्वरूप फाह्याज़ ने अपना आईकार्ड निकालकर उसके सामने रख दिया। उसके डेजिग्नेशन से वाकिफ़ होते ही साधना के टोन बदल गए।

“आयम...आयम रियली सॉरी मिस्टर फाह्याज़....आयम रियली सॉरी फॉर

सच अ रॉंग एटिट्यूड। मुझे...मुझे..नहीं...।”

“प्लीज...।” फाह्याज़ ने ऐसे लहजे में कहा, मानो बड़ी मुश्किल से अपने गुस्से को जब्त कर पा रहा हो- “प्लीज खामोश रहिए आप क्योंकि आपके सेंटेंस, आपकी थिंकिंग सब कुछ डिस्टर्बिंग है। आपके प्रोफेशन में ये एक्सपेक्टेड नहीं है कि आप किसी के सोशल स्टेटस को देखते हुए अपना एटिट्यूड चुनें।”

साधना कसमसाकर खामोश रह गयी। उसके कैरियर में ये पहली बार था, जब किसी ने इस तरह उसे उसकी ड्यूटी की याद दिलाई थी। वह होंठ चबाते हुए माहौल के सामान्य होने का इंतजार करने लगी और जब फाह्याज़ कुछ हद तक संतुलित नजर आने लगा तो वह असहज भाव से बोली- “आप...आप...प्लीज बताइए कि किस तरह की साइकोलॉजिकल प्रॉब्लम है आपके साथ।”

“एक्चुअली...।” फाह्याज़ ने गहरी साँस लेकर आँखें बंद कीं और फिर अपना लहजा पहले जैसा रखते हुए कहा- “इंटरप्रेटेशन ऑफ ड्रीम को लेकर आपसे कुछ बात करनी है मुझे।”

“सिगमंड फ्रायड की किताब के बारे में?” साधना के माथे पर बल पड़े।

“नहीं..नहीं..।” फाह्याज़ ने स्पष्ट किया- “एक सपने को लेकर मेरे कुछ पर्सनल एक्सपीरियेंसेज हैं, उन्हीं पर आपके ओपिनियन जानना चाहता हूँ।”

“जी बताएं।”

“मुझे मेरी गुजर चुकी पत्नी का सपना आया था, जिसमें वो कटोरे में भरे खून से एक नरभेड़िये को नहला रही थी।” इतना कहने के बाद फाह्याज़ थमकर साधना की ओर देखने लगा।

“आपकी वाइफ को पास हुए कितना वक्त हुआ?” साधना ने पूछा।

“एक साल।”

“सपना आपको एक से अधिक बार आ चुका है?”

“हालाँकि केवल एक बार आया लेकिन जिस तरह आया और जिन हालात में आया, उनके मद्देनजर इसे साधारण नहीं कहा जा सकता।”

“एक्सप्लेन कीजिए।”

“आई मीन मुझे ऐसा फील हुआ था, जैसे मैं जागती आँखों से वह सब-कुछ देख रहा हूँ। नींद खुलने पर बुरी तरह डरा हुआ था। इतना कि डर के मारे अब्बू के कमरे में चला गया था।”

“सपने देखकर डर जाना चित्त की अस्थिरता और भावुक प्रवृत्ति को दर्शाता है। अंतर्मन में कोई अपराधबोध होने पर अक्सर ऐसे सपने आते हैं। क्या वाकई आपको कोई गिल्ट फील होता है?

“गिल्ट तो बस यही है कि मैं अपनी बीवी को बचा नहीं पाया। प्रोफेशनल

लाइफ में कभी-कभी पॉलिटिकल इंटरफेयरेंस हो जाने पर वाजिब एक्शन न ले पाने का अपराधबोध भी हफ़्तों या महीनों तक बना रहता है।”

“आप कार्मिक सायकल में यकीन रखते हैं? आई मीन क्या आप ये मानते हैं कि हमारे साथ जो कुछ भी होता है, उसके लिए हम खुद जिम्मेदार होते हैं?”

“बिल्कुल करता हूँ। मैं मुसलमान हूँ फिर भी गीता में कही गयी कार्मिक थ्योरी में स्ट्रांगली बिलीव करता हूँ क्योंकि अच्छी बातों को अमल में लाने में कोई बुराई नहीं है, चाहे वह किसी भी मजहब की हों।”

