जर्मन जनता द्वारा नाज़ी सदस्यों का चुनाव
एडोल्फ हिटलर और नाज़ियों ने वर्ष 1930 में तूफानी रफ्तार से आधुनिक अभियान चलाया। जर्मनी में ऐसा कुछ पहले कभी नहीं देखा गया था। हिटलर ने पूरे देश का भ्रमण किया, जगह-जगह दर्जनों भाषण दिए, सभाओं में भाग लिया, लोगों से हाथ मिलाए, अपने हस्ताक्षर दिए, फोटो खिंचवाए और छोटे-छोटे बच्चों को चूमा।
जोसेफ गॉबेल्स ने बड़ी सूझ-बूझ से हजारों सभाओं, मशाल जुलूसों का आयोजन किया। हर जगह पोस्टर चिपकाए और नाज़ी अखबारों के विशेष संस्करणों की लाखों प्रतियाँ छपवाईं।
जर्मनी महामंदी की गिरफ्त में था और बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता के बीच लोग गरीबी, विपत्ति व अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे थे।
प्रभावशाली वक्ता हिटलर के लिए जर्मन लोगों पर अपनी योग्यताओं के बाण छोड़ने का दीर्घ प्रतीक्षित अवसर आ गया था। उन पद-दलित लोगों में उसे वह श्रोता वर्ग मिला, जो उसकी बात सुनने का इच्छुक था। अपने भाषणों में हिटलर ने जर्मनी के लोगों को वही दिया, जिसकी उन्हें सर्वाधिक आवश्यकता थी—हौसला। उसने ढेरों अस्पष्ट वादे किए और उन वादों का ब्योरा टाल गया। उसने सीधे-सादे मुहावरों का प्रयोग किया और उन्हें बार-बार दुहराया।
सभाओं को संबोधित करने के उसके कार्यक्रमों को बड़ी सावधानी से नाटकीय बनाने का प्रयास किया जाता। श्रोताओं को जान-बूझकर लंबी प्रतीक्षा कराई जाती, जान-बूझकर बेचैनी बढ़ने दी जाती और यह बेकरारी तभी टूटती जब सुनहरे झंडों के साथ भूरी कमीजों के भव्य जुलूस सैनिक धुन बजाते हुए आते और अंतत: ‘जय-जयकार’ के उच्च-घोष के बीच हिटलर के दर्शन होते। थिएटरनुमा रोशनी और स्वस्तिकों से सजे-धजे बंद हॉल के अंदर बड़ा जबरदस्त एवं चित्ताकर्षक प्रभाव पड़ता था।
हिटलर पहले धीमी अटकती आवाज में अपना भाषण शुरू करता, फिर धीरे-धीरे उसका स्वर बढ़ता जाता और चरम बिंदु पर पहुँचकर उन्मत्त आवेश में फट पड़ता। लगता था, उसने काफी अभ्यास से यह शैली अपनाई है, जिसमें उसके हाथों की भाव-भंगिमा भी अधिकतम प्रभाव उत्पन्न करने में उसका साथ देती। वह लोगों की भावनाओं के साथ खेलता, उत्तेजना को इस स्तर तक बढ़ा देता कि लोगों की आँखें फटी रह जातीं और वे चीखते-चिल्लाते पगलाए जन-समूह की तरह उसकी इच्छा के वशीभूत होकर अवास्तविक धार्मिक श्रद्धा के साथ उसको देखते रह जाते।
हिटलर के वादों में हर किसी को देने के लिए कुछ-न-कुछ था—बेरोजगार को काम, विफल कारोबारी लोगों के लिए समृद्धि, उद्योग को लाभ, सेना में वृद्धि एवं विस्तार, सामाजिक सामंजस्य, आदर्शवादी युवा छात्रों के विषय में वर्ग पृथक्ता का अंत और नैराश्य में डूबे लोगों को जर्मन गौरव की बहाली। उसने अराजकता में व्यवस्था स्थापित करने, सब लोगों में एकता की भावना जगाने और अपनापन उत्पन्न करने का वचन दिया। वह जर्मनी को दुबारा मजबूत बनाएगा, मित्र राष्ट्रों को युद्ध संबंधी हरजाने की अदायगी रोक देगा, वर्सेलिस संधि को खारिज कर देगा, भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त कर देगा, मार्क्सवाद पर अंकुश रखेगा और यहूदियों के साथ सख्ती से पेश आएगा।
उसने जर्मनी के सभी वर्गों के लोगों से अपील की। नाज़ी पार्टी का नाम ही जान-बूझकर ऐसा रखा गया था कि उसमें सब सम्मिलित हों—राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन कामगार पार्टी (नेशनल सोशलिस्ट जर्मन कामगार पार्टी)।
हिटलर से लेकर लघुतम नगर ब्लॉक के नेता तक, सभी नाज़ियों ने जर्मन जनमानस में उनका संदेश पहुँचाने के लिए बिना थके, लगातार काम किया।
14 सितंबर, 1930 को चुनाव के दिन नाज़ियों को 63,71,000 मत मिले, कुल मतों के 18 प्रतिशत से ऊपर और इस तरह वे जर्मन राइचस्टैग (जर्मन लोकसभा) में 107 सीटों के हकदार बन गए। हिटलर के लिए यह एक चमत्कारिक विजय थी। रातोरात, नाज़ी पार्टी जर्मनी की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई।
इस जीत ने हिटलर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलाई तथा विश्व के प्रचार माध्यमों में जिज्ञासा जगाई। उसके पास भेंट वार्त्ता के लिए अनुरोधों की झड़ी लग गई। विदेशी पत्रकार जानना चाहते थे कि वर्सेलिस संधि को खारिज करने तथा युद्ध संबंधी क्षतिपूर्ति को समाप्त करने से उसका क्या अभिप्राय था और उसकी इस घोषणा का क्या मतलब था कि प्रथम विश्व युद्ध के लिए जर्मनी जिम्मेदार नहीं है!
