हसीनाबाद, सन 1975।

सबसे पहले बोनफायर के इर्द गिर्द थिरकते कबाइलियों के पाँव थमे, फिर वातावरण में एक गहरी खामोशी इस कदर व्याप्त हो गयी मानो वहाँ का शोर किसी स्विच के जरिये संचालित रहा हो और स्विच को अचानक बंद कर दिया गया हो। पाषाण-प्रतिमा बने हुए कबाइली कई क्षणों तक विस्फारित नेत्रों से अपने साथी के उस मुंड को घूरते रहे, जिसे बेरहमीपूर्वक धड़ से उखाड़कर उनके बीच फेंक दिया गया था तत्पश्चात तेज चीख-पुकार मचाते हुए इधर-उधर भागने लगे। कुछ हौसलामंद लोगों ने बोनफायर की लकड़ियाँ उठाकर किसी आक्रमण के प्रति सजग रहने का दम भरा लेकिन उनका भी हौसला उस पल दम तोड़ गया, जब करीब ही उन्हें भेड़िये की गगनभेदी चिंघाड़ सुनाई पड़ी। जंगल का वह इलाका दहशत भरी चीखों से गूँज उठा। वातावरण में ‘आदमभेड़िया आ गया-आदमभेड़िया आ गया।’ की गूँज इस कदर बढ़ी कि बाकी आवाजें जर्फ़ हो गयीं। बदहवासी का आलम यूँ छाया कि किसी को ये सुध तक न रही कि जो गिर रहा है, वह दोबारा उठने से पहले बुरी तरह कुचला जा रहा है।

किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा कबीले का सरदार भेड़-बकरियों की तरह दिशाहीन होकर भाग रहे अपने लोगों को देख रहा था। कुछ को अभी भी भरोसा था कि वे कबीले में सुरक्षित हैं लिहाजा अपनी झोपड़ियों में छिपकर दरवाजा बंद कर रहे थे जबकि कुछ का नरभेड़िये से रक्षा करने वाली उस रस्म से भरोसा उठ गया था और वे बेतहाशा जंगल में, उस दिशा के विपरीत भाग रहे थे, जिस दिशा से भेड़िये की चिंघाड़ आयी थी। इस बीच क़त्ल किये जा चुके कबाइली का मुंड अनगिनत ठोकरें खाकर और भी लहुलुहान हुआ जा रहा था।

“य...य....ये....कैसे हो गया?” सरदार ने आँखों में नायकीनी लिए हुए उस ओर देखा, जिस ओर से नरभेड़िये की आवाज़ आयी थी- “वो वहशी यहाँ कैसे आ गया?”

सरदार ने आकाश की ओर देखा, जहाँ चमक रहे श्वेत चन्द्रमा पर बादल के हल्के-फुल्के कतरे मंडरा रहे थे। मैदान खाली हो चुका था। कबाइली अब या तो अपनी झोपड़ी में छिपे हुए थे या फिर जंगल में भाग गए थे। बाहर अब सरदार के अलावा उसके कुछ अंगरक्षक ही बचे हुए थे।

“अपनी-अपनी झोपड़ी में जाओ।” सरदार ने अंगरक्षकों को लक्ष्य करके कहा- “आज चाँदी के खंजर के इस्तेमाल का वक्त आ गया है।”

सुनते ही अंगरक्षक मैदान से यूँ गायब हुए जैसे उन्हें सरदार के उपर्युक्त कथन की ही प्रतीक्षा रही हो। उनके जाने के बाद सरदार ने दोनों हथेलियों की मुट्ठी बनाकर छाती से लगाई और गर्दन झुकाकर कोई प्रार्थना करने लगा। प्रार्थना पूरी करने के बाद जब उसने चेहरा ऊपर उठाया तो वह आत्मविश्वास से चमक रहा था। लम्बे-लम्बे डग भरते हुए वह अपनी झोपड़ी में पहुँचा और फिर वहाँ से झोपड़ी के उस खण्ड में दाखिल हुआ, जो कबीले के ईष्ट देव की अराधना स्थली थी। कबीले के विधान के मुताबिक़ नरभेड़िये के शिकार में इस्तेमाल होने वाला चाँदी का पवित्र खंजर वहीं रखा जाता था लेकिन उस क्षण सरदार बुरी तरह सहम गया, जब उसने देखा कि बगुले से मिलते-जुलते पक्षी जैसी सूरत वाले उनके देवता की मूर्ति जमीन पर खण्ड-खण्ड हुई बिखरी पड़ी थी।

इस बार सरदार की आँखों में जो भय नजर आया, वह ठीक वैसा ही था, जैसा उन पराजितों की आँखों में नजर आता है, जिनके लिए हार का मतलब मौत होता है। देवता के कदमों में रखी लकड़ी की पेटी खुली हुई थी और उसमें से चाँदी का खंजर गायब था।

“खंजर तलाश रहे हो सरदार, ताकि नरभेड़िये को मार सको?”