“हम्म।” साधना ने यूँ गहरी साँस ली, जैसे फाह्याज़ की मानसिक हालत को बखूबी समझ गयी हो- “इट्स नॉट अ बिग इशू मिस्टर फाह्याज़। आप इमोशनल हैं, कर्मा बिलिवर हैं और हाल ही में अपनी वाइफ को खोये हैं इसलिए आपके अंदर ये गिल्ट है कि आपके कार्मिक रिफ्लेक्शन की वजह से आपकी वाइफ की मौत हुई। यानी कि आपका कोई गलत काम ही उनकी मौत की वजह बना, ये अपराधबोध आपके मन में गहराई तक बैठ गया है।” साधना थोड़ा ठहरकर आगे बोली- “समटाइम्स अच्छी बातों का ऑब्सेसन भी बहुत भयानक हो जाता है। आपके केस में यही हो रहा है। हमारे कर्म लौटकर हमारे ही पास आते हैं, इस यकीन की बदौलत आप कोई भी बुरा काम करने से बचते हैं, इट्स रियली ऐन अप्रिसियेबल डीड लेकिन अपने साथ घटी हर बुरी घटना को, पास्ट में किये गए किन्हीं ऐसे बुरे कामों से जोड़ लेना, जिनके बारे में आप जानते तक नहीं; बहुत ही डेंजरस है। ये आपके अंदर गिल्ट पैदा करेगा, आपको अवसाद की ओर ले जाएगा। आप सपने देखकर इसीलिए डर जाते हैं क्योंकि आप बहुत सारे गिल्ट के साथ जी रहे हैं।”

“सपने में नरभेड़िया और शबनम के नजर आने के पीछे क्या लॉजिक है? शबनम मेरी वाइफ का नाम था।”

“केस क्या था?”

“वो प्रेग्नेट थी। एक्सिडेंटली गिर जाने के कारण वजायनल ब्लीडिंग हुई, फिर ट्रांसफ्यूजन एंड देन एनाफिलैक्टिक शॉक। ट्रांसफ्यूजन के कुछ घंटों के अंदर ही वह..।” फाह्याज़ ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

फाह्याज़ की बात सुनकर साधना के चेहरे पर कई सवाल आये और चले गए लेकिन प्रत्यक्ष में उसने पूछा- “शबनम की मौत के बाद से आप डॉक्टर्स के बारे में क्या ख्याल रखते हैं?”

“थोड़ा सा मन खिन्न रहता है क्योंकि गिरने जैसी मामूली सी घटना के कारण मेरी बीवी चली गयी और वे कुछ नहीं कर पाए। जबकि हम समय से उसे हॉस्पिटल ले गए थे।”

“दरअसल आपका अवचेतन मन जब सपने बुनता है तो वह डॉक्टर्स को भेड़िये के रूप में प्रोजेक्ट करता है और आपकी पत्नी को विक्टिम के रूप में। चूँकि आपकी पत्नी की मौत में ब्लड ट्रांसफ्यूजन की अहम् भूमिका है, इसलिए सपने में वो खून से भेड़िये यानी कि डॉक्टर को नहलाती नजर आती हैं। इन योर ड्रीम, वुल्फ इज मेटाफर ऑफ़ डॉक्टर।”

फाह्याज़ ने एक गहरी साँस ली लेकिन कहा कुछ नहीं। साधना ने अपने स्तर से उसके सपने की जो व्याख्या की थी, वह उसकी दशा पर तो सटीक बैठ सकती थी लेकिन वही व्याख्या जब वह कामरान के केस पर अप्लाई कर रहा था तो वह पूरी तरह से निराधार हो जा रही थी। कामरान का तो विनायक या पेटिंग वाली बाकी शख्सियतों से कोई सम्बन्ध नहीं था, फिर उसे उनसे जुड़े ऐसे सपने बार-बार क्यों आते थे? वे खून से नरभेड़िये को नहलाते हुए कामरान को क्यों दिखाई देते थे?

“एम् आई क्लियर?” साधना की आवाज़ ने फाह्याज़ की तंद्रा भंग की।

“नो..नो...।” उसने प्रतिरोध किया- “आपकी एक्सप्लानेशन केवल मेरी कहानी को ही जस्टीफाई कर रही है, जबकि ये सपना किसी और से भी जुड़ा हुआ है।”

“यू मीन कि सेम यही सपना किसी और को भी आता है?”

उन दोनों की बातचीत अब ऐसे मोड़ पर पहुँच चुकी थी, जहाँ से आगे बढ़ने का मतलब था साधना को भी इन्वेस्टीगेशन में इन्वाल्व कर लेना इसलिए फाह्याज़ उस पर नजरें टिकाये हुए ये फैसला करने लगा कि वह महिला उसके काम आ सकती है या नहीं। वह तथ्यों को जोड़कर तार्किक नतीजे निकालने में माहिर थी, इसका उदाहरण उसने कुछ समय पहले ही देख लिया था लिहाजा केस में उसकी मदद लेना उसे अहमकाना फैसला नहीं लगा। प्रत्यक्ष में उसने कहा- “क्या आप अँधेरी दुनिया में यकीन करती हैं?”