बीयर हॉल क्रांति के पीछे हिटलर की चार्ली चैपलिन जैसी जो हास्यास्पद छवि बनी थी, वह नष्ट हो गई। बीयर हॉल क्रांतिकारी की जगह अब एक कुशल वक्ता ने ले ली थी, जो जनता की भावनाओं के साथ खेल सकता था।
13 अक्तूबर, 1930 को निर्वाचित नाज़ी सदस्यों ने अपनी भूरे रंग की कमीजें पहनीं। वे एक साथ राइचस्टैग में दाखिल हुए और अपनी-अपनी सीटों पर बैठ गए। जब हाजिरी की गई, उनमें से प्रत्येक ने तेज आवाज में जवाब दिया, ‘‘हाजिर! हिटलर की जय हो (हेल हिटलर)!’’
उनका लोकतांत्रिक सरकार के साथ सहयोग करने का कोई इरादा नहीं था; क्योंकि वे जानते थे कि जर्मनी में हालात जितने खराब होंगे, उन्हें उतना ही अधिक लाभ पहुँचेगा और वे उस स्थिति का फायदा उठाकर दयनीय लोगों के बीच हिटलर को अधिक लोकप्रिय बना सकेंगे।
असैनिक वस्त्र पहने नाज़ी तूफानी दस्तों ने यहूदियों की दुकानों, रेस्तराँओं और डिपार्टमेंटल स्टोरों के शीशे तोड़कर अपनी जीत का जश्न मनाया, जो इस बात का संकेत था कि आगे क्या स्थिति आने वाली है!
लड़खड़ाते जर्मन लोकतंत्र के लिए घड़ी अंत निकट आने का संकेत दे रही थी और समय हिटलर के पक्ष में था।
सफलता और आत्महत्या
वर्ष 1930 और 1931 का समय राजनीतिक दृष्टि से हिटलर के लिए अच्छा था। उसका दल जर्मनी में दूसरा सबसे बड़ा दल बनकर उभरा। हिटलर सर्वाधिक बिकनेवाला लेखक बन गया। उसकी किताब ‘मैन कैंफ’ की लाखों प्रतियाँ बिक जाने से उसे काफी आय हुई। म्यूनिख में नाज़ी पार्टी को भी आकर्षक मुख्यालय ब्राउन हाउस मिल गया।
उन जर्मन उद्योगपतियों से नाज़ियों को धन प्राप्त हो रहा था, जो समझने लगे थे कि भविष्य में नाज़ी आगे बढ़ने वाले हैं। उन्होंने हिटलर के नाम इस उम्मीद में धन दिया कि जब उसे सत्ता हासिल होगी, वे उसकी कृपा-दृष्टि पा सकेंगे। उनसे प्राप्त धन का प्रयोग वैतनिक नाज़ियों की बढ़ती संख्या को भुगतान करने और गॉबेल के प्रचार-तंत्र को चलते रहने के लिए किया गया।
जर्मन जनरल स्टाफ भी इस आशा में हिटलर को समर्थन दे रहा था कि वह अपने वादे के अनुसार वर्सेलिस संधि को खारिज कर देगा, जिसकी शर्तों के अनुसार उनकी सेना में 1,00,000 से अधिक सैनिक नहीं हो सकते थे और सेना का आधुनिकीकरण भी नहीं किया जा सकता था। हिटलर ने जर्मन सेना में नाज़ी सिद्धांत फैलाने के आरोप में तीन युवा नियमित सेना अधिकारियों के मुकदमे के दौरान एक गवाह के रूप में जो प्रदर्शन किया था और साहस दिखाया था, उससे इन जनरलों को प्रोत्साहन मिला था।
हिटलर ने अदालत में अपनी पेशी के जरिए जनरल स्टाफ को यह संदेश पहुँचाया था कि नियमित सेना को हटाकर तूफानी दस्तों की सेना को उनकी जगह देने का कोई प्रयास नहीं किया जाएगा और यह कि सत्ता में आ जाने पर नाज़ी सरकार जर्मन सेना को महत्ता की नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने के लिए सबकुछ करेगी। जनरल वास्तव में यही सुनना चाहते थे।