आवाज़ सुनकर सरदार पीछे मुड़ा और खौफ से जड़ होकर रह गया। पीछे पशुपति खड़ा था। उसके हाथ में चाँदी का वही खंजर चमक रहा था, जो नरभेड़िये को मारने के लिए अभीष्ट था। उसकी भेड़िये जैसी आँखें लाल थीं, समूचे जिस्म पर काले बाल थे, हाथों के नाखून ब्लिश्त भर लम्बे व नुकीले थे और बदन के कपड़े चीथड़ों में तब्दील हो गए थे। हालाँकि इस क्षण उसका चेहरा इंसानों जैसा ही था लेकिन पाशविकता उस पर पूरी तरह हावी थी। उसके मुँह से झाग बह रहा था और होठों के किनारों से दो नुकीले दांत बाहर झाँक रहे थे।

“मारोगे मुझे?” पशुपति ने सर्द लहजे में कहा और खंजर वाली अपनी हथेली सरदार की ओर फैला दी- “तो उठाओ खंजर, लगाओ मेरे दिल को निशाना।”

“तुम...तुम कौन हो...?” सरदार हकलाया। उसकी हिम्मत पशुपति की ओर बढ़ने की नहीं हुई- “हमारे रस्म में इतनी ताकत है कि कोई नरभेड़िया हमारे कबीले में आ ही नहीं सकता।”

पशुपति ने अपने कान में ठुँसी हुई रुई की गोलियों को बाहर निकाल दिया और इसी के साथ सरदार की आँखें हैरत से फैल गयीं।

“तुम..तुम साज़िश करके हम तक पहुँचे हो? तुम...तुम हमसे कोई बदला लेने आये हो?”

“खंजर उठाओ सरदार।” पशुपति का लहजा पहले से अधिक सर्द और भयानक हो गया- “वक्त निकला जा रहा है।”

सरदार कोशिशों के बाद भी ये नहीं समझ पाया कि पशुपति के उस आमंत्रण के पीछे उसका मंतव्य क्या था। कबीले की मान्यता के मुताबिक़ नरभेड़िये के खून में ये खासियत होती है कि उनकी रुधिर कणिकाएं चाँदी जैसे पदार्थ के साथ अभिकृत होकर एक विषैले यौगिक का निर्माण करती हैं, जो नरभेड़िये के पूरे शरीर में तेजी से फ़ैलकर उसकी मौत का कारण बन जाता है। इसलिए नरभेड़िये को मारने के तमाम टोटकों में प्रयुक्त हथियार अक्सर चाँदी के होते हैं, जैसे चाँदी के खंजर, चाँदी की गोलियाँ वगैरह। पशुपति के आमंत्रण के पीछे कारण कुछ भी रहा हो, सरदार के पास किसी भी तरह उस खंजर को दोबारा हासिल करने के अलावा और कोई चारा नहीं था क्योंकि बिना खंजर के वह बेकार था। उस दरिंदे के साथ उसका कोई मुकाबला ही नहीं था।

वह चौंकन्ना होकर आगे बढ़ा। उसकी एक आँख खंजर पर थी तो दूसरी पशुपति पर, जबकि पशुपति का पूरा ध्यान सरदार पर था, मानो कोई बगुला मछली का शिकार करने के लिए पानी में ध्यानस्थ खड़ा हो।

ठीक उस क्षण, जब सरदार, पशुपति की हथेली पर रखे खंजर पर झपट्टा मारने वाला था, पशुपति ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। आवेग में सरदार का धड़ पशुपति की ओर झुका और पशुपति के खंजर वाले हाथ ने हौले से हरकत की। परिणाम ये हुआ कि सरदार के गाल पर एक पतली सी लाल लकीर खींच गयी। कंठ से हल्की कराह निकालते हुए उसने बचाव के तहत अपने कदम पीछे खींच लिए, जबकि पशुपति अपनी ही जगह खड़ा रहा।