“जरूर। हर वो दुनिया अँधेरी है, जहाँ ज्ञान का प्रकाश नहीं है।”

“मेरा मतलब है कि अनसुलझे रहस्य, भूत-प्रेत, सुपरनेचुरल बीइंग्स वगैरह-वगैरह।” कहने के साथ ही फाह्याज़ ने अपनी सवालिया निगाहें उस पर टिका दीं।

“यकीन तो नहीं करती लेकिन अगर एक पुलिस ऑफिसर ऐसी किसी मौजूदगी का दावा करेगा तो उसके पीछे का सच जानने की कोशिश जरूर करूँगी।”

“मुझे आपसे इसी जवाब की उम्मीद थी।” फाह्याज़ का लहजा उत्साह से भर गया- “दरसअल मेरे जीवन में इन हौलनाक घटनाओं की शुरूआत एक क़त्ल से हुई, विनायक शुक्ला के क़त्ल से।”

और फिर फाह्याज़ ने अब तक के वाकयात को तथ्यों व निष्कर्षों समेत विस्तारपूर्वक साधना के सामने रख दिया।

“हे माँ।” वह गले में लटकी दुर्गा जी की लॉकेट को छूते हुए हैरतजदा लहजे में बोली- “इट्स..इट्स वैरी स्ट्रेंज। एक..एक आर्टिस्ट की बनाई हुई तस्वीरें किसी की मौत की वजह कैसे बन सकती है? और...और इन सबमें आपकी वाइफ कैसे शामिल हैं?”

“मौतों के इस सिलसिले को रोकने के लिए मुझे यही मिस्ट्री हल करनी है, इवेन हमें हल करनी है, एक साथ मिलकर।”

“लेकिन मैं आप लोगों की मदद कैसे कर सकती हूँ?” साधना के लहजे में विवशता भर आयी- “ये मनोविज्ञान का नहीं शैतान का विषय है। साफ़-साफ़ किसी प्रेतात्मा का दखल दिखाई दे रहा है इन घटनाओं में। अगर...अगर आपके अलावा किसी और ने ये बात कही होती तो मैं कभी यकीन नहीं करती उस पर।”

“आप मदद कर सकती हैं साधना जी।” फाह्याज़ ने जोर देकर कहा- “मैंने नतीजे निकालने की आपकी क्षमता को कुछ देर पहले ही देखा। आप ड्रीम्स का इंटरप्रेटेशन अच्छा कर लेती हैं। इस केस में जरूरत है तो बस नरभेड़िये के सपने को किसी दूसरे नजरिये से इंटरप्रेटेट करने की।”

“लेकिन मैं वो दूसरा नजरिया लाऊंगी कहाँ से मिस्टर फाह्याज़? मेरे पास ऐसा कोई एक्सपीरीयेंस नहीं है।”

“हम मिलकर लायेंगे। अभी-अभी तो आपने कहा था कि अगर मैं कुछ अविश्वसनीय बताऊँगा तो आप उसके पीछे के सच को ढूंढने की कोशिश करेंगी।”

साधना असमंजस में पड़कर फाह्याज़ को घूरने लगी।

“मैं फिर से कहती हूँ सर कि आप किसी पैरानॉर्मल एक्सपर्ट की मदद लीजिए।” साधना ने विनीत स्वर में कहा।

“और मैं भी फिर से कहता हूँ कि आप मेरी मदद कीजिए। हमारा भी इन मामलात को हैंडल करने का कोई एक्सपीरीयेंस नहीं है। हम तो केस तक क्लोज कर चुके हैं। लेकिन फिर भी उस मामले की तह तक जाना चाहते हैं तो इसकी वजह सिर्फ इंसानियत है। किसी नजर न आने वाली सत्ता से हम उलझना चाहते हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि हम निर्दोषों की जान बचाना चाहते हैं।”

“ठ...ठीक है। मैं कोशिश करती हूँ।” अंतत: साधना ने घुटने टेक दिए और थोड़ी देर तक कुछ विचार करने के बाद आगे बोली- “पहले मैं आपकी मिसेज की डिटेल्ड केस स्टडी करना चाहती हूँ, क्योंकि जिस एनाफिलैक्टिक शॉक की आपने बात की, वह तो एक कॉमन कंडीशन है, जो इतना फैटल नहीं होता कि पेशेंट की सडन डेथ हो जाए इसलिए मुझे लगता है कि आपकी वाइफ के साथ कोई और भी सीवियर कंडीशन रही होगी।”

“उसके साथ जो कुछ हुआ था, ट्रांसफ्यूजन के बाद हुआ था।”

“यानी की जो भी गड़बड़ हुई, ट्रांसफ्यूजन के दौरान हुई।” साधना ने विचारपूर्ण मुद्रा अख्तियार करते हुए कहा- “लास्ट मोमेंट में आपकी वाइफ ने क्या सिम्प्टम शो किये थे?”