किंतु हिटलर के लिए समस्याओं का कारण कोई और नहीं, उसके अपने ही समर्थक सैन्य दल (एस.ए.), तूफानी दस्ते बने। बहुत से हिंसा-प्रवृत्त, समाजवादी मानसिकतावाले एस.ए. सदस्य एक नई जर्मन क्रांतिकारी सेना बनना चाहते थे। हिटलर ने उन्हें दुबके-छिपे रहने का हुक्म दिया था। लेकिन उसके इस आदेश के बावजूद उन्होंने सड़कों पर उपद्रव मचाया। हिटलर को बर्लिन में कैप्टन वाल्टर स्टींस के नेतृत्व में किए गए एक छोटे विद्रोह का दमन करने के लिए अपने व्यक्तिगत अंगरक्षकों का इस्तेमाल करना पड़ा, जो हेनरिक हिटलर के नियंत्रणाधीन थे।
हिटलर ने पूर्व ए.ए. नेता, अर्नस्ट रोहम को नया नेता नियुक्त कर दिया, ताकि वह 60,000 सदस्य संख्यावाले तूफानी दस्तों (एस.ए.) को पुनर्गठित एवं व्यवस्थित कर सके। फिर भी, एस.ए. और उसके नेता वर्षों तक हिटलर के लिए सिरदर्द बने रहे, जिसकी परिणति कुछ साल बाद एक बड़े संकट में हुई। यह संकट उसके निजी जीवन में था, जिसने हिटलर को अंदर से बुरी तरह हिलाकर रख दिया।
वर्ष 1928 की गरमियों में हिटलर ने बर्शतिसगेडन में एक छोटा सा देहाती मकान किराए पर लिया था, जहाँ से बवेरियाई पहाड़ों का सुंदर दृश्य दिखाई देता था और जो वर्षों बाद उसके विस्तृत देहाती बँगले की जगह बनी।
हिटलर तब 39 वर्ष का था और यह पहली जगह थी, जिसे वह सच में घर कह सकता था। वह उस छोटे ग्राम्य-गृह में बस गया और उसने अपनी सौतेली बहन एंजेला को वियना छोड़कर उसके पास आकर रहने तथा घर का कामकाज सँभालने के लिए बुला लिया। एंजेला अपनी दोनों बेटियों फ्रेडिल और गेली को साथ लेकर आ गई।
गेली चौबीस वर्षीय प्रसन्नचित्त महिला थी। उसके बाल सुनहरे थे और चेहरे पर वियनी आकर्षण था। उसकी ये विशेषताएँ अपने से दोगुनी उम्र के किसी भी व्यक्ति को लुभा सकती थीं। हिटलर को उससे बेहद प्यार हो गया। वह पहली बार किसी युवा लड़के की भाँति उस पर प्यार लुटाने लगा। वह उसे खरीदारी कराने उसके साथ जाता और जब वह कपड़े पहनकर देखती तो हिटलर धैर्यपूर्वक खड़ा रहता। वह उसे थिएटरों, कॉफी हाउस, संगीत कार्यक्रमों और पार्टी की बैठकों में भी ले जाता।
हिटलर और उसकी भानजी के बीच प्रेम-संबंध स्थानीय प्रथाओं के अनुसार अधिकतर समाज में मान्य था, क्योंकि वह उसकी सौतेली बहन की बेटी थी।

जवान गेली इस व्यक्ति के प्रेम-प्रदर्शन से खुश थी, जिसकी प्रसिद्धि दिनोंदिन बढ़ रही थी। जब वे दोनों किसी कैफे में बैठे होते, तब भी अजनबी-अपरिचित लोग आकर हिटलर से कोई निशानी या उसके हस्ताक्षर माँगते। प्रभावशाली होने का आडंबर तो साथ में होता ही था, एस.एस. अंगरक्षक एक शोफर और आज्ञाकारी सहायकों की टोली।
लेकिन युवा गेली को इश्कबाजी का शौक था। हालाँकि उसे बड़ी उम्र के पुरुष का प्रेम-प्रदर्शन अच्छा लग रहा था, फिर भी उसे युवा लोगों की संगति की चाहत रहती थी। उसके कई प्रेम-प्रसंग हुए, जिनमें से एक हिटलर के शोफर के साथ भी था, जिसे बाद में नौकरी से हटा दिया गया।
यद्यपि हिटलर को गेली के प्रेम-प्रसंगों से जलन होती थी और वह उन्हें नापसंद भी करता था, लेकिन दूसरी ओर हिटलर स्वयं एक भूरे बालोंवाली सत्रह वर्षीया ईवा ब्रॉन से इश्क लड़ा रहा था, जो उसके निजी फोटोग्राफर हेनरिक हॉफमैन की फोटोग्राफी की दुकान पर काम करती थी।