“दर्द महसूस हुआ सरदार?” उसने जहरबुझे लहजे में पूछा।

“तुम...तुम क्या चाहते हो?” सरदार हकलाया।

“इस कबीले को श्मशान बनाना।” कहने के साथ ही पशुपति के चेहरे पर जो वहशत उभरी, उसे देख सरदार दहल गया- “सबसे पहले तुम्हें एक बेरहम मौत दूँगा, फिर तुम्हारे इस कबीले को तुम्हारे लोगों की ही लाशों से पाट दूँगा।”

“तुम्ह....तुम्हारी प्रजाति के लोग तो ऐसा नहीं करते। व...वे केवल रास्ते में मिले शिकार को क़त्ल करते हैं लेकिन तुम...तुम तो बाकयाद साज़िश रचकर हमारे यहाँ आये। तुम्हें हमारे बारे में पूरी जानकारी है। तुमने हमारे रस्म से बचने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया।” सरदार के मन की उलझन वक्र रेखाओं की शक्ल में उसके माथे पर उभर आयी- “ह..हो कौन..तुम?”

पशुपति कुत्सित मुस्कान मुस्काया, मानो सरदार के उपर्युक्त सवाल से उसके मन में असीम आह्लाद उत्पन्न हुआ हो।

“तुम्हें शांति की मौत नहीं मरने दूँगा सरदार। तुम इस सवाल के साथ ही इस दुनिया से कूच करोगे कि आखिर क्यों एक नरभेड़िये ने तुम्हारे पूरे कुनबे को ख़ाक में मिला दिया।”

पशुपति ने खंजर को दूर उछाला और सरदार के बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया। सरदार ने प्रतिरोध किया लेकिन प्रतिद्वंद्वी के अपरिमित पाशविक बल के आगे उसका कोई पैंतरा न चल सका। पशुपति, उसे बालों से पकड़कर घसीटते हुए बाहर मैदान में लेकर आ गया। सरदार जमीन से उठने न पाये, इसलिए उसने अपना भारी-भरकम दाहिना पाँव उसकी छाती पर रख दिया तत्पश्चात चाँद की ओर देखा।

“ह....हमसे....हमसे क्या दुश्मनी है तुम्हारी?” मौत की दहलीज पर खड़े सरदार ने संभवत: आख़िरी बार उससे पूछा।

“मुझसे क्या दुश्मनी थी तुम्हारी?” पशुपति के हलक से भेड़िये और इंसान की मिली-जुली गुर्राहट निकली। उसके भारी-भरकम पाँव तले दम घुटने के कारण सरदार मुँह से तो कुछ नहीं कह पाया लेकिन उसकी भंगिमाओं से पशुपति ने भाँप लिया कि उसका सवाल सरदार की समझ में नहीं आया था। उसकी नासमझी को महसूस कर पशुपति की मुखाकृति पहले से अधिक कठोर हो गयी- “तुमने तो मुझे और भी नाराज कर दिया सरदार। तुम्हें तो ये भी याद नहीं रहा कि तुमने गुनाह क्या किया था। तुम समझते हो कि तुमने जो किया था, वो ऐसा कृत्य था ही नहीं, जिसे याद रखा जाए।”

सरदार गूं-गूं करता रहा, कुछ कह नहीं पाया।

“समय समाप्त हुआ।” सहसा पशुपति ने घोषणा की और अपना पैर सरदार की छाती से हटा लिया- “मौत के दूत तुम्हें लेने आ चुके हैं।” उसने सरदार का गला अपने पंजे में भींच लिया नतीजतन नुकीले नाखूनों की चुभन से सरदार के गले से खून रिसने लगा- “एक लाइन बोलता हूँ, शायद उस लाइन से तुम मुझे पहचान सको।” पशुपति का पंजा सरदार के गले से हटकर उसके बालों पर कस गया। उसने आँखों में हिंसक चमक और होठों पर रूह कंपा देने वाली वीभत्स मुस्कान लिए हुए कहा- “नियति की चंगुल से निकलकर आया हूँ, पहचानो कौन हूँ?”