“मैं उसके पास नहीं था लेकिन अब्बू ने बताया था कि सिर दर्द, घबराहट, फीवर, साँस लेने में दिक्कत जैसी कुछ शिकायत की थी उसने।”

“ये सब ट्रांसफ्यूजन के दौरान ही शुरू हो गया था या ट्रांसफ्यूजन कम्पलीट होने के बाद?”

“नहीं पता क्योंकि मैं आख़िरी वक्त में उसके साथ नहीं था।” फाह्याज़ का लहजा लड़खड़ाया।

“हालाँकि मैं एक साइकोलॉजिस्ट हूँ, इसलिए इस पर ऑथराइजेशन के साथ नहीं कुछ कह सकती लेकिन मुझे लगता है कि वो ट्रांसफ्यूजन ही आपकी वाइफ की मौत की वजह बना।”

“यू मीन हॉस्पिटल की लापरवाही? मेडिकल नेग्लिगेंसी?” फाह्याज़ के माथे पर बल पड़ गये।

“नहीं-नहीं।” साधना ने जल्दी से पहलू बदलकर कहा- “ये मेरी फील्ड का टॉपिक नहीं है, इसलिए मैं श्योर हुए बिना किसी हॉस्पिटल पर इतना बड़ा एलीगेशन नहीं लगा सकती।” थोड़ी देर रुककर वह आगे बोली- “मेरे हसबैंड सीनियर पैथोलॉजिस्ट हैं। मैं ये केस उनके साथ डिस्कस करती हूँ फिर कुछ फिगर आउट करके बताती हूँ। क्या आपके पास उस केस के सारे डाक्यूमेंट्स हैं?”

“मैंने जला दिए थे क्योंकि वे मुझे उसकी याद दिलाते थे।”

“तो फिर हॉस्पिटल के एमआरडी से निकलवा लीजिए, हमें जरूरत पड़ सकती है।”

“थैंक यू मैम।” फाह्याज़ ने कृतज्ञ लहजे में कहा।

“सिर्फ थैंक्स से काम नहीं चलेगा, मेरे खिलाफ़ ऍफ़आईआर लिखवाने का इरादा भी आपको छोड़ना पड़ेगा।” साधना हँसी।

“ऑफ़कोर्स क्योंकि मुझे यकीन है कि अब आप अपने फ़र्ज़ से कभी कन्नी काटकर नहीं निकलेंगी, अब चलता हूँ। यहाँ से सीधे हॉस्पिटल जाऊंगा। प्लीज अपना फोन नम्बर दे दीजिए।” फाह्याज़ ने सेलफोन का डायलर ओपन करते हुए कहा।

साधना का बोला गया नम्बर उसने सेव किया तत्पश्चात उस नंबर पर एक

मिस कॉल भी छोड़ दिया ताकि साधना भी उसका नम्बर सेव कर सके। उक्त कार्य निबटाने के बाद वह केबिन से बाहर आया और सुबोध का नंबर डायल किया।

“कामरान ने उन पेटिंग्स को फोटो टाइप इमेजेस में कन्वर्ट किया?” रिसीव होते ही उसने पूछा।

“जी हाँ, अभी-अभी उसका मेल आया है। जल्द ही काम पर लगता हूँ। वैसे अभी आप कहाँ हैं?”

“सरकारी अस्पताल में था लेकिन अब यहाँ से उस हॉस्पिटल के लिए निकल रहा हूँ, जहाँ शबनम एडमिट थी।”

“आप सरकारी अस्पताल क्यों गए थे?” दूसरी ओर से सुबोध का हैरतजदा स्वर आया।

“साइकोलॉजी वार्ड में आया था, अपने सपने को इंटरप्रेटेट कराने के लिए।”

“मेरा मतलब है कि अगर यही करना था तो किसी अच्छे साइकोलॉजिस्ट के पास गये होते। एक रुपये में आपको आपके सपने की कौन सी व्याख्या मिली होगी वहाँ?”

“काफी कुछ मिला। और फिर मुझे उस अजीब से सपने को लेकर एक साइकोलॉजिस्ट की राय जाननी थी, बस। अपना कोई इलाज नहीं कराना था। ऐसे मामूली काम के लिए किसी प्राइवेट डॉक्टर की पंद्रह सौ रूपये फीस क्यों अफोर्ड करता? पुलिस वाला हूँ, ट्वेंटी फोर सेवेन लगा रहता हूँ तब जाकर चार पैसे मिलते हैं। यूँ ही क्यों उड़ाता फिरूं?”

“ये भी ठीक है। वैसे हॉस्पिटल क्यों जा रहे हैं?”

“लम्बी बात है। लौटकर बताता हूँ।”

कहने के बाद फाह्याज़ कॉल डिसकनेक्ट करके वार्ड से बाहर आया और बाइक की ओर बढ़ गया।