अपनी भानजी के प्रति हिटलर की जलन और दखलंदाजी ने गेली के जीवन को अंधकारमय बना दिया, विशेषकर जब से वह म्यूनिख में नौ कमरों के एक आकर्षक फ्लैट में उसके साथ रहने के लिए गई। वह जहाँ भी जाती, दो नाज़ी संरक्षिकाएँ उसके साथ रहतीं और उसे ठीक उसी समय घर वापस आना पड़ता था, जो समय उसे दिया जाता था। हिटलर की अनुमति के बिना वह कुछ भी नहीं कर सकती थी। और वह जब-जब अपने अंकल के बंधनों से मुक्त होने की कोशिश करती, वह अपनी जकड़ और मजबूत कर देता।
अंतत: गेली के साथ हिटलर के प्रेम-संबंध बहुत बिगड़ गए। उनमें अकसर जोरदार बहस होती थी।
सितंबर 1931 में हिटलर ने उससे कहा, ‘‘मैं जब तक बाहर हूँ, तुम इस फ्लैट में ही रहना और वियना मत चली जाना।’’ यह सुनकर उसे गुस्सा आ गया। लंबी-चौड़ी बहस हुई। वह किसी भी हालत में जाना चाहती थी। हिटलर ने मना कर दिया।
हिटलर जैसे ही एस.ए. की एक बैठक में पहुँचने के लिए घर से निकल कर अपनी कार की तरफ गया, गेली ने खिड़की में से चिल्लाकर एक बार फिर पूछा कि क्या वह जा सकती है? हिटलर ने जवाब में सख्ती से कहा, ‘‘नहीं।’’
दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ, उसका बोझ लिये बेचैनी के साथ वह चला गया। अगली सुबह हैंबर्ग के रास्ते में एक टैक्सी ने झंडी दिखाकर हिटलर की कार रोकी। हिटलर जिस होटल से निकला था, वहाँ से रुडोल्फ हैस टेलीफोन पर हिटलर से तुरंत बात करना चाहता था। हिटलर ने जब फोन उठाया तो उसे बताया गया कि उसकी भानजी ने खुद को गोली मार ली है। व्याकुलता में हिटलर तुरंत म्यूनिख की ओर लौट पड़ा। जब तक वह अपने फ्लैट में पहुँचा, गेली की देह को पहले ही हटाया जा चुका था। उसने पिस्तौल से सीधे अपने दिल में गोली मार ली थी।
उसके प्रेम की जीवन-लीला समाप्त हो गई, वह भी भीषण परिस्थितियों में। जले पर नमक छिड़कने का काम अखबारों में छपी इन अफवाहों ने किया कि शायद उसकी हत्या हुई है—संभवत: हिटलर के कहने पर। हिटलर गहरे दु:ख में डूब गया और भोजन या नींद के बिना उसने कई दिन यूँ ही गुजार दिए, कमरे में आगे-पीछे चहलकदमी करते हुए।
हरमैन गेरिंग ने बाद में बताया कि उसकी प्यारी भानजी की खुदकुशी के पश्चात् हिटलर कभी भी पहले जैसा नहीं रहा। हिटलर ने बाद में कहा कि गेली एकमात्र स्त्री थी, जिससे उसने कभी प्यार किया था। उसने गेली की तसवीर हमेशा दीवार पर टाँगे रखी। उसके जन्म और मृत्यु की वर्षगाँठ पर वह उस तसवीर को फूलों से सजाता था।
हिटलर जब भी गेली का जिक्र करता था, उसकी आँखें आँसुओं से भर आती थीं।
आश्चर्य की बात है कि उसकी मृत्यु के कुछ ही समय बाद, जब वह नाश्ते के लिए बैठा था, तो नाश्ते में परोसे गए मांस के टुकड़े को उसने घृणा से देखा और यह कहकर उसे खाने से मना कर दिया कि उसे खाना मुर्दा खाने के बराबर है। बस, उसी क्षण से उसने मांस खाने से इनकार कर दिया।
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