पशुपति की आख़िरी लाइन सुनकर सरदार की आँखें हैरत से फैलती चली गयीं, शायद उस एकमात्र कथन के जरिये ही उसे अपने सारे सवालों के जवाब मिल गए थे लेकिन उन जवाबों को वह जाहिर न कर सका क्योंकि अगले ही क्षण पशुपति ने उसके सिर को धड़ से उखाड़कर हवा में उछाल दिया। वातावरण में सरदार की दिल दहला देने वाली आख़िरी चीख गूंजी और इसी के साथ उसके धड़ से पिचकारी की तरह छूटे रक्त के फव्वारे ने पशुपति के चेहरे को रंग दिया। धड़ काफी देर तक भूमि पर पड़ा छटपटाता रहा जबकि सिर न जाने कहाँ जाकर गिरा।

जब सरदार का धड़ निष्प्राण होकर शांत पड़ गया तो पशुपति ने आँखें बंद करके एक गहरी साँस ली मानो सरदार के खून से उसके सीने में धधकती प्रतिशोध की आग ठण्डी हो गयी हो।

और फिर पूनम की उस रात कबीले में मौत का ऐसा तांडव हुआ, जो पूरे जंगल के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। मासूम कबाइलियों के खून के छींटों से श्वेत चन्द्रमा भी रक्तिम पड़ गया। रात की खामोशी में मजलूमों की प्राणान्तक चीखें दूर तक गूँजी, जो वहाँ से मीलों दूर हसीनाबाद में भी सुनाई दिया।

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राजनगर, वर्तमान।

लियाकत उस एकमंजिला मकान के सामने पहुँचे, जो मुश्किल से दो या तीन कमरों का था और उनकी जानकारी के मुताबिक़ मुर्दाघर में गार्ड की नौकरी करने वाले कमलाप्रसाद बेनवंशी का था। मकान का रख-रखाव साधारण था। प्लास्टर इतने कमजोर हो चले थे कि देखकर लगता था महज़ हाथ लगा देने भर से वे दीवार से उखड़कर नीचे गिर सकते थे। हालाँकि लियाकत, कमला को अपने साथ मौलाना के यहाँ ले जाने के लिए लेने आये थे, ताकि मौलाना उससे अन्य बातों की तस्दीक करके उस रहस्यमयी मोमिन के बारे में कोई राय कायम कर सकें, जो उनके मुताबिक़ एक जिन्न था, लेकिन यहाँ जो माहौल था, उसे देख उनका मन द्रवित हो गया।

मकान के बाहर पड़ोसी खड़े थे और भीतर से रोने की आवाजें आ रही थीं। हर नए आगंतुक के हाथ में कफ़न होता था, जिसे वह एक जगह पर पहले से मौजूद कफ़न के ढेर पर रखने के बाद गमगीन मुद्रा लिए हुए भीड़ का हिस्सा बन जाता था। लियाकत के सामने ही दो लोग अंत्येष्टि का सामान और बाँस की खपच्चियाँ लेकर आये। उपर्युक्त माहौल को देखकर उनके मन में जो आशंका पनपी, उसके निराकरण के लिए उन्होंने नजदीक खड़े एक आदमी से पूछा- “ये कमला के यहाँ किसका इंतकाल हो गया जनाब?”

“खुद कमला का ही। रात को दिल का दौरा पड़ा और आनन-फानन में

निकल गया।”

सुनते ही लियाकत का बदन सर्द पड़ गया, आँखों में हैरत के भाव आये।

“दिल का दौरा ही पड़ा था, या कोई और माजरा था?” उन्होंने आशंकित लहजे में पूछा।

“अब कौन बता सकता है मियाँ कि असल माजरा क्या था। बीवी बता रही है कि कुछ दिनों से बड़ा ही डरा-डरा सा रहता था।”

“मुर्दाघर की नौकरी करता था न?” लियाकत ने कुछ नए तथ्य हासिल हो जाने की उम्मीद में अनजान बनकर पूछा।

“तभी तो गया जान से।” आदमी ने दबी-दबी जुबान में कहा।

“मुर्दाघर की नौकरी करने के एवज में मरा?” लियाकत ने भी दबी जुबान में ही पूछा।

“बताया जा रहा है कि कुछ दिन पहले वहाँ कोई घटना घटी थी उसके साथ। तभी से बुरे सपने देखने लगा था और सहमा-सहमा सा रहने लगा था। कल रात नींद में सोते हुए बड़े जोर से चीखा। चीखकर सुनकर जब बीवी बच्चे उठे तो क्या देखते हैं कि पत्थर का बुत बना हुआ कमला हवा में किसी को घूर रहा था। जब बीवी ने हिलाकर उसे नॉर्मल करने की कोशिश की तो त्योराकर गिर पड़ा, साँसें थम गयीं, धड़कनें रुक गयीं और जिस्म ठण्डा पड़ने लगा। लोग दहाड़े मारकर रोने लगे। बाद में पड़ोस के डॉक्टर ने कन्फर्म किया कि मर चुका है।”

सर्द आलम में भी लियाकत को बदन पर पसीने की लकीरें ढलकती हुई महसूस हुईं। उन्होंने बेचैन होकर चेहरे पर हथेली फिराई और भीड़ से दूर हटकर मौलाना को फोन करने की नियत से कुरते की जेब में हाथ डाला कि तभी आवाज़ आयी- “मत करो उसे फोन। वो भी मौत की राह पर है।”

लियाकत ने आवाज़ की दिशा में गर्दन घुमाई लेकिन आवाज़ देने वाले शख्स पर नजर पड़ते ही जड़ होकर रह गये। मुँह खुला रह गया और आँखों पर यकीन नहीं हुआ कि उनके सामने वही इंसान खड़ा था, जो इंसान नहीं था और मौलाना से मिलने से पहले जिसे वे रहस्यमयी मोमिन समझ रहे थे। वह हूबहू उसी पोशाक में था, जिस पोशाक में लियाकत ने उसे कमला द्वारा ली गयी तस्वीर में देखा था। सिर पर हरा साफ़ा, भयजदा करतीं भूरी-भूरी आँखें, निहायत ही गोरा और भरा हुआ चेहरा, घुटनों तक लटकता सफ़ेद बेदाग़ कमीज और सफ़ेद लम्बी दाढ़ी। लियाकत की जुबान को लकवा मार गया, वजह ये नहीं थी कि वे उसकी रौबदार शख्सियत के रुआब में आ गए थे, बल्कि असल वजह ये थी कि अब वे उस मखलूक की असली पहचान से वाकिफ़ थे। इस बात से वाकिफ़ थे कि वह आग का बना हुआ था। कुरते की जेब में पहुँचा लियाकत का हाथ काँपने लगा, जिसे

उस आदमी ने भी साफ़-साफ़ देखा।

“मौलाना से दरयाफ्त करने की जरूरत नहीं है। हम बताते हैं तुम्हें कि कमलाप्रसाद की मौत कैसे हुई।”

लियाकत ने थूक निगलकर गला तर किया और सामने खड़े शख्सियत की असली पहचान से नावाकिफ़ होने का दिखावा करते हुए कहा- “क....कैसी....कैसी...बातें कर रहे हैं मोहतरम? यहाँ एक इंतकाल हुआ है, इसीलिए चला आया मैं तो।”

“हमने मारा है उसे।” चेहरे पर डराने वाली गंभीरता लिए हुए उस आदमी ने बर्फ के समान ठण्डे लहजे में कहा- “जब मौलाना की मौत होगी तो उसकी वजह भी हम ही होंगे और अगर जिंदा रहना चाहते हो तो तुम भी हमें तलाशने का इरादा छोड़ दो, वरना तुम्हें इन दोनों से भी भयानक मौत देंगे हम।” कथन पूरा करने के साथ ही आदमी के चेहरे पर दहशतनाक भाव पाँव पसारने लगे।

लियाकत ने आस-पास नजरें घुमाने के बाद फिर से उस आदमी की ओर देखा, जो कहीं से भी नहीं लग रहा था कि किसी दूसरी दुनिया से आया हुआ है। असलियत न जानने वाले लोगों के लिए वह महज़ एक साधारण इंसान था। बल्कि ऐसा इंसान था, जिसे लोग कोई पीर समझकर सजदा करने लग सकते थे।

जब लियाकत ने देखा कि वह स्वयं अपनी पहचान छिपाने की कोशिश नहीं कर रहा है तो उन्होंने भी अनजान बनने के अपने नाटक का पटाक्षेप कर दिया और धीमे स्वर में पूछा- “क...क्यों..क्यों..मारा आपने उसे? किस मकसद से आप हम इंसानों की दुनिया में आये हैं?”

“हम, तुम इंसानों के मुखालिफ़ नहीं हैं और न ही तुम्हें कोई नुकसान पहुँचाने की ख्वाहिश पालते हैं लेकिन तुम लोगों से राबता रखने का इरादा भी नहीं रखते। हम यहाँ महज़ अपनी कुछ जरूरतों मसलन तालीम हासिल करने, अल्लाह की इबादत करने के तुम्हारे तौर-तरीके समझने और यहाँ फैली तुम्हारी बेशुमार तंजीमों की बाबत मालूमात हासिल करने के लिए आते हैं। और जो वक्फ़ा यहाँ गुजारते हैं, उस दरम्यान ये पुरजोर कोशिश करते हैं कि तुम हमें पहचान न सको क्योंकि हम नहीं चाहते कि तुम इंसान हमारे वजूद पर यकीन करो। ये यकीन करो कि जिन्नात होते हैं। यही कायनात का उसूल है कि अल्लाह के बनाए हुए दो सबसे काबिल मखलूक कभी एक-दूसरे की राह में न आयें और न ही एक-दूसरे के मामलात में दखल दें मगर फिर भी हमें दखल देना पड़ा। कमला नाम के इस आदमजात को दिल का दौरा देना पड़ा और तुम्हारे मौलाना को दिमागी हेमरेज।”

“द...दिमागी...हेमरेज....यानी कि..यानी कि ब्रेन हेमरेज?”

“हाँ क्योंकि ये दोनों कभी भी हमारी शिनाख्त के आम होने की वजह बन

सकते थे। अगर अपनी बची हुई जिंदगी से और परिवार से मोहब्बत है तो तुम भी ये कोशिश छोड़ दो क्योंकि तीन इंसानों को लगातार मौत बख्शना हमें भी गंवारा नहीं होगा।”

“तुम...तुम किस मकसद से हमारी दुनिया में हो? तुम विनायक की लाश पर पर निशान देखने मुर्दाघर क्यों गए थे? बताओ मुझे क्योंकि उस निशान को लेकर खुद मेरा बेटा भी परेशान है।”

“जो भी उस निशान में हद से ज्यादा दिलचस्पी लेगा, उसके राज़ को तलाशने की कोशिश करेगा उसकी जिंदगी जहन्नुम बन जायेगी। बुरे सपने उसका जीना हराम कर देंगे।” आदमी ने जबड़े भींचते हुए रहस्यमय लहजे में कहा- “इसलिए अपने बेटे से कहो कि उस निशान से दूर रहे। रही बात तुम्हारी दुनिया में हमारे आने की तो इसके पीछे हमारा मकसद किसी को ढूँढना है और उसे ढूंढकर एक बेरहम मौत देना है।” आदमी के चेहरे पर नफ़रत और क्रोध का जो दावानल नजर आया, उसने लियाकत को दहला दिया- “हमने अपने बारे में सब कुछ बता दिया तुम्हें, अब ये तुम्हारे ऊपर है कि तुम जिंदगी चुनते हो या मेरे हाथों मरने वालों की फेहरिस्त में दर्ज होते हो।”

आदमी की चेतावनी सुनकर लियाकत के समूचे बदन में खौफ़ सरगोशी कर उठी। खुद को जिन्न कहने वाला वह आदमी पलटा और हवा को भी मात देते हुए, तेज-तेज कदमों से चलते हुए एक गली में जाकर नज़रों से ओझल हो गया।

लियाकत ने जेब से मोबाइल निकाला और मौलाना का नम्बर मिलाया। फोन उनके किसी शागिर्द ने उठाया और बताया कि गुज़री हुई रात उनके दिमाग की कोई नस फट गयी थी और फिलहाल अस्पताल में थे लेकिन डॉक्टर के मुताबिक़ किसी भी पल उनकी साँसें थम सकती थीं।

खबर सुनते ही लियाकत को महसूस हुआ, जैसे उनके सीने भारी वजन रख दिया गया हो। उन्होंने अधरों पर जुबान फेरते हुए कमला के घर के सामने खड़े भीड़ पर नजर डाली। तत्पश्चात वहाँ से हट गए। कमला और मौलाना का चेहरा लगातार उनकी आँखों के सामने घूम रहा